राग गउड़ी

रात की धुन, चिंतन के घंटों की।
गौड़ी राग ग्रंथ साहिब का सबसे विस्तृत राग है, अंग चौरानवें से लेकर तीन-सौ-छियालिस तक चलता है। कुल अंगों का क़रीब अठारह प्रतिशत हिस्सा इसी एक राग के नाम है।
शास्त्रीय परम्परा में यह रात्रि का राग है, गहरा, चिंतन-प्रवण। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी विशेषता है।
“सिमरि सिमरि सिमरि सुख पाइआ ।” गउड़ी सुखमनी M5
इस राग के सब अंग
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