राग गउड़ी

रात की धुन, चिंतन के घंटों की।
गौड़ी राग ग्रंथ साहिब का सबसे विस्तृत राग है, अंग चौरानवें से लेकर तीन-सौ-छियालिस तक चलता है। कुल अंगों का क़रीब अठारह प्रतिशत हिस्सा इसी एक राग के नाम है।
शास्त्रीय परम्परा में यह रात्रि का राग है, गहरा, चिंतन-प्रवण। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी विशेषता है।
"सिमरि सिमरि सिमरि सुखु पाइआ ॥" गउड़ी M5
इस राग के सब अंग
151152153154155156157158159160161162163164165166167168169170171172173174175176177178179180181182183184185186187188189190191192193194195196197198199200201202203204205206207208209210211212213214215216217218219220221222223224225226227228229230231232233234235236237238239240241242243244245246247248249250251252253254255256257258259260261262263264265266267268269270271272273274275276277278279280281282283284285286287288289290291292293294295296297298299300301302303304305306307308309310311312313314315316317318319320321322323324325326327328329330331332333334335336337338339340341342343344345346
इस राग के शबद
हर शबद अपनी पहली पंक्ति से, वाणी के अनुसार। पंक्ति पर जाने से वह शबद अपने अंग पर खुलता है।
महला 1 (40)
- भउ मुचु भारा वडा तोलु ॥अंग 151
- डरि घरु घरि डरु डरि डरु जाइ ॥अंग 151
- माता मति पिता संतोखु ॥अंग 151
- पउणै पाणी अगनी का मेलु ॥अंग 152
- सुणि सुणि बूझै मानै नाउ ॥ ता कै सद बलिहारै जाउ ॥अंग 152
- जातो जाइ कहा ते आवै ॥अंग 152
- कामु क्रोधु माइआ महि चीतु ॥अंग 153
- उलटिओ कमलु ब्रहमु बीचारि ॥अंग 153
- सतिगुरु मिलै सु मरणु दिखाए ॥अंग 153
- किरतु पइआ नह मेटै कोइ ॥अंग 154
- जिनि अकथु कहाइआ अपिओ पीआइआ ॥अंग 154
- जनमि मरै त्रै गुण हितकारु ॥अंग 154
- अंम्रित काइआ रहै सुखाली बाजी इहु संसारो ॥अंग 154
- अवरि पंच हम एक जना किउ राखउ घर बारु मना ॥अंग 155
- मुंद्रा ते घट भीतरि मुंद्रा कांइआ कीजै खिंथाता ॥अंग 155
- अउखध मंत्र मूलु मन एकै जे करि द्रिड़ु चितु कीजै रे ॥अंग 156
- कत की माई बापु कत केरा किदू थावहु हम आए ॥अंग 156
- रैणि गवाई सोइ कै दिवसु गवाइआ खाइ ॥अंग 156
- हरणी होवा बनि बसा कंद मूल चुणि खाउ ॥अंग 157
- जै घरि कीरति आखीऐ करते का होइ बीचारो ॥अंग 157
- निधि सिधि निरमल नामु बीचारु ॥अंग 220
- मनु कुंचरु काइआ उदिआनै ॥अंग 221
- ना मनु मरै न कारजु होइ ॥अंग 222
- हउमै करतिआ नह सुखु होइ ॥अंग 222
- दूजी माइआ जगत चित वासु ॥अंग 223
- अधिआतम करम करे ता साचा ॥अंग 223
- खिमा गही ब्रतु सील संतोखं ॥अंग 223
- ऐसो दासु मिलै सुखु होई ॥अंग 224
- ब्रहमै गरबु कीआ नही जानिआ ॥अंग 224
- चोआ चंदनु अंकि चड़ावउ ॥अंग 225
- सेवा एक न जानसि अवरे ॥अंग 225
- हठु करि मरै न लेखै पावै ॥अंग 226
- हउमै करत भेखी नही जानिआ ॥अंग 226
- प्रथमे ब्रहमा कालै घरि आइआ ॥अंग 227
- बोलहि साचु मिथिआ नही राई ॥अंग 227
- रामि नामि चितु रापै जा का ॥अंग 228
- जिउ गाई कउ गोइली राखहि करि सारा ॥ अहिनिसि पालहि राखि लेहि आतम सुखु धारा ॥1॥अंग 228
- गुर परसादी बूझि ले तउ होइ निबेरा ॥अंग 229
- धन थीई दुबलि कंत हावै केव नैणी देखए ॥अंग 242
- किउ धीरैगी नाह बिना प्रभ वेपरवाहे ॥अंग 243
महला 3 (39)
- गुरि मिलिऐ हरि मेला होई ॥अंग 157
- गुर ते गिआनु पाए जनु कोइ ॥अंग 158
- सु थाउ सचु मनु निरमलु होइ ॥अंग 158
- इकि गावत रहे मनि सादु न पाइ ॥अंग 158
- मनु मारे धातु मरि जाइ ॥अंग 159
- हउमै विचि सभु जगु बउराना ॥अंग 159
- सो किउ विसरै जिस के जीअ पराना ॥अंग 159
- तूं अकथु किउ कथिआ जाहि ॥अंग 160
- एकसु ते सभि रूप हहि रंगा ॥अंग 160
- मनमुखि सूता माइआ मोहि पिआरि ॥अंग 160
- सचा अमरु सचा पातिसाहु ॥अंग 161
- जिना गुरमुखि धिआइआ तिन पूछउ जाइ ॥अंग 161
- गुर सेवा जुग चारे होई ॥अंग 161
- सतिगुरु मिलै वडभागि संजोग ॥अंग 162
- जैसी धरती ऊपरिमेघुला बरसतु है किआ धरती मधे पाणी नाही ॥अंग 162
- सभु जगु कालै वसि है बाधा दूजै भाइ ॥अंग 162
- पेईअड़ै दिन चारि है हरि हरि लिखि पाइआ ॥अंग 162
- सतिगुर ते गिआनु पाइआ हरि ततु बीचारा ॥अंग 163
- मन का सूतकु दूजा भाउ ॥अंग 229
- गुरमुखि सेवा प्रान अधारा ॥अंग 229
- इसु जुग का धरमु पड़हु तुम भाई ॥अंग 230
- ब्रहमा मूलु वेद अभिआसा ॥अंग 230
- ब्रहमा वेदु पड़ै वादु वखाणै ॥अंग 231
- त्रै गुण वखाणै भरमु न जाइ ॥अंग 231
- नामु अमोलकु गुरमुखि पावै ॥अंग 232
- मन ही मनु सवारिआ भै सहजि सुभाइ ॥अंग 232
- सतिगुर ते जो मुह फेरे ते वेमुख बुरे दिसंनि ॥अंग 233
- बिनु हरि पिआरे रहि न साकै गुर बिनु महलु न पाईऐ ॥अंग 243
- कापरु तनि सुहावै जा पिर भावै गुरमती चितु लाईऐ ॥अंग 244
- दुबिधा सहजि समाए कामणि वरु पाए गुरमती रंगु लाए ॥अंग 245
- सबदु खेवटु विचि पाए हरि आपि लघाए इन बिधि दुतरु तरीऐ ॥अंग 245
- घरि बैठिआ हरि पाए सदा चितु लाए सहजे सति सुभाए ॥अंग 246
- गउड़ी रागि सुलखणी जे खसमै चिति करेइ ॥अंग 311
- हउमै जगतु भुलाइआ दुरमति बिखिआ बिकार ॥अंग 312
- माइआधारी अति अंना बोला ॥अंग 313
- मनमुखु अहंकारी महलु न जाणै खिनु आगै खिनु पीछै ॥अंग 314
- जिनि गुरु गोपिआ आपणा तिसु ठउर न ठाउ ॥अंग 314
- मनमुखु अगिआनु दुरमति अहंकारी ॥अंग 314
- गुरमुखि गिआनु बिबेक बुधि होइ ॥अंग 317
महला 4 (109)
- पंडितु सासत सिम्रिति पड़िआ ॥अंग 163
- निरगुण कथा कथा है हरि की ॥अंग 164
- माता प्रीति करे पुतु खाइ ॥अंग 164
- भीखक प्रीति भीख प्रभ पाइ ॥अंग 164
- सतिगुर सेवा सफल है बणी ॥अंग 165
- हरि आपे जोगी डंडाधारी ॥अंग 165
- साहु हमारा तूं धणी जैसी तूं रासि देहि तैसी हम लेहि ॥अंग 165
- जिउ जननी गरभु पालती सुत की करि आसा ॥अंग 165
- हलु जोतै उदमु करे मेरा पुतु धी खाइ ॥अंग 166
- नित दिनसु राति लालचु करे भरमै भरमाइआ ॥अंग 166
- हमरै मनि चिति हरि आस नित किउ देखा हरि दरसु तुमारा ॥अंग 167
- घर मंदर घोड़े खुसी मनु अन रसि लाइआ ॥अंग 167
- जिउ जननी सुतु जणि पालती राखै नदरि मझारि ॥अंग 168
- जिसु मिलिऐ मनि होइ अनंदु सो सतिगुरु कहीऐ ॥अंग 168
- हरि दइआलि दइआ प्रभि कीनी मेरै मनि तनि मुखि हरि बोली ॥अंग 168
- जगजीवन अपरंपर सुआमी जगदीसुर पुरख बिधाते ॥अंग 169
- करहु क्रिपा जगजीवन दाते मेरा मनु हरि सेती राचे ॥अंग 169
- तुम दइआल सरब दुख भंजन इक बिनउ सुनहु दे काने ॥अंग 169
- मेरे मन सो प्रभु सदा नालि है सुआमी कहु किथै हरि पहु नसीऐ ॥अंग 170
- दइआ करहु हरि दरसु दिखावहु मेरै मनि तनि लोच घणेरी ॥1॥अंग 170
- इहु मनूआ खिनु न टिकै बहु रंगी दह दह दिसि चलि चलि हाढे ॥अंग 170
- कामि करोधि नगरु बहु भरिआ मिलि साधू खंडल खंडा हे ॥अंग 171
- इसु गड़ महि हरि राम राइ है किछु सादु न पावै धीठा ॥अंग 171
- हरि हरि अरथि सरीरु हम बेचिआ पूरे गुर कै आगे ॥अंग 171
- हम अहंकारी अहंकार अगिआन मति गुरि मिलिऐ आपु गवाइआ ॥अंग 172
- गुरमति बाजै सबदु अनाहदु गुरमति मनूआ गावै ॥अंग 172
- गुरमुखि जिंदू जपि नामु करंमा ॥अंग 172
- करहले मन परदेसीआ किउ मिलीऐ हरि माइ ॥अंग 234
- मन करहला वीचारीआ वीचारि देखु समालि ॥अंग 234
- सतिगुरु पुरखु दइआलु है जिस नो समतु सभु कोइ ॥अंग 300
- हउमै माइआ सभ बिखु है नित जगि तोटा संसारि ॥अंग 300
- तू सचा साहिबु सचु है सचु सचा गोसाई ॥अंग 301
- विणु नावै होरु सलाहणा सभु बोलणु फिका सादु ॥अंग 301
- सतिगुर हरि प्रभु दसि नामु धिआई मनि हरी ॥अंग 301
- तू आपे आपि निरंकारु है निरंजन हरि राइआ ॥अंग 301
- मन अंतरि हउमै रोगु है भ्रमि भूले मनमुख दुरजना ॥अंग 301
- मनु तनु रता रंग सिउ गुरमुखि हरि गुणतासु ॥अंग 301
- तू करता पुरखु अगंमु है किसु नालि तू वड़ीऐ ॥अंग 301
- मै मनि तनि प्रेमु पिरंम का अठे पहर लगंनि ॥अंग 301
- जिन अंदरि प्रीति पिरंम की जिउ बोलनि तिवै सोहंनि ॥अंग 301
- तू करता आपि अभुलु है भुलण विचि नाही ॥अंग 301
- सुणि साजन प्रेम संदेसरा अखी तार लगंनि ॥अंग 302
- सतिगुरु दाता दइआलु है जिस नो दइआ सदा होइ ॥अंग 302
- जिस नो साहिबु वडा करे सोई वड जाणी ॥अंग 302
- हरि सति निरंजन अमरु है निरभउ निरवैरु निरंकारु ॥अंग 302
- आपे धरती साजीअनु आपे आकासु ॥अंग 302
- तू सचा साहिबु सचु है सचु सचे भावै ॥अंग 302
- सतिगुरु धरती धरम है तिसु विचि जेहा को बीजे तेहा फलु पाए ॥अंग 302
- इकु मनु इकु वरतदा जितु लगै सो थाइ पाइ ॥अंग 303
- जिन हरि हिरदै सेविआ तिन हरि आपि मिलाए ॥अंग 303
- सतिगुर विचि वडी वडिआई जो अनदिनु हरि हरि नामु धिआवै ॥अंग 303
- पूरे गुर का हुकमु न मंनै ओहु मनमुखु अगिआनु मुठा बिखु माइआ ॥अंग 303
- सचु सचा सभ दू वडा है सो लए जिसु सतिगुरु टिके ॥अंग 304
- हरि प्रभ का सभु खेतु है हरि आपि किरसाणी लाइआ ॥अंग 304
- सारा दिनु लालचि अटिआ मनमुखि होरे गला ॥अंग 304
- तू वेपरवाहु अथाहु है अतुलु किउ तुलीऐ ॥अंग 304
- सतिगुर की सेवा निरमली निरमल जनु होइ सु सेवा घाले ॥अंग 304
- जिना अंदरि नामु निधानु हरि तिन के काज दयि आदे रासि ॥अंग 305
- तू साहिबु अगम दइआलु है वड दाता दाणा ॥अंग 305
- अगो दे सत भाउ न दिचै पिछो दे आखिआ कंमि न आवै ॥अंग 305
- गुर सतिगुर का जो सिखु अखाए सु भलके उठि हरि नामु धिआवै ॥अंग 305
- जो तुधु सचु धिआइदे से विरले थोड़े ॥अंग 306
- मलु जूई भरिआ नीला काला खिधोलड़ा तिनि वेमुखि वेमुखै नो पाइआ ॥अंग 306
- साहिबु जिस का नंगा भुखा होवै तिस दा नफरु किथहु रजि खाए ॥अंग 306
- नानक वीचारहि संत जन चारि वेद कहंदे ॥अंग 306
- सतिगुर सेती गणत जि रखै हलतु पलतु सभु तिस का गइआ ॥अंग 307
- तूहै सचा सचु तू सभ दू उपरि तू दीबाणु ॥अंग 307
- धुरि मारे पूरै सतिगुरू सेई हुणि सतिगुरि मारे ॥अंग 307
- जिन कउ आपि देइ वडिआई जगतु भी आपे आणि तिन कउ पैरी पाए ॥अंग 308
- तू सचा साहिबु आपि है सचु साह हमारे ॥अंग 308
- जिसु अंदरि ताति पराई होवै तिस दा कदे न होवी भला ॥अंग 308
- होदै परतखि गुरू जो विछुड़े तिन कउ दरि ढोई नाही ॥अंग 308
- जि होंदै गुरू बहि टिकिआ तिसु जन की वडिआई वडी होई ॥अंग 309
- काइआ कोटु अपारु है अंदरि हटनाले ॥अंग 309
- जो निंदा करे सतिगुर पूरे की सु अउखा जग महि होइआ ॥अंग 309
- वडभागीआ सोहागणी जिना गुरमुखि मिलिआ हरि राइ ॥अंग 309
- इहु सरीरु सभु धरमु है जिसु अंदरि सचे की विचि जोति ॥अंग 309
- सभि रस तिन कै रिदै हहि जिन हरि वसिआ मन माहि ॥अंग 310
- सा धरती भई हरीआवली जिथै मेरा सतिगुरु बैठा आइ ॥अंग 310
- सचु सचा सतिगुरु अमरु है जिसु अंदरि हरि उरि धारिआ ॥अंग 310
- करि किरपा सतिगुरु मेलिओनु मुखि गुरमुखि नामु धिआइसी ॥अंग 310
- गुरसिखा कै मनि भावदी गुर सतिगुर की वडिआई ॥अंग 310
- हउ आखि सलाही सिफति सचु सचु सचे की वडिआई ॥अंग 310
- जिना अंदरि उमरथल सेई जाणनि सूलीआ ॥अंग 311
- अउगणी भरिआ सरीरु है किउ संतहु निरमलु होइ ॥अंग 311
- सालाही सचु सालाहणा सचु सचा पुरखु निराले ॥अंग 311
- सतसंगति महि हरि उसतति है संगि साधू मिले पिआरिआ ॥अंग 311
- सचु सचे की सिफति सलाह है सो करे जिसु अंदरु भिजै ॥अंग 312
- साकत जाइ निवहि गुर आगै मनि खोटे कूड़ि कूड़िआरे ॥अंग 312
- सतिगुरु पुरखु अगंमु है जिसु अंदरि हरि उरि धारिआ ॥अंग 312
- सचु सुतिआ जिनी अराधिआ जा उठे ता सचु चवे ॥अंग 312
- किआ सवणा किआ जागणा गुरमुखि ते परवाणु ॥अंग 312
- सतिगुरु सेवीऐ आपणा पाईऐ नामु अपारु ॥अंग 313
- सचु सचे के जन भगत हहि सचु सचा जिनी अराधिआ ॥अंग 313
- मनमुखु प्राणी मुगधु है नामहीण भरमाइ ॥अंग 313
- गुरु सालाही आपणा बहु बिधि रंगि सुभाइ ॥अंग 313
- सचु सचा कुदरति जाणीऐ दिनु राती जिनि बणाईआ ॥अंग 313
- मै मनु तनु खोजि खोजेदिआ सो प्रभु लधा लोड़ि ॥अंग 313
- तू करता सभु किछु जाणदा जो जीआ अंदरि वरतै ॥अंग 314
- इहु मनूआ द्रिड़ु करि रखीऐ गुरमुखि लाईऐ चितु ॥अंग 314
- सा सेवा कीती सफल है जितु सतिगुर का मनु मंने ॥अंग 314
- जिन के चित कठोर हहि से बहहि न सतिगुर पासि ॥अंग 314
- तपा न होवै अंद्रहु लोभी नित माइआ नो फिरै जजमालिआ ॥अंग 315
- हरि भगतां हरि आराधिआ हरि की वडिआई ॥अंग 316
- मनमुख मूलहु भुलिआ विचि लबु लोभु अहंकारु ॥अंग 316
- जिना अंदरि दूजा भाउ है तिन॑ा गुरमुखि प्रीति न होइ ॥अंग 316
- जेवेहे करम कमावदा तेवेहे फलते ॥अंग 317
- सतिगुर के जीअ की सार न जापै कि पूरै सतिगुर भावै ॥अंग 317
- तूं सचा साहिबु अति वडा तुहि जेवडु तूं वड वडे ॥अंग 317
महला 5 (624)
- किन बिधि कुसलु होत मेरे भाई ॥अंग 175
- किउ भ्रमीऐ भ्रमु किस का होई ॥अंग 176
- कई जनम भए कीट पतंगा ॥अंग 176
- करम भूमि महि बोअहु नामु ॥अंग 176
- गुर का बचनु सदा अबिनासी ॥अंग 177
- जिनि कीता माटी ते रतनु ॥अंग 177
- तिस की सरणि नाही भउ सोगु ॥अंग 177
- सुणि हरि कथा उतारी मैलु ॥अंग 178
- अगले मुए सि पाछै परे ॥अंग 178
- अनिक जतन नही होत छुटारा ॥अंग 178
- बहुतु दरबु करि मनु न अघाना ॥अंग 179
- बहु रंग माइआ बहु बिधि पेखी ॥अंग 179
- तउ किरपा ते मारगु पाईऐ ॥अंग 180
- आन रसा जेते तै चाखे ॥अंग 180
- मनु मंदरु तनु साजी बारि ॥अंग 180
- रैणि दिनसु रहै इक रंगा ॥अंग 181
- तूं मेरा सखा तूंही मेरा मीतु ॥अंग 181
- नैनहु नीद पर द्रिसटि विकार ॥अंग 182
- जा कै वसि खान सुलतान ॥अंग 182
- सतिगुर दरसनि अगनि निवारी ॥अंग 183
- साधसंगि जपिओ भगवंतु ॥अंग 183
- बंधन तोड़ि बोलावै रामु ॥अंग 183
- जिसु मनि वसै तरै जनु सोइ ॥अंग 184
- जीअ जुगति जा कै है हाथ ॥अंग 184
- गुर परसादि नामि मनु लागा ॥अंग 184
- हसत पुनीत होहि ततकाल ॥अंग 185
- जो पराइओ सोई अपना ॥अंग 185
- कलिजुग महि मिलि आए संजोग ॥अंग 185
- हम धनवंत भागठ सच नाइ ॥अंग 185
- डरि डरि मरते जब जानीऐ दूरि ॥अंग 186
- जा का मीतु साजनु है समीआ ॥अंग 186
- जा कै दुखु सुखु सम करि जापै ॥अंग 186
- अगम रूप का मन महि थाना ॥अंग 186
- कवन रूपु तेरा आराधउ ॥अंग 186
- आपन तनु नही जा को गरबा ॥अंग 187
- गुर के चरण ऊपरि मेरे माथे ॥अंग 187
- रे मन मेरे तूं ता कउ आहि ॥ जा कै ऊणा कछहू नाहि ॥1॥अंग 187
- मीतु करै सोई हम माना ॥अंग 187
- जा कउ तुम भए समरथ अंगा ॥अंग 188
- दुलभ देह पाई वडभागी ॥अंग 188
- का की माई का को बाप ॥अंग 188
- वडे वडे जो दीसहि लोग ॥अंग 188
- पूरा मारगु पूरा इसनानु ॥अंग 188
- संत की धूरि मिटे अघ कोट ॥अंग 188
- हरि गुण जपत कमलु परगासै ॥अंग 189
- एकसु सिउ जा का मनु राता ॥अंग 189
- नामु भगत कै प्रान अधारु ॥अंग 189
- संत प्रसादि हरि नामु धिआइआ ॥अंग 189
- कर करि टहल रसना गुण गावउ ॥अंग 189
- जा कउ अपनी किरपा धारै ॥अंग 190
- छाडि सिआनप बहु चतुराई ॥अंग 190
- राखि लीआ गुरि पूरै आपि ॥अंग 190
- अनिक रसा खाए जैसे ढोर ॥अंग 190
- साधसंगि ता की सरनी परहु ॥अंग 191
- सूके हरे कीए खिन माहे ॥अंग 191
- ताप गए पाई प्रभि सांति ॥अंग 191
- भले दिनस भले संजोग ॥अंग 191
- गुर का सबदु राखु मन माहि ॥अंग 192
- जिसु सिमरत दूखु सभु जाइ ॥अंग 192
- भै महि रचिओ सभु संसारा ॥अंग 192
- तुमरी क्रिपा ते जपीऐ नाउ ॥अंग 192
- कण बिना जैसे थोथर तुखा ॥अंग 192
- तूं समरथु तूंहै मेरा सुआमी ॥अंग 193
- ता का दरसु पाईऐ वडभागी ॥अंग 193
- हरि सिमरत तेरी जाइ बलाइ ॥अंग 193
- हिरदै चरन कमल प्रभ धारे ॥अंग 193
- गुर जी के दरसन कउ बलि जाउ ॥अंग 193
- करै दुहकरम दिखावै होरु ॥अंग 194
- राम रंगु कदे उतरि न जाइ ॥अंग 194
- सिमरत सुआमी किलविख नासे ॥अंग 194
- हरि चरणी जा का मनु लागा ॥अंग 194
- हरि सिमरत सभि मिटहि कलेस ॥अंग 194
- जिस का दीआ पैनै खाइ ॥अंग 195
- प्रभ के चरन मन माहि धिआनु ॥अंग 195
- खादा पैनदा मूकरि पाइ ॥अंग 195
- अपने लोभ कउ कीनो मीतु ॥अंग 195
- कोटि बिघन हिरे खिन माहि ॥अंग 195
- करि किरपा भेटे गुर सोई ॥अंग 196
- बिखै राज ते अंधुला भारी ॥अंग 196
- आठ पहर संगी बटवारे ॥अंग 196
- थाती पाई हरि को नाम ॥अंग 196
- जलि थलि महीअलि पूरन हरि मीत ॥अंग 196
- हरि हरि नामि मजनु करि सूचे ॥अंग 197
- पउ सरणाई जिनि हरि जाते ॥अंग 197
- बाहरि राखिओ रिदै समालि ॥अंग 197
- धंनु इहु थानु गोविंद गुण गाए ॥अंग 197
- जो प्राणी गोविंदु धिआवै ॥अंग 197
- हरि के दास सिउ साकत नही संगु ॥अंग 198
- सा मति निरमल कहीअत धीर ॥अंग 198
- ऐसी प्रीति गोविंद सिउ लागी ॥अंग 198
- राम रसाइणि जो जन गीधे ॥अंग 198
- नितप्रति नावणु राम सरि कीजै ॥अंग 198
- सो किछु करि जितु मैलु न लागै ॥अंग 199
- जीवत छाडि जाहि देवाने ॥अंग 199
- गरीबा उपरि जि खिंजै दाड़ी ॥अंग 199
- महजरु झूठा कीतोनु आपि ॥अंग 199
- जन की धूरि मन मीठ खटानी ॥अंग 199
- जीवन पदवी हरि के दास ॥अंग 200
- सांति भई गुर गोबिदि पाई ॥अंग 200
- नेत्र प्रगासु कीआ गुरदेव ॥अंग 200
- धनु ओहु मसतकु धनु तेरे नेत ॥अंग 200
- तूंहै मसलति तूंहै नालि ॥अंग 200
- सतिगुरु पूरा भइआ क्रिपालु ॥अंग 200
- धोती खोलि विछाए हेठि ॥अंग 201
- थिरु घरि बैसहु हरि जन पिआरे ॥अंग 201
- हरि संगि राते भाहि न जलै ॥अंग 201
- उदमु करत सीतल मन भए ॥अंग 201
- कोटि मजन कीनो इसनान ॥अंग 202
- सिमरि सिमरि सिमरि सुखु पाइआ ॥अंग 202
- अपने सेवक कउ आपि सहाई ॥अंग 202
- राम को बलु पूरन भाई ॥अंग 202
- भुज बल बीर ब्रहम सुख सागर गरत परत गहि लेहु अंगुरीआ ॥1॥ रहाउ ॥अंग 203
- तुझ बिनु घरी न जीवना ध्रिगु रहणा संसारि ॥अंग 203
- है कोई राम पिआरो गावै ॥अंग 203
- कवन गुन प्रानपति मिलउ मेरी माई ॥1॥ रहाउ ॥अंग 204
- प्रभ मिलबे कउ प्रीति मनि लागी ॥अंग 204
- निकसु रे पंखी सिमरि हरि पांख ॥अंग 204
- हरि पेखन कउ सिमरत मनु मेरा ॥अंग 204
- किन बिधि मिलै गुसाई मेरे राम राइ ॥अंग 204
- ऐसो परचउ पाइओ ॥अंग 205
- अउध घटै दिनसु रैनारे ॥अंग 205
- राखु पिता प्रभ मेरे ॥अंग 205
- ओहु अबिनासी राइआ ॥अंग 206
- छोडि छोडि रे बिखिआ के रसूआ ॥अंग 206
- तुझ बिनु कवनु हमारा ॥अंग 206
- तुझ बिनु कवनु रीझावै तोही ॥अंग 207
- मिलहु पिआरे जीआ ॥अंग 207
- हउ ता कै बलिहारी ॥अंग 207
- जोग जुगति सुनि आइओ गुर ते ॥अंग 208
- अनूप पदारथु नामु सुनहु सगल धिआइले मीता ॥अंग 208
- दइआ मइआ करि प्रानपति मोरे मोहि अनाथ सरणि प्रभ तोरी ॥अंग 208
- तुम हरि सेती राते संतहु ॥अंग 209
- सहजि समाइओ देव ॥अंग 209
- पारब्रहम पूरन परमेसुर मन ता की ओट गहीजै रे ॥अंग 209
- हरि हरि कबहू न मनहु बिसारे ॥अंग 210
- सुखु नाही रे हरि भगति बिना ॥अंग 210
- मन धर तरबे हरि नाम नो ॥अंग 210
- दीबानु हमारो तुही एक ॥अंग 210
- जीअरे ओल॑ा नाम का ॥अंग 211
- बारनै बलिहारनै लख बरीआ ॥अंग 211
- हरि हरि हरि आराधीऐ ॥अंग 211
- मन राम नाम गुन गाईऐ ॥अंग 211
- रसना जपीऐ एकु नाम ॥अंग 211
- जा कउ बिसरै राम नाम ताहू कउ पीर ॥अंग 212
- गरबु बडो मूलु इतनो ॥अंग 212
- मोहि दासरो ठाकुर को ॥अंग 212
- है कोई ऐसा हउमै तोरै ॥अंग 212
- चिंतामणि करुणा मए ॥1॥ रहाउ ॥अंग 212
- मेरे मन सरणि प्रभू सुख पाए ॥अंग 212
- मेरे मन गुरु गुरु गुरु सद करीऐ ॥अंग 213
- त्रिसना बिरले ही की बुझी हे ॥1॥ रहाउ ॥अंग 213
- सभहू को रसु हरि हो ॥1॥ रहाउ ॥अंग 213
- गुन कीरति निधि मोरी ॥1॥ रहाउ ॥अंग 213
- मातो हरि रंगि मातो ॥1॥ रहाउ ॥अंग 214
- हरि नामु लेहु मीता लेहु आगै बिखम पंथु भैआन ॥1॥ रहाउ ॥अंग 214
- पाइओ बाल बुधि सुखु रे ॥अंग 214
- भावनु तिआगिओ री तिआगिओ ॥अंग 214
- पाइआ लालु रतनु मनि पाइआ ॥अंग 215
- उबरत राजा राम की सरणी ॥अंग 215
- मो कउ इह बिधि को समझावै ॥अंग 215
- हरि बिनु अवर क्रिआ बिरथे ॥अंग 216
- गउड़ी माला 5 ॥अंग 216
- तूं मेरा बहु माणु करते तूं मेरा बहु माणु ॥अंग 217
- दुख भंजनु तेरा नामु जी दुख भंजनु तेरा नामु ॥अंग 218
- हरि राम राम राम रामा ॥अंग 218
- मीठे हरि गुण गाउ जिंदू तूं मीठे हरि गुण गाउ ॥अंग 218
- जब इहु मन महि करत गुमाना ॥अंग 235
- गुर सेवा ते नामे लागा ॥अंग 236
- गुर का सबदु रिद अंतरि धारै ॥अंग 236
- प्रथमे गरभ वास ते टरिआ ॥अंग 237
- जो इसु मारे सोई सूरा ॥अंग 237
- हरि सिउ जुरै त सभु को मीतु ॥अंग 238
- बिनु सिमरन जैसे सरप आरजारी ॥अंग 239
- गुर कै बचनि मोहि परम गति पाई ॥अंग 239
- तिसु गुर कउ सिमरउ सासि सासि ॥अंग 239
- मिलु मेरे गोबिंद अपना नामु देहु ॥अंग 240
- आदि मधि जो अंति निबाहै ॥ सो साजनु मेरा मनु चाहै ॥1॥अंग 240
- खोजत फिरे असंख अंतु न पारीआ ॥अंग 240
- नाराइण हरि रंग रंगो ॥अंग 241
- हरि हरि गुरु गुरु करत भरम गए ॥अंग 241
- रंग संगि बिखिआ के भोगा इन संगि अंध न जानी ॥1॥अंग 242
- पुरखो बिधाता एकु स्रीधरु किउ मिलह तुझै उडीणीआ ॥अंग 247
- मोहन तेरे ऊचे मंदर महल अपारा ॥अंग 248
- पतित असंख पुनीत करि पुनह पुनह बलिहार ॥अंग 248
- जपि मना तूं राम नराइणु गोविंदा हरि माधो ॥अंग 248
- सुणि सखीए मिलि उदमु करेहा मनाइ लैहि हरि कंतै ॥अंग 249
- गुरदेव माता गुरदेव पिता गुरदेव सुआमी परमेसुरा ॥अंग 250
- आपहि कीआ कराइआ आपहि करनै जोगु ॥अंग 250
- ओअं साध सतिगुर नमसकारं ॥अंग 250
- निरंकार आकार आपि निरगुन सरगुन एक ॥अंग 250
- ओअं गुरमुखि कीओ अकारा ॥अंग 250
- सेई साह भगवंत से सचु संपै हरि रासि ॥अंग 250
- ससा सति सति सति सोऊ ॥अंग 250
- धनु धनु कहा पुकारते माइआ मोह सभ कूर ॥अंग 250
- धधा धूरि पुनीत तेरे जनूआ ॥अंग 251
- अनिक भेख अरु ङिआन धिआन मनहठि मिलिअउ न कोइ ॥अंग 251
- ङंङा ङिआनु नही मुख बातउ ॥अंग 251
- आवन आए स्रिसटि महि बिनु बूझे पसु ढोर ॥अंग 251
- या जुग महि एकहि कउ आइआ ॥अंग 251
- आवत हुकमि बिनास हुकमि आगिआ भिंन न कोइ ॥अंग 251
- एऊ जीअ बहुतु ग्रभ वासे ॥अंग 251
- किरत कमावन सुभ असुभ कीने तिनि प्रभि आपि ॥अंग 251
- एकहि आपि करावनहारा ॥अंग 251
- राचि रहे बनिता बिनोद कुसम रंग बिख सोर ॥अंग 251
- रे मन बिनु हरि जह रचहु तह तह बंधन पाहि ॥अंग 252
- टूटे बंधन जासु के होआ साधू संगु ॥अंग 252
- रारा रंगहु इआ मनु अपना ॥अंग 252
- लालच झूठ बिकार मोह बिआपत मूड़े अंध ॥अंग 252
- लला लपटि बिखै रस राते ॥अंग 252
- लाल गुपाल गोबिंद प्रभ गहिर गंभीर अथाह ॥अंग 252
- लला ता कै लवै न कोऊ ॥अंग 252
- आतम रसु जिह जानिआ हरि रंग सहजे माणु ॥अंग 252
- आइआ सफल ताहू को गनीऐ ॥अंग 252
- यासु जपत मनि होइ अनंदु बिनसै दूजा भाउ ॥ दूख दरद त्रिसना बुझै नानक नामि समाउ ॥1॥अंग 252
- यया जारउ दुरमति दोऊ ॥अंग 253
- अंतरि मन तन बसि रहे ईत ऊत के मीत ॥अंग 253
- अनदिनु सिमरहु तासु कउ जो अंति सहाई होइ ॥अंग 253
- अति सुंदर कुलीन चतुर मुखि ङिआनी धनवंत ॥अंग 253
- ङंङा खटु सासत्र होइ ङिआता ॥अंग 253
- कुंट चारि दह दिसि भ्रमे करम किरति की रेख ॥अंग 253
- कका कारन करता सोऊ ॥अंग 253
- खात खरचत बिलछत रहे टूटि न जाहि भंडार ॥अंग 253
- खखा खूना कछु नही तिसु संम्रथ कै पाहि ॥अंग 253
- गनि मिनि देखहु मनै माहि सरपर चलनो लोग ॥अंग 254
- गगा गोबिद गुण रवहु सासि सासि जपि नीत ॥अंग 254
- घोखे सासत्र बेद सभ आन न कथतउ कोइ ॥अंग 254
- घघा घालहु मनहि एह बिनु हरि दूसर नाहि ॥अंग 254
- ङणि घाले सभ दिवस सास नह बढन घटन तिलु सार ॥अंग 254
- ङंङा ङ्रासै कालु तिह जो साकत प्रभि कीन ॥अंग 254
- चिति चितवउ चरणारबिंद ऊध कवल बिगसांत ॥अंग 254
- चचा चरन कमल गुर लागा ॥ धनि धनि उआ दिन संजोग सभागा ॥अंग 254
- छाती सीतल मनु सुखी छंत गोबिद गुन गाइ ॥अंग 254
- छछा छोहरे दास तुमारे ॥अंग 254
- जोर जुलम फूलहि घनो काची देह बिकार ॥अंग 255
- जजा जानै हउ कछु हूआ ॥अंग 255
- झालाघे उठि नामु जपि निसि बासुर आराधि ॥अंग 255
- झझा झूरनु मिटै तुमारो ॥अंग 255
- ञतन करहु तुम अनिक बिधि रहनु न पावहु मीत ॥अंग 255
- ञंञा ञाणहु द्रिड़ु सही बिनसि जात एह हेत ॥अंग 255
- टूटे बंधन जनम मरन साध सेव सुखु पाइ ॥अंग 255
- टहल करहु तउ एक की जा ते ब्रिथा न कोइ ॥अंग 255
- ठाक न होती तिनहु दरि जिह होवहु सुप्रसंन ॥अंग 255
- ठठा मनूआ ठाहहि नाही ॥ जो सगल तिआगि एकहि लपटाही ॥अंग 256
- डंडउति बंदन अनिक बार सरब कला समरथ ॥अंग 256
- डडा डेरा इहु नही जह डेरा तह जानु ॥अंग 256
- ढाहन लागे धरम राइ किनहि न घालिओ बंध ॥अंग 256
- ढढा ढूढत कह फिरहु ढूढनु इआ मन माहि ॥अंग 256
- जह साधू गोबिद भजनु कीरतनु नानक नीत ॥अंग 256
- णाणा रण ते सीझीऐ आतम जीतै कोइ ॥अंग 256
- तनु मनु धनु अरपउ तिसै प्रभू मिलावै मोहि ॥अंग 256
- तता ता सिउ प्रीति करि गुण निधि गोबिद राइ ॥अंग 256
- थाके बहु बिधि घालते त्रिपति न त्रिसना लाथ ॥अंग 257
- थथा थिरु कोऊ नही काइ पसारहु पाव ॥अंग 257
- दासह एकु निहारिआ सभु कछु देवनहार ॥अंग 257
- ददा दाता एकु है सभ कउ देवनहार ॥अंग 257
- धर जीअरे इक टेक तू लाहि बिडानी आस ॥अंग 257
- धधा धावत तउ मिटै संतसंगि होइ बासु ॥अंग 257
- नानक नामु नामु जपु जपिआ अंतरि बाहरि रंगि ॥अंग 257
- नंना नरकि परहि ते नाही ॥ जा कै मनि तनि नामु बसाही ॥अंग 257
- पति राखी गुरि पारब्रहम तजि परपंच मोह बिकार ॥अंग 258
- पपा परमिति पारु न पाइआ ॥अंग 258
- फाहे काटे मिटे गवन फतिह भई मनि जीत ॥अंग 258
- फफा फिरत फिरत तू आइआ ॥अंग 258
- बिनउ सुनहु तुम पारब्रहम दीन दइआल गुपाल ॥अंग 258
- बबा ब्रहमु जानत ते ब्रहमा ॥अंग 258
- भै भंजन अघ दूख नास मनहि अराधि हरे ॥अंग 258
- भभा भरमु मिटावहु अपना ॥अंग 258
- माइआ डोलै बहु बिधी मनु लपटिओ तिह संग ॥अंग 258
- ममा मागनहार इआना ॥अंग 258
- मति पूरी परधान ते गुर पूरे मन मंत ॥अंग 259
- ममा जाहू मरमु पछाना ॥ भेटत साधसंग पतीआना ॥अंग 259
- यार मीत सुनि साजनहु बिनु हरि छूटनु नाहि ॥अंग 259
- यया जतन करत बहु बिधीआ ॥अंग 259
- रोसु न काहू संग करहु आपन आपु बीचारि ॥अंग 259
- रारा रेन होत सभ जा की ॥अंग 259
- लालच झूठ बिखै बिआधि इआ देही महि बास ॥अंग 259
- लला लावउ अउखध जाहू ॥अंग 259
- वासुदेव सरबत्र मै ऊन न कतहू ठाइ ॥अंग 259
- ववा वैरु न करीऐ काहू ॥अंग 259
- हउ हउ करत बिहानीआ साकत मुगध अजान ॥अंग 260
- ड़ाड़ा ड़ाड़ि मिटै संगि साधू ॥अंग 260
- साधू की मन ओट गहु उकति सिआनप तिआगु ॥अंग 260
- ससा सरनि परे अब हारे ॥ सासत्र सिम्रिति बेद पूकारे ॥अंग 260
- खुदी मिटी तब सुख भए मन तन भए अरोग ॥अंग 260
- खखा खरा सराहउ ताहू ॥अंग 260
- सति कहउ सुनि मन मेरे सरनि परहु हरि राइ ॥अंग 260
- ससा सिआनप छाडु इआना ॥अंग 260
- हरि हरि मुख ते बोलना मनि वूठै सुखु होइ ॥अंग 260
- हेरउ घटि घटि सगल कै पूरि रहे भगवान ॥अंग 260
- लेखै कतहि न छूटीऐ खिनु खिनु भूलनहार ॥अंग 261
- लूण हरामी गुनहगार बेगाना अलप मति ॥अंग 261
- खात पीत खेलत हसत भरमे जनम अनेक ॥अंग 261
- खेलत खेलत आइओ अनिक जोनि दुख पाइ ॥अंग 261
- आए प्रभ सरनागती किरपा निधि दइआल ॥अंग 261
- अखर महि त्रिभवन प्रभि धारे ॥अंग 261
- हथि कलंम अगंम मसतकि लिखावती ॥अंग 261
- हे अचुत हे पारब्रहम अबिनासी अघनास ॥अंग 261
- गुरदेव माता गुरदेव पिता गुरदेव सुआमी परमेसुरा ॥अंग 262
- आदि गुरए नमह ॥अंग 262
- सिमरउ सिमरि सिमरि सुखु पावउ ॥अंग 262
- सुखमनी सुख अंम्रित प्रभ नामु ॥अंग 262
- प्रभ कै सिमरनि रिधि सिधि नउ निधि ॥अंग 262
- प्रभ का सिमरनु सभ ते ऊचा ॥अंग 263
- प्रभ कउ सिमरहि से धनवंते ॥अंग 263
- प्रभ कउ सिमरहि से परउपकारी ॥अंग 263
- प्रभ कै सिमरनि कारज पूरे ॥अंग 263
- हरि सिमरनु करि भगत प्रगटाए ॥अंग 263
- दीन दरद दुख भंजना घटि घटि नाथ अनाथ ॥अंग 263
- जह मात पिता सुत मीत न भाई ॥अंग 264
- सगल स्रिसटि को राजा दुखीआ ॥अंग 264
- छूटत नही कोटि लख बाही ॥अंग 264
- जिह मारग के गने जाहि न कोसा ॥अंग 264
- भगत जना की बरतनि नामु ॥अंग 264
- हरि का नामु जन कउ मुकति जुगति ॥अंग 264
- हरि हरि जन कै मालु खजीना ॥अंग 265
- पारजातु इहु हरि को नाम ॥अंग 265
- बहु सासत्र बहु सिम्रिती पेखे सरब ढढोलि ॥अंग 265
- जाप ताप गिआन सभि धिआन ॥अंग 265
- नउ खंड प्रिथमी फिरै चिरु जीवै ॥अंग 265
- मन कामना तीरथ देह छुटै ॥अंग 265
- बहुतु सिआणप जम का भउ बिआपै ॥अंग 265
- चारि पदारथ जे को मागै ॥अंग 266
- सगल पुरख महि पुरखु प्रधानु ॥अंग 266
- निरधन कउ धनु तेरो नाउ ॥अंग 266
- सरब धरम महि स्रेसट धरमु ॥अंग 266
- निरगुनीआर इआनिआ सो प्रभु सदा समालि ॥अंग 266
- रमईआ के गुन चेति परानी ॥अंग 266
- जिह प्रसादि धर ऊपरि सुखि बसहि ॥अंग 267
- आदि अंति जो राखनहारु ॥अंग 267
- रतनु तिआगि कउडी संगि रचै ॥अंग 267
- करतूति पसू की मानस जाति ॥अंग 267
- सुनि अंधा कैसे मारगु पावै ॥अंग 267
- संगि सहाई सु आवै न चीति ॥अंग 267
- तू ठाकुरु तुम पहि अरदासि ॥अंग 268
- देनहारु प्रभ छोडि कै लागहि आन सुआइ ॥अंग 268
- दस बसतू ले पाछै पावै ॥अंग 268
- अगनत साहु अपनी दे रासि ॥अंग 268
- अनिक भाति माइआ के हेत ॥ सरपर होवत जानु अनेत ॥अंग 268
- मिथिआ तनु धनु कुटंबु सबाइआ ॥अंग 268
- मिथिआ स्रवन पर निंदा सुनहि ॥अंग 268
- बिरथी साकत की आरजा ॥अंग 269
- रहत अवर कछु अवर कमावत ॥अंग 269
- करउ बेनती पारब्रहमु सभु जानै ॥अंग 269
- काम क्रोध अरु लोभ मोह बिनसि जाइ अहंमेव ॥अंग 269
- जिह प्रसादि छतीह अंम्रित खाहि ॥अंग 269
- जिह प्रसादि पाट पटंबर हढावहि ॥अंग 269
- जिह प्रसादि आरोग कंचन देही ॥अंग 270
- जिह प्रसादि आभूखन पहिरीजै ॥अंग 270
- जिह प्रसादि करहि पुंन बहु दान ॥अंग 270
- जिह प्रसादि सुनहि करन नाद ॥अंग 270
- जिह प्रसादि तूं प्रगटु संसारि ॥अंग 270
- आपि जपाए जपै सो नाउ ॥अंग 270
- अगम अगाधि पारब्रहमु सोइ ॥अंग 271
- साध कै संगि मुख ऊजल होत ॥अंग 271
- साध कै संगि अगोचरु मिलै ॥अंग 271
- साधसंगि दुसमन सभि मीत ॥अंग 271
- साध कै संगि न कबहू धावै ॥अंग 271
- साध कै संगि सभ कुल उधारै ॥अंग 271
- साध कै संगि नही कछु घाल ॥अंग 272
- साध कै संगि सुनउ हरि नाउ ॥अंग 272
- साध की महिमा बेद न जानहि ॥अंग 272
- मनि साचा मुखि साचा सोइ ॥अंग 272
- ब्रहम गिआनी सदा निरलेप ॥अंग 272
- ब्रहम गिआनी निरमल ते निरमला ॥अंग 272
- ब्रहम गिआनी सगल की रीना ॥अंग 272
- ब्रहम गिआनी एक ऊपरि आस ॥अंग 273
- ब्रहम गिआनी कै एकै रंग ॥अंग 273
- ब्रहम गिआनी ब्रहम का बेता ॥अंग 273
- ब्रहम गिआनी की कीमति नाहि ॥अंग 273
- ब्रहम गिआनी सभ स्रिसटि का करता ॥अंग 273
- उरि धारै जो अंतरि नामु ॥अंग 274
- मिथिआ नाही रसना परस ॥अंग 274
- बैसनो सो जिसु ऊपरि सुप्रसंन ॥अंग 274
- भगउती भगवंत भगति का रंगु ॥अंग 274
- सो पंडितु जो मनु परबोधै ॥अंग 274
- बीज मंत्रु सरब को गिआनु ॥अंग 274
- जिस कै मनि पारब्रहम का निवासु ॥अंग 274
- प्रभ की आगिआ आतम हितावै ॥अंग 275
- पारब्रहम के सगले ठाउ ॥अंग 275
- उसतति करहि अनेक जन अंतु न पारावार ॥अंग 275
- कई कोटि होए पूजारी ॥अंग 275
- कई कोटि भए अभिमानी ॥अंग 275
- कई कोटि सिध जती जोगी ॥अंग 275
- कई कोटि राजस तामस सातक ॥अंग 276
- कई कोटि पाताल के वासी ॥अंग 276
- कई कोटि भए बैरागी ॥अंग 276
- कई कोटि खाणी अरु खंड ॥अंग 276
- कई कोटि पारब्रहम के दास ॥अंग 276
- करण कारण प्रभु एकु है दूसर नाही कोइ ॥अंग 276
- करन करावन करनै जोगु ॥अंग 276
- प्रभ भावै मानुख गति पावै ॥अंग 277
- कहु मानुख ते किआ होइ आवै ॥अंग 277
- खिन महि नीच कीट कउ राज ॥अंग 277
- इस का बलु नाही इसु हाथ ॥अंग 277
- कबहू निरति करै बहु भाति ॥अंग 277
- कबहू होइ पंडितु करे बख्यानु ॥अंग 277
- कबहू साधसंगति इहु पावै ॥अंग 278
- सुखी बसै मसकीनीआ आपु निवारि तले ॥अंग 278
- जिस कै अंतरि राज अभिमानु ॥अंग 278
- धनवंता होइ करि गरबावै ॥अंग 278
- कोटि करम करै हउ धारे ॥अंग 278
- जब लगु जानै मुझ ते कछु होइ ॥अंग 278
- सहस खटे लख कउ उठि धावै ॥अंग 278
- करन करावन करनैहारु ॥अंग 279
- आपि उपदेसै समझै आपि ॥अंग 279
- सति सति सति प्रभु सुआमी ॥अंग 279
- संत सरनि जो जनु परै सो जनु उधरनहार ॥अंग 279
- संत कै दूखनि आरजा घटै ॥अंग 279
- संत के दूखन ते मुखु भवै ॥अंग 279
- संत का निंदकु महा अतताई ॥अंग 280
- संत का दोखी सदा अपवितु ॥अंग 280
- संत का दोखी अध बीच ते टूटै ॥अंग 280
- संत का दोखी इउ बिललाइ ॥अंग 280
- संत का दोखी बिगड़ रूपु होइ जाइ ॥अंग 280
- सभ घट तिस के ओहु करनैहारु ॥अंग 280
- तजहु सिआनप सुरि जनहु सिमरहु हरि हरि राइ ॥अंग 281
- मानुख की टेक ब्रिथी सभ जानु ॥अंग 281
- उसतति मन महि करि निरंकार ॥अंग 281
- बडभागी ते जन जग माहि ॥अंग 281
- गुर प्रसादि आपन आपु सुझै ॥अंग 281
- जिस कउ हरि प्रभु मनि चिति आवै ॥अंग 281
- नह किछु जनमै नह किछु मरै ॥अंग 281
- जिन प्रभु जाता सु सोभावंत ॥अंग 282
- जो किछु करै सु प्रभ कै रंगि ॥अंग 282
- सरब कला भरपूर प्रभ बिरथा जाननहार ॥अंग 282
- टूटी गाढनहार गोुपाल ॥अंग 282
- रूपवंतु होइ नाही मोहै ॥अंग 282
- जिउ मंदर कउ थामै थंमनु ॥अंग 282
- मन मूरख काहे बिललाईऐ ॥अंग 282
- जिसु वखर कउ लैनि तू आइआ ॥अंग 283
- चरन साध के धोइ धोइ पीउ ॥अंग 283
- मिरतक कउ जीवालनहार ॥अंग 283
- जा कै मनि गुर की परतीति ॥अंग 283
- रूपु न रेख न रंगु किछु त्रिहु गुण ते प्रभ भिंन ॥अंग 283
- अबिनासी प्रभु मन महि राखु ॥अंग 283
- मनसा पूरन सरना जोग ॥अंग 284
- जा की लीला की मिति नाहि ॥अंग 284
- नाना रूप नाना जा के रंग ॥अंग 284
- नाम के धारे सगले जंत ॥अंग 284
- रूपु सति जा का सति असथानु ॥अंग 284
- सति बचन साधू उपदेस ॥अंग 284
- बिसमन बिसम भए बिसमाद ॥अंग 285
- आदि सचु जुगादि सचु ॥अंग 285
- चरन सति सति परसनहार ॥अंग 285
- सति सरूपु रिदै जिनि मानिआ ॥अंग 285
- ठाकुर का सेवकु आगिआकारी ॥अंग 285
- अपुने जन का परदा ढाकै ॥अंग 285
- नीकी कीरी महि कल राखै ॥अंग 285
- बारं बार बार प्रभु जपीऐ ॥अंग 286
- बोलहु जसु जिहबा दिनु राति ॥अंग 286
- मन मेरे तिन की ओट लेहि ॥अंग 286
- सति पुरखु जिनि जानिआ सतिगुरु तिस का नाउ ॥अंग 286
- सतिगुरु सिख की करै प्रतिपाल ॥अंग 286
- गुर कै ग्रिहि सेवकु जो रहै ॥अंग 286
- बीस बिसवे गुर का मनु मानै ॥अंग 287
- सफल दरसनु पेखत पुनीत ॥अंग 287
- जिहबा एक उसतति अनेक ॥अंग 287
- इहु हरि रसु पावै जनु कोइ ॥अंग 287
- तपति माहि ठाढि वरताई ॥अंग 287
- निरगुनु आपि सरगुनु भी ओही ॥अंग 287
- साथि न चालै बिनु भजन बिखिआ सगली छारु ॥अंग 288
- संत जना मिलि करहु बीचारु ॥अंग 288
- जिसु धन कउ चारि कुंट उठि धावहि ॥अंग 288
- मनु परबोधहु हरि कै नाइ ॥अंग 288
- ततु बीचारु कहै जनु साचा ॥अंग 288
- संगि न चालसि तेरै धना ॥अंग 288
- गुर की मति तूं लेहि इआने ॥अंग 288
- गुन गावत तेरी उतरसि मैलु ॥अंग 289
- एको जपि एको सालाहि ॥अंग 289
- फिरत फिरत प्रभ आइआ परिआ तउ सरनाइ ॥अंग 289
- जाचक जनु जाचै प्रभ दानु ॥अंग 289
- प्रभ की द्रिसटि महा सुखु होइ ॥अंग 289
- सेवक की मनसा पूरी भई ॥अंग 289
- सो किउ बिसरै जि घाल न भानै ॥अंग 289
- साजन संत करहु इहु कामु ॥अंग 290
- उपजी प्रीति प्रेम रसु चाउ ॥अंग 290
- प्रभ बखसंद दीन दइआल ॥अंग 290
- सरब बैकुंठ मुकति मोख पाए ॥अंग 290
- सरगुन निरगुन निरंकार सुंन समाधी आपि ॥अंग 290
- जब अकारु इहु कछु न द्रिसटेता ॥अंग 290
- जब होवत प्रभ केवल धनी ॥अंग 291
- अबिनासी सुख आपन आसन ॥अंग 291
- जह निरमल पुरखु पुरख पति होता ॥अंग 291
- जब अपनी सोभा आपन संगि बनाई ॥अंग 291
- जह अछल अछेद अभेद समाइआ ॥अंग 291
- जह आपि रचिओ परपंचु अकारु ॥अंग 291
- जह अबिगतु भगतु तह आपि ॥अंग 292
- जीअ जंत के ठाकुरा आपे वरतणहार ॥अंग 292
- आपि कथै आपि सुननैहारु ॥अंग 292
- जीअ जंत्र सभ ता कै हाथ ॥अंग 292
- पूरन पूरि रहे दइआल ॥अंग 292
- जनु लागा हरि एकै नाइ ॥अंग 292
- साधसंगि मिलि करहु अनंद ॥अंग 293
- हलतु पलतु दुइ लेहु सवारि ॥अंग 293
- तिस ते दूरि कहा को जाइ ॥अंग 293
- मति पूरी अंम्रितु जा की द्रिसटि ॥अंग 293
- गिआन अंजनु गुरि दीआ अगिआन अंधेर बिनासु ॥अंग 293
- संतसंगि अंतरि प्रभु डीठा ॥अंग 293
- सो अंतरि सो बाहरि अनंत ॥अंग 293
- बेद पुरान सिंम्रिति महि देखु ॥अंग 294
- संत जना का पेखनु सभु ब्रहम ॥अंग 294
- आपि सति कीआ सभु सति ॥अंग 294
- सरब भूत आपि वरतारा ॥अंग 294
- इस ते होइ सु नाही बुरा ॥अंग 294
- जो जानै तिसु सदा सुखु होइ ॥अंग 294
- पूरा प्रभु आराधिआ पूरा जा का नाउ ॥अंग 295
- पूरे गुर का सुनि उपदेसु ॥अंग 295
- खेम कुसल सहज आनंद ॥अंग 295
- उतम सलोक साध के बचन ॥अंग 295
- सरनि जोगु सुनि सरनी आए ॥अंग 295
- प्रभ की उसतति करहु संत मीत ॥अंग 295
- खेम सांति रिधि नव निधि ॥अंग 295
- इहु निधानु जपै मनि कोइ ॥अंग 296
- जिसु मनि बसै सुनै लाइ प्रीति ॥अंग 296
- जलि थलि महीअलि पूरिआ सुआमी सिरजनहारु ॥अंग 296
- एकम एकंकारु प्रभु करउ बंदना धिआइ ॥अंग 296
- करउ बंदना अनिक वार सरनि परउ हरि राइ ॥अंग 296
- दुतीआ दुरमति दूरि करि गुर सेवा करि नीत ॥अंग 296
- तीनि बिआपहि जगत कउ तुरीआ पावै कोइ ॥अंग 297
- त्रितीआ त्रै गुण बिखै फल कब उतम कब नीचु ॥अंग 297
- चतुर सिआणा सुघड़ु सोइ जिनि तजिआ अभिमानु ॥अंग 297
- चतुरथि चारे बेद सुणि सोधिओ ततु बीचारु ॥अंग 297
- पंच बिकार मन महि बसे राचे माइआ संगि ॥अंग 297
- पंचमि पंच प्रधान ते जिह जानिओ परपंचु ॥अंग 297
- खट सासत्र ऊचौ कहहि अंतु न पारावार ॥अंग 297
- खसटमि खट सासत्र कहहि सिंम्रिति कथहि अनेक ॥अंग 297
- संत मंडल हरि जसु कथहि बोलहि सति सुभाइ ॥अंग 298
- सपतमि संचहु नाम धनु टूटि न जाहि भंडार ॥अंग 298
- आठ पहर गुन गाईअहि तजीअहि अवरि जंजाल ॥अंग 298
- असटमी असट सिधि नव निधि ॥अंग 298
- नाराइणु नह सिमरिओ मोहिओ सुआद बिकार ॥अंग 298
- नउमी नवे छिद्र अपवीत ॥अंग 298
- दस दिस खोजत मै फिरिओ जत देखउ तत सोइ ॥अंग 298
- दसमी दस दुआर बसि कीने ॥अंग 298
- एको एकु बखानीऐ बिरला जाणै स्वादु ॥अंग 299
- एकादसी निकटि पेखहु हरि रामु ॥अंग 299
- दुरमति हरी सेवा करी भेटे साध क्रिपाल ॥अंग 299
- दुआदसी दानु नामु इसनानु ॥अंग 299
- तीनि गुणा महि बिआपिआ पूरन होत न काम ॥अंग 299
- त्रउदसी तीनि ताप संसार ॥अंग 299
- चारि कुंट चउदह भवन सगल बिआपत राम ॥अंग 299
- चउदहि चारि कुंट प्रभ आप ॥अंग 299
- आतमु जीता गुरमती गुण गाए गोबिंद ॥अंग 299
- अमावस आतम सुखी भए संतोखु दीआ गुरदेव ॥अंग 299
- पूरनु कबहु न डोलता पूरा कीआ प्रभ आपि ॥अंग 300
- पूरनमा पूरन प्रभ एकु करण कारण समरथु ॥अंग 300
- दुख बिनसे सहसा गइओ सरनि गही हरि राइ ॥अंग 300
- कोई गावै को सुणै कोई करै बीचारु ॥अंग 300
- रहदे खुहदे निंदक मारिअनु करि आपे आहरु ॥अंग 315
- मुंढहु भुले मुंढ ते किथै पाइनि हथु ॥अंग 315
- पउड़ी 5 ॥अंग 315
- सेवक सचे साह के सेई परवाणु ॥अंग 315
- जो धुरि लिखिआ लेखु प्रभ मेटणा न जाइ ॥अंग 315
- पउड़ी 5 ॥अंग 315
- नरक घोर बहु दुख घणे अकिरतघणा का थानु ॥अंग 315
- अवखध सभे कीतिअनु निंदक का दारू नाहि ॥अंग 315
- पउड़ी 5 ॥अंग 315
- भगत जनां का राखा हरि आपि है किआ पापी करीऐ ॥अंग 316
- नानक वीचारहि संत मुनि जनां चारि वेद कहंदे ॥अंग 316
- गुर नानक हरि नामु द्रिड़ाइआ भंनण घड़ण समरथु ॥अंग 317
- खुधिआवंतु न जाणई लाज कुलाज कुबोलु ॥अंग 317
- हरि हरि नामु जो जनु जपै सो आइआ परवाणु ॥अंग 318
- भलके उठि पराहुणा मेरै घरि आवउ ॥अंग 318
- जो तुधु भावै सो भला सचु तेरा भाणा ॥अंग 318
- चेता ई तां चेति साहिबु सचा सो धणी ॥अंग 318
- वाऊ संदे कपड़े पहिरहि गरबि गवार ॥अंग 318
- सेई उबरे जगै विचि जो सचै रखे ॥अंग 318
- नानक सोई दिनसु सुहावड़ा जितु प्रभु आवै चिति ॥अंग 318
- नानक मित्राई तिसु सिउ सभ किछु जिस कै हाथि ॥अंग 318
- अंम्रितु नामु निधानु है मिलि पीवहु भाई ॥अंग 318
- डिठड़ो हभ ठाइ ऊण न काई जाइ ॥अंग 318
- दामनी चमतकार तिउ वरतारा जग खे ॥अंग 319
- सिम्रिति सासत्र सोधि सभि किनै कीम न जाणी ॥अंग 319
- अंतरि चिंता नैणी सुखी मूलि न उतरै भुख ॥अंग 319
- मुठड़े सेई साथ जिनी सचु न लदिआ ॥अंग 319
- जिथै बैसनि साध जन सो थानु सुहंदा ॥अंग 319
- चिड़ी चुहकी पहु फुटी वगनि बहुतु तरंग ॥अंग 319
- घर मंदर खुसीआ तही जह तू आवहि चिति ॥अंग 319
- हरि धनु सची रासि है किनै विरलै जाता ॥अंग 319
- खखड़ीआ सुहावीआ लगड़ीआ अक कंठि ॥अंग 319
- विसारेदे मरि गए मरि भि न सकहि मूलि ॥अंग 319
- सुख निधानु प्रभु एकु है अबिनासी सुणिआ ॥अंग 319
- जिना सासि गिरासि न विसरै हरि नामां मनि मंतु ॥अंग 319
- अठे पहर भउदा फिरै खावण संदड़ै सूलि ॥अंग 319
- तिसै सरेवहु प्राणीहो जिस दै नाउ पलै ॥अंग 320
- जाचकु मंगै दानु देहि पिआरिआ ॥अंग 320
- सिखहु सबदु पिआरिहो जनम मरन की टेक ॥अंग 320
- ओथै अंम्रितु वंडीऐ सुखीआ हरि करणे ॥अंग 320
- सतिगुरि पूरै सेविऐ दूखा का होइ नासु ॥अंग 320
- जिसु सिमरत संकट छुटहि अनद मंगल बिस्राम ॥अंग 320
- तिन की सोभा किआ गणी जिनी हरि हरि लधा ॥अंग 320
- कामु न करही आपणा फिरहि अवता लोइ ॥अंग 320
- बिखै कउड़तणि सगल माहि जगति रही लपटाइ ॥अंग 320
- इह नीसाणी साध की जिसु भेटत तरीऐ ॥अंग 320
- नानक आए से परवाणु है जिन हरि वुठा चिति ॥अंग 320
- पारब्रहमु प्रभु द्रिसटी आइआ पूरन अगम बिसमाद ॥अंग 320
- धोहु न चली खसम नालि लबि मोहि विगुते ॥अंग 321
- उठंदिआ बहंदिआ सवंदिआ सुखु सोइ ॥अंग 321
- लालचि अटिआ नित फिरै सुआरथु करे न कोइ ॥अंग 321
- सभे वसतू कउड़ीआ सचे नाउ मिठा ॥अंग 321
- जाचड़ी सा सारु जो जाचंदी हेकड़ो ॥अंग 321
- नीहि जि विधा मंनु पछाणू विरलो थिओ ॥अंग 321
- सोई सेविहु जीअड़े दाता बखसिंदु ॥अंग 321
- वत लगी सचे नाम की जो बीजे सो खाइ ॥अंग 321
- मंगणा त सचु इकु जिसु तुसि देवै आपि ॥अंग 321
- लाहा जग महि से खटहि जिन हरि धनु रासि ॥अंग 321
- पारब्रहमि फुरमाइआ मीहु वुठा सहजि सुभाइ ॥अंग 321
- जंमणु मरणु न तिन॑ कउ जो हरि लड़ि लागे ॥अंग 322
- धरणि सुवंनी खड़ रतन जड़ावी हरि प्रेम पुरखु मनि वुठा ॥अंग 322
- फिरदी फिरदी दह दिसा जल परबत बनराइ ॥अंग 322
- जिसु सरब सुखा फल लोड़ीअहि सो सचु कमावउ ॥अंग 322
- एकु जि साजनु मै कीआ सरब कला समरथु ॥अंग 322
- जे करु गहहि पिआरड़े तुधु न छोडा मूलि ॥अंग 322
- सभि निधान घरि जिस दै हरि करे सु होवै ॥अंग 322
- भोरी भरमु वञाइ पिरी मुहबति हिकु तू ॥अंग 322
- चड़ि कै घोड़ड़ै कुंदे पकड़हि खूंडी दी खेडारी ॥अंग 322
- रसना उचरै हरि स्रवणी सुणै सो उधरै मिता ॥अंग 322
- धंधड़े कुलाह चिति न आवै हेकड़ो ॥अंग 323
- परेतहु कीतोनु देवता तिनि करणैहारे ॥अंग 323
- प्रभु बेअंतु किछु अंतु नाहि सभु तिसै करणा ॥अंग 323
- तिंना भुख न का रही जिस दा प्रभु है सोइ ॥अंग 323
- जाचिकु मंगै नित नामु साहिबु करे कबूलु ॥अंग 323
- मनु रता गोविंद संगि सचु भोजनु जोड़े ॥अंग 323
- ऐसो अचरजु देखिओ कबीर ॥अंग 326
महला 9 (9)
- साधो मन का मानु तिआगउ ॥अंग 219
- साधो रचना राम बनाई ॥अंग 219
- प्रानी कउ हरि जसु मनि नही आवै ॥अंग 219
- साधो इहु मनु गहिओ न जाई ॥अंग 219
- साधो गोबिंद के गुन गावउ ॥अंग 219
- कोऊ माई भूलिओ मनु समझावै ॥अंग 219
- साधो राम सरनि बिसरामा ॥अंग 220
- मन रे कहा भइओ तै बउरा ॥अंग 220
- नर अचेत पाप ते डरु रे ॥अंग 220
भगत कबीर जी (77)
- अब मोहि जलत राम जलु पाइआ ॥अंग 323
- माधउ जल की पिआस न जाइ ॥अंग 323
- जब हम एको एकु करि जानिआ ॥अंग 324
- नगन फिरत जौ पाईऐ जोगु ॥अंग 324
- संधिआ प्रात इस्नानु कराही ॥अंग 324
- कबीर जी गउड़ी ॥अंग 324
- गरभ वास महि कुलु नही जाती ॥अंग 324
- अंधकार सुखि कबहि न सोई है ॥अंग 325
- जोति की जाति जाति की जोती ॥अंग 325
- जो जन परमिति परमनु जाना ॥अंग 325
- उपजै निपजै निपजि समाई ॥अंग 325
- अवर मूए किआ सोगु करीजै ॥अंग 325
- असथावर जंगम कीट पतंगा ॥अंग 325
- जिउ जल छोडि बाहरि भइओ मीना ॥अंग 326
- चोआ चंदन मरदन अंगा ॥अंग 326
- जम ते उलटि भए है राम ॥अंग 326
- सबदि अतीति अनाहदि राता ॥अंग 327
- कंचन सिउ पाईऐ नही तोलि ॥अंग 327
- जिह मरनै सभु जगतु तरासिआ ॥अंग 327
- कत नही ठउर मूलु कत लावउ ॥अंग 327
- जा कै हरि सा ठाकुरु भाई ॥अंग 328
- बिनु सत सती होइ कैसे नारि ॥अंग 328
- बिखिआ बिआपिआ सगल संसारु ॥अंग 328
- जिह कुलि पूतु न गिआन बीचारी ॥अंग 328
- जो जन लेहि खसम का नाउ ॥ तिन कै सद बलिहारै जाउ ॥1॥अंग 328
- गगनि रसाल चुऐ मेरी भाठी ॥अंग 328
- मन का सुभाउ मनहि बिआपी ॥अंग 328
- ओइ जु दीसहि अंबरि तारे ॥अंग 329
- बेद की पुत्री सिंम्रिति भाई ॥अंग 329
- देइ मुहार लगामु पहिरावउ ॥अंग 329
- जिह मुखि पांचउ अंम्रित खाए ॥अंग 329
- आपे पावकु आपे पवना ॥अंग 329
- ना मै जोग धिआन चितु लाइआ ॥अंग 329
- जिह सिरि रचि रचि बाधत पाग ॥अंग 330
- गउड़ी गुआरेरी के पदे पैतीस ॥अंग 330
- गउड़ी गुआरेरी ॥अंग 330
- गउड़ी भी सोरठि भी ॥अंग 330
- कउनु को पूतु पिता को का को ॥अंग 331
- अब मो कउ भए राजा राम सहाई ॥अंग 331
- जलि है सूतकु थलि है सूतकु सूतक ओपति होई ॥अंग 331
- झगरा एकु निबेरहु राम ॥अंग 331
- देखौ भाई ग्यान की आई आंधी ॥अंग 331
- हरि जसु सुनहि न हरि गुन गावहि ॥अंग 332
- जीवत पितर न मानै कोऊ मूएं सिराध कराही ॥अंग 332
- जीवत मरै मरै फुनि जीवै ऐसे सुंनि समाइआ ॥अंग 332
- उलटत पवन चक्र खटु भेदे सुरति सुंन अनरागी ॥अंग 333
- तह पावस सिंधु धूप नही छहीआ तह उतपति परलउ नाही ॥अंग 333
- पापु पुंनु दुइ बैल बिसाहे पवनु पूजी परगासिओ ॥अंग 333
- गउड़ी पंचपदा ॥अंग 333
- जोगी कहहि जोगु भल मीठा अवरु न दूजा भाई ॥अंग 334
- जह कछु अहा तहा किछु नाही पंच ततु तह नाही ॥अंग 334
- सुरति सिम्रिति दुइ कंनी मुंदा परमिति बाहरि खिंथा ॥अंग 334
- गज नव गज दस गज इकीस पुरीआ एक तनाई ॥अंग 335
- एक जोति एका मिली किंबा होइ महोइ ॥अंग 335
- जेते जतन करत ते डूबे भव सागरु नही तारिओ रे ॥अंग 335
- कालबूत की हसतनी मन बउरा रे चलतु रचिओ जगदीस ॥अंग 335
- अगनि न दहै पवनु नही मगनै तसकरु नेरि न आवै ॥अंग 336
- जिउ कपि के कर मुसटि चनन की लुबधि न तिआगु दइओ ॥अंग 336
- पानी मैला माटी गोरी ॥अंग 336
- राम जपउ जीअ ऐसे ऐसे ॥ ध्रू प्रहिलाद जपिओ हरि जैसे ॥1॥अंग 337
- गउड़ी 9 ॥अंग 337
- गउड़ी पूरबी ॥अंग 337
- रे मन तेरो कोइ नही खिंचि लेइ जिनि भारु ॥अंग 337
- पंथु निहारै कामनी लोचन भरी ले उसासा ॥अंग 337
- आस पास घन तुरसी का बिरवा माझ बना रसि गाऊं रे ॥अंग 338
- गउड़ी पूरबी 12 ॥अंग 338
- गउड़ी 12 ॥अंग 338
- गउड़ी 13 ॥अंग 338
- लख चउरासीह जीअ जोनि महि भ्रमत नंदु बहु थाको रे ॥अंग 338
- निंदउ निंदउ मो कउ लोगु निंदउ ॥अंग 339
- राजा राम तूं ऐसा निरभउ तरन तारन राम राइआ ॥1॥ रहाउ ॥अंग 339
- खट नेम करि कोठड़ी बांधी बसतु अनूपु बीच पाई ॥अंग 339
- माई मोहि अवरु न जानिओ आनानां ॥अंग 339
- बावन अछर लोक त्रै सभु कछु इन ही माहि ॥अंग 340
- पंद्रह थितंी सात वार ॥अंग 343
- अंमावस महि आस निवारहु ॥अंग 343
- बार बार हरि के गुन गावउ ॥अंग 344
भगत नामदेव जी (1)
- देवा पाहन तारीअले ॥अंग 345