श्री ललिता सहस्रनाम
एक हज़ार नाम, श्रीविद्या परम्परा का हृदय-पाठ।

एक हज़ार नामों की संरचना
देवी की उपासना-परम्परा में सहस्रनाम-पाठ एक प्राचीन शैली है, जहाँ देवता के एक हज़ार नाम सूत्र-बद्ध छंद-संरचना में पिरोए जाते हैं। ललिता सहस्रनाम का मूल ब्रह्माण्ड-पुराण के उत्तर-खण्ड में आये ललितोपाख्यान में है, जहाँ हयग्रीव-अवतार-विष्णु अपने शिष्य अगस्त्य ऋषि को यह पाठ देते हैं। पारम्परिक तिथि-निर्धारण कठिन है, मगर पाठ की भाषा-शैली से अधिकांश विद्वान इसे आठवीं-नौवीं सदी के क़रीब रखते हैं।
कथा-संदर्भ यह है। अगस्त्य ऋषि और उनकी पत्नी लोपामुद्रा महान देवी-भक्त थे, मगर उनके सामने एक प्रश्न था: श्रीविद्या की उपासना का सबसे सम्पूर्ण रूप क्या है? अगस्त्य ने हयग्रीव से पूछा, हयग्रीव ने उत्तर में यह सहस्रनाम दिया। परम्परा कहती है कि इन नामों की रचना स्वयं ललिता की आज्ञा से आठ वाग्-देवियों ने की। पाठ-शैली नामावली की है, यानी हर नाम के आगे “ॐ” और अन्त में “नमः” जोड़ कर इसे ध्यान-पाठ के रूप में दोहराया जाता है। इसके अतिरिक्त सहस्रनाम-स्तोत्र की शैली भी है, जहाँ यही हज़ार नाम अनुष्टुप् छंदों में बँधे होते हैं।
नामों का क्रम संयोग नहीं है। आरम्भ के चौरासी नाम देवी के अवतार-प्रयोजन और सिर से चरण तक के स्वरूप-वर्णन से चलते हैं। आगे के नाम श्रीचक्र की संरचना और परिवार-देवियों का वर्णन हैं। बीच के नाम भण्डासुर-वध की कथा का सार हैं। अन्तिम सैंकड़ों नाम वैदिक तत्त्व-दर्शन की पारिभाषिकता हैं, सच्चिदानन्द-रूपिणी, सर्व-व्यापिनी, ब्रह्म-विद्या।
श्रीविद्या परम्परा
ललिता को समझने के लिए श्रीविद्या-परम्परा का संक्षिप्त परिचय आवश्यक है। यह तन्त्र की एक दक्षिणाचार शाखा है, अर्थात् वैदिक संस्कारों से मेल खाती हुई, वामाचार की क्रियाओं से अलग। श्रीचक्र, जो नौ त्रिकोणों से बना एक अन्तर्संगत यन्त्र है, इस परम्परा का केन्द्रीय प्रतीक है। ऊपर के चार त्रिकोण शिव (पुरुष-तत्त्व) के, नीचे के पाँच त्रिकोण शक्ति (प्रकृति-तत्त्व) के। बीच का बिन्दु ललिता का स्थान है।
परम्परा का गुप्त-केन्द्र पंचदशाक्षरी-मन्त्र है, पन्द्रह अक्षरों का एक छोटा-सा सूत्र। दीक्षा-गुरु शिष्य को यह मन्त्र देता है, और बाद में षोडशी (सोलहवें अक्षर) के साथ इसे पूर्ण किया जाता है। इस छोटे-से मन्त्र पर हज़ारों पन्नों की टीका लिखी गयी है, जिनमें सबसे प्रसिद्ध भास्करराय की “वरिवस्या-रहस्य” है, अठारहवीं सदी के मध्य की।
भण्डासुर-कथा का मध्य-भाग
देवी-भागवत और ब्रह्माण्ड-पुराण के विवरण के अनुसार, ललिता का अवतार एक विशिष्ट प्रयोजन के लिए हुआ, भण्डासुर नामक राक्षस के वध के लिए। भण्ड की उत्पत्ति की कथा यह है। शिव ने जब कामदेव को तीसरे नेत्र से भस्म किया, तो उसकी राख से एक भयानक असुर उत्पन्न हुआ, जिसका नाम भण्ड पड़ा, अर्थात् “जो रिक्त है”। ब्रह्मा ने उसे यह वर दिया कि वह जिस शस्त्र से लड़ेगा, उसी शस्त्र की आधी शक्ति प्रतिद्वंद्वी से जीत लेगा।
भण्डासुर ने तीनों लोक जीत लिए। देवताओं ने ललिता का आह्वान किया, और वह चिदग्नि-कुण्ड से प्रकट हुईं, सहस्र-सूर्य की कान्ति-धारिणी, चार भुजाओं वाली, पाश, अंकुश, धनुष और बाण से सज्जित। अपनी मन्त्रिणी (मन्त्र-शक्ति) और वाराही (दण्ड-शक्ति) के साथ उन्होंने भण्डासुर का वध किया। सहस्रनाम के बीच के लगभग सौ नाम इसी युद्ध-कथा को सूत्र-रूप में कहते हैं।
संरचना: दस खण्डों में
हमने एक हज़ार नामों को दस खण्डों में बाँटा है, प्रत्येक खण्ड लगभग सौ नाम। यह विषय-अनुसार विभाजन भास्करराय की “सौभाग्य-भास्कर” टीका में मिलने वाली अर्थ-संगति का अनुसरण करता है।
देव-कार्य और दिव्य-स्वरूप
श्री-माता से आरम्भ, चौरासी नाम। ये पहले नाम देवी के अवतार-प्रयोजन और सिर से कण्ठ तक के स्वरूप का वर्णन करते हैं। “देव-कार्य-समुद्यता” से चल कर अंग-वर्णन तक का भाग।
अंग-वर्णन, आभूषण और सिंहासन
शेष शरीर-अंगों का वर्णन और सिंहासन-शोभा। कण्ठ से चरण तक का स्वरूप, और देवी का आसन। यह भाग स्वरूप-चित्रण से भरा है।
श्रीचक्र और परिवार-देवियाँ
श्रीचक्र-राज-निलया से आरम्भ, परिवार-देवियों (वाग्-देवियाँ, नित्या-देवियाँ, मन्त्रिणी, वाराही) का वर्णन। यह भाग श्रीविद्या की तान्त्रिक संरचना खोलता है।
भण्डासुर-वध और युद्ध-कथा
देवी का अवतार-प्रयोजन: भण्डासुर नामक असुर का वध। यह भाग युद्ध-कथा कहता है, जैसे देवी-माहात्म्य में महिषासुर का वध। मन्त्रिणी और वाराही की भूमिका।
श्रीविद्या और तत्त्व-नाम
श्रीविद्या, षोडशी, बिन्दु, मन्त्र-तन्त्र-यन्त्र-स्वरूप। देवी के वे नाम जो गूढ़ तत्त्व को बताते हैं।
ब्रह्माण्ड-व्यापक स्वरूप
देवी का ब्रह्माण्ड-व्यापी रूप। माया, मूल-प्रकृति, अव्यक्त। सांख्य-तत्त्व के नाम।
साधक-संबंध और साधना-मार्ग
साधक के साथ देवी का संबंध। नित्य-तृप्ता, सर्व-गा, सर्व-मोहिनी। तन्त्र के मार्ग और उपासना के स्तर।
वेदान्त और महावाक्य से संगति
देवी का वेदान्तिक स्वरूप: सच्चिदानन्द-रूपिणी, ब्रह्म-विद्या, तत्त्व-मयी। यह भाग श्रीविद्या और अद्वैत-वेदान्त के मिलन-बिन्दु को दिखाता है।
समापन और मुद्रांकन-नाम
अन्तिम सौ नाम, पाठ को मुद्रांकित करने वाले नाम। श्री-शिवा, शिव-शक्ति-ऐक्य-रूपिणी, ललिताम्बिका, ये अन्तिम तीन नाम पूरे स्तोत्र का सार हैं।
पाठ की पुरानी पद्धति
पारम्परिक रूप से यह पाठ शुक्रवार को विशेष होता है, क्योंकि शुक्रवार ललिता का दिन है। पाठ-विधि सरल है। प्रातः स्नान के बाद, श्रीयन्त्र या किसी ललिता-चित्र के सामने बैठ कर, एक सरल संकल्प, “मैं यह स्तोत्र ललिता-त्रिपुर-सुन्दरी देवी की प्रीति के लिए पढ़ रही हूँ” अथवा “पढ़ रहा हूँ”। फिर एक हज़ार नाम बिना रुके, बिना त्रुटि के, श्रद्धा से। पैंतीस से चालीस मिनट में पूरा।
नये पाठक एक खण्ड प्रतिदिन के क्रम से दस दिन में इसे पूरा कर सकते हैं। पारम्परिक पंचाङ्ग-पाठ में पटल, पद्धति, कवच, सहस्रनाम और स्तव, पाँचों एक साथ होते हैं, मगर केवल सहस्रनाम पढ़ना भी पूर्ण माना जाता है।
साथ में पढ़ें
- सौन्दर्य-लहरी शंकराचार्य-कृत, श्रीविद्या का काव्य-स्वरूप
- देवी माहात्म्य मार्कण्डेय-पुराण से, दुर्गा-स्वरूप
- ललिता त्रिशती तीन सौ नामों का स्तोत्र, सहस्रनाम का सहोदर
- खड्ग-माला स्तोत्रम् श्रीचक्र की पूजा-विधि
- महावाक्य श्रीविद्या और अद्वैत-वेदान्त का मिलन-बिन्दु
यही कथा वहाँ भी
- देवी
पात्र-परिचय: देवी का समग्र स्वरूप - देवी माहात्म्य
देवी माहात्म्य (मार्कण्डेय पुराण): दुर्गा-चण्डिका का असुर-संहार - सौन्दर्य लहरी · Saundarya Lahari
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