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अंग 167

अंग
167
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
जितनी भूख अन रस साद है तितनी भूख फिरि लागै ॥
जिसु हरि आपि क्रिपा करे सो वेचे सिरु गुर आगै ॥
जन नानक हरि रसि त्रिपतिआ फिरि भूख न लागै ॥4॥4॥10॥48॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: और और रसों की और और स्वादों की जितनी भी तृष्णा (मनुष्य को लगती) है, (ज्यों ज्यों रसों के स्वाद लेते जाते हैं) उतनी ही तृष्णा बारंबार लगती जाती है। (माया के रसों से मनुष्य कभी भी तृप्त नहीं होता)। जिस मनुष्य पर परमात्मा स्वयं कृपा करता है, वह मनुष्य गुरू के आगे (अपना) सिर बेच देता है (वह अपना आप गुरू के हवाले करता है)। हे दास नानक ! वह मनुष्य परमात्मा के नाम-रस से तृप्त हो जाता है, उसे माया की तृष्णा नहीं व्यापती। 4। 4। 10। 48।
गउड़ी बैरागणि महला 4 ॥
हमरै मनि चिति हरि आस नित किउ देखा हरि दरसु तुमारा ॥
जिनि प्रीति लाई सो जाणता हमरै मनि चिति हरि बहुतु पिआरा ॥
हउ कुरबानी गुर आपणे जिनि विछुड़िआ मेलिआ मेरा सिरजनहारा ॥1॥
मेरे राम हम पापी सरणि परे हरि दुआरि ॥
मतु निरगुण हम मेलै कबहूं अपुनी किरपा धारि ॥1॥ रहाउ ॥
हमरे अवगुण बहुतु बहुतु है बहु बार बार हरि गणत न आवै ॥
तूं गुणवंता हरि हरि दइआलु हरि आपे बखसि लैहि हरि भावै ॥
हम अपराधी राखे गुर संगती उपदेसु दीओ हरि नामु छडावै ॥2॥
तुमरे गुण किआ कहा मेरे सतिगुरा जब गुरु बोलह तब बिसमु होइ जाइ ॥
हम जैसे अपराधी अवरु कोई राखै जैसे हम सतिगुरि राखि लीए छडाइ ॥
तूं गुरु पिता तूंहै गुरु माता तूं गुरु बंधपु मेरा सखा सखाइ ॥3॥
जो हमरी बिधि होती मेरे सतिगुरा सा बिधि तुम हरि जाणहु आपे ॥
हम रुलते फिरते कोई बात न पूछता गुर सतिगुर संगि कीरे हम थापे ॥
धंनु धंनु गुरू नानक जन केरा जितु मिलिऐ चूके सभि सोग संतापे ॥4॥5॥11॥49॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी बैरागणि महला 4 ॥ हे हरी ! मेरे मन में चित्त में सदा ये उम्मीद रहती है कि मैं किसी तरह आपका दर्शन कर सकूँ। (हे भाई !) जिस हरी ने मेरे अंदर अपना प्यार पैदा किया है वही जानता है। मुझे अपने मन में अपने चित्त में हरी बहुत अच्छा लग रहा है। मैं अपने गुरू से सदके जाता हूँ, जिसने मुझे मेरा विछुड़ा हुआ सृजनहार हरी मिला दिया है। 1। हे मेरे राम ! मैं पापी आपकी शरण आया हूँ, आपके दर पर आ गिरा हूँ कि शायद (इस तरह) आप अपनी मेहर करके मुझ गुणहीन को अपने चरणों में जोड़ ले। 1। रहाउ। हे हरी ! मेरे अंदर बेअंत अवगुण हैं, गिने नहीं जा सकते। मैं मुड़ मुड़ के अवगुण करता हूँ। आप गुणों का मालिक है, दया का घर है। जब आपकी रजा होती है आप खुद बख्श लेता है। (हे भाई !) हम जैसे पापियों को हरी गुरू की संगति में रखता है, उपदेश देता है, और उसका नाम विकारों से खलासी कर देता है। 2। हे मेरे सत्गुरू ! मैं आपके कौन कौन से गुण बयान करूँ? जब मैं ‘गुरू गुरू’ जपता हूँ, मेरी हालत आश्चर्यजनक अवस्था वाली बन जाती है। हम जैसे पापियों को जैसे सत्गुरू ने रख लिया है (बचा लिया है) (विकारों के पँजे से) छुड़ा लिया है। और कौन (इस तरह) बचा सकता है? हे हरी ! आप ही मेरा गुरू है, मेरा पिता है, मेरा रिश्तेदार है, मेरा मित्र है। 3। हे मेरे सत्गुरू ! हे मेरे हरी ! जो मेरी हालत होती थी, उस हालत को आप खुद ही जानता है। मै यहाँ-वहाँ भटकता फिरता था, मेरी कोई बात नहीं था पूछता, तूने मुझ कीड़े को गुरू सत्गुरू के चरणों में ला के आदर बख्शा। (हे भाई !) दास नानक का गुरू धन्य है। धन्य है जिस (गुरू) को मिल के मेरे सारे शोक समाप्त हो गए मेरे सारे कलेश दूर हो गए। 4। 5। 11। 49।
गउड़ी बैरागणि महला 4 ॥
कंचन नारी महि जीउ लुभतु है मोहु मीठा माइआ ॥
घर मंदर घोड़े खुसी मनु अन रसि लाइआ ॥
हरि प्रभु चिति न आवई किउ छूटा मेरे हरि राइआ ॥1॥
मेरे राम इह नीच करम हरि मेरे ॥
गुणवंता हरि हरि दइआलु करि किरपा बखसि अवगण सभि मेरे ॥1॥ रहाउ ॥
किछु रूपु नही किछु जाति नाही किछु ढंगु न मेरा ॥
किआ मुहु लै बोलह गुण बिहून नामु जपिआ न तेरा ॥
हम पापी संगि गुर उबरे पुंनु सतिगुर केरा ॥2॥
सभु जीउ पिंडु मुखु नकु दीआ वरतण कउ पाणी ॥
अंनु खाणा कपड़ु पैनणु दीआ रस अनि भोगाणी ॥
जिनि दीए सु चिति न आवई पसू हउ करि जाणी ॥3॥
सभु कीता तेरा वरतदा तूं अंतरजामी ॥
हम जंत विचारे किआ करह सभु खेलु तुम सुआमी ॥
जन नानकु हाटि विहाझिआ हरि गुलम गुलामी ॥4॥6॥12॥50॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी बैरागणि महला 4 ॥ मेरी जीवात्मा सोने (के मोह) में, स्त्री (के मोह) में फसी हुई है। माया का मोह मुझे मीठा लग रहा है। घर, पक्के महल घोड़े (देख-देख के) मुझे चाव चढ़ता है, मेरा मन और और पदार्थों के रस में लगा हुआ है। हे मेरे हरी ! हे मेरे राजन ! (आप) परमात्मा कभी मेरे चित्त में नहीं आता। मैं (इस मोह में से) कैसे निकलूँ?। 1। हे मेरे राम ! मेरे हरी ! मेरे ये नीच कर्म हैं। पर आप गुणों का मालिक है। आप दया का घर है। मेहर कर और मेरे सारे अवगुण बख्श। 1। रहाउ। ना मेरा (सुंदर) रूप है, ना मेरी ऊँची जाति है, ना मेरे में कोई सुचॅज है। हे प्रभू ! मैं गुणों से विहीन हूँ। मैंने आपका नाम नहीं जपा। मैं कौन सा मुंह ले कर (आपके सामने) बात करने के लायक हूँ? ये सत्गुरू की मेहर हुई है कि मैं पापी, गुरू की संगति में रह के (पापों से) बच गया हूँ। 2। ये जीवात्मा, ये शरीर, ये मुंह ये नाक आदि अंग ये सब कुछ परमात्मा ने मुझे दिया है। पानी (हवा, अग्नि आदि) मुझे उसने बरतने के लिए दिए हैं। उसने मुझे अन्न खाने को दिया है, कपड़ा पहनने को दिया है, और अनेकों स्वादिष्ट पदार्थ भोगने को दिए हैं। पर, जिस परमात्मा ने ये सारे पदार्थ दिए हैं, वह मुझे कभी याद भी नहीं आता। मैं (मूर्ख) पशु अपने आप को बड़ा समझता हूँ। 3। (हे प्रभू ! हम जीवों के वश में भी क्या है? जगत में जो कुछ हो रहा है) सब आपका ही किया हैं रहा है, आप हरेक दिल की जानता है। हम तुच्छ जीव (आपसे बागी हैं के) क्या कर सकते हैं? हे स्वामी ! ये सारा आपका ही खेल हैं रहा है। (जैसे कोई गुलाम मण्डी से खरीदा जाता है तैसे ही) ये आपका दास नानक (आपकी साध-संगति की दुकान में) (आपके सुंदर नाम से) बिका हुआ है। आपके गुलामों का गुलाम है। 4। 6। 12। 50।

गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “और और रसों की और और स्वादों की जितनी भी तृष्णा (मनुष्य को लगती) है, (ज्यों ज्यों रसों के स्वाद लेते जाते हैं) उतनी ही तृष्णा बारंबार लगती जाती है।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।