अंग
221
राग Gauree
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਗੁਰ ਕੀ ਮਤਿ ਜੀਇ ਆਈ ਕਾਰਿ ॥੧॥
ਇਨ ਬਿਧਿ ਰਾਮ ਰਮਤ ਮਨੁ ਮਾਨਿਆ ॥
ਗਿਆਨ ਅੰਜਨੁ ਗੁਰ ਸਬਦਿ ਪਛਾਨਿਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਇਕੁ ਸੁਖੁ ਮਾਨਿਆ ਸਹਜਿ ਮਿਲਾਇਆ ॥
ਨਿਰਮਲ ਬਾਣੀ ਭਰਮੁ ਚੁਕਾਇਆ ॥
ਲਾਲ ਭਏ ਸੂਹਾ ਰੰਗੁ ਮਾਇਆ ॥
ਨਦਰਿ ਭਈ ਬਿਖੁ ਠਾਕਿ ਰਹਾਇਆ ॥੨॥
ਉਲਟ ਭਈ ਜੀਵਤ ਮਰਿ ਜਾਗਿਆ ॥
ਸਬਦਿ ਰਵੇ ਮਨੁ ਹਰਿ ਸਿਉ ਲਾਗਿਆ ॥
ਰਸੁ ਸੰਗ੍ਰਹਿ ਬਿਖੁ ਪਰਹਰਿ ਤਿਆਗਿਆ ॥
ਭਾਇ ਬਸੇ ਜਮ ਕਾ ਭਉ ਭਾਗਿਆ ॥੩॥
ਸਾਦ ਰਹੇ ਬਾਦੰ ਅਹੰਕਾਰਾ ॥
ਚਿਤੁ ਹਰਿ ਸਿਉ ਰਾਤਾ ਹੁਕਮਿ ਅਪਾਰਾ ॥
ਜਾਤਿ ਰਹੇ ਪਤਿ ਕੇ ਆਚਾਰਾ ॥
ਦ੍ਰਿਸਟਿ ਭਈ ਸੁਖੁ ਆਤਮ ਧਾਰਾ ॥੪॥
ਤੁਝ ਬਿਨੁ ਕੋਇ ਨ ਦੇਖਉ ਮੀਤੁ ॥
ਕਿਸੁ ਸੇਵਉ ਕਿਸੁ ਦੇਵਉ ਚੀਤੁ ॥
ਕਿਸੁ ਪੂਛਉ ਕਿਸੁ ਲਾਗਉ ਪਾਇ ॥
ਕਿਸੁ ਉਪਦੇਸਿ ਰਹਾ ਲਿਵ ਲਾਇ ॥੫॥
ਗੁਰ ਸੇਵੀ ਗੁਰ ਲਾਗਉ ਪਾਇ ॥
ਭਗਤਿ ਕਰੀ ਰਾਚਉ ਹਰਿ ਨਾਇ ॥
ਸਿਖਿਆ ਦੀਖਿਆ ਭੋਜਨ ਭਾਉ ॥
ਹੁਕਮਿ ਸੰਜੋਗੀ ਨਿਜ ਘਰਿ ਜਾਉ ॥੬॥
ਗਰਬ ਗਤੰ ਸੁਖ ਆਤਮ ਧਿਆਨਾ ॥
ਜੋਤਿ ਭਈ ਜੋਤੀ ਮਾਹਿ ਸਮਾਨਾ ॥
ਲਿਖਤੁ ਮਿਟੈ ਨਹੀ ਸਬਦੁ ਨੀਸਾਨਾ ॥
ਕਰਤਾ ਕਰਣਾ ਕਰਤਾ ਜਾਨਾ ॥੭॥
ਨਹ ਪੰਡਿਤੁ ਨਹ ਚਤੁਰੁ ਸਿਆਨਾ ॥
ਨਹ ਭੂਲੋ ਨਹ ਭਰਮਿ ਭੁਲਾਨਾ ॥
ਕਥਉ ਨ ਕਥਨੀ ਹੁਕਮੁ ਪਛਾਨਾ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮਤਿ ਸਹਜਿ ਸਮਾਨਾ ॥੮॥੧॥
ਇਨ ਬਿਧਿ ਰਾਮ ਰਮਤ ਮਨੁ ਮਾਨਿਆ ॥
ਗਿਆਨ ਅੰਜਨੁ ਗੁਰ ਸਬਦਿ ਪਛਾਨਿਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਇਕੁ ਸੁਖੁ ਮਾਨਿਆ ਸਹਜਿ ਮਿਲਾਇਆ ॥
ਨਿਰਮਲ ਬਾਣੀ ਭਰਮੁ ਚੁਕਾਇਆ ॥
ਲਾਲ ਭਏ ਸੂਹਾ ਰੰਗੁ ਮਾਇਆ ॥
ਨਦਰਿ ਭਈ ਬਿਖੁ ਠਾਕਿ ਰਹਾਇਆ ॥੨॥
ਉਲਟ ਭਈ ਜੀਵਤ ਮਰਿ ਜਾਗਿਆ ॥
ਸਬਦਿ ਰਵੇ ਮਨੁ ਹਰਿ ਸਿਉ ਲਾਗਿਆ ॥
ਰਸੁ ਸੰਗ੍ਰਹਿ ਬਿਖੁ ਪਰਹਰਿ ਤਿਆਗਿਆ ॥
ਭਾਇ ਬਸੇ ਜਮ ਕਾ ਭਉ ਭਾਗਿਆ ॥੩॥
ਸਾਦ ਰਹੇ ਬਾਦੰ ਅਹੰਕਾਰਾ ॥
ਚਿਤੁ ਹਰਿ ਸਿਉ ਰਾਤਾ ਹੁਕਮਿ ਅਪਾਰਾ ॥
ਜਾਤਿ ਰਹੇ ਪਤਿ ਕੇ ਆਚਾਰਾ ॥
ਦ੍ਰਿਸਟਿ ਭਈ ਸੁਖੁ ਆਤਮ ਧਾਰਾ ॥੪॥
ਤੁਝ ਬਿਨੁ ਕੋਇ ਨ ਦੇਖਉ ਮੀਤੁ ॥
ਕਿਸੁ ਸੇਵਉ ਕਿਸੁ ਦੇਵਉ ਚੀਤੁ ॥
ਕਿਸੁ ਪੂਛਉ ਕਿਸੁ ਲਾਗਉ ਪਾਇ ॥
ਕਿਸੁ ਉਪਦੇਸਿ ਰਹਾ ਲਿਵ ਲਾਇ ॥੫॥
ਗੁਰ ਸੇਵੀ ਗੁਰ ਲਾਗਉ ਪਾਇ ॥
ਭਗਤਿ ਕਰੀ ਰਾਚਉ ਹਰਿ ਨਾਇ ॥
ਸਿਖਿਆ ਦੀਖਿਆ ਭੋਜਨ ਭਾਉ ॥
ਹੁਕਮਿ ਸੰਜੋਗੀ ਨਿਜ ਘਰਿ ਜਾਉ ॥੬॥
ਗਰਬ ਗਤੰ ਸੁਖ ਆਤਮ ਧਿਆਨਾ ॥
ਜੋਤਿ ਭਈ ਜੋਤੀ ਮਾਹਿ ਸਮਾਨਾ ॥
ਲਿਖਤੁ ਮਿਟੈ ਨਹੀ ਸਬਦੁ ਨੀਸਾਨਾ ॥
ਕਰਤਾ ਕਰਣਾ ਕਰਤਾ ਜਾਨਾ ॥੭॥
ਨਹ ਪੰਡਿਤੁ ਨਹ ਚਤੁਰੁ ਸਿਆਨਾ ॥
ਨਹ ਭੂਲੋ ਨਹ ਭਰਮਿ ਭੁਲਾਨਾ ॥
ਕਥਉ ਨ ਕਥਨੀ ਹੁਕਮੁ ਪਛਾਨਾ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮਤਿ ਸਹਜਿ ਸਮਾਨਾ ॥੮॥੧॥
गुर की मति जीइ आई कारि ॥१॥
इन बिधि राम रमत मनु मानिआ ॥
गिआन अंजनु गुर सबदि पछानिआ ॥१॥ रहाउ ॥
इकु सुखु मानिआ सहजि मिलाइआ ॥
निरमल बाणी भरमु चुकाइआ ॥
लाल भए सूहा रंगु माइआ ॥
नदरि भई बिखु ठाकि रहाइआ ॥२॥
उलट भई जीवत मरि जागिआ ॥
सबदि रवे मनु हरि सिउ लागिआ ॥
रसु संग्रहि बिखु परहरि तिआगिआ ॥
भाइ बसे जम का भउ भागिआ ॥३॥
साद रहे बादं अहंकारा ॥
चितु हरि सिउ राता हुकमि अपारा ॥
जाति रहे पति के आचारा ॥
द्रिसटि भई सुखु आतम धारा ॥४॥
तुझ बिनु कोइ न देखउ मीतु ॥
किसु सेवउ किसु देवउ चीतु ॥
किसु पूछउ किसु लागउ पाइ ॥
किसु उपदेसि रहा लिव लाइ ॥५॥
गुर सेवी गुर लागउ पाइ ॥
भगति करी राचउ हरि नाइ ॥
सिखिआ दीखिआ भोजन भाउ ॥
हुकमि संजोगी निज घरि जाउ ॥६॥
गरब गतं सुख आतम धिआना ॥
जोति भई जोती माहि समाना ॥
लिखतु मिटै नही सबदु नीसाना ॥
करता करणा करता जाना ॥७॥
नह पंडितु नह चतुरु सिआना ॥
नह भूलो नह भरमि भुलाना ॥
कथउ न कथनी हुकमु पछाना ॥
नानक गुरमति सहजि समाना ॥८॥१॥
इन बिधि राम रमत मनु मानिआ ॥
गिआन अंजनु गुर सबदि पछानिआ ॥१॥ रहाउ ॥
इकु सुखु मानिआ सहजि मिलाइआ ॥
निरमल बाणी भरमु चुकाइआ ॥
लाल भए सूहा रंगु माइआ ॥
नदरि भई बिखु ठाकि रहाइआ ॥२॥
उलट भई जीवत मरि जागिआ ॥
सबदि रवे मनु हरि सिउ लागिआ ॥
रसु संग्रहि बिखु परहरि तिआगिआ ॥
भाइ बसे जम का भउ भागिआ ॥३॥
साद रहे बादं अहंकारा ॥
चितु हरि सिउ राता हुकमि अपारा ॥
जाति रहे पति के आचारा ॥
द्रिसटि भई सुखु आतम धारा ॥४॥
तुझ बिनु कोइ न देखउ मीतु ॥
किसु सेवउ किसु देवउ चीतु ॥
किसु पूछउ किसु लागउ पाइ ॥
किसु उपदेसि रहा लिव लाइ ॥५॥
गुर सेवी गुर लागउ पाइ ॥
भगति करी राचउ हरि नाइ ॥
सिखिआ दीखिआ भोजन भाउ ॥
हुकमि संजोगी निज घरि जाउ ॥६॥
गरब गतं सुख आतम धिआना ॥
जोति भई जोती माहि समाना ॥
लिखतु मिटै नही सबदु नीसाना ॥
करता करणा करता जाना ॥७॥
नह पंडितु नह चतुरु सिआना ॥
नह भूलो नह भरमि भुलाना ॥
कथउ न कथनी हुकमु पछाना ॥
नानक गुरमति सहजि समाना ॥८॥१॥
हिन्दी अर्थ: गुरू की दी हुई मति मेरे चिक्त को रास आ गई है (लाभदायक साबित हुई है)। 1। परमात्मा का नाम सिमर सिमर के मेरा मन (सिमरन में) इस प्रकार रम गया है (कि अब) सिमरन के बिना रह ही नहीं सकता। गुरू के शबद में जुड़ के मैंने वह (आत्मिक) सुरमा ढूँढ लिया है जो परमात्मा के साथ गहरी सांझ डाल देता है। 1। रहाउ। (अब मेरा मन) मान गया है कि यही (आत्मिक) सुख (सब सुखों से श्रेष्ठ सुख है)। मुझे सहज अवस्था में मिला दिया है। (परमात्मा की सिफत सालाह वाली) पवित्र बाणी ने मेरी भटकना समाप्त कर दी है। (सिमरन की बरकति से नाम में रंग के मेरा मन मजीठ जैसे पक्के रंग वाला) लाल हो गया है। माया कारंग मुझे कुसंभ के रंग जैसा कच्चा लाल दिखाई दे गया है। (मेरे ऊपर परमात्मा की मेहर की) नजर हुई है~ मैंने माया के जहर को (अपने ऊपर असर करने से) रोक लिया है। 2। (मेरी सुरति माया के मोह से) पलट गयी है। दुनिया की किरत-कार करते हुए (मेरा मन माया की तरफ से) मर गया है। मुझे आत्मिक जागृति आ गई है। गुरू के शबद के द्वारा मैं सिमरन कर रहा हूँ। मेरा मन परमात्मा के साथ प्रीत पा चुका है। (आत्मिक) आनंद (अपने अंदर) इकट्ठा करके मैंने माया के जहर को (अपने अंदर से) दूर करके (सदा के लिए) त्याग दिया है। परमात्मा के प्रेम में टिकने के कारण मेरा मौत का डर दूर हो गया है। 3। (सिमरन की बरकति से मेरे अंदर से मायावी पदार्थों के) चस्के दूर हो गए हैं। (मन में रोजाना हो रहा माया वाला) झगड़ा मिट गया है~ अहंकार रह गया है। मेरा चिक्त अब परमात्मा (के नाम) से रंगा गया है~ मैं अब उस बेअंत प्रभू की रजा में टिक गया हूँ। जाति-वर्ण और लोक लाज की खातिर किए जाने वाले धर्म-कर्म बस हो गए हैं। (मेरे पर प्रभू की) मेहर की निगाह हुई है~ मुझे आत्मिक सुख मिल गया है। 4। (गुरू के शबद की बरकति से~ हे प्रभू !) मुझे तेरे बिना कोई और (पक्का) मित्र नहीं दिखता। मैं अब किसी और को नहीं सिमरता~ मैं किसी और को अपना मन नहीं भेट करता। मैं किसी और से सालाह नहीं लेता। मैं किसी और के पैर नहीं लगता फिरता। मैं किसी और के उपदेश में सुरति नहीं जोड़ता फिरता। 5। (गुरू के शबद ने ही मुझे तेरे ज्ञान का अंजन दिया है~ इस वास्ते) मैं गुरू की ही सेवा करता हूँ~ गुरू के ही चरणों में लगता हूँ। (गुरू की ही सहायता से हे भाई !) मैं परमात्मा की भक्ति करता हूँ~ हरी के नाम में टिकता हूँ। गुरू की शिक्षा~ गुरू की दीक्षा~ गुरू के प्रेम को ही मैंने अपनी आत्मा का भोजन बनाया है। प्रभू की रजा में ही ये पिछले कर्मों का अंकुर फूटा है~ और मैं अपने असल घर (प्रभू-चरणों) में टिका बैठा हूँ। 6। (सिमरन की बरकति से) अहंकार दूर हो गया है~ आत्मिक आनंद में मेरी सुरति टिक गई है। मेरे अंदर आत्मिक प्रकाश हो गया है~ मेरी जीवात्मा प्रभू की ज्योति में लीन हो गई है। (मेरे हृदय में) उकरा हुआ गुरू-शबद (रूपी) लेख अब ऐसा प्रकट हुआ है कि मिट नहीं सकता। मैंने करते व (करते की) रचना को करतार रूप ही जान लिया है~ (मैंने करतार को ही सृष्टि का रचनहारा जान लिया है)। 7। मैं कोई पण्डित नहीं हूँ~ चतुर नहीं हूँ~ मैं समझदार नहीं हूँ (भाव~ किसी विद्वता~चतुराई~ समझदारी का आसरा नहीं लिया) तभी तो मैं (रास्ते से) भटका नहीं~ गलत राह पर नहीं पड़ा। मैं कोई चतुराई की बातें नहीं करता, मैं अडोल अवस्था में टिक गया हूँ। हे नानक ! (कह,) मैंने तो सतिगुरू की मति ले कर परमात्मा के हुकम को पहिचाना है (भाव~ मैंने ये समझ लिया है कि प्रभू के हुकम में चलना ही सही रास्ता है) 8। 1।
ਗਉੜੀ ਗੁਆਰੇਰੀ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਮਨੁ ਕੁੰਚਰੁ ਕਾਇਆ ਉਦਿਆਨੈ ॥
ਗੁਰੁ ਅੰਕਸੁ ਸਚੁ ਸਬਦੁ ਨੀਸਾਨੈ ॥ ਰਾਜ ਦੁਆਰੈ ਸੋਭ ਸੁ ਮਾਨੈ ॥੧॥
ਚਤੁਰਾਈ ਨਹ ਚੀਨਿਆ ਜਾਇ ॥
ਬਿਨੁ ਮਾਰੇ ਕਿਉ ਕੀਮਤਿ ਪਾਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਘਰ ਮਹਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਤਸਕਰੁ ਲੇਈ ॥
ਨੰਨਾਕਾਰੁ ਨ ਕੋਇ ਕਰੇਈ ॥
ਰਾਖੈ ਆਪਿ ਵਡਿਆਈ ਦੇਈ ॥੨॥
ਨੀਲ ਅਨੀਲ ਅਗਨਿ ਇਕ ਠਾਈ ॥
ਜਲਿ ਨਿਵਰੀ ਗੁਰਿ ਬੂਝ ਬੁਝਾਈ ॥
ਮਨੁ ਦੇ ਲੀਆ ਰਹਸਿ ਗੁਣ ਗਾਈ ॥੩॥
ਜੈਸਾ ਘਰਿ ਬਾਹਰਿ ਸੋ ਤੈਸਾ ॥
ਬੈਸਿ ਗੁਫਾ ਮਹਿ ਆਖਉ ਕੈਸਾ ॥
ਸਾਗਰਿ ਡੂਗਰਿ ਨਿਰਭਉ ਐਸਾ ॥੪॥
ਮੂਏ ਕਉ ਕਹੁ ਮਾਰੇ ਕਉਨੁ ॥
ਨਿਡਰੇ ਕਉ ਕੈਸਾ ਡਰੁ ਕਵਨੁ ॥
ਸਬਦਿ ਪਛਾਨੈ ਤੀਨੇ ਭਉਨ ॥੫॥
ਜਿਨਿ ਕਹਿਆ ਤਿਨਿ ਕਹਨੁ ਵਖਾਨਿਆ ॥
ਜਿਨਿ ਬੂਝਿਆ ਤਿਨਿ ਸਹਜਿ ਪਛਾਨਿਆ ॥
ਦੇਖਿ ਬੀਚਾਰਿ ਮੇਰਾ ਮਨੁ ਮਾਨਿਆ ॥੬॥
ਕੀਰਤਿ ਸੂਰਤਿ ਮੁਕਤਿ ਇਕ ਨਾਈ ॥
ਤਹੀ ਨਿਰੰਜਨੁ ਰਹਿਆ ਸਮਾਈ ॥
ਨਿਜ ਘਰਿ ਬਿਆਪਿ ਰਹਿਆ ਨਿਜ ਠਾਈ ॥੭॥
ਉਸਤਤਿ ਕਰਹਿ ਕੇਤੇ ਮੁਨਿ ਪ੍ਰੀਤਿ ॥
ਮਨੁ ਕੁੰਚਰੁ ਕਾਇਆ ਉਦਿਆਨੈ ॥
ਗੁਰੁ ਅੰਕਸੁ ਸਚੁ ਸਬਦੁ ਨੀਸਾਨੈ ॥ ਰਾਜ ਦੁਆਰੈ ਸੋਭ ਸੁ ਮਾਨੈ ॥੧॥
ਚਤੁਰਾਈ ਨਹ ਚੀਨਿਆ ਜਾਇ ॥
ਬਿਨੁ ਮਾਰੇ ਕਿਉ ਕੀਮਤਿ ਪਾਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਘਰ ਮਹਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਤਸਕਰੁ ਲੇਈ ॥
ਨੰਨਾਕਾਰੁ ਨ ਕੋਇ ਕਰੇਈ ॥
ਰਾਖੈ ਆਪਿ ਵਡਿਆਈ ਦੇਈ ॥੨॥
ਨੀਲ ਅਨੀਲ ਅਗਨਿ ਇਕ ਠਾਈ ॥
ਜਲਿ ਨਿਵਰੀ ਗੁਰਿ ਬੂਝ ਬੁਝਾਈ ॥
ਮਨੁ ਦੇ ਲੀਆ ਰਹਸਿ ਗੁਣ ਗਾਈ ॥੩॥
ਜੈਸਾ ਘਰਿ ਬਾਹਰਿ ਸੋ ਤੈਸਾ ॥
ਬੈਸਿ ਗੁਫਾ ਮਹਿ ਆਖਉ ਕੈਸਾ ॥
ਸਾਗਰਿ ਡੂਗਰਿ ਨਿਰਭਉ ਐਸਾ ॥੪॥
ਮੂਏ ਕਉ ਕਹੁ ਮਾਰੇ ਕਉਨੁ ॥
ਨਿਡਰੇ ਕਉ ਕੈਸਾ ਡਰੁ ਕਵਨੁ ॥
ਸਬਦਿ ਪਛਾਨੈ ਤੀਨੇ ਭਉਨ ॥੫॥
ਜਿਨਿ ਕਹਿਆ ਤਿਨਿ ਕਹਨੁ ਵਖਾਨਿਆ ॥
ਜਿਨਿ ਬੂਝਿਆ ਤਿਨਿ ਸਹਜਿ ਪਛਾਨਿਆ ॥
ਦੇਖਿ ਬੀਚਾਰਿ ਮੇਰਾ ਮਨੁ ਮਾਨਿਆ ॥੬॥
ਕੀਰਤਿ ਸੂਰਤਿ ਮੁਕਤਿ ਇਕ ਨਾਈ ॥
ਤਹੀ ਨਿਰੰਜਨੁ ਰਹਿਆ ਸਮਾਈ ॥
ਨਿਜ ਘਰਿ ਬਿਆਪਿ ਰਹਿਆ ਨਿਜ ਠਾਈ ॥੭॥
ਉਸਤਤਿ ਕਰਹਿ ਕੇਤੇ ਮੁਨਿ ਪ੍ਰੀਤਿ ॥
गउड़ी गुआरेरी महला १ ॥
मनु कुंचरु काइआ उदिआनै ॥
गुरु अंकसु सचु सबदु नीसानै ॥ राज दुआरै सोभ सु मानै ॥१॥
चतुराई नह चीनिआ जाइ ॥
बिनु मारे किउ कीमति पाइ ॥१॥ रहाउ ॥
घर महि अंम्रितु तसकरु लेई ॥
नंनाकारु न कोइ करेई ॥
राखै आपि वडिआई देई ॥२॥
नील अनील अगनि इक ठाई ॥
जलि निवरी गुरि बूझ बुझाई ॥
मनु दे लीआ रहसि गुण गाई ॥३॥
जैसा घरि बाहरि सो तैसा ॥
बैसि गुफा महि आखउ कैसा ॥
सागरि डूगरि निरभउ ऐसा ॥४॥
मूए कउ कहु मारे कउनु ॥
निडरे कउ कैसा डरु कवनु ॥
सबदि पछानै तीने भउन ॥५॥
जिनि कहिआ तिनि कहनु वखानिआ ॥
जिनि बूझिआ तिनि सहजि पछानिआ ॥
देखि बीचारि मेरा मनु मानिआ ॥६॥
कीरति सूरति मुकति इक नाई ॥
तही निरंजनु रहिआ समाई ॥
निज घरि बिआपि रहिआ निज ठाई ॥७॥
उसतति करहि केते मुनि प्रीति ॥
मनु कुंचरु काइआ उदिआनै ॥
गुरु अंकसु सचु सबदु नीसानै ॥ राज दुआरै सोभ सु मानै ॥१॥
चतुराई नह चीनिआ जाइ ॥
बिनु मारे किउ कीमति पाइ ॥१॥ रहाउ ॥
घर महि अंम्रितु तसकरु लेई ॥
नंनाकारु न कोइ करेई ॥
राखै आपि वडिआई देई ॥२॥
नील अनील अगनि इक ठाई ॥
जलि निवरी गुरि बूझ बुझाई ॥
मनु दे लीआ रहसि गुण गाई ॥३॥
जैसा घरि बाहरि सो तैसा ॥
बैसि गुफा महि आखउ कैसा ॥
सागरि डूगरि निरभउ ऐसा ॥४॥
मूए कउ कहु मारे कउनु ॥
निडरे कउ कैसा डरु कवनु ॥
सबदि पछानै तीने भउन ॥५॥
जिनि कहिआ तिनि कहनु वखानिआ ॥
जिनि बूझिआ तिनि सहजि पछानिआ ॥
देखि बीचारि मेरा मनु मानिआ ॥६॥
कीरति सूरति मुकति इक नाई ॥
तही निरंजनु रहिआ समाई ॥
निज घरि बिआपि रहिआ निज ठाई ॥७॥
उसतति करहि केते मुनि प्रीति ॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी महला १ ॥ (इस) शरीर जंगल में मन हाथी (के समान) है। (जिस मन हाथी के सिर पर) गुरू का अंकुश हो और सदा स्थिर (प्रभू की सिफत सालाह का) शबद निशान (झूल रहा) हो~ (वह मन-हाथी) प्रभू-पातशाह के दर पर शोभा पाता है वह आदर पाता है। 1। चतुराई दिखाने से ये पहिचान नहीं होती कि (चतुराई दिखाने वाला) मन कीमत पाने का हकदार हो गया है। मन को विकारों की ओर से मारे बिना मन की कद्र नहीं पड़ सकती (भाव~ वही मन आदर-सत्कार का हकदार होता है~ जो वश में आ जाता है)। 1। रहाउ। (मनुष्य के हृदय-) घर में नाम-अंमृत मौजूद है~ (पर मोह में फंसा हुआ मन-) चोर (उस अमृत को) चुराए जाता है~ (ये मन इतना आकी हुआ पड़ा है कि कोई भी जीव इसके आगे इनकार नहीं कर सकता)। परमात्मा खुद जिस (के अंदर बसते अमृत) की रक्षा करता है~ उसे इज्जत (मान-सम्मान) बख्शता है। 2। (इस मन में) तृष्णा की बेअंत आग एक ही जगह पर पड़ी है~ जिसे गुरू ने (तृष्णा की आग से बचने की) समझ बख्शी है~ उसकी ये आग प्रभू के नाम-जल से बुझ जाती है~ (पर जिसने भी नाम-जल लिया है) अपना मन (बदले में) दे कर लिया है~ वह (फिर) चाव से परमात्मा की सिफत सालाह के गुण गाता है। 3। (अगर~ मन-हाथी के सिर पर गुरू का अंकुश नहीं है तो) जैसा (अमोड़~ भटकने वाला) ये गृहस्थ में (रहते हुए) है~ वैसा ही (अमोड़) ये बाहर (जंगलों में रहते हुए) होता है। पहाड़ की गुफा में भी बैठ के मैं क्या कहूँ कि कैसा बन गया है? (गुफा में रहने पर भी ये मन अमोड़ ही रहता है)। समुंद्र में प्रवेश से (तीर्थों पर डुबकी लगाए~ चाहे) पहाड़ (की गुफा) में बैठे~ ये एक सा ही निडर रहता है। 4। पर अगर ये (मन-हाथी गुरू अंकुश के अधीन रह के विकारों की ओर से) मर जाए तो कोई विकार इस पर चोट नहीं कर सकता। यदि ये (गुरू-अंकुश के डर में रह कर) निडर (दलेर) हो जाए~ तो दुनिया वाला कोई डर इसे छू नहीं सकता (क्योंकि) गुरू के शबद में जुड़ के ये पहिचान लेता है (कि इसका रक्षक परमात्मा) तीनों ही भवनों में हर जगह बसता है। 5। जिस मनुष्य ने (निरी मन की चतुराई से यह) कह दिया (कि परमात्मा तीनों भवनों में हर जगह मौजूद है) उसने जुबानी जुबानी ही कह दिया (उसका मन हाथी अभी भी टिकाव में नहीं है भटक रहा है~ अमोड़ है)। जिस ने (गुरू अंकुश के अधीन रह के ये भेद) समझ लिया~ उसने अडोल आत्मिक अवस्था में टिक के (उस तीनों भवनों में बसते को) पहिचान भी लिया। (हर जगह प्रभू का) दर्शन करके प्रभू के गुणों को विचार के उस का ‘मेरा मेरा’ कहने वाला मन (प्रभू की सिफत सालाह में) डूब जाता है। 6। जिस हृदय में एक परमात्मा की सिफत सालाह है~ वहां शोभा है~ वहाँ सुंदरता है~ वहाँ विकारों से निजात है~ वहीं माया के प्रभाव से रहित परमात्मा हर वक्त मौजूद है। (वह हृदय परमात्मा का अपना घर बन गया~ अपना निवास स्थान बन गया)~ उस अपने घर में~ उस अपने निवास स्थान में परमात्मा हर वक्त मौजूद है। 7। अनेकों ही मुनि जन (मन-हाथी को गुरू अंकुश के अधीन करके) पवित्र शरीर से पवित्र मन से प्यार में जुड़ के परमात्मा की सिफत सालाह करते हैं~
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 221 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।
गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।
Dwarka के नए-बसे sector में पहली बार आए परिवार का घर देखना।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 55 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 221” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 222 →, पीछे का: ← अंग 220।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।