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अंग 236

अंग
236
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
करन करावन सभु किछु एकै ॥
आपे बुधि बीचारि बिबेकै ॥
दूरि न नेरै सभ कै संगा ॥
सचु सालाहणु नानक हरि रंगा ॥8॥1॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! (जीव बिचारे के क्या वश?) सिर्फ परमात्मा ही (हरेक जीव में व्यापक हो के) सब कुछ कर रहा है और वह प्रभू खुद ही (हरेक जीव को) अक्ल (बख्शता है), खुद ही (हरेक जीव में व्यापक हो के) विचार के (जीवन जुगति को) परखता है। वह परमात्मा किसी से दूर नहीं बसता, सब के नजदीक बसता है, सब के साथ बसता है। वह प्रभू सदा स्थिर रहने वाला है, वही सब चोज तमाशे करने वाला है, वही सराहनीय है। 8। 1।
गउड़ी महला 5 ॥
गुर सेवा ते नामे लागा ॥
तिस कउ मिलिआ जिसु मसतकि भागा ॥
तिस कै हिरदै रविआ सोइ ॥
मनु तनु सीतलु निहचलु होइ ॥1॥
ऐसा कीरतनु करि मन मेरे ॥
ईहा ऊहा जो कामि तेरै ॥1॥ रहाउ ॥
जासु जपत भउ अपदा जाइ ॥
धावत मनूआ आवै ठाइ ॥
जासु जपत फिरि दूखु न लागै ॥
जासु जपत इह हउमै भागै ॥2॥
जासु जपत वसि आवहि पंचा ॥
जासु जपत रिदै अंम्रितु संचा ॥
जासु जपत इह त्रिसना बुझै ॥
जासु जपत हरि दरगह सिझै ॥3॥
जासु जपत कोटि मिटहि अपराध ॥
जासु जपत हरि होवहि साध ॥
जासु जपत मनु सीतलु होवै ॥
जासु जपत मलु सगली खोवै ॥4॥
जासु जपत रतनु हरि मिलै ॥
बहुरि न छोडै हरि संगि हिलै ॥
जासु जपत कई बैकुंठ वासु ॥
जासु जपत सुख सहजि निवासु ॥5॥
जासु जपत इह अगनि न पोहत ॥
जासु जपत इहु कालु न जोहत ॥
जासु जपत तेरा निरमल माथा ॥
जासु जपत सगला दुखु लाथा ॥6॥
जासु जपत मुसकलु कछू न बनै ॥
जासु जपत सुणि अनहत धुनै ॥
जासु जपत इह निरमल सोइ ॥
जासु जपत कमलु सीधा होइ ॥7॥
गुरि सुभ द्रिसटि सभ ऊपरि करी ॥
जिस कै हिरदै मंत्रु दे हरी ॥
अखंड कीरतनु तिनि भोजनु चूरा ॥
कहु नानक जिसु सतिगुरु पूरा ॥8॥2॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ (पर, हे मेरे मन !) वह मनुष्य ही परमात्मा के नाम में जुड़ता है जो गुरू की शरण पड़ता है (गुरू की शरण पड़ा मनुष्य हरी नाम में जुड़ता है, और गुरू) उस मनुष्य को मिलता है जिसके माथे के भाग्य जाग जाएं। (फिर) उस मनुष्य के हृदय में वह परमात्मा आ बसता है, उसका मन और शरीर (हृदय) ठण्डा ठार हो जाता है, विकारों की तरफ से अडोल हो जाता है। 1। हे मेरे मन !आप परमात्मा की ऐसी सिफत सालाह करता रह, जो आपकी इस जिंदगी में भी काम आए, और परलोक में भी आपके काम आए। 1। रहाउ। (हे मेरे मन ! आप उस परमात्मा की सिफत सालाह करता रह) जिसका नाम जप के हरेक किस्म का डर दूर हैं जाता है, हरेक बिपदा टॅल जाती है, विकारों की तरफ दौड़ता मन ठहर जाता है, जिसका नाम जपने से फिर कोई दुख छू नहीं सकता, और अंदर से अहंकार दूर हो जाता है। 2। जिसका नाम जपने से (कामादिक) पाँचों विकार काबू आ जाते हैं, आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल हृदय में इकट्ठा कर सकते हैं, माया की प्यास बुझ जाती है और परमात्मा की दरगाह में भी कामयाब हो जाते हैं। 3। (हे भाई ! आप उस परमात्मा की सिफत सालाह करता रह) जिसका नाम जपने से (पिछले किए हुए) करोड़ों पाप मिट जाते हैं, तथा (आगे के लिए) भले मनुष्य बन जाते हैं, जिसका नाम जपने से मन (विकारों की तपश से) ठण्डा शीतल हो जाता है और अपने अंदर की (विकारों की) सारी मैल दूर कर लेता है। 4। जिस का जाप करने से मनुष्य को हरि नाम रत्न प्राप्त हो जाता है, (सिमरन की बरकति से) मनुष्य परमात्मा के साथ इतना रच-मिच जाता है कि (प्राप्त किए हुए उस नाम-रत्न को) दुबारा नहीं छोड़ता, मानो जैसे, अनेकों बैकुंठों का निवास हासिल हो जाता है। 5। जिसका नाम जपने से आत्मिक आनंद मिलता है आत्मिक अडोलता में ठिकाना मिल जाता है 5। (हे भाई !आप उस परमात्मा की सिफत सालाह करता रह) जिसका नाम जपने से तृष्णा की आग छू नहीं सकेगी, मौत का सहम नजदीक नहीं फटकेगा (आत्मिक मौत अपना जोर नहीं डाल पाएगी), हर जगह आप उज्जवल-मुख रहेगा, और आपका हरेक किस्म का दुख दूर हैं जाएगा। 6। (हे भाई ! आप उस परमात्मा की सिफत सालाह करता रह) जिसका नाम जपने से (मनुष्य के जीवन सफर में) कोई मुश्किल नहीं बनती, मनुष्य एक-रस आत्मिक आनंद के गीत की धुनि सुनता रहता है (मनुष्य के अंदर हर वक्त आत्मिक आनंद की रौंअ चली रहती है), मनुष्य (लोक-परलोक में) पवित्र शोभा कमाता है। जिसका नाम जपने से मनुष्य का कमल रूपी हृदय (विकारों से पलट के, परमात्मा की याद की तरफ) सीधा हो जाता है 7। उस मनुष्य पर गुरू ने (जैसे) सबसे बढ़िया किस्म की मेहर की नजर कर दी। जिस मनुष्य के हृदय में परमात्मा का नाम जपने का उपदेश बसाता है उसने परमात्मा की एक-रस सिफत सालाह को अपनी आत्मा के लिए स्वादिष्ट भोजन बना लिया हे नानक ! कह, (हे भाई ! गुरू) जिस मनुष्य को पूरा गुरू मिल पड़ा। 8। 2।
गउड़ी महला 5 ॥
गुर का सबदु रिद अंतरि धारै ॥
पंच जना सिउ संगु निवारै ॥
दस इंद्री करि राखै वासि ॥
ता कै आतमै होइ परगासु ॥1॥
ऐसी द्रिड़ता ता कै होइ ॥
जा कउ दइआ मइआ प्रभ सोइ ॥1॥ रहाउ ॥
साजनु दुसटु जा कै एक समानै ॥
जेता बोलणु तेता गिआनै ॥
जेता सुनणा तेता नामु ॥
जेता पेखनु तेता धिआनु ॥2॥
सहजे जागणु सहजे सोइ ॥
सहजे होता जाइ सु होइ ॥
सहजि बैरागु सहजे ही हसना ॥
सहजे चूप सहजे ही जपना ॥3॥
सहजे भोजनु सहजे भाउ ॥
सहजे मिटिओ सगल दुराउ ॥
सहजे होआ साधू संगु ॥
सहजि मिलिओ पारब्रहमु निसंगु ॥4॥
सहजे ग्रिह महि सहजि उदासी ॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ वह मनुष्य अपने हृदय में गुरू का शबद बसाता है, कामादिक पाँचों विकारों से अपना साथ हटा लेता है, दसों ही इंद्रियों को अपने काबू में कर लेता है और उसकी आत्मा में प्रकाश हो जाता है (उसे आत्मिक जीवन की समझ आ जाती है)। 1। उस मनुष्य के हृदय में ऐसा आत्मिक बल पैदा होता है (हे भाई !) जिस मनुष्य पर परमात्मा की दया होती है, कृपा होती है। 1। रहाउ। (हे भाई !) जिस मनुष्य को अपने हृदय में मित्र और वैरी एक जैसे ही प्रतीत होते हैं, जितना कुछ वह बोलता है, आत्मिक जीवन की सूझ के बारे में बोलता है, जितना कुछ सुनता है, परमात्मा की सिफत सालाह ही सुनता है, जितना कुछ देखता है, परमात्मा में सुरति जोड़ने के कारण ही बनता है। 2। वह मनुष्य चाहे जागता है, चाहे सोया हुआ है, वह सदा आत्मिक अडोलता में ही टिका रहता है; परमात्मा की रजा में जो कुछ होता है, उसे ठीक मानता है, और आत्मिक अडोलता में ही लीन रहता है; कोई गमी की घटना हो जाए, चाहे खुशी का कारण बने, वह आत्मिक अडोलता में ही रहता है; अगर वह चुप बैठा है तो भी अडोलता में है और अगर बोल रहा है तो भी अडोलता में है। 3। आत्मिक अडोलता में टिका हुआ ही वह खाने-पीने का व्यवहार करता है, आत्मिक अडोलता में ही वह दूसरों के साथ प्रेम भरा सलूक करता है; आत्मिक अडोलता में टिके रहने के कारण उसके अंदर से सारा कपट-भाव मिट जाता है; आत्मिक अडोलता में ही उसे गुरू का मिलाप हो जाता है, और प्रत्यक्ष तौर पर उसे परमात्मा मिल जाता है। 4। अगर वह घर में है तो भी आत्मिक अडोलता में, अगर वह दुनिया से उपराम फिरता है तो भी आत्मिक अडोलता में

गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे नानक ! (जीव बिचारे के क्या वश?) सिर्फ परमात्मा ही (हरेक जीव में व्यापक हो के) सब कुछ कर रहा है और वह प्रभू खुद ही (हरेक जीव को) अक्ल (बख्शता है), खुद ही (हरेक जीव में व्यापक हो ।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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