आपे बुधि बीचारि बिबेकै ॥
दूरि न नेरै सभ कै संगा ॥
सचु सालाहणु नानक हरि रंगा ॥8॥1॥
गुर सेवा ते नामे लागा ॥
तिस कउ मिलिआ जिसु मसतकि भागा ॥
तिस कै हिरदै रविआ सोइ ॥
मनु तनु सीतलु निहचलु होइ ॥1॥
ऐसा कीरतनु करि मन मेरे ॥
ईहा ऊहा जो कामि तेरै ॥1॥ रहाउ ॥
जासु जपत भउ अपदा जाइ ॥
धावत मनूआ आवै ठाइ ॥
जासु जपत फिरि दूखु न लागै ॥
जासु जपत इह हउमै भागै ॥2॥
जासु जपत वसि आवहि पंचा ॥
जासु जपत रिदै अंम्रितु संचा ॥
जासु जपत इह त्रिसना बुझै ॥
जासु जपत हरि दरगह सिझै ॥3॥
जासु जपत कोटि मिटहि अपराध ॥
जासु जपत हरि होवहि साध ॥
जासु जपत मनु सीतलु होवै ॥
जासु जपत मलु सगली खोवै ॥4॥
जासु जपत रतनु हरि मिलै ॥
बहुरि न छोडै हरि संगि हिलै ॥
जासु जपत कई बैकुंठ वासु ॥
जासु जपत सुख सहजि निवासु ॥5॥
जासु जपत इह अगनि न पोहत ॥
जासु जपत इहु कालु न जोहत ॥
जासु जपत तेरा निरमल माथा ॥
जासु जपत सगला दुखु लाथा ॥6॥
जासु जपत मुसकलु कछू न बनै ॥
जासु जपत सुणि अनहत धुनै ॥
जासु जपत इह निरमल सोइ ॥
जासु जपत कमलु सीधा होइ ॥7॥
गुरि सुभ द्रिसटि सभ ऊपरि करी ॥
जिस कै हिरदै मंत्रु दे हरी ॥
अखंड कीरतनु तिनि भोजनु चूरा ॥
कहु नानक जिसु सतिगुरु पूरा ॥8॥2॥
गुर का सबदु रिद अंतरि धारै ॥
पंच जना सिउ संगु निवारै ॥
दस इंद्री करि राखै वासि ॥
ता कै आतमै होइ परगासु ॥1॥
ऐसी द्रिड़ता ता कै होइ ॥
जा कउ दइआ मइआ प्रभ सोइ ॥1॥ रहाउ ॥
साजनु दुसटु जा कै एक समानै ॥
जेता बोलणु तेता गिआनै ॥
जेता सुनणा तेता नामु ॥
जेता पेखनु तेता धिआनु ॥2॥
सहजे जागणु सहजे सोइ ॥
सहजे होता जाइ सु होइ ॥
सहजि बैरागु सहजे ही हसना ॥
सहजे चूप सहजे ही जपना ॥3॥
सहजे भोजनु सहजे भाउ ॥
सहजे मिटिओ सगल दुराउ ॥
सहजे होआ साधू संगु ॥
सहजि मिलिओ पारब्रहमु निसंगु ॥4॥
सहजे ग्रिह महि सहजि उदासी ॥
गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे नानक ! (जीव बिचारे के क्या वश?) सिर्फ परमात्मा ही (हरेक जीव में व्यापक हो के) सब कुछ कर रहा है और वह प्रभू खुद ही (हरेक जीव को) अक्ल (बख्शता है), खुद ही (हरेक जीव में व्यापक हो ।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।