अंग
279
राग Gauree
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ਤ੍ਰਿਪਤਿ ਨ ਆਵੈ ਮਾਇਆ ਪਾਛੈ ਪਾਵੈ ॥
ਅਨਿਕ ਭੋਗ ਬਿਖਿਆ ਕੇ ਕਰੈ ॥
ਨਹ ਤ੍ਰਿਪਤਾਵੈ ਖਪਿ ਖਪਿ ਮਰੈ ॥
ਬਿਨਾ ਸੰਤੋਖ ਨਹੀ ਕੋਊ ਰਾਜੈ ॥
ਸੁਪਨ ਮਨੋਰਥ ਬ੍ਰਿਥੇ ਸਭ ਕਾਜੈ ॥
ਨਾਮ ਰੰਗਿ ਸਰਬ ਸੁਖੁ ਹੋਇ ॥
ਬਡਭਾਗੀ ਕਿਸੈ ਪਰਾਪਤਿ ਹੋਇ ॥
ਕਰਨ ਕਰਾਵਨ ਆਪੇ ਆਪਿ ॥
ਸਦਾ ਸਦਾ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਜਾਪਿ ॥੫॥
ਅਨਿਕ ਭੋਗ ਬਿਖਿਆ ਕੇ ਕਰੈ ॥
ਨਹ ਤ੍ਰਿਪਤਾਵੈ ਖਪਿ ਖਪਿ ਮਰੈ ॥
ਬਿਨਾ ਸੰਤੋਖ ਨਹੀ ਕੋਊ ਰਾਜੈ ॥
ਸੁਪਨ ਮਨੋਰਥ ਬ੍ਰਿਥੇ ਸਭ ਕਾਜੈ ॥
ਨਾਮ ਰੰਗਿ ਸਰਬ ਸੁਖੁ ਹੋਇ ॥
ਬਡਭਾਗੀ ਕਿਸੈ ਪਰਾਪਤਿ ਹੋਇ ॥
ਕਰਨ ਕਰਾਵਨ ਆਪੇ ਆਪਿ ॥
ਸਦਾ ਸਦਾ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਜਾਪਿ ॥੫॥
त्रिपति न आवै माइआ पाछै पावै ॥
अनिक भोग बिखिआ के करै ॥
नह त्रिपतावै खपि खपि मरै ॥
बिना संतोख नही कोऊ राजै ॥
सुपन मनोरथ ब्रिथे सभ काजै ॥
नाम रंगि सरब सुखु होइ ॥
बडभागी किसै परापति होइ ॥
करन करावन आपे आपि ॥
सदा सदा नानक हरि जापि ॥५॥
अनिक भोग बिखिआ के करै ॥
नह त्रिपतावै खपि खपि मरै ॥
बिना संतोख नही कोऊ राजै ॥
सुपन मनोरथ ब्रिथे सभ काजै ॥
नाम रंगि सरब सुखु होइ ॥
बडभागी किसै परापति होइ ॥
करन करावन आपे आपि ॥
सदा सदा नानक हरि जापि ॥५॥
हिन्दी अर्थ: माया जमा किए जाता है (पर) तृप्त नहीं होता। माया की अनेकों मौजें मानता है। तसल्ली नहीं होती। (भोगों के पीछे और दौड़ता है) बड़ा दुखी होता है। अगर अंदर संतोष ना हो। तो कोई (मनुष्य) तृप्त नहीं होता। जैसे सपनों का कोई लाभ नहीं होता। वैसे (संतोष-हीन मनुष्य के) सारे काम और ख्वाहिशें व्यर्थ हैं। प्रभू के नाम की मौज में (ही) सारा सुख है। (और ये सुख) किसी बड़े भाग्यशाली को मिलता है। (जो) प्रभू खुद ही सब कुछ करने के और (जीवों से) कराने के स्मर्थ है। हे नानक ! उस प्रभू को सदा सिमर। 5।
ਕਰਨ ਕਰਾਵਨ ਕਰਨੈਹਾਰੁ ॥
ਇਸ ਕੈ ਹਾਥਿ ਕਹਾ ਬੀਚਾਰੁ ॥
ਜੈਸੀ ਦ੍ਰਿਸਟਿ ਕਰੇ ਤੈਸਾ ਹੋਇ ॥
ਆਪੇ ਆਪਿ ਆਪਿ ਪ੍ਰਭੁ ਸੋਇ ॥
ਜੋ ਕਿਛੁ ਕੀਨੋ ਸੁ ਅਪਨੈ ਰੰਗਿ ॥
ਸਭ ਤੇ ਦੂਰਿ ਸਭਹੂ ਕੈ ਸੰਗਿ ॥
ਬੂਝੈ ਦੇਖੈ ਕਰੈ ਬਿਬੇਕ ॥
ਆਪਹਿ ਏਕ ਆਪਹਿ ਅਨੇਕ ॥
ਮਰੈ ਨ ਬਿਨਸੈ ਆਵੈ ਨ ਜਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਸਦ ਹੀ ਰਹਿਆ ਸਮਾਇ ॥੬॥
ਇਸ ਕੈ ਹਾਥਿ ਕਹਾ ਬੀਚਾਰੁ ॥
ਜੈਸੀ ਦ੍ਰਿਸਟਿ ਕਰੇ ਤੈਸਾ ਹੋਇ ॥
ਆਪੇ ਆਪਿ ਆਪਿ ਪ੍ਰਭੁ ਸੋਇ ॥
ਜੋ ਕਿਛੁ ਕੀਨੋ ਸੁ ਅਪਨੈ ਰੰਗਿ ॥
ਸਭ ਤੇ ਦੂਰਿ ਸਭਹੂ ਕੈ ਸੰਗਿ ॥
ਬੂਝੈ ਦੇਖੈ ਕਰੈ ਬਿਬੇਕ ॥
ਆਪਹਿ ਏਕ ਆਪਹਿ ਅਨੇਕ ॥
ਮਰੈ ਨ ਬਿਨਸੈ ਆਵੈ ਨ ਜਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਸਦ ਹੀ ਰਹਿਆ ਸਮਾਇ ॥੬॥
करन करावन करनैहारु ॥
इस कै हाथि कहा बीचारु ॥
जैसी द्रिसटि करे तैसा होइ ॥
आपे आपि आपि प्रभु सोइ ॥
जो किछु कीनो सु अपनै रंगि ॥
सभ ते दूरि सभहू कै संगि ॥
बूझै देखै करै बिबेक ॥
आपहि एक आपहि अनेक ॥
मरै न बिनसै आवै न जाइ ॥
नानक सद ही रहिआ समाइ ॥६॥
इस कै हाथि कहा बीचारु ॥
जैसी द्रिसटि करे तैसा होइ ॥
आपे आपि आपि प्रभु सोइ ॥
जो किछु कीनो सु अपनै रंगि ॥
सभ ते दूरि सभहू कै संगि ॥
बूझै देखै करै बिबेक ॥
आपहि एक आपहि अनेक ॥
मरै न बिनसै आवै न जाइ ॥
नानक सद ही रहिआ समाइ ॥६॥
हिन्दी अर्थ: प्रभू खुद ही सब कुछ करने योग्य है, और (जीवों से) करवाने के समर्थ है। विचार के देख ले इस जीव के हाथ में कुछ भी नहीं। प्रभू जैसी नजर (बंदे पर) करता है (बंदा) वैसा ही बन जाता है। वह प्रभू स्वयं ही स्वयं है। जो कुछ उसने बनाया है अपनी मौज में बनाया है; सब जीवों के अंग संग भी है और सबसे अलग भी है। सब कुछ समझता है देखता है और पहचानता है। प्रभू स्वयं ही एक है और स्वयं ही अनेक (रूप) धार रहा है। वह ना कभी मरता है ना बिनसता है; ना पैदा होता है ना मरता है; हे नानक ! प्रभू सदा ही अपने आप में टिका रहता है। 6।
ਆਪਿ ਉਪਦੇਸੈ ਸਮਝੈ ਆਪਿ ॥
ਆਪੇ ਰਚਿਆ ਸਭ ਕੈ ਸਾਥਿ ॥
ਆਪਿ ਕੀਨੋ ਆਪਨ ਬਿਸਥਾਰੁ ॥
ਸਭੁ ਕਛੁ ਉਸ ਕਾ ਓਹੁ ਕਰਨੈਹਾਰੁ ॥
ਉਸ ਤੇ ਭਿੰਨ ਕਹਹੁ ਕਿਛੁ ਹੋਇ ॥
ਥਾਨ ਥਨੰਤਰਿ ਏਕੈ ਸੋਇ ॥
ਅਪੁਨੇ ਚਲਿਤ ਆਪਿ ਕਰਣੈਹਾਰ ॥
ਕਉਤਕ ਕਰੈ ਰੰਗ ਆਪਾਰ ॥
ਮਨ ਮਹਿ ਆਪਿ ਮਨ ਅਪੁਨੇ ਮਾਹਿ ॥
ਨਾਨਕ ਕੀਮਤਿ ਕਹਨੁ ਨ ਜਾਇ ॥੭॥
ਆਪੇ ਰਚਿਆ ਸਭ ਕੈ ਸਾਥਿ ॥
ਆਪਿ ਕੀਨੋ ਆਪਨ ਬਿਸਥਾਰੁ ॥
ਸਭੁ ਕਛੁ ਉਸ ਕਾ ਓਹੁ ਕਰਨੈਹਾਰੁ ॥
ਉਸ ਤੇ ਭਿੰਨ ਕਹਹੁ ਕਿਛੁ ਹੋਇ ॥
ਥਾਨ ਥਨੰਤਰਿ ਏਕੈ ਸੋਇ ॥
ਅਪੁਨੇ ਚਲਿਤ ਆਪਿ ਕਰਣੈਹਾਰ ॥
ਕਉਤਕ ਕਰੈ ਰੰਗ ਆਪਾਰ ॥
ਮਨ ਮਹਿ ਆਪਿ ਮਨ ਅਪੁਨੇ ਮਾਹਿ ॥
ਨਾਨਕ ਕੀਮਤਿ ਕਹਨੁ ਨ ਜਾਇ ॥੭॥
आपि उपदेसै समझै आपि ॥
आपे रचिआ सभ कै साथि ॥
आपि कीनो आपन बिसथारु ॥
सभु कछु उस का ओहु करनैहारु ॥
उस ते भिंन कहहु किछु होइ ॥
थान थनंतरि एकै सोइ ॥
अपुने चलित आपि करणैहार ॥
कउतक करै रंग आपार ॥
मन महि आपि मन अपुने माहि ॥
नानक कीमति कहनु न जाइ ॥७॥
आपे रचिआ सभ कै साथि ॥
आपि कीनो आपन बिसथारु ॥
सभु कछु उस का ओहु करनैहारु ॥
उस ते भिंन कहहु किछु होइ ॥
थान थनंतरि एकै सोइ ॥
अपुने चलित आपि करणैहार ॥
कउतक करै रंग आपार ॥
मन महि आपि मन अपुने माहि ॥
नानक कीमति कहनु न जाइ ॥७॥
हिन्दी अर्थ: (सो वह) स्वयं ही शिक्षा देता है और स्वयं ही (उस शिक्षा को) समझता है। प्रभू खुद ही सब जीवों के साथ मिला हुआ है। अपना फैलाव उसने खुद ही बनाया है। (जगत की) हरेक शै उसकी बनाई हुई है वह बनाने के काबिल है। बताओ उससे अलग कुछ हो सकता है? हर जगह वह प्रभू खुद ही (मौजूद) है। अपने खेल आप ही करने के लायक है। बेअंत रंगों के तमाशे करता है। (जीवों के) मन में स्वयं बस रहा है (जीवों को) अपने मन में टिकाए बैठा है; हे नानक ! उसका मूल्य बताया नहीं जा सकता। 7।
ਸਤਿ ਸਤਿ ਸਤਿ ਪ੍ਰਭੁ ਸੁਆਮੀ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦਿ ਕਿਨੈ ਵਖਿਆਨੀ ॥
ਸਚੁ ਸਚੁ ਸਚੁ ਸਭੁ ਕੀਨਾ ॥
ਕੋਟਿ ਮਧੇ ਕਿਨੈ ਬਿਰਲੈ ਚੀਨਾ ॥
ਭਲਾ ਭਲਾ ਭਲਾ ਤੇਰਾ ਰੂਪ ॥
ਅਤਿ ਸੁੰਦਰ ਅਪਾਰ ਅਨੂਪ ॥
ਨਿਰਮਲ ਨਿਰਮਲ ਨਿਰਮਲ ਤੇਰੀ ਬਾਣੀ ॥
ਘਟਿ ਘਟਿ ਸੁਨੀ ਸ੍ਰਵਨ ਬਖੵਾਣੀ ॥
ਪਵਿਤ੍ਰ ਪਵਿਤ੍ਰ ਪਵਿਤ੍ਰ ਪੁਨੀਤ ॥
ਨਾਮੁ ਜਪੈ ਨਾਨਕ ਮਨਿ ਪ੍ਰੀਤਿ ॥੮॥੧੨॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦਿ ਕਿਨੈ ਵਖਿਆਨੀ ॥
ਸਚੁ ਸਚੁ ਸਚੁ ਸਭੁ ਕੀਨਾ ॥
ਕੋਟਿ ਮਧੇ ਕਿਨੈ ਬਿਰਲੈ ਚੀਨਾ ॥
ਭਲਾ ਭਲਾ ਭਲਾ ਤੇਰਾ ਰੂਪ ॥
ਅਤਿ ਸੁੰਦਰ ਅਪਾਰ ਅਨੂਪ ॥
ਨਿਰਮਲ ਨਿਰਮਲ ਨਿਰਮਲ ਤੇਰੀ ਬਾਣੀ ॥
ਘਟਿ ਘਟਿ ਸੁਨੀ ਸ੍ਰਵਨ ਬਖੵਾਣੀ ॥
ਪਵਿਤ੍ਰ ਪਵਿਤ੍ਰ ਪਵਿਤ੍ਰ ਪੁਨੀਤ ॥
ਨਾਮੁ ਜਪੈ ਨਾਨਕ ਮਨਿ ਪ੍ਰੀਤਿ ॥੮॥੧੨॥
सति सति सति प्रभु सुआमी ॥
गुर परसादि किनै वखिआनी ॥
सचु सचु सचु सभु कीना ॥
कोटि मधे किनै बिरलै चीना ॥
भला भला भला तेरा रूप ॥
अति सुंदर अपार अनूप ॥
निरमल निरमल निरमल तेरी बाणी ॥
घटि घटि सुनी स्रवन बखॵाणी ॥
पवित्र पवित्र पवित्र पुनीत ॥
नामु जपै नानक मनि प्रीति ॥८॥१२॥
गुर परसादि किनै वखिआनी ॥
सचु सचु सचु सभु कीना ॥
कोटि मधे किनै बिरलै चीना ॥
भला भला भला तेरा रूप ॥
अति सुंदर अपार अनूप ॥
निरमल निरमल निरमल तेरी बाणी ॥
घटि घटि सुनी स्रवन बखॵाणी ॥
पवित्र पवित्र पवित्र पुनीत ॥
नामु जपै नानक मनि प्रीति ॥८॥१२॥
हिन्दी अर्थ: (सब का) मालिक प्रभू सदा ही कायम रहने वाला है, गुरू की मेहर से किसी विरले ने (ये बात) बताई है। जो कुछ उसने बनाया है वह भी मुकंमल है (संपूर्ण है अधूरा नहीं) ये बात करोड़ों में से किसी विरले ने पहिचानी है। तेरा रूप क्या प्यारा प्यारा है? हे अत्यंत सुंदर बेअंत और बेमिसाल प्रभू ! तेरी बोली भी मीठी मीठी है। हरेक शरीर में कानों द्वारा सुनी जा रही है और जीभ से उचारी जा रही है (भाव। हरेक शरीर में तू खुद ही बोल रहा है)। हे नानक ! वह पवित्र ही पवित्र हो जाता है। (जो ऐसे प्रभू का) नाम प्रीति से मन में जपता है। 8। 12।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਸੰਤ ਸਰਨਿ ਜੋ ਜਨੁ ਪਰੈ ਸੋ ਜਨੁ ਉਧਰਨਹਾਰ ॥
ਸੰਤ ਕੀ ਨਿੰਦਾ ਨਾਨਕਾ ਬਹੁਰਿ ਬਹੁਰਿ ਅਵਤਾਰ ॥੧॥
ਸੰਤ ਸਰਨਿ ਜੋ ਜਨੁ ਪਰੈ ਸੋ ਜਨੁ ਉਧਰਨਹਾਰ ॥
ਸੰਤ ਕੀ ਨਿੰਦਾ ਨਾਨਕਾ ਬਹੁਰਿ ਬਹੁਰਿ ਅਵਤਾਰ ॥੧॥
सलोकु ॥
संत सरनि जो जनु परै सो जनु उधरनहार ॥
संत की निंदा नानका बहुरि बहुरि अवतार ॥१॥
संत सरनि जो जनु परै सो जनु उधरनहार ॥
संत की निंदा नानका बहुरि बहुरि अवतार ॥१॥
हिन्दी अर्थ: शलोक॥ जो मनुष्य संतों की शरण पड़ता है वह माया के बंधनों से बच जाता है; (पर) हे नानक ! संतों की निंदा करने से बार बार पैदा होना पड़ता है (भाव- जनम मरन के चक्कर में पड़ जाते हैं)। 1।
ਅਸਟਪਦੀ ॥
ਸੰਤ ਕੈ ਦੂਖਨਿ ਆਰਜਾ ਘਟੈ ॥
ਸੰਤ ਕੈ ਦੂਖਨਿ ਜਮ ਤੇ ਨਹੀ ਛੁਟੈ ॥
ਸੰਤ ਕੈ ਦੂਖਨਿ ਸੁਖੁ ਸਭੁ ਜਾਇ ॥
ਸੰਤ ਕੈ ਦੂਖਨਿ ਨਰਕ ਮਹਿ ਪਾਇ ॥
ਸੰਤ ਕੈ ਦੂਖਨਿ ਮਤਿ ਹੋਇ ਮਲੀਨ ॥
ਸੰਤ ਕੈ ਦੂਖਨਿ ਸੋਭਾ ਤੇ ਹੀਨ ॥
ਸੰਤ ਕੇ ਹਤੇ ਕਉ ਰਖੈ ਨ ਕੋਇ ॥
ਸੰਤ ਕੈ ਦੂਖਨਿ ਥਾਨ ਭ੍ਰਸਟੁ ਹੋਇ ॥
ਸੰਤ ਕ੍ਰਿਪਾਲ ਕ੍ਰਿਪਾ ਜੇ ਕਰੈ ॥
ਨਾਨਕ ਸੰਤਸੰਗਿ ਨਿੰਦਕੁ ਭੀ ਤਰੈ ॥੧॥
ਸੰਤ ਕੈ ਦੂਖਨਿ ਆਰਜਾ ਘਟੈ ॥
ਸੰਤ ਕੈ ਦੂਖਨਿ ਜਮ ਤੇ ਨਹੀ ਛੁਟੈ ॥
ਸੰਤ ਕੈ ਦੂਖਨਿ ਸੁਖੁ ਸਭੁ ਜਾਇ ॥
ਸੰਤ ਕੈ ਦੂਖਨਿ ਨਰਕ ਮਹਿ ਪਾਇ ॥
ਸੰਤ ਕੈ ਦੂਖਨਿ ਮਤਿ ਹੋਇ ਮਲੀਨ ॥
ਸੰਤ ਕੈ ਦੂਖਨਿ ਸੋਭਾ ਤੇ ਹੀਨ ॥
ਸੰਤ ਕੇ ਹਤੇ ਕਉ ਰਖੈ ਨ ਕੋਇ ॥
ਸੰਤ ਕੈ ਦੂਖਨਿ ਥਾਨ ਭ੍ਰਸਟੁ ਹੋਇ ॥
ਸੰਤ ਕ੍ਰਿਪਾਲ ਕ੍ਰਿਪਾ ਜੇ ਕਰੈ ॥
ਨਾਨਕ ਸੰਤਸੰਗਿ ਨਿੰਦਕੁ ਭੀ ਤਰੈ ॥੧॥
असटपदी ॥
संत कै दूखनि आरजा घटै ॥
संत कै दूखनि जम ते नही छुटै ॥
संत कै दूखनि सुखु सभु जाइ ॥
संत कै दूखनि नरक महि पाइ ॥
संत कै दूखनि मति होइ मलीन ॥
संत कै दूखनि सोभा ते हीन ॥
संत के हते कउ रखै न कोइ ॥
संत कै दूखनि थान भ्रसटु होइ ॥
संत क्रिपाल क्रिपा जे करै ॥
नानक संतसंगि निंदकु भी तरै ॥१॥
संत कै दूखनि आरजा घटै ॥
संत कै दूखनि जम ते नही छुटै ॥
संत कै दूखनि सुखु सभु जाइ ॥
संत कै दूखनि नरक महि पाइ ॥
संत कै दूखनि मति होइ मलीन ॥
संत कै दूखनि सोभा ते हीन ॥
संत के हते कउ रखै न कोइ ॥
संत कै दूखनि थान भ्रसटु होइ ॥
संत क्रिपाल क्रिपा जे करै ॥
नानक संतसंगि निंदकु भी तरै ॥१॥
हिन्दी अर्थ: अष्टपदी॥ संत की निंदा करने से (मनुष्य की) उम्र (व्यर्थ ही) गुजर जाती है। (क्योंकि) संत की निंदा करने से जमों से बच नहीं सकता। संत की निंदा करने से सारा (ही) सुख (नाश हो) जाता है। और मनुष्य नरक में (भाव- घोर दुखों में) पड़ जाता है। संत की निंदा करने से (मनुष्य की) मति मैली हो जाती है। और (जगत में) मनुष्य शोभा से वंचित रह जाता है। संत के धिक्कारे हुए आदमी की कोई मनुष्य सहायता नहीं कर सकता। (क्योंकि) संत की निंदा करने से (निंदक का) हृदय गंदा हो जाता है। (पर) अगर कृपालु संत स्वयं कृपा करे तो। हे नानक ! संत की संगति में निंदक भी (पापों से) बच जाता है। 1।
ਸੰਤ ਕੇ ਦੂਖਨ ਤੇ ਮੁਖੁ ਭਵੈ ॥
ਸੰਤਨ ਕੈ ਦੂਖਨਿ ਕਾਗ ਜਿਉ ਲਵੈ ॥
ਸੰਤਨ ਕੈ ਦੂਖਨਿ ਸਰਪ ਜੋਨਿ ਪਾਇ ॥
ਸੰਤ ਕੈ ਦੂਖਨਿ ਤ੍ਰਿਗਦ ਜੋਨਿ ਕਿਰਮਾਇ ॥
ਸੰਤਨ ਕੈ ਦੂਖਨਿ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਮਹਿ ਜਲੈ ॥
ਸੰਤ ਕੈ ਦੂਖਨਿ ਸਭੁ ਕੋ ਛਲੈ ॥
ਸੰਤ ਕੈ ਦੂਖਨਿ ਤੇਜੁ ਸਭੁ ਜਾਇ ॥
ਸੰਤ ਕੈ ਦੂਖਨਿ ਨੀਚੁ ਨੀਚਾਇ ॥
ਸੰਤ ਦੋਖੀ ਕਾ ਥਾਉ ਕੋ ਨਾਹਿ ॥
ਸੰਤਨ ਕੈ ਦੂਖਨਿ ਕਾਗ ਜਿਉ ਲਵੈ ॥
ਸੰਤਨ ਕੈ ਦੂਖਨਿ ਸਰਪ ਜੋਨਿ ਪਾਇ ॥
ਸੰਤ ਕੈ ਦੂਖਨਿ ਤ੍ਰਿਗਦ ਜੋਨਿ ਕਿਰਮਾਇ ॥
ਸੰਤਨ ਕੈ ਦੂਖਨਿ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਮਹਿ ਜਲੈ ॥
ਸੰਤ ਕੈ ਦੂਖਨਿ ਸਭੁ ਕੋ ਛਲੈ ॥
ਸੰਤ ਕੈ ਦੂਖਨਿ ਤੇਜੁ ਸਭੁ ਜਾਇ ॥
ਸੰਤ ਕੈ ਦੂਖਨਿ ਨੀਚੁ ਨੀਚਾਇ ॥
ਸੰਤ ਦੋਖੀ ਕਾ ਥਾਉ ਕੋ ਨਾਹਿ ॥
संत के दूखन ते मुखु भवै ॥
संतन कै दूखनि काग जिउ लवै ॥
संतन कै दूखनि सरप जोनि पाइ ॥
संत कै दूखनि त्रिगद जोनि किरमाइ ॥
संतन कै दूखनि त्रिसना महि जलै ॥
संत कै दूखनि सभु को छलै ॥
संत कै दूखनि तेजु सभु जाइ ॥
संत कै दूखनि नीचु नीचाइ ॥
संत दोखी का थाउ को नाहि ॥
संतन कै दूखनि काग जिउ लवै ॥
संतन कै दूखनि सरप जोनि पाइ ॥
संत कै दूखनि त्रिगद जोनि किरमाइ ॥
संतन कै दूखनि त्रिसना महि जलै ॥
संत कै दूखनि सभु को छलै ॥
संत कै दूखनि तेजु सभु जाइ ॥
संत कै दूखनि नीचु नीचाइ ॥
संत दोखी का थाउ को नाहि ॥
हिन्दी अर्थ: संत की निंदा करने से (निंदक का) चेहरा ही भ्रष्ट हो जाता है। (और निंदक) (जगह जगह) कौए की तरह लब-लब करता है (निंदा के बचन बोलता फिरता है)। संत की निंदा करने से (खोटा स्वभाव बन जाने से) मनुष्य सांप की जोनि जा पड़ता है। और कृमि आदि छोटी जोनियों में भटकता है। संत की निंदा के कारण (निंदक) तृष्णा (की आग) में जलता भुनता है। और हरेक मनुष्य को धोखा देता फिरता है। संत की निंदा करने से सारा तेज प्रताप ही नष्ट हो जाता है और (निंदक) महा नीच बन जाता है। संत की निंदा करने वालों का कोई आसरा नहीं रहता;
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 279 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
दिल्ली के Sunday-morning के bhajan-मण्डली, घर में dadiji सुन रहीं।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 62 पंक्तियों का है, 7 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 279” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 280 →, पीछे का: ← अंग 278।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।