लुल्ला परिवारLulla Family
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भागवतम् और पुराणलीला, भक्ति और अवतार

शिवपुराण

चुना हुआ पुनर्कथन

32 चुने हुए प्रसंग।

दायरा और आधार-संस्करण

पाठ-जाँच के लिए गीता प्रेस का श्रीशिवमहापुराणम्, केवल संस्कृत श्लोक, उत्पाद 2020, नामित संदर्भ है।

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शिवपुराण

शिव की कथाएँ, गीता प्रेस के संक्षिप्त शिवपुराण से, कहानी के रूप में। जैसे-जैसे और कथाएँ जुड़ती जाएँगी, यह संग्रह बढ़ता जाएगा।

शिवपुराण माहात्म्य

शिव मन्दिर के पास भस्मधवल त्रिशूलधारी शिवपार्षद काले पाशधारी यमदूतों को खदेड़कर ब्राह्मण देवराज को छुड़ा रहे हैं और उसे स्वर्णिम दिव्य विमान पर बिठा रहे हैं, एक ओर श्यामवर्ण धर्मराज हाथ जोड़े प्रणाम कर रहे हैं।

चंचुला की कथाशिवपुराण सुनने से एक पापिनी का उद्धार, और कथा की महिमा।

रुद्रसंहिता (सृष्टि खण्ड)

मलय पर्वत की गुफा में समाधिस्थ नारद के समक्ष कामदेव धनुष चढ़ाए और वसन्त पुष्प बिखेरते हुए।

नारद का अभिमानतप के मद में चूर नारद, और विष्णु की माया का पाठ।

देवर्षि नारद अपनी वीणा पास रखकर हाथ जोड़े ब्रह्मलोक में कमल पर विराजमान श्वेत-दाढ़ी वाले चतुर्मुख ब्रह्मा के सम्मुख भक्तिपूर्वक घुटनों के बल बैठे हैं और पितामह उन्हें शिवतत्त्व की कथा सुनाने को उद्यत हैं।

रुद्रसंहिता (सती खण्ड)

दक्ष के आँगन में सखियों के बीच बैठी नन्ही श्याम-वर्णा सती खेल भूलकर पत्र-फलक पर शिव का चित्र बनाती और उनके नाम जपती हैं, पास एक वात्सल्यमयी धाय।

शिव-सती विवाहब्रह्मा के अनुरोध पर शिव और सती का विवाह।

दण्डकारण्य के घने वन में नन्दी पर सती-सहित विचरते शिव उस शोक-विह्वल श्याम श्रीराम और धनुर्धर लक्ष्मण से सामना पाते हैं जो हा सीते पुकारते वन में भटक रहे हैं।

प्रयागके भव्य यज्ञमण्डपमें राख जैसे उज्ज्वल शरीरवाले शिव त्रिशूल लिये आसनपर शान्त बैठे किसीको सिर नहीं झुकाते, उनके पास तेजस्वी नन्दीश्वर बैठे हैं, ऊपर कमलपर चतुर्मुख ब्रह्मा विराजते हैं, और मुकुटधारी दक्ष क्रोधसे उँगली उठाकर शिवकी निन्दा करते हैं जबकि चारों ओर ऋषि और देवता हाथ जोड़े बैठे हैं।

रुद्रसंहिता (पार्वती खण्ड)

हिमवान् और मेना के समक्ष पालने में श्यामवर्णा दिव्य कन्या शिवा प्रकट, ऊपर मेघों में विष्णु आदि देव दर्शन करते।

पार्वती का जन्महिमालय के घर देवी का अवतरण और शिव की सेवा।

तारकासुर काले श्याम विशाल शरीर और सुनहरे मुकुट में इन्द्र के दिव्य सिंहासन पर विराजमान है, उसके एक हाथ में धनुष है और पास सोने की गदा रखी है, चारों ओर दैत्य बैठे हैं तथा पदच्युत देवता और दिव्य प्राणी सिर झुकाए हाथ जोड़े खड़े हैं।

हिमालय के हिमशिखर पर समाधिस्थ शिव के सामने पार्वती दो सखियों सहित पुष्प अर्पित कर सेवा कर रही हैं।

हिमवान् और मेना के समक्ष तपस्या को जाने की अनुमति लेती पार्वती, सखियाँ पास खड़ी हैं।

हिमशिखर पर समाधिस्थ शिव के समक्ष सप्तर्षि नतमस्तक खड़े हैं।

हिमवान के पर्वत-महल में अरुन्धती-सहित सप्तर्षि शिव की महिमा कहते हुए पार्वती का हाथ माँगते हैं, और भाव-विभोर गिरिराज हाथ जोड़कर वाग्दान दे देते हैं।

रुद्रसंहिता (कुमार खण्ड)

कैलास पर पार्वती छह मुखवाले शिशु कार्तिकेय को गोद में लिये हैं, पास शिव और उपहार लाती देवियाँ हैं।

कार्तिकेय और तारकासुरस्कन्द का जन्म और तारकासुर का वध।

हिमालय के महल में मुकुटधारी पार्वती स्नेह से अपने नवनिर्मित पुत्र का मुख दोनों हाथों से थामे हैं; बालक मानव-मुख वाला, घुँघराले बाल और श्वेत धोती में है, पास उबटन और पुष्पों के पात्र रखे हैं।

हिमालय में शिव और पार्वती नन्दी के साथ बैठे हैं; उनके सामने दोनों पुत्र, मोरवाहन षण्मुख कार्तिकेय शक्ति-अस्त्र लिए और मूषक के पास गजमुख गणेश मोदक तथा अंकुश लिए, बाल-रूप में विराजमान हैं।

रुद्रसंहिता (युद्ध खण्ड)

चार मुख वाले ब्रह्मा हंस पर उतरकर वरद हस्त उठाते हैं और नीले केश वाले तीन असुर भाई हाथ जोड़े तपस्या में बैठे उनसे तीन उड़ते नगरों का वर मांगते हैं।

त्रिपुरारितीन उड़ते नगरों का दहन और शिव का त्रिपुरारि नाम।

पुष्कर तीर्थ पर वर्षों से कृष्ण-मन्त्र जपते तपस्वी दम्भ के मस्तक से तेज का जाज्वल्यमान स्तम्भ उठकर दिशाओं को भर देता है, ऊपर आकाश में देव-मुनि आँखें मूँदे घबराए हुए।

शोणितपुर के दीपित प्रासाद में रात को अकेले सहस्रबाहु बाणासुर भाव-विभोर होकर ताण्डव करते हैं, केवल अपने आराध्य को रिझाने को, और ऊपर प्रसन्न शिव कोमल प्रभा-मण्डल में मन्द-मुस्कान लिए प्रकट होते हैं।

गजमुख असुर गजासुर मुकुट पहने पर्वत-शिखर पर पद्मासन में समाधिस्थ है; उसकी घोर तपस्या की लपटें चारों ओर आकाश तक फैली आग बनकर धधक रही हैं।

शतरुद्रसंहिता

वन के आश्रम में ध्यानमग्न शिलाद मुनि के समक्ष भस्म-धवल शिव उमा सहित प्रकट होकर एक हाथ वरमुद्रा में उठाए मृत्युहीन और अयोनिज पुत्र का वरदान देते हैं, पास त्रिशूल-डमरू गड़ा है और शिवलिंग पर पुष्प सजे हैं।

नन्दीश्वरशिव के गणपति नन्दी का जन्म और अभिषेक।

काशी के घाटों पर रात में त्रिशूलधारी काल भैरव श्वान के साथ खड़े हैं, भक्त दीप लिये आरती कर रहे हैं।

ऋक्षकुल पर्वत पर तपस्यारत अत्रि और अनसूया के सामने ब्रह्मा, विष्णु और शिव प्रकट होकर तीन पुत्रों का वरदान देते हैं।

विशाल दैत्य वृत्रासुर गदा उठाये युद्धभूमिपर खड़ा है, नीचे अस्त्रोंका ढेर पड़ा है, और ऊपर आकाशमें कमलपर विराजमान चतुर्मुख ब्रह्मा भागकर आये इन्द्र तथा देवताओंको उपाय बताते हैं, पृष्ठभूमिमें बिजलीभरा काला आकाश छाया है।

वसन्ती फूलों से लदे वन में राजा भद्रायु कंधे पर बड़ा धनुष और तरकश लिये रानी कीर्तिमालिनी के साथ टहल रहे हैं, पीछे छत्र और भाले लिये सेवक चल रहे हैं।

तपस्वी वेषमें अर्जुन एक पार्थिव शिवलिंगके सामने हाथ जोड़े समाधिमें बैठे हैं, उनके मस्तकसे तेजकी ज्वाला ऊपर उठ रही है, पास ही धनुष रखा है, और ऊपर आकाशमें महादेवका दिव्य रूप प्रकट है।

कोटिरुद्रसंहिता

दक्ष के भवन में मंगल-वाद्यों के बीच वृद्ध प्रजापति एक-एक कर अपनी सत्ताईस तेजस्विनी नक्षत्र-कन्याओं का हाथ दुग्ध-धवल चन्द्रमा को सौंपते हैं, मानो एक चन्द्र के चारों ओर तारों की माला।

सोमनाथप्रथम ज्योतिर्लिंग सोमनाथ के प्रादुर्भाव (manifestation) की कथा।

क्रौंच पर्वत पर रूठे हुए कुमार कार्तिकेय हाथ बाँधे मुँह फेरे बैठे हैं, पास मयूर और वेल रखा है, और भस्म-धवल शिव तथा स्वर्णवर्णा पार्वती स्नेह से हाथ बढ़ाकर उन्हें मनाते हैं, पीछे पर्वत पर दो ज्योतियाँ मल्लिकार्जुन लिंग की भाँति जगमगाती हैं।

वीणा लिए नारद गिरिराज विन्ध्य से मेरु की ऊँचाई की चर्चा करते, पीछे हिमशिखर और स्वर्णिम मेरु पर्वत।

चार भुजाओंवाले नीले श्रीहरि आकाशमें तैरती हुई देदीप्यमान मन्दिर-नगरीके बीच समाधिस्थ बैठे हैं, उनके शरीरसे श्वेत जलकी धाराएँ बहकर सूने आकाशको भर रही हैं, और एक चमकती मणि नीचे गिरकर मणिकर्णिका तीर्थको प्रकट कर रही है।

पके सुनहरे धान के खेत में वृद्ध महर्षि गौतम तिनके के गुच्छे से एक दुर्बल गाय को हांकते हैं और वह गाय भूमि पर गिर पड़ती है, पास खड़ी पत्नी अहल्या व्यथित होती हैं और ओट में छिपे ईर्ष्यालु ऋषि तथा उनकी स्त्रियां अंगुली उठाकर गोहत्या का झूठा दोष चिल्लाते हैं।

समुद्र-तट पर वानर-सेना के बीच खड़े श्रीराम पार लंका की ओर देखते हैं, हाथ में वानर का लाया मीठा जल, पर शिव-दर्शन से पहले उसे एक ओर रखे हुए।