अंग 309

अंग
309
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਓਇ ਅਗੈ ਕੁਸਟੀ ਗੁਰ ਕੇ ਫਿਟਕੇ ਜਿ ਓਸੁ ਮਿਲੈ ਤਿਸੁ ਕੁਸਟੁ ਉਠਾਹੀ ॥
ਹਰਿ ਤਿਨ ਕਾ ਦਰਸਨੁ ਨਾ ਕਰਹੁ ਜੋ ਦੂਜੈ ਭਾਇ ਚਿਤੁ ਲਾਹੀ ॥
ਧੁਰਿ ਕਰਤੈ ਆਪਿ ਲਿਖਿ ਪਾਇਆ ਤਿਸੁ ਨਾਲਿ ਕਿਹੁ ਚਾਰਾ ਨਾਹੀ ॥
ਜਨ ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਅਰਾਧਿ ਤੂ ਤਿਸੁ ਅਪੜਿ ਕੋ ਨ ਸਕਾਹੀ ॥
ਨਾਵੈ ਕੀ ਵਡਿਆਈ ਵਡੀ ਹੈ ਨਿਤ ਸਵਾਈ ਚੜੈ ਚੜਾਹੀ ॥੨॥
ओइ अगै कुसटी गुर के फिटके जि ओसु मिलै तिसु कुसटु उठाही ॥
हरि तिन का दरसनु ना करहु जो दूजै भाइ चितु लाही ॥
धुरि करतै आपि लिखि पाइआ तिसु नालि किहु चारा नाही ॥
जन नानक नामु अराधि तू तिसु अपड़ि को न सकाही ॥
नावै की वडिआई वडी है नित सवाई चड़ै चड़ाही ॥२॥

हिन्दी अर्थ: गुरू से टूटे हुए वे पहले ही कोढ़ी हैं। जो कोई ऐसे मनुष्य का संग करता है उसे भी कोढ़ चिपका देते हैं। (हे सिखो !) वास्ता है ईश्वर का। उनके दर्शन भी ना करो जो (सतिगुरू को छोड़ के) माया के प्यार में चिक्त जोड़ते हैं। उनके साथ (भाव। उन्हें सुधारने के लिए) कोई उपाय कारगर नहीं हो सकता। क्योंकि। करतार ने आरम्भ से ही (उनके किए कर्मों के अनुसार ऐसे दूसरे भाव के संस्कार ही उनके मन में) लिख के डाल दिए हैं। हे दास नानक ! तू नाम जप। नाम जपने वाले की बराबरी कोई नहीं कर सकता। नाम की महिमा बहुत बड़ी है। दिनो-दिन बढ़ती जाती है। 2।
ਮਃ ੪ ॥
ਜਿ ਹੋਂਦੈ ਗੁਰੂ ਬਹਿ ਟਿਕਿਆ ਤਿਸੁ ਜਨ ਕੀ ਵਡਿਆਈ ਵਡੀ ਹੋਈ ॥
ਤਿਸੁ ਕਉ ਜਗਤੁ ਨਿਵਿਆ ਸਭੁ ਪੈਰੀ ਪਇਆ ਜਸੁ ਵਰਤਿਆ ਲੋਈ ॥
ਤਿਸ ਕਉ ਖੰਡ ਬ੍ਰਹਮੰਡ ਨਮਸਕਾਰੁ ਕਰਹਿ ਜਿਸ ਕੈ ਮਸਤਕਿ ਹਥੁ ਧਰਿਆ ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਸੋ ਪੂਰਾ ਹੋਈ ॥
ਗੁਰ ਕੀ ਵਡਿਆਈ ਨਿਤ ਚੜੈ ਸਵਾਈ ਅਪੜਿ ਕੋ ਨ ਸਕੋਈ ॥
ਜਨੁ ਨਾਨਕੁ ਹਰਿ ਕਰਤੈ ਆਪਿ ਬਹਿ ਟਿਕਿਆ ਆਪੇ ਪੈਜ ਰਖੈ ਪ੍ਰਭੁ ਸੋਈ ॥੩॥
मः ४ ॥
जि होंदै गुरू बहि टिकिआ तिसु जन की वडिआई वडी होई ॥
तिसु कउ जगतु निविआ सभु पैरी पइआ जसु वरतिआ लोई ॥
तिस कउ खंड ब्रहमंड नमसकारु करहि जिस कै मसतकि हथु धरिआ गुरि पूरै सो पूरा होई ॥
गुर की वडिआई नित चड़ै सवाई अपड़ि को न सकोई ॥
जनु नानकु हरि करतै आपि बहि टिकिआ आपे पैज रखै प्रभु सोई ॥३॥

हिन्दी अर्थ: महला ४॥ जिस मनुष्य को सतिगुरू ने खुद होते हुए बैठ के (भाव। अपनी जिंदगी में अपने हाथों से) तिलक दिया हो। उसकी बहुत शोभा होती है। उसके आगे सारा संसार झुकता है और उसके चरणों में लगता है। उसकी शोभा सारे जगत में बिखर जाती है। जिसके माथे पर पूरे सतिगुरू ने हाथ रखा हो (भाव। जिसकी सहायता सतिगुरू ने की) वह (सब गुणों में) पूर्ण हो गया और सब खण्ड-ब्रहमंडों के जीव-जंतु उसको नमस्कार करते हैं। सतिगुरू की वडिआई दिनो-दिन बढ़ती है। कोई मनुष्य उसकी बराबरी नहीं कर सकता। (क्योंकि) अपने सेवक नानक को सृजनहार प्रभू ने खुद मान बख्शा है। (इस करके) प्रभू खुद लाज रखता है। 3।
ਪਉੜੀ ॥
ਕਾਇਆ ਕੋਟੁ ਅਪਾਰੁ ਹੈ ਅੰਦਰਿ ਹਟਨਾਲੇ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਉਦਾ ਜੋ ਕਰੇ ਹਰਿ ਵਸਤੁ ਸਮਾਲੇ ॥
ਨਾਮੁ ਨਿਧਾਨੁ ਹਰਿ ਵਣਜੀਐ ਹੀਰੇ ਪਰਵਾਲੇ ॥
ਵਿਣੁ ਕਾਇਆ ਜਿ ਹੋਰ ਥੈ ਧਨੁ ਖੋਜਦੇ ਸੇ ਮੂੜ ਬੇਤਾਲੇ ॥
ਸੇ ਉਝੜਿ ਭਰਮਿ ਭਵਾਈਅਹਿ ਜਿਉ ਝਾੜ ਮਿਰਗੁ ਭਾਲੇ ॥੧੫॥
पउड़ी ॥
काइआ कोटु अपारु है अंदरि हटनाले ॥
गुरमुखि सउदा जो करे हरि वसतु समाले ॥
नामु निधानु हरि वणजीऐ हीरे परवाले ॥
विणु काइआ जि होर थै धनु खोजदे से मूड़ बेताले ॥
से उझड़ि भरमि भवाईअहि जिउ झाड़ मिरगु भाले ॥१५॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ (मानस) शरीर एक सुंदर किला है। जिस में (मानो। सुंदर) बाजार भी हैं। (भाव। ज्ञानेंद्रियां दुकानों की कतारें हैं)। जो मनुष्य सतिगुरू के सन्मुख हो के व्यापार करता है। वह हरी का नाम-धन संभाल लेता है। (शरीर किले में ही) प्रभू के नाम का खजाना का वणज किया जा सकता है (यही धन सदा साथ निभने वाले) हीरे और मूंगे हैं। जो मनुष्य इस धन को शरीर के बिना किसी और जगह से तलाशते हैं। वे मूर्ख हैं और (मनुष्य शरीर में आए हुए) भूत हैं। जैसे (कस्तूरी को अपनी ही नाभि में ना जानते हुए) हिरन (कस्तूरी की वासना के लिए) झाड़ियों में ढूँढते फिरते हैं। 15।
ਸਲੋਕ ਮਃ ੪ ॥
ਜੋ ਨਿੰਦਾ ਕਰੇ ਸਤਿਗੁਰ ਪੂਰੇ ਕੀ ਸੁ ਅਉਖਾ ਜਗ ਮਹਿ ਹੋਇਆ ॥
ਨਰਕ ਘੋਰੁ ਦੁਖ ਖੂਹੁ ਹੈ ਓਥੈ ਪਕੜਿ ਓਹੁ ਢੋਇਆ ॥
ਕੂਕ ਪੁਕਾਰ ਕੋ ਨ ਸੁਣੇ ਓਹੁ ਅਉਖਾ ਹੋਇ ਹੋਇ ਰੋਇਆ ॥
ਓਨਿ ਹਲਤੁ ਪਲਤੁ ਸਭੁ ਗਵਾਇਆ ਲਾਹਾ ਮੂਲੁ ਸਭੁ ਖੋਇਆ ॥
ਓਹੁ ਤੇਲੀ ਸੰਦਾ ਬਲਦੁ ਕਰਿ ਨਿਤ ਭਲਕੇ ਉਠਿ ਪ੍ਰਭਿ ਜੋਇਆ ॥
ਹਰਿ ਵੇਖੈ ਸੁਣੈ ਨਿਤ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਤਿਦੂ ਕਿਛੁ ਗੁਝਾ ਨ ਹੋਇਆ ॥
ਜੈਸਾ ਬੀਜੇ ਸੋ ਲੁਣੈ ਜੇਹਾ ਪੁਰਬਿ ਕਿਨੈ ਬੋਇਆ ॥
ਜਿਸੁ ਕ੍ਰਿਪਾ ਕਰੇ ਪ੍ਰਭੁ ਆਪਣੀ ਤਿਸੁ ਸਤਿਗੁਰ ਕੇ ਚਰਣ ਧੋਇਆ ॥
ਗੁਰ ਸਤਿਗੁਰ ਪਿਛੈ ਤਰਿ ਗਇਆ ਜਿਉ ਲੋਹਾ ਕਾਠ ਸੰਗੋਇਆ ॥
ਜਨ ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇ ਤੂ ਜਪਿ ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮਿ ਸੁਖੁ ਹੋਇਆ ॥੧॥
सलोक मः ४ ॥
जो निंदा करे सतिगुर पूरे की सु अउखा जग महि होइआ ॥
नरक घोरु दुख खूहु है ओथै पकड़ि ओहु ढोइआ ॥
कूक पुकार को न सुणे ओहु अउखा होइ होइ रोइआ ॥
ओनि हलतु पलतु सभु गवाइआ लाहा मूलु सभु खोइआ ॥
ओहु तेली संदा बलदु करि नित भलके उठि प्रभि जोइआ ॥
हरि वेखै सुणै नित सभु किछु तिदू किछु गुझा न होइआ ॥
जैसा बीजे सो लुणै जेहा पुरबि किनै बोइआ ॥
जिसु क्रिपा करे प्रभु आपणी तिसु सतिगुर के चरण धोइआ ॥
गुर सतिगुर पिछै तरि गइआ जिउ लोहा काठ संगोइआ ॥
जन नानक नामु धिआइ तू जपि हरि हरि नामि सुखु होइआ ॥१॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला ४ ॥ जो मनुष्य पूरे सतिगुरू की निंदा करता है। वह संसार में (भाव। सारी उम्र) दुखी रहता है। दुखों का कूआँ-रूप जो घोर नर्क है। उस निंदक को पकड़ के उस कूँए में डाला जाता है। (जहाँ) उसकी चीख-पुकार की ओर कोई ध्यान नहीं करता। और वह ज्यों-ज्यों दुखी होता है। त्यों-त्यों ज्यादा रोता है। लोक और परलोक। भजन-रूपी लाभ और मानस-जनम-रूपी मूल – ये सब कुछ निंदक ने गवा लिए होते हैं। तेली का बैल बना के नित्य नए सूरज के साथ वह प्रभू के हुकम में जोया जाता है (भाव। जैसे तेली का बैल हर रोज सवेरे कोल्हू के आगे जुतता है। वैसे ही वह निंदक नित्य निंदा के चक्कर में पड़ कर दुख सहता है)। हरी सदा (ये) सब कुछ देखता सुनता है उससे कोई बात छुपी नहीं रह सकती। (यह प्रभू के हुकम में ही है कि) जैसा बीज किसी जीव ने शुरू से बीजा है और जैसा अब बीज रहा है। वैसा फल वह खाता है। जिस मनुष्य पर प्रभू अपनी मेहर करे। वह सतिगुरू के चरण धोता है। जैसे लोहा काठ के संग तैरता है वैसे ही सतिगुरू के बताए मार्ग पर चल के (संसार सागर से) तैर जाता है। (इस वास्ते) हे दास नानक ! तू नाम जप (क्योंकि) प्रभू का नाम जपने से सुख मिलता है। 1।
ਮਃ ੪ ॥
ਵਡਭਾਗੀਆ ਸੋਹਾਗਣੀ ਜਿਨਾ ਗੁਰਮੁਖਿ ਮਿਲਿਆ ਹਰਿ ਰਾਇ ॥
ਅੰਤਰ ਜੋਤਿ ਪ੍ਰਗਾਸੀਆ ਨਾਨਕ ਨਾਮਿ ਸਮਾਇ ॥੨॥
मः ४ ॥
वडभागीआ सोहागणी जिना गुरमुखि मिलिआ हरि राइ ॥
अंतर जोति प्रगासीआ नानक नामि समाइ ॥२॥

हिन्दी अर्थ: महला ४॥ सतिगुरू के सन्मुख रहके जिन्हें प्रकाश-रूप प्रभू मिल गया है। वह जीव-सि्त्रयां बड़ी भाग्यशाली व जीवित पति वाली (सोहगन) हैं। हे नानक ! नाम में लीन होने से उनके हृदय में ज्योति जग पड़ती है। 2।
ਪਉੜੀ ॥
ਇਹੁ ਸਰੀਰੁ ਸਭੁ ਧਰਮੁ ਹੈ ਜਿਸੁ ਅੰਦਰਿ ਸਚੇ ਕੀ ਵਿਚਿ ਜੋਤਿ ॥
ਗੁਹਜ ਰਤਨ ਵਿਚਿ ਲੁਕਿ ਰਹੇ ਕੋਈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸੇਵਕੁ ਕਢੈ ਖੋਤਿ ॥
ਸਭੁ ਆਤਮ ਰਾਮੁ ਪਛਾਣਿਆ ਤਾਂ ਇਕੁ ਰਵਿਆ ਇਕੋ ਓਤਿ ਪੋਤਿ ॥
ਇਕੁ ਦੇਖਿਆ ਇਕੁ ਮੰਨਿਆ ਇਕੋ ਸੁਣਿਆ ਸ੍ਰਵਣ ਸਰੋਤਿ ॥
पउड़ी ॥
इहु सरीरु सभु धरमु है जिसु अंदरि सचे की विचि जोति ॥
गुहज रतन विचि लुकि रहे कोई गुरमुखि सेवकु कढै खोति ॥
सभु आतम रामु पछाणिआ तां इकु रविआ इको ओति पोति ॥
इकु देखिआ इकु मंनिआ इको सुणिआ स्रवण सरोति ॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ यह सारा (मानस) शरीर धर्म (कमाने की जगह) है। इसमें सच्चे प्रभू की ज्योति छुपी हुई है। इस (शरीर) में (दैवी गुण-रूपी) गुझे लाल छुपे हुए हैं। सतिगुरू के सन्मुख होने से कोई दुर्लभ सेवक इनको खोद के (भाव। गहरी विचार से) निकालता है। (जब वह सेवक लाभ ढूँढ लेता है) तब एक प्रभू को सारी सृष्टि में (इस तरह) रमा हुआ पहचानता है। जैसे ताने और पेटे में ओत-प्रोत एक ही सूत्र होता है। (तब वह सेवक सारे संसार में) एक हरी को ही देखता है। एक हरी पर ही भरोसा रखता है और अपने कानों से एक हरी की ही बातें सुनता है।

संदर्भ: यह अंग 309 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Raam Daas Ji।

Mehrauli के पुराने पत्थरों के पास, 800 साल का इतिहास और एक 600 साल पुरानी पंक्ति।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 36 पंक्तियों का है, 6 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 309” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 310 →, पीछे का: ← अंग 308

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।