अंग 230

अंग
230
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਗੁਰਮੁਖਿ ਵਿਚਹੁ ਹਉਮੈ ਜਾਇ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਮੈਲੁ ਨ ਲਾਗੈ ਆਇ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਵਸੈ ਮਨਿ ਆਇ ॥੨॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਕਰਮ ਧਰਮ ਸਚਿ ਹੋਈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਅਹੰਕਾਰੁ ਜਲਾਏ ਦੋਈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਸੁਖੁ ਹੋਈ ॥੩॥
ਆਪਣਾ ਮਨੁ ਪਰਬੋਧਹੁ ਬੂਝਹੁ ਸੋਈ ॥
ਲੋਕ ਸਮਝਾਵਹੁ ਸੁਣੇ ਨ ਕੋਈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਮਝਹੁ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਹੋਈ ॥੪॥
ਮਨਮੁਖਿ ਡੰਫੁ ਬਹੁਤੁ ਚਤੁਰਾਈ ॥
ਜੋ ਕਿਛੁ ਕਮਾਵੈ ਸੁ ਥਾਇ ਨ ਪਾਈ ॥
ਆਵੈ ਜਾਵੈ ਠਉਰ ਨ ਕਾਈ ॥੫॥
ਮਨਮੁਖ ਕਰਮ ਕਰੇ ਬਹੁਤੁ ਅਭਿਮਾਨਾ ॥
ਬਗ ਜਿਉ ਲਾਇ ਬਹੈ ਨਿਤ ਧਿਆਨਾ ॥
ਜਮਿ ਪਕੜਿਆ ਤਬ ਹੀ ਪਛੁਤਾਨਾ ॥੬॥
ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਸੇਵੇ ਮੁਕਤਿ ਨ ਹੋਈ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਮਿਲੈ ਹਰਿ ਸੋਈ ॥
ਗੁਰੁ ਦਾਤਾ ਜੁਗ ਚਾਰੇ ਹੋਈ ॥੭॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਜਾਤਿ ਪਤਿ ਨਾਮੇ ਵਡਿਆਈ ॥
ਸਾਇਰ ਕੀ ਪੁਤ੍ਰੀ ਬਿਦਾਰਿ ਗਵਾਈ ॥
ਨਾਨਕ ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਝੂਠੀ ਚਤੁਰਾਈ ॥੮॥੨॥
गुरमुखि विचहु हउमै जाइ ॥
गुरमुखि मैलु न लागै आइ ॥
गुरमुखि नामु वसै मनि आइ ॥२॥
गुरमुखि करम धरम सचि होई ॥
गुरमुखि अहंकारु जलाए दोई ॥
गुरमुखि नामि रते सुखु होई ॥३॥
आपणा मनु परबोधहु बूझहु सोई ॥
लोक समझावहु सुणे न कोई ॥
गुरमुखि समझहु सदा सुखु होई ॥४॥
मनमुखि डंफु बहुतु चतुराई ॥
जो किछु कमावै सु थाइ न पाई ॥
आवै जावै ठउर न काई ॥५॥
मनमुख करम करे बहुतु अभिमाना ॥
बग जिउ लाइ बहै नित धिआना ॥
जमि पकड़िआ तब ही पछुताना ॥६॥
बिनु सतिगुर सेवे मुकति न होई ॥
गुर परसादी मिलै हरि सोई ॥
गुरु दाता जुग चारे होई ॥७॥
गुरमुखि जाति पति नामे वडिआई ॥
साइर की पुत्री बिदारि गवाई ॥
नानक बिनु नावै झूठी चतुराई ॥८॥२॥

हिन्दी अर्थ: (हे पंडित !) गुरू की शरण पड़ने से मन में से अहंकार दूर हो जाता है~ गुरू की शरण पड़ने से (मन के अहंकार की) मैल आ के नहीं चिपकती~ (क्योंकि) गुरू की शरण पड़ने से परमात्मा का नाम मन में आ बसता है। 2। (हे पंडित !) गुरू के सन्मुख रहने से सदा स्थिर परमात्मा में लीनता हो जाती है (और यही है असली) कर्म-धर्म। जो गुरू की शरण पड़ता है वह (अपने अंदर से) अहंकार व मेर तेर जला देता है। प्रभू के नाम में रंगे जा के गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य को आत्मिक आनंद प्राप्त होता है। 3। (हे पंडित ! पहले) अपने मन को जगाओ और उस परमात्मा की हस्ती को समझो। (हे पण्डित ! तुम्हारा अपना मन माया के मोह में सोया पड़ा है~ पर) तुम लोगों को शिक्षा देते हो (इस तरह कभी) कोई मनुष्य (शिक्षा) नहीं सुनता। गुरू की शरण पड़ कर तुम खुद (सही जीवन मार्ग को) समझो~ तुम्हें सदा आत्मिक आनंद मिलेगा। 4। (हे पंडित !) अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य (धार्मिक) दिखावा करता है~ बड़ी चतुराई दिखाता है। (पर जो कुछ वह) खुद (अमली जीवन) कमाता है वह (परमात्मा की नजरों में) परवान नहीं होता~ वह मनुष्य जनम मरण के चक्कर में पड़ा रहता है~ उसे आत्मिक शांति की कोई जगह नहीं मिलती। 5। अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य (अपनी ओर से धार्मिक) कर्म करता है (पर) इस तरह उसके अंदर बहुत गुरूर पैदा होता है~ वह सदा बगुले की तरह ही समाधि लगा के बैठता है। वह तभी पछताएगा जब मौत ने (उसे सिर से) आ जकड़ा। 6। (हे पण्डित !) सतिगुरू की शरण पड़े बिना (दंभ आदि से) खलासी नहीं होती। गुरू की कृपा से ही वह (घट-घट की जानने वाला) परमात्मा मिलता है। (हे पण्डित ! सतियुग कलियुग कह कह के किसी युग के जिम्मे बुराई लगा के गलती ना कर) चारों युगों में गुरू ही परमात्मा के नाम की दाति देने वाला है। 7। (हे पंडित !) गुरू की शरण पड़ने वाले मनुष्य के लिए हरी-नाम ही ऊँची जाति है~ ऊँचा कुल है~ परमात्मा के नाम में वह अपनी इज्जत मानता है। नाम की बरकति से ही उसने माया का प्रभाव (अपने अंदर से) काट के परे रख दिया है। हे नानक ! (कह, हे पंडित !) परमात्मा के नाम से वंचित रह कर और और चतुराईयां दिखानी व्यर्थ हैं। 8। 2।
ਗਉੜੀ ਮਃ ੩ ॥
ਇਸੁ ਜੁਗ ਕਾ ਧਰਮੁ ਪੜਹੁ ਤੁਮ ਭਾਈ ॥
ਪੂਰੈ ਗੁਰਿ ਸਭ ਸੋਝੀ ਪਾਈ ॥
ਐਥੈ ਅਗੈ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਸਖਾਈ ॥੧॥
ਰਾਮ ਪੜਹੁ ਮਨਿ ਕਰਹੁ ਬੀਚਾਰੁ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਮੈਲੁ ਉਤਾਰੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਵਾਦਿ ਵਿਰੋਧਿ ਨ ਪਾਇਆ ਜਾਇ ॥
ਮਨੁ ਤਨੁ ਫੀਕਾ ਦੂਜੈ ਭਾਇ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਸਚਿ ਲਿਵ ਲਾਇ ॥੨॥
ਹਉਮੈ ਮੈਲਾ ਇਹੁ ਸੰਸਾਰਾ ॥
ਨਿਤ ਤੀਰਥਿ ਨਾਵੈ ਨ ਜਾਇ ਅਹੰਕਾਰਾ ॥
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਭੇਟੇ ਜਮੁ ਕਰੇ ਖੁਆਰਾ ॥੩॥
ਸੋ ਜਨੁ ਸਾਚਾ ਜਿ ਹਉਮੈ ਮਾਰੈ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਪੰਚ ਸੰਘਾਰੈ ॥
ਆਪਿ ਤਰੈ ਸਗਲੇ ਕੁਲ ਤਾਰੈ ॥੪॥
ਮਾਇਆ ਮੋਹਿ ਨਟਿ ਬਾਜੀ ਪਾਈ ॥
ਮਨਮੁਖ ਅੰਧ ਰਹੇ ਲਪਟਾਈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਅਲਿਪਤ ਰਹੇ ਲਿਵ ਲਾਈ ॥੫॥
ਬਹੁਤੇ ਭੇਖ ਕਰੈ ਭੇਖਧਾਰੀ ॥
ਅੰਤਰਿ ਤਿਸਨਾ ਫਿਰੈ ਅਹੰਕਾਰੀ ॥
ਆਪੁ ਨ ਚੀਨੈ ਬਾਜੀ ਹਾਰੀ ॥੬॥
ਕਾਪੜ ਪਹਿਰਿ ਕਰੇ ਚਤੁਰਾਈ ॥
ਮਾਇਆ ਮੋਹਿ ਅਤਿ ਭਰਮਿ ਭੁਲਾਈ ॥
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਸੇਵੇ ਬਹੁਤੁ ਦੁਖੁ ਪਾਈ ॥੭॥
ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਸਦਾ ਬੈਰਾਗੀ ॥
ਗ੍ਰਿਹੀ ਅੰਤਰਿ ਸਾਚਿ ਲਿਵ ਲਾਗੀ ॥
ਨਾਨਕ ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵਹਿ ਸੇ ਵਡਭਾਗੀ ॥੮॥੩॥
गउड़ी मः ३ ॥
इसु जुग का धरमु पड़हु तुम भाई ॥
पूरै गुरि सभ सोझी पाई ॥
ऐथै अगै हरि नामु सखाई ॥१॥
राम पड़हु मनि करहु बीचारु ॥
गुर परसादी मैलु उतारु ॥१॥ रहाउ ॥
वादि विरोधि न पाइआ जाइ ॥
मनु तनु फीका दूजै भाइ ॥
गुर कै सबदि सचि लिव लाइ ॥२॥
हउमै मैला इहु संसारा ॥
नित तीरथि नावै न जाइ अहंकारा ॥
बिनु गुर भेटे जमु करे खुआरा ॥३॥
सो जनु साचा जि हउमै मारै ॥
गुर कै सबदि पंच संघारै ॥
आपि तरै सगले कुल तारै ॥४॥
माइआ मोहि नटि बाजी पाई ॥
मनमुख अंध रहे लपटाई ॥
गुरमुखि अलिपत रहे लिव लाई ॥५॥
बहुते भेख करै भेखधारी ॥
अंतरि तिसना फिरै अहंकारी ॥
आपु न चीनै बाजी हारी ॥६॥
कापड़ पहिरि करे चतुराई ॥
माइआ मोहि अति भरमि भुलाई ॥
बिनु गुर सेवे बहुतु दुखु पाई ॥७॥
नामि रते सदा बैरागी ॥
ग्रिही अंतरि साचि लिव लागी ॥
नानक सतिगुरु सेवहि से वडभागी ॥८॥३॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी मः ३ ॥ हे भाई ! इस मानस जन्म के कर्तव्य पढ़ो (अर्थात~ ये सीखो कि मानस जन्म में जीवन सफल करने के लिए क्या प्रयास करने चाहिए)। (हे भाई ! जो मनुष्य गुरू की शरण आ पड़ा है) पूरे गुरू ने उसे ये सूझ दी कि इस लोक में और परलोक में परमात्मा का नाम (ही असल) साथी है। 1। (हे भाई !) परमात्मा (की सिफत सालाह) पढ़ो~ (अपने) मन में (परमात्मा के गुणों का) विचार करो~ (इस तरह) गुरू की कृपा से (अपने मन में से विकारों की) मैल दूर करो। 1। रहाउ। (हे भाई ! किसी धार्मिक) बहिस करने से (या किसी धर्म का) खण्डन करने से परमात्मा का नाम प्राप्त नहीं होता (इस तरह परमात्मा के नाम की लगन से टूट के) और ही स्वादों में पड़ा मन आत्मिक जीवन से वंचित हो जाता है~ शरीर (हृदय) आत्मिक जीवन विहीन हो जाता है। गुरू के शबद के द्वारा (ही मनुष्य) सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा में लगन जोड़ सकता है। 2। (हे भाई !गुरू को मिले बिना) ये जगत (भाव~ दुनिया का ये मनुष्य) अहम् (के विकार) से मलीन (-मन) हो जाता है। सदा तीर्थों पर स्नान भी करता है (पर इस तरह इसके मन का) अहंकार दूर नहीं होता~ गुरू को मिले बगैर आत्मिक मौत इसे ख्वार करती रहती है। 3। (हे भाई !) वह मनुष्य सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा का रूप हो जाता है~ और (अपने अंदर से) अहंकार को दूर कर लेता है जो मनुष्य गुरू के शबद द्वारा (कामादिक) पाँचों विकारों को खत्म कर देता है~ वह खुद (संसार समुंद्र में से) पार लांघ जाता है और अपने सारे कुलों को भी पार लंघा लेता है। 4। (हे भाई ! जैसे जब कोई नट बाजी डालता है तो लोग तमाशा देखने आ इकट्ठे होते हैं~ वैसे ही) (प्रभू) नट ने माया के मोह से ये (जगत रचना का) तमाशा रच दिया है। (इसे देख देख के) अपने मन के पीछे चलने वाले (माया के मोह में) अंधे हुए मनुष्य (इस तमाशे के साथ) चिपक रहे हैं। पर~ गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य (प्रभू चरणों में) सुरति जोड़ के (इस तमाशे से) निर्लिप रहते हैं। 5। (हे भाई !) निरे धार्मिक पहिरावे को ही धर्म समझने वाला मनुष्य विभिन्न तरह की धार्मिक वेश-भूषाएं पहनता है (पर उसके) अंदर (माया की) तृष्णा (बनी रहती है) वह अहंकार में ही विचरता है। वह अपने जीवन को नहीं परखता (इस वास्ते) वह मनुष्य-जनम की बाज़ी हार जाता है। 6। (हे भाई !) जो मनुष्य निरे धार्मिक पहिरावे करके ही चतुराई (भरी बातें) करता है (कि मैं धार्मिक हूँ~ पर अंदर से) माया के मोह के कारण बहुत भटकना में फंस के गलत राह पर पड़ा रहता है~ वह मनुष्य गुरू की शरण ना आने के कारण बहुत दुख पाता है। 7। (हे भाई !) जो मनुष्य परमात्मा के नाम में रंगे रहते हैं~ वे सदैव वैरागमयी रहते हैं। गृहस्थ में रहते हुए ही उनकी लगन सदा-स्थिर परमात्मा में लगी रहती है। हे नानक ! वे मनुष्य बहुत भाग्यशाली हैं~ क्योंकि वे गुरू की शरण में रहते हैं। 8। 3।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਬ੍ਰਹਮਾ ਮੂਲੁ ਵੇਦ ਅਭਿਆਸਾ ॥
ਤਿਸ ਤੇ ਉਪਜੇ ਦੇਵ ਮੋਹ ਪਿਆਸਾ ॥
ਤ੍ਰੈ ਗੁਣ ਭਰਮੇ ਨਾਹੀ ਨਿਜ ਘਰਿ ਵਾਸਾ ॥੧॥
ਹਮ ਹਰਿ ਰਾਖੇ ਸਤਿਗੁਰੂ ਮਿਲਾਇਆ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਭਗਤਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਦ੍ਰਿੜਾਇਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਤ੍ਰੈ ਗੁਣ ਬਾਣੀ ਬ੍ਰਹਮ ਜੰਜਾਲਾ ॥
ਪੜਿ ਵਾਦੁ ਵਖਾਣਹਿ ਸਿਰਿ ਮਾਰੇ ਜਮਕਾਲਾ ॥
गउड़ी महला ३ ॥
ब्रहमा मूलु वेद अभिआसा ॥
तिस ते उपजे देव मोह पिआसा ॥
त्रै गुण भरमे नाही निज घरि वासा ॥१॥
हम हरि राखे सतिगुरू मिलाइआ ॥
अनदिनु भगति हरि नामु द्रिड़ाइआ ॥१॥ रहाउ ॥
त्रै गुण बाणी ब्रहम जंजाला ॥
पड़ि वादु वखाणहि सिरि मारे जमकाला ॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ३ ॥ (हे भाई ! जिस) ब्रहमा को वेद-अभ्यास का रास्ता चलाने वाला माना जाता है (जो ब्रह्मा वेद-अभ्यास का मूल माना जाता है) उससे (सारे) देवते पैदा हुए (माने जाते हैं~ पर वह देवते माया के) मोह (-माया की) तृष्णा में फंसे हुए ही बताए जा रहे हैं। वह देवते माया के तीन गुणों में ही भटकते रहे~ उन्हे प्रभू चरणों में ठिकाना ना मिला। 1। (हे भाई !) हमें परमात्मा ने (माया के प्रभाव से बचा) लिया है~ (परमातमा ने हमें) गुरू मिला दिया है~ (जिस गुरू ने हमारे दिल में) हर वक्त (परमात्मा की) भक्ति पक्की टिका दी है~ परमात्मा का नाम पक्का टिका दिया है। 1। रहाउ। (हे भाई !) ब्रह्मा की रची हुई बाणी (वह बाणी जो ब्रहमा की रची हुई बताई जाती है) माया के तीन गुणों में ही रखती है~ (क्योंकि इसे) पढ़ के (विद्वान पण्डित) बहिस ही करते हैं~ उनके सिर पर आत्मिक मौत अपनी चोट कायम रखती है।

संदर्भ: यह अंग 230 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Amar Daas Ji।

New Friends Colony के पाँच-मंज़िला flat की terrace पर रात की हवा।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 56 पंक्तियों का है, 3 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 230” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 231 →, पीछे का: ← अंग 229

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।