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महाकाव्य और पुराण

हरिवंश

हरि के वंश की कथा: सृष्टि के पहले क्षण से कृष्ण के सम्पूर्ण जीवन तक, बीस प्रसंगों में

हरिवंश कृष्ण वृक्ष के नीचे बंसी बजा रहे हैं, पास गौएँ और मोर हैं, दूर जल के उस पार द्वारका नगरी दिखती है।
  • 20कथाएँ
  • महाभारत · खिल-पर्व

पूरा महाभारत सुन चुके जनमेजय वैशम्पायन से यदुवंश की कथा आरम्भ से माँगते हैं, और कहानी सृष्टि से शुरू होती है। महाभारत के इस खिल-पर्व से बीस चुने हुए प्रसंग, जिनमें पन्द्रह कृष्ण-चरित के, जन्म से बाणासुर-युद्ध तक; पूरे ग्रंथ का अनुवाद नहीं।

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दायरा और आधार-संस्करणपाठ-जाँच के लिए भांडारकर ओरिएण्टल रिसर्च इंस्टीट्यूट का Critical Edition of Harivamsa, खण्ड 1 और 2, सम्पादक डॉ. पी. एल. वैद्य, नामित संदर्भ है। स्रोत और सीमाएँ → संग्रह का पूरा नक़्शा →

हरिवंश कृष्ण वृक्ष के नीचे बंसी बजा रहे हैं, पास गौएँ और मोर हैं, दूर जल के उस पार द्वारका नगरी दिखती है।

महाकाव्य और पुराण समूह में हरिवंश, अपने 8 साथी संग्रहों के बीच

20 कथाएँ

हरिवंश पर्व

  1. 1सृष्टि का आरम्भपढ़ने में लगभग 5 मिनट
  2. 2वेन और पृथुपढ़ने में लगभग 4 मिनट
  3. 3सूर्य, संज्ञा और छायापढ़ने में लगभग 4 मिनट
  4. 4स्यमन्तक मणिपढ़ने में लगभग 5 मिनट

विष्णु पर्व · कृष्ण-चरित

  1. 5धरती की पुकारपढ़ने में लगभग 4 मिनट
  2. 6कृष्ण-जन्मपढ़ने में लगभग 6 मिनट
  3. 7पूतना-वधपढ़ने में लगभग 4 मिनट
  4. 8उलटी गाड़ी और व्रज का अचरजपढ़ने में लगभग 4 मिनट
  5. 9यमलार्जुन (ओखल और दो वृक्ष)पढ़ने में लगभग 4 मिनट
  6. 10कालिय-दमनपढ़ने में लगभग 4 मिनट
  7. 11धेनुक और प्रलम्बपढ़ने में लगभग 4 मिनट
  8. 12गोवर्धन-धारणपढ़ने में लगभग 5 मिनट
  9. 13अक्रूर और मथुरा की राहपढ़ने में लगभग 4 मिनट
  10. 14कंस-वधपढ़ने में लगभग 5 मिनट
  11. 15जरासंध और द्वारकापढ़ने में लगभग 4 मिनट
  12. 16रुक्मिणी-हरणपढ़ने में लगभग 4 मिनट
  13. 17नरकासुर-वधपढ़ने में लगभग 4 मिनट
  14. 18पारिजातपढ़ने में लगभग 4 मिनट
  15. 19बाण-युद्धपढ़ने में लगभग 5 मिनट

उपसंहार

  1. 20उपसंहार: आने वाले युगपढ़ने में लगभग 3 मिनट

पढ़ने की राहें

हरिवंश


महाभारत सुन चुकने के बाद भी जनमेजय की प्यास बुझी नहीं थी। कुरुओं की कथा में वृष्णि और अन्धक वीरों के नाम बार-बार आए थे, पर उनकी अपनी कथा छूट गई थी, और राजा ने वैशम्पायन से वही माँगी। उसी माँग से हरिवंश उठता है: हरि के वंश की कथा, महाभारत का खिल-पर्व, उसका परिशिष्ट, और अपने आप में एक पूरा महाकाव्य। पुराणों की सूची में इसका नाम नहीं, पर ढंग पुराणों का ही है। सृष्टि से कथा उठती है, मनुओं और युगों का हिसाब चलता है, वंशों की नदियाँ बहती हैं, सूर्य का कुल, पृथु, स्यमन्तक मणि, और फिर वह धारा कृष्ण पर आ कर ठहरती है। यहीं इस ग्रन्थ का सबसे बड़ा आकर्षण है। कृष्ण के जीवन का इतना विस्तृत वृत्तान्त, जन्म से गोकुल, मथुरा और द्वारका तक, स्वयं महाभारत में नहीं मिलता, और परम्परा ने इस जीवन के लिए इसी ग्रन्थ को सदा प्रमाण माना है। गीता का जो नायक रथ पर खड़ा मिलता है, उसका बचपन, उसकी गायें, उसका कालिय, उसका गोवर्धन, उसका कंस, सब यहाँ हैं। इसीलिए पढ़िए। जो कृष्ण को केवल रथ पर खड़े उपदेशक की तरह जानते हैं, उन्हें यहाँ वह शिशु मिलेगा जो उलटी गाड़ी के पास से रेंगता हुआ निकल जाता है; और जो उन्हें बालक की तरह जानते हैं, उन्हें वह पुरुष मिलेगा जो जरासंध से लड़ता है और समुद्र की गोद में द्वारका बसाता है। नीचे बीस चुने हुए प्रसंग कहानी-रूप में अलग पन्नों पर रखे हैं, तीन भागों में: हरिवंश पर्व, विष्णु पर्व का कृष्ण-चरित, और उपसंहार।

कहाँ से शुरू करें? कथा के क्रम से चलना हो तो प्रसंग 1 से, सृष्टि के आरम्भ से, और सीधे बीसवें तक, आने वाले युगों तक। कृष्ण के लिए आए हों तो प्रसंग 5, धरती की पुकार, से उठाइए; वहीं से विष्णु पर्व खुलता है और एक साँस में कंस-वध तक ले जाता है। और अगर आज बस एक पन्ना पढ़ना हो, तो 10, कालिय-दमन, या 12, गोवर्धन-धारण; दोनों अपने आप में पूरे हैं। हर प्रसंग के नीचे उसका अपना स्रोत-नोट है, और हर कथा आप उसी के पन्ने पर, उसके अपने समय में, पढ़ सकते हैं।


बीस चुनी हुई पुनर्कथाएँ। अध्याय-संख्या पी. एल. वैद्य के समीक्षित हरिवंश (भांडारकर प्राच्यविद्या संस्थान, पुणे) की है; कई प्रसंग मन्मथनाथ दत्त के अंग्रेज़ी अनुवाद (1897) से कहे गए हैं, जो प्रचलित पाठ पर आधारित है। हर प्रसंग का दायरा उसके अपने स्रोत-नोट में दिया है।