Lulla Family

श्री राम गीता

श्री राम गीता
अध्यात्म रामायण · उत्तर काण्ड · सर्ग 5
62 श्लोक, 8 खण्डों में। राज्याभिषेक के पश्चात्, लक्ष्मण जी श्रीरामचन्द्र से एक प्रश्न रखते हैं: “भ्राता, मुझे ब्रह्म-ज्ञान का उपदेश दीजिए।” राम उत्तर में जो कहते हैं, वही एक संक्षिप्त और सीधा वेदान्त-उपदेश बनकर हमारे सामने आता है।
अज्ञानमेवास्य हि मूलकारणं तद्धानमेवात्र विधौ विधीयते।
विद्यैव तन्नाशविधौ पटीयसी न कर्म तज्जं सविरोधमीरितम् ॥
“संसार का मूल कारण अज्ञान ही है, और उसी का नाश यहाँ विधेय है; उस अज्ञान को मिटाने में विद्या ही समर्थ है, उससे उपजा कर्म नहीं।” यही वह मर्म है जिससे सम्पूर्ण राम-गीता खुलती है।
Hero illustration for rg/rg-hero-landing.jpg

परिचय

A luminous non-dual color illustration expressing the Adhyatma Ramayana's vision: Sri Rama as the supreme Brahman, blue-complexioned and radiant, seated in serene majesty enveloped in boundless golden light, the still ground of all being. Around him a single shimmering veil of Maya unfolds into the play of the manifold world, the seamless one appearing as the many; the cosmos arising from and resting within his luminous form. Sita is suggested only as the gentle luminous veil of Maya inseparable from him, not as a separate crowned figure. Classical-Indian painterly style, deep indigo and gold, vast oneness and quiet awe; no text or watermark.

अध्यात्म रामायण एक भिन्न प्रकार की रामायण है। वाल्मीकि की रामायण मुख्यतः कथा है, जिसमें राम की उत्कृष्टता पर बल है। अध्यात्म रामायण वेदान्त की दृष्टि से रची गयी है, जहाँ राम स्वयं ब्रह्म हैं, सीता माया हैं, और सम्पूर्ण रामकथा एक अद्वैत-व्याख्यान बन जाती है।

इस ग्रन्थ के रचयिता परम्परा से व्यास माने जाते हैं। इसका वर्तमान रूप लगभग चौदहवीं-पन्द्रहवीं शताब्दी में स्थिर हुआ। उन्हीं दिनों वेदान्त का नया उत्कर्ष चल रहा था, और “अध्यात्म” नाम से अनेक ग्रन्थ सामने आये, जिनमें यह सर्वाधिक प्रतिष्ठित है।

A tender color illustration in classical-Indian miniature style: the coronation now complete, Sri Rama sits calm and majestic upon the royal throne of Ayodhya in fine silks and crown, a faint serene smile on his blue-hued face as though awaiting this very moment. Beside him, quietly seated on the marble floor, the composed Lakshmana looks toward his elder brother with a question stirring within, hands joined. Behind them the peace of the palace after the long forest exile and war; courtiers stand at a respectful distance. Jewel tones, golden lamplight, restrained reverent mood; no other figures crowd the brothers; no text or watermark.

“राम गीता” इसी अध्यात्म रामायण के उत्तर काण्ड में आती है। राज्याभिषेक सम्पन्न हो चुका है। राम राजगद्दी पर विराजमान हैं। लक्ष्मण जी समीप ही शान्त बैठे हैं। चौदह वर्ष का वनवास, फिर युद्ध, और अब यह शान्ति। किन्तु एक प्रश्न उनके भीतर ठहरा हुआ है।

वे अग्रज के समीप जाकर हाथ जोड़कर निवेदन करते हैं, “रघुनाथ, मुझे एक बात समझाइए। संसार में लोग कर्म करते हैं, यज्ञ करते हैं, शास्त्र पढ़ते हैं। फिर भी दुःख का अन्त नहीं होता। क्या कोई एक ऐसा तत्त्व है जिससे शान्ति मिल जाये?”

राम के मुख पर मन्द मुस्कान आ जाती है, मानो इसी क्षण की वे प्रतीक्षा कर रहे हों। गुरु के रूप में बैठकर वे 62 श्लोकों में सम्पूर्ण वेदान्त को उठाकर लक्ष्मण के सम्मुख रख देते हैं।

राम गीता अद्वैत-वेदान्त की एक संक्षिप्त, सीधी और प्रामाणिक प्रस्तुति है। शंकराचार्य के दार्शनिक स्वर और अष्टावक्र के अत्यन्त निर्भीक स्वर, दोनों के बीच का मार्ग, किन्तु वेदान्त यहाँ पूर्ण रूप में है। साधक को क्या पढ़ना चाहिए, क्या करना चाहिए, और साधना के पश्चात् क्या घटित होता है, यह सब इन्हीं 62 श्लोकों में समाया हुआ है।

यह गीता संक्षिप्त होते हुए भी अनेक टीकाओं की पात्र रही है। आदि शंकराचार्य की अद्वैत-परम्परा के विख्यात टीकाकार आनन्दगिरि ने इस पर विस्तृत व्याख्या रची। आज भी जो जन राम-भक्ति और अद्वैत-ज्ञान को एक साथ हृदय में धारण करना चाहते हैं, उनके लिए यह आधारभूत ग्रन्थ है।

हमने इस गीता को 8 विषय-खण्डों में बाँटा है, क्योंकि श्लोक-दर-श्लोक पढ़ते जाने पर भीतर का प्रवाह छूट जाता है। प्रत्येक खण्ड एक ही विषय पर ठहरता है। धीरे-धीरे पढ़िए, कुछ अंशों पर रुकिए, और राम के सरल किन्तु गहरे शब्दों को भीतर बहने दीजिए।

आठ खण्ड

62 श्लोकों को 8 विषय-खण्डों में सँवारा गया है। प्रत्येक खण्ड में संस्कृत मूल, उसका लिप्यन्तर और विस्तार से अर्थ।

खण्ड 1
प्रश्न और प्रारम्भ
लक्ष्मण का प्रश्न, और राम का पहला वचन: ज्ञान के बिना कर्म व्यर्थ है।
खण्ड 2
ज्ञान और कर्म
कर्म अकेला क्यों पर्याप्त नहीं, और ज्ञान का स्थान सबसे ऊपर क्यों।
खण्ड 3
पंच-कोश विवेक
पाँच कोश: अन्न, प्राण, मन, विज्ञान, आनन्द। “मैं” इन सबसे परे।
खण्ड 4
अद्वैत-स्वरूप
आत्मा एक है, ब्रह्म एक है, और दोनों एक ही हैं।
खण्ड 5
माया का खेल
अनेकता एक से कैसे उठ खड़ी हुई। माया का जादू, और उसका मूल।
खण्ड 6
साधना का मार्ग
श्रवण, मनन, निदिध्यासन। गुरु का स्वरूप, और शिष्य की पात्रता।
खण्ड 7
मुक्त की दशा
जीवन्मुक्त का व्यवहार, और उसकी भीतरी अवस्था।
खण्ड 8
उपसंहार
राम का अन्तिम वचन, और यह उपदेश किसे देना है, किसे नहीं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या यह “राम गीता” वाल्मीकि की रामायण में है?

नहीं। यह अध्यात्म रामायण में है, जो वाल्मीकि की रामायण से भिन्न है और वेदान्त-दर्शन को रामकथा के रूप में रखती है। यह गीता उसके उत्तर काण्ड के सर्ग 5 में आती है।

यह भगवद् गीता से किस प्रकार भिन्न है?

भगवद् गीता विस्तृत है (700 श्लोक), यह संक्षिप्त (62 श्लोक)। भगवद् गीता में कर्म, भक्ति और ज्ञान, तीनों मार्ग आते हैं। राम गीता मुख्यतः ज्ञान-मार्ग पर ठहरती है। और भगवद् गीता एक योद्धा को कर्म-योग सिखाती है, जबकि राम गीता एक भाई को ब्रह्म-ज्ञान देती है।

क्या यह केवल ज्ञान-मार्ग है, इसमें भक्ति नहीं?

यह मुख्यतः ज्ञान-मार्ग है, किन्तु इसमें अद्वैत और भक्ति का अनूठा संगम है। राम स्वयं ब्रह्म हैं, अतः यहाँ भक्ति और ज्ञान अलग नहीं रह जाते। राम पर समर्पण ही आत्मा पर समर्पण है।

“पंच-कोश” का क्या अर्थ है?

A meditative diagrammatic color illustration of the five sheaths (pancha-kosha) teaching: a seated human figure shown as five luminous concentric layers, from the outermost physical body (annamaya) inward through the breath-sheath (pranamaya), the mind-sheath (manomaya), the intellect-sheath (vijnanamaya), to the innermost subtle bliss-sheath (anandamaya), each rendered as a softly glowing translucent shell in graded jewel hues. At the silent center burns a single steady flame of pure awareness, the witnessing 'I' that stands beyond and apart from all five coverings. Classical-Indian devotional palette, gold and indigo, contemplative stillness; no text or watermark.

यह तैत्तिरीय उपनिषद् का विचार है। मनुष्य के पाँच आवरण: अन्नमय (शरीर), प्राणमय (प्राण), मनोमय (मन), विज्ञानमय (बुद्धि) और आनन्दमय (आनन्द-कोश)। “मैं” इन पाँचों से परे, इन सबका साक्षी है।

यदि मैं ब्राह्मण नहीं, तब भी क्या इसे पढ़ना उचित है?

हाँ। राम गीता का अधिकांश उपदेश सर्व-साधारण के लिए है। केवल इतना ध्यान रहे कि यह जिज्ञासु के लिए रची गयी है, जो हृदय से अद्वैत को समझना चाहता है। जिसमें वह जिज्ञासा न जागी हो, उसे यह नीरस लग सकती है।

किस क्रम में पढ़ूँ?

क्रम से, खण्ड 1 से 8 तक। प्रत्येक खण्ड पिछले पर टिककर आगे बढ़ता है। खण्ड 3 (पंच-कोश) सबसे सूक्ष्म है, और खण्ड 6 (साधना) सबसे व्यावहारिक। किन्तु इन तक पहुँचने से पूर्व शेष को पढ़ लेना आवश्यक है।

साथ में पढ़ें