अंग
223
राग Gauree
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਗੁਰੁ ਪੁਛਿ ਦੇਖਿਆ ਨਾਹੀ ਦਰੁ ਹੋਰੁ ॥
ਦੁਖੁ ਸੁਖੁ ਭਾਣੈ ਤਿਸੈ ਰਜਾਇ ॥
ਨਾਨਕੁ ਨੀਚੁ ਕਹੈ ਲਿਵ ਲਾਇ ॥੮॥੪॥
ਦੁਖੁ ਸੁਖੁ ਭਾਣੈ ਤਿਸੈ ਰਜਾਇ ॥
ਨਾਨਕੁ ਨੀਚੁ ਕਹੈ ਲਿਵ ਲਾਇ ॥੮॥੪॥
गुरु पुछि देखिआ नाही दरु होरु ॥
दुखु सुखु भाणै तिसै रजाइ ॥
नानकु नीचु कहै लिव लाइ ॥८॥४॥
दुखु सुखु भाणै तिसै रजाइ ॥
नानकु नीचु कहै लिव लाइ ॥८॥४॥
हिन्दी अर्थ: मैंने अपने गुरू को पूछ के देख लिया है कि (उस प्रभू के बिना सुख का) और कोई ठिकाना नहीं। जीव के दुख और सुख उस प्रभू की रजा में ही उस प्रभू की मर्जी से ही मिलते हैं। अंजान मति नानक (प्रभू चरणों में) सुरति जोड़ के प्रभू की सिफत सालाह ही करता है (इसी में ही सुख है)। 8। 4।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਦੂਜੀ ਮਾਇਆ ਜਗਤ ਚਿਤ ਵਾਸੁ ॥
ਕਾਮ ਕ੍ਰੋਧ ਅਹੰਕਾਰ ਬਿਨਾਸੁ ॥੧॥
ਦੂਜਾ ਕਉਣੁ ਕਹਾ ਨਹੀ ਕੋਈ ॥
ਸਭ ਮਹਿ ਏਕੁ ਨਿਰੰਜਨੁ ਸੋਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਦੂਜੀ ਦੁਰਮਤਿ ਆਖੈ ਦੋਇ ॥
ਆਵੈ ਜਾਇ ਮਰਿ ਦੂਜਾ ਹੋਇ ॥੨॥
ਧਰਣਿ ਗਗਨ ਨਹ ਦੇਖਉ ਦੋਇ ॥
ਨਾਰੀ ਪੁਰਖ ਸਬਾਈ ਲੋਇ ॥੩॥
ਰਵਿ ਸਸਿ ਦੇਖਉ ਦੀਪਕ ਉਜਿਆਲਾ ॥
ਸਰਬ ਨਿਰੰਤਰਿ ਪ੍ਰੀਤਮੁ ਬਾਲਾ ॥੪॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਮੇਰਾ ਚਿਤੁ ਲਾਇਆ ॥
ਸਤਿਗੁਰਿ ਮੋ ਕਉ ਏਕੁ ਬੁਝਾਇਆ ॥੫॥
ਏਕੁ ਨਿਰੰਜਨੁ ਗੁਰਮੁਖਿ ਜਾਤਾ ॥
ਦੂਜਾ ਮਾਰਿ ਸਬਦਿ ਪਛਾਤਾ ॥੬॥
ਏਕੋ ਹੁਕਮੁ ਵਰਤੈ ਸਭ ਲੋਈ ॥
ਏਕਸੁ ਤੇ ਸਭ ਓਪਤਿ ਹੋਈ ॥੭॥
ਰਾਹ ਦੋਵੈ ਖਸਮੁ ਏਕੋ ਜਾਣੁ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਹੁਕਮੁ ਪਛਾਣੁ ॥੮॥
ਸਗਲ ਰੂਪ ਵਰਨ ਮਨ ਮਾਹੀ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਏਕੋ ਸਾਲਾਹੀ ॥੯॥੫॥
ਦੂਜੀ ਮਾਇਆ ਜਗਤ ਚਿਤ ਵਾਸੁ ॥
ਕਾਮ ਕ੍ਰੋਧ ਅਹੰਕਾਰ ਬਿਨਾਸੁ ॥੧॥
ਦੂਜਾ ਕਉਣੁ ਕਹਾ ਨਹੀ ਕੋਈ ॥
ਸਭ ਮਹਿ ਏਕੁ ਨਿਰੰਜਨੁ ਸੋਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਦੂਜੀ ਦੁਰਮਤਿ ਆਖੈ ਦੋਇ ॥
ਆਵੈ ਜਾਇ ਮਰਿ ਦੂਜਾ ਹੋਇ ॥੨॥
ਧਰਣਿ ਗਗਨ ਨਹ ਦੇਖਉ ਦੋਇ ॥
ਨਾਰੀ ਪੁਰਖ ਸਬਾਈ ਲੋਇ ॥੩॥
ਰਵਿ ਸਸਿ ਦੇਖਉ ਦੀਪਕ ਉਜਿਆਲਾ ॥
ਸਰਬ ਨਿਰੰਤਰਿ ਪ੍ਰੀਤਮੁ ਬਾਲਾ ॥੪॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਮੇਰਾ ਚਿਤੁ ਲਾਇਆ ॥
ਸਤਿਗੁਰਿ ਮੋ ਕਉ ਏਕੁ ਬੁਝਾਇਆ ॥੫॥
ਏਕੁ ਨਿਰੰਜਨੁ ਗੁਰਮੁਖਿ ਜਾਤਾ ॥
ਦੂਜਾ ਮਾਰਿ ਸਬਦਿ ਪਛਾਤਾ ॥੬॥
ਏਕੋ ਹੁਕਮੁ ਵਰਤੈ ਸਭ ਲੋਈ ॥
ਏਕਸੁ ਤੇ ਸਭ ਓਪਤਿ ਹੋਈ ॥੭॥
ਰਾਹ ਦੋਵੈ ਖਸਮੁ ਏਕੋ ਜਾਣੁ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਹੁਕਮੁ ਪਛਾਣੁ ॥੮॥
ਸਗਲ ਰੂਪ ਵਰਨ ਮਨ ਮਾਹੀ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਏਕੋ ਸਾਲਾਹੀ ॥੯॥੫॥
गउड़ी महला १ ॥
दूजी माइआ जगत चित वासु ॥
काम क्रोध अहंकार बिनासु ॥१॥
दूजा कउणु कहा नही कोई ॥
सभ महि एकु निरंजनु सोई ॥१॥ रहाउ ॥
दूजी दुरमति आखै दोइ ॥
आवै जाइ मरि दूजा होइ ॥२॥
धरणि गगन नह देखउ दोइ ॥
नारी पुरख सबाई लोइ ॥३॥
रवि ससि देखउ दीपक उजिआला ॥
सरब निरंतरि प्रीतमु बाला ॥४॥
करि किरपा मेरा चितु लाइआ ॥
सतिगुरि मो कउ एकु बुझाइआ ॥५॥
एकु निरंजनु गुरमुखि जाता ॥
दूजा मारि सबदि पछाता ॥६॥
एको हुकमु वरतै सभ लोई ॥
एकसु ते सभ ओपति होई ॥७॥
राह दोवै खसमु एको जाणु ॥
गुर कै सबदि हुकमु पछाणु ॥८॥
सगल रूप वरन मन माही ॥
कहु नानक एको सालाही ॥९॥५॥
दूजी माइआ जगत चित वासु ॥
काम क्रोध अहंकार बिनासु ॥१॥
दूजा कउणु कहा नही कोई ॥
सभ महि एकु निरंजनु सोई ॥१॥ रहाउ ॥
दूजी दुरमति आखै दोइ ॥
आवै जाइ मरि दूजा होइ ॥२॥
धरणि गगन नह देखउ दोइ ॥
नारी पुरख सबाई लोइ ॥३॥
रवि ससि देखउ दीपक उजिआला ॥
सरब निरंतरि प्रीतमु बाला ॥४॥
करि किरपा मेरा चितु लाइआ ॥
सतिगुरि मो कउ एकु बुझाइआ ॥५॥
एकु निरंजनु गुरमुखि जाता ॥
दूजा मारि सबदि पछाता ॥६॥
एको हुकमु वरतै सभ लोई ॥
एकसु ते सभ ओपति होई ॥७॥
राह दोवै खसमु एको जाणु ॥
गुर कै सबदि हुकमु पछाणु ॥८॥
सगल रूप वरन मन माही ॥
कहु नानक एको सालाही ॥९॥५॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला १ ॥ परमात्मा से दूरी डालने वाली (परमात्मा की) माया (ही है जिस ने) जगत के जीवों के मनों में अपना ठिकाना बनाया हुआ है। (इस माया से पैदा हुए) काम-क्रोध-अहंकार (आदि विकार जीवों के आत्मिक जीवन का) नाश कर देते हैं। 1। सारे जीवों में एक वही परमात्मा बस रहा है~ जिस पर माया का प्रभाव नहीं पड़ सकता। कहीं भी उससे बिना कोई और नहीं। उस प्रभू से अलग (अलग अस्तित्व वाला) मैं कोई भी बता नहीं सकता। 1। रहाउ। परमात्मा से दूरी पैदा करने वाली (माया के कारण ही मनुष्य की) बुरी मति (मनुष्य को) बताती रहती है कि माया की हस्ती प्रभू से अलग है। (इस दुरमति के असर तहत) जीव पैदा होता है मरता है~ पैदा होता है मरता है। (इस तरह) आत्मिक मौत मर के परमात्मा से दूर हो जाता है। 2। पर मैं तो धरती आकाश में~ स्त्री पुरुष में~ सारी ही सृष्टि में (कहीं भी परमात्मा के बिना) किसी और हस्ती को नहीं देखता। 3। मैं सूर्य चंद्रमा (इन सृष्टि के) दीपकों का प्रकाश देखता हूँ~ सभी के अंदर मुझे एक-रस सदा यौवन प्रीतम प्रभू ही दिखाई दे रहा है। 4। सतिगुरू ने मेहर करके मेरा चिक्त प्रभू चरणों में जोड़ दिया~ और मुझे ये समझ दे दी कि हर जगह एक परमात्मा ही बस रहा है। 5। जो मनुष्य गुरू के सन्मुख होता है वह ये जान लेता है कि एक निरंजन ही हर जगह मौजूद है और गुरू शबद की बरकति से (अपने अंदर से) परमात्मा से अलगाव मिटा के परमात्मा (के अस्तित्व) को पहचान लेता है । 6। सारी सृष्टि में सिर्फ परमात्मा का ही हुकम चल रहा है~ एक परमात्मा से ही सारी उत्पक्ति हुई है। 7। (एक प्रभू से ही सारी उत्पक्ति होने पर भी माया के प्रभाव तले जगत में) दोनों रास्ते चल पड़ते हैं (-गुरमुखता व दुरमति)। (पर~ हे भाई ! सब में) एक परमात्मा को ही (रचा हुआ) जान। गुरू के शबद में जुड़ के (सारे जगत में परमात्मा का ही) हुकम चलता पहिचान। 8। जो सारे रूपों में सारे वर्णों में और सार (जीवों के) मनों में व्यापक है हे नानक ! कह, मैं उस एक परमात्मा की ही सिफत सालाह करता हूँ। 9। 5।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਅਧਿਆਤਮ ਕਰਮ ਕਰੇ ਤਾ ਸਾਚਾ ॥
ਮੁਕਤਿ ਭੇਦੁ ਕਿਆ ਜਾਣੈ ਕਾਚਾ ॥੧॥
ਐਸਾ ਜੋਗੀ ਜੁਗਤਿ ਬੀਚਾਰੈ ॥
ਪੰਚ ਮਾਰਿ ਸਾਚੁ ਉਰਿ ਧਾਰੈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜਿਸ ਕੈ ਅੰਤਰਿ ਸਾਚੁ ਵਸਾਵੈ ॥
ਜੋਗ ਜੁਗਤਿ ਕੀ ਕੀਮਤਿ ਪਾਵੈ ॥੨॥
ਰਵਿ ਸਸਿ ਏਕੋ ਗ੍ਰਿਹ ਉਦਿਆਨੈ ॥
ਕਰਣੀ ਕੀਰਤਿ ਕਰਮ ਸਮਾਨੈ ॥੩॥
ਏਕ ਸਬਦ ਇਕ ਭਿਖਿਆ ਮਾਗੈ ॥
ਗਿਆਨੁ ਧਿਆਨੁ ਜੁਗਤਿ ਸਚੁ ਜਾਗੈ ॥੪॥
ਭੈ ਰਚਿ ਰਹੈ ਨ ਬਾਹਰਿ ਜਾਇ ॥
ਕੀਮਤਿ ਕਉਣ ਰਹੈ ਲਿਵ ਲਾਇ ॥੫॥
ਆਪੇ ਮੇਲੇ ਭਰਮੁ ਚੁਕਾਏ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦਿ ਪਰਮ ਪਦੁ ਪਾਏ ॥੬॥
ਗੁਰ ਕੀ ਸੇਵਾ ਸਬਦੁ ਵੀਚਾਰੁ ॥
ਹਉਮੈ ਮਾਰੇ ਕਰਣੀ ਸਾਰੁ ॥੭॥
ਜਪ ਤਪ ਸੰਜਮ ਪਾਠ ਪੁਰਾਣੁ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਅਪਰੰਪਰ ਮਾਨੁ ॥੮॥੬॥
ਅਧਿਆਤਮ ਕਰਮ ਕਰੇ ਤਾ ਸਾਚਾ ॥
ਮੁਕਤਿ ਭੇਦੁ ਕਿਆ ਜਾਣੈ ਕਾਚਾ ॥੧॥
ਐਸਾ ਜੋਗੀ ਜੁਗਤਿ ਬੀਚਾਰੈ ॥
ਪੰਚ ਮਾਰਿ ਸਾਚੁ ਉਰਿ ਧਾਰੈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜਿਸ ਕੈ ਅੰਤਰਿ ਸਾਚੁ ਵਸਾਵੈ ॥
ਜੋਗ ਜੁਗਤਿ ਕੀ ਕੀਮਤਿ ਪਾਵੈ ॥੨॥
ਰਵਿ ਸਸਿ ਏਕੋ ਗ੍ਰਿਹ ਉਦਿਆਨੈ ॥
ਕਰਣੀ ਕੀਰਤਿ ਕਰਮ ਸਮਾਨੈ ॥੩॥
ਏਕ ਸਬਦ ਇਕ ਭਿਖਿਆ ਮਾਗੈ ॥
ਗਿਆਨੁ ਧਿਆਨੁ ਜੁਗਤਿ ਸਚੁ ਜਾਗੈ ॥੪॥
ਭੈ ਰਚਿ ਰਹੈ ਨ ਬਾਹਰਿ ਜਾਇ ॥
ਕੀਮਤਿ ਕਉਣ ਰਹੈ ਲਿਵ ਲਾਇ ॥੫॥
ਆਪੇ ਮੇਲੇ ਭਰਮੁ ਚੁਕਾਏ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦਿ ਪਰਮ ਪਦੁ ਪਾਏ ॥੬॥
ਗੁਰ ਕੀ ਸੇਵਾ ਸਬਦੁ ਵੀਚਾਰੁ ॥
ਹਉਮੈ ਮਾਰੇ ਕਰਣੀ ਸਾਰੁ ॥੭॥
ਜਪ ਤਪ ਸੰਜਮ ਪਾਠ ਪੁਰਾਣੁ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਅਪਰੰਪਰ ਮਾਨੁ ॥੮॥੬॥
गउड़ी महला १ ॥
अधिआतम करम करे ता साचा ॥
मुकति भेदु किआ जाणै काचा ॥१॥
ऐसा जोगी जुगति बीचारै ॥
पंच मारि साचु उरि धारै ॥१॥ रहाउ ॥
जिस कै अंतरि साचु वसावै ॥
जोग जुगति की कीमति पावै ॥२॥
रवि ससि एको ग्रिह उदिआनै ॥
करणी कीरति करम समानै ॥३॥
एक सबद इक भिखिआ मागै ॥
गिआनु धिआनु जुगति सचु जागै ॥४॥
भै रचि रहै न बाहरि जाइ ॥
कीमति कउण रहै लिव लाइ ॥५॥
आपे मेले भरमु चुकाए ॥
गुर परसादि परम पदु पाए ॥६॥
गुर की सेवा सबदु वीचारु ॥
हउमै मारे करणी सारु ॥७॥
जप तप संजम पाठ पुराणु ॥
कहु नानक अपरंपर मानु ॥८॥६॥
अधिआतम करम करे ता साचा ॥
मुकति भेदु किआ जाणै काचा ॥१॥
ऐसा जोगी जुगति बीचारै ॥
पंच मारि साचु उरि धारै ॥१॥ रहाउ ॥
जिस कै अंतरि साचु वसावै ॥
जोग जुगति की कीमति पावै ॥२॥
रवि ससि एको ग्रिह उदिआनै ॥
करणी कीरति करम समानै ॥३॥
एक सबद इक भिखिआ मागै ॥
गिआनु धिआनु जुगति सचु जागै ॥४॥
भै रचि रहै न बाहरि जाइ ॥
कीमति कउण रहै लिव लाइ ॥५॥
आपे मेले भरमु चुकाए ॥
गुर परसादि परम पदु पाए ॥६॥
गुर की सेवा सबदु वीचारु ॥
हउमै मारे करणी सारु ॥७॥
जप तप संजम पाठ पुराणु ॥
कहु नानक अपरंपर मानु ॥८॥६॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला १ ॥ जब मनुष्य आत्मिक जीवन ऊँचे करने वाले कर्म करता है~ तब ही सच्चा (जोगी) है पर जिसका मन विकारों के मुकाबले में कमजोर है~ वह विकारों से खलासी हासिल करने के भेद को क्या जान सकता है?1। ऐसा (आदमी) जोगी (कहलाने का हकदार हो सकता है जो जीवन की सही) जुगति समझता है (वह जीवन-जुगति ये है कि कामादिक) पाँचों (विकारों) को मार के सदा कायम रहने वाले परमात्मा (की याद) को अपने हृदय में टिकाता है। 1। रहाउ। जिस मनुष्य के अंदर परमात्मा अपना सदा स्थिर नाम बसाता है~ वह मनुष्य प्रभू मिलाप की जुगति की कद्र समझता है। 2। तपश~ ठण्ड (भाव~ किसी की ओर से बेरुखी भरा सलूक और किसी की तरफ से मधुर रवईया) घर~ जंगल (भाव~ घर में रहते हुए निर्मोही सलूक) उसे एक समान दिखते हैं। परमात्मा की सिफत सालाह रूपी करणी उसका समान (साधारन) कर्म हें (भाव~ सोए हुए ही वह अर्थात सहज ही वह सिफत सालाह में जुड़ा रहता है)। 3। (दर दर से रोटियां माँगने की जगह वह जोगी गुरू के दर से) परमातमा की सिफत सालाह की बाणी की खैर (भिक्षा) माँगता है। उसके अंदर प्रभू के साथ गहरी सांझ पड़ती है~ उसकी ऊँची सुरति जाग पड़ती है~ उसके अंदर सिमरन रूपी जुगति जाग जाती है। 4। वह जोगी सदा प्रभू के डर-अदब में लीन रहता है~ (इस डर से) बाहर नहीं जाता। ऐसे जोगी का कौन मुल्य डाल सकता है? वह सदा प्रभू चरणों में सुरति जोड़े रखता है। 5। (ये जो साधना के हठ कुछ नहीं सवार सकते) प्रभू स्वयं ही अपने साथ मिलाता है और जीव की भटकना को खत्म करता है। गुरू की कृपा से मनुष्य सबसे ऊूंचा आत्मिक दर्जा हासिल करता है। 6। (असल जोगी) गुरू की बताई हुई सेवा करता है~ गुरू के शबद को अपनी विचार बनाता है। अहंकार को (अपने अंदर से) मारता है – यही है उस जोगी की श्रेष्ठ करणी। 7। जोगी के जप~ तप~ संजम और पुराण आदिक कोई धर्म-पुस्तक का पाठ हे नानक ! कह, बेअंत प्रभू की सिफत सालाह में अपने आप को जोड़ लेना – ही हैं । 8। 6।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਖਿਮਾ ਗਹੀ ਬ੍ਰਤੁ ਸੀਲ ਸੰਤੋਖੰ ॥
ਰੋਗੁ ਨ ਬਿਆਪੈ ਨਾ ਜਮ ਦੋਖੰ ॥
ਮੁਕਤ ਭਏ ਪ੍ਰਭ ਰੂਪ ਨ ਰੇਖੰ ॥੧॥
ਜੋਗੀ ਕਉ ਕੈਸਾ ਡਰੁ ਹੋਇ ॥
ਰੂਖਿ ਬਿਰਖਿ ਗ੍ਰਿਹਿ ਬਾਹਰਿ ਸੋਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਨਿਰਭਉ ਜੋਗੀ ਨਿਰੰਜਨੁ ਧਿਆਵੈ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਜਾਗੈ ਸਚਿ ਲਿਵ ਲਾਵੈ ॥
ਸੋ ਜੋਗੀ ਮੇਰੈ ਮਨਿ ਭਾਵੈ ॥੨॥
ਕਾਲੁ ਜਾਲੁ ਬ੍ਰਹਮ ਅਗਨੀ ਜਾਰੇ ॥
ਜਰਾ ਮਰਣ ਗਤੁ ਗਰਬੁ ਨਿਵਾਰੇ ॥
ਆਪਿ ਤਰੈ ਪਿਤਰੀ ਨਿਸਤਾਰੇ ॥੩॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵੇ ਸੋ ਜੋਗੀ ਹੋਇ ॥
ਭੈ ਰਚਿ ਰਹੈ ਸੁ ਨਿਰਭਉ ਹੋਇ ॥
ਜੈਸਾ ਸੇਵੈ ਤੈਸੋ ਹੋਇ ॥੪॥
ਖਿਮਾ ਗਹੀ ਬ੍ਰਤੁ ਸੀਲ ਸੰਤੋਖੰ ॥
ਰੋਗੁ ਨ ਬਿਆਪੈ ਨਾ ਜਮ ਦੋਖੰ ॥
ਮੁਕਤ ਭਏ ਪ੍ਰਭ ਰੂਪ ਨ ਰੇਖੰ ॥੧॥
ਜੋਗੀ ਕਉ ਕੈਸਾ ਡਰੁ ਹੋਇ ॥
ਰੂਖਿ ਬਿਰਖਿ ਗ੍ਰਿਹਿ ਬਾਹਰਿ ਸੋਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਨਿਰਭਉ ਜੋਗੀ ਨਿਰੰਜਨੁ ਧਿਆਵੈ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਜਾਗੈ ਸਚਿ ਲਿਵ ਲਾਵੈ ॥
ਸੋ ਜੋਗੀ ਮੇਰੈ ਮਨਿ ਭਾਵੈ ॥੨॥
ਕਾਲੁ ਜਾਲੁ ਬ੍ਰਹਮ ਅਗਨੀ ਜਾਰੇ ॥
ਜਰਾ ਮਰਣ ਗਤੁ ਗਰਬੁ ਨਿਵਾਰੇ ॥
ਆਪਿ ਤਰੈ ਪਿਤਰੀ ਨਿਸਤਾਰੇ ॥੩॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵੇ ਸੋ ਜੋਗੀ ਹੋਇ ॥
ਭੈ ਰਚਿ ਰਹੈ ਸੁ ਨਿਰਭਉ ਹੋਇ ॥
ਜੈਸਾ ਸੇਵੈ ਤੈਸੋ ਹੋਇ ॥੪॥
गउड़ी महला १ ॥
खिमा गही ब्रतु सील संतोखं ॥
रोगु न बिआपै ना जम दोखं ॥
मुकत भए प्रभ रूप न रेखं ॥१॥
जोगी कउ कैसा डरु होइ ॥
रूखि बिरखि ग्रिहि बाहरि सोइ ॥१॥ रहाउ ॥
निरभउ जोगी निरंजनु धिआवै ॥
अनदिनु जागै सचि लिव लावै ॥
सो जोगी मेरै मनि भावै ॥२॥
कालु जालु ब्रहम अगनी जारे ॥
जरा मरण गतु गरबु निवारे ॥
आपि तरै पितरी निसतारे ॥३॥
सतिगुरु सेवे सो जोगी होइ ॥
भै रचि रहै सु निरभउ होइ ॥
जैसा सेवै तैसो होइ ॥४॥
खिमा गही ब्रतु सील संतोखं ॥
रोगु न बिआपै ना जम दोखं ॥
मुकत भए प्रभ रूप न रेखं ॥१॥
जोगी कउ कैसा डरु होइ ॥
रूखि बिरखि ग्रिहि बाहरि सोइ ॥१॥ रहाउ ॥
निरभउ जोगी निरंजनु धिआवै ॥
अनदिनु जागै सचि लिव लावै ॥
सो जोगी मेरै मनि भावै ॥२॥
कालु जालु ब्रहम अगनी जारे ॥
जरा मरण गतु गरबु निवारे ॥
आपि तरै पितरी निसतारे ॥३॥
सतिगुरु सेवे सो जोगी होइ ॥
भै रचि रहै सु निरभउ होइ ॥
जैसा सेवै तैसो होइ ॥४॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला १ ॥ वह जोगी (गृहस्थ में रह के ही) दूसरों की ज्यादती बर्दाश्त करने का स्वाभाव बनाता है। मीठा स्वभाव एवं संतोष उसके नित्य के कर्म हैं। (ऐसे असल जोगी पर कामादिक कोई) रोग जोर नहीं डाल सकता। उसे मौत का भी डर नहीं होता। ऐसे जोगी विकारों से आजाद हो जाते हैं~ क्योंकि वह रूप-रेख रहित परमात्मा का रूप हो जाते हैं। 1। उस जोगी को (माया के शूरवीरों कामादिकों के हमलों से) किसी तरह का कोई डर नहीं रहता (जिससे घबरा के वह गृहस्थ त्याग के भाग जाए)। जिस मनुष्य को पेड़ पौधों में~ घर में~ बाहर जंगल (आदि) में हर जगह वह परमात्मा ही नजर आता है (वही है असल जोगी~)1। रहाउ। जो परमात्मा माया के प्रभाव में नहीं आता~ उसे जो मनुष्य सिमरता है वह है (असल) जोगी। वह तो हर समय (माया के हमलों से) सुचेत रहता है~ क्योंकि वह सदा स्थिर प्रभू में सुरति जोड़े रखता है। वह भी (माया के हमलों से) नहीं डरता (उसे क्या जरूरत पड़ी है गृहस्थ से भागने की?)। मेरे मन में वह जोगी प्यारा लगता है (वही है असल जोगी)। 2। (वही जोगी अपने अंदर प्रकट हुए) ब्रहम् (के तेज) की अग्नि से मौत (मौत के डर को) जाल को (जिसके सहम ने सारे जीवों को फंसाया हुया है) जला देता है। उस जोगी को बुढ़ापे का डर मौत का सहम दूर दूर हो जाता है। वह जोगी (अपने अंदर से) अहंकार दूर कर लेता है। वह स्वयं भी (संसार समुंद्र से) पार लांघ जाता है~ अपने पित्रों को भी पार लंघा लेता है। 3। जो मनुष्य गुरू के बताए हुए राह पर चलता है~ वह (असल) जोगी बनता है~ वह परमात्मा के डर अदब में (जीवन-राह पर) चलता है~ वह (कामादिक विकारों के हमलों से) निडर रहता है (क्योंकि ये एक असूल की बात है कि) मनुष्य जैसे की सेवा (-भक्ति) करता है वैसा ही स्वयं बन जाता है (निरभउ निरंकार को सिमर के निर्भय ही बनना हुआ)। 4।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 223 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।
गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।
Vasant Vihar के market में Sunday सुबह की धीमी-धीमी activity।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 58 पंक्तियों का है, 4 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 223” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 224 →, पीछे का: ← अंग 222।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।