अंग
295
राग Gauree
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਜਿਸੁ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਸਭੁ ਜਗਤੁ ਤਰਾਇਆ ॥
ਜਨ ਆਵਨ ਕਾ ਇਹੈ ਸੁਆਉ ॥
ਜਨ ਕੈ ਸੰਗਿ ਚਿਤਿ ਆਵੈ ਨਾਉ ॥
ਆਪਿ ਮੁਕਤੁ ਮੁਕਤੁ ਕਰੈ ਸੰਸਾਰੁ ॥
ਨਾਨਕ ਤਿਸੁ ਜਨ ਕਉ ਸਦਾ ਨਮਸਕਾਰੁ ॥੮॥੨੩॥
ਜਨ ਆਵਨ ਕਾ ਇਹੈ ਸੁਆਉ ॥
ਜਨ ਕੈ ਸੰਗਿ ਚਿਤਿ ਆਵੈ ਨਾਉ ॥
ਆਪਿ ਮੁਕਤੁ ਮੁਕਤੁ ਕਰੈ ਸੰਸਾਰੁ ॥
ਨਾਨਕ ਤਿਸੁ ਜਨ ਕਉ ਸਦਾ ਨਮਸਕਾਰੁ ॥੮॥੨੩॥
जिसु प्रसादि सभु जगतु तराइआ ॥
जन आवन का इहै सुआउ ॥
जन कै संगि चिति आवै नाउ ॥
आपि मुकतु मुकतु करै संसारु ॥
नानक तिसु जन कउ सदा नमसकारु ॥८॥२३॥
जन आवन का इहै सुआउ ॥
जन कै संगि चिति आवै नाउ ॥
आपि मुकतु मुकतु करै संसारु ॥
नानक तिसु जन कउ सदा नमसकारु ॥८॥२३॥
हिन्दी अर्थ: जिस मनुष्य की मेहर से सारा जगत का ही उद्धार होता है। ऐसे मनुष्य के आने का यही मनोरथ है कि उसकी संगति में (रह के और मनुष्यों को प्रभू का) नाम चेते आता है। वह मनुष्य खुद (माया से) आजाद है जगत को भी आजाद करता है; हे नानक ! ऐसे (उक्तम) मनुष्य को हमारा सदा प्रणाम है। 8। 23।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਪੂਰਾ ਪ੍ਰਭੁ ਆਰਾਧਿਆ ਪੂਰਾ ਜਾ ਕਾ ਨਾਉ ॥
ਨਾਨਕ ਪੂਰਾ ਪਾਇਆ ਪੂਰੇ ਕੇ ਗੁਨ ਗਾਉ ॥੧॥
ਪੂਰਾ ਪ੍ਰਭੁ ਆਰਾਧਿਆ ਪੂਰਾ ਜਾ ਕਾ ਨਾਉ ॥
ਨਾਨਕ ਪੂਰਾ ਪਾਇਆ ਪੂਰੇ ਕੇ ਗੁਨ ਗਾਉ ॥੧॥
सलोकु ॥
पूरा प्रभु आराधिआ पूरा जा का नाउ ॥
नानक पूरा पाइआ पूरे के गुन गाउ ॥१॥
पूरा प्रभु आराधिआ पूरा जा का नाउ ॥
नानक पूरा पाइआ पूरे के गुन गाउ ॥१॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक ॥ (जिस मनुष्य ने) अटॅल नाम वाले पूरन प्रभू को सिमरा है। उसे वह पूरन प्रभू मिल गया है। (इस वास्ते) हे नानक ! तू भी पूरन प्रभू के गुण गा। 1।
ਅਸਟਪਦੀ ॥
ਪੂਰੇ ਗੁਰ ਕਾ ਸੁਨਿ ਉਪਦੇਸੁ ॥
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਨਿਕਟਿ ਕਰਿ ਪੇਖੁ ॥
ਸਾਸਿ ਸਾਸਿ ਸਿਮਰਹੁ ਗੋਬਿੰਦ ॥
ਮਨ ਅੰਤਰ ਕੀ ਉਤਰੈ ਚਿੰਦ ॥
ਆਸ ਅਨਿਤ ਤਿਆਗਹੁ ਤਰੰਗ ॥
ਸੰਤ ਜਨਾ ਕੀ ਧੂਰਿ ਮਨ ਮੰਗ ॥
ਆਪੁ ਛੋਡਿ ਬੇਨਤੀ ਕਰਹੁ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਅਗਨਿ ਸਾਗਰੁ ਤਰਹੁ ॥
ਹਰਿ ਧਨ ਕੇ ਭਰਿ ਲੇਹੁ ਭੰਡਾਰ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰ ਪੂਰੇ ਨਮਸਕਾਰ ॥੧॥
ਪੂਰੇ ਗੁਰ ਕਾ ਸੁਨਿ ਉਪਦੇਸੁ ॥
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਨਿਕਟਿ ਕਰਿ ਪੇਖੁ ॥
ਸਾਸਿ ਸਾਸਿ ਸਿਮਰਹੁ ਗੋਬਿੰਦ ॥
ਮਨ ਅੰਤਰ ਕੀ ਉਤਰੈ ਚਿੰਦ ॥
ਆਸ ਅਨਿਤ ਤਿਆਗਹੁ ਤਰੰਗ ॥
ਸੰਤ ਜਨਾ ਕੀ ਧੂਰਿ ਮਨ ਮੰਗ ॥
ਆਪੁ ਛੋਡਿ ਬੇਨਤੀ ਕਰਹੁ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਅਗਨਿ ਸਾਗਰੁ ਤਰਹੁ ॥
ਹਰਿ ਧਨ ਕੇ ਭਰਿ ਲੇਹੁ ਭੰਡਾਰ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰ ਪੂਰੇ ਨਮਸਕਾਰ ॥੧॥
असटपदी ॥
पूरे गुर का सुनि उपदेसु ॥
पारब्रहमु निकटि करि पेखु ॥
सासि सासि सिमरहु गोबिंद ॥
मन अंतर की उतरै चिंद ॥
आस अनित तिआगहु तरंग ॥
संत जना की धूरि मन मंग ॥
आपु छोडि बेनती करहु ॥
साधसंगि अगनि सागरु तरहु ॥
हरि धन के भरि लेहु भंडार ॥
नानक गुर पूरे नमसकार ॥१॥
पूरे गुर का सुनि उपदेसु ॥
पारब्रहमु निकटि करि पेखु ॥
सासि सासि सिमरहु गोबिंद ॥
मन अंतर की उतरै चिंद ॥
आस अनित तिआगहु तरंग ॥
संत जना की धूरि मन मंग ॥
आपु छोडि बेनती करहु ॥
साधसंगि अगनि सागरु तरहु ॥
हरि धन के भरि लेहु भंडार ॥
नानक गुर पूरे नमसकार ॥१॥
हिन्दी अर्थ: अष्टपदी ॥ (हे मन !) पूरे सतिगुरू की शिक्षा सुन। और अकाल-पुरख को (हर जगह) नजदीक जान के देख। (हे भाई !) हर दम प्रभू को याद कर। (ताकि) तेरे मन के अंदर की चिंता मिट जाए। हे मन ! नित्य ना रहने वाली (चीजों की) आशाओं की लहरें त्याग दे। और संत जनों के पैरों की ख़ाक मांग। (हे भाई !) स्वैभाव छोड़ के (प्रभू के आगे) अरदास कर। (और इस तरह) साधसंगति में (रह के) (विकारों की) आग के समुंद्र से पार लांघ। हे नानक ! प्रभू-नाम-रूपी धन के खजाने भर ले और पूरे सतिगुरू को नमस्कार कर। 1।
ਖੇਮ ਕੁਸਲ ਸਹਜ ਆਨੰਦ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਭਜੁ ਪਰਮਾਨੰਦ ॥
ਨਰਕ ਨਿਵਾਰਿ ਉਧਾਰਹੁ ਜੀਉ ॥
ਗੁਨ ਗੋਬਿੰਦ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਰਸੁ ਪੀਉ ॥
ਚਿਤਿ ਚਿਤਵਹੁ ਨਾਰਾਇਣ ਏਕ ॥
ਏਕ ਰੂਪ ਜਾ ਕੇ ਰੰਗ ਅਨੇਕ ॥
ਗੋਪਾਲ ਦਾਮੋਦਰ ਦੀਨ ਦਇਆਲ ॥
ਦੁਖ ਭੰਜਨ ਪੂਰਨ ਕਿਰਪਾਲ ॥
ਸਿਮਰਿ ਸਿਮਰਿ ਨਾਮੁ ਬਾਰੰ ਬਾਰ ॥
ਨਾਨਕ ਜੀਅ ਕਾ ਇਹੈ ਅਧਾਰ ॥੨॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਭਜੁ ਪਰਮਾਨੰਦ ॥
ਨਰਕ ਨਿਵਾਰਿ ਉਧਾਰਹੁ ਜੀਉ ॥
ਗੁਨ ਗੋਬਿੰਦ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਰਸੁ ਪੀਉ ॥
ਚਿਤਿ ਚਿਤਵਹੁ ਨਾਰਾਇਣ ਏਕ ॥
ਏਕ ਰੂਪ ਜਾ ਕੇ ਰੰਗ ਅਨੇਕ ॥
ਗੋਪਾਲ ਦਾਮੋਦਰ ਦੀਨ ਦਇਆਲ ॥
ਦੁਖ ਭੰਜਨ ਪੂਰਨ ਕਿਰਪਾਲ ॥
ਸਿਮਰਿ ਸਿਮਰਿ ਨਾਮੁ ਬਾਰੰ ਬਾਰ ॥
ਨਾਨਕ ਜੀਅ ਕਾ ਇਹੈ ਅਧਾਰ ॥੨॥
खेम कुसल सहज आनंद ॥
साधसंगि भजु परमानंद ॥
नरक निवारि उधारहु जीउ ॥
गुन गोबिंद अंम्रित रसु पीउ ॥
चिति चितवहु नाराइण एक ॥
एक रूप जा के रंग अनेक ॥
गोपाल दामोदर दीन दइआल ॥
दुख भंजन पूरन किरपाल ॥
सिमरि सिमरि नामु बारं बार ॥
नानक जीअ का इहै अधार ॥२॥
साधसंगि भजु परमानंद ॥
नरक निवारि उधारहु जीउ ॥
गुन गोबिंद अंम्रित रसु पीउ ॥
चिति चितवहु नाराइण एक ॥
एक रूप जा के रंग अनेक ॥
गोपाल दामोदर दीन दइआल ॥
दुख भंजन पूरन किरपाल ॥
सिमरि सिमरि नामु बारं बार ॥
नानक जीअ का इहै अधार ॥२॥
हिन्दी अर्थ: अटॅल सुख, आसान जीवन और आत्मिक अडोलता के आनंद प्राप्त होंगे (हे भाई !) साध-संगति में परम-सुख प्रभू को सिमर। नर्कों को दूर करके जीवात्मा को बचा ले- गोबिंद के गुण गा (नाम-) अमृत का रस पी। उस एक प्रभू का ध्यान चिक्त में धर। जिस एक अकाल-पुरख के अनेकों रंग हैं। दीनों पर दया करने वाला गोपाल दामोदर दुखों का नाश करने वाला सब में व्यापक और मेहर का जो घर है। हे नानक ! उस का नाम बारंबार याद कर। जिंद का आसरा ये नाम ही है। 2।
ਉਤਮ ਸਲੋਕ ਸਾਧ ਕੇ ਬਚਨ ॥
ਅਮੁਲੀਕ ਲਾਲ ਏਹਿ ਰਤਨ ॥
ਸੁਨਤ ਕਮਾਵਤ ਹੋਤ ਉਧਾਰ ॥
ਆਪਿ ਤਰੈ ਲੋਕਹ ਨਿਸਤਾਰ ॥
ਸਫਲ ਜੀਵਨੁ ਸਫਲੁ ਤਾ ਕਾ ਸੰਗੁ ॥
ਜਾ ਕੈ ਮਨਿ ਲਾਗਾ ਹਰਿ ਰੰਗੁ ॥
ਜੈ ਜੈ ਸਬਦੁ ਅਨਾਹਦੁ ਵਾਜੈ ॥
ਸੁਨਿ ਸੁਨਿ ਅਨਦ ਕਰੇ ਪ੍ਰਭੁ ਗਾਜੈ ॥
ਪ੍ਰਗਟੇ ਗੁਪਾਲ ਮਹਾਂਤ ਕੈ ਮਾਥੇ ॥
ਨਾਨਕ ਉਧਰੇ ਤਿਨ ਕੈ ਸਾਥੇ ॥੩॥
ਅਮੁਲੀਕ ਲਾਲ ਏਹਿ ਰਤਨ ॥
ਸੁਨਤ ਕਮਾਵਤ ਹੋਤ ਉਧਾਰ ॥
ਆਪਿ ਤਰੈ ਲੋਕਹ ਨਿਸਤਾਰ ॥
ਸਫਲ ਜੀਵਨੁ ਸਫਲੁ ਤਾ ਕਾ ਸੰਗੁ ॥
ਜਾ ਕੈ ਮਨਿ ਲਾਗਾ ਹਰਿ ਰੰਗੁ ॥
ਜੈ ਜੈ ਸਬਦੁ ਅਨਾਹਦੁ ਵਾਜੈ ॥
ਸੁਨਿ ਸੁਨਿ ਅਨਦ ਕਰੇ ਪ੍ਰਭੁ ਗਾਜੈ ॥
ਪ੍ਰਗਟੇ ਗੁਪਾਲ ਮਹਾਂਤ ਕੈ ਮਾਥੇ ॥
ਨਾਨਕ ਉਧਰੇ ਤਿਨ ਕੈ ਸਾਥੇ ॥੩॥
उतम सलोक साध के बचन ॥
अमुलीक लाल एहि रतन ॥
सुनत कमावत होत उधार ॥
आपि तरै लोकह निसतार ॥
सफल जीवनु सफलु ता का संगु ॥
जा कै मनि लागा हरि रंगु ॥
जै जै सबदु अनाहदु वाजै ॥
सुनि सुनि अनद करे प्रभु गाजै ॥
प्रगटे गुपाल महांत कै माथे ॥
नानक उधरे तिन कै साथे ॥३॥
अमुलीक लाल एहि रतन ॥
सुनत कमावत होत उधार ॥
आपि तरै लोकह निसतार ॥
सफल जीवनु सफलु ता का संगु ॥
जा कै मनि लागा हरि रंगु ॥
जै जै सबदु अनाहदु वाजै ॥
सुनि सुनि अनद करे प्रभु गाजै ॥
प्रगटे गुपाल महांत कै माथे ॥
नानक उधरे तिन कै साथे ॥३॥
हिन्दी अर्थ: साधु (गुरू) के बचन सबसे अच्छी सिफत सालाह की बाणी है। ये अमूल्य लाल हैं, अमोलक रत्न हैं। (इन वचनों को) सुनने से और कमाने से बेड़ा पार होता है। (जो कमाता है) वह स्वयं तैरता है और लोगों का भी निस्तारा करता है। उसकी जिंदगी पूरी मुरादों वाली होती है उसकी संगति औरों की भी मुरादें पूरी करती है। जिस मनुष्य के मन में प्रभू के लिए प्यार बन जाता है। (उसके अंदर) जै-जैकार की गूँज हमेशा चलती रहती है जिसे सुन के (भाव महिसूस करके) वह खुश होता है (क्योंकि) प्रभू (उसके अंदर) अपना नूर रौशन करता है। गोपाल प्रभू की ऊँची करणी वाले बंदे के माथे पर प्रगट होते हैं। हे नानक ! ऐसे मनुष्य के साथ और कई मनुष्यों का बेड़ा पार होता है। 3।
ਸਰਨਿ ਜੋਗੁ ਸੁਨਿ ਸਰਨੀ ਆਏ ॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਪ੍ਰਭ ਆਪ ਮਿਲਾਏ ॥
ਮਿਟਿ ਗਏ ਬੈਰ ਭਏ ਸਭ ਰੇਨ ॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਨਾਮੁ ਸਾਧਸੰਗਿ ਲੈਨ ॥
ਸੁਪ੍ਰਸੰਨ ਭਏ ਗੁਰਦੇਵ ॥
ਪੂਰਨ ਹੋਈ ਸੇਵਕ ਕੀ ਸੇਵ ॥
ਆਲ ਜੰਜਾਲ ਬਿਕਾਰ ਤੇ ਰਹਤੇ ॥
ਰਾਮ ਨਾਮ ਸੁਨਿ ਰਸਨਾ ਕਹਤੇ ॥
ਕਰਿ ਪ੍ਰਸਾਦੁ ਦਇਆ ਪ੍ਰਭਿ ਧਾਰੀ ॥
ਨਾਨਕ ਨਿਬਹੀ ਖੇਪ ਹਮਾਰੀ ॥੪॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਪ੍ਰਭ ਆਪ ਮਿਲਾਏ ॥
ਮਿਟਿ ਗਏ ਬੈਰ ਭਏ ਸਭ ਰੇਨ ॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਨਾਮੁ ਸਾਧਸੰਗਿ ਲੈਨ ॥
ਸੁਪ੍ਰਸੰਨ ਭਏ ਗੁਰਦੇਵ ॥
ਪੂਰਨ ਹੋਈ ਸੇਵਕ ਕੀ ਸੇਵ ॥
ਆਲ ਜੰਜਾਲ ਬਿਕਾਰ ਤੇ ਰਹਤੇ ॥
ਰਾਮ ਨਾਮ ਸੁਨਿ ਰਸਨਾ ਕਹਤੇ ॥
ਕਰਿ ਪ੍ਰਸਾਦੁ ਦਇਆ ਪ੍ਰਭਿ ਧਾਰੀ ॥
ਨਾਨਕ ਨਿਬਹੀ ਖੇਪ ਹਮਾਰੀ ॥੪॥
सरनि जोगु सुनि सरनी आए ॥
करि किरपा प्रभ आप मिलाए ॥
मिटि गए बैर भए सभ रेन ॥
अंम्रित नामु साधसंगि लैन ॥
सुप्रसंन भए गुरदेव ॥
पूरन होई सेवक की सेव ॥
आल जंजाल बिकार ते रहते ॥
राम नाम सुनि रसना कहते ॥
करि प्रसादु दइआ प्रभि धारी ॥
नानक निबही खेप हमारी ॥४॥
करि किरपा प्रभ आप मिलाए ॥
मिटि गए बैर भए सभ रेन ॥
अंम्रित नामु साधसंगि लैन ॥
सुप्रसंन भए गुरदेव ॥
पूरन होई सेवक की सेव ॥
आल जंजाल बिकार ते रहते ॥
राम नाम सुनि रसना कहते ॥
करि प्रसादु दइआ प्रभि धारी ॥
नानक निबही खेप हमारी ॥४॥
हिन्दी अर्थ: हे प्रभू ! ये सुन के तू दर आए की बाँह थामने में स्मर्थ है। हम तेरे दर पर आए थे। तूने मेहर करके (हमें) अपने साथ मिला लिया है। (अब हमारे) वैर मिट गए हैं हम सब के पैरों की ख़ाक हो गए हैं (अब) साध-संगति में अमर करने वाला नाम जप रहे हैं। गुरदेव जी (हमारे पर) प्रसन्न हो गए हैं। इस वास्ते (हमारी) सेवकों की सेवा सफल हो गई है। (हम अब) घर के धंधों और विकारों से बच गए हैं। प्रभू का नाम सुन के जीभ से (भी) उचारते हैं। हे नानक ! प्रभू ने मेहर करके (हम पर) दया की है। और हमारा किया हुआ व्यापार दरगाह में कबूल हो गया है। 4।
ਪ੍ਰਭ ਕੀ ਉਸਤਤਿ ਕਰਹੁ ਸੰਤ ਮੀਤ ॥
ਸਾਵਧਾਨ ਏਕਾਗਰ ਚੀਤ ॥
ਸੁਖਮਨੀ ਸਹਜ ਗੋਬਿੰਦ ਗੁਨ ਨਾਮ ॥
ਜਿਸੁ ਮਨਿ ਬਸੈ ਸੁ ਹੋਤ ਨਿਧਾਨ ॥
ਸਰਬ ਇਛਾ ਤਾ ਕੀ ਪੂਰਨ ਹੋਇ ॥
ਪ੍ਰਧਾਨ ਪੁਰਖੁ ਪ੍ਰਗਟੁ ਸਭ ਲੋਇ ॥
ਸਭ ਤੇ ਊਚ ਪਾਏ ਅਸਥਾਨੁ ॥
ਬਹੁਰਿ ਨ ਹੋਵੈ ਆਵਨ ਜਾਨੁ ॥
ਹਰਿ ਧਨੁ ਖਾਟਿ ਚਲੈ ਜਨੁ ਸੋਇ ॥
ਨਾਨਕ ਜਿਸਹਿ ਪਰਾਪਤਿ ਹੋਇ ॥੫॥
ਸਾਵਧਾਨ ਏਕਾਗਰ ਚੀਤ ॥
ਸੁਖਮਨੀ ਸਹਜ ਗੋਬਿੰਦ ਗੁਨ ਨਾਮ ॥
ਜਿਸੁ ਮਨਿ ਬਸੈ ਸੁ ਹੋਤ ਨਿਧਾਨ ॥
ਸਰਬ ਇਛਾ ਤਾ ਕੀ ਪੂਰਨ ਹੋਇ ॥
ਪ੍ਰਧਾਨ ਪੁਰਖੁ ਪ੍ਰਗਟੁ ਸਭ ਲੋਇ ॥
ਸਭ ਤੇ ਊਚ ਪਾਏ ਅਸਥਾਨੁ ॥
ਬਹੁਰਿ ਨ ਹੋਵੈ ਆਵਨ ਜਾਨੁ ॥
ਹਰਿ ਧਨੁ ਖਾਟਿ ਚਲੈ ਜਨੁ ਸੋਇ ॥
ਨਾਨਕ ਜਿਸਹਿ ਪਰਾਪਤਿ ਹੋਇ ॥੫॥
प्रभ की उसतति करहु संत मीत ॥
सावधान एकागर चीत ॥
सुखमनी सहज गोबिंद गुन नाम ॥
जिसु मनि बसै सु होत निधान ॥
सरब इछा ता की पूरन होइ ॥
प्रधान पुरखु प्रगटु सभ लोइ ॥
सभ ते ऊच पाए असथानु ॥
बहुरि न होवै आवन जानु ॥
हरि धनु खाटि चलै जनु सोइ ॥
नानक जिसहि परापति होइ ॥५॥
सावधान एकागर चीत ॥
सुखमनी सहज गोबिंद गुन नाम ॥
जिसु मनि बसै सु होत निधान ॥
सरब इछा ता की पूरन होइ ॥
प्रधान पुरखु प्रगटु सभ लोइ ॥
सभ ते ऊच पाए असथानु ॥
बहुरि न होवै आवन जानु ॥
हरि धनु खाटि चलै जनु सोइ ॥
नानक जिसहि परापति होइ ॥५॥
हिन्दी अर्थ: हे संत मित्र ! अकाल-पुरख की सिफत सालाह – ध्यान से चिक्त के एक निशाने पर टिका के करो। प्रभू की सिफत सालाह और प्रभू का नाम अडोल अवस्था (का कारण है और) सुखों की मणि (रतन) है। जिसके मन में (नाम) बसता है वह (गुणों का) खजाना हो जाता है। उस मनुष्य की सारी इच्छाएं पूरी हो जाती हैं। वह आदमी सबसे बड़ा बन जाता है और सारे जगत में प्रसिद्ध हो जाता है। उसको ऊँचे से ऊँचा ठिकाना मिल जाता है। दुबारा उसे जनम मरन (का चक्कर नहीं) व्यापता। वह मनुष्य प्रभू का नाम-रूपी धन कमा के (जगत से) जाता है। हे नानक ! जिस मनुष्य को (धुर से ही) ये दाति मिलती है। 5।
ਖੇਮ ਸਾਂਤਿ ਰਿਧਿ ਨਵ ਨਿਧਿ ॥
ਬੁਧਿ ਗਿਆਨੁ ਸਰਬ ਤਹ ਸਿਧਿ ॥
ਬਿਦਿਆ ਤਪੁ ਜੋਗੁ ਪ੍ਰਭ ਧਿਆਨੁ ॥
ਬੁਧਿ ਗਿਆਨੁ ਸਰਬ ਤਹ ਸਿਧਿ ॥
ਬਿਦਿਆ ਤਪੁ ਜੋਗੁ ਪ੍ਰਭ ਧਿਆਨੁ ॥
खेम सांति रिधि नव निधि ॥
बुधि गिआनु सरब तह सिधि ॥
बिदिआ तपु जोगु प्रभ धिआनु ॥
बुधि गिआनु सरब तह सिधि ॥
बिदिआ तपु जोगु प्रभ धिआनु ॥
हिन्दी अर्थ: अटॅल सुख मन का टिकाव। रिद्धियां और नौ खजाने। अक्ल, ज्ञान और सारी ही करामातें उस मनुष्य में (आ जाती हैं)। विद्या, तप, जोग, अकाल-पुरख का ध्यान।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 295 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
Sunday सुबह 7 बजे parents से 30-मिनट की video-call, बीच में silence।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 62 पंक्तियों का है, 8 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 295” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 296 →, पीछे का: ← अंग 294।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।