समय में यह कोश
पहले लंबा इतिहास बिछाइए, फिर इसी रेखा पर इस पुस्तकालय को रखिए
ज़रा बैठिए, साहब। ऊपर से देखें तो यह एक लंबा किनारा है, और उस पर जगह-जगह निशान लगे हैं। हर निशान एक पाठ है, किसी सदी में रचा या सँभाला गया। पहले हम पूरा किनारा बिछाते हैं, फिर उसी पर अपनी अलमारी के पाठ टाँकते हैं।
एक बात पहले, साफ़-साफ़। भारतीय तिथियाँ अधिकतर सापेक्ष हैं, भाषा और भीतरी सबूतों से जोड़ी गई हैं, और पक्की तारीख़ें विवादित रहती हैं, क्योंकि ये पाठ लिखे जाने से पहले सदियों मुँह-ज़बानी सँभाले गए। तो आगे जो भी साल आएँगे, उन्हें लगभग पढ़िए।
रचना का मोटा क्रम
ऋग्वेद की संहिता लगभग 1500-1200 ई.पू.। बाक़ी संहिताएँ लगभग 1200-1000 ई.पू.। ब्राह्मण लगभग 1000-700 ई.पू.। आरण्यक और पुराने उपनिषद लगभग 800-500 ई.पू., बुद्ध से पहले के। बुद्ध और महावीर पाँचवीं सदी ई.पू.। वेदांग और सूत्र-साहित्य लगभग 600-200 ई.पू.। महाकाव्य लगभग 400 ई.पू. से 400 ई. तक, और गीता लगभग 200 ई.पू. से 200 ई. के बीच आकार लेती है। मनु जैसा धर्मशास्त्र लगभग दूसरी-तीसरी सदी ई.। दर्शन-सूत्र लगभग 200 ई.पू.-400 ई.। पुराण मोटे तौर पर 300-1000 ई.। आगम और तंत्र लगभग 500-1200 ई.। वेदांत के भाष्यकार, शंकर लगभग 700 ई., रामानुज लगभग 1100, मध्व तेरहवीं सदी में। देशज भक्ति छठी से सत्रहवीं सदी तक। और गुरु ग्रंथ साहिब 1604 में।
कब का चार मतलब
अब एक बारीक़ी, जो आगे राम वाले पन्ने की भूमिका भी है। कब के चार अलग मतलब होते हैं। रचना की तारीख़, यानी पाठ जब अपने रूप में आया। उसके पीछे की पुरानी मौखिक धारा। कथा के भीतर का वह समय जो कहानी ख़ुद गिनती है। और परंपरा का खगोलीय युग-समय। ये चारों अलग-अलग सवालों के जवाब हैं, और एक-दूसरे में बदले नहीं जाते। इसी युग-समय पर एक पूरा पन्ना आगे है।
अपनी अलमारी इसी रेखा पर
अब इस साइट के अपने पाठ इसी रेखा पर रखिए, पुराने से नए की ओर, हर एक के आगे उसका दर्जा। नीचे की सूची यही करती है।
- उपनिषदश्रुतिलगभग 700-300 ई.पू.
- भगवद्गीतास्मृतिलगभग 200 ई.पू.-200 ई.
- महावाक्यश्रुतिउपनिषदों से
- योग सूत्रस्मृतिदूसरी-चौथी सदी ई.
- विष्णु सहस्रनामस्मृतिमहाभारत में, पहली-चौथी सदी ई.
- यक्ष-प्रश्न, विदुर-नीति, अनुगीतास्मृतिमहाभारत की महाकाव्य-परत
- हरिवंशस्मृतिमहाभारत का खिल-पर्व, पहली-चौथी सदी ई.
- रामायणस्मृतिसंकलन लगभग 400 ई.पू.-200 ई.
- महाभारतस्मृतिसंकलन लगभग 400 ई.पू.-400 ई.
- ब्रह्म सूत्रस्मृतिलगभग 200 ई.पू.-400 ई.
- देवी माहात्म्यस्मृतिमार्कण्डेय पुराण में, पाँचवीं-छठी सदी ई.
- सौंदर्य लहरीस्मृतिशंकर को आरोपित, लगभग 8वीं सदी, कर्तृत्व विवादित
- विवेकचूड़ामणिस्मृतिशंकर को आरोपित, तिथि व कर्तृत्व विवादित
- अवधूत गीतास्मृतिदत्तात्रेय को आरोपित, 9वीं-10वीं सदी, विवादित
- अष्टावक्र गीतास्मृतितिथि विवादित, प्रायः 8वीं-14वीं सदी
- भागवत की कथाएँस्मृतिभागवत पुराण से, 9वीं-10वीं सदी ई.
- योग वासिष्ठस्मृतिकश्मीरी मोक्षोपाय लगभग 950 ई., बाद में पुनर्रचित
- नारद भक्ति सूत्रस्मृतिलगभग 10वीं-13वीं सदी
- ललिता सहस्रनामस्मृतिब्रह्माण्ड पुराण से, तिथि अनिश्चित
- शिव महिम्न स्तोत्रस्मृतिमध्यकालीन, तिथि अनिश्चित
- राम गीतास्मृतिअध्यात्म रामायण से हो तो 14वीं-15वीं सदी
- जपजी साहिबसिखगुरु नानक, लगभग 1500-1539 ई.
- आनंद साहिबसिखगुरु अमरदास, सोलहवीं सदी
- विभीषण गीतास्मृतिरामचरितमानस का एक प्रसंग, लगभग 1574 ई.
- हनुमान चालीसास्मृतितुलसीदास, सोलहवीं सदी के अंत में
- सुखमनी साहिबसिखगुरु अर्जन, लगभग 1600 ई.
- आदि ग्रंथसिखसंकलन 1604 ई.
जो आकृति उभरती है
इससे एक आकृति बनती है। दो पुराने लंगर हैं, उपनिषद और गीता। फिर एक लंबा शांत खिंचाव। और फिर दूसरी सहस्राब्दी में भक्ति और अद्वैत के पाठों का एक घना झुरमुट। महाकाव्यों और ब्रह्मसूत्र के अलमारी में आ जाने से यह रीढ़ अब पहले से चौड़ी है। फिर भी यहाँ संहिता, ब्राह्मण या आरण्यक की कर्मकांडी परतों से कुछ नहीं, वेदांग से कुछ नहीं, धर्मशास्त्र से कुछ नहीं, और आगम-तंत्र से कुछ नहीं। यह परंपरा की चिंतन और भक्ति वाली रीढ़ है।
दूसरी घड़ी
अब तक हमने जो रेखा बिछाई, वह स्याही की घड़ी है, यानी पाठ कब काग़ज़ पर आया। पर परंपरा अपने पास एक और घड़ी रखती है, और वह कहीं बड़ी है। उसमें समय एक के भीतर एक बैठा है। एक कल्प ब्रह्मा का एक दिन है, हज़ार महायुग, क़रीब बत्तीस अरब वर्ष नहीं, चार सौ बत्तीस करोड़ वर्ष। एक कल्प में चौदह मन्वन्तर, हर एक इकहत्तर महायुग का, क़रीब तीस करोड़ वर्ष, और अभी सातवाँ, वैवस्वत, चल रहा है। हर महायुग तैंतालीस लाख वर्ष का, और उसी में सत्य, त्रेता, द्वापर और कलि, चार युग, चार-तीन-दो-एक के अनुपात में। हम इसी वैवस्वत मन्वन्तर के अट्ठाईसवें महायुग के कलि युग में बैठे हैं।
जो सदियों से नहीं, युगों से जिए
इसी घड़ी पर कथा के पात्र भी बैठते हैं, और उनकी आयु इसी पैमाने की है। राम का राज्य ग्यारह हज़ार वर्ष का कहा गया, और दशरथ अपने को साठ हज़ार वर्ष का बताते हैं। यह त्रेता के आयु-पैमाने की बात है। और एक पात्र तो और भी आगे जाता है, जाम्बवान, जो रीछों का राजा है। वह राम की सेवा में त्रेता में मिलता है, और फिर वही जाम्बवान कृष्ण से द्वापर में भिड़ता है, उसी स्यमन्तक मणि वाले प्रसंग में, और अपनी पुत्री जाम्बवती उन्हें देता है। यानी एक ही प्राणी त्रेता से द्वापर तक जिया, बीच का पूरा खिंचाव, जो लाखों वर्षों के क्रम में आता है।
फिर चिरंजीवी हैं, जिन्हें परंपरा युगों के पार जीवित मानती है, हनुमान, परशुराम, मार्कण्डेय और कुछ और। परशुराम दोनों महाकाव्यों में मिलते हैं, त्रेता में भी और द्वापर में भी। मार्कण्डेय के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने प्रलय तक देखी, यानी उनका जीवन कल्पों को छूता है। और इन सबके ऊपर देवी, शिव और विष्णु हैं, जिनकी कोई आयु गिनी ही नहीं जाती, क्योंकि वे इस घड़ी के भीतर नहीं, इसके पार हैं, सनातन, जैसा पहला पन्ना कहता है।
तो मूल कब का है
यहीं वह बात उठती है जो स्याही की घड़ी अकेले नहीं कह पाती। इस दूसरी घड़ी पर, कृष्ण और महाभारत क़रीब पाँच हज़ार वर्ष पीछे बैठते हैं, कलि के मुहाने पर। राम उससे बहुत पीछे, त्रेता में, लाखों वर्ष की दूरी पर। जाम्बवान का जीवन इन दोनों के बीच एक पुल की तरह तना है। और जो घटनाएँ ये पाठ कहते हैं, परंपरा के हिसाब से, उसी गहरे समय में घटीं, उस काग़ज़ से बहुत पहले जिस पर वे आख़िर में लिखी गईं। नीचे की तस्वीर यही दो घड़ियाँ साथ रखती है।
दोनों घड़ियाँ अलग सवालों के जवाब देती हैं, और एक-दूसरे में बदली नहीं जा सकतीं, ठीक वैसे ही जैसे कब के चार मतलब। स्याही की घड़ी पूछती है, यह पाठ कब लिखा गया। कथा की घड़ी पूछती है, यह जो कहता है वह कब घटा। पहली विद्वानों की पाठ-विद्या से चलती है, दूसरी परंपरा के अपने युग-गणित से। और एक एहतियात यहाँ भी वही, कि घटनाओं को नामित युगों में बिठाना अपने आप में एक बाद की व्यवस्था है (देवदत्त पटनायक), इसलिए इन गहरी संख्याओं को इतिहास की तारीख़ की तरह नहीं, परंपरा की अपनी गिनती की तरह पढ़िए। युग-गणित का पूरा हिसाब राम वाले पन्ने पर है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
ये तारीख़ें पक्की क्यों नहीं हैं?
क्योंकि ये पाठ लिखे जाने से पहले सदियों मुँह-ज़बानी चले। तिथियाँ भाषा और भीतरी सबूतों से जोड़ी जाती हैं, इसलिए लगभग रहती हैं।
इस साइट पर पुराने और नए सिरे पर कौन-से पाठ हैं?
पुराने सिरे पर उपनिषद, नए सिरे पर 1604 का आदि ग्रंथ। बीच में दूसरी सहस्राब्दी का घना झुरमुट है।
कब के चार मतलब क्यों ज़रूरी हैं?
क्योंकि रचना की तारीख़, मौखिक धारा, कथा का भीतरी समय और युग-समय, ये अलग सवालों के जवाब हैं। इन्हें मिलाने से उलझन बढ़ती है।
पढ़ने के लिए
- स्टेफ़नी जेमिसन व जोएल ब्रेरटन, The Rigveda
- माइकल विट्ज़ेल, The Development of the Vedic Canon and its Schools
- पैट्रिक ओलिवेल, The Early Upanishads; Manu’s Code of Law
- जे. एल. ब्रॉकिंगटन, The Sanskrit Epics
- लूडो रोशर, The Puranas
- फ़्रीडहेल्म हार्डी, Viraha-Bhakti
- वाल्टर स्लाये, on the Mokshopaya
- डब्ल्यू. एच. मैक्लाउड व पशौरा सिंह, on the Sikh scriptures
जो तंत्र में सोचता है, उसके लिए इस पन्ने का काम यह है। मन में दो घड़ियाँ साथ रखिए। एक स्याही की, जो बताती है पाठ कब लिखा गया, और जिस पर यह संग्रह उपनिषद से ले कर 1604 तक फैला है। दूसरी कथा की, जो परंपरा के युग-गणित पर चलती है, और जिस पर वही घटनाएँ लाखों वर्ष पीछे, गहरे समय में बैठती हैं। किसी पाठ के सामने पूछिए कि आप कौन-सी घड़ी माँग रहे हैं। दोनों सच्ची हैं, और एक-दूसरे में बदली नहीं जातीं।