अंग 246

अंग
246
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਇਸਤਰੀ ਪੁਰਖ ਕਾਮਿ ਵਿਆਪੇ ਜੀਉ ਰਾਮ ਨਾਮ ਕੀ ਬਿਧਿ ਨਹੀ ਜਾਣੀ ॥
ਮਾਤ ਪਿਤਾ ਸੁਤ ਭਾਈ ਖਰੇ ਪਿਆਰੇ ਜੀਉ ਡੂਬਿ ਮੁਏ ਬਿਨੁ ਪਾਣੀ ॥
ਡੂਬਿ ਮੁਏ ਬਿਨੁ ਪਾਣੀ ਗਤਿ ਨਹੀ ਜਾਣੀ ਹਉਮੈ ਧਾਤੁ ਸੰਸਾਰੇ ॥
ਜੋ ਆਇਆ ਸੋ ਸਭੁ ਕੋ ਜਾਸੀ ਉਬਰੇ ਗੁਰ ਵੀਚਾਰੇ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਹੋਵੈ ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਵਖਾਣੈ ਆਪਿ ਤਰੈ ਕੁਲ ਤਾਰੇ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਵਸੈ ਘਟ ਅੰਤਰਿ ਗੁਰਮਤਿ ਮਿਲੇ ਪਿਆਰੇ ॥੨॥
ਰਾਮ ਨਾਮ ਬਿਨੁ ਕੋ ਥਿਰੁ ਨਾਹੀ ਜੀਉ ਬਾਜੀ ਹੈ ਸੰਸਾਰਾ ॥
ਦ੍ਰਿੜੁ ਭਗਤਿ ਸਚੀ ਜੀਉ ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਵਾਪਾਰਾ ॥
ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਵਾਪਾਰਾ ਅਗਮ ਅਪਾਰਾ ਗੁਰਮਤੀ ਧਨੁ ਪਾਈਐ ॥
ਸੇਵਾ ਸੁਰਤਿ ਭਗਤਿ ਇਹ ਸਾਚੀ ਵਿਚਹੁ ਆਪੁ ਗਵਾਈਐ ॥
ਹਮ ਮਤਿ ਹੀਣ ਮੂਰਖ ਮੁਗਧ ਅੰਧੇ ਸਤਿਗੁਰਿ ਮਾਰਗਿ ਪਾਏ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਬਦਿ ਸੁਹਾਵੇ ਅਨਦਿਨੁ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਏ ॥੩॥
ਆਪਿ ਕਰਾਏ ਕਰੇ ਆਪਿ ਜੀਉ ਆਪੇ ਸਬਦਿ ਸਵਾਰੇ ॥
ਆਪੇ ਸਤਿਗੁਰੁ ਆਪਿ ਸਬਦੁ ਜੀਉ ਜੁਗੁ ਜੁਗੁ ਭਗਤ ਪਿਆਰੇ ॥
ਜੁਗੁ ਜੁਗੁ ਭਗਤ ਪਿਆਰੇ ਹਰਿ ਆਪਿ ਸਵਾਰੇ ਆਪੇ ਭਗਤੀ ਲਾਏ ॥
ਆਪੇ ਦਾਨਾ ਆਪੇ ਬੀਨਾ ਆਪੇ ਸੇਵ ਕਰਾਏ ॥
ਆਪੇ ਗੁਣਦਾਤਾ ਅਵਗੁਣ ਕਾਟੇ ਹਿਰਦੈ ਨਾਮੁ ਵਸਾਏ ॥
ਨਾਨਕ ਸਦ ਬਲਿਹਾਰੀ ਸਚੇ ਵਿਟਹੁ ਆਪੇ ਕਰੇ ਕਰਾਏ ॥੪॥੪॥
इसतरी पुरख कामि विआपे जीउ राम नाम की बिधि नही जाणी ॥
मात पिता सुत भाई खरे पिआरे जीउ डूबि मुए बिनु पाणी ॥
डूबि मुए बिनु पाणी गति नही जाणी हउमै धातु संसारे ॥
जो आइआ सो सभु को जासी उबरे गुर वीचारे ॥
गुरमुखि होवै राम नामु वखाणै आपि तरै कुल तारे ॥
नानक नामु वसै घट अंतरि गुरमति मिले पिआरे ॥२॥
राम नाम बिनु को थिरु नाही जीउ बाजी है संसारा ॥
द्रिड़ु भगति सची जीउ राम नामु वापारा ॥
राम नामु वापारा अगम अपारा गुरमती धनु पाईऐ ॥
सेवा सुरति भगति इह साची विचहु आपु गवाईऐ ॥
हम मति हीण मूरख मुगध अंधे सतिगुरि मारगि पाए ॥
नानक गुरमुखि सबदि सुहावे अनदिनु हरि गुण गाए ॥३॥
आपि कराए करे आपि जीउ आपे सबदि सवारे ॥
आपे सतिगुरु आपि सबदु जीउ जुगु जुगु भगत पिआरे ॥
जुगु जुगु भगत पिआरे हरि आपि सवारे आपे भगती लाए ॥
आपे दाना आपे बीना आपे सेव कराए ॥
आपे गुणदाता अवगुण काटे हिरदै नामु वसाए ॥
नानक सद बलिहारी सचे विटहु आपे करे कराए ॥४॥४॥

हिन्दी अर्थ: (माया के मोह के प्रभाव में) स्त्री और मर्द काम-वासना में फसे रहते हैं। परमात्मा के नाम सिमरन की जाच नहीं सीखते। (माया के मोह में फसे जीवों को अपने) माता-पिता-पुत्र-भाई (ही) बहुत प्यारे लगते हैं। (जिस सरोवर में) पानी नहीं। (पानी की जगह मोह है उस में) डूब के (नाको नाक फस के) आत्मिक मौत सहेड़ लेते हैं। मोह रूपी पानी वाले माया-सरोवर में नाको नाक फस के जीव आत्मिक मौत ले लेते है और अपने आत्मिक जीवन को नहीं परखते-जाचते। (इस तरह) संसार में (जीवों को) अहंकार की भटकना लगी हुई है। जो भी जीव जगत में (जनम ले के) आता है वह (इस भटकना में) फसता जाता है। (इसमें से वही) बचते हैं जो गुरू के शबद को अपनी सोच-मण्डल में बसाते हैं। जो मनुष्य गुरू के सन्मुख हो के परमात्मा का नाम उच्चारता है। वह खुद (इस माया-सरोवर से) पार लांघ जाता है। अपनी कुलों को भी पार लंघा लेता है। हे नानक ! जिस मनुष्य के हृदय में परमात्मा का नाम आ बसता है। वह गुरू की मति का आसरा ले के प्यारे प्रभू को मिल जाता है। 2। हे भाई ! ये जगत (परमात्मा की रची हुई एक) खेल है (इस में) परमात्मा के नाम के बिना और कोई सदा कायम रहने वाला नहीं। हे भाई ! परमात्मा का नाम-वणज ही सदा कायम रहने वाला है। अपहुँच और बेअंत परमात्मा का नाम-वणज ही सदा कायम रहने वाला धन है। ये धन गुरू की मति पर चलने से मिलता है। प्रभू की सेवा भक्ति, प्रभू चरणों में सुरति जोड़नी – ये सदा कायम रहने वाली (राशि) है (इसकी बरकति से अपने) अंदर से स्वैभाव दूर कर सकते हैं। हम अल्प-बुद्धि वालों को, मूर्खों को, माया के मोह में अंधे हुओं को सतिगुरू ने ही जीवन के सही रास्ते पर डाला है। हे नानक ! गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य गुरू के शबद में जुड़ के सुंदर आत्मिक जीवन वाले बन जाते हैं और, वह हर वक्त परमात्मा के गुण गाते रहते हैं। 3। (पर) हे भाई ! (जीवों के वश कुछ नहीं। माया-सर में डूबने से बचाने वाला प्रभू स्वयं ही है) प्रभू खुद ही (प्रेरणा करके जीवों से काम) करवाता है (जीवों में व्यापक हो के) खुद ही (सब कुछ) करता है। प्रभू खुद ही गुरू के शबद में जोड़ के (जीवों के) जीवन सुंदर बनाता है। प्रभू खुद ही सत्गुरू मिलाता है। खुद ही (गुरू का) शबद बख्शता है। और खुद ही हरेक युग में अपने भक्तों को प्यार करता है। हरेक युग में हरि अपने भक्तों को प्यार करता है। खुद ही उनके जीवन को सँवारता है। खुद ही (उन्हें) भक्ति में जोड़ता है। वह खुद ही सबके दिल की जानने वाला और पहचानने वाला है। वह खुद ही (अपने भक्तों से अपनी) सेवा-भक्ति करवाता है। (हे भाई !) परमात्मा खुद ही (अपने) गुणों की दाति बख्शता है। (हमारे) अवगुण दूर करता है। और (हमारे) हृदय में (अपना) नाम बसाता है। हे नानक ! (कह, मैं) उस सदा कायम रहने वाले परमात्मा से सदके जाता हूँ। वह खुद ही सब कुछ करता है और स्वयं ही सब कुछ कराता है। 4। 4।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਗੁਰ ਕੀ ਸੇਵਾ ਕਰਿ ਪਿਰਾ ਜੀਉ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਧਿਆਏ ॥
ਮੰਞਹੁ ਦੂਰਿ ਨ ਜਾਹਿ ਪਿਰਾ ਜੀਉ ਘਰਿ ਬੈਠਿਆ ਹਰਿ ਪਾਏ ॥
ਘਰਿ ਬੈਠਿਆ ਹਰਿ ਪਾਏ ਸਦਾ ਚਿਤੁ ਲਾਏ ਸਹਜੇ ਸਤਿ ਸੁਭਾਏ ॥
ਗੁਰ ਕੀ ਸੇਵਾ ਖਰੀ ਸੁਖਾਲੀ ਜਿਸ ਨੋ ਆਪਿ ਕਰਾਏ ॥
ਨਾਮੋ ਬੀਜੇ ਨਾਮੋ ਜੰਮੈ ਨਾਮੋ ਮੰਨਿ ਵਸਾਏ ॥
ਨਾਨਕ ਸਚਿ ਨਾਮਿ ਵਡਿਆਈ ਪੂਰਬਿ ਲਿਖਿਆ ਪਾਏ ॥੧॥
ਹਰਿ ਕਾ ਨਾਮੁ ਮੀਠਾ ਪਿਰਾ ਜੀਉ ਜਾ ਚਾਖਹਿ ਚਿਤੁ ਲਾਏ ॥
ਰਸਨਾ ਹਰਿ ਰਸੁ ਚਾਖੁ ਮੁਯੇ ਜੀਉ ਅਨ ਰਸ ਸਾਦ ਗਵਾਏ ॥
ਸਦਾ ਹਰਿ ਰਸੁ ਪਾਏ ਜਾ ਹਰਿ ਭਾਏ ਰਸਨਾ ਸਬਦਿ ਸੁਹਾਏ ॥
ਨਾਮੁ ਧਿਆਏ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਪਾਏ ਨਾਮਿ ਰਹੈ ਲਿਵ ਲਾਏ ॥
ਨਾਮੇ ਉਪਜੈ ਨਾਮੇ ਬਿਨਸੈ ਨਾਮੇ ਸਚਿ ਸਮਾਏ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਗੁਰਮਤੀ ਪਾਈਐ ਆਪੇ ਲਏ ਲਵਾਏ ॥੨॥
ਏਹ ਵਿਡਾਣੀ ਚਾਕਰੀ ਪਿਰਾ ਜੀਉ ਧਨ ਛੋਡਿ ਪਰਦੇਸਿ ਸਿਧਾਏ ॥
ਦੂਜੈ ਕਿਨੈ ਸੁਖੁ ਨ ਪਾਇਓ ਪਿਰਾ ਜੀਉ ਬਿਖਿਆ ਲੋਭਿ ਲੁਭਾਏ ॥
ਬਿਖਿਆ ਲੋਭਿ ਲੁਭਾਏ ਭਰਮਿ ਭੁਲਾਏ ਓਹੁ ਕਿਉ ਕਰਿ ਸੁਖੁ ਪਾਏ ॥
ਚਾਕਰੀ ਵਿਡਾਣੀ ਖਰੀ ਦੁਖਾਲੀ ਆਪੁ ਵੇਚਿ ਧਰਮੁ ਗਵਾਏ ॥
गउड़ी महला ३ ॥
गुर की सेवा करि पिरा जीउ हरि नामु धिआए ॥
मंञहु दूरि न जाहि पिरा जीउ घरि बैठिआ हरि पाए ॥
घरि बैठिआ हरि पाए सदा चितु लाए सहजे सति सुभाए ॥
गुर की सेवा खरी सुखाली जिस नो आपि कराए ॥
नामो बीजे नामो जंमै नामो मंनि वसाए ॥
नानक सचि नामि वडिआई पूरबि लिखिआ पाए ॥१॥
हरि का नामु मीठा पिरा जीउ जा चाखहि चितु लाए ॥
रसना हरि रसु चाखु मुये जीउ अन रस साद गवाए ॥
सदा हरि रसु पाए जा हरि भाए रसना सबदि सुहाए ॥
नामु धिआए सदा सुखु पाए नामि रहै लिव लाए ॥
नामे उपजै नामे बिनसै नामे सचि समाए ॥
नानक नामु गुरमती पाईऐ आपे लए लवाए ॥२॥
एह विडाणी चाकरी पिरा जीउ धन छोडि परदेसि सिधाए ॥
दूजै किनै सुखु न पाइओ पिरा जीउ बिखिआ लोभि लुभाए ॥
बिखिआ लोभि लुभाए भरमि भुलाए ओहु किउ करि सुखु पाए ॥
चाकरी विडाणी खरी दुखाली आपु वेचि धरमु गवाए ॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ३ ॥ हे प्यारी जिंदे ! गुरू की सेवा कर (गुरू की शरण पड़। और) परमात्मा का नाम सिमर। (इस तरह) तू अपने आप में से दूर नहीं जाएगी (माया कें मोह की भटकना से बच जाएगी)। (हे जिंदे !) हृदय घर में टिके रहने से परमात्मा मिल जाता है। जो जीव आत्मिक अडोलता में टिक के। सदा स्थिर प्रभू के प्रेम में जुड़ के सदा (प्रभू चरणों में) चित्त जोड़ता है। वह हृदय घर में टिका रह के परमात्मा को ढूँढ लेता है। ( हे जिंदे !) गुरू की बताई हुई सेवा बहुत सुख देने वाली है (पर ये सेवा वही मनुष्य करता है) जिससे परमात्मा खुद कराऐ (जिसे खुद प्रेरणा करे)। (वह मनुष्य फिर अपने हृदय खेत में) परमात्मा का नाम ही बीजता है (वहाँ) नाम ही उगता है। वह मनुष्य अपने मन में सदा नाम ही बसाए रखता है। हे नानक ! सदा स्थिर प्रभू में जुड़ के। प्रभू नाम में टिक के (मनुष्य लोक-परलोक में) आदर पाता है। (नाम सिमरन की बरकति से) पहले जन्म में किए कर्मों के संस्कारों के लेख मनुष्य के अंदर अंकुरित हो जाते हैं। 1। हे प्यारी जिंदे ! परमात्मा का नाम मीठा है (पर ये तुम्हें तभी समझ आएगी) जब तू चित्त जोड़ के (ये नाम-रस) चखेगी। हे मेरी निष्कर्मण्य जीभ ! परमात्मा के नाम का स्वाद चख। और अन्य रसों के स्वाद त्याग दे। (पर जीभ के भी क्या वश?) जब परमात्मा को ठीक लगे। तभी जीभ सदा परमात्मा के नाम का स्वाद लेती है। और गुरू के शबद में जुड़ के सुंदर हो जाती है। (हे जिंदे !) जो मनुष्य नाम सिमरता है नाम में सुरति जोड़े रखता है। वह सदा आत्मिक आनंद पाता है। नाम की बरकति से उसके अंदर (नाम-रस की तमन्ना) पैदा होती है। नाम की बरकति से (उसके अंदर से और रसों की पकड़) दूर हो जाती है। नाम सिमरन की बरकति से वह सदा स्थिर प्रभू में लीन रहता है। (पर) हे नानक ! परमात्मा का नाम गुरू की मति पर चलने से ही मिलता है। परमात्मा खुद ही अपने नाम की लगन पैदा करता है। 2। हे प्यारी जिंदे ! (जैसे ये बेगानी नौकरी बड़ी दुखदाई होती है कि मनुष्य अपनी स्त्री को घर छोड़ के परदेस चला जाता है। वैसे ही परमात्मा को विसार के) और खुशामदें (बड़ी दुखदाई हैं क्योंकि) जीव स्त्री (अपना आंतरिक आत्मिक ठिकाना) छोड़ के जगह-जगह बाहर भटकती फिरती है। हे प्यारी जिंदे ! माया के मोह में फंस के किसी ने कभी सुख नहीं पाया। मनुष्य माया के लोभ में फंस जाता है।(जब मनुष्य) माया के लोभ में फंसता है (तब माया की खातिर) भटकना में पड़ कर गलत रास्ते पर पड़ जाता है (उस हालत में ये) सुख कैसे पा सकता है? (हे जिंदे ! माया की खातिर ये दर दर की खुशामद बहुत दुखदाई है) मनुष्य अपना आत्मिक जीवन (माया के बदले) बेच के अपना कर्तव्य छोड़ बैठता है।

संदर्भ: यह अंग 246 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Amar Daas Ji।

दिल्ली की Pollution-Day की शाम, AQI 400, और घर के अंदर कुछ साँस।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 35 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 246” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 247 →, पीछे का: ← अंग 245

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।