अंग 314

अंग
314
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਪਉੜੀ ॥
ਤੂ ਕਰਤਾ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਜਾਣਦਾ ਜੋ ਜੀਆ ਅੰਦਰਿ ਵਰਤੈ ॥
ਤੂ ਕਰਤਾ ਆਪਿ ਅਗਣਤੁ ਹੈ ਸਭੁ ਜਗੁ ਵਿਚਿ ਗਣਤੈ ॥
ਸਭੁ ਕੀਤਾ ਤੇਰਾ ਵਰਤਦਾ ਸਭ ਤੇਰੀ ਬਣਤੈ ॥
ਤੂ ਘਟਿ ਘਟਿ ਇਕੁ ਵਰਤਦਾ ਸਚੁ ਸਾਹਿਬ ਚਲਤੈ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਨੋ ਮਿਲੇ ਸੁ ਹਰਿ ਮਿਲੇ ਨਾਹੀ ਕਿਸੈ ਪਰਤੈ ॥੨੪॥
पउड़ी ॥
तू करता सभु किछु जाणदा जो जीआ अंदरि वरतै ॥
तू करता आपि अगणतु है सभु जगु विचि गणतै ॥
सभु कीता तेरा वरतदा सभ तेरी बणतै ॥
तू घटि घटि इकु वरतदा सचु साहिब चलतै ॥
सतिगुर नो मिले सु हरि मिले नाही किसै परतै ॥२४॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ हे सृजनहार ! जो कुछ जीवों के मनों में बरतता है (भाव। जो विचार चलते हैं)। तू वह सब जानता है। सारा संसार ही इस गिनती (फायदे-नुकसान के विचार। चिंता व चिंतन) में है। हे सृजनहार ! एक तू इससे परे है। (क्योंकि) जो कुछ हो रहा है सब तेरा ही किया हुआ हो रहा है। सारी (सृष्टि की) बनावट ही तेरी बनाई हुई है। हे हरी ! तू हरेक घट में व्यापक है। तेरे करिश्में (आश्चर्यजनक) हैं। (सब जगह व्यापक होते हुए भी हरी को अपने आप कोई नहीं ढूँढ सका) जो मनुष्य सतिगुरू को मिला है। उस ने ही हरी को पाया है। (माया) के किसी (आडम्बर) ने उन्हें हरी से परताया नहीं। 24।
ਸਲੋਕੁ ਮਃ ੪ ॥
ਇਹੁ ਮਨੂਆ ਦ੍ਰਿੜੁ ਕਰਿ ਰਖੀਐ ਗੁਰਮੁਖਿ ਲਾਈਐ ਚਿਤੁ ॥
ਕਿਉ ਸਾਸਿ ਗਿਰਾਸਿ ਵਿਸਾਰੀਐ ਬਹਦਿਆ ਉਠਦਿਆ ਨਿਤ ॥
ਮਰਣ ਜੀਵਣ ਕੀ ਚਿੰਤਾ ਗਈ ਇਹੁ ਜੀਅੜਾ ਹਰਿ ਪ੍ਰਭ ਵਸਿ ॥
ਜਿਉ ਭਾਵੈ ਤਿਉ ਰਖੁ ਤੂ ਜਨ ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਬਖਸਿ ॥੧॥
सलोकु मः ४ ॥
इहु मनूआ द्रिड़ु करि रखीऐ गुरमुखि लाईऐ चितु ॥
किउ सासि गिरासि विसारीऐ बहदिआ उठदिआ नित ॥
मरण जीवण की चिंता गई इहु जीअड़ा हरि प्रभ वसि ॥
जिउ भावै तिउ रखु तू जन नानक नामु बखसि ॥१॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला ४॥ (अगर) सतिगुरू के सन्मुख हो के मन (प्रभू की याद में) जोड़ें (और) इस मन को पक्का कर के रखें (ताकि ये माया की तरफ ना दौड़े)। (और यदि) बैठते-उठते (काम-काज करते हुए) कभी एक दम के लिए भी (नाम) ना बिसारें। (तो) यह जीव हरी के वश में (आ जाता है। भाव अपना आप उसके हवाले कर देता है। और) इसकी सारी चिंता मिट जाती है। (हे हरी !) जैसे तुझे ठीक लगे वैसे (मुझे) दास नानक को नाम की दाति बख्श (क्योंकि। नाम ही है जो मन की चिंता-फिक्र को मिटा सकता हैं)। 1।
ਮਃ ੩ ॥
ਮਨਮੁਖੁ ਅਹੰਕਾਰੀ ਮਹਲੁ ਨ ਜਾਣੈ ਖਿਨੁ ਆਗੈ ਖਿਨੁ ਪੀਛੈ ॥
ਸਦਾ ਬੁਲਾਈਐ ਮਹਲਿ ਨ ਆਵੈ ਕਿਉ ਕਰਿ ਦਰਗਹ ਸੀਝੈ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਕਾ ਮਹਲੁ ਵਿਰਲਾ ਜਾਣੈ ਸਦਾ ਰਹੈ ਕਰ ਜੋੜਿ ॥
ਆਪਣੀ ਕ੍ਰਿਪਾ ਕਰੇ ਹਰਿ ਮੇਰਾ ਨਾਨਕ ਲਏ ਬਹੋੜਿ ॥੨॥
मः ३ ॥
मनमुखु अहंकारी महलु न जाणै खिनु आगै खिनु पीछै ॥
सदा बुलाईऐ महलि न आवै किउ करि दरगह सीझै ॥
सतिगुर का महलु विरला जाणै सदा रहै कर जोड़ि ॥
आपणी क्रिपा करे हरि मेरा नानक लए बहोड़ि ॥२॥

हिन्दी अर्थ: महला ३ ॥ अहंकार में मतवाला हुआ मनमुख (सतिगुरू के) निवास स्थान (भाव। सत्संग) को नहीं पहिचानता हर वक्त अस्थिर अवस्था में रहता है (एक पल प्रसन्न तो अगले पल दुखी)। हमेशा बुलाते रहें तो भी वह सत्संग में नहीं आता (इस वास्ते) वह हरी की दरगाह में भी कैसे सुर्खरू हो? (सत्संग की) किसी उस विरले (दुर्लभ) को सार आती है जो सदा हाथ जोड़े रखे (भाव। मन विनम्रता में रह के याद में जुड़ा रहे)। हे नानक ! जिस पर प्यारा प्रभू खुद अपनी मेहर करे। उसे (मनमुखता की ओर से) मोड़ लेता है। 2।
ਪਉੜੀ ॥
ਸਾ ਸੇਵਾ ਕੀਤੀ ਸਫਲ ਹੈ ਜਿਤੁ ਸਤਿਗੁਰ ਕਾ ਮਨੁ ਮੰਨੇ ॥
ਜਾ ਸਤਿਗੁਰ ਕਾ ਮਨੁ ਮੰਨਿਆ ਤਾ ਪਾਪ ਕਸੰਮਲ ਭੰਨੇ ॥
ਉਪਦੇਸੁ ਜਿ ਦਿਤਾ ਸਤਿਗੁਰੂ ਸੋ ਸੁਣਿਆ ਸਿਖੀ ਕੰਨੇ ॥
ਜਿਨ ਸਤਿਗੁਰ ਕਾ ਭਾਣਾ ਮੰਨਿਆ ਤਿਨ ਚੜੀ ਚਵਗਣਿ ਵੰਨੇ ॥
ਇਹ ਚਾਲ ਨਿਰਾਲੀ ਗੁਰਮੁਖੀ ਗੁਰ ਦੀਖਿਆ ਸੁਣਿ ਮਨੁ ਭਿੰਨੇ ॥੨੫॥
पउड़ी ॥
सा सेवा कीती सफल है जितु सतिगुर का मनु मंने ॥
जा सतिगुर का मनु मंनिआ ता पाप कसंमल भंने ॥
उपदेसु जि दिता सतिगुरू सो सुणिआ सिखी कंने ॥
जिन सतिगुर का भाणा मंनिआ तिन चड़ी चवगणि वंने ॥
इह चाल निराली गुरमुखी गुर दीखिआ सुणि मनु भिंने ॥२५॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। जिस सेवा से सतिगुरू का मन (सिख पर) पतीज जाए। वही की हुई सेवा फायदेमंद है (क्योंकि जब) सतिगुरू का मन पतीजे, तब ही विकार व पाप दूर होते हैं। (पतीज के) सतिगुरू जो उपदेश सिखों को देता है वह ध्यान से उसे सुनते हैं। (फिर) जो सिख सतिगुरू की रजा और सिदक रहते हैं। उनको (पहले से) चौगुनी रंगत चढ़ जाती है। सतिगुरू की ही शिक्षा सुन के मन (हरी के प्यार में) भीगता है – सतिगुरू के सन्मुख रहने वाला ये रास्ता (संसार के अन्य मतों से) निराला है। 25।
ਸਲੋਕੁ ਮਃ ੩ ॥
ਜਿਨਿ ਗੁਰੁ ਗੋਪਿਆ ਆਪਣਾ ਤਿਸੁ ਠਉਰ ਨ ਠਾਉ ॥
ਹਲਤੁ ਪਲਤੁ ਦੋਵੈ ਗਏ ਦਰਗਹ ਨਾਹੀ ਥਾਉ ॥
ਓਹ ਵੇਲਾ ਹਥਿ ਨ ਆਵਈ ਫਿਰਿ ਸਤਿਗੁਰ ਲਗਹਿ ਪਾਇ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਕੀ ਗਣਤੈ ਘੁਸੀਐ ਦੁਖੇ ਦੁਖਿ ਵਿਹਾਇ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਪੁਰਖੁ ਨਿਰਵੈਰੁ ਹੈ ਆਪੇ ਲਏ ਜਿਸੁ ਲਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਦਰਸਨੁ ਜਿਨਾ ਵੇਖਾਲਿਓਨੁ ਤਿਨਾ ਦਰਗਹ ਲਏ ਛਡਾਇ ॥੧॥
सलोकु मः ३ ॥
जिनि गुरु गोपिआ आपणा तिसु ठउर न ठाउ ॥
हलतु पलतु दोवै गए दरगह नाही थाउ ॥
ओह वेला हथि न आवई फिरि सतिगुर लगहि पाइ ॥
सतिगुर की गणतै घुसीऐ दुखे दुखि विहाइ ॥
सतिगुरु पुरखु निरवैरु है आपे लए जिसु लाइ ॥
नानक दरसनु जिना वेखालिओनु तिना दरगह लए छडाइ ॥१॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला ३॥ जिस मनुष्य ने अपने सतिगुरू की निंदा की है। उसे ना जगह ना ठिकाना। उसके ये लोक और परलोक दानों गवाए जाते हैं। हरी की दरगाह में (भी) जगह नहीं है मिलती। (ऐसे लोगों को) फिर वह मौका नहीं मिलता कि सतिगुरू के चरणों में लग सकें। (क्योंकि) सतिगुरू की निंदा करने में (एक बार जो) गलतान हो जाएं तो निरोल दुखों में ही उम्र बीतती है। (पर) मर्द (भाव। शूरवीर) सतिगुरू (ऐसा) निर्वैर है कि उस (निंदक) को भी खुद ही (भाव। अपने आप मेहर करके चरणों से) लगा लेता है। और हे नानक ! जिन्हें हरी। गुरू के दर्शन करवाता है। उन्हें दरगाह में छुड़ा लेता है। 1।
ਮਃ ੩ ॥
ਮਨਮੁਖੁ ਅਗਿਆਨੁ ਦੁਰਮਤਿ ਅਹੰਕਾਰੀ ॥
ਅੰਤਰਿ ਕ੍ਰੋਧੁ ਜੂਐ ਮਤਿ ਹਾਰੀ ॥
ਕੂੜੁ ਕੁਸਤੁ ਓਹੁ ਪਾਪ ਕਮਾਵੈ ॥
ਕਿਆ ਓਹੁ ਸੁਣੈ ਕਿਆ ਆਖਿ ਸੁਣਾਵੈ ॥
ਅੰਨਾ ਬੋਲਾ ਖੁਇ ਉਝੜਿ ਪਾਇ ॥
ਮਨਮੁਖੁ ਅੰਧਾ ਆਵੈ ਜਾਇ ॥
ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਭੇਟੇ ਥਾਇ ਨ ਪਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਪੂਰਬਿ ਲਿਖਿਆ ਕਮਾਇ ॥੨॥
मः ३ ॥
मनमुखु अगिआनु दुरमति अहंकारी ॥
अंतरि क्रोधु जूऐ मति हारी ॥
कूड़ु कुसतु ओहु पाप कमावै ॥
किआ ओहु सुणै किआ आखि सुणावै ॥
अंना बोला खुइ उझड़ि पाइ ॥
मनमुखु अंधा आवै जाइ ॥
बिनु सतिगुर भेटे थाइ न पाइ ॥
नानक पूरबि लिखिआ कमाइ ॥२॥

हिन्दी अर्थ: महला ३॥ मनमुख विचार-हीन खोटी बुद्धि वाला और अहंकारी होता है। उसके मन में क्रोध है और वह (विषियों के) जूए में अक्ल गवा लेता हैं। वह (सदा) झूठ-फरेब और पाप के काम करता है (इस वास्ते) वह सुने क्या और (किसी को) कह के सुनाए क्या? (भाव। झूठ फरेब वाले काम करने से उसका मन तो पापी हुआ ही पड़ा है। ना वह प्रभू की बंदगी की बात सुनता है और ना ही किसी को सुनाता है)। (सतिगुरू के दर्शनों से) अंधा (और उपदेश सुनने से) बहरा हो के अंधा मनमुख गलत रास्ते पर पड़ा हुआ है और नित्य पैदा होता मरता है। सतिगुरू को मिले बिना (कोई दरगाह में) कबूल नहीं होता। (क्योंकि) हे नानक ! शुरू से (किए कर्मों के अनुसार जो संस्कार उसके मन में) लिखे गए हैं (उनके अनुसार अब भी बुरे काम ही) किए जाता है। 2।
ਪਉੜੀ ॥
ਜਿਨ ਕੇ ਚਿਤ ਕਠੋਰ ਹਹਿ ਸੇ ਬਹਹਿ ਨ ਸਤਿਗੁਰ ਪਾਸਿ ॥
ਓਥੈ ਸਚੁ ਵਰਤਦਾ ਕੂੜਿਆਰਾ ਚਿਤ ਉਦਾਸਿ ॥
ਓਇ ਵਲੁ ਛਲੁ ਕਰਿ ਝਤਿ ਕਢਦੇ ਫਿਰਿ ਜਾਇ ਬਹਹਿ ਕੂੜਿਆਰਾ ਪਾਸਿ ॥
ਵਿਚਿ ਸਚੇ ਕੂੜੁ ਨ ਗਡਈ ਮਨਿ ਵੇਖਹੁ ਕੋ ਨਿਰਜਾਸਿ ॥
ਕੂੜਿਆਰ ਕੂੜਿਆਰੀ ਜਾਇ ਰਲੇ ਸਚਿਆਰ ਸਿਖ ਬੈਠੇ ਸਤਿਗੁਰ ਪਾਸਿ ॥੨੬॥
पउड़ी ॥
जिन के चित कठोर हहि से बहहि न सतिगुर पासि ॥
ओथै सचु वरतदा कूड़िआरा चित उदासि ॥
ओइ वलु छलु करि झति कढदे फिरि जाइ बहहि कूड़िआरा पासि ॥
विचि सचे कूड़ु न गडई मनि वेखहु को निरजासि ॥
कूड़िआर कूड़िआरी जाइ रले सचिआर सिख बैठे सतिगुर पासि ॥२६॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। जिन मनुष्यों के मन कठोर (भाव। निर्दयी) होते हैं। वे सतिगुरू के पास नहीं बैठ सकते। वहाँ (सतिगुरू की संगत में तो) सत्य की बातें होती हैं। झूठ के व्यापारी के मन को उदासी छाई रहती है। (सतिगुरू की संगति में) वे छल-फरेब करके समय गुजारते हैं। (वहाँ से उठ के) फिर झूठों के पास ही जा बैठते हैं। कोई पक्ष मन में निर्णय कर के देख लो। सच्चे (मनुष्य के हृदय में) झूठ नहीं मिल सकता (अर्थात अपना गहरा प्रभाव नहीं डाल सकता)। झूठे झूठों में ही जा मिलते हैं और सच्चे सिख सतिगुरू के पास ही जा बैठते हैं। 26।

संदर्भ: यह अंग 314 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Amar Daas Ji।

Janpath की सड़क-side चाय और बीच में एक quiet moment।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 44 पंक्तियों का है, 7 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 314” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 315 →, पीछे का: ← अंग 313

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।