अंग
247
राग Gauree
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਮਾਇਆ ਬੰਧਨ ਟਿਕੈ ਨਾਹੀ ਖਿਨੁ ਖਿਨੁ ਦੁਖੁ ਸੰਤਾਏ ॥
ਨਾਨਕ ਮਾਇਆ ਕਾ ਦੁਖੁ ਤਦੇ ਚੂਕੈ ਜਾ ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਚਿਤੁ ਲਾਏ ॥੩॥
ਮਨਮੁਖ ਮੁਗਧ ਗਾਵਾਰੁ ਪਿਰਾ ਜੀਉ ਸਬਦੁ ਮਨਿ ਨ ਵਸਾਏ ॥
ਮਾਇਆ ਕਾ ਭ੍ਰਮੁ ਅੰਧੁ ਪਿਰਾ ਜੀਉ ਹਰਿ ਮਾਰਗੁ ਕਿਉ ਪਾਏ ॥
ਕਿਉ ਮਾਰਗੁ ਪਾਏ ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਭਾਏ ਮਨਮੁਖਿ ਆਪੁ ਗਣਾਏ ॥
ਹਰਿ ਕੇ ਚਾਕਰ ਸਦਾ ਸੁਹੇਲੇ ਗੁਰ ਚਰਣੀ ਚਿਤੁ ਲਾਏ ॥
ਜਿਸ ਨੋ ਹਰਿ ਜੀਉ ਕਰੇ ਕਿਰਪਾ ਸਦਾ ਹਰਿ ਕੇ ਗੁਣ ਗਾਏ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਰਤਨੁ ਜਗਿ ਲਾਹਾ ਗੁਰਮੁਖਿ ਆਪਿ ਬੁਝਾਏ ॥੪॥੫॥੭॥
ਨਾਨਕ ਮਾਇਆ ਕਾ ਦੁਖੁ ਤਦੇ ਚੂਕੈ ਜਾ ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਚਿਤੁ ਲਾਏ ॥੩॥
ਮਨਮੁਖ ਮੁਗਧ ਗਾਵਾਰੁ ਪਿਰਾ ਜੀਉ ਸਬਦੁ ਮਨਿ ਨ ਵਸਾਏ ॥
ਮਾਇਆ ਕਾ ਭ੍ਰਮੁ ਅੰਧੁ ਪਿਰਾ ਜੀਉ ਹਰਿ ਮਾਰਗੁ ਕਿਉ ਪਾਏ ॥
ਕਿਉ ਮਾਰਗੁ ਪਾਏ ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਭਾਏ ਮਨਮੁਖਿ ਆਪੁ ਗਣਾਏ ॥
ਹਰਿ ਕੇ ਚਾਕਰ ਸਦਾ ਸੁਹੇਲੇ ਗੁਰ ਚਰਣੀ ਚਿਤੁ ਲਾਏ ॥
ਜਿਸ ਨੋ ਹਰਿ ਜੀਉ ਕਰੇ ਕਿਰਪਾ ਸਦਾ ਹਰਿ ਕੇ ਗੁਣ ਗਾਏ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਰਤਨੁ ਜਗਿ ਲਾਹਾ ਗੁਰਮੁਖਿ ਆਪਿ ਬੁਝਾਏ ॥੪॥੫॥੭॥
माइआ बंधन टिकै नाही खिनु खिनु दुखु संताए ॥
नानक माइआ का दुखु तदे चूकै जा गुर सबदी चितु लाए ॥३॥
मनमुख मुगध गावारु पिरा जीउ सबदु मनि न वसाए ॥
माइआ का भ्रमु अंधु पिरा जीउ हरि मारगु किउ पाए ॥
किउ मारगु पाए बिनु सतिगुर भाए मनमुखि आपु गणाए ॥
हरि के चाकर सदा सुहेले गुर चरणी चितु लाए ॥
जिस नो हरि जीउ करे किरपा सदा हरि के गुण गाए ॥
नानक नामु रतनु जगि लाहा गुरमुखि आपि बुझाए ॥४॥५॥७॥
नानक माइआ का दुखु तदे चूकै जा गुर सबदी चितु लाए ॥३॥
मनमुख मुगध गावारु पिरा जीउ सबदु मनि न वसाए ॥
माइआ का भ्रमु अंधु पिरा जीउ हरि मारगु किउ पाए ॥
किउ मारगु पाए बिनु सतिगुर भाए मनमुखि आपु गणाए ॥
हरि के चाकर सदा सुहेले गुर चरणी चितु लाए ॥
जिस नो हरि जीउ करे किरपा सदा हरि के गुण गाए ॥
नानक नामु रतनु जगि लाहा गुरमुखि आपि बुझाए ॥४॥५॥७॥
हिन्दी अर्थ: माया के (मोह के) बंधनों के कारण मनुष्य का मन (एक जगह) टिकता नहीं। (हरेक किस्म का) दुख इसे हर वक्त कलेश देता है। हे नानक ! माया के मोह से पैदा हुआ दुख तभी खत्म होता है जब मनुष्य गुरू के शबद में अपना चिक्त जोड़ता है। 3। हे प्यारी जिंदे ! अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य मूर्ख और उजड्ड ही रहता है। वह गुरू के शबद को अपने मन में नहीं बसाता। हे जिंदे ! माया (के मोह) का चक्कर उसे (सही जीवन-राह से) अंधा कर देता है (इस वास्ते वह) परमात्मा (के मिलाप) का रास्ता नहीं ढूँढ सकता। गुरू की मर्जी के मुताबिक चले बिना मनुष्य हरी के मिलाप का रास्ता नहीं ढूँढ सकता (क्योंकि) अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य सदा अपने आप को बड़ा प्रगट करता रहता है (और उसके अंदर सेवक वाली निम्रता नहीं आ सकती)। (दूसरी तरफ) परमात्मा के सेवक-भगत गुरू के चरणों में चिक्त जोड़ के सदा सुखी रहते हैं। (पर। हे जिंदे ! किसी के वश की बात नहीं) जिस मनुष्य पर परमात्मा स्वयं दया करता है। वही सदा परमात्मा के गुण गाता है। हे नानक ! परमात्मा का नाम ही जगत में (असल) कमाई है। इस बात की सूझ परमात्मा स्वयं ही (मनुष्य को) गुरू की शरण में ला के देता है। 4। 5।
ਰਾਗੁ ਗਉੜੀ ਛੰਤ ਮਹਲਾ ੫
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਮੇਰੈ ਮਨਿ ਬੈਰਾਗੁ ਭਇਆ ਜੀਉ ਕਿਉ ਦੇਖਾ ਪ੍ਰਭ ਦਾਤੇ ॥
ਮੇਰੇ ਮੀਤ ਸਖਾ ਹਰਿ ਜੀਉ ਗੁਰ ਪੁਰਖ ਬਿਧਾਤੇ ॥
ਪੁਰਖੋ ਬਿਧਾਤਾ ਏਕੁ ਸ੍ਰੀਧਰੁ ਕਿਉ ਮਿਲਹ ਤੁਝੈ ਉਡੀਣੀਆ ॥
ਕਰ ਕਰਹਿ ਸੇਵਾ ਸੀਸੁ ਚਰਣੀ ਮਨਿ ਆਸ ਦਰਸ ਨਿਮਾਣੀਆ ॥
ਸਾਸਿ ਸਾਸਿ ਨ ਘੜੀ ਵਿਸਰੈ ਪਲੁ ਮੂਰਤੁ ਦਿਨੁ ਰਾਤੇ ॥
ਨਾਨਕ ਸਾਰਿੰਗ ਜਿਉ ਪਿਆਸੇ ਕਿਉ ਮਿਲੀਐ ਪ੍ਰਭ ਦਾਤੇ ॥੧॥
ਇਕ ਬਿਨਉ ਕਰਉ ਜੀਉ ਸੁਣਿ ਕੰਤ ਪਿਆਰੇ ॥
ਮੇਰਾ ਮਨੁ ਤਨੁ ਮੋਹਿ ਲੀਆ ਜੀਉ ਦੇਖਿ ਚਲਤ ਤੁਮਾਰੇ ॥
ਚਲਤਾ ਤੁਮਾਰੇ ਦੇਖਿ ਮੋਹੀ ਉਦਾਸ ਧਨ ਕਿਉ ਧੀਰਏ ॥
ਗੁਣਵੰਤ ਨਾਹ ਦਇਆਲੁ ਬਾਲਾ ਸਰਬ ਗੁਣ ਭਰਪੂਰਏ ॥
ਪਿਰ ਦੋਸੁ ਨਾਹੀ ਸੁਖਹ ਦਾਤੇ ਹਉ ਵਿਛੁੜੀ ਬੁਰਿਆਰੇ ॥
ਬਿਨਵੰਤਿ ਨਾਨਕ ਦਇਆ ਧਾਰਹੁ ਘਰਿ ਆਵਹੁ ਨਾਹ ਪਿਆਰੇ ॥੨॥
ਹਉ ਮਨੁ ਅਰਪੀ ਸਭੁ ਤਨੁ ਅਰਪੀ ਅਰਪੀ ਸਭਿ ਦੇਸਾ ॥
ਹਉ ਸਿਰੁ ਅਰਪੀ ਤਿਸੁ ਮੀਤ ਪਿਆਰੇ ਜੋ ਪ੍ਰਭ ਦੇਇ ਸਦੇਸਾ ॥
ਅਰਪਿਆ ਤ ਸੀਸੁ ਸੁਥਾਨਿ ਗੁਰ ਪਹਿ ਸੰਗਿ ਪ੍ਰਭੂ ਦਿਖਾਇਆ ॥
ਖਿਨ ਮਾਹਿ ਸਗਲਾ ਦੂਖੁ ਮਿਟਿਆ ਮਨਹੁ ਚਿੰਦਿਆ ਪਾਇਆ ॥
ਦਿਨੁ ਰੈਣਿ ਰਲੀਆ ਕਰੈ ਕਾਮਣਿ ਮਿਟੇ ਸਗਲ ਅੰਦੇਸਾ ॥
ਬਿਨਵੰਤਿ ਨਾਨਕੁ ਕੰਤੁ ਮਿਲਿਆ ਲੋੜਤੇ ਹਮ ਜੈਸਾ ॥੩॥
ਮੇਰੈ ਮਨਿ ਅਨਦੁ ਭਇਆ ਜੀਉ ਵਜੀ ਵਾਧਾਈ ॥
ਘਰਿ ਲਾਲੁ ਆਇਆ ਪਿਆਰਾ ਸਭ ਤਿਖਾ ਬੁਝਾਈ ॥
ਮਿਲਿਆ ਤ ਲਾਲੁ ਗੁਪਾਲੁ ਠਾਕੁਰੁ ਸਖੀ ਮੰਗਲੁ ਗਾਇਆ ॥
ਸਭ ਮੀਤ ਬੰਧਪ ਹਰਖੁ ਉਪਜਿਆ ਦੂਤ ਥਾਉ ਗਵਾਇਆ ॥
ਅਨਹਤ ਵਾਜੇ ਵਜਹਿ ਘਰ ਮਹਿ ਪਿਰ ਸੰਗਿ ਸੇਜ ਵਿਛਾਈ ॥
ਬਿਨਵੰਤਿ ਨਾਨਕੁ ਸਹਜਿ ਰਹੈ ਹਰਿ ਮਿਲਿਆ ਕੰਤੁ ਸੁਖਦਾਈ ॥੪॥੧॥
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਮੇਰੈ ਮਨਿ ਬੈਰਾਗੁ ਭਇਆ ਜੀਉ ਕਿਉ ਦੇਖਾ ਪ੍ਰਭ ਦਾਤੇ ॥
ਮੇਰੇ ਮੀਤ ਸਖਾ ਹਰਿ ਜੀਉ ਗੁਰ ਪੁਰਖ ਬਿਧਾਤੇ ॥
ਪੁਰਖੋ ਬਿਧਾਤਾ ਏਕੁ ਸ੍ਰੀਧਰੁ ਕਿਉ ਮਿਲਹ ਤੁਝੈ ਉਡੀਣੀਆ ॥
ਕਰ ਕਰਹਿ ਸੇਵਾ ਸੀਸੁ ਚਰਣੀ ਮਨਿ ਆਸ ਦਰਸ ਨਿਮਾਣੀਆ ॥
ਸਾਸਿ ਸਾਸਿ ਨ ਘੜੀ ਵਿਸਰੈ ਪਲੁ ਮੂਰਤੁ ਦਿਨੁ ਰਾਤੇ ॥
ਨਾਨਕ ਸਾਰਿੰਗ ਜਿਉ ਪਿਆਸੇ ਕਿਉ ਮਿਲੀਐ ਪ੍ਰਭ ਦਾਤੇ ॥੧॥
ਇਕ ਬਿਨਉ ਕਰਉ ਜੀਉ ਸੁਣਿ ਕੰਤ ਪਿਆਰੇ ॥
ਮੇਰਾ ਮਨੁ ਤਨੁ ਮੋਹਿ ਲੀਆ ਜੀਉ ਦੇਖਿ ਚਲਤ ਤੁਮਾਰੇ ॥
ਚਲਤਾ ਤੁਮਾਰੇ ਦੇਖਿ ਮੋਹੀ ਉਦਾਸ ਧਨ ਕਿਉ ਧੀਰਏ ॥
ਗੁਣਵੰਤ ਨਾਹ ਦਇਆਲੁ ਬਾਲਾ ਸਰਬ ਗੁਣ ਭਰਪੂਰਏ ॥
ਪਿਰ ਦੋਸੁ ਨਾਹੀ ਸੁਖਹ ਦਾਤੇ ਹਉ ਵਿਛੁੜੀ ਬੁਰਿਆਰੇ ॥
ਬਿਨਵੰਤਿ ਨਾਨਕ ਦਇਆ ਧਾਰਹੁ ਘਰਿ ਆਵਹੁ ਨਾਹ ਪਿਆਰੇ ॥੨॥
ਹਉ ਮਨੁ ਅਰਪੀ ਸਭੁ ਤਨੁ ਅਰਪੀ ਅਰਪੀ ਸਭਿ ਦੇਸਾ ॥
ਹਉ ਸਿਰੁ ਅਰਪੀ ਤਿਸੁ ਮੀਤ ਪਿਆਰੇ ਜੋ ਪ੍ਰਭ ਦੇਇ ਸਦੇਸਾ ॥
ਅਰਪਿਆ ਤ ਸੀਸੁ ਸੁਥਾਨਿ ਗੁਰ ਪਹਿ ਸੰਗਿ ਪ੍ਰਭੂ ਦਿਖਾਇਆ ॥
ਖਿਨ ਮਾਹਿ ਸਗਲਾ ਦੂਖੁ ਮਿਟਿਆ ਮਨਹੁ ਚਿੰਦਿਆ ਪਾਇਆ ॥
ਦਿਨੁ ਰੈਣਿ ਰਲੀਆ ਕਰੈ ਕਾਮਣਿ ਮਿਟੇ ਸਗਲ ਅੰਦੇਸਾ ॥
ਬਿਨਵੰਤਿ ਨਾਨਕੁ ਕੰਤੁ ਮਿਲਿਆ ਲੋੜਤੇ ਹਮ ਜੈਸਾ ॥੩॥
ਮੇਰੈ ਮਨਿ ਅਨਦੁ ਭਇਆ ਜੀਉ ਵਜੀ ਵਾਧਾਈ ॥
ਘਰਿ ਲਾਲੁ ਆਇਆ ਪਿਆਰਾ ਸਭ ਤਿਖਾ ਬੁਝਾਈ ॥
ਮਿਲਿਆ ਤ ਲਾਲੁ ਗੁਪਾਲੁ ਠਾਕੁਰੁ ਸਖੀ ਮੰਗਲੁ ਗਾਇਆ ॥
ਸਭ ਮੀਤ ਬੰਧਪ ਹਰਖੁ ਉਪਜਿਆ ਦੂਤ ਥਾਉ ਗਵਾਇਆ ॥
ਅਨਹਤ ਵਾਜੇ ਵਜਹਿ ਘਰ ਮਹਿ ਪਿਰ ਸੰਗਿ ਸੇਜ ਵਿਛਾਈ ॥
ਬਿਨਵੰਤਿ ਨਾਨਕੁ ਸਹਜਿ ਰਹੈ ਹਰਿ ਮਿਲਿਆ ਕੰਤੁ ਸੁਖਦਾਈ ॥੪॥੧॥
रागु गउड़ी छंत महला ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मेरै मनि बैरागु भइआ जीउ किउ देखा प्रभ दाते ॥
मेरे मीत सखा हरि जीउ गुर पुरख बिधाते ॥
पुरखो बिधाता एकु स्रीधरु किउ मिलह तुझै उडीणीआ ॥
कर करहि सेवा सीसु चरणी मनि आस दरस निमाणीआ ॥
सासि सासि न घड़ी विसरै पलु मूरतु दिनु राते ॥
नानक सारिंग जिउ पिआसे किउ मिलीऐ प्रभ दाते ॥१॥
इक बिनउ करउ जीउ सुणि कंत पिआरे ॥
मेरा मनु तनु मोहि लीआ जीउ देखि चलत तुमारे ॥
चलता तुमारे देखि मोही उदास धन किउ धीरए ॥
गुणवंत नाह दइआलु बाला सरब गुण भरपूरए ॥
पिर दोसु नाही सुखह दाते हउ विछुड़ी बुरिआरे ॥
बिनवंति नानक दइआ धारहु घरि आवहु नाह पिआरे ॥२॥
हउ मनु अरपी सभु तनु अरपी अरपी सभि देसा ॥
हउ सिरु अरपी तिसु मीत पिआरे जो प्रभ देइ सदेसा ॥
अरपिआ त सीसु सुथानि गुर पहि संगि प्रभू दिखाइआ ॥
खिन माहि सगला दूखु मिटिआ मनहु चिंदिआ पाइआ ॥
दिनु रैणि रलीआ करै कामणि मिटे सगल अंदेसा ॥
बिनवंति नानकु कंतु मिलिआ लोड़ते हम जैसा ॥३॥
मेरै मनि अनदु भइआ जीउ वजी वाधाई ॥
घरि लालु आइआ पिआरा सभ तिखा बुझाई ॥
मिलिआ त लालु गुपालु ठाकुरु सखी मंगलु गाइआ ॥
सभ मीत बंधप हरखु उपजिआ दूत थाउ गवाइआ ॥
अनहत वाजे वजहि घर महि पिर संगि सेज विछाई ॥
बिनवंति नानकु सहजि रहै हरि मिलिआ कंतु सुखदाई ॥४॥१॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मेरै मनि बैरागु भइआ जीउ किउ देखा प्रभ दाते ॥
मेरे मीत सखा हरि जीउ गुर पुरख बिधाते ॥
पुरखो बिधाता एकु स्रीधरु किउ मिलह तुझै उडीणीआ ॥
कर करहि सेवा सीसु चरणी मनि आस दरस निमाणीआ ॥
सासि सासि न घड़ी विसरै पलु मूरतु दिनु राते ॥
नानक सारिंग जिउ पिआसे किउ मिलीऐ प्रभ दाते ॥१॥
इक बिनउ करउ जीउ सुणि कंत पिआरे ॥
मेरा मनु तनु मोहि लीआ जीउ देखि चलत तुमारे ॥
चलता तुमारे देखि मोही उदास धन किउ धीरए ॥
गुणवंत नाह दइआलु बाला सरब गुण भरपूरए ॥
पिर दोसु नाही सुखह दाते हउ विछुड़ी बुरिआरे ॥
बिनवंति नानक दइआ धारहु घरि आवहु नाह पिआरे ॥२॥
हउ मनु अरपी सभु तनु अरपी अरपी सभि देसा ॥
हउ सिरु अरपी तिसु मीत पिआरे जो प्रभ देइ सदेसा ॥
अरपिआ त सीसु सुथानि गुर पहि संगि प्रभू दिखाइआ ॥
खिन माहि सगला दूखु मिटिआ मनहु चिंदिआ पाइआ ॥
दिनु रैणि रलीआ करै कामणि मिटे सगल अंदेसा ॥
बिनवंति नानकु कंतु मिलिआ लोड़ते हम जैसा ॥३॥
मेरै मनि अनदु भइआ जीउ वजी वाधाई ॥
घरि लालु आइआ पिआरा सभ तिखा बुझाई ॥
मिलिआ त लालु गुपालु ठाकुरु सखी मंगलु गाइआ ॥
सभ मीत बंधप हरखु उपजिआ दूत थाउ गवाइआ ॥
अनहत वाजे वजहि घर महि पिर संगि सेज विछाई ॥
बिनवंति नानकु सहजि रहै हरि मिलिआ कंतु सुखदाई ॥४॥१॥
हिन्दी अर्थ: रागु गउड़ी छंत महला ५ ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। (तेरे दर्शन के बिना) मेरे मन में व्याकुलता पैदा हो रही है। (बता) मैं तुझे कैसे देखूँ? हे मेरे दातार प्रभू !- हे मेरे मित्र ! हे मेरे साथी ! हे हरी ! हे सबसे बड़े ! हे सर्व व्यापक ! हे सृजनहार जीउ ! तू सर्व-व्यापक है। तू सबको पैदा करने वाला है। तू ही लक्ष्मी-पति है (तुझसे विछुड़ के) हम व्याकुल हो रही हैं। (बता) हम तुझे कैसे मिलें? (हे जिंदे ! जो जीव-सि्त्रयां) अहं त्याग के (अपने) हाथों से सेवा करती हैं। (अपना) सिर (गुरू के) चरणों में रखती हैं। और (अपने) मन में (प्रभू के) दर्शन की आस रखती हैं। उन्हें हरेक साँस के साथ (वह याद रहता है) उन्हें दिन रात (किसी भा समय) एक घड़ी भर। एक पल भर। एक महूरत भर वह प्रभू नहीं भूलता। हे नानक ! (कह,) हे दातार प्रभू ! (हम जीव तेरे बिना) प्यासे पपीहे की तरह (तड़प रहे) हैं। (बता) तुझे कैसे मिलें?। 1। हे प्यारे कंत जीउ ! सुन। मैं एक विनती करती हूँ। तेरे चमत्कार-तमाशे देख-देख के मैं ठॅगी गई हूँ। (तेरे चमत्कार-तमाशों ने) मेरा मन मोह लिया है मेरा तन (हरेक इंद्रिय) मोहे गए हैं। (पर अब ये) जीव-स्त्री (इन चमत्कार-तमाशों से) उदास हो गई है। (तेरे मिलाप के बिना इसे) धैर्य नहीं आ सकता। हे सब गुणों के मालिक पति-प्रभू ! तू दया का घर है। तू सदा जवान है। तू सारे गुणों से भरपूर है। हे सारे सुखों के दाते पति ! (तेरे में कोई) दोश नहीं। मैं मंद-कर्मण्य स्वयं ही तुझसे विछुड़ी हुई हूँ। हे नानक ! (कह,) हे प्यारे पति ! (ये जीव-स्त्री) विनती करती है। तू मेहर कर के इसके हृदय घर में आ बस। 2। जो मुझे प्रभू से मिलाप कराने वाला संदेशा दे। मैं उस मित्र-प्यारे को अपना मन भेट कर दूँ। अपना शरीर (हृदय) अर्पित कर दूँ। (ये) सारे देश (ज्ञानेंद्रियां) भेट कर दूँ। अपना सिर उसके हवाले कर दूँ। (जिस जीव-स्त्री ने) साध-संगति की बरकति से अपना सिर गुरू के हवाले कर दिया।गुरू ने उसे हृदय में बस रहा परमात्मा दिखला दिया; एक छिन में ही उस जीव-स्त्री का सारा ही (प्रभू से विछोड़े का) दुख दूर हो गया। (क्योंकि) उसे मन की मुराद मिल गई। वह जीव-स्त्री (प्रभू चरणों में जुड़ के) दिन रात आत्मिक आनंद पाती है। उसके सारे चिंता-फिक्र मिट जाते हैं। नानक विनती करता है, (जो जीव-स्त्री साध-संगति का आसरा ले के अपने आप को गुरू के हवाले करती है उसे) पति प्रभू मिल जाता है और वह पति प्रभू ऐसा है। जैसा हम सारे जीव (सदा) ढूँढते रहते हैं। (वही है जिससे हम सारे मिलने की चाहत रखते हैं)। 3। मेरे मन में (अब) चाव बना रहता है। मेरे अंदर वह आत्मिक हालत प्रबल बनी हुई है कि मेरा दिल हुलारे ले रहा है। हे सहेलियो ! (जब का) मेरे हृदय घर में सुंदर प्यारा प्रभू पति आ बसा है। मेरी सारी (माया की) तृष्णा मिट गई है। (जबसे) सोहणा प्यारा ठाकुर गोपाल मुझे मिला है। मेरी सहेलियों ने (मेरे ज्ञानेंद्रियों ने) खुशी के गीत गाना शुरू कर दिए हैं। मेरे इन मित्रों-संबन्धियों को (मेरी ज्ञानेंद्रियों को) चाव चढ़ा रहता है और (मेरे अंदर से) कामादिक वैरियों का नाम-निशान मिट गया है। मैंने प्रभू पति के साथ सेज बिछा ली है। (मैंने अपने दिल को प्रभू की याद के साथ जोड़ दिया है)। अब मेरे हृय में बिन बजाए बाजे बज रहे हैं (मेरे हृदय में लगातारवह उल्लास बना रहता है जो बजते बाजों को सुन के अनुभव करते हैं। ) नानक विनती करता है, जिस जीव-स्त्री को सारे सुखों का दाता प्रभू पति मिल जाता है। वह आत्मिक अडोलता में टिकी रहती है। 4। 1।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 247 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
सर्दी के पहले हफ़्ते का पहला rajai का आना, और मन का बदलना।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 34 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 247” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 248 →, पीछे का: ← अंग 246।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।