अंग
179
राग Gauree
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਮਨ ਮੇਰੇ ਗਹੁ ਹਰਿ ਨਾਮ ਕਾ ਓਲਾ ॥
ਤੁਝੈ ਨ ਲਾਗੈ ਤਾਤਾ ਝੋਲਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜਿਉ ਬੋਹਿਥੁ ਭੈ ਸਾਗਰ ਮਾਹਿ ॥
ਅੰਧਕਾਰ ਦੀਪਕ ਦੀਪਾਹਿ ॥
ਅਗਨਿ ਸੀਤ ਕਾ ਲਾਹਸਿ ਦੂਖ ॥
ਨਾਮੁ ਜਪਤ ਮਨਿ ਹੋਵਤ ਸੂਖ ॥੨॥
ਉਤਰਿ ਜਾਇ ਤੇਰੇ ਮਨ ਕੀ ਪਿਆਸ ॥
ਪੂਰਨ ਹੋਵੈ ਸਗਲੀ ਆਸ ॥
ਡੋਲੈ ਨਾਹੀ ਤੁਮਰਾ ਚੀਤੁ ॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਨਾਮੁ ਜਪਿ ਗੁਰਮੁਖਿ ਮੀਤ ॥੩॥
ਨਾਮੁ ਅਉਖਧੁ ਸੋਈ ਜਨੁ ਪਾਵੈ ॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਜਿਸੁ ਆਪਿ ਦਿਵਾਵੈ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਜਾ ਕੈ ਹਿਰਦੈ ਵਸੈ ॥
ਦੂਖੁ ਦਰਦੁ ਤਿਹ ਨਾਨਕ ਨਸੈ ॥੪॥੧੦॥੭੯॥
ਤੁਝੈ ਨ ਲਾਗੈ ਤਾਤਾ ਝੋਲਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜਿਉ ਬੋਹਿਥੁ ਭੈ ਸਾਗਰ ਮਾਹਿ ॥
ਅੰਧਕਾਰ ਦੀਪਕ ਦੀਪਾਹਿ ॥
ਅਗਨਿ ਸੀਤ ਕਾ ਲਾਹਸਿ ਦੂਖ ॥
ਨਾਮੁ ਜਪਤ ਮਨਿ ਹੋਵਤ ਸੂਖ ॥੨॥
ਉਤਰਿ ਜਾਇ ਤੇਰੇ ਮਨ ਕੀ ਪਿਆਸ ॥
ਪੂਰਨ ਹੋਵੈ ਸਗਲੀ ਆਸ ॥
ਡੋਲੈ ਨਾਹੀ ਤੁਮਰਾ ਚੀਤੁ ॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਨਾਮੁ ਜਪਿ ਗੁਰਮੁਖਿ ਮੀਤ ॥੩॥
ਨਾਮੁ ਅਉਖਧੁ ਸੋਈ ਜਨੁ ਪਾਵੈ ॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਜਿਸੁ ਆਪਿ ਦਿਵਾਵੈ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਜਾ ਕੈ ਹਿਰਦੈ ਵਸੈ ॥
ਦੂਖੁ ਦਰਦੁ ਤਿਹ ਨਾਨਕ ਨਸੈ ॥੪॥੧੦॥੭੯॥
मन मेरे गहु हरि नाम का ओला ॥
तुझै न लागै ताता झोला ॥१॥ रहाउ ॥
जिउ बोहिथु भै सागर माहि ॥
अंधकार दीपक दीपाहि ॥
अगनि सीत का लाहसि दूख ॥
नामु जपत मनि होवत सूख ॥२॥
उतरि जाइ तेरे मन की पिआस ॥
पूरन होवै सगली आस ॥
डोलै नाही तुमरा चीतु ॥
अंम्रित नामु जपि गुरमुखि मीत ॥३॥
नामु अउखधु सोई जनु पावै ॥
करि किरपा जिसु आपि दिवावै ॥
हरि हरि नामु जा कै हिरदै वसै ॥
दूखु दरदु तिह नानक नसै ॥४॥१०॥७९॥
तुझै न लागै ताता झोला ॥१॥ रहाउ ॥
जिउ बोहिथु भै सागर माहि ॥
अंधकार दीपक दीपाहि ॥
अगनि सीत का लाहसि दूख ॥
नामु जपत मनि होवत सूख ॥२॥
उतरि जाइ तेरे मन की पिआस ॥
पूरन होवै सगली आस ॥
डोलै नाही तुमरा चीतु ॥
अंम्रित नामु जपि गुरमुखि मीत ॥३॥
नामु अउखधु सोई जनु पावै ॥
करि किरपा जिसु आपि दिवावै ॥
हरि हरि नामु जा कै हिरदै वसै ॥
दूखु दरदु तिह नानक नसै ॥४॥१०॥७९॥
हिन्दी अर्थ: हे मेरे मन ! परमात्मा के नाम का आसरा ले~ तुझे (दुनिया के दुख-कलेशों की) गर्म हवा का झोका छू नहीं सकेगा। 1। रहाउ। (हे भाई !) जैसे डरावने समुंद्र में जहाज (मनुष्य को डूबने से बचाता है~ जैसे अंधेरे में दीपक प्रकाश करता है और ठोकर खाने से बचाता है)~ जैसे~ आग ठंड-पाले का दुख दूर कर देती है~ ऐसे ही परमात्मा का नाम सिमरने से मन में आनंद पैदा होता है। 2। (जप की बरकति से) तेरे मन की (माया की) तृष्णा उतर जाएगी। तेरी ही आस पूरी हो जाएगी (दुनियावी आशाएं सताने से हट जाएंगी)~ और तेरा मन (माया की लालसा में) डोलेगा नहीं हे मित्र ! गुरू की शरण पड़ कर आत्मिक जीवन देने वाला हरी नाम जप । 3। (पर यह) हरी-नाम की दवा वही मनुष्य हासिल करता है जिसको प्रभू मेहर करके खुद (गुरू से) दिलवाता है। जिस मनुष्य के हृदय में परमात्मा का नाम बस जाता है हे नानक !~ उसका सारा दुख-दर्द दूर हो जाता है। 4। 10। 79।
ਗਉੜੀ ਗੁਆਰੇਰੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਬਹੁਤੁ ਦਰਬੁ ਕਰਿ ਮਨੁ ਨ ਅਘਾਨਾ ॥
ਅਨਿਕ ਰੂਪ ਦੇਖਿ ਨਹ ਪਤੀਆਨਾ ॥
ਪੁਤ੍ਰ ਕਲਤ੍ਰ ਉਰਝਿਓ ਜਾਨਿ ਮੇਰੀ ॥
ਓਹ ਬਿਨਸੈ ਓਇ ਭਸਮੈ ਢੇਰੀ ॥੧॥
ਬਿਨੁ ਹਰਿ ਭਜਨ ਦੇਖਉ ਬਿਲਲਾਤੇ ॥
ਧ੍ਰਿਗੁ ਤਨੁ ਧ੍ਰਿਗੁ ਧਨੁ ਮਾਇਆ ਸੰਗਿ ਰਾਤੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜਿਉ ਬਿਗਾਰੀ ਕੈ ਸਿਰਿ ਦੀਜਹਿ ਦਾਮ ॥
ਓਇ ਖਸਮੈ ਕੈ ਗ੍ਰਿਹਿ ਉਨ ਦੂਖ ਸਹਾਮ ॥
ਜਿਉ ਸੁਪਨੈ ਹੋਇ ਬੈਸਤ ਰਾਜਾ ॥
ਨੇਤ੍ਰ ਪਸਾਰੈ ਤਾ ਨਿਰਾਰਥ ਕਾਜਾ ॥੨॥
ਜਿਉ ਰਾਖਾ ਖੇਤ ਊਪਰਿ ਪਰਾਏ ॥
ਖੇਤੁ ਖਸਮ ਕਾ ਰਾਖਾ ਉਠਿ ਜਾਏ ॥
ਉਸੁ ਖੇਤ ਕਾਰਣਿ ਰਾਖਾ ਕੜੈ ॥
ਤਿਸ ਕੈ ਪਾਲੈ ਕਛੂ ਨ ਪੜੈ ॥੩॥
ਜਿਸ ਕਾ ਰਾਜੁ ਤਿਸੈ ਕਾ ਸੁਪਨਾ ॥
ਜਿਨਿ ਮਾਇਆ ਦੀਨੀ ਤਿਨਿ ਲਾਈ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ॥
ਆਪਿ ਬਿਨਾਹੇ ਆਪਿ ਕਰੇ ਰਾਸਿ ॥
ਨਾਨਕ ਪ੍ਰਭ ਆਗੈ ਅਰਦਾਸਿ ॥੪॥੧੧॥੮੦॥
ਬਹੁਤੁ ਦਰਬੁ ਕਰਿ ਮਨੁ ਨ ਅਘਾਨਾ ॥
ਅਨਿਕ ਰੂਪ ਦੇਖਿ ਨਹ ਪਤੀਆਨਾ ॥
ਪੁਤ੍ਰ ਕਲਤ੍ਰ ਉਰਝਿਓ ਜਾਨਿ ਮੇਰੀ ॥
ਓਹ ਬਿਨਸੈ ਓਇ ਭਸਮੈ ਢੇਰੀ ॥੧॥
ਬਿਨੁ ਹਰਿ ਭਜਨ ਦੇਖਉ ਬਿਲਲਾਤੇ ॥
ਧ੍ਰਿਗੁ ਤਨੁ ਧ੍ਰਿਗੁ ਧਨੁ ਮਾਇਆ ਸੰਗਿ ਰਾਤੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜਿਉ ਬਿਗਾਰੀ ਕੈ ਸਿਰਿ ਦੀਜਹਿ ਦਾਮ ॥
ਓਇ ਖਸਮੈ ਕੈ ਗ੍ਰਿਹਿ ਉਨ ਦੂਖ ਸਹਾਮ ॥
ਜਿਉ ਸੁਪਨੈ ਹੋਇ ਬੈਸਤ ਰਾਜਾ ॥
ਨੇਤ੍ਰ ਪਸਾਰੈ ਤਾ ਨਿਰਾਰਥ ਕਾਜਾ ॥੨॥
ਜਿਉ ਰਾਖਾ ਖੇਤ ਊਪਰਿ ਪਰਾਏ ॥
ਖੇਤੁ ਖਸਮ ਕਾ ਰਾਖਾ ਉਠਿ ਜਾਏ ॥
ਉਸੁ ਖੇਤ ਕਾਰਣਿ ਰਾਖਾ ਕੜੈ ॥
ਤਿਸ ਕੈ ਪਾਲੈ ਕਛੂ ਨ ਪੜੈ ॥੩॥
ਜਿਸ ਕਾ ਰਾਜੁ ਤਿਸੈ ਕਾ ਸੁਪਨਾ ॥
ਜਿਨਿ ਮਾਇਆ ਦੀਨੀ ਤਿਨਿ ਲਾਈ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ॥
ਆਪਿ ਬਿਨਾਹੇ ਆਪਿ ਕਰੇ ਰਾਸਿ ॥
ਨਾਨਕ ਪ੍ਰਭ ਆਗੈ ਅਰਦਾਸਿ ॥੪॥੧੧॥੮੦॥
गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥
बहुतु दरबु करि मनु न अघाना ॥
अनिक रूप देखि नह पतीआना ॥
पुत्र कलत्र उरझिओ जानि मेरी ॥
ओह बिनसै ओइ भसमै ढेरी ॥१॥
बिनु हरि भजन देखउ बिललाते ॥
ध्रिगु तनु ध्रिगु धनु माइआ संगि राते ॥१॥ रहाउ ॥
जिउ बिगारी कै सिरि दीजहि दाम ॥
ओइ खसमै कै ग्रिहि उन दूख सहाम ॥
जिउ सुपनै होइ बैसत राजा ॥
नेत्र पसारै ता निरारथ काजा ॥२॥
जिउ राखा खेत ऊपरि पराए ॥
खेतु खसम का राखा उठि जाए ॥
उसु खेत कारणि राखा कड़ै ॥
तिस कै पालै कछू न पड़ै ॥३॥
जिस का राजु तिसै का सुपना ॥
जिनि माइआ दीनी तिनि लाई त्रिसना ॥
आपि बिनाहे आपि करे रासि ॥
नानक प्रभ आगै अरदासि ॥४॥११॥८०॥
बहुतु दरबु करि मनु न अघाना ॥
अनिक रूप देखि नह पतीआना ॥
पुत्र कलत्र उरझिओ जानि मेरी ॥
ओह बिनसै ओइ भसमै ढेरी ॥१॥
बिनु हरि भजन देखउ बिललाते ॥
ध्रिगु तनु ध्रिगु धनु माइआ संगि राते ॥१॥ रहाउ ॥
जिउ बिगारी कै सिरि दीजहि दाम ॥
ओइ खसमै कै ग्रिहि उन दूख सहाम ॥
जिउ सुपनै होइ बैसत राजा ॥
नेत्र पसारै ता निरारथ काजा ॥२॥
जिउ राखा खेत ऊपरि पराए ॥
खेतु खसम का राखा उठि जाए ॥
उसु खेत कारणि राखा कड़ै ॥
तिस कै पालै कछू न पड़ै ॥३॥
जिस का राजु तिसै का सुपना ॥
जिनि माइआ दीनी तिनि लाई त्रिसना ॥
आपि बिनाहे आपि करे रासि ॥
नानक प्रभ आगै अरदासि ॥४॥११॥८०॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥ बहुत धन जोड़ के भी मन भरता नहीं~ अनेकों (सुंदर सि्त्रयों के) रूप देख के भी मन की तसल्ली नहीं होती। मनुष्य~ ये समझ के कि ये मेरी स्त्री है ये मेरा पुत्र है~ माया के मोह में फंसा रहता है। (सि्त्रयों का) सौंदर्य नाश हो जाता है~ (वह अपने निहित) स्त्री-पुत्र राख की ढेरी हो जाते हैं (किसी के साथ भी साथ नहीं निभता)। 1। मैं देखता हूँ कि परमात्मा के भजन के बिना जीव बिलखते हैं। जो मनुष्य माया के मोह में व्यस्त रहते हैं उनका शरीर धिक्कारयोग्य है। 1। रहाउ। जैसे किसी बगार करने वाले (भार उठाने वाले) के सिर पर पैसे-रुपए रखे जाएं~ वह पैसे-रुपए मालिक के घर में जा पहुँचते हैं~ उस बिगारी ने (भार उठाने का) दुख ही सहा होता है। जैसे कोई मनुष्य सपने में राजा बन बैठता है (पर नींद खत्म होने पर जब) आँखें खोलता है तो (सुपनें में मिले राज की सारी सच्चाई) ध्वस्त हो जाती है। 2। जैसे कोई रक्षक किसी और के खेत की (रखवाली करता है)~ (फसल पकने पर) फसल मालिक की मल्कियत हो जाती है और रखवाले का काम खत्म हो जाता है। रखवाला उस (पराए) खेत की (रखवाली की) खातिर दुखी होता रहता है~ पर उसे (आखिर) कुछ भी नहीं मिलता। 3। (पर जीव के भी क्या वश? सुपने में) जिस प्रभू का (दिया हुआ) राज मिलता है~ उसी का दिया हुआ सपना भी होता है। जिस प्रभू ने मनुष्य को माया दी है~ उसी ने माया की तृष्णा भी चिपकाई हुई है। हे नानक ! प्रभू खुद ही (तृष्णा चिपका के) आत्मिक मौत देता है~ खुद ही (अपने नाम की दाति दे के) मानस जीवन का मनोरथ सफल करता है। प्रभू के दर पर ही (सदा नाम की दाति के वास्ते) अरदास करनी चाहिए। 4। 11। 80।
ਗਉੜੀ ਗੁਆਰੇਰੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਬਹੁ ਰੰਗ ਮਾਇਆ ਬਹੁ ਬਿਧਿ ਪੇਖੀ ॥
ਕਲਮ ਕਾਗਦ ਸਿਆਨਪ ਲੇਖੀ ॥
ਮਹਰ ਮਲੂਕ ਹੋਇ ਦੇਖਿਆ ਖਾਨ ॥
ਤਾ ਤੇ ਨਾਹੀ ਮਨੁ ਤ੍ਰਿਪਤਾਨ ॥੧॥
ਸੋ ਸੁਖੁ ਮੋ ਕਉ ਸੰਤ ਬਤਾਵਹੁ ॥
ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਬੂਝੈ ਮਨੁ ਤ੍ਰਿਪਤਾਵਹੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਅਸੁ ਪਵਨ ਹਸਤਿ ਅਸਵਾਰੀ ॥
ਚੋਆ ਚੰਦਨੁ ਸੇਜ ਸੁੰਦਰਿ ਨਾਰੀ ॥
ਨਟ ਨਾਟਿਕ ਆਖਾਰੇ ਗਾਇਆ ॥
ਤਾ ਮਹਿ ਮਨਿ ਸੰਤੋਖੁ ਨ ਪਾਇਆ ॥੨॥
ਤਖਤੁ ਸਭਾ ਮੰਡਨ ਦੋਲੀਚੇ ॥
ਸਗਲ ਮੇਵੇ ਸੁੰਦਰ ਬਾਗੀਚੇ ॥
ਆਖੇੜ ਬਿਰਤਿ ਰਾਜਨ ਕੀ ਲੀਲਾ ॥
ਮਨੁ ਨ ਸੁਹੇਲਾ ਪਰਪੰਚੁ ਹੀਲਾ ॥੩॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਸੰਤਨ ਸਚੁ ਕਹਿਆ ॥
ਸਰਬ ਸੂਖ ਇਹੁ ਆਨੰਦੁ ਲਹਿਆ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਹਰਿ ਕੀਰਤਨੁ ਗਾਈਐ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਵਡਭਾਗੀ ਪਾਈਐ ॥੪॥
ਜਾ ਕੈ ਹਰਿ ਧਨੁ ਸੋਈ ਸੁਹੇਲਾ ॥
ਪ੍ਰਭ ਕਿਰਪਾ ਤੇ ਸਾਧਸੰਗਿ ਮੇਲਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ਦੂਜਾ ॥੧੨॥੮੧॥
ਬਹੁ ਰੰਗ ਮਾਇਆ ਬਹੁ ਬਿਧਿ ਪੇਖੀ ॥
ਕਲਮ ਕਾਗਦ ਸਿਆਨਪ ਲੇਖੀ ॥
ਮਹਰ ਮਲੂਕ ਹੋਇ ਦੇਖਿਆ ਖਾਨ ॥
ਤਾ ਤੇ ਨਾਹੀ ਮਨੁ ਤ੍ਰਿਪਤਾਨ ॥੧॥
ਸੋ ਸੁਖੁ ਮੋ ਕਉ ਸੰਤ ਬਤਾਵਹੁ ॥
ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਬੂਝੈ ਮਨੁ ਤ੍ਰਿਪਤਾਵਹੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਅਸੁ ਪਵਨ ਹਸਤਿ ਅਸਵਾਰੀ ॥
ਚੋਆ ਚੰਦਨੁ ਸੇਜ ਸੁੰਦਰਿ ਨਾਰੀ ॥
ਨਟ ਨਾਟਿਕ ਆਖਾਰੇ ਗਾਇਆ ॥
ਤਾ ਮਹਿ ਮਨਿ ਸੰਤੋਖੁ ਨ ਪਾਇਆ ॥੨॥
ਤਖਤੁ ਸਭਾ ਮੰਡਨ ਦੋਲੀਚੇ ॥
ਸਗਲ ਮੇਵੇ ਸੁੰਦਰ ਬਾਗੀਚੇ ॥
ਆਖੇੜ ਬਿਰਤਿ ਰਾਜਨ ਕੀ ਲੀਲਾ ॥
ਮਨੁ ਨ ਸੁਹੇਲਾ ਪਰਪੰਚੁ ਹੀਲਾ ॥੩॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਸੰਤਨ ਸਚੁ ਕਹਿਆ ॥
ਸਰਬ ਸੂਖ ਇਹੁ ਆਨੰਦੁ ਲਹਿਆ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਹਰਿ ਕੀਰਤਨੁ ਗਾਈਐ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਵਡਭਾਗੀ ਪਾਈਐ ॥੪॥
ਜਾ ਕੈ ਹਰਿ ਧਨੁ ਸੋਈ ਸੁਹੇਲਾ ॥
ਪ੍ਰਭ ਕਿਰਪਾ ਤੇ ਸਾਧਸੰਗਿ ਮੇਲਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ਦੂਜਾ ॥੧੨॥੮੧॥
गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥
बहु रंग माइआ बहु बिधि पेखी ॥
कलम कागद सिआनप लेखी ॥
महर मलूक होइ देखिआ खान ॥
ता ते नाही मनु त्रिपतान ॥१॥
सो सुखु मो कउ संत बतावहु ॥
त्रिसना बूझै मनु त्रिपतावहु ॥१॥ रहाउ ॥
असु पवन हसति असवारी ॥
चोआ चंदनु सेज सुंदरि नारी ॥
नट नाटिक आखारे गाइआ ॥
ता महि मनि संतोखु न पाइआ ॥२॥
तखतु सभा मंडन दोलीचे ॥
सगल मेवे सुंदर बागीचे ॥
आखेड़ बिरति राजन की लीला ॥
मनु न सुहेला परपंचु हीला ॥३॥
करि किरपा संतन सचु कहिआ ॥
सरब सूख इहु आनंदु लहिआ ॥
साधसंगि हरि कीरतनु गाईऐ ॥
कहु नानक वडभागी पाईऐ ॥४॥
जा कै हरि धनु सोई सुहेला ॥
प्रभ किरपा ते साधसंगि मेला ॥१॥ रहाउ दूजा ॥१२॥८१॥
बहु रंग माइआ बहु बिधि पेखी ॥
कलम कागद सिआनप लेखी ॥
महर मलूक होइ देखिआ खान ॥
ता ते नाही मनु त्रिपतान ॥१॥
सो सुखु मो कउ संत बतावहु ॥
त्रिसना बूझै मनु त्रिपतावहु ॥१॥ रहाउ ॥
असु पवन हसति असवारी ॥
चोआ चंदनु सेज सुंदरि नारी ॥
नट नाटिक आखारे गाइआ ॥
ता महि मनि संतोखु न पाइआ ॥२॥
तखतु सभा मंडन दोलीचे ॥
सगल मेवे सुंदर बागीचे ॥
आखेड़ बिरति राजन की लीला ॥
मनु न सुहेला परपंचु हीला ॥३॥
करि किरपा संतन सचु कहिआ ॥
सरब सूख इहु आनंदु लहिआ ॥
साधसंगि हरि कीरतनु गाईऐ ॥
कहु नानक वडभागी पाईऐ ॥४॥
जा कै हरि धनु सोई सुहेला ॥
प्रभ किरपा ते साधसंगि मेला ॥१॥ रहाउ दूजा ॥१२॥८१॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥ मैंने बहु-रंगी माया कई ढंग-तरीकों से मोहती देखी है। कागज कलम (ले कर कईयों ने) अनेकों विद्वता वाले लेख लिखे हैं (माया उन्हें विद्वता के रूप में मोह रही है)। (कईयों ने) चौधरी खान-सुल्तान बन के देख लिया है। इनसे (किसी का) मन तृप्त नहीं हो सका। 1। हे संत जनों ! मुझे वह आत्मिक आनंद बताओ (जिससे मेरी माया की) तृष्णा मिट जाए। हे संत जनों ! मेरे मन को संतोखी बना दो। 1। रहाउ। हाथियों की और हवा जैसे तेज घोड़ों की सवारी (कईयों ने कर के देखी है)~ इत्र और चंदन (इस्तेमाल करके देखा है)~ सुंदर स्त्री की सेज (ले के देखी) है~ मैंने रंग भूमि में नटों के नाटक देखे हैं~ और उनके गीत गाए हुए सुने हैं। इनमें व्यस्त हो के भी (किसी के) मन ने शांति प्राप्त नहीं की। 2। राज-दरबार की सजावटें~ तख्त (ऊपर बैठना)~ दुलीचे~ सब किस्म के फल~ सुंदर फुलवाड़ियां~ शिकार खेलने वाली रुची~ राजाओं की खेलें (इन सब से भी) मन सुखी नहीं होता। ये सारा यत्न छल ही साबत होता है। 3। (दुनिआ के रंग तमाशों में से सुख तलाशते को) संतों ने मेहर करके सच बताया कि (सिर्फ इसी उद्यम से ही) सारे सुखों का मूल ये आत्मिक आनंद मिलता है की साध-संगति में परमात्मा की सिफत सालाह के गीत गाने चाहिए। हे नानक ! कह, सिफत सालाह की ये दाति बड़े भाग्यों से मिलती है। 4। जिस मनुष्य के हृदय में परमात्मा का नाम धन मौजूद है वही आसान है। साध-संगति में मिल बैठना परमात्मा की कृपा से ही नसीब होता है। 1। रहाउ दूजा।
ਗਉੜੀ ਗੁਆਰੇਰੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 179 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
दिल्ली के Sunday-morning के bhajan-मण्डली, घर में dadiji सुन रहीं।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 55 पंक्तियों का है, 4 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 179” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 180 →, पीछे का: ← अंग 178।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।