अंग
250
राग Gauree
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਗਉੜੀ ਬਾਵਨ ਅਖਰੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਸਲੋਕੁ ॥
ਗੁਰਦੇਵ ਮਾਤਾ ਗੁਰਦੇਵ ਪਿਤਾ ਗੁਰਦੇਵ ਸੁਆਮੀ ਪਰਮੇਸੁਰਾ ॥
ਗੁਰਦੇਵ ਸਖਾ ਅਗਿਆਨ ਭੰਜਨੁ ਗੁਰਦੇਵ ਬੰਧਿਪ ਸਹੋਦਰਾ ॥
ਗੁਰਦੇਵ ਦਾਤਾ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਉਪਦੇਸੈ ਗੁਰਦੇਵ ਮੰਤੁ ਨਿਰੋਧਰਾ ॥
ਗੁਰਦੇਵ ਸਾਂਤਿ ਸਤਿ ਬੁਧਿ ਮੂਰਤਿ ਗੁਰਦੇਵ ਪਾਰਸ ਪਰਸ ਪਰਾ ॥
ਗੁਰਦੇਵ ਤੀਰਥੁ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਸਰੋਵਰੁ ਗੁਰ ਗਿਆਨ ਮਜਨੁ ਅਪਰੰਪਰਾ ॥
ਗੁਰਦੇਵ ਕਰਤਾ ਸਭਿ ਪਾਪ ਹਰਤਾ ਗੁਰਦੇਵ ਪਤਿਤ ਪਵਿਤ ਕਰਾ ॥
ਗੁਰਦੇਵ ਆਦਿ ਜੁਗਾਦਿ ਜੁਗੁ ਜੁਗੁ ਗੁਰਦੇਵ ਮੰਤੁ ਹਰਿ ਜਪਿ ਉਧਰਾ ॥
ਗੁਰਦੇਵ ਸੰਗਤਿ ਪ੍ਰਭ ਮੇਲਿ ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਹਮ ਮੂੜ ਪਾਪੀ ਜਿਤੁ ਲਗਿ ਤਰਾ ॥
ਗੁਰਦੇਵ ਸਤਿਗੁਰੁ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਪਰਮੇਸਰੁ ਗੁਰਦੇਵ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਨਮਸਕਰਾ ॥੧॥
ਗਉੜੀ ਬਾਵਨ ਅਖਰੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਸਲੋਕੁ ॥
ਗੁਰਦੇਵ ਮਾਤਾ ਗੁਰਦੇਵ ਪਿਤਾ ਗੁਰਦੇਵ ਸੁਆਮੀ ਪਰਮੇਸੁਰਾ ॥
ਗੁਰਦੇਵ ਸਖਾ ਅਗਿਆਨ ਭੰਜਨੁ ਗੁਰਦੇਵ ਬੰਧਿਪ ਸਹੋਦਰਾ ॥
ਗੁਰਦੇਵ ਦਾਤਾ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਉਪਦੇਸੈ ਗੁਰਦੇਵ ਮੰਤੁ ਨਿਰੋਧਰਾ ॥
ਗੁਰਦੇਵ ਸਾਂਤਿ ਸਤਿ ਬੁਧਿ ਮੂਰਤਿ ਗੁਰਦੇਵ ਪਾਰਸ ਪਰਸ ਪਰਾ ॥
ਗੁਰਦੇਵ ਤੀਰਥੁ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਸਰੋਵਰੁ ਗੁਰ ਗਿਆਨ ਮਜਨੁ ਅਪਰੰਪਰਾ ॥
ਗੁਰਦੇਵ ਕਰਤਾ ਸਭਿ ਪਾਪ ਹਰਤਾ ਗੁਰਦੇਵ ਪਤਿਤ ਪਵਿਤ ਕਰਾ ॥
ਗੁਰਦੇਵ ਆਦਿ ਜੁਗਾਦਿ ਜੁਗੁ ਜੁਗੁ ਗੁਰਦੇਵ ਮੰਤੁ ਹਰਿ ਜਪਿ ਉਧਰਾ ॥
ਗੁਰਦੇਵ ਸੰਗਤਿ ਪ੍ਰਭ ਮੇਲਿ ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਹਮ ਮੂੜ ਪਾਪੀ ਜਿਤੁ ਲਗਿ ਤਰਾ ॥
ਗੁਰਦੇਵ ਸਤਿਗੁਰੁ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਪਰਮੇਸਰੁ ਗੁਰਦੇਵ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਨਮਸਕਰਾ ॥੧॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
गउड़ी बावन अखरी महला ५ ॥
सलोकु ॥
गुरदेव माता गुरदेव पिता गुरदेव सुआमी परमेसुरा ॥
गुरदेव सखा अगिआन भंजनु गुरदेव बंधिप सहोदरा ॥
गुरदेव दाता हरि नामु उपदेसै गुरदेव मंतु निरोधरा ॥
गुरदेव सांति सति बुधि मूरति गुरदेव पारस परस परा ॥
गुरदेव तीरथु अंम्रित सरोवरु गुर गिआन मजनु अपरंपरा ॥
गुरदेव करता सभि पाप हरता गुरदेव पतित पवित करा ॥
गुरदेव आदि जुगादि जुगु जुगु गुरदेव मंतु हरि जपि उधरा ॥
गुरदेव संगति प्रभ मेलि करि किरपा हम मूड़ पापी जितु लगि तरा ॥
गुरदेव सतिगुरु पारब्रहमु परमेसरु गुरदेव नानक हरि नमसकरा ॥१॥
गउड़ी बावन अखरी महला ५ ॥
सलोकु ॥
गुरदेव माता गुरदेव पिता गुरदेव सुआमी परमेसुरा ॥
गुरदेव सखा अगिआन भंजनु गुरदेव बंधिप सहोदरा ॥
गुरदेव दाता हरि नामु उपदेसै गुरदेव मंतु निरोधरा ॥
गुरदेव सांति सति बुधि मूरति गुरदेव पारस परस परा ॥
गुरदेव तीरथु अंम्रित सरोवरु गुर गिआन मजनु अपरंपरा ॥
गुरदेव करता सभि पाप हरता गुरदेव पतित पवित करा ॥
गुरदेव आदि जुगादि जुगु जुगु गुरदेव मंतु हरि जपि उधरा ॥
गुरदेव संगति प्रभ मेलि करि किरपा हम मूड़ पापी जितु लगि तरा ॥
गुरदेव सतिगुरु पारब्रहमु परमेसरु गुरदेव नानक हरि नमसकरा ॥१॥
हिन्दी अर्थ: ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। गउड़ी बावन अखरी महला ५ ॥ श्लोक॥ गुरू ही मां है। गुरू ही पिता है (गुरू ही आत्मिक जन्म देने वाला है)। गुरू मालिक प्रभू का रूप है। गुरू (माया के मोह का) अंधकार नाश करने वाला मित्र है। गुरू ही (तोड़ निभाने वाला) संबंधी व भाई है। गुरू (असली) दाता है जो प्रभू के नाम का उपदेश देता है। गुरू का उपदेश ऐसा है जिस का असर (कोई विकार आदि) गवा नहीं सकते। गुरू शांति सत्य और बुद्धि का स्वरूप है। गुरू एक ऐसा पारस है जिसकी छोह पारस की छोह से श्रेष्ठ है। गुरू (सच्चा) तीर्थ है। अमृत का सरोवर है। गुरू के ज्ञान (-जल) का स्नान (सारे तीर्थों के स्नानों से) बहुत श्रेष्ठ है। गुरू करतार का रूप है। सारे पापों को दूर करने वाला है। गुरू विकारी लोगों (के हृदय) को पवित्र करने वाला है। जब से जगत बना है गुरू शुरू से ही हरेक युग में (परमात्मा के नाम का उपदेश-दाता) है। गुरू का दिया हुआ हरि-नाम मंत्र जप के (संसार-समुंद्र के विकारों की लहरों से) पार लांघ जाते हैं। हे प्रभू ! मेहर कर। हमें गुरू की संगति दे। ता कि हम मूर्ख पापी उसकी संगति में (रह के) तर जाएं। गुरू परमेश्वर पारब्रहम् का रूप है। हे नानक ! हरी के रूप गुरू को (सदा) नमस्कार करनी चाहिए। 1।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਆਪਹਿ ਕੀਆ ਕਰਾਇਆ ਆਪਹਿ ਕਰਨੈ ਜੋਗੁ ॥
ਨਾਨਕ ਏਕੋ ਰਵਿ ਰਹਿਆ ਦੂਸਰ ਹੋਆ ਨ ਹੋਗੁ ॥੧॥
ਆਪਹਿ ਕੀਆ ਕਰਾਇਆ ਆਪਹਿ ਕਰਨੈ ਜੋਗੁ ॥
ਨਾਨਕ ਏਕੋ ਰਵਿ ਰਹਿਆ ਦੂਸਰ ਹੋਆ ਨ ਹੋਗੁ ॥੧॥
सलोकु ॥
आपहि कीआ कराइआ आपहि करनै जोगु ॥
नानक एको रवि रहिआ दूसर होआ न होगु ॥१॥
आपहि कीआ कराइआ आपहि करनै जोगु ॥
नानक एको रवि रहिआ दूसर होआ न होगु ॥१॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक ॥ सारी जगत रचना प्रभू ने खुद ही की है। स्वयं ही करने की स्मर्था वाला है। हे नानक ! वह आप ही सारे जगत में व्यापक है। उससे बिना कोई और दूसरा नहीं। 1।पउड़ी ॥
ਪਉੜੀ ॥
ਓਅੰ ਸਾਧ ਸਤਿਗੁਰ ਨਮਸਕਾਰੰ ॥
ਆਦਿ ਮਧਿ ਅੰਤਿ ਨਿਰੰਕਾਰੰ ॥
ਆਪਹਿ ਸੁੰਨ ਆਪਹਿ ਸੁਖ ਆਸਨ ॥
ਆਪਹਿ ਸੁਨਤ ਆਪ ਹੀ ਜਾਸਨ ॥
ਆਪਨ ਆਪੁ ਆਪਹਿ ਉਪਾਇਓ ॥
ਆਪਹਿ ਬਾਪ ਆਪ ਹੀ ਮਾਇਓ ॥
ਆਪਹਿ ਸੂਖਮ ਆਪਹਿ ਅਸਥੂਲਾ ॥
ਲਖੀ ਨ ਜਾਈ ਨਾਨਕ ਲੀਲਾ ॥੧॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਪ੍ਰਭ ਦੀਨ ਦਇਆਲਾ ॥
ਤੇਰੇ ਸੰਤਨ ਕੀ ਮਨੁ ਹੋਇ ਰਵਾਲਾ ॥ ਰਹਾਉ ॥
ਓਅੰ ਸਾਧ ਸਤਿਗੁਰ ਨਮਸਕਾਰੰ ॥
ਆਦਿ ਮਧਿ ਅੰਤਿ ਨਿਰੰਕਾਰੰ ॥
ਆਪਹਿ ਸੁੰਨ ਆਪਹਿ ਸੁਖ ਆਸਨ ॥
ਆਪਹਿ ਸੁਨਤ ਆਪ ਹੀ ਜਾਸਨ ॥
ਆਪਨ ਆਪੁ ਆਪਹਿ ਉਪਾਇਓ ॥
ਆਪਹਿ ਬਾਪ ਆਪ ਹੀ ਮਾਇਓ ॥
ਆਪਹਿ ਸੂਖਮ ਆਪਹਿ ਅਸਥੂਲਾ ॥
ਲਖੀ ਨ ਜਾਈ ਨਾਨਕ ਲੀਲਾ ॥੧॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਪ੍ਰਭ ਦੀਨ ਦਇਆਲਾ ॥
ਤੇਰੇ ਸੰਤਨ ਕੀ ਮਨੁ ਹੋਇ ਰਵਾਲਾ ॥ ਰਹਾਉ ॥
पउड़ी ॥
ओअं साध सतिगुर नमसकारं ॥
आदि मधि अंति निरंकारं ॥
आपहि सुंन आपहि सुख आसन ॥
आपहि सुनत आप ही जासन ॥
आपन आपु आपहि उपाइओ ॥
आपहि बाप आप ही माइओ ॥
आपहि सूखम आपहि असथूला ॥
लखी न जाई नानक लीला ॥१॥
करि किरपा प्रभ दीन दइआला ॥
तेरे संतन की मनु होइ रवाला ॥ रहाउ ॥
ओअं साध सतिगुर नमसकारं ॥
आदि मधि अंति निरंकारं ॥
आपहि सुंन आपहि सुख आसन ॥
आपहि सुनत आप ही जासन ॥
आपन आपु आपहि उपाइओ ॥
आपहि बाप आप ही माइओ ॥
आपहि सूखम आपहि असथूला ॥
लखी न जाई नानक लीला ॥१॥
करि किरपा प्रभ दीन दइआला ॥
तेरे संतन की मनु होइ रवाला ॥ रहाउ ॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ उस निरंकार को नमस्कार है जो स्वयं ही गुरू रूप धारण करता है। जो जगत के आरम्भ में भी स्वयं ही था। अब भी स्वयं ही है। जगत के अंत में भी स्वयं ही रहेगा। (जब जगत की हस्ती नहीं होती) निरा एकल-स्वरूप भी वह स्वयं ही होता है। स्वयं ही अपने सूक्ष्म-स्वरूप में टिका होता है। तब अपनी शोभा सुनने वाला भी स्वयं खुद ही होता है। अपने आप को दिखाई देते स्वरूप में लाने वाला भी स्वयं ही है। स्वयं ही (अपना) पिता है। स्वयं ही (अपनी) माँ है। अन-दिखते और दिखते स्वरूप वाला खुद ही है। हे नानक ! (परमात्मा की ये जगत-रचना वाला) खेल बयान नहीं किया जा सकता। 1। हे दीनों पर दया करने वाले प्रभू ! मेरे पर मेहर कर। मेरा मन तेरे संत जनों के चरणों की धूड़ बना रहे।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਨਿਰੰਕਾਰ ਆਕਾਰ ਆਪਿ ਨਿਰਗੁਨ ਸਰਗੁਨ ਏਕ ॥
ਏਕਹਿ ਏਕ ਬਖਾਨਨੋ ਨਾਨਕ ਏਕ ਅਨੇਕ ॥੧॥
ਨਿਰੰਕਾਰ ਆਕਾਰ ਆਪਿ ਨਿਰਗੁਨ ਸਰਗੁਨ ਏਕ ॥
ਏਕਹਿ ਏਕ ਬਖਾਨਨੋ ਨਾਨਕ ਏਕ ਅਨੇਕ ॥੧॥
सलोकु ॥
निरंकार आकार आपि निरगुन सरगुन एक ॥
एकहि एक बखाननो नानक एक अनेक ॥१॥
निरंकार आकार आपि निरगुन सरगुन एक ॥
एकहि एक बखाननो नानक एक अनेक ॥१॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक। आकार-रहित परमात्मा स्वयं ही (जगत-) अकार बनाता है। वह स्वयं ही (निरंकार रूप में) माया के तीनों स्वभावों से परे रहता है। और जगत रचना रच के माया के तीनों गुणों वाला हो जाता है। हे नानक ! प्रभू अपने एक स्वरूप से अनेकों रूप बना लेता है। (पर ये अनेक रूप उससे अलग नहीं हैं)। यही कहा जा सकता है कि वह एक खुद ही खुद है। 1।
ਪਉੜੀ ॥
ਓਅੰ ਗੁਰਮੁਖਿ ਕੀਓ ਅਕਾਰਾ ॥
ਏਕਹਿ ਸੂਤਿ ਪਰੋਵਨਹਾਰਾ ॥
ਭਿੰਨ ਭਿੰਨ ਤ੍ਰੈ ਗੁਣ ਬਿਸਥਾਰੰ ॥
ਨਿਰਗੁਨ ਤੇ ਸਰਗੁਨ ਦ੍ਰਿਸਟਾਰੰ ॥
ਸਗਲ ਭਾਤਿ ਕਰਿ ਕਰਹਿ ਉਪਾਇਓ ॥
ਜਨਮ ਮਰਨ ਮਨ ਮੋਹੁ ਬਢਾਇਓ ॥
ਦੁਹੂ ਭਾਤਿ ਤੇ ਆਪਿ ਨਿਰਾਰਾ ॥
ਨਾਨਕ ਅੰਤੁ ਨ ਪਾਰਾਵਾਰਾ ॥੨॥
ਓਅੰ ਗੁਰਮੁਖਿ ਕੀਓ ਅਕਾਰਾ ॥
ਏਕਹਿ ਸੂਤਿ ਪਰੋਵਨਹਾਰਾ ॥
ਭਿੰਨ ਭਿੰਨ ਤ੍ਰੈ ਗੁਣ ਬਿਸਥਾਰੰ ॥
ਨਿਰਗੁਨ ਤੇ ਸਰਗੁਨ ਦ੍ਰਿਸਟਾਰੰ ॥
ਸਗਲ ਭਾਤਿ ਕਰਿ ਕਰਹਿ ਉਪਾਇਓ ॥
ਜਨਮ ਮਰਨ ਮਨ ਮੋਹੁ ਬਢਾਇਓ ॥
ਦੁਹੂ ਭਾਤਿ ਤੇ ਆਪਿ ਨਿਰਾਰਾ ॥
ਨਾਨਕ ਅੰਤੁ ਨ ਪਾਰਾਵਾਰਾ ॥੨॥
पउड़ी ॥
ओअं गुरमुखि कीओ अकारा ॥
एकहि सूति परोवनहारा ॥
भिंन भिंन त्रै गुण बिसथारं ॥
निरगुन ते सरगुन द्रिसटारं ॥
सगल भाति करि करहि उपाइओ ॥
जनम मरन मन मोहु बढाइओ ॥
दुहू भाति ते आपि निरारा ॥
नानक अंतु न पारावारा ॥२॥
ओअं गुरमुखि कीओ अकारा ॥
एकहि सूति परोवनहारा ॥
भिंन भिंन त्रै गुण बिसथारं ॥
निरगुन ते सरगुन द्रिसटारं ॥
सगल भाति करि करहि उपाइओ ॥
जनम मरन मन मोहु बढाइओ ॥
दुहू भाति ते आपि निरारा ॥
नानक अंतु न पारावारा ॥२॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ पगुरमुख बनने के वास्ते प्रभू ने जगत-रचना की है। सारे जीव-जंतुओं को अपने एक ही हुकम-धागे में परो के रखने में स्मर्थ है। प्रभू ने अपने अदृष्य रूप से दृष्टमान जगत रचा है। माया के तीनों रूपों का अलग-अलग विस्तार कर दिया है। हे प्रभू ! तूने सारी (अनेकों) किस्में बना के जगत उत्पक्ति की है। जनम-मरन का मूल जीवों के मन का मोह भी तूने ही बढ़ाया है। पर तू स्वयं इस जनम-मरन से अलग है। हे नानक ! (कह,) प्रभू के इस छोर व उस छोर का अंत नहीं पाया जा सकता। 2।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਸੇਈ ਸਾਹ ਭਗਵੰਤ ਸੇ ਸਚੁ ਸੰਪੈ ਹਰਿ ਰਾਸਿ ॥
ਨਾਨਕ ਸਚੁ ਸੁਚਿ ਪਾਈਐ ਤਿਹ ਸੰਤਨ ਕੈ ਪਾਸਿ ॥੧॥
ਸੇਈ ਸਾਹ ਭਗਵੰਤ ਸੇ ਸਚੁ ਸੰਪੈ ਹਰਿ ਰਾਸਿ ॥
ਨਾਨਕ ਸਚੁ ਸੁਚਿ ਪਾਈਐ ਤਿਹ ਸੰਤਨ ਕੈ ਪਾਸਿ ॥੧॥
सलोकु ॥
सेई साह भगवंत से सचु संपै हरि रासि ॥
नानक सचु सुचि पाईऐ तिह संतन कै पासि ॥१॥
सेई साह भगवंत से सचु संपै हरि रासि ॥
नानक सचु सुचि पाईऐ तिह संतन कै पासि ॥१॥
हिन्दी अर्थ: सलोक- (जीव जगत में हरी नाम का वणज करने आए हैं) जिनके पास परमात्मा का नाम-धन है। हरी के नाम की (वणज करने के लिए) पूँजी है। वही शाहूकार हैं। वही धनवान हैं। हे नानक ! ऐसे संत-जनों से ही नाम-धन व आत्मिक पवित्रता हासिल होती है। 1।
ਪਵੜੀ ॥
ਸਸਾ ਸਤਿ ਸਤਿ ਸਤਿ ਸੋਊ ॥
ਸਤਿ ਪੁਰਖ ਤੇ ਭਿੰਨ ਨ ਕੋਊ ॥
ਸੋਊ ਸਰਨਿ ਪਰੈ ਜਿਹ ਪਾਯੰ ॥
ਸਿਮਰਿ ਸਿਮਰਿ ਗੁਨ ਗਾਇ ਸੁਨਾਯੰ ॥
ਸੰਸੈ ਭਰਮੁ ਨਹੀ ਕਛੁ ਬਿਆਪਤ ॥
ਪ੍ਰਗਟ ਪ੍ਰਤਾਪੁ ਤਾਹੂ ਕੋ ਜਾਪਤ ॥
ਸੋ ਸਾਧੂ ਇਹ ਪਹੁਚਨਹਾਰਾ ॥
ਨਾਨਕ ਤਾ ਕੈ ਸਦ ਬਲਿਹਾਰਾ ॥੩॥
ਸਸਾ ਸਤਿ ਸਤਿ ਸਤਿ ਸੋਊ ॥
ਸਤਿ ਪੁਰਖ ਤੇ ਭਿੰਨ ਨ ਕੋਊ ॥
ਸੋਊ ਸਰਨਿ ਪਰੈ ਜਿਹ ਪਾਯੰ ॥
ਸਿਮਰਿ ਸਿਮਰਿ ਗੁਨ ਗਾਇ ਸੁਨਾਯੰ ॥
ਸੰਸੈ ਭਰਮੁ ਨਹੀ ਕਛੁ ਬਿਆਪਤ ॥
ਪ੍ਰਗਟ ਪ੍ਰਤਾਪੁ ਤਾਹੂ ਕੋ ਜਾਪਤ ॥
ਸੋ ਸਾਧੂ ਇਹ ਪਹੁਚਨਹਾਰਾ ॥
ਨਾਨਕ ਤਾ ਕੈ ਸਦ ਬਲਿਹਾਰਾ ॥੩॥
पवड़ी ॥
ससा सति सति सति सोऊ ॥
सति पुरख ते भिंन न कोऊ ॥
सोऊ सरनि परै जिह पायं ॥
सिमरि सिमरि गुन गाइ सुनायं ॥
संसै भरमु नही कछु बिआपत ॥
प्रगट प्रतापु ताहू को जापत ॥
सो साधू इह पहुचनहारा ॥
नानक ता कै सद बलिहारा ॥३॥
ससा सति सति सति सोऊ ॥
सति पुरख ते भिंन न कोऊ ॥
सोऊ सरनि परै जिह पायं ॥
सिमरि सिमरि गुन गाइ सुनायं ॥
संसै भरमु नही कछु बिआपत ॥
प्रगट प्रतापु ताहू को जापत ॥
सो साधू इह पहुचनहारा ॥
नानक ता कै सद बलिहारा ॥३॥
हिन्दी अर्थ: पवड़ी- वह परमात्मा सदा स्थिर रहने वाला है। सदा स्थिर रहने वाला है। उस सदा स्थिर व्यापक प्रभू से अलग हस्ती वाला और कोई नहीं। जिस मनुष्य को प्रभू अपनी शरण में लेता है। वही (शरण में) आता है। वह मनुष्य प्रभू का सिमरन करके उसकी सिफत सालाह करके औरों को भी सुनाता है। कोई संशय। सहम। कोई भटकना उस मनुष्य पर अपना जोर नहीं डाल सकता। (क्योंकि उसे हर जगह प्रभू ही प्रभू दिखता है) उसे हर जगह प्रभू का ही प्रताप प्रत्यक्ष दिखता है। जो मनुष्य इस आत्मिक अवस्था पर पहुँचता है। उसे साधू जानो। हे नानक ! (कह,) मैं उससे सदा सदके हूँ। 3।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਧਨੁ ਧਨੁ ਕਹਾ ਪੁਕਾਰਤੇ ਮਾਇਆ ਮੋਹ ਸਭ ਕੂਰ ॥
ਧਨੁ ਧਨੁ ਕਹਾ ਪੁਕਾਰਤੇ ਮਾਇਆ ਮੋਹ ਸਭ ਕੂਰ ॥
सलोकु ॥
धनु धनु कहा पुकारते माइआ मोह सभ कूर ॥
धनु धनु कहा पुकारते माइआ मोह सभ कूर ॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक॥ (हे भाई !) क्यूं हर वक्त धन इकट्ठा करने के लिए चीखते-पुकारते रहते हो? माया का मोह तो झूठा ही है (इस धन ने सदा साथ नहीं निभना)।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 250 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
दिल्ली के सुबह 5 बजे के gurdwara में जब रागी पहली पंक्ति गाता है, हवा में एक specific quietness आती है।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 52 पंक्तियों का है, 8 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 250” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 251 →, पीछे का: ← अंग 249।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।