अंग 269

अंग
269
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सुखमनी साहिब का हिस्सा। पूरी 24 अष्टपदियों की हिन्दी टीका /sukhmani-sahib/ पर है।
ਮਿਥਿਆ ਨੇਤ੍ਰ ਪੇਖਤ ਪਰ ਤ੍ਰਿਅ ਰੂਪਾਦ ॥
ਮਿਥਿਆ ਰਸਨਾ ਭੋਜਨ ਅਨ ਸ੍ਵਾਦ ॥
ਮਿਥਿਆ ਚਰਨ ਪਰ ਬਿਕਾਰ ਕਉ ਧਾਵਹਿ ॥
ਮਿਥਿਆ ਮਨ ਪਰ ਲੋਭ ਲੁਭਾਵਹਿ ॥
ਮਿਥਿਆ ਤਨ ਨਹੀ ਪਰਉਪਕਾਰਾ ॥
ਮਿਥਿਆ ਬਾਸੁ ਲੇਤ ਬਿਕਾਰਾ ॥
ਬਿਨੁ ਬੂਝੇ ਮਿਥਿਆ ਸਭ ਭਏ ॥
ਸਫਲ ਦੇਹ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮ ਲਏ ॥੫॥
मिथिआ नेत्र पेखत पर त्रिअ रूपाद ॥
मिथिआ रसना भोजन अन स्वाद ॥
मिथिआ चरन पर बिकार कउ धावहि ॥
मिथिआ मन पर लोभ लुभावहि ॥
मिथिआ तन नही परउपकारा ॥
मिथिआ बासु लेत बिकारा ॥
बिनु बूझे मिथिआ सभ भए ॥
सफल देह नानक हरि हरि नाम लए ॥५॥

हिन्दी अर्थ: आँखें व्यर्थ हैं (यदि ये) पराई स्त्री का रूप देखती हैं। जीभ व्यर्थ है (अगर ये) खाने व अन्य सवादों में (लगी हुई है); पैर व्यर्थ है (अगर ये) पराए नुकसान के लिए दौड़-भाग रहे हैं। हे मन ! तू भी व्यर्थ है (यदि तू) पराए धन का लोभ कर रहा है। (वह) शरीर व्यर्थ हैं जो दूसरों की भलाई नहीं करते। (नाक) व्यर्थ है (जो) विकारों की वासना ले रहा है। (अपने अपने अस्तित्व के उद्देश्य) को समझे बिना (ये) सारे (अंग) व्यर्थ हैं। हे नानक ! वह शरीर सफल है जो प्रभू का नाम जपता है।5।
ਬਿਰਥੀ ਸਾਕਤ ਕੀ ਆਰਜਾ ॥
ਸਾਚ ਬਿਨਾ ਕਹ ਹੋਵਤ ਸੂਚਾ ॥
ਬਿਰਥਾ ਨਾਮ ਬਿਨਾ ਤਨੁ ਅੰਧ ॥
ਮੁਖਿ ਆਵਤ ਤਾ ਕੈ ਦੁਰਗੰਧ ॥
ਬਿਨੁ ਸਿਮਰਨ ਦਿਨੁ ਰੈਨਿ ਬ੍ਰਿਥਾ ਬਿਹਾਇ ॥
ਮੇਘ ਬਿਨਾ ਜਿਉ ਖੇਤੀ ਜਾਇ ॥
ਗੋਬਿਦ ਭਜਨ ਬਿਨੁ ਬ੍ਰਿਥੇ ਸਭ ਕਾਮ ॥
ਜਿਉ ਕਿਰਪਨ ਕੇ ਨਿਰਾਰਥ ਦਾਮ ॥
ਧੰਨਿ ਧੰਨਿ ਤੇ ਜਨ ਜਿਹ ਘਟਿ ਬਸਿਓ ਹਰਿ ਨਾਉ ॥
ਨਾਨਕ ਤਾ ਕੈ ਬਲਿ ਬਲਿ ਜਾਉ ॥੬॥
बिरथी साकत की आरजा ॥
साच बिना कह होवत सूचा ॥
बिरथा नाम बिना तनु अंध ॥
मुखि आवत ता कै दुरगंध ॥
बिनु सिमरन दिनु रैनि ब्रिथा बिहाइ ॥
मेघ बिना जिउ खेती जाइ ॥
गोबिद भजन बिनु ब्रिथे सभ काम ॥
जिउ किरपन के निरारथ दाम ॥
धंनि धंनि ते जन जिह घटि बसिओ हरि नाउ ॥
नानक ता कै बलि बलि जाउ ॥६॥

हिन्दी अर्थ: (ईश्वर से) टूटे हुए मनुष्य की उम्र व्यर्थ जाती है। (क्योंकि) सच्चे प्रभू (के नाम) के बिना वह कैसे स्वच्छ हो सकता है? नाम के बिना अंधे (साकत) का शरीर (ही) किसी काम का नहीं। (क्योंकि) उसके मुंह में से (निंदा आदि) की बद बू आती है। (वैसे) सिमरन के बगैर (साकत के) दिन रात बेकार चले जाते हैं। जैसे बरखा के बगैर खेती निष्फल जाती है। प्रभू के भजन से वंचित रहने के कारण (मनुष्य के) सारे ही काम किसी अर्थ के नहीं। (क्योंकि ये काम इसका अपना कुछ नहीं सँवारते) जैसे कंजूस का धन उसके अपने किसी काम का नहीं। वह मनुष्य मुबारक हैं। जिनके हृदय में प्रभू का नाम बसता है। हे नानक ! (कह कि) मैं उन (गुरमुखों) से सदके जाता हूँ।6।
ਰਹਤ ਅਵਰ ਕਛੁ ਅਵਰ ਕਮਾਵਤ ॥
ਮਨਿ ਨਹੀ ਪ੍ਰੀਤਿ ਮੁਖਹੁ ਗੰਢ ਲਾਵਤ ॥
ਜਾਨਨਹਾਰ ਪ੍ਰਭੂ ਪਰਬੀਨ ॥
ਬਾਹਰਿ ਭੇਖ ਨ ਕਾਹੂ ਭੀਨ ॥
ਅਵਰ ਉਪਦੇਸੈ ਆਪਿ ਨ ਕਰੈ ॥
ਆਵਤ ਜਾਵਤ ਜਨਮੈ ਮਰੈ ॥
ਜਿਸ ਕੈ ਅੰਤਰਿ ਬਸੈ ਨਿਰੰਕਾਰੁ ॥
ਤਿਸ ਕੀ ਸੀਖ ਤਰੈ ਸੰਸਾਰੁ ॥
ਜੋ ਤੁਮ ਭਾਨੇ ਤਿਨ ਪ੍ਰਭੁ ਜਾਤਾ ॥
ਨਾਨਕ ਉਨ ਜਨ ਚਰਨ ਪਰਾਤਾ ॥੭॥
रहत अवर कछु अवर कमावत ॥
मनि नही प्रीति मुखहु गंढ लावत ॥
जाननहार प्रभू परबीन ॥
बाहरि भेख न काहू भीन ॥
अवर उपदेसै आपि न करै ॥
आवत जावत जनमै मरै ॥
जिस कै अंतरि बसै निरंकारु ॥
तिस की सीख तरै संसारु ॥
जो तुम भाने तिन प्रभु जाता ॥
नानक उन जन चरन पराता ॥७॥

हिन्दी अर्थ: धर्म के बाहरी धारे हुए चिन्ह और हैं पर असल जिंदगी कुछ और है; मन में (तो) प्रभू से प्यार नहीं। (पर) मुंह की बातों से घर पूरा करता है। (पर दिलों की) जानने वाला प्रभू सयाना है। (वह कभी) किसी के बाहरी भेष से प्रसन्न नहीं हुआ। (जो मनुष्य) औरों को सलाहें देता है (पर) खुद (उन सलाहों पर) नहीं चलता। वह सदा जनम मरण के चक्कर में पड़ा रहता है। जिस मनुष्य के हृदय में निरंकार बसता है। उसकी शिक्षा से जगत (विकारों से) बचता है। (हे प्रभू !) जो (भगत) तुझे प्यारे लगते हैं उन्होंने तुझे पहिचाना है। हे नानक ! (कह) -मैं उन (भक्तों) के चरणों में पड़ता हूँ।7।
ਕਰਉ ਬੇਨਤੀ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਸਭੁ ਜਾਨੈ ॥
ਅਪਨਾ ਕੀਆ ਆਪਹਿ ਮਾਨੈ ॥
ਆਪਹਿ ਆਪ ਆਪਿ ਕਰਤ ਨਿਬੇਰਾ ॥
ਕਿਸੈ ਦੂਰਿ ਜਨਾਵਤ ਕਿਸੈ ਬੁਝਾਵਤ ਨੇਰਾ ॥
ਉਪਾਵ ਸਿਆਨਪ ਸਗਲ ਤੇ ਰਹਤ ॥
ਸਭੁ ਕਛੁ ਜਾਨੈ ਆਤਮ ਕੀ ਰਹਤ ॥
ਜਿਸੁ ਭਾਵੈ ਤਿਸੁ ਲਏ ਲੜਿ ਲਾਇ ॥
ਥਾਨ ਥਨੰਤਰਿ ਰਹਿਆ ਸਮਾਇ ॥
ਸੋ ਸੇਵਕੁ ਜਿਸੁ ਕਿਰਪਾ ਕਰੀ ॥
ਨਿਮਖ ਨਿਮਖ ਜਪਿ ਨਾਨਕ ਹਰੀ ॥੮॥੫॥
करउ बेनती पारब्रहमु सभु जानै ॥
अपना कीआ आपहि मानै ॥
आपहि आप आपि करत निबेरा ॥
किसै दूरि जनावत किसै बुझावत नेरा ॥
उपाव सिआनप सगल ते रहत ॥
सभु कछु जानै आतम की रहत ॥
जिसु भावै तिसु लए लड़ि लाइ ॥
थान थनंतरि रहिआ समाइ ॥
सो सेवकु जिसु किरपा करी ॥
निमख निमख जपि नानक हरी ॥८॥५॥

हिन्दी अर्थ: (जो जो) विनती मैं करता हूँ। प्रभू सब जानता है। अपने पैदा किए जीव को वह खुद ही सम्मान देता है। (जीवों के किए कर्मों के मुताबिक) प्रभू खुद ही फैसला करता है। (भाव) किसी को ये बुद्धि बख्शता है कि प्रभू हमारे नजदीक है और किसी को ये जनाता है कि प्रभू कहीं दूर है। सब तरीकों से चतुराईयों से (प्रभू) परे है (भाव-किसी हीले चतुराई से प्रभू प्रसन्न नहीं होता) (क्योंकि वह जीव की) आत्मिक रहणी की हरेक बात जानता है। जो (जीव) उसे भाता है उसे अपने साथ जोड़ लेता है। प्रभू हर जगह मौजूद है। वही मनुष्य (असली) सेवक बनता है जिस पर प्रभू मेहर करता है। हे नानक ! (ऐसे) प्रभू को दम-ब-दम याद कर।8।5।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਕਾਮ ਕ੍ਰੋਧ ਅਰੁ ਲੋਭ ਮੋਹ ਬਿਨਸਿ ਜਾਇ ਅਹੰਮੇਵ ॥
ਨਾਨਕ ਪ੍ਰਭ ਸਰਣਾਗਤੀ ਕਰਿ ਪ੍ਰਸਾਦੁ ਗੁਰਦੇਵ ॥੧॥
सलोकु ॥
काम क्रोध अरु लोभ मोह बिनसि जाइ अहंमेव ॥
नानक प्रभ सरणागती करि प्रसादु गुरदेव ॥१॥

हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ (मेरे) काम। क्रोध। लोभ। मोह व अहंकार दूर हो जाएं। हे नानक ! (बिनती कर और कह) -हे गुरदेव ! हे प्रभू ! मैं शरण आया हूँ। (मेरे पर) मेहर कर। 1।
ਅਸਟਪਦੀ ॥
ਜਿਹ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਛਤੀਹ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਖਾਹਿ ॥
ਤਿਸੁ ਠਾਕੁਰ ਕਉ ਰਖੁ ਮਨ ਮਾਹਿ ॥
ਜਿਹ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਸੁਗੰਧਤ ਤਨਿ ਲਾਵਹਿ ॥
ਤਿਸ ਕਉ ਸਿਮਰਤ ਪਰਮ ਗਤਿ ਪਾਵਹਿ ॥
ਜਿਹ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਬਸਹਿ ਸੁਖ ਮੰਦਰਿ ॥
ਤਿਸਹਿ ਧਿਆਇ ਸਦਾ ਮਨ ਅੰਦਰਿ ॥
ਜਿਹ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਗ੍ਰਿਹ ਸੰਗਿ ਸੁਖ ਬਸਨਾ ॥
ਆਠ ਪਹਰ ਸਿਮਰਹੁ ਤਿਸੁ ਰਸਨਾ ॥
ਜਿਹ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਰੰਗ ਰਸ ਭੋਗ ॥
ਨਾਨਕ ਸਦਾ ਧਿਆਈਐ ਧਿਆਵਨ ਜੋਗ ॥੧॥
असटपदी ॥
जिह प्रसादि छतीह अंम्रित खाहि ॥
तिसु ठाकुर कउ रखु मन माहि ॥
जिह प्रसादि सुगंधत तनि लावहि ॥
तिस कउ सिमरत परम गति पावहि ॥
जिह प्रसादि बसहि सुख मंदरि ॥
तिसहि धिआइ सदा मन अंदरि ॥
जिह प्रसादि ग्रिह संगि सुख बसना ॥
आठ पहर सिमरहु तिसु रसना ॥
जिह प्रसादि रंग रस भोग ॥
नानक सदा धिआईऐ धिआवन जोग ॥१॥

हिन्दी अर्थ: अष्टपदी॥ (हे भाई !) जिस की कृपा से तू कई किस्मों के स्वादिष्ट पकवान खाता है। उस प्रभू को मन में (याद) रख। जिसकी मेहर से अपने शरीर पर तू सुगंधियां लगाता है। उसे याद करने से तू उच्च पदवी हासिल कर लेगा। जिसकी दया से तू सुख-महलों में बसता है। उसे सदा मन में सिमर। जिस (प्रभू) की कृपा से तू घर में मौजों से बस रहा है। उसे जीभ से आठों पहर याद कर। हे नानक ! जिस (प्रभू) की बख्शिश से खेल-तमाशे (मौज-मस्ती)। स्वादिष्ट भोजन व पदार्थ (नसीब होते हैं) उस ध्यानयोग को सदा ही ध्याना चाहिए।1।
ਜਿਹ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਪਾਟ ਪਟੰਬਰ ਹਢਾਵਹਿ ॥
ਤਿਸਹਿ ਤਿਆਗਿ ਕਤ ਅਵਰ ਲੁਭਾਵਹਿ ॥
ਜਿਹ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਸੁਖਿ ਸੇਜ ਸੋਈਜੈ ॥
ਮਨ ਆਠ ਪਹਰ ਤਾ ਕਾ ਜਸੁ ਗਾਵੀਜੈ ॥
ਜਿਹ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਤੁਝੁ ਸਭੁ ਕੋਊ ਮਾਨੈ ॥
जिह प्रसादि पाट पटंबर हढावहि ॥
तिसहि तिआगि कत अवर लुभावहि ॥
जिह प्रसादि सुखि सेज सोईजै ॥
मन आठ पहर ता का जसु गावीजै ॥
जिह प्रसादि तुझु सभु कोऊ मानै ॥

हिन्दी अर्थ: (हे मन !) जिस (प्रभू) की कृपा से तू रेशमी कपड़े पहनता है। उसे बिसार के और कहाँ लोभ कर रहा है? जिसकी मेहर से सेज पर सुखी सोते हैं। हे मन ! उस प्रभू का यश आठों पहर गाना चाहिए। जिसकी मेहर से हरेक मनुष्य तेरा आदर करता है।

संदर्भ: यह अंग 269 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।

M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।

Rajiv Chowk metro station की platform पर 9 PM की भीड़।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 57 पंक्तियों का है, 7 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 269” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 270 →, पीछे का: ← अंग 268

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।