अंग 282

अंग
282
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सुखमनी साहिब का हिस्सा। पूरी 24 अष्टपदियों की हिन्दी टीका /sukhmani-sahib/ पर है।
ਆਪੇ ਆਪਿ ਸਗਲ ਮਹਿ ਆਪਿ ॥
ਅਨਿਕ ਜੁਗਤਿ ਰਚਿ ਥਾਪਿ ਉਥਾਪਿ ॥
ਅਬਿਨਾਸੀ ਨਾਹੀ ਕਿਛੁ ਖੰਡ ॥
ਧਾਰਣ ਧਾਰਿ ਰਹਿਓ ਬ੍ਰਹਮੰਡ ॥
ਅਲਖ ਅਭੇਵ ਪੁਰਖ ਪਰਤਾਪ ॥
ਆਪਿ ਜਪਾਏ ਤ ਨਾਨਕ ਜਾਪ ॥੬॥
आपे आपि सगल महि आपि ॥
अनिक जुगति रचि थापि उथापि ॥
अबिनासी नाही किछु खंड ॥
धारण धारि रहिओ ब्रहमंड ॥
अलख अभेव पुरख परताप ॥
आपि जपाए त नानक जाप ॥६॥

हिन्दी अर्थ: सारे जीवों में केवल खुद ही है। अनेकों ढंगों से (जगत को) बना बना के नाश भी कर देता है। प्रभू स्वयं अविनाशी है; उस का कुछ नाश नहीं होता। सारे ब्रहमंड की रचना भी स्वयं ही रच रहा है। उस व्यापक प्रभू के प्रताप का भेद नहीं पाया जा सकता। बयान नहीं हो सकता; हे नानक ! अगर वह स्वयं अपना जाप कराए तो ही जीव जाप करते हैं। 6।
ਜਿਨ ਪ੍ਰਭੁ ਜਾਤਾ ਸੁ ਸੋਭਾਵੰਤ ॥
ਸਗਲ ਸੰਸਾਰੁ ਉਧਰੈ ਤਿਨ ਮੰਤ ॥
ਪ੍ਰਭ ਕੇ ਸੇਵਕ ਸਗਲ ਉਧਾਰਨ ॥
ਪ੍ਰਭ ਕੇ ਸੇਵਕ ਦੂਖ ਬਿਸਾਰਨ ॥
ਆਪੇ ਮੇਲਿ ਲਏ ਕਿਰਪਾਲ ॥
ਗੁਰ ਕਾ ਸਬਦੁ ਜਪਿ ਭਏ ਨਿਹਾਲ ॥
ਉਨ ਕੀ ਸੇਵਾ ਸੋਈ ਲਾਗੈ ॥
ਜਿਸ ਨੋ ਕ੍ਰਿਪਾ ਕਰਹਿ ਬਡਭਾਗੈ ॥
ਨਾਮੁ ਜਪਤ ਪਾਵਹਿ ਬਿਸ੍ਰਾਮੁ ॥
ਨਾਨਕ ਤਿਨ ਪੁਰਖ ਕਉ ਊਤਮ ਕਰਿ ਮਾਨੁ ॥੭॥
जिन प्रभु जाता सु सोभावंत ॥
सगल संसारु उधरै तिन मंत ॥
प्रभ के सेवक सगल उधारन ॥
प्रभ के सेवक दूख बिसारन ॥
आपे मेलि लए किरपाल ॥
गुर का सबदु जपि भए निहाल ॥
उन की सेवा सोई लागै ॥
जिस नो क्रिपा करहि बडभागै ॥
नामु जपत पावहि बिस्रामु ॥
नानक तिन पुरख कउ ऊतम करि मानु ॥७॥

हिन्दी अर्थ: जिन लोंगों ने प्रभू को पहिचान लिया वह शोभा वाले हो गए; सारा जगत उनके उपदेशों से (विकारों से) बचता है। हरी के भगत सब (जीवों) को बचाने के लायक हैं। (सब के) दुख दूर करने के स्मर्थ होते हैं। (सेवकों को) कृपालु प्रभू खुद (अपने साथ) मिला लेता है। सतिगुरू का शबद ज पके वह (फूल जैसे) खिल उठते हैं। वही मनुष्य उन (सेवकों) की सेवा में लगता है। जिस भाग्यशाली पर (हे प्रभू !) तू खुद मेहर करता है। (वह सेवक) नाम जपके अडोल अवस्था हासिल करते हैं; हे नानक ! उन लोगों को बहुत ऊँचे मनुष्य समझो। 7।
ਜੋ ਕਿਛੁ ਕਰੈ ਸੁ ਪ੍ਰਭ ਕੈ ਰੰਗਿ ॥
ਸਦਾ ਸਦਾ ਬਸੈ ਹਰਿ ਸੰਗਿ ॥
ਸਹਜ ਸੁਭਾਇ ਹੋਵੈ ਸੋ ਹੋਇ ॥
ਕਰਣੈਹਾਰੁ ਪਛਾਣੈ ਸੋਇ ॥
ਪ੍ਰਭ ਕਾ ਕੀਆ ਜਨ ਮੀਠ ਲਗਾਨਾ ॥
ਜੈਸਾ ਸਾ ਤੈਸਾ ਦ੍ਰਿਸਟਾਨਾ ॥
ਜਿਸ ਤੇ ਉਪਜੇ ਤਿਸੁ ਮਾਹਿ ਸਮਾਏ ॥
ਓਇ ਸੁਖ ਨਿਧਾਨ ਉਨਹੂ ਬਨਿ ਆਏ ॥
ਆਪਸ ਕਉ ਆਪਿ ਦੀਨੋ ਮਾਨੁ ॥
ਨਾਨਕ ਪ੍ਰਭ ਜਨੁ ਏਕੋ ਜਾਨੁ ॥੮॥੧੪॥
जो किछु करै सु प्रभ कै रंगि ॥
सदा सदा बसै हरि संगि ॥
सहज सुभाइ होवै सो होइ ॥
करणैहारु पछाणै सोइ ॥
प्रभ का कीआ जन मीठ लगाना ॥
जैसा सा तैसा द्रिसटाना ॥
जिस ते उपजे तिसु माहि समाए ॥
ओइ सुख निधान उनहू बनि आए ॥
आपस कउ आपि दीनो मानु ॥
नानक प्रभ जनु एको जानु ॥८॥१४॥

हिन्दी अर्थ: (प्रभू का सेवक) जो कुछ करता है प्रभू की रजा में (रह के) करता है। और सदा ही प्रभू की हजूरी में बसता है सहज ही जो कुछ होता है उसे प्रभू की रजा जानता है। और सब कुछ करने वाला प्रभू को ही समझता है। (प्रभू के) सेवकों को प्रभू का किया हुआ मीठा लगता है। (क्योंकि) प्रभू जैसा (सर्व-व्यापक) है वैसा ही उन्हें नजर आता है। जिस प्रभू से वे सेवक पैदा हुए हैं उसी में लीन रहते हैं। वे सुखों का खजाना हो जाते हैं ओर ये दर्जा फबता भी उन्हीं को ही है। (संवकों को सम्मान दे के) प्रभू अपने आप को खुद सम्मान देता है (क्योंकि सेवक का सम्मान प्रभू का ही सम्मान है) हे नानक ! प्रभू और प्रभू के सेवकों को एक रूप समझो। । 8। 14।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਸਰਬ ਕਲਾ ਭਰਪੂਰ ਪ੍ਰਭ ਬਿਰਥਾ ਜਾਨਨਹਾਰ ॥
ਜਾ ਕੈ ਸਿਮਰਨਿ ਉਧਰੀਐ ਨਾਨਕ ਤਿਸੁ ਬਲਿਹਾਰ ॥੧॥
सलोकु ॥
सरब कला भरपूर प्रभ बिरथा जाननहार ॥
जा कै सिमरनि उधरीऐ नानक तिसु बलिहार ॥१॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक। प्रभू सारी शक्तियों के साथ पूर्ण है। (सब जीवों के) दुख-दर्द जानता है। हे नानक ! जिस (ऐसे प्रभू) के सिमरन से (विकारों से) बच सकते हैं। उससे (सदा) सदके जाएं। 1।
ਅਸਟਪਦੀ ॥
ਟੂਟੀ ਗਾਢਨਹਾਰ ਗੋੁਪਾਲ ॥
ਸਰਬ ਜੀਆ ਆਪੇ ਪ੍ਰਤਿਪਾਲ ॥
ਸਗਲ ਕੀ ਚਿੰਤਾ ਜਿਸੁ ਮਨ ਮਾਹਿ ॥
ਤਿਸ ਤੇ ਬਿਰਥਾ ਕੋਈ ਨਾਹਿ ॥
ਰੇ ਮਨ ਮੇਰੇ ਸਦਾ ਹਰਿ ਜਾਪਿ ॥
ਅਬਿਨਾਸੀ ਪ੍ਰਭੁ ਆਪੇ ਆਪਿ ॥
ਆਪਨ ਕੀਆ ਕਛੂ ਨ ਹੋਇ ॥
ਜੇ ਸਉ ਪ੍ਰਾਨੀ ਲੋਚੈ ਕੋਇ ॥
ਤਿਸੁ ਬਿਨੁ ਨਾਹੀ ਤੇਰੈ ਕਿਛੁ ਕਾਮ ॥
ਗਤਿ ਨਾਨਕ ਜਪਿ ਏਕ ਹਰਿ ਨਾਮ ॥੧॥
असटपदी ॥
टूटी गाढनहार गोुपाल ॥
सरब जीआ आपे प्रतिपाल ॥
सगल की चिंता जिसु मन माहि ॥
तिस ते बिरथा कोई नाहि ॥
रे मन मेरे सदा हरि जापि ॥
अबिनासी प्रभु आपे आपि ॥
आपन कीआ कछू न होइ ॥
जे सउ प्रानी लोचै कोइ ॥
तिसु बिनु नाही तेरै किछु काम ॥
गति नानक जपि एक हरि नाम ॥१॥

हिन्दी अर्थ: अष्टपदी॥ (जीवों के दिल की) टूटी हुई (तार) को (अपने साथ) गाँठने वाला (प्रभू स्वयं ही) है। सारे जीवों की पालना करने वाला गोपाल प्रभू खुद है। जिस प्रभू को अपने मन में सभी की (रोजी का) फिक्र है। उस (के दर) से कोई जीव ना-उम्मीद नहीं (आता)। हे मेरे मन ! सदा प्रभू को जप। वह नाश-रहित और अपने जैसा आप ही है। प्राणी का अपने प्रयत्नों से किया हुआ कोई भी काम सिरे नहीं चढ़ता। अगर कोई प्राणी सौ बार चाहे तो भी उस प्रभू के बिना और कोई चीज तेरे (असल) काम की नहीं। हे नानक ! एक प्रभू का नाम जप तो गति होगी। 1।
ਰੂਪਵੰਤੁ ਹੋਇ ਨਾਹੀ ਮੋਹੈ ॥
ਪ੍ਰਭ ਕੀ ਜੋਤਿ ਸਗਲ ਘਟ ਸੋਹੈ ॥
ਧਨਵੰਤਾ ਹੋਇ ਕਿਆ ਕੋ ਗਰਬੈ ॥
ਜਾ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਤਿਸ ਕਾ ਦੀਆ ਦਰਬੈ ॥
ਅਤਿ ਸੂਰਾ ਜੇ ਕੋਊ ਕਹਾਵੈ ॥
ਪ੍ਰਭ ਕੀ ਕਲਾ ਬਿਨਾ ਕਹ ਧਾਵੈ ॥
ਜੇ ਕੋ ਹੋਇ ਬਹੈ ਦਾਤਾਰੁ ॥
ਤਿਸੁ ਦੇਨਹਾਰੁ ਜਾਨੈ ਗਾਵਾਰੁ ॥
ਜਿਸੁ ਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਤੂਟੈ ਹਉ ਰੋਗੁ ॥
ਨਾਨਕ ਸੋ ਜਨੁ ਸਦਾ ਅਰੋਗੁ ॥੨॥
रूपवंतु होइ नाही मोहै ॥
प्रभ की जोति सगल घट सोहै ॥
धनवंता होइ किआ को गरबै ॥
जा सभु किछु तिस का दीआ दरबै ॥
अति सूरा जे कोऊ कहावै ॥
प्रभ की कला बिना कह धावै ॥
जे को होइ बहै दातारु ॥
तिसु देनहारु जानै गावारु ॥
जिसु गुर प्रसादि तूटै हउ रोगु ॥
नानक सो जनु सदा अरोगु ॥२॥

हिन्दी अर्थ: रूप वाला हो के कोई प्राणी (रूप का) गुमान ना करे। (क्योंकि) सारे शरीरों में प्रभू की ही ज्योति सुशोभित है। धनवान हो के क्या कोई मनुष्य अहंकार करे। जबकि सारा धन उस प्रभू का ही बख्शा हुआ है? अगर कोई मनुष्य (अपने आप को) बड़ा शूरवीर कहलवाए (तो रक्ती भर ये तो सोच ले कि) प्रभू की (दी हुई) ताकत के बिना कहाँ दौड़ सकता है। अगर कोई बंदा (धनाढ हो के) दाता बन बैठे। तो वह मूर्ख उस प्रभू को पहिचाने जो (सब जीवों को) देने के स्मर्थ है। जिसका अहंकार रूपी रोग गुरू की कृपा से दूर होता है। हे नानक ! वह मनुष्य सदा निरोग है 2।
ਜਿਉ ਮੰਦਰ ਕਉ ਥਾਮੈ ਥੰਮਨੁ ॥
ਤਿਉ ਗੁਰ ਕਾ ਸਬਦੁ ਮਨਹਿ ਅਸਥੰਮਨੁ ॥
ਜਿਉ ਪਾਖਾਣੁ ਨਾਵ ਚੜਿ ਤਰੈ ॥
ਪ੍ਰਾਣੀ ਗੁਰ ਚਰਣ ਲਗਤੁ ਨਿਸਤਰੈ ॥
ਜਿਉ ਅੰਧਕਾਰ ਦੀਪਕ ਪਰਗਾਸੁ ॥
ਗੁਰ ਦਰਸਨੁ ਦੇਖਿ ਮਨਿ ਹੋਇ ਬਿਗਾਸੁ ॥
ਜਿਉ ਮਹਾ ਉਦਿਆਨ ਮਹਿ ਮਾਰਗੁ ਪਾਵੈ ॥ ਤਿਉ ਸਾਧੂ ਸੰਗਿ ਮਿਲਿ ਜੋਤਿ ਪ੍ਰਗਟਾਵੈ ॥
ਤਿਨ ਸੰਤਨ ਕੀ ਬਾਛਉ ਧੂਰਿ ॥
ਨਾਨਕ ਕੀ ਹਰਿ ਲੋਚਾ ਪੂਰਿ ॥੩॥
जिउ मंदर कउ थामै थंमनु ॥
तिउ गुर का सबदु मनहि असथंमनु ॥
जिउ पाखाणु नाव चड़ि तरै ॥
प्राणी गुर चरण लगतु निसतरै ॥
जिउ अंधकार दीपक परगासु ॥
गुर दरसनु देखि मनि होइ बिगासु ॥
जिउ महा उदिआन महि मारगु पावै ॥ तिउ साधू संगि मिलि जोति प्रगटावै ॥
तिन संतन की बाछउ धूरि ॥
नानक की हरि लोचा पूरि ॥३॥

हिन्दी अर्थ: जैसे घर (की छत) को खंभा सहारा देता है। वैसे ही गुरू का शबद मन का सहारा है। जैसे पत्थर नाव में चढ़ के (नदी वगैरा से) पार लांघ जाता है। वैसे ही गुरू के चरण लगा हुआ आदमी (संसार समुंद्र) तैर जाता है। जैसे दीपक अंधकार (दूर कर के) रौशनी कर देता है। वैसे ही गुरू का दीदार करके मन में खिलाव (पैदा) हो जाता है। जैसे (किसी) घने जंगल में (भटके हुए को) राह मिल जाए। वैसे ही साधु की संगति में बैठने से (अकाल पुरख की) ज्योति (मनुष्य के अंदर) प्रगट होती है। मैं उन संतों के चरणों की धूड़ मांगता हूँ। हे प्रभू ! नानक की ये ख्वाइश पूरी कर। 3।
ਮਨ ਮੂਰਖ ਕਾਹੇ ਬਿਲਲਾਈਐ ॥
मन मूरख काहे बिललाईऐ ॥

हिन्दी अर्थ: हे मूर्ख मन ! (दुख मिलने पर) क्यूँ बिलकता है?

संदर्भ: यह अंग 282 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।

M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।

दिल्ली के winter-fog में सुबह 5 बजे driver को waiting करवाना।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 60 पंक्तियों का है, 8 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 282” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 283 →, पीछे का: ← अंग 281

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।