अंग 251

अंग
251
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਨਾਮ ਬਿਹੂਨੇ ਨਾਨਕਾ ਹੋਤ ਜਾਤ ਸਭੁ ਧੂਰ ॥੧॥
नाम बिहूने नानका होत जात सभु धूर ॥१॥

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! नाम से विहीन रहके सारा जगत ही व्यर्थ जीवन गुजार जाता है। 1।
ਪਵੜੀ ॥
ਧਧਾ ਧੂਰਿ ਪੁਨੀਤ ਤੇਰੇ ਜਨੂਆ ॥
ਧਨਿ ਤੇਊ ਜਿਹ ਰੁਚ ਇਆ ਮਨੂਆ ॥
ਧਨੁ ਨਹੀ ਬਾਛਹਿ ਸੁਰਗ ਨ ਆਛਹਿ ॥
ਅਤਿ ਪ੍ਰਿਅ ਪ੍ਰੀਤਿ ਸਾਧ ਰਜ ਰਾਚਹਿ ॥
ਧੰਧੇ ਕਹਾ ਬਿਆਪਹਿ ਤਾਹੂ ॥ ਜੋ ਏਕ ਛਾਡਿ ਅਨ ਕਤਹਿ ਨ ਜਾਹੂ ॥
ਜਾ ਕੈ ਹੀਐ ਦੀਓ ਪ੍ਰਭ ਨਾਮ ॥
ਨਾਨਕ ਸਾਧ ਪੂਰਨ ਭਗਵਾਨ ॥੪॥
पवड़ी ॥
धधा धूरि पुनीत तेरे जनूआ ॥
धनि तेऊ जिह रुच इआ मनूआ ॥
धनु नही बाछहि सुरग न आछहि ॥
अति प्रिअ प्रीति साध रज राचहि ॥
धंधे कहा बिआपहि ताहू ॥ जो एक छाडि अन कतहि न जाहू ॥
जा कै हीऐ दीओ प्रभ नाम ॥
नानक साध पूरन भगवान ॥४॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ हे प्रभू ! तेरे सेवकों के चरणों की धूड़ पवित्र (करने वाली होती) है। वह लोग भाग्यशाली हैं। जिनके मन में इस धूड़ की तमन्ना है। (ऐसे मनुष्य इस चरन-धूड़ के मुकाबले में दुनिया वाला) धन नहीं चाहते। स्वर्ग की भी चाहत नहीं रखते। वे तो अपने अति प्यारे प्रभू की प्रीति में और गुरमुखों की चरण-धूड़ में ही मस्त रहते हैं। माया के कोई जंजाल उन पर जोर नहीं डाल सकते। जो मनुष्य एक परमात्मा की ओट छोड़ के किसी और तरफ नहीं जाते। हे नानक ! प्रभू ने जिनके हृदय में अपना नाम बसा दिया है। वह भगवान का रूप पूरे संत हैं। 4।
ਸਲੋਕ ॥
ਅਨਿਕ ਭੇਖ ਅਰੁ ਙਿਆਨ ਧਿਆਨ ਮਨਹਠਿ ਮਿਲਿਅਉ ਨ ਕੋਇ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਕਿਰਪਾ ਭਈ ਭਗਤੁ ਙਿਆਨੀ ਸੋਇ ॥੧॥
सलोक ॥
अनिक भेख अरु ङिआन धिआन मनहठि मिलिअउ न कोइ ॥
कहु नानक किरपा भई भगतु ङिआनी सोइ ॥१॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक॥ अनेकों धार्मिक भेष धारण करने से। धर्म-चर्चा करने से। मन के हठ से समाधियां लगाने से कोई मनुष्य परमात्मा से नहीं मिल सकता। हे नानक ! कह,जिस पर प्रभू की मेहर हो। वही भगत बन सकता है। वही परमात्मा के साथ गहरी सांझ डाल सकता है। 1।
ਪਉੜੀ ॥
ਙੰਙਾ ਙਿਆਨੁ ਨਹੀ ਮੁਖ ਬਾਤਉ ॥
ਅਨਿਕ ਜੁਗਤਿ ਸਾਸਤ੍ਰ ਕਰਿ ਭਾਤਉ ॥
ਙਿਆਨੀ ਸੋਇ ਜਾ ਕੈ ਦ੍ਰਿੜ ਸੋਊ ॥
ਕਹਤ ਸੁਨਤ ਕਛੁ ਜੋਗੁ ਨ ਹੋਊ ॥
ਙਿਆਨੀ ਰਹਤ ਆਗਿਆ ਦ੍ਰਿੜੁ ਜਾ ਕੈ ॥
ਉਸਨ ਸੀਤ ਸਮਸਰਿ ਸਭ ਤਾ ਕੈ ॥
ਙਿਆਨੀ ਤਤੁ ਗੁਰਮੁਖਿ ਬੀਚਾਰੀ ॥
ਨਾਨਕ ਜਾ ਕਉ ਕਿਰਪਾ ਧਾਰੀ ॥੫॥
पउड़ी ॥
ङंङा ङिआनु नही मुख बातउ ॥
अनिक जुगति सासत्र करि भातउ ॥
ङिआनी सोइ जा कै द्रिड़ सोऊ ॥
कहत सुनत कछु जोगु न होऊ ॥
ङिआनी रहत आगिआ द्रिड़ु जा कै ॥
उसन सीत समसरि सभ ता कै ॥
ङिआनी ततु गुरमुखि बीचारी ॥
नानक जा कउ किरपा धारी ॥५॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी- निरी मुंह से की गई बातों से। शास्त्रों की अनेकों किस्म की युक्तियों के इस्तेमाल से परमात्मा से जान-पहिचान नहीं हो सकती। परमात्मा के साथ वही जान-पहिचान डाल सकता है। जिसके हृदय में प्रभू का पक्का निवास बने। निरी प्रभू मिलाप की बातें कहने-सुनने से प्रभू-मिलाप नहीं हो सकता। जिसके दिल में परमात्मा की रजा पक्की टिकी रहे। वही असल ज्ञानी है। उसे सारा दुख-सुख एक समान प्रतीत होता है। जो गुरू के द्वारा जगत के मूल प्रभू के गुणों का विचारवान बन जाए। हे नानक ! जिस मनुष्य पर प्रभू कृपा करे। उसकी सांझ परमात्मा के साथ बनती है। 5।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਆਵਨ ਆਏ ਸ੍ਰਿਸਟਿ ਮਹਿ ਬਿਨੁ ਬੂਝੇ ਪਸੁ ਢੋਰ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸੋ ਬੁਝੈ ਜਾ ਕੈ ਭਾਗ ਮਥੋਰ ॥੧॥
सलोकु ॥
आवन आए स्रिसटि महि बिनु बूझे पसु ढोर ॥
नानक गुरमुखि सो बुझै जा कै भाग मथोर ॥१॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक ॥ जगत में उन लोगों ने सिर्फ कहने मात्र को ही मानस जन्म लिया। पर जीवन का सही रास्ता समझे बिना वे पशु ही रहे (पशुओं वाली जिंदगी ही गुजारते रहे)। हे नानक ! वह मनुष्य गुरू के द्वारा जीवन का सही रास्ता समझता है। जिसके माथे पर (पूबर्लि कर्मों के अच्छे कर्मों के) भाग्य जाग पड़ें। 1।
ਪਉੜੀ ॥
ਯਾ ਜੁਗ ਮਹਿ ਏਕਹਿ ਕਉ ਆਇਆ ॥
ਜਨਮਤ ਮੋਹਿਓ ਮੋਹਨੀ ਮਾਇਆ ॥
ਗਰਭ ਕੁੰਟ ਮਹਿ ਉਰਧ ਤਪ ਕਰਤੇ ॥
ਸਾਸਿ ਸਾਸਿ ਸਿਮਰਤ ਪ੍ਰਭੁ ਰਹਤੇ ॥
ਉਰਝਿ ਪਰੇ ਜੋ ਛੋਡਿ ਛਡਾਨਾ ॥
ਦੇਵਨਹਾਰੁ ਮਨਹਿ ਬਿਸਰਾਨਾ ॥
ਧਾਰਹੁ ਕਿਰਪਾ ਜਿਸਹਿ ਗੁਸਾਈ ॥ ਇਤ ਉਤ ਨਾਨਕ ਤਿਸੁ ਬਿਸਰਹੁ ਨਾਹੀ ॥੬॥
पउड़ी ॥
या जुग महि एकहि कउ आइआ ॥
जनमत मोहिओ मोहनी माइआ ॥
गरभ कुंट महि उरध तप करते ॥
सासि सासि सिमरत प्रभु रहते ॥
उरझि परे जो छोडि छडाना ॥
देवनहारु मनहि बिसराना ॥
धारहु किरपा जिसहि गुसाई ॥ इत उत नानक तिसु बिसरहु नाही ॥६॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी- मनुष्य इस जन्म में सिर्फ परमात्मा का सिमरन करने के लिए जन्मा है। पर पैदा होते ही इसे ठगनी माया ठॅग लेती है। (ये आम प्रचलित विचार है कि) जीव माँ के पेट में उल्टे लटके हुए परमात्मा का भजन करते रहते हैं। वहां श्वास-श्वास प्रभू को सिमरते रहते हैं (पर प्रभू की अजब माया है कि) जिस माया को अवश्य ही छोड़ जाना है उससे सारी जिंदगी फसे रहते हैं। पर जो प्रभू सारे पदार्थ देने वाला है उसे मन से भुला देते हैं। हे नानक ! (कह,) हे मालिक प्रभू ! जिस मनुष्य पर तू कृपा करता है। उसके मन से तू लोक-परलोक में कभी नहीं बिसरता। 6।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਆਵਤ ਹੁਕਮਿ ਬਿਨਾਸ ਹੁਕਮਿ ਆਗਿਆ ਭਿੰਨ ਨ ਕੋਇ ॥
ਆਵਨ ਜਾਨਾ ਤਿਹ ਮਿਟੈ ਨਾਨਕ ਜਿਹ ਮਨਿ ਸੋਇ ॥੧॥
सलोकु ॥
आवत हुकमि बिनास हुकमि आगिआ भिंन न कोइ ॥
आवन जाना तिह मिटै नानक जिह मनि सोइ ॥१॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक॥ जीव प्रभू के हुकम में पैदा होता है। हुकम में ही मरता है। कोई भी जीव प्रभू के हुकम से आकी नहीं हो सकता। हे नानक ! (सिर्फ) उस जीव का जन्म मरण (का चक्कर) खत्म होता है जिस के मन में वह (हुकम का मालिक प्रभू) बसता है। 1।
ਪਉੜੀ ॥
ਏਊ ਜੀਅ ਬਹੁਤੁ ਗ੍ਰਭ ਵਾਸੇ ॥
ਮੋਹ ਮਗਨ ਮੀਠ ਜੋਨਿ ਫਾਸੇ ॥
ਇਨਿ ਮਾਇਆ ਤ੍ਰੈ ਗੁਣ ਬਸਿ ਕੀਨੇ ॥
ਆਪਨ ਮੋਹ ਘਟੇ ਘਟਿ ਦੀਨੇ ॥
ਏ ਸਾਜਨ ਕਛੁ ਕਹਹੁ ਉਪਾਇਆ ॥
ਜਾ ਤੇ ਤਰਉ ਬਿਖਮ ਇਹ ਮਾਇਆ ॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਸਤਸੰਗਿ ਮਿਲਾਏ ॥
ਨਾਨਕ ਤਾ ਕੈ ਨਿਕਟਿ ਨ ਮਾਏ ॥੭॥
पउड़ी ॥
एऊ जीअ बहुतु ग्रभ वासे ॥
मोह मगन मीठ जोनि फासे ॥
इनि माइआ त्रै गुण बसि कीने ॥
आपन मोह घटे घटि दीने ॥
ए साजन कछु कहहु उपाइआ ॥
जा ते तरउ बिखम इह माइआ ॥
करि किरपा सतसंगि मिलाए ॥
नानक ता कै निकटि न माए ॥७॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी- ये जीव अनेकों जूनियों में वास लेते हैं। मीठे मोह में मस्त हो के जूनियों के चक्कर में फंस जाते हैं। इस माया ने (जीवों को अपने) तीन गुणों के वश में कर रखा है। हरेक जीव के हृदय में इसने अपना मोह टिका दिया है। हे सज्जन ! कोई ऐसा इलाज बता। जिससे मैं इस मुश्किल माया (के मोह-रूप समुंद्र) में से पार लांघ सकूँ। हे नानक ! (कह,) प्रभू अपनी मेहर करके जिस जीव को सत्संग में मिलाता है। माया उसके नजदीक नहीं (फटक सकती)। 7।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਕਿਰਤ ਕਮਾਵਨ ਸੁਭ ਅਸੁਭ ਕੀਨੇ ਤਿਨਿ ਪ੍ਰਭਿ ਆਪਿ ॥
ਪਸੁ ਆਪਨ ਹਉ ਹਉ ਕਰੈ ਨਾਨਕ ਬਿਨੁ ਹਰਿ ਕਹਾ ਕਮਾਤਿ ॥੧॥
सलोकु ॥
किरत कमावन सुभ असुभ कीने तिनि प्रभि आपि ॥
पसु आपन हउ हउ करै नानक बिनु हरि कहा कमाति ॥१॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक॥ (हरेक जीव में बैठ के) सब अच्छे बुरे काम वह स्वयं ही कर रहा है (प्रभू ने खुद किए हैं)। पर हे नानक ! मूर्ख मनुष्य गुमान करता है कि मैं करता हूँ। प्रभू की प्रेरणा के बिना जीव कुछ भी नहीं कर सकता। 1।
ਪਉੜੀ ॥
ਏਕਹਿ ਆਪਿ ਕਰਾਵਨਹਾਰਾ ॥
ਆਪਹਿ ਪਾਪ ਪੁੰਨ ਬਿਸਥਾਰਾ ॥
ਇਆ ਜੁਗ ਜਿਤੁ ਜਿਤੁ ਆਪਹਿ ਲਾਇਓ ॥
ਸੋ ਸੋ ਪਾਇਓ ਜੁ ਆਪਿ ਦਿਵਾਇਓ ॥
ਉਆ ਕਾ ਅੰਤੁ ਨ ਜਾਨੈ ਕੋਊ ॥
ਜੋ ਜੋ ਕਰੈ ਸੋਊ ਫੁਨਿ ਹੋਊ ॥
ਏਕਹਿ ਤੇ ਸਗਲਾ ਬਿਸਥਾਰਾ ॥
ਨਾਨਕ ਆਪਿ ਸਵਾਰਨਹਾਰਾ ॥੮॥
पउड़ी ॥
एकहि आपि करावनहारा ॥
आपहि पाप पुंन बिसथारा ॥
इआ जुग जितु जितु आपहि लाइओ ॥
सो सो पाइओ जु आपि दिवाइओ ॥
उआ का अंतु न जानै कोऊ ॥
जो जो करै सोऊ फुनि होऊ ॥
एकहि ते सगला बिसथारा ॥
नानक आपि सवारनहारा ॥८॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी- (जीवों से अच्छे बुरे काम) कराने वाला प्रभू सिर्फ खुद ही है। उस ने खुद ही अच्छे बुरे कामों का पसारा पसारा हुआ है। इस मानस जनम में (भाव। जनम दे के) जिस जिस तरफ प्रभू खुद लगाता है (उधर ही जीव लगते हैं)। जो (मति) प्रभू खुद जीवों को देता है। वही वे ग्रहण करते हैं। उस प्रभू के गुणों का कोई अंत नहीं जान सकता। (जगत में) वही कुछ हो रहा है जो प्रभू खुद करता है। हे नानक ! ये सारा जगत पसारा प्रभू का ही पसारा हुआ है। वह स्वयं ही जीवों को सीधे रास्ते पर डालने वाला है। 8।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਰਾਚਿ ਰਹੇ ਬਨਿਤਾ ਬਿਨੋਦ ਕੁਸਮ ਰੰਗ ਬਿਖ ਸੋਰ ॥
ਨਾਨਕ ਤਿਹ ਸਰਨੀ ਪਰਉ ਬਿਨਸਿ ਜਾਇ ਮੈ ਮੋਰ ॥੧॥
सलोकु ॥
राचि रहे बनिता बिनोद कुसम रंग बिख सोर ॥
नानक तिह सरनी परउ बिनसि जाइ मै मोर ॥१॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक ॥ (हम जीव) स्त्री आदि के रंग-तमाशों में मस्त हो रहे हैं। पर ये माया की फूं-फां कुसंभ के रंग की तरह (क्षिण भंगुर ही है।) हे नानक ! (कह,) मैं तो उस प्रभू की शरण पड़ता हूँ (जिसकी मेहर से) अहंकार और ममता दूर हो जाती है। 1।

संदर्भ: यह अंग 251 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।

M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।

Connaught Place के Bangla Sahib में दोपहर 12 बजे का langar-समय, और बीच में यह पंक्ति।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 59 पंक्तियों का है, 11 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 251” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 252 →, पीछे का: ← अंग 250

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।