सनातन धर्म क्या है
एक शब्द को दो टुकड़ों में बाँटिए, फिर उसका दावा सुनिए, फिर देखिए कि आज उसका इस्तेमाल कैसे होता है
एक शब्द है जो बहुत सुना जाता है और कम खोला जाता है। आइए, पहले उसे दो हिस्सों में रख कर देखें, फिर उसका दावा समझें, और फिर यह कि आज उसके साथ कैसा बरताव होता है।
शब्द को खोलिए
शब्द है सनातन धर्म। इसे दो हिस्सों में रखिए। सनातन, यानी जिसका आदि नहीं, जो सदा से है, शाश्वत। और धर्म, जो √धृ से बना है, धारण करने की क्रिया से, थामने से। मोनियर-विलियम्स अपनी अ संस्कृत-इंग्लिश डिक्शनरी में इस शब्द को इसी धातु के नीचे रखते हैं, और उसकी प्रविष्टि इसी अर्थ से खुलती है: जो स्थापित है, जो दृढ़ है। तो धर्म वह है जो थामे रहता है, जो किसी चीज़ को बिखरने नहीं देता। दोनों को जोड़िए, और सनातन धर्म पढ़ा जाता है शाश्वत व्यवस्था, वह नियम जो सदा से चला आता है।
धर्म का फैलाव
धर्म किसी एक अंग्रेज़ी शब्द में नहीं समाता। यह एक साथ कई अर्थ उठाए चलता है। यह वह विश्व-व्यवस्था है जिसे पुराने वेद ऋत कहते थे, उसी की विरासत। यह किसी वस्तु का अपना स्वभाव भी है, जैसे आग का धर्म जलाना। यह कर्तव्य और सही आचरण भी है। और यह समाज और नीति का नियम भी। एक ही शब्द, और इतनी थालियाँ एक साथ हाथ में।
सनातन क्यों
अब सनातन पर आइए। सनातन दर्जे का दावा करता है, उसका नाम है जिसे परंपरा अनादि मानती है, और ऐसे दावे को कोई पंचांग नहीं परख सकता। परंपरा वेद को अपौरुषेय मानती है, यानी किसी पुरुष का रचा हुआ नहीं। ऋषियों ने उसे सुना और देखा। गीता आत्मा को सनातन कहती है (2.24), और जीव को उस परम का सनातन अंश (15.7)। महाभारत जैसे महाकाव्य और धर्मशास्त्र बार-बार एक टेक दोहराते हैं, एष धर्मः सनातनः, और इसी से कुछ बातों पर मुहर लगाते हैं, अहिंसा, सत्य और क्षमा, कि ये सदा के हैं। इस टेक वाली सबसे जानी-मानी पंक्ति मनुस्मृति 4.138 की है: सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात्, न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्, प्रियं च नानृतं ब्रूयात्, एष धर्मः सनातनः। यानी सच बोलिए, प्रिय बोलिए, ऐसा सच न बोलिए जो चुभे, और ऐसा प्रिय न बोलिए जो झूठ हो, यही सनातन धर्म है।
जो बदलता है, और जो ठहरता है
अब इसे एक व्यवस्था की तरह देखिए। सनातन धर्म वह आधार है जो हर हाल में एक-सा रहता है। इनके चारों ओर परंपरा कुछ परतें रखती है जो समय और जगह से बँधी हैं। युग-धर्म, जो किसी युग के लायक़ हो। देश-काल धर्म, जो जगह और समय देख कर चले। आपद्-धर्म, जो संकट में लागू हो। और स्वधर्म, अपनी भूमिका और अपने स्वभाव का कर्तव्य। ये परतें देश-काल के हिसाब से रखी गई हैं। देश-काल बदलता है तो परतें भी बदल जाती हैं, और जो तब भी बचा रह जाता है, वही सनातन है।
नाम की कहानी
नाम पर भी एक कहानी है। हिन्दू शब्द पहले एक भूगोल का नाम था। फ़ारसी में सिन्धु नदी के पार रहने वालों को इसी नाम से पुकारा जाता था, और यूनानियों ने इसी से इण्डोस और इण्डिया बनाए। सनातन धर्म नाम बाद में अपनाया गया, अपने भीतर से दिया हुआ एक नाम, जो कहता है कि इसका कोई एक संस्थापक नहीं और कोई एक जन्म-तिथि नहीं। उन्नीसवीं सदी में इसका एक छोटा अर्थ भी चला, जब आर्य समाज के सुधारक केवल वेद पर टिके और परंपरावादी सनातनी हिन्दू उनसे अलग खड़े हुए। 1880 और 1890 के दशकों से बनी सनातन धर्म सभाओं ने यही नाम अपने झण्डे पर लिखा।
और एक बात ईमानदारी से। विल्हेम हाल्बफ़ास (इंडिया ऐंड यूरोप, 1988) और ब्रायन के. पेनिंगटन (वॉज़ हिंदूइज़्म इन्वेंटेड?, 2005), दोनों कहते हैं कि परंपरा को एक, शाश्वत और संस्थापक-रहित मान कर देखना अपने आप में कुछ हद तक एक आधुनिक रचना है, जो धर्म की पश्चिमी कोटियों के साथ बातचीत में आकार लेती गई।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
सनातन धर्म और हिन्दू धर्म एक ही हैं?
रोज़मर्रा में दोनों एक जैसे चलते हैं। फ़र्क़ इतना कि हिन्दू नाम भूगोल से आया, और सनातन धर्म नाम परंपरा ने अपने भीतर से दिया, इस ज़ोर के साथ कि इसका कोई एक आरंभ नहीं।
सनातन का मतलब बहुत पुराना है?
पुराने से आगे की बात है, बिना आदि का। बहुत पुरानी चीज़ का भी कभी आरंभ हुआ था। सनातन उसे कहते हैं जिसका परंपरा कोई आरंभ नहीं मानती, इसलिए यह दर्जे का शब्द है।
तो क्या इसमें कुछ बदलता ही नहीं?
बहुत कुछ बदलता है। युग, देश, काल और भूमिका के हिसाब से परतें बदलती रहती हैं। सनातन वह है जो इन सब के बदलने पर भी ठहरा रहता है।
धर्म का सीधा अनुवाद क्या है?
कोई एक सीधा अनुवाद हाथ नहीं आता। व्यवस्था, स्वभाव, कर्तव्य और नीति, यह सब एक साथ इसमें बसा है।
पढ़ने के लिए
- मोनियर-विलियम्स, अ संस्कृत-इंग्लिश डिक्शनरी
- गैविन फ़्लड, ऐन इंट्रोडक्शन टु हिंदूइज़्म
- विल्हेम हाल्बफ़ास, इंडिया ऐंड यूरोप: ऐन एसे इन अंडरस्टैंडिंग (1988)
- ब्रायन के. पेनिंगटन, वॉज़ हिंदूइज़्म इन्वेंटेड? ब्रिटन्स, इंडियन्स, ऐंड द कलोनियल कंस्ट्रक्शन ऑफ़ रिलिजन (2005)
सनातन धर्म को एक अटल आधार की तरह पढ़िए, और युग, देश, काल तथा स्वधर्म को उसके ऊपर चलने वाली बदलती परतों की तरह। फिर परंपरा की कोई भी बहस उठे, आप पूछ सकते हैं कि यह अटल आधार की बात है या किसी एक परत की। ज़्यादातर बहसें किसी एक परत की निकलती हैं, और यह सवाल एक वाक्य में इसे दिखा देता है।