अंग 189

अंग
189
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਸੰਤ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਜਨਮ ਮਰਣ ਤੇ ਛੋਟ ॥੧॥
ਸੰਤ ਕਾ ਦਰਸੁ ਪੂਰਨ ਇਸਨਾਨੁ ॥
ਸੰਤ ਕ੍ਰਿਪਾ ਤੇ ਜਪੀਐ ਨਾਮੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸੰਤ ਕੈ ਸੰਗਿ ਮਿਟਿਆ ਅਹੰਕਾਰੁ ॥
ਦ੍ਰਿਸਟਿ ਆਵੈ ਸਭੁ ਏਕੰਕਾਰੁ ॥੨॥
ਸੰਤ ਸੁਪ੍ਰਸੰਨ ਆਏ ਵਸਿ ਪੰਚਾ ॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਨਾਮੁ ਰਿਦੈ ਲੈ ਸੰਚਾ ॥੩॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਜਾ ਕਾ ਪੂਰਾ ਕਰਮ ॥
ਤਿਸੁ ਭੇਟੇ ਸਾਧੂ ਕੇ ਚਰਨ ॥੪॥੪੬॥੧੧੫॥
संत प्रसादि जनम मरण ते छोट ॥१॥
संत का दरसु पूरन इसनानु ॥
संत क्रिपा ते जपीऐ नामु ॥१॥ रहाउ ॥
संत कै संगि मिटिआ अहंकारु ॥
द्रिसटि आवै सभु एकंकारु ॥२॥
संत सुप्रसंन आए वसि पंचा ॥
अंम्रितु नामु रिदै लै संचा ॥३॥
कहु नानक जा का पूरा करम ॥
तिसु भेटे साधू के चरन ॥४॥४६॥११५॥

हिन्दी अर्थ: गुरू संत की कृपा से (मनुष्य को) जनम मरण के चक्र से निजात मिल जाती है। 1। (हे भाई !) गुरू संत का दर्शन (ही) मुकम्मल (तीर्थ) स्नान है। गुरू संत की कृपा से परमात्मा का नाम जपा जा सकता है। 1। रहाउ। (हे भाई !) गुरू संत की संगत में (रहने से) अहंकार दूर हो जाता है (गुरू की संगति में रहने वाले मनुष्य को) हर जगह एक परमात्मा ही नजर आता है। 2। (हे भाई !) जिस मनुष्य पर गुरू-संत मेहरवान हो जाए~ (कामादिक) पाँचों दूत उसके वश में आ जाते हैं~ वह मनुष्य आत्मिक जीवन देने वाला हरि-नाम अपने हृदय में इकट्ठा कर लेता है। 3। (पर) हे नानक ! , जिसकी बड़ी (बढ़िया) किस्मत हो उस मनुष्य को (ही) गुरू के चरण (परसने को) मिलते हैं। 4। 46। 115।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਹਰਿ ਗੁਣ ਜਪਤ ਕਮਲੁ ਪਰਗਾਸੈ ॥
ਹਰਿ ਸਿਮਰਤ ਤ੍ਰਾਸ ਸਭ ਨਾਸੈ ॥੧॥
ਸਾ ਮਤਿ ਪੂਰੀ ਜਿਤੁ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਵੈ ॥
ਵਡੈ ਭਾਗਿ ਸਾਧੂ ਸੰਗੁ ਪਾਵੈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਪਾਈਐ ਨਿਧਿ ਨਾਮਾ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਪੂਰਨ ਸਭਿ ਕਾਮਾ ॥੨॥
ਹਰਿ ਕੀ ਭਗਤਿ ਜਨਮੁ ਪਰਵਾਣੁ ॥
ਗੁਰ ਕਿਰਪਾ ਤੇ ਨਾਮੁ ਵਖਾਣੁ ॥੩॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਸੋ ਜਨੁ ਪਰਵਾਨੁ ॥
ਜਾ ਕੈ ਰਿਦੈ ਵਸੈ ਭਗਵਾਨੁ ॥੪॥੪੭॥੧੧੬॥
गउड़ी महला ५ ॥
हरि गुण जपत कमलु परगासै ॥
हरि सिमरत त्रास सभ नासै ॥१॥
सा मति पूरी जितु हरि गुण गावै ॥
वडै भागि साधू संगु पावै ॥१॥ रहाउ ॥
साधसंगि पाईऐ निधि नामा ॥
साधसंगि पूरन सभि कामा ॥२॥
हरि की भगति जनमु परवाणु ॥
गुर किरपा ते नामु वखाणु ॥३॥
कहु नानक सो जनु परवानु ॥
जा कै रिदै वसै भगवानु ॥४॥४७॥११६॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ (हे भाई !) परमात्मा के गुण गाने से (हृदय) कमल के फूल जैसा खिल उठता है। परमात्मा का नाम सिमरने से हरेक तरह के डर दूर हो जाता है। 1। (हे भाई !) वही अक्ल किसी गलती करने से बची समझो~ जिस अक्ल की बरकति से मनुष्य परमात्मा के गुण गाता है (पर ये बुद्धि उस मनुष्य के अंदर पैदा होती है जो) सौभाग्य से गुरू की संगति प्राप्त कर लेता है। 1। रहाउ। (हे भाई !) गुरू की सँगत में रहने से परमात्मा का नाम खज़ाना मिल जाता है~ और गुरू की सँगत में रहने से सभी काम सफल हो जाते हैं। 2। परमात्मा की भक्ति करने से मानस जनम सफल हो जाता है (परमात्मा की भक्ति) परमात्मा का नाम उचारना~ गुरू की कृपा से ही मिलता है। 3। हे नानक ! कह, (सिर्फ) वह मनुष्य (परमात्मा की दरगाह में) कबूल होता है~ जिसके हृदय में सदा परमात्मा (का नाम) बसता है। 4। 47। 116।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਏਕਸੁ ਸਿਉ ਜਾ ਕਾ ਮਨੁ ਰਾਤਾ ॥
ਵਿਸਰੀ ਤਿਸੈ ਪਰਾਈ ਤਾਤਾ ॥੧॥
ਬਿਨੁ ਗੋਬਿੰਦ ਨ ਦੀਸੈ ਕੋਈ ॥
ਕਰਨ ਕਰਾਵਨ ਕਰਤਾ ਸੋਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਮਨਹਿ ਕਮਾਵੈ ਮੁਖਿ ਹਰਿ ਹਰਿ ਬੋਲੈ ॥
ਸੋ ਜਨੁ ਇਤ ਉਤ ਕਤਹਿ ਨ ਡੋਲੈ ॥੨॥
ਜਾ ਕੈ ਹਰਿ ਧਨੁ ਸੋ ਸਚ ਸਾਹੁ ॥
ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਕਰਿ ਦੀਨੋ ਵਿਸਾਹੁ ॥੩॥
ਜੀਵਨ ਪੁਰਖੁ ਮਿਲਿਆ ਹਰਿ ਰਾਇਆ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਪਰਮ ਪਦੁ ਪਾਇਆ ॥੪॥੪੮॥੧੧੭॥
गउड़ी महला ५ ॥
एकसु सिउ जा का मनु राता ॥
विसरी तिसै पराई ताता ॥१॥
बिनु गोबिंद न दीसै कोई ॥
करन करावन करता सोई ॥१॥ रहाउ ॥
मनहि कमावै मुखि हरि हरि बोलै ॥
सो जनु इत उत कतहि न डोलै ॥२॥
जा कै हरि धनु सो सच साहु ॥
गुरि पूरै करि दीनो विसाहु ॥३॥
जीवन पुरखु मिलिआ हरि राइआ ॥
कहु नानक परम पदु पाइआ ॥४॥४८॥११७॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ (गुरू की कृपा से) जिस मनुष्य का मन एक परमात्मा के साथ ही रंगा रहता है~ उसे औरों के साथ ईष्या करनी भूल जाती है। 1। (जिस मनुष्य पे गुरू की कृपा होती है~ उसे कहीं भी) गोबिंद के बिना और कोई (दूसरा) नहीं दिखता। (उसे हर जगह) वही करतार दिखता है जो सब कुछ करने की स्मर्था वाला है। 1। रहाउ। (गुरू की कृपा से जो मनुष्य) मन लगा के सिमरन की कमाई करता है और मुंह से सदा परमात्मा का नाम उचारता है~ वह मनुष्य (स्वच्छ आत्मिक जीवन के स्तर से) कभी भी नहीं डोलता- ना इस लोक में ना ही परलोक में।2 (गुरू की कृपा से) जिस मनुष्य के पास परमात्मा का नाम-धन है~ वह ऐसा शाहूकार है~ जो सदा ही शाहूकार टिका रहता है। पूरे गुरू ने (परमात्मा की हजूरी में उसकी) साख बना दी है। 3। हे नानक ! कह, (गुरू की कृपा से) जिस मनुष्य को सर्व-व्यापक प्रभू~ सब जीवों की जिंदगी का सहारा प्रभू मिल पड़ा है उसने सबसे ऊँचा आत्मिक दर्जा हासिल कर लिया है। 4। 48। 117।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਨਾਮੁ ਭਗਤ ਕੈ ਪ੍ਰਾਨ ਅਧਾਰੁ ॥
ਨਾਮੋ ਧਨੁ ਨਾਮੋ ਬਿਉਹਾਰੁ ॥੧॥
ਨਾਮ ਵਡਾਈ ਜਨੁ ਸੋਭਾ ਪਾਏ ॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਜਿਸੁ ਆਪਿ ਦਿਵਾਏ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਨਾਮੁ ਭਗਤ ਕੈ ਸੁਖ ਅਸਥਾਨੁ ॥
ਨਾਮ ਰਤੁ ਸੋ ਭਗਤੁ ਪਰਵਾਨੁ ॥੨॥
ਹਰਿ ਕਾ ਨਾਮੁ ਜਨ ਕਉ ਧਾਰੈ ॥
ਸਾਸਿ ਸਾਸਿ ਜਨੁ ਨਾਮੁ ਸਮਾਰੈ ॥੩॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਜਿਸੁ ਪੂਰਾ ਭਾਗੁ ॥
ਨਾਮ ਸੰਗਿ ਤਾ ਕਾ ਮਨੁ ਲਾਗੁ ॥੪॥੪੯॥੧੧੮॥
गउड़ी महला ५ ॥
नामु भगत कै प्रान अधारु ॥
नामो धनु नामो बिउहारु ॥१॥
नाम वडाई जनु सोभा पाए ॥
करि किरपा जिसु आपि दिवाए ॥१॥ रहाउ ॥
नामु भगत कै सुख असथानु ॥
नाम रतु सो भगतु परवानु ॥२॥
हरि का नामु जन कउ धारै ॥
सासि सासि जनु नामु समारै ॥३॥
कहु नानक जिसु पूरा भागु ॥
नाम संगि ता का मनु लागु ॥४॥४९॥११८॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ भक्ति करने वाले मनुष्य के हृदय में परमात्मा का नाम उसकी जिंदगी का सहारा है। नाम ही उसके वास्ते धन है~ और नाम ही उसके वास्ते (असली) वणज-व्यापार है। 1। (हे भाई ! जिस मनुष्य के हृदय में परमात्मा का) नाम है~ वह मनुष्य (लोक परलोक में) आदर हासिल करता है~ शोभा पाता है। (पर~ ये हरी-नाम उसी मनुष्य को मिलता है) जिसे मेहर करके परमात्मा खुद (गुरू से) दिलवाता है। 1। रहाउ। परमात्मा का नाम भक्त के हृदय में आत्मिक आनंद देने का श्रोत है। जो मनुष्य परमात्मा के नाम-रंग में रंगा हुआ है~ वही भगत है। वही परमात्मा की हजूरी में कबूल है। 2। परमात्मा का नाम (परमात्मा के) सेवक को सहारा देता है~ सेवक अपनी एक-एक साँस के साथ परमात्मा का नाम (अपने हृदय में) सम्भाल के रखता है। 3। हे नानक ! कह, जिस मनुष्य के बड़े भाग्य होते हैं~ उसका (ही) मन परमात्मा के नाम के साथ प्रसन्न होता है। 4। 49। 118।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਸੰਤ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇਆ ॥
ਤਬ ਤੇ ਧਾਵਤੁ ਮਨੁ ਤ੍ਰਿਪਤਾਇਆ ॥੧॥
ਸੁਖ ਬਿਸ੍ਰਾਮੁ ਪਾਇਆ ਗੁਣ ਗਾਇ ॥
ਸ੍ਰਮੁ ਮਿਟਿਆ ਮੇਰੀ ਹਤੀ ਬਲਾਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਚਰਨ ਕਮਲ ਅਰਾਧਿ ਭਗਵੰਤਾ ॥
ਹਰਿ ਸਿਮਰਨ ਤੇ ਮਿਟੀ ਮੇਰੀ ਚਿੰਤਾ ॥੨॥
ਸਭ ਤਜਿ ਅਨਾਥੁ ਏਕ ਸਰਣਿ ਆਇਓ ॥
ਊਚ ਅਸਥਾਨੁ ਤਬ ਸਹਜੇ ਪਾਇਓ ॥੩॥
ਦੂਖੁ ਦਰਦੁ ਭਰਮੁ ਭਉ ਨਸਿਆ ॥
ਕਰਣਹਾਰੁ ਨਾਨਕ ਮਨਿ ਬਸਿਆ ॥੪॥੫੦॥੧੧੯॥
गउड़ी महला ५ ॥
संत प्रसादि हरि नामु धिआइआ ॥
तब ते धावतु मनु त्रिपताइआ ॥१॥
सुख बिस्रामु पाइआ गुण गाइ ॥
स्रमु मिटिआ मेरी हती बलाइ ॥१॥ रहाउ ॥
चरन कमल अराधि भगवंता ॥
हरि सिमरन ते मिटी मेरी चिंता ॥२॥
सभ तजि अनाथु एक सरणि आइओ ॥
ऊच असथानु तब सहजे पाइओ ॥३॥
दूखु दरदु भरमु भउ नसिआ ॥
करणहारु नानक मनि बसिआ ॥४॥५०॥११९॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ (हे भाई ! जब से) गुरू संत की कृपा से मैं परमात्मा का नाम सिमर रहा हूँ~ तब से (माया की खातिर) दौड़ने वाला मेरा मन तृप्त हो गया है। 1। हे भाई ! गुरू की कृपा से परमात्मा के) गुण गा के मैंने (वह) आत्मिक आनंद का दाता (परमात्मा) ढूँढ लिया है। (अब माया की खातिर मेरी) दौड़-भाग मिट गई है~ (मेरी माया की तृष्णा की) बला मर चुकी है। 1। रहाउ। (हे भाई ! गुरू की कृपा से) भगवान के सुंदर चरणों का ध्यान धर के परमात्मा का नाम सिमरने से मेरी (हरेक किस्म की) चिंता मिट गई है। 2। (हे भाई ! जब) मैं अनाथ~ और सारे आसरे छोड़ के एक परमात्मा की शरण आ गया~ तब आत्मिक अडोलता में टिक के मैंने उन सब (ठिकानों से) ऊँचा ठिकाना प्राप्त कर लिया । 3। (अब मेरा हरेक किस्म का) दुख-दर्द~ भटकना व डर दूर हो गया है हे नानक ! (कह, गुरू की कृपा से) सृजनहार परमात्मा मेरे मन में आ बसा है। 4। 50। 119।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਕਰ ਕਰਿ ਟਹਲ ਰਸਨਾ ਗੁਣ ਗਾਵਉ ॥
गउड़ी महला ५ ॥
कर करि टहल रसना गुण गावउ ॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ (हे भाई ! अपने गुरू की मेहर सदका) मैं अपने हाथों से (गुरमुखों की) सेवा करता हूँ और जीभ से (परमात्मा के) गुण गाता हूँ~

संदर्भ: यह अंग 189 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।

M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।

CBSE board-exam का दिन सुबह, बच्चा pencil-box check कर रहा, माँ चुप।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 55 पंक्तियों का है, 6 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 189” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 190 →, पीछे का: ← अंग 188

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।