अंग 313

अंग
313
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਜਿਨਾ ਸਾਸਿ ਗਿਰਾਸਿ ਨ ਵਿਸਰੈ ਸੇ ਪੂਰੇ ਪੁਰਖ ਪਰਧਾਨ ॥
ਕਰਮੀ ਸਤਿਗੁਰੁ ਪਾਈਐ ਅਨਦਿਨੁ ਲਗੈ ਧਿਆਨੁ ॥
ਤਿਨ ਕੀ ਸੰਗਤਿ ਮਿਲਿ ਰਹਾ ਦਰਗਹ ਪਾਈ ਮਾਨੁ ॥
ਸਉਦੇ ਵਾਹੁ ਵਾਹੁ ਉਚਰਹਿ ਉਠਦੇ ਭੀ ਵਾਹੁ ਕਰੇਨਿ ॥
ਨਾਨਕ ਤੇ ਮੁਖ ਉਜਲੇ ਜਿ ਨਿਤ ਉਠਿ ਸੰਮਾਲੇਨਿ ॥੧॥
जिना सासि गिरासि न विसरै से पूरे पुरख परधान ॥
करमी सतिगुरु पाईऐ अनदिनु लगै धिआनु ॥
तिन की संगति मिलि रहा दरगह पाई मानु ॥
सउदे वाहु वाहु उचरहि उठदे भी वाहु करेनि ॥
नानक ते मुख उजले जि नित उठि संमालेनि ॥१॥

हिन्दी अर्थ: उन्हें प्रभू एक दम के लिए भी नहीं बिसरता और वह मनुष्य (सर्व-गुण) संपूर्ण व उक्तम होते हैं (भाव। सोए हुए भी नाम में जुड़े रहते हैं और जागते हुए भी। लोगों को वे सोए हुए या जागते दिखते हैं। वे सदा नाम में लीन रहते हैं)। (प्रभू की) मेहर से सतिगुरू मिलता है और हर वक्त (सोये हुए अथवा जागते हुए मेहर से ही) जीव का ध्यान (नाम में जुड़ा रहता है)। (चिक्त चाहता है कि) मैं भी उनकी संगति करूँ और प्रभू की हजूरी में आदर पाऊँ। (सतिगुरू के सन्मुख होए हुए वे भाग्यशाली जीव) सोने के समय भी सिफतसालाह करते हैं और उठने के वक्त भी। हे नानक ! वह मुख उज्जवल होते हैं। जो सदा सुचेत रहके नाम चेते रखते हैं। 1।
ਮਃ ੪ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵੀਐ ਆਪਣਾ ਪਾਈਐ ਨਾਮੁ ਅਪਾਰੁ ॥
ਭਉਜਲਿ ਡੁਬਦਿਆ ਕਢਿ ਲਏ ਹਰਿ ਦਾਤਿ ਕਰੇ ਦਾਤਾਰੁ ॥
ਧੰਨੁ ਧੰਨੁ ਸੇ ਸਾਹ ਹੈ ਜਿ ਨਾਮਿ ਕਰਹਿ ਵਾਪਾਰੁ ॥
ਵਣਜਾਰੇ ਸਿਖ ਆਵਦੇ ਸਬਦਿ ਲਘਾਵਣਹਾਰੁ ॥
ਜਨ ਨਾਨਕ ਜਿਨ ਕਉ ਕ੍ਰਿਪਾ ਭਈ ਤਿਨ ਸੇਵਿਆ ਸਿਰਜਣਹਾਰੁ ॥੨॥
मः ४ ॥
सतिगुरु सेवीऐ आपणा पाईऐ नामु अपारु ॥
भउजलि डुबदिआ कढि लए हरि दाति करे दातारु ॥
धंनु धंनु से साह है जि नामि करहि वापारु ॥
वणजारे सिख आवदे सबदि लघावणहारु ॥
जन नानक जिन कउ क्रिपा भई तिन सेविआ सिरजणहारु ॥२॥

हिन्दी अर्थ: महला ४॥ अपने सतिगुरू की बताई हुई कार करें। तो ना खत्म होने वाला नाम (भाव नाम का खजाना) मिल जाता है। दातें देने वाला हरी (नाम की यह) दात बख्शता है और (नाम) संसार सागर में डूबते को निकाल लेता है। जो शाह नाम (की राशि) से व्यापार करते हैं वह भाग्यशाली हैं। (क्योंकि इस प्रकार का) व्यापार करने वाले जो सिख (सतिगुरू के पास) आते हैं। (सतिगुरू उनको अपने) शबद द्वारा (भवजल से) पार उतार देता है। (पर) हे दास नानक ! सृजनहार प्रभू की बंदगी वही मनुष्य करते हैं। जिन पर प्रभू स्वयं मेहर करता है। 2।
ਪਉੜੀ ॥
ਸਚੁ ਸਚੇ ਕੇ ਜਨ ਭਗਤ ਹਹਿ ਸਚੁ ਸਚਾ ਜਿਨੀ ਅਰਾਧਿਆ ॥
ਜਿਨ ਗੁਰਮੁਖਿ ਖੋਜਿ ਢੰਢੋਲਿਆ ਤਿਨ ਅੰਦਰਹੁ ਹੀ ਸਚੁ ਲਾਧਿਆ ॥
ਸਚੁ ਸਾਹਿਬੁ ਸਚੁ ਜਿਨੀ ਸੇਵਿਆ ਕਾਲੁ ਕੰਟਕੁ ਮਾਰਿ ਤਿਨੀ ਸਾਧਿਆ ॥
ਸਚੁ ਸਚਾ ਸਭ ਦੂ ਵਡਾ ਹੈ ਸਚੁ ਸੇਵਨਿ ਸੇ ਸਚਿ ਰਲਾਧਿਆ ॥
ਸਚੁ ਸਚੇ ਨੋ ਸਾਬਾਸਿ ਹੈ ਸਚੁ ਸਚਾ ਸੇਵਿ ਫਲਾਧਿਆ ॥੨੨॥
पउड़ी ॥
सचु सचे के जन भगत हहि सचु सचा जिनी अराधिआ ॥
जिन गुरमुखि खोजि ढंढोलिआ तिन अंदरहु ही सचु लाधिआ ॥
सचु साहिबु सचु जिनी सेविआ कालु कंटकु मारि तिनी साधिआ ॥
सचु सचा सभ दू वडा है सचु सेवनि से सचि रलाधिआ ॥
सचु सचे नो साबासि है सचु सचा सेवि फलाधिआ ॥२२॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। जो मनुष्य सच्चे हरी का सचमुच भजन करते हैं। वह ही सच्चे भक्त (कहलाते) हैं। जो मनुष्य गुरू के सन्मुख हो कर खोज के ढूँढते हैं (भाव। यत्न से तलाशते हैं) वे अपने हृदय में ही प्रभू को पा लेते हैं। जिन मनुष्यों ने सच्चा सांई सचमुच सिमरा है उन्होंने दुखदाई काल को मार के काबू कर लिया है। (भाव। उन्हे काल काँटे के समान दुखद प्रतीत नहीं होता)। जो सच्चा हरी सबसे बड़ा है। उसकी बंदगी जो मनुष्य करते हैं। वह उस में लीन हो जाते हैं। धन्य है सच्चा प्रभू। धन्य है सच्चा प्रभू (इस तरह) जो मनुष्य सचमुच सच्चे की आराधना करते हैं। उन्हें उक्तम फल प्राप्त होता है (भाव। वे मानस जनम को सफल कर लेते हैं)। 22।
ਸਲੋਕ ਮਃ ੪ ॥
ਮਨਮੁਖੁ ਪ੍ਰਾਣੀ ਮੁਗਧੁ ਹੈ ਨਾਮਹੀਣ ਭਰਮਾਇ ॥
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਮਨੂਆ ਨਾ ਟਿਕੈ ਫਿਰਿ ਫਿਰਿ ਜੂਨੀ ਪਾਇ ॥
ਹਰਿ ਪ੍ਰਭੁ ਆਪਿ ਦਇਆਲ ਹੋਹਿ ਤਾਂ ਸਤਿਗੁਰੁ ਮਿਲਿਆ ਆਇ ॥
ਜਨ ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਸਲਾਹਿ ਤੂ ਜਨਮ ਮਰਣ ਦੁਖੁ ਜਾਇ ॥੧॥
सलोक मः ४ ॥
मनमुखु प्राणी मुगधु है नामहीण भरमाइ ॥
बिनु गुर मनूआ ना टिकै फिरि फिरि जूनी पाइ ॥
हरि प्रभु आपि दइआल होहि तां सतिगुरु मिलिआ आइ ॥
जन नानक नामु सलाहि तू जनम मरण दुखु जाइ ॥१॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला ४॥ मनमुख मनुष्य मूर्ख है। नाम से टूटा हुआ भटकता फिरता है। सतिगुरू के बिना उसका होछा मन (किसी आसरे पर) टिक नहीं सकता (इस वास्ते) बार-बार जूनियों में पड़ता है। यदि हरी प्रभू खुद मेहर करे तो सतिगुरू आ के मिलता है (और नाम के आसरे टिका के भटकने से बचा लेता है)। (इस वास्ते) हे दास नानक ! तू भी नाम की सिफत सालाह कर (ता कि) तेरा सारी उम्र का दुख खत्म हो जाए। 1।
ਮਃ ੪ ॥
ਗੁਰੁ ਸਾਲਾਹੀ ਆਪਣਾ ਬਹੁ ਬਿਧਿ ਰੰਗਿ ਸੁਭਾਇ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਸੇਤੀ ਮਨੁ ਰਤਾ ਰਖਿਆ ਬਣਤ ਬਣਾਇ ॥
ਜਿਹਵਾ ਸਾਲਾਹਿ ਨ ਰਜਈ ਹਰਿ ਪ੍ਰੀਤਮ ਚਿਤੁ ਲਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਵੈ ਕੀ ਮਨਿ ਭੁਖ ਹੈ ਮਨੁ ਤ੍ਰਿਪਤੈ ਹਰਿ ਰਸੁ ਖਾਇ ॥੨॥
मः ४ ॥
गुरु सालाही आपणा बहु बिधि रंगि सुभाइ ॥
सतिगुर सेती मनु रता रखिआ बणत बणाइ ॥
जिहवा सालाहि न रजई हरि प्रीतम चितु लाइ ॥
नानक नावै की मनि भुख है मनु त्रिपतै हरि रसु खाइ ॥२॥

हिन्दी अर्थ: महला ४॥ (मन चाहता है कि) कई तरह (भाव कई तरह की उमंगों के साथ भाव-विभोर हो के) प्यारे सतिगुरू के प्यार में और स्वभाव में (लीन हो के) उसकी सिफत सालाह करूँ। मेरा मन प्यारे सतिगुरू के साथ रंगा गया है। (गुरू ने मेरे मन को) सवार बना दिया है। मेरी जीभ सिफत-सलाह करके तृप्त नहीं होती और मन प्रीतम प्रभू के साथ (नेह) लगा के नहीं भरता। (भरे भी कैसे?) हे नानक ! मन में तो नाम की भूख है। मन तभी तृप्त हो अगर प्रभू के नाम का स्वाद चख ले। 2।
ਪਉੜੀ ॥
ਸਚੁ ਸਚਾ ਕੁਦਰਤਿ ਜਾਣੀਐ ਦਿਨੁ ਰਾਤੀ ਜਿਨਿ ਬਣਾਈਆ ॥
ਸੋ ਸਚੁ ਸਲਾਹੀ ਸਦਾ ਸਦਾ ਸਚੁ ਸਚੇ ਕੀਆ ਵਡਿਆਈਆ ॥
ਸਾਲਾਹੀ ਸਚੁ ਸਲਾਹ ਸਚੁ ਸਚੁ ਕੀਮਤਿ ਕਿਨੈ ਨ ਪਾਈਆ ॥
ਜਾ ਮਿਲਿਆ ਪੂਰਾ ਸਤਿਗੁਰੂ ਤਾ ਹਾਜਰੁ ਨਦਰੀ ਆਈਆ ॥
ਸਚੁ ਗੁਰਮੁਖਿ ਜਿਨੀ ਸਲਾਹਿਆ ਤਿਨਾ ਭੁਖਾ ਸਭਿ ਗਵਾਈਆ ॥੨੩॥
पउड़ी ॥
सचु सचा कुदरति जाणीऐ दिनु राती जिनि बणाईआ ॥
सो सचु सलाही सदा सदा सचु सचे कीआ वडिआईआ ॥
सालाही सचु सलाह सचु सचु कीमति किनै न पाईआ ॥
जा मिलिआ पूरा सतिगुरू ता हाजरु नदरी आईआ ॥
सचु गुरमुखि जिनी सलाहिआ तिना भुखा सभि गवाईआ ॥२३॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ जिस प्रभू ने दिन और रात (जैसे चमत्कार) बनाए हैं। वह सच्चा प्रभू (इस) कुदरति से ही सचमुच (बहुत बड़ी महिमा वाला) प्रतीत होता है; (मेरा मन चाहता है कि) मैं सदा उस सच्चे प्रभू की सिफत सालाह करूँ और महिमा कहूँ। सराहनीय प्रभू सच्चा है। उसकी महिमा भी स्थिर रहने वाली है। पर किसी ने उसकी कीमत नहीं पाई। जब पूरन सतिगुरू मिलता है तो वह महानताएं प्रत्यक्ष दिख पड़ती हैं। जो मनुष्य सतिगुरू के सन्मुख हो के (भाव। स्वै भाव गवा के) सच्चे प्रभू की वडिआई करते हैं। उनकी सारी भूख दूर हो जाती हैं। 23।
ਸਲੋਕ ਮਃ ੪ ॥
ਮੈ ਮਨੁ ਤਨੁ ਖੋਜਿ ਖੋਜੇਦਿਆ ਸੋ ਪ੍ਰਭੁ ਲਧਾ ਲੋੜਿ ॥
ਵਿਸਟੁ ਗੁਰੂ ਮੈ ਪਾਇਆ ਜਿਨਿ ਹਰਿ ਪ੍ਰਭੁ ਦਿਤਾ ਜੋੜਿ ॥੧॥
सलोक मः ४ ॥
मै मनु तनु खोजि खोजेदिआ सो प्रभु लधा लोड़ि ॥
विसटु गुरू मै पाइआ जिनि हरि प्रभु दिता जोड़ि ॥१॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला ४॥ मन और शरीर को खोजते-खोजते मैंने (अंत में) प्रभू को ढूँढ ही लिया (पर मैं अपने बल पर नहीं ढूँढ सकता था)। मुझे सतिगुरू वकील मिल गया। जिसने हरी प्रभू मिला दिया। 1।
ਮਃ ੩ ॥
ਮਾਇਆਧਾਰੀ ਅਤਿ ਅੰਨਾ ਬੋਲਾ ॥
ਸਬਦੁ ਨ ਸੁਣਈ ਬਹੁ ਰੋਲ ਘਚੋਲਾ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਜਾਪੈ ਸਬਦਿ ਲਿਵ ਲਾਇ ॥
ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਸੁਣਿ ਮੰਨੇ ਹਰਿ ਨਾਮਿ ਸਮਾਇ ॥
ਜੋ ਤਿਸੁ ਭਾਵੈ ਸੁ ਕਰੇ ਕਰਾਇਆ ॥
ਨਾਨਕ ਵਜਦਾ ਜੰਤੁ ਵਜਾਇਆ ॥੨॥
मः ३ ॥
माइआधारी अति अंना बोला ॥
सबदु न सुणई बहु रोल घचोला ॥
गुरमुखि जापै सबदि लिव लाइ ॥
हरि नामु सुणि मंने हरि नामि समाइ ॥
जो तिसु भावै सु करे कराइआ ॥
नानक वजदा जंतु वजाइआ ॥२॥

हिन्दी अर्थ: महला ३॥ जिस मनुष्य ने (हृदय में) माया (का प्यार) धारण किया हुआ है वह (सतिगुरू की ओर से) अंधा और बहरा है (भाव। ना सतिगुरू के दर्शन करके पतीज सकता है और ना ही उपदेश सुन के)। वह मनुष्य सतिगुरू के शब्दों की ओर ध्यान ही नहीं देता। (पर) (माया का) बेमतलब खपाने वाला (भाव। सिर दर्द कराने वाला) शोर बहुत (पसंद करता है)। जो मनुष्य सतिगुरू के सन्मुख होता है। (वह ऐसे) दिखाई देता है (कि) वह गुरू के शबद में बिरती जोड़ता है। हरी के नाम को सुन के उस पर सिदक लाता है और हरी के नाम में (ही) लीन हो जाता है। (पर मायाधारी अथवा गुरमुखि के क्या हाथ?) जो कुछ उस प्रभू को ठीक लगता है (उसी के अनुसार) ये जीव करवाया काम करता है। हे नानक ! जीव (बाजे की तरह) बजाए बजता है (भाव। बुलाने से बोलता है)। 2।

संदर्भ: यह अंग 313 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Raam Daas Ji।

Hauz Khas Village के lake के पास बैठ कर पानी देखना।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 43 पंक्तियों का है, 8 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 313” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 314 →, पीछे का: ← अंग 312

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।