Background
माण्डूक्य उपनिषद् अथर्ववेद से ली गई है, और उन दस मुख्य उपनिषदों में से एक है जिन पर आदि शंकराचार्य ने भाष्य लिखा। नाम मण्डूक ऋषि की शाखा से पड़ा।
यह उपनिषद् केवल 12 मन्त्र की है। मगर इन 12 मन्त्र में जो कहा गया है, वो पूरी अद्वैत वेदान्त की नींव है। बाद में गौडपाद ने इस पर एक प्रसिद्ध ‘कारिका’ लिखी, जो माण्डूक्य से भी बड़ी हो गई। और गौडपाद के शिष्य के शिष्य आदि शंकराचार्य ने उसी पर अपना भाष्य लिखा।
इसका विषय एक सरल सा है, मगर साधारण सोच के लिए चौंकाने वाला: चेतना की चार अवस्थाएँ हैं, और ‘ओम्’ का अक्षर इन चारों का map है। ‘अ’, ‘उ’, ‘म्’, और इन तीनों के बाद की चुप्पी।
अगर आप एक उपनिषद् पढ़कर वेदान्त समझना चाहते हैं, तो परंपरा कहती है, यही पढ़ो। और बार-बार पढ़ो।
कथा-सार (Story in Brief)
एक छोटा सा thought experiment: कल आपने क्या किया? सुबह उठे, चाय पी, काम पर गए, रात को सोए। यह जागरण-अवस्था है। आप बाहर देख रहे थे, सुन रहे थे, छू रहे थे।
फिर रात में एक सपना आया। उसमें भी आपने कुछ देखा, कुछ सुना। मगर वो सब आपके अपने मन के अंदर था। यह स्वप्न-अवस्था है। बाहर कुछ नहीं था, अंदर सब कुछ था।
फिर एक पल आया जब सपने भी नहीं चल रहे थे। बिल्कुल चुप, गहरी नींद। आप थे, यह आप जानते हैं, क्योंकि सुबह उठकर आप कहते हैं ‘अच्छी नींद आई।’ मगर उस वक़्त ‘मैं हूँ’ भी कहीं नहीं था। यह सुषुप्ति-अवस्था है।
माण्डूक्य पूछती है, अगर आप तीनों अवस्थाओं में मौजूद थे, तो वो ‘आप’ कौन है जो तीनों को जानता है? वो जागरण नहीं, स्वप्न नहीं, सुषुप्ति नहीं। वो चौथा है, तुरीय। और वो ओम् की चौथी मात्रा है, जो ओम् के बाद की चुप्पी है।
Introduction
अगर कभी आप गहरी नींद से अचानक उठें, तो एक छोटा सा पल होता है जब कुछ याद नहीं आता। नाम नहीं, काम नहीं, चिंताएँ नहीं। फिर धीरे-धीरे ‘मैं’ लौटता है, फिर ‘मेरा घर’, ‘मेरा फ़ोन’, ‘मेरा problem’।
उस छोटे से पल में, जब ‘मैं’ लौट नहीं था, फिर भी कोई था जो जागा। माण्डूक्य उसी के बारे में है।
भूमिका
मन्त्र 1
भूतं भवद्भविष्यदिति सर्वमोङ्कार एव ।
यच्चान्यत् त्रिकालातीतं तदप्योङ्कार एव ॥
मन्त्र 2
सोऽयमात्मा चतुष्पात् ॥
दूसरा मन्त्र सबसे छोटा है, और शायद सबसे radical। तीन वाक्य:
सर्वं ह्येतद् ब्रह्म, यह सब ब्रह्म है। बाहर की दुनिया, घर, सड़क, smartphone, सब। अयमात्मा ब्रह्म, यह जो भीतर बैठा ‘मैं’ है, वो भी ब्रह्म ही है। और सोऽयमात्मा चतुष्पात्, यह आत्मा चार पादों वाला है।
यह statement बृहदारण्यक के ‘अहं ब्रह्मास्मि’ और छान्दोग्य के ‘तत्त्वमसि’ के साथ मिलकर ‘महावाक्य’ बनाता है। यह पंक्ति आत्मा और ब्रह्म को एक बता देती है, बिना किसी qualification के। बाक़ी दस मन्त्र इस statement को unpack करते हैं।
तीन ज्ञात अवस्थाएँ
मन्त्र 3
स्थूलभुग् वैश्वानरः प्रथमः पादः ॥
पहला पाद, वैश्वानर। यानी आप जब जागे हुए हैं। ‘बहिष्प्रज्ञ’ मतलब बाहर की तरफ़ चेतना। आप अभी इस screen को देख रहे हैं, यह बहिष्प्रज्ञ है।
‘सात अंग’ पारंपरिक रूप से शरीर के सात अंग माने जाते हैं (सिर, आँख, साँस, मुँह, कान, हाथ, पैर)। ‘उन्नीस मुख’ पाँच ज्ञानेन्द्रिय + पाँच कर्मेन्द्रिय + पाँच प्राण + मन + बुद्धि + चित्त + अहंकार। यानी हमारी पूरी ‘system’ जिसके through हम दुनिया से contact करते हैं।
और ‘स्थूलभुक्’ मतलब stool, ठोस चीज़ों का भोक्ता। जागरण में हम physical things से लेन-देन करते हैं।
मन्त्र 4
प्रविविक्तभुक् तैजसो द्वितीयः पादः ॥
दूसरा पाद, तैजस। यह स्वप्न-अवस्था है। ‘अन्तःप्रज्ञ’ यानी अब चेतना बाहर नहीं, अंदर देखती है। आँखें बंद हैं, मगर एक पूरा संसार बन रहा है। चेहरे, आवाज़ें, परिस्थितियाँ। सब कहाँ से आ रहा है? आपके अपने मन से।
वही सात अंग, वही उन्नीस मुख। यानी जिस अहंकार ने जागते वक़्त ‘मैं’ पकड़ा था, वो ही अब सपने में ‘मैं’ बना है। बस material बदला। पहले external था, अब internal।
‘प्रविविक्तभुक्’ का मतलब है subtle चीज़ों का भोक्ता। सपने में जो आप ‘खा’ रहे हैं, वो असली खाना नहीं, उसका मानसिक रूप है।
मन्त्र 5
न कञ्चन स्वप्नं पश्यति तत् सुषुप्तम् ।
सुषुप्तस्थान एकीभूतः प्रज्ञानघन एव
आनन्दमयो ह्यानन्दभुक् चेतोमुखः प्राज्ञस्तृतीयः पादः ॥
तीसरा पाद, प्राज्ञ। यह गहरी नींद है, बिना सपने वाली। यहाँ कुछ भी नहीं हो रहा है, मगर आप ‘थे’। सुबह उठकर आप कहते हैं ‘अच्छी नींद आई’, तो कोई वहाँ था जो इस अनुभव को remember कर रहा है।
‘एकीभूत’ मतलब सब एक हो गया। जागरण-स्वप्न में जो subject-object का खेल था, वो यहाँ रुक गया। ‘प्रज्ञानघन’ मतलब चेतना का सघन रूप। बिना किसी content के, बस होना।
उपनिषद् इसे ‘आनन्दमय’ कहती है। यहाँ ध्यान देने वाली बात है, हमें यह आनन्द ‘याद’ नहीं आता क्योंकि ‘याद’ करने वाला अहंकार वहाँ था ही नहीं। फिर भी जब हम उठते हैं, हम कहते हैं ‘सुख से सोए।’ वो सुख तब था, बिना किसी witness के। यह एक clue है, बाद में काम आएगा।
मन्त्र 6
एष योनिः सर्वस्य प्रभवाप्ययौ हि भूतानाम् ॥
एक पॉवरफुल मन्त्र। प्राज्ञ (deep sleep state) को ‘सर्वेश्वर’, ‘सर्वज्ञ’, ‘अन्तर्यामी’, ‘सब का स्रोत’ कहा। यानी जो हमारी रोज़ की deep sleep थी, उसी में पूरा ब्रह्मांड समाया हुआ है।
यहाँ माण्डूक्य एक बहुत बारीक काम करती है। यह बता रही है कि deep sleep और cosmic causal state (ईश्वर) एक ही तत्व के दो रूप हैं। आपकी अपनी गहरी नींद और सृष्टि का beej, दोनों एक ही जगह से चलते हैं।
लेकिन यह अभी final नहीं। प्राज्ञ अभी भी ‘पाद’ है, यानी आत्मा का एक हिस्सा। पूरा आत्मा अगले मन्त्र में आएगा।
चौथी अवस्था
मन्त्र 7
न प्रज्ञानघनं न प्रज्ञं नाप्रज्ञम् ।
अदृष्टमव्यवहार्यमग्राह्यमलक्षणम्
अचिन्त्यमव्यपदेश्यमेकात्मप्रत्ययसारम् ।
प्रपञ्चोपशमं शान्तं शिवमद्वैतं
चतुर्थं मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेयः ॥
यह माण्डूक्य का सबसे प्रसिद्ध मन्त्र है। तुरीय का वर्णन। और वर्णन क्या है? केवल negations। ‘न यह, न वो, न दोनों, न कुछ और।’
क्यों ऐसा करना पड़ा? क्योंकि तुरीय कोई अवस्था नहीं है। यह तीनों अवस्थाओं के बीच कहीं छिपा हुआ नहीं है। यह तीनों का substrate है। जैसे screen पर तीन films चलें, और तीनों के पीछे एक ही screen रहे, वैसा। तुरीय वो screen है।
और इसलिए कोई भी positive description गलत होगा। कह दो ‘यह चेतना है’, तो तुरीय की एक object-like image बन जाएगी। तो उपनिषद् कहती है, बस यह जान लो कि यह क्या नहीं है। और जो बच जाता है, वही तुरीय है।
‘अद्वैत’ शब्द यहाँ पहली बार आता है। ‘दो नहीं।’ यानी देखने वाले और देखे जाने वाले का भेद यहाँ नहीं रहता।
ओम् की मात्राएँ
मन्त्र 8
पादा मात्रा मात्राश्च पादा
अकार उकारो मकार इति ॥
अब उपनिषद् एक नया move करती है। पहले चेतना की चार अवस्थाएँ बताईं। अब उन्हीं को ‘ओम्’ के साथ map करती है।
‘ओम्’ को लिखकर देखो: अ-उ-म। तीन sounds। और जब आप पूरा ‘ओम्’ बोलते हैं, तो अंत में एक छोटी सी चुप्पी आती है। ‘अ’ से शुरू, ‘म’ पर बंद, और फिर silence।
यह चार आवाज़ें (तीन sounds + silence) चार चेतना-अवस्थाओं के साथ बैठती हैं। ‘अ’ = जागरण, ‘उ’ = स्वप्न, ‘म’ = सुषुप्ति, silence = तुरीय।
मन्त्र 9
आप्तेरादिमत्त्वाद् वा ।
आप्नोति ह वै सर्वान् कामान् आदिश्च भवति
य एवं वेद ॥
‘अ’ की दो विशेषताएँ हैं: यह सब letters में आदि है (पहला), और यह सब letters में आप्ति (पहुँच) देता है। बिना ‘अ’ के कोई sound बन नहीं सकती। मुँह खोलते ही ‘अ’ निकलता है।
वैसे ही वैश्वानर (जागरण) भी हमारी अनुभव की ‘आदि’ है। हम जागरण से ही शुरू करते हैं। और जागरण से ही हम बाक़ी अनुभवों तक पहुँचते हैं।
जो इस map को जान लेता है, उसे सब इच्छाएँ मिलती हैं और वो हर मामले में आदि बनता है। यह कोई magical claim नहीं है। यह वो practical effect है जो होशियारी से ‘अ’ की position पहचानने पर मिलता है।
मन्त्र 10
उत्कर्षाद् उभयत्वाद् वा ।
उत्कर्षति ह वै ज्ञानसन्ततिं समानश्च भवति,
नास्याब्रह्मवित्कुले भवति य एवं वेद ॥
‘उ’ की दो विशेषताएँ: उत्कर्ष (बढ़ना) और उभय (दोनों के बीच होना)। ‘अ’ से ‘म’ तक जाने में ‘उ’ बीच में है। और ‘उ’ एक तरह से ‘अ’ को ‘म’ तक ले जाता है, बढ़ाता है।
वैसे ही तैजस (स्वप्न) जागरण और सुषुप्ति के बीच का पुल है। और सपने हमारे जागते अनुभवों को बढ़ाते हैं, उन्हें process करते हैं।
जो ऐसा जानता है, उसकी ज्ञान-सन्तति (knowledge lineage) बढ़ती है। और ‘न उसके कुल में कोई अब्रह्म-वित् नहीं होता’ मतलब उसकी विद्या रुकती नहीं, आगे की पीढ़ियों तक जाती है।
मन्त्र 11
मितेरपीतेर्वा ।
मिनोति ह वा इदं सर्वमपीतिश्च भवति
य एवं वेद ॥
‘म्’ का दो काम है: मिति (नापना, समेटना) और अपीति (विलय)। जब आप ‘ओम्’ बोलते हैं, अंत में ‘म’ पर मुँह बंद हो जाता है। सब sounds उसी में समा जाते हैं।
वैसे ही सुषुप्ति (प्राज्ञ) में जागरण-स्वप्न के सब अनुभव एकीभूत हो जाते हैं। आपकी रोज़ की life, आपके सपने, सब के सब रात की गहरी नींद में dissolve हो जाते हैं।
जो ऐसा जानता है, वो भी सब अनुभवों को नापता है (समेटता है), और सब अनुभव उसमें मिल जाते हैं।
मन्त्र 12
शिवोऽद्वैतः ।
एवमोङ्कार आत्मैव संविशत्यात्मनात्मानं
य एवं वेद य एवं वेद ॥
अंतिम मन्त्र। तुरीय का फिर से उल्लेख, मगर अब ओम् के context में। तुरीय ‘अमात्र’ है, यानी इसकी कोई मात्रा नहीं। यह तीन sounds (अ-उ-म) के बाद की चुप्पी है।
‘अव्यवहार्य’ (इसके साथ कोई transaction नहीं हो सकता), ‘प्रपञ्चोपशम’ (सारी दुनिया का शान्त हो जाना), ‘शिव’ (मंगलमय), ‘अद्वैत’ (एक, बिना दूसरे के)।
और एक practical commitment: जो ऐसा जान लेता है, वो ख़ुद से ख़ुद में प्रवेश कर जाता है। यानी और कहीं नहीं जाना है। बाहर नहीं देखना है। अपनी ही चेतना के भीतर का जो substrate है, उसी में स्थित हो जाना है।
अंत में दो बार ‘य एवं वेद, य एवं वेद’। ‘जो ऐसा जानता है, जो ऐसा जानता है।’ उपनिषदों की repetition यह है कि ‘अब बात पूरी हो गई, इससे आगे कुछ नहीं।’ किताब बंद।
उपनिषद् की शुरुआत ही बड़ी direct है। बिना भूमिका, बिना preamble। पहली ही पंक्ति में कह दिया, ‘ओम् = सब कुछ।’
‘अक्षर’ का literal मतलब है ‘जो क्षीण न हो’, यानी जो टिका रहे। ओम् एक ध्वनि है, मगर ऐसी ध्वनि जो किसी और ध्वनि पर निर्भर नहीं। उसके पीछे और कोई बीज नहीं।
और फिर एक छोटा सा qualifier: जो भूत-भविष्य-वर्तमान में है, वो तो ओम् है ही, पर जो तीनों कालों के बाहर है, वो भी ओम् है। यानी ओम् केवल समय में नहीं बँधा, समय से पहले और बाद का जो tatva है, वो भी इसी में।