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माण्डूक्य उपनिषद्

अथर्व वेद · उपनिषद्
बारह मन्त्र, और उनमें ॐ की तीन मात्राओं पर टँगी हमारी जागने, सपने और गहरी नींद की पूरी ज़िंदगी।

ऋषियों की उस पुरानी परम्परा में एक दृश्य ऐसा भी है जहाँ कोई कथा नहीं चलती, कोई उपमा नहीं, कोई किस्सा नहीं। साधक बैठा है, साँस थमी हुई है, और गुरु केवल एक ध्वनि की ओर इशारा करते हैं, ॐ। स्वामी कृष्णानन्द (श्री शिवानन्द की परम्परा के वेदान्ताचार्य) कहते हैं कि यह उपनिषद् न कोई दृष्टान्त देता है, न कहानी सुनाता है, न तुलना करता है, बस मनुष्य के और परम सत्य के नंगे तथ्य रख देता है।

आरम्भ ही एक गम्भीर घोषणा से होता है, ॐ इत्येतदक्षरमिदं सर्वम् (यह अक्षर ॐ ही यह सब कुछ है)। जो बीत गया, जो है, और जो आगे आएगा, वह सब मानो इसी एक सत्य की व्याख्या है। स्वामी जी के अनुसार आप जब ॐ का जप करते हैं तो आप उसे रचते नहीं, जो स्पन्दन पहले से वहाँ है उसी से अपना स्वर मिला लेते हैं।

इसी का नाम है माण्डूक्य उपनिषद्, अर्थात् मण्डूक नामक ऋषि को प्रकट हुई वह गुप्त विद्या (रहस्य-शिक्षा)। अथर्ववेद से आया यह उपनिषद् आकार में छोटे-से-छोटा है, केवल बारह मन्त्र (कथन), पर स्वामी कृष्णानन्द इसे मुमुक्षु (मुक्ति-अभिलाषी) के लिए अकेला पर्याप्त बताते हैं, माण्डूक्यमेकमेवालं मुमुक्षूणां विमुक्तये, और कहते हैं कि इसका असली अर्थ समझ में आ जाए तो छान्दोग्य या बृहदारण्यक तक पढ़ने की आवश्यकता न रहे।

इसका ढाँचा एक ही धागे पर बुना है, ॐ की तीन मात्राएँ अ, उ और म, तथा उनके परे का मौन, और चेतना की चार अवस्थाएँ, जागृत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय (चौथी, परम अवस्था)। स्वामी जी के अनुसार आत्मा अभिधेय (जिसे कहा जाए) है और ॐ अभिधान (जो कहे), इसलिए मूल सवाल यही है, ध्वनि की इन मात्राओं में से होते हुए आप उस चौथे, अनकहे को कैसे जान लें, जिसे जान लेना ही पूरी मुक्ति है।

ॐ ही यह सब है

स्वामी कृष्णानन्द अपने शिष्यों के सामने माण्डूक्य उपनिषद् (ऋषि मण्डूक से उतरी वह गुप्त विद्या जिसका नाम उन्हीं के नाम पर पड़ा) खोलकर बैठे हैं। शुरुआत में ही वे बता देते हैं कि यह उपनिषद् और उपनिषदों जैसा नहीं चलता। यह कोई कहानी नहीं सुनाता, न उपमाएँ देता है, न तुलनाएँ करता है। यह सीधे मनुष्य की और सत्ता की असली बनावट के नंगे तथ्य रखता है। केवल बारह मन्त्रों में सारी उपनिषद्-विद्या इसने एक मुट्ठी में बाँध दी है। इसीलिए परम्परा कहती है, मुमुक्षु (मुक्ति का अभिलाषी) के लिए अकेला माण्डूक्य ही बहुत है, और जो इसका असली अर्थ पकड़ ले उसे छान्दोग्य या बृहदारण्यक तक खंगालने की ज़रूरत नहीं रहती।

पहली ही पंक्ति एक गम्भीर घोषणा है, ॐ ही वह अक्षर (कभी न क्षय होने वाला, अविनाशी) है, और यही सब कुछ है। जो बीत गया, जो अभी है, जो आगे आएगा, वह सब इसी एक सत्य की मानो व्याख्या भर है, और परम्परा का वाक्य दोहराते हुए स्वामी जी कहते हैं, सर्वम् ॐकार एव (सब कुछ ॐ ही है)। जो भी आँख से दिखे, मन से पकड़ा जाए, अनुमान या शास्त्र-वचन से जाना जाए, जो भी एक शब्द सृष्टि में समा सके, वह सब ॐ है।

स्वामी कृष्णानन्द यहाँ एक भ्रम तोड़ते हैं। उनके अनुसार ॐ का असली स्वरूप कोई जाप या उच्चारण, कोई शब्द या आवाज़ तक सीमित होने वाला नहीं, यद्यपि वह ध्वनि भी है। ॐ अपने आप में, अपने ही अधिकार से ठहरी हुई एक सत्ता है, जिसे वे वस्तु-तन्त्र (जो अपने ही बल पर है, किसी और के सहारे नहीं) कहते हैं, और इसे पुरुष-तन्त्र (जो किसी के मानने भर से है) से अलग रखते हैं। उनके शब्दों में, हम जाप करके ॐ को रचते नहीं, हम तो केवल उस कम्पन के साथ अपना एक सहानुभूति-कम्पन जगाते हैं जो पहले से ही ब्रह्माण्ड में अपने अधिकार से गूँज रहा है। ॐ एक वैश्विक कम्पन है, सृष्टि के आरम्भ में उठी पहली स्पन्दन-ध्वनि, हमारी बनाई हुई नहीं।

A meditating sage at dawn, mouth open in chant, the sacred syllable AUM blazing from his throat as golden sound-waves that fan out and gather every letter and tongue of creation back into one luminous cosmic vibration.

फिर वे नाम और रूप का सूत्र खोलते हैं। संसार की हर वस्तु का एक नाम (पुकारने वाला शब्द) है और एक रूप (वह आकार जिसकी ओर वह नाम इशारा करता है)। पर्वत, नदी, अग्नि, राम, कृष्ण, ये सब विशेष नाम हैं, विशेष रूपों से बँधे हुए। स्वामी जी कहते हैं, ईश्वर का कोई विशेष रूप होता नहीं, उसका रूप तो वैश्विक है, इसलिए किसी एक देश, एक स्त्री, एक पुरुष की सीमित भाषा से उसे पुकारा नहीं जा सकता। उसे चाहिए एक वैश्विक नाम, एक ऐसी वाणी जो सारे ब्रह्माण्ड के लिए सच हो। ऐसी कोई स्थानीय भाषा है नहीं, बस एक ही वाणी ऋषियों पर प्रकट हुई, ॐ, यानी प्रणव (वह मूल ध्वनि जिसमें सब वाणियाँ समाई हैं)। जब हम अ, ब, स बोलते हैं तो कण्ठ का एक टुकड़ा काँपता है, पर जब हम ॐ कहते हैं तो पूरा स्वर-यन्त्र काँप उठता है, मानो हर भाषा, हर शब्द उसी मूल-ध्वनि में लौट आता हो।

अब स्वामी कृष्णानन्द उस गहराई पर ले जाते हैं जो इस खंड का प्राण है। ॐ का स्वभाव दुहरा है। एक ओर वह कालिक है, जो भूत, वर्तमान, भविष्य में बँधा है, अ, उ, म इन तीन अक्षरों से बनी समूची सृष्टि। दूसरी ओर वह शाश्वत है। उपनिषद् आगे कहता है, और जो काल से भी परे है, वह भी ॐ ही है, क्योंकि वैश्विक के पास कोई काल होता नहीं। स्वामी जी इसे अमात्र (बिना मात्रा वाला, अमाप) और चतुर्थ-भाव (वह चौथा स्वभाव जो अ, उ, म के भेदों से परे है) कहते हैं। ॐ का यह मौन रूप कानों को सुनाई नहीं देता, वह न आवाज़ है न केवल कम्पन, वह तो शुद्ध सत्ता है, जिसे सच्चिदानन्द-स्वरूप (सत्, चित् और आनन्द का रूप, यानी होना, जानना और परम सुख) कहते हैं। नदी और सागर की उपमा से वे समझाते हैं, नदी कालिक रूप है, उसका अपना नाम और आकार है, सागर शाश्वत रूप है, जहाँ सारी नदियाँ एक हो जाती हैं और कोई अलग नाम-रूप बचता ही नहीं।

इसी से वह कथन खुलता है जिसकी ओर पूरा उपनिषद् बढ़ता है, यह सब ब्रह्म (वह परम, अनन्त सत्ता) है, और यह जो भीतर बैठी आत्मा (अपना असली स्वरूप) है, वही ब्रह्म है। और उसी एक आत्मा के चार पाद (चार चरण, चार स्तर) हैं, जिन्हें यह उपनिषद् आगे एक-एक करके खोलता है। स्वामी कृष्णानन्द के अनुसार इसीलिए ॐ का सही चिन्तन कोई रटन नहीं, वह एक सीधी राह है जीव को ईश्वर में बदल देने की, अपनी सीमित, दूसरों से बँधी पहचान को उस असीम, अपने ही अधिकार से ठहरी सत्ता में लौटा देने की।

सार: ॐ कोई ध्वनि-मात्र नहीं, समूची सत्ता का नाम है। स्वामी कृष्णानन्द कहते हैं, हम इसे बनाते नहीं, बस उस कम्पन के साथ अपना सुर मिलाते हैं जो पहले से अपने ही अधिकार से गूँज रहा है। बीता, बहता और आने वाला सब काल इसी में है, और जो काल से परे है वह भी यही। यह सब ब्रह्म है, और जो ब्रह्म बाहर फैला है वही भीतर बैठी आपकी अपनी आत्मा है।

पहला पाद: जागृत, जहाँ चेतना बाहर की ओर ताकती है

स्वामी कृष्णानन्द (माण्डूक्य उपनिषद् पर प्रवचन देने वाले वेदान्ताचार्य) आत्मा की चार अवस्थाओं की पड़ताल यहीं से शुरू करते हैं, और बात बहुत व्यावहारिक जगह से उठाते हैं। हम जिसे ज़िंदगी कहते हैं, वह असल में जागने का समय है। आँख खुली, और सामने दुनिया, शरीर, दूसरे लोग। ईश्वर हमें दिखाई नहीं देता, ब्रह्म दिखाई नहीं देता, प्रणव (ओंकार) दिखाई नहीं देता। जो दिखता है वही हमारे लिए असली है। स्वामी जी कहते हैं कि इसीलिए उपनिषद् भी पहली सीढ़ी वहीं रखता है जहाँ हमारे पैर पहले से टिके हैं, यानी इन्द्रियों के सामने पड़ा हुआ स्थूल जगत्। इस अवस्था का नाम है जागृत-अवस्था (जागने की हालत), और यह आत्मा का पहला पाद (चौथाई, पहला पाँव) है।

इस चेतना का पहला लक्षण है बहिःप्रज्ञ (बाहर की ओर जानने वाली)। स्वामी जी की बात साफ़ है, हम अपने पेट के भीतर तक नहीं देख पाते, मन के भीतर देखना तो दूर की बात। हम बहिर्मुखी हैं, हमारी सारी दौड़ अपने से बाहर की चीज़ों के पीछे है। हम दूसरों की फ़िक्र में डूबे रहते हैं, अपने में नहीं। जागृत चेतना का यही अनोखा ढाँचा है, वह दूसरी हर चीज़ में लगी रहती है, बस अपने आप में नहीं लगती। और यह चेतना भोगती क्या है? स्थूल को। उपनिषद् इसे स्थूलभुक् (स्थूल का भोक्ता) कहता है, यानी जो कुछ ठोस है, बाहरी है, उसी को यह ग्रहण करती और पचाती है।

अब उपनिषद् इसी जागृत को दो तराज़ुओं पर तौलता है, एक बाहर का विराट ब्रह्माण्ड, एक हमारी अपनी छोटी देह। स्वामी कृष्णानन्द कहते हैं कि यह केवल अपने-आप का विश्लेषण नहीं, यह व्यक्ति और विश्व का मेल भी है। जीव और ईश्वर के बीच कोई न पाटी जा सकने वाली खाई नहीं। इसी मेल को दिखाने के लिए मन्त्र दो शब्द देता है, सप्तांग (सात अंगों वाला) और एकोनविंशतिमुख (उन्नीस मुख वाला)। सात अंग समष्टि (समूचे जगत् का सामूहिक रूप) की ओर इशारा करते हैं, उन्नीस मुख व्यष्टि (एक-एक जीव का अलग रूप) यानी एक-एक जीव की ओर।

The vast Virat Purusha (Vaishvanara) as a single cosmic being filling the sky: starry heavens forming his head, sun and moon his two eyes, the four directions his ears, the winds his breath, the earth his feet.

सात अंग वाली बात के लिए स्वामी जी मुण्डक उपनिषद् का वह सुप्रसिद्ध वर्णन सामने रखते हैं जिसमें समूचा ब्रह्माण्ड ही एक पुरुष का शरीर बन जाता है। आकाश के चमकीले लोक उसका सिर, सूर्य और चन्द्र उसकी दो आँखें, दिशाएँ उसके कान, वेद उसकी वाणी, समस्त वायु उसका प्राण (साँस), सारा विश्व उसका हृदय, और पृथ्वी उसके चरण। यही विराट है, यही पुरुषसूक्त का पुरुष, यही वह रूप जो अर्जुन ने गीता के ग्यारहवें अध्याय में देखा, और यही वह विराट जिसकी झलक यशोदा ने बालक कृष्ण के मुख में देखी थी। इसी को वैश्वानर कहते हैं, क्योंकि विश्व (समस्त जगत्) और नर (मनुष्य) मिलकर वैश्वानर बनता है। स्वामी जी मीरा का वह वचन भी याद दिलाते हैं कि इस जगत् में पुरुष एक ही है। बाक़ी सब उसी एक की छाया हैं।

अब छोटे छोर पर आइए, हमारी अपनी देह। यहाँ स्वामी जी उन्नीस मुख गिनाते हैं, और मुख का अर्थ है वह द्वार जिससे हम जगत् को भीतर लेते हैं। पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (जानने के साधन, यानी कान, त्वचा, आँख, जीभ, नाक), पाँच कर्मेन्द्रियाँ (काम करने के साधन, यानी वाणी, हाथ, पैर, और दो निचले अंग), पाँच प्राण (प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान, यानी शरीर में बहने वाली पाँच जीवनी हवाएँ), और चार वाला अन्तःकरण (भीतर का यन्त्र, यानी विचार करने वाला मन, निर्णय करने वाली बुद्धि, मैं-मेरा करने वाला अहंकार, और स्मृति सँजोने वाला चित्त)। पाँच और पाँच और पाँच और चार, यही उन्नीस मुख हैं। इन्हीं उन्नीस झरोखों से जीव बाहरी जगत् को निगलता है, और इन्हीं से जगत् भी उसमें घुस आता है। यह वैश्वानर का व्यष्टि रूप है, जिसे विश्व (एक देह में बसी जागृत चेतना) कहते हैं, जबकि समूचे ब्रह्माण्ड में बसी वही चेतना विराट या वैश्वानर कहलाती है।

फिर स्वामी कृष्णानन्द उस बारीक भेद पर आते हैं जो इस पूरे पाद का सार है। बाहर की ओर तो ईश्वर और जीव, दोनों ताकते हैं, दोनों बहिःप्रज्ञ हैं, पर ढंग अलग है। विराट की चेतना केवल अहम् अस्मि (मैं हूँ) है, उसके सामने कोई दूसरा है ही नहीं। पूरा जगत् ही उसका ‘मैं’ है, इसलिए न कोई राग, न द्वेष, न पीड़ा, न इच्छा। पर जीव कहता है, मैं भी हूँ और मेरे बाहर जगत् भी है। इसी ‘बाहर’ को वह चाहता है, नापता है, अपने सुख का साधन बनाना चाहता है। स्वामी जी की दो टूक बात यही है, जीव और ईश्वर में फ़र्क़ सिर्फ़ इच्छा का है। इच्छा छूट जाए तो जीव ईश्वर है, इच्छा जुड़ जाए तो ईश्वर जीव हो जाता है। और इच्छा ही हमारी दुर्बलता है, जितना अधिक चाहते हैं उतने ही कमज़ोर होते जाते हैं, क्योंकि विराट का बल उसकी निरिच्छा (इच्छा का सर्वथा अभाव) में है। एक मीठी झलक स्वामी जी देते हैं, यह विराट वाली ‘मैं हूँ’ की हालत कुछ-कुछ उस क्षण जैसी है जब गहरी नींद से जागते ही, जगत् की हलचल चढ़ने से पहले, बस अपने होने का एक कोमल एहसास भर रहता है।

सार: जिसे हम ‘बाहरी, रोज़ की दुनिया’ कहकर मामूली समझते हैं, वही आत्मा का पहला पाँव है। उन्नीस झरोखों से जगत् को निगलते हुए जीव और सात अंगों में फैला विराट, दोनों बाहर ही ताक रहे हैं। दोनों में अन्तर एक ही है, इच्छा। जिस पल चाहना थमती है, वही जीव चुपचाप वैश्वानर के विराट ‘मैं हूँ’ में मिल जाता है।

दूसरा और तीसरा पाद: स्वप्न और गहरी नींद

जाग्रत् की बात हो चुकी, अब माण्डूक्य उपनिषद् हमें भीतर ले जाता है। पहला पाद वैश्वानर था, बाहर खुली आँखों की दुनिया। अब अगला मन्त्र उस अवस्था की ओर इशारा करता है जिसका आँगन स्वप्न है, स्वप्नस्थान (जहाँ का बसेरा सपना हो)। इसी चेतना को व्यक्ति के स्तर पर तैजस (तेज से बना, सूक्ष्म प्रकाश-रूप दृष्टा) कहते हैं और समूचे ब्रह्माण्ड के स्तर पर हिरण्यगर्भ (सृष्टि का सूक्ष्म, सामूहिक मन)। यह वही चेतना है जो जागते समय बाहर बहती थी, अब भीतर मुड़ गई है, अन्तःप्रज्ञ (भीतर की ओर जानने वाली) हो गई है।

स्वामी कृष्णानन्द एक पते की बात उठाते हैं। हम कहते हैं स्वप्न झूठा है और जाग्रत् सच्चा, पर यह तुलना करता कौन है? स्वामी जी के अनुसार जो हमेशा जागता ही रहे वह भी यह न्याय नहीं कर सकता, और जो सदा सपने में ही रहे वह भी नहीं। तुलना तो वही कर सकता है जिसे दोनों अवस्थाओं की एक साथ ख़बर हो, उस निष्पक्ष न्यायाधीश की तरह जो किसी एक पक्ष का न हो। इसका अर्थ हुआ कि हमारा असली रूप न पूरा जाग्रत् में समाता है, न स्वप्न में। हम तो वह तीसरे ही हैं, दोनों के साक्षी (देखने वाले गवाह)। स्वामी जी इसे एक जाँच-आयोग बैठाने जैसा बताते हैं, जहाँ निष्पक्ष रहकर ही सच तक पहुँचा जा सकता है।

A split dream-tableau: a crowned king asleep on his throne dreaming himself a ragged beggar on the road, while a sleeping beggar in rags dreams himself a king in a jeweled court, the two reveries mirrored.

फिर वे एक तीखी मिसाल देते हैं, जो किसी पुराने विचारक की कही है। मान लीजिए कोई राजा रोज़ बारह घण्टे सपने में भिखारी बन जाता है, और कोई भिखारी रोज़ बारह घण्टे सपने में राजा। अब बताइए, असली राजा कौन और असली भिखारी कौन? स्वामी कृष्णानन्द कहते हैं कि जिस अवस्था में आप होते हैं, वही उस घड़ी सच्ची जान पड़ती है। सपने में आप हँसते हैं, रोते हैं, सपने का साँप देखकर सचमुच उछल पड़ते हैं, सपने का बाघ देखकर पसीने में तर जागते हैं। अगर वह पीड़ा झूठी थी, तो उछले क्यों? वे रस्सी और साँप का दृष्टान्त भी जोड़ते हैं। अँधेरे में रस्सी साँप दिखती है, तो वह उस पल हमारे लिए था ही, इसी से तो हम काँपे। प्रकाश आने पर ही पता चलता है कि रस्सी थी। ऐसे ही यह जाग्रत् का संसार है, जब तक दिखता है तब तक है, और ज्ञान का प्रकाश आने पर इसकी जगह ब्रह्म की रस्सी दिख जाती है।

इसी विश्लेषण से स्वामी जी मनुष्य और ईश्वर का रिश्ता खोलते हैं। जो नाता स्वप्न के दृष्टा का जागने वाले से है, वही नाता मनुष्य का ईश्वर से है। जैसे स्वप्न की दुनिया जागने वाले के मन की रचना है, वैसे यह जाग्रत् दुनिया ईश्वर की रचना है। और जैसे सपने से जागने पर हम कुछ खोते नहीं, उलटे और भरे-पूरे हो जाते हैं, वैसे ही ईश्वर-साक्षात्कार में कुछ खोता नहीं, हमारा होना और बढ़ जाता है। स्वामी कृष्णानन्द याद दिलाते हैं कि स्वप्न में मन ही अपनी इन्द्रियाँ रच लेता है, आँख मुँदी हो फिर भी देख लेता है, कान बन्द हों फिर भी सुन लेता है। मन ही दो हो जाता है, देखने वाला भी वही, और देखी जाने वाली दुनिया भी वही।

स्वप्न के कारण भी वे गिनाते हैं, और यहाँ पश्चिम से आगे जाते हैं। फ़्रॉयड, ऐडलर और युंग ने सपनों को दबी इच्छाओं और ग्रन्थियों का खेल बताया, यह आधा सच है। पर स्वामी जी के अनुसार सपने पुराने कर्म के फल से भी आते हैं, किसी दूर बैठे प्रियजन के गहरे विचार के असर से भी (जैसे माँ कहीं दूर याद कर रही हो), और गुरु की कृपा से भी। वे कहते हैं कि कभी प्रारब्ध से जो चोट जाग्रत् में सहनी थी, गुरु उसे शक्तिपात (गुरु की चेतना का उतरना) द्वारा सपने में ही बीत जाने देते हैं, और स्वयं ईश्वर की कृपा भी सपने में उतरती है। कारण यह कि जागते में अहंकार अड़ंगा डालता है, पर नींद और स्वप्न में वह अहं कुछ शान्त पड़ जाता है, इसीलिए ऊँची शक्तियों को वहाँ काम करने की जगह मिल जाती है।

अब तीसरा पाद, गहरी नींद, सुषुप्ति (बिना सपने की गाढ़ी नींद)। स्वामी जी समझाते हैं कि मन थककर चूर हो जाता है और अपनी ही गोद में सिमट जाता है। यहाँ न कोई कामना, न कोई सपना। सारी समझ, सारे संस्कार और वासनाएँ एक हो जाती हैं, एकीभूत (एक में मिली हुई), और चेतना एक घना पिण्ड बन जाती है, प्रज्ञानघन (ज्ञान का गाढ़ा द्रव्य)। इस अवस्था में जो भोगा जाता है वह आनन्द ही है, यह प्राज्ञ (इस गहरी अवस्था का चेतन रूप) है। स्वामी जी का ज़ोर इस पर है कि यह आनन्द में डूबना अनजाने में, बिना होश के होता है, इसी एक ओट से सारा खेल अटका है।

A weary sleepless emperor pushing away his crown, treasure and kingdom with both hands, begging his courtiers only to let him sleep, the dark blissful peace of dreamless deep-sleep (sushupti) glowing behind him as the one reward he craves.

इस सुख की ऊँचाई पर स्वामी कृष्णानन्द ठहरकर बोलते हैं। किसी सम्राट को हफ़्ते भर नींद न मिले, तो वह कहेगा, मुझे सोने दीजिए, अपना साम्राज्य वापस ले लीजिए। सारी दुनिया देकर भी कोई वह सुख नहीं दे सकता जो अकेले, बिना किसी संगी, बिना किसी सम्पत्ति के, गहरी नींद में मिलता है। वहाँ आप केवल आनन्द ही खाते हैं, आनन्द को ही निगलते और जीते हैं, और कुछ न पाकर भी तरोताज़ा होकर लौटते हैं। स्वामी जी पूछते हैं, यह बल, यह आनन्द आया कहाँ से? यह इसी संसार का नहीं, किसी और ही स्रोत का है। और यह भोगने वाला मुँह न इन्द्रिय है न मन, चेतना ही वहाँ का मुँह है, चेतोमुख (जिसका मुख चेतना हो); चित् ही आनन्द चखती है। हमारा असली रूप यह अकेलापन है, यह केवलता (निपट एकाकीपन, शुद्ध अकेले होना), न कि भीड़ और इन्द्रियों का जोड़। स्वामी जी का मर्म-वाक्य यही है कि अगर इस नींद के साथ होश जुड़ जाए, तो यही समाधि है, यही आत्म-साक्षात्कार, यही मोक्ष। यह प्राज्ञ ही दोनों लोकों का कारण है, कारणावस्था, और जाग्रत् व स्वप्न उसके कार्य। समूचे ब्रह्माण्ड के स्तर पर इसी प्राज्ञ का प्रतिरूप ईश्वर है। गहरी नींद का वह सुख रोज़ हमें परम के द्वार तक ले जाता है, पर हम पहचान नहीं पाते।

सार: गहरी नींद का जो गाढ़ा सुख आप रोज़ बिना माँगे चखते हैं, वह किसी बाहरी चीज़ से नहीं, आपके अपने केवल होने से उठता है। फ़र्क बस इतना है कि वहाँ होश नहीं रहता। उसी सुख में जागकर बैठ जाना, बिना सोए उसी पूर्णता को जान लेना, यही समाधि है और यही आपका सच्चा रूप।

चौथा पाद: तुरीय, जो किसी जगह में नहीं रहता

अब तक माण्डूक्य उपनिषद् ने हमें आत्मा की तीन अवस्थाएँ दिखाई हैं। जागना (बाहर की दुनिया को जानने वाली चेतना), सपना (भीतर की दुनिया को रचने वाली चेतना), और गहरी नींद (जहाँ न बाहर रहता है, न भीतर, बस एक घना अँधेरा-सा सुख)। इन्हीं को ॐ की तीन मात्राओं, अ-उ-म् से जोड़ा गया था। सातवाँ मन्त्र उस मोड़ पर खड़ा है जहाँ ये तीनों पीछे छूट जाते हैं। यहाँ उपनिषद् उस चौथे की ओर इशारा करता है, जिसे तुरीय (शब्दशः “चौथा”) कहते हैं।

स्वामी कृष्णानन्द, जो श्री शिवानन्द जी की परम्परा के मनीषी हैं और जिनकी यह व्याख्या हम यहाँ पढ़ रहे हैं, पहले एक बड़ी बात साफ़ करते हैं। वे कहते हैं कि असली सत्ता न व्यक्तिगत है, न विश्वव्यापी। यहाँ तक कि ईश्वर को सर्वेश्वर, सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान कहना भी एक रिश्ते के सहारे की गई परिभाषा है। हम कहते हैं कि वह सब जगह है, तो हमने उसे जगह (देश) से जोड़ दिया। हम कहते हैं वह सब जानता है, तो मान लिया कि जानने को कुछ “और” बचा हुआ है। स्वामी जी के अनुसार ये सब तटस्थ-लक्षण हैं (आस-पास की, बाहरी पहचान), स्वरूप-लक्षण नहीं (अपने सच्चे रूप की पहचान)। तुरीय वही स्वरूप है। सृष्टि से पहले ईश्वर अपने आप में जो था, वही।

इसी वजह से सातवाँ मन्त्र उसे “नहीं, नहीं” की भाषा में पकड़ता है। न भीतर की चेतना (नान्तःप्रज्ञम्, सपने जैसी भीतरी जानकारी नहीं), न बाहर की चेतना (न बहिःप्रज्ञम्, जागने जैसी बाहरी जानकारी नहीं), न दोनों एक साथ (नोभयतःप्रज्ञम्)। स्वामी जी ज़ोर देकर कहते हैं कि यह चेतना का कोई घना ढेर भी नहीं है (न प्रज्ञानघनम्), क्योंकि ढेर तो जगह घेरता है और नापा जाता है, और चेतना नापी नहीं जाती। यह बिना किसी जान के सूना-सा कुछ भी नहीं (न प्रज्ञम्), और चेतना का अभाव भी नहीं (नाप्रज्ञम्)। उनकी बारीक बात यह है कि यह विषयों से ख़ाली चेतना नहीं है, यह तो वह चेतना है जिसमें सारे विषय घुलकर समा गए हैं। इसलिए इसे कोरी पारदर्शी ख़ालीपन कहना ग़लत होगा।

फिर मन्त्र इसके लक्षण गिनाता है, और स्वामी जी हरेक को खोलते हैं। अदृष्ट (आँख जितना भी ज़ोर लगाए, देख न पाए)। अव्यवहार्य (इससे कोई लेन-देन, कोई व्यवहार नहीं हो सकता, न छूना, न पकड़ना, न बात करना)। अग्राह्य (इन्द्रियों की पकड़ से परे)। अलक्षण (इसलिए इसकी कोई परिभाषा नहीं, क्योंकि परिभाषा तो देखे-सुने गुणों का जोड़ है, और यहाँ देखने-सुनने को कुछ है ही नहीं)। अचिन्त्य (मन सोच भी न पाए, क्योंकि सोचते ही हम उसे देश-काल में, बाहर खड़ा कर देंगे)। अव्यपदेश्य (कहा न जा सके, कोई शास्त्र, कोई सन्त, सारे ऋषियों का ज्ञान मिलकर भी इसका बखान करने को छोटा पड़ता है)। स्वामी जी कहते हैं, यह सारी दुनिया एक-दूसरे के हवाले की जाल है, हर चीज़ किसी “और” के सहारे समझाई जाती है। पर यहाँ कोई “और” बचता ही नहीं, इसलिए यह सारी हलचल का, तन और मन दोनों का, मौन हो जाना है।

अब उपनिषद् एक सुन्दर पकड़ देता है, एकात्मप्रत्ययसारम् (एक ही आत्मा के बोध का सार)। स्वामी जी इसे रामायण की एक मिसाल से समझाते हैं। कवि से पूछा गया, राम-रावण का युद्ध किसके जैसा था? वह कहता है, आकाश आकाश जैसा है, सागर सागर जैसा, और राम-रावण का युद्ध बस राम-रावण के युद्ध जैसा था, और किसी से तुलना ही नहीं बनती। आत्मा भी ऐसी ही है, आत्मा बस आत्मा जैसी है। स्वामी जी इसके तीन अर्थ बताते हैं, एकत्व (एकपन), आत्मत्व (अपनापन, स्वयं होना), और सारत्व (सबका सार होना)। आत्मा वह है जो किसी प्रमाण के सहारे नहीं, अपने होने मात्र से अपने को जानती है। यहाँ जानने वाला और जो जाना गया, दोनों एक हो जाते हैं, जैसे दो समुद्र मिलकर एक हो जाएँ। इसी को वे इन्द्रियों और तर्क से परे का सीधा अनुभव (अन्तर्ज्ञान) कहते हैं।

याज्ञवल्क्य के “सलिल एको द्रष्टा” (बिना किनारे के जल-सी अकेली देखने वाली चेतना) का सहारा लेकर स्वामी जी कहते हैं, यही परमात्मा है। श्रीमद्भागवत के “ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति” को याद करके वे बताते हैं कि एक ही सत्य अपने आप में ब्रह्म है, सृष्टिकर्ता रूप में परमात्मा, और भक्तों के प्रिय रूप में भगवान। द्वैत, विशिष्टाद्वैत और अद्वैत, सब यहाँ आकर मिल जाते हैं, झगड़े थम जाते हैं, दर्शनशास्त्र चुप हो जाते हैं। वे एक गुरु-कथा सुनाते हैं, शिष्य ने तीन बार पूछा, “आत्मा क्या है?” गुरु तीनों बार मौन रहे। चौथी बार पूछने पर गुरु बोले, “हम तो बता ही रहे हैं, आप सुन नहीं रहे, क्योंकि मौन ही आत्मा है।” फिर मन्त्र के बाक़ी शब्द आते हैं, प्रपञ्चोपशमम् (जहाँ सारी सृष्टि की हलचल लहरों के सागर में डूबने की तरह शान्त हो जाए), शान्तम् (वह शान्ति जो किसी शोर के अभाव से नहीं, अपने स्वभाव से उपजती है), शिवम् (परम मंगल), अद्वैतम् (इसे “एक” भी मत कहिए, क्योंकि “एक” तो “दो, तीन” से रिश्ता रखता है, इसलिए बस “अद्वैत”, दो नहीं, नेति नेति)।

The gopis wandering through a moonlit Vrindavan grove, beseeching every tree and creeping vine for word of Krishna, until, their seeking ego spent, blue-hued Krishna himself appears smiling amid them, the Self revealing itself once the search falls silent.

अन्त में मन्त्र कहता है, “चतुर्थं मन्यन्ते, स आत्मा, स विज्ञेयः” (इसे चौथा माना जाता है, वही आत्मा है, वही जानने योग्य है)। स्वामी जी की परम साफ़ बात यहीं है। तुरीय कोई गिनती का चौथा, कोई चौथी जगह नहीं है जहाँ जाकर बैठा जाए। वह तो जागने, सपने और नींद, इन तीनों के पार होना है, बिना संख्या का, बिना नाप का होना। उनके अनुसार जब आप वहाँ पहुँचते हैं, तब यह नहीं लगता कि “मैं किसी चौथी अवस्था में हूँ”, उलटे वही एकमात्र सम्भव अवस्था जान पड़ती है। यही तीनों का साक्षी है, हमारा और सारी चीज़ों का असली स्वरूप, सत्-चित्-आनन्द। और इसी को जान लेना ही जीवन का प्रयोजन है। स्वामी जी गोपियों की मिसाल देते हैं, जो हर पेड़, हर लता से कृष्ण का पता पूछती फिरीं, पर जब अहं थक कर मिट गया, तभी कृष्ण स्वयं प्रकट हुए। आत्मा भी वस्तुओं में ढूँढ़े नहीं मिलती, अहंकार के शान्त होते ही वह स्वयं उघड़ आती है।

सार: तुरीय कोई चौथी मंज़िल नहीं जहाँ चढ़कर पहुँचा जाए, वह जागने, सपने और नींद, तीनों को देखता रहने वाला साक्षी है। उसे “नहीं, नहीं” से ही छुआ जा सकता है, क्योंकि हर परिभाषा उसे किसी “और” से बाँध देती है, और वहाँ कोई “और” बचता ही नहीं। जिस दिन ढूँढ़ने वाला अहं थक कर शान्त होता है, उसी दिन वह अपने आप उघड़ आता है, क्योंकि वही हमारा अपना स्वरूप है।

अ, उ, म, और उसके बाद का मौन

स्वामी कृष्णानन्द अपने व्याख्यान के इस अन्तिम पड़ाव पर हैं। माण्डूक्य उपनिषद् जहाँ से चला था, ॐ से, अब वहीं लौट आता है, मगर एक नई समझ के साथ। स्वामी जी समझाते हैं कि यह पूरा उपनिषद् दो चीज़ों के बीच का रिश्ता बुन रहा है, एक है आत्मा (हमारी अपनी असली सत्ता), और दूसरा है ॐ। ॐ नाम है, आत्मा नामधारी है। ॐ इशारा करने वाली उँगली है, आत्मा वह सत्य है जिस ओर उँगली उठी है। और जैसे आत्मा के तीन परिचित रूप हैं (जागृत, स्वप्न, सुषुप्ति), वैसे ही ॐ के भी तीन टुकड़े हैं, अ-कार, उ-कार, म-कार। स्वामी जी कहते हैं, ॐ की ये मात्राएँ आत्मा के पाँव हैं, और आत्मा के पाँव ये मात्राएँ हैं।

पहली कड़ी जोड़ते हुए स्वामी कृष्णानन्द अ-कार को जागृत अवस्था से मिलाते हैं। जागृत में आत्मा वैश्वानर (समस्त जगत् में फैला हुआ, बाहर की ओर खुला चेतन) कहलाता है, और यही ॐ का अ-कार है। उनका तर्क सुनिए, जैसे हर अनुभव की शुरुआत जागने से होती है (स्वप्न तो जागने के संस्कारों का फल है, और गहरी नींद उन्हीं अधूरी छापों का समेट लिया जाना), वैसे ही अ हर वर्ण का आरम्भ है। आप मुँह खोलते ही जो पहली ध्वनि उठती है, वह अ ही है, और स्वामी जी के अनुसार बाक़ी सारे शब्द उसी अ में समाए हुए हैं। इसीलिए उपनिषद् कहता है, जो इस मेल पर ध्यान धरता है, उसकी सारी कामनाएँ पूरी होती हैं और वह सबमें अग्रणी हो जाता है, चीज़ें बिन माँगे उसके पास चली आती हैं। स्वामी जी इसे असली शक्ति बताते हैं, वह शक्ति जो बिना कहे ही काम करा ले।

दूसरी कड़ी में स्वामी कृष्णानन्द उ-कार को तैजस (स्वप्न का चेतन, भीतर की ओर मुड़ा हुआ) से जोड़ते हैं। उनका कहना है कि उ-कार उत्कर्ष है, यानी ऊपर उठा हुआ, क्योंकि वह अ के बाद आता है, उसी का फल जान पड़ता है। बोलते वक़्त उ की ध्वनि गले के बीच से उठती है, स्वर-रचना के ठीक मँझधार में। ऐसे ही स्वप्न जागृत और सुषुप्ति के बीच का पड़ाव है, दोनों को छूता हुआ। स्वामी जी कहते हैं, जो इस मेल पर ध्यान धरता है उसका ज्ञान साधारण जानकारी से ऊपर उठ जाता है, और वह समभाव लाने वाला, मेल बिठाने वाला व्यक्ति बन जाता है। उसके भीतर कोई द्वन्द्व नहीं रहता, इसलिए उसकी मौजूदगी में बाहर भी कलह थम जाती है। वह बिना कुछ बोले शान्ति फैलाने वाला हो जाता है।

तीसरी कड़ी में स्वामी कृष्णानन्द म-कार को सुषुप्ति (गहरी निद्रा, कारण-अवस्था) से मिलाते हैं, जहाँ आत्मा प्राज्ञ (बीज-रूप जानकार) कहलाता है। उनकी समझ बड़ी सूक्ष्म है। जब हम ॐ का जाप करते हैं, अ और उ अन्त में म में जाकर डूब जाते हैं, ठीक वैसे ही जैसे जागृत और स्वप्न की सारी छापें गहरी नींद में समा जाती हैं। म-कार सबका माप है और सबका विलय भी, क्योंकि सुषुप्ति में हमारी अधूरी वासनाएँ और संस्कार बीज की तरह दबे पड़े रहते हैं, और वहीं से जागृत-स्वप्न के अनुभव अंकुरित होते हैं। इसी अर्थ में नींद कारण भी है और फल भी। स्वामी जी कहते हैं, जो इस मेल पर ध्यान धरता है वह सबको नापने वाला, सर्वज्ञ हो जाता है, सारी सृष्टि उसमें वैसे ही समाती है जैसे नदियाँ सागर में।

अब स्वामी कृष्णानन्द उस चौथे की ओर मुड़ते हैं, जिसका वर्णन उपनिषद् पहले ही कर चुका है, तुरीय (न भीतर का ज्ञान, न बाहर का, न दोनों का)। जैसे आत्मा का एक पार-अवस्था रूप है, वैसे ही ॐ का भी एक रूप है जो मात्राओं से परे है, अमात्र (बिना माप, बिना मात्रा)। यह कोई ध्वनि की दशा नहीं, स्वामी जी कहते हैं यह तो सत्ता का स्पन्दन भर है, जिसमें कोई पदार्थ नहीं, जो स्थूल-सूक्ष्म-कारण तीनों से परे है। उपनिषद् इसे केवल एक नाम देता है, अमात्र, अनापनीय। जैसे आत्मा पकड़ में नहीं आती, अकथनीय और अचिन्त्य है, वैसे ही ॐ की यह मौन दशा भी हर तरह से नाप से बाहर है।

और यहीं स्वामी कृष्णानन्द का असली बिन्दु आता है। ॐ की यह चौथी, मौन दशा कोई और चीज़ नहीं, आत्मा ही है। प्रपञ्चोपशम (सारे जगत्-व्यापार का थम जाना), शिव (परम मंगल), अद्वैत (जहाँ दूसरा कुछ बचता ही नहीं)। उच्चार जहाँ थमता है, वहाँ जो शेष रहता है वही आत्मा है। स्वामी जी एक अनूठी बात कहते हैं, जो यह रहस्य गहरे ध्यान से जान लेता है, वह आत्मा में किसी द्वार से प्रवेश नहीं करता, वह आत्मा के द्वारा ही आत्मा में प्रवेश पाता है। हम आत्मा में नहीं घुसते, आत्मा ही आत्मा में घुलती है। हम बचते ही नहीं, हम आत्मा में जैसे भाप बनकर मिल जाते हैं, और आत्मा आत्मा हो रहती है। यही आत्म-साक्षात्कार है, यही ब्रह्म-साक्षात्कार है, दोनों एक ही क्षण में। स्वामी जी अन्त में याद दिलाते हैं कि मुमुक्षु (मुक्ति के अभिलाषी) के लिए अकेला माण्डूक्य ही पर्याप्त है, बशर्ते इसे सुनकर भुलाया न जाए, जीवन में उतार लिया जाए।

सार: ॐ की तीन मात्राएँ हमारी तीन रोज़मर्रा की अवस्थाएँ हैं, अ जागना, उ सपना, म गहरी नींद। मगर जाप जब पूरा होकर मौन में ठहरता है, वह मौन ही चौथा है, तुरीय, और वही आत्मा है। उच्चार का थमना कोई कमी नहीं, वही पूर्णता है। हम आत्मा तक किसी रास्ते से नहीं पहुँचते, हम आत्मा के द्वारा ही आत्मा में घुल जाते हैं।

और अन्त में, अपनी ओर

बारह छोटे-छोटे मन्त्रों के बाद यह उपनिषद् हमें ठीक वहीं ले आकर खड़ा कर देता है जहाँ से हम कभी हटे ही नहीं थे, यानी अपने ही पास। दिन भर हम जागते हैं (जागृत), रात सपने देखते हैं (स्वप्न), फिर गहरी नींद में सब डूब जाता है (सुषुप्ति)। तीनों हालतें आती-जाती रहती हैं, एक-दूसरे को मिटाती रहती हैं। पर एक है जो तीनों में हाज़िर रहता है और किसी एक में भी क़ैद नहीं होता। वही चौथा है, तुरीय (चौथी अवस्था), और स्वामी कृष्णानन्द कहते हैं कि यह “चौथा” गिनती का चौथा नहीं, बस उन तीन सापेक्ष हालतों के मुक़ाबले कहा गया एक इशारा है; जिस घड़ी आप वहाँ पहुँचते हैं, आपको यह नहीं लगता कि “मैं किसी चौथी जगह आ पहुँचा”। उलटे लगता है कि यही एकमात्र जगह है, यही अपना असली घर है। जो जागता नहीं, सपना नहीं देखता, सोता नहीं, जो न बाहर की ओर मुड़ता है न भीतर की, वही आत्मा है, वही आप हैं।

स्वामी कृष्णानन्द के अनुसार इसी आत्मा को उपनिषद् बड़े जतन से नकारता चलता है, अदृश्य (जिसे आँख देख न पाए), अग्राह्य (जिसे इन्द्रियाँ पकड़ न सकें), अचिन्त्य (जिसे मन सोच न सके), क्योंकि सोचना तो किसी चीज़ को बाहर खड़ा करके देखना है, और यह तो देखने वाला ख़ुद है, कोई देखी जाने वाली वस्तु नहीं। फिर भी यह कोरा सूनापन या बेहोशी नहीं; यह शान्त है, शिव (परम कल्याणकारी) है, अद्वैत (जहाँ दूसरा कुछ बचता ही नहीं) है। स्वामी जी एक पुरानी कथा सुनाते हैं, एक शिष्य ने गुरु से बार-बार पूछा, “मुझे आत्मा का परिचय दीजिए”, और गुरु हर बार चुप रहे; आख़िर बोले, “हम तो बता ही रहे हैं, आप सुन नहीं रहे, क्योंकि मौन ही आत्मा है।” उसी मौन में संसार का सारा शोर थम जाता है, और स्वामी जी कहते हैं कि यह चुप्पी हज़ार दलीलों से ज़्यादा साफ़ बात कह जाती है। ॐ का सारा ढाँचा इसी की ओर उँगली उठाने के लिए है, अ-कार जागृत को थामता है, उ-कार स्वप्न को, म-कार गहरी नींद को, और जब उच्चार ख़त्म होकर मौन बचता है, वही मात्रा-रहित ॐ, वही अमात्र (बिना नाप-तौल वाला) तुरीय है; इसीलिए स्वामी जी कहते हैं कि उस आत्मा में हम किसी दरवाज़े से नहीं घुसते, “आत्मा में आत्मा से ही प्रवेश होता है।”

तो जब आज शाम आप ॐ बोलें, उसके फ़ौरन बाद के उस छोटे-से मौन पर ठहर जाइए, और उसी में अपने आप को टटोलिए। स्वामी कृष्णानन्द कहते हैं कि सारी ज़िन्दगी, सारी भागदौड़ असल में इसी आत्मा को ढूँढ़ने की कोशिश है; हम चीज़ों से, लोगों से, उपलब्धियों से इसलिए प्रेम करते हैं कि कहीं भीतर हमें उम्मीद रहती है कि वह पूर्णता वहीं मिल जाएगी, पर वह किसी एक जगह बँधी नहीं, इसलिए हाथ खाली रह जाते हैं। यह उपनिषद् कहता है, “स विज्ञेयः”, इसी को जानना है, यही जीवन का प्रयोजन है। और जानना यहाँ कोई जानकारी जोड़ना नहीं, बस वह हो जाना है जो आप पहले से हैं। तो हर बार जब साँस थमे और मौन उतरे, समझ लीजिए कि वह उँगली बाहर किसी की ओर नहीं, आपकी अपनी ओर उठी है।

सार: जागते, सोते, सपने देखते, तीनों हालतों के बीच जो कभी बदलता नहीं, वही द्रष्टा आप हैं, तुरीय आप हैं। ॐ का उच्चार और उसके बाद का मौन रोज़ इसी की याद दिलाता है, कि जिसे आप उम्र भर बाहर खोजते हैं, वह आपके अपने भीतर, हर साँस के मौन में, पहले से बैठा है।

व्याख्या मुख्यतः स्वामी कृष्णानन्द (दिव्य जीवन संघ) की माण्डूक्य-उपनिषद्-व्याख्या पर आधारित।