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उपनिषद्प्रश्न के भीतर का मौन

माण्डूक्य उपनिषद्: ॐ के चार पाद और चार अवस्थाएँ

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अथर्ववेद · माण्डूक्य उपनिषद् · बारह मन्त्र
बारह मन्त्रों का वह नक्शा जिसमें जागना, सपना, गहरी नींद और इन तीनों से परे चौथा, चारों एक ही ॐ की मात्राएँ बनकर खुलते हैं।

रात का तीसरा पहर है। एक ही आदमी बिस्तर पर पड़ा है और उसके भीतर तीन दुनियाएँ बारी बारी से आ जा रही हैं। कुछ देर पहले वह जागा हुआ था, छत की दरार, तकिए की सिलवट, बाहर गली में किसी का खाँसना, सब उसके सामने खुला पड़ा था। फिर आँख लगी और वही आदमी किसी और शहर में चलने लगा, ऐसी सड़कों पर जो कहीं बनी ही नहीं थीं, ऐसे लोगों से मिलता हुआ जिनके चेहरे उसने कभी नहीं देखे। और अब, इस घड़ी, न वह शहर बचा है न यह कमरा। कोई सपना नहीं, कोई इच्छा नहीं, फिर भी वह मिटा नहीं है, क्योंकि सुबह उठकर वह कहेगा कि बड़ी मीठी नींद आई। माण्डूक्य उपनिषद् इसी आदमी की ओर उँगली उठाकर पूछता है कि इन तीनों हालतों में जो हर बार बचा रह जाता है, वह कौन है।

अथर्ववेद का यह उपनिषद् बारह मन्त्रों में पूरा हो जाता है। इससे छोटा कोई मुख्य उपनिषद् नहीं है, और शायद इससे सघन भी कोई नहीं। यहाँ न कोई राजा है, न कोई शिष्य जो हाथ जोड़कर आया हो, न जंगल की कोई सभा। यहाँ केवल एक अक्षर है, ॐ, और एक आदमी की चौबीस घण्टे की आवाजाही, और दोनों को आमने सामने रखकर यह उपनिषद् दिखाता है कि वे एक ही नक्शे के दो पाठ हैं। बाद के आचार्य गौडपाद ने इन्हीं बारह मन्त्रों पर अपनी कारिकाएँ लिखीं और उन्हीं से वेदान्त की आगे की सारी इमारत खड़ी हुई, पर वे कारिकाएँ इस उपनिषद् का हिस्सा नहीं हैं। जो नीचे है, वह इन बारह मन्त्रों का अपना कहा हुआ है।

इस उपनिषद् के मुख्य किरदार

ॐ: वह अक्षर जो बोला भी जाता है और क्षरित भी नहीं होता, जिसमें तीनों काल और उनसे परे का भी समाया हुआ है।

आत्मा: वह जो इन बारह मन्त्रों का असली विषय है, जिसे उपनिषद् चार पादों वाला कहता है।

वैश्वानर: जागते हुए का नाम, जिसकी चेतना बाहर की ओर खुली रहती है और जो स्थूल को भोगता है।

तैजस: सपने वाले का नाम, जिसकी चेतना भीतर की ओर मुड़ जाती है और जो अपनी ही रोशनी में संसार गढ़ता है।

प्राज्ञ: गहरी नींद वाले का नाम, जहाँ सब एक हो जाता है और जिसे उपनिषद् सबका ईश्वर तक कहता है।

चतुर्थ: वह जिसे मूल में नाम ही नहीं दिया गया, बस गिनती दी गई है, और जिसे बाद की परिपाटी तुरीय कहती है।

ॐ: वह अक्षर जिसमें तीनों काल समा जाते हैं

पहला मन्त्र किसी कहानी से नहीं, सीधे एक ध्वनि पर हाथ रखकर शुरू होता है। “ॐ इत्येतदक्षरमिदꣳ सर्वम्”, यह जो ॐ अक्षर है, यही यह सब कुछ है। अक्षर शब्द यहाँ दो काम एक साथ कर रहा है। अक्षर वह है जो क्षरित नहीं होता, जो घिसता नहीं, जो चुकता नहीं। और अक्षर वह भी है जो गले से निकलता है, एक आवाज़, एक हिज्जा। पहले ही वाक्य में उपनिषद् इन दोनों को एक जगह बिठा देता है, कि जो कभी घटता नहीं, वह हमारे मुँह से निकलने वाली सबसे सादी आवाज़ के भीतर बैठा हुआ है।

उसी मन्त्र में आगे कहा गया कि जो बीत चुका, जो अभी चल रहा है, और जो अभी आया नहीं, यह सब ॐ ही है। यहाँ तक बात फिर भी समय के भीतर की है। पर मन्त्र एक क़दम और बढ़ता है, “यच्चान्यत् त्रिकालातीतं तदप्योङ्कार एव”, और जो कुछ इन तीनों कालों से परे है, वह भी ॐ ही है। पहली पंक्ति समय के भीतर की हर चीज़ को समेट लेती है। दूसरी उस चीज़ को भी समेट लेती है जो समय की पकड़ में कभी आती ही नहीं। इन दो पंक्तियों के बाद बाहर कुछ नहीं छूटता, और यही इस उपनिषद् का तरीक़ा है, कि वह पहले पूरा घेरा खींचता है, फिर उसके भीतर उतरता है।

मन्त्र में एक छोटा सा शब्द है, उपव्याख्यान। ॐ यह सब है, और आगे जो कहा जाएगा वह इसी की खोलकर की गई व्याख्या है। यानी बाक़ी ग्यारह मन्त्र कोई नया विषय नहीं उठाते, वे इसी एक वाक्य को खोलते जाते हैं। यह जानकर पढ़ना ज़रूरी है, वरना लगेगा कि बीच में कहीं बात ध्वनि से हटकर अवस्थाओं पर चली गई। हटती नहीं। यह उपनिषद् एक ही चीज़ को दो तरफ़ से दिखाता है, एक तरफ़ से वह आवाज़ है, दूसरी तरफ़ से वह हमारा अपना दिन और रात है।

ध्वनि को इतनी जगह क्यों मिली, यह सोचने लायक़ है। हमारे पास दुनिया तक पहुँचने का पहला पुल नाम ही है। बच्चा चीज़ को छूने से पहले उसकी आवाज़ सीखता है, और जिस चीज़ का नाम नहीं आता उसे हम बहुत देर तक अपने भीतर टिका भी नहीं पाते। नाम और नामी की यह जोड़ी इतनी गहरी है कि उपनिषद् उसे उलटकर पकड़ लेता है, कि अगर हर चीज़ किसी न किसी ध्वनि से बँधी है, तो एक ऐसी ध्वनि भी होगी जो किसी एक चीज़ से नहीं, समूचे से बँधी है। वही ॐ है।

और वह ध्वनि कोई अजनबी ध्वनि नहीं है। गला खुला रखिए और आवाज़ निकालिए, वह अ है। होंठ बन्द कर लीजिए और आवाज़ भीतर ही रह जाए, वह म है। इन दोनों के बीच जो सारी जगह है, जहाँ आवाज़ गले से होंठ की ओर लुढ़कती है, वहाँ उ है। मुँह जो कुछ भी बोल सकता है, वह इन्हीं तीन ठिकानों के बीच बोलता है। ॐ किसी विशेष मन्त्र की तरह नहीं, बोलने की पूरी सीमा की तरह यहाँ रखा गया है, और आगे आठवें मन्त्र में यही तीन ठिकाने तीन अवस्थाओं से जोड़ दिए जाएँगे।

सार: पहला मन्त्र एक अक्षर को समूचे के बराबर रख देता है, पहले समय के भीतर की हर चीज़ को, फिर समय से परे की भी। आगे के सारे मन्त्र इसी एक वाक्य की खोली हुई व्याख्या हैं। ध्वनि को इतनी जगह इसलिए मिली कि नाम ही वह पहला धागा है जिससे हम किसी भी चीज़ को पकड़ते हैं।

यह आत्मा ब्रह्म है, और इसके चार पाद हैं

दूसरा मन्त्र बहुत थोड़े शब्दों में वह कह देता है जिसके लिए दूसरे उपनिषद् पूरे अध्याय लगाते हैं। यह सब जो है, ब्रह्म है। और फिर, “अयमात्मा ब्रह्म”, यह जो आत्मा है, वही ब्रह्म है। ध्यान दीजिए कि वाक्य में अयम् शब्द है, यह वाला, सामने वाला, हाथ भर की दूरी वाला। किसी दूर के ब्रह्म की ओर इशारा नहीं हो रहा। जो इस समय पढ़ रहा है, सुन रहा है, साँस ले रहा है, उसी की ओर उँगली है।

उसी साँस में मन्त्र आगे जोड़ता है, “सोऽयमात्मा चतुष्पात्”, यह जो आत्मा है, वह चार पादों वाला है। पाद का अर्थ पैर भी होता है और चौथाई भी। रुपये के चार चवन्नी वाले अर्थ में चौथाई, और चारपाई के चार पैरों वाले अर्थ में पैर। यहाँ दोनों अर्थ काम आते हैं, पर एक सावधानी के साथ। शांकरभाष्य इस जगह ठहरकर कहता है कि पहले तीन पाद उस सीढ़ी की तरह हैं जिन पर चढ़कर चौथे तक पहुँचा जाता है, और चौथा उन तीनों के बराबर खड़ा कोई चौथा टुकड़ा नहीं है। यह भेद पूरे उपनिषद् को समझने की कुंजी है, क्योंकि आगे सातवाँ मन्त्र चौथे को गिनाता तो चौथा ही है, पर उसकी सारी भाषा बाक़ी तीनों से अलग हो जाती है।

अब देखिए कि यह उपनिषद् अपनी बात साबित करने के लिए कौन सा रास्ता चुनता है। वह आकाश की ओर हाथ नहीं उठाता, किसी सृष्टि की कथा नहीं सुनाता, किसी ऋषि की गवाही नहीं लाता। वह हमें उस जगह ले जाता है जहाँ हम रोज़ बिना नागा जाते हैं, दिन में जागते हैं, नींद में सपना देखते हैं, और फिर एक ऐसी गहराई में उतरते हैं जहाँ कुछ भी नहीं बचता। यही तीन जगहें उसकी प्रयोगशाला हैं। किसी को कहीं जाना नहीं है, कुछ नया करना नहीं है, बस उस पर ग़ौर करना है जो हर चौबीस घण्टे में तीन बार अपने आप हो रहा है।

और एक बात इसी मन्त्र से निकलती है जो आगे बार बार काम आएगी। तीनों अवस्थाओं में विषय बदल जाता है। जागते में ईंट पत्थर वाली दुनिया है, सपने में मन की गढ़ी दुनिया है, गहरी नींद में कोई दुनिया नहीं है। पर जिसके सामने ये तीनों आते जाते हैं, वह नहीं बदलता, वरना सुबह उठकर कोई यह न कह पाता कि मैं सोया था और मुझे कुछ पता नहीं था। जिसे पता नहीं था, उसी को पता है कि पता नहीं था। इस छोटे से पेंच पर यह पूरा उपनिषद् खड़ा है।

सार: दूसरा मन्त्र आत्मा और ब्रह्म को एक ठहराकर कहता है कि यह आत्मा चार पादों वाला है। चार पाद चार बराबर टुकड़े नहीं हैं, पहले तीन सीढ़ी हैं और चौथा वह जगह जहाँ सीढ़ी ख़त्म होती है। प्रमाण के लिए उपनिषद् हमारे अपने दिन और रात को ही मेज़ पर रख देता है।

पहला पाद: जागरण, जहाँ चेतना बाहर फैली रहती है

तीसरा मन्त्र जागने वाले का परिचय देता है और उसे चार पहचानें देता है। उसका स्थान जागरण है, उसकी चेतना बहिष्प्रज्ञ है यानी बाहर की ओर खुली हुई, उसके सात अङ्ग हैं, उन्नीस मुख हैं, और वह स्थूल को भोगता है। “स्थूलभुग्वैश्वानरः प्रथमः पादः”, स्थूल का भोक्ता वैश्वानर, यह पहला पाद है। नाम पर ग़ौर कीजिए। वैश्वानर, यानी विश्व के सब नरों वाला, सबका साझा। जागते हुए हम सब एक ही दुनिया में होते हैं, इसलिए इस अवस्था का नाम भी साझेदारी वाला है।

सात अङ्गों की गिनती यह मन्त्र देता है, सूची नहीं देता। उन्नीस मुखों की गिनती परम्परा यों खोलती है, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ जिनसे भीतर आता है, पाँच कर्मेन्द्रियाँ जिनसे बाहर जाता है, पाँच प्राण जिनसे देह चलती है, और मन, बुद्धि, अहंकार तथा चित्त, कुल उन्नीस। मुख शब्द यहाँ खाने के दरवाज़े के अर्थ में है। जागता हुआ आदमी उन्नीस दरवाज़ों से एक साथ दुनिया भीतर ले रहा है, और उसे इसका पता तक नहीं चलता, क्योंकि यह सब इतनी रफ़्तार से होता है कि सब मिलकर एक ही सादा अनुभव जैसा लगने लगता है।

बहिष्प्रज्ञ शब्द इस अवस्था की असली चाबी है। जागने में हमारी चेतना का मुँह बाहर की ओर है। जो कुछ भी सामने आता है, चेतना उसी का आकार ले लेती है। आप घड़ी देखते हैं तो एक पल के लिए आपके भीतर घड़ी है, कोई पुकारता है तो आवाज़ है, चाय का प्याला उठाते हैं तो गरमाहट है। दिन भर यही चलता है, और शाम तक आदमी थक जाता है, हालाँकि उसने शायद कोई भारी काम नहीं किया। बाहर की ओर लगातार बहते रहना अपने आप में एक श्रम है।

स्थूलभुक् कहना भी सोच समझकर है। जागते हुए हम जिसे भोगते हैं वह ठोस है, उसका वज़न है, वह हमारी मर्ज़ी से नहीं बदलता। दीवार वहीं रहेगी जहाँ है, चाहे हम कुछ भी सोचें। यही इस अवस्था की ताक़त है और यही इसका बन्धन। ताक़त इसलिए कि यहाँ चीज़ें भरोसे लायक़ हैं, दूसरों के साथ साझा हैं, और इसी साझे पर सारा व्यवहार खड़ा है। बन्धन इसलिए कि यहाँ हम अपने को उतना ही मान बैठते हैं जितनी यह देह है, और देह का हर सुख दुख अपना सुख दुख हो जाता है।

यह उपनिषद् जागरण को नीचा नहीं दिखाता। वह उसे पहला पाद कहता है, और पहला होना यहाँ कोई ताना नहीं है, आगे नौवें मन्त्र में यही पहलापन एक फल बनकर लौटेगा। जागरण वह ज़मीन है जहाँ से यात्रा शुरू होती है, और जिसने जागते हुए ग़ौर से देखना नहीं सीखा, वह सोते हुए क्या देखेगा। इसलिए इस अवस्था का काम है, ठीक से जागना, और यह जानना कि जिस दुनिया को हम पूरा सच मान बैठे हैं, वह चार में से एक हिस्से का सच है।

सार: पहला पाद वैश्वानर है, जिसकी चेतना बाहर की ओर खुली रहती है और जो उन्नीस दरवाज़ों से स्थूल जगत को भीतर लेता है। नाम ही बताता है कि यह अवस्था सबकी साझा है। उपनिषद् इसे छोटा नहीं कहता, पहला कहता है, और पहला होना आगे एक फल बनकर लौटेगा।

दूसरा पाद: स्वप्न, जहाँ संसार भीतर से बनता है

चौथा मन्त्र क़रीब क़रीब वही वाक्य दोहराता है, बस दो शब्द बदल देता है, और उन दो शब्दों से पूरी दुनिया बदल जाती है। स्थान स्वप्न है, चेतना अन्तःप्रज्ञ है यानी भीतर की ओर मुड़ी हुई, सात अङ्ग वही, उन्नीस मुख वही, और भोग प्रविविक्त का है। “प्रविविक्तभुक्तैजसो द्वितीयः पादः”, सूक्ष्म का भोक्ता तैजस, यह दूसरा पाद है। अङ्ग और मुख वही रहने का मतलब यह है कि सपने में भी वही पूरा तन्त्र काम कर रहा है, बस उसका ईंधन बदल गया है।

सपने में आँख बन्द है, फिर भी हम देखते हैं। कान बन्द हैं, फिर भी कोई पुकारता है। बाहर से कुछ नहीं आ रहा, फिर भी एक पूरा शहर खड़ा है, उसमें सीढ़ियाँ हैं, मौसम है, कोई रिश्तेदार है जो बरसों पहले गुज़र चुका। यह सब किस माल से बना है। जो कुछ दिन में उन्नीस दरवाज़ों से भीतर आया था, उसी की छाप से। इसीलिए इस भोग को प्रविविक्त कहा गया, अलग किया हुआ, छाँटा हुआ, सूक्ष्म। जागते में हम चीज़ें भोगते हैं, सपने में हम उनकी छाप भोगते हैं।

नाम तैजस है, तेजस् से बना, यानी रोशनी वाला। इस एक शब्द में सपने की सबसे अजीब बात पकड़ी गई है। सपने में बाहर कोई दीपक नहीं जल रहा, फिर भी वहाँ दिन निकलता है, चेहरे दिखते हैं, रंग होते हैं। रोशनी किसकी है। अपनी। चेतना यहाँ दिखाने वाली और दिखने वाली, दोनों हो जाती है। जागते हुए यह बात छिपी रहती है क्योंकि वहाँ सूरज है और उसे श्रेय देना आसान है। सपने में वह बहाना छिन जाता है, और चेतना अपनी ही रोशनी में अकेली पकड़ी जाती है।

यही कारण है कि उपनिषद् स्वप्न को बीच की सीढ़ी बनाता है। पहली सीढ़ी पर दुनिया हमसे बाहर लगती है और बहुत ठोस लगती है। दूसरी सीढ़ी पर वही अनुभव, वैसा ही सच्चा लगता हुआ, बिना किसी बाहरी चीज़ के खड़ा हो जाता है। सपने के भीतर हमें एक बार भी शक नहीं होता कि यह सब बनावटी है। डर लगे तो दिल सचमुच धड़कता है, दौड़ें तो साँस सचमुच फूलती है। जागने पर सब भाप हो जाता है, और बचता है वह जो देख रहा था।

ग़ौर करने की बात यह भी है कि सपने का आदमी और जागने का आदमी, दोनों एक ही हैं। बीच में कोई अदला बदली नहीं हुई। जो कल दफ़्तर गया था, वही रात को किसी उड़ते हुए घर की छत पर खड़ा था, और वही सुबह चाय माँगेगा। तीनों जगह नाम एक है, याद एक है। उपनिषद् इसी एकता की डोर पकड़कर हमें तीसरी सीढ़ी तक ले जाता है, जहाँ न बाहर की दुनिया है न भीतर की।

सार: दूसरा पाद तैजस है, जिसकी चेतना भीतर मुड़ जाती है और जो दिन भर की छापों को भोगता है। सपने में कोई बाहरी दीपक नहीं होता, फिर भी सब दिखता है, इसलिए नाम रोशनी वाला पड़ा। यही वह सीढ़ी है जहाँ पता चलता है कि पूरा अनुभव बिना बाहरी चीज़ के भी खड़ा हो सकता है।

तीसरा पाद: सुषुप्ति, जहाँ कोई इच्छा नहीं बचती

पाँचवाँ मन्त्र पहले परिभाषा देता है, फिर नाम। “यत्र सुप्तो न कञ्चन कामं कामयते”, जहाँ सोया हुआ न किसी काम की कामना करता है और न कोई स्वप्न देखता है, वह सुषुप्ति है। यह परिभाषा दो इनकारों से बनी है, और ये इनकार बहुत सटीक हैं। इच्छा नहीं, यानी कोई कमी महसूस ही नहीं हो रही। दृश्य नहीं, यानी सामने रखने को कुछ है ही नहीं। जिस आदमी को दिन भर सौ चीज़ें चाहिए थीं, वह कुछ घण्टों के लिए बिलकुल बिना माँग का हो जाता है।

इसके बाद मन्त्र नाम और पहचानें देता है। वहाँ सब एक हो जाता है, वह प्रज्ञान का घन है, आनन्दमय है, आनन्द को भोगता है, और उसका मुख चेतस् है। “प्रज्ञानघन एवानन्दमयो ह्यानन्दभुक्”, यानी वह जानने का ठोस पिण्ड है और आनन्द का भोक्ता है, और उसका नाम प्राज्ञ है, यह तीसरा पाद है। घन शब्द बहुत सुन्दर है। जागते में जानना टुकड़ों में बँटा रहता है, यह जाना, वह जाना, यह छूटा। गहरी नींद में वह बँटवारा नहीं रहता, जानना अपने आप में इकट्ठा पड़ा रहता है, जैसे नमक का ढेला, जिसे जहाँ से चखिए वही स्वाद।

आनन्द वाली बात कोई कल्पना नहीं है, वह हमारे रोज़ के अनुभव से आई है। दुनिया में हर आदमी, चाहे उसके पास कुछ हो या कुछ न हो, गहरी नींद के बाद कहता है कि नींद अच्छी आई। जिसके पास महल है और जिसके पास चटाई है, दोनों उसी एक जगह जाकर बराबर हो जाते हैं। वहाँ न कोई रिश्तेदार है, न कोई क़र्ज़, न कोई नाम। उपनिषद् इसी सबूत पर हाथ रखता है, कि अगर सुख किसी चीज़ के मिलने से आता होता, तो जिस जगह कोई चीज़ नहीं है वहाँ सबसे गहरा सुख क्यों मिलता।

छठा मन्त्र इसी प्राज्ञ के बारे में वे बातें कहता है जो चौंका देती हैं। यही सबका ईश्वर है, यही सर्वज्ञ है, यही भीतर से चलाने वाला है, यही सबकी योनि है, और भूतों का उद्भव तथा लय दोनों इसी से होते हैं। गहरी नींद को इतना ऊँचा दर्जा क्यों। क्योंकि वहीं सब कुछ समेटकर रखा हुआ है। रात को जो आदमी सब भूलकर सोया था, सुबह उसकी सारी दुनिया वापस उसी तरतीब से खड़ी हो जाती है, वही नाम, वही चिन्ताएँ, वही रिश्ते। कहीं तो वह सब सँभला हुआ था।

और यहीं इस पाद की सीमा भी खुल जाती है। जो योनि है, उसमें बीज है। सुषुप्ति में दुनिया मिटती नहीं, बीज बनकर बैठ जाती है, इसीलिए वह हर सुबह उगती है। इसलिए गहरी नींद विश्राम है, मंज़िल नहीं। कोई आदमी बीस घण्टे सोकर भी मुक्त नहीं होता, क्योंकि वहाँ कमी का अनुभव भले न हो, जानना अपने को जानता नहीं। उपनिषद् इसी कारण तीन पर रुकता नहीं। तीन अवस्थाएँ गिनाकर वह चौथे की ओर जाता है, और वहाँ उसकी भाषा ही बदल जाती है।

सार: तीसरा पाद प्राज्ञ है, जहाँ न इच्छा है न दृश्य, जहाँ जानना टुकड़ों में नहीं, घन बनकर पड़ा रहता है। उपनिषद् इसे सबका ईश्वर और सबकी योनि तक कहता है, क्योंकि सारी दुनिया वहीं बीज बनकर सँभली रहती है। पर जहाँ बीज है वहाँ अंकुर भी है, इसलिए यह विश्राम है, मंज़िल नहीं।

चौथा: जो न भीतर देखता है, न बाहर

सातवाँ मन्त्र इस उपनिषद् का हृदय है, और वह अपनी बात इनकारों से शुरू करता है। न भीतर की ओर जानने वाला, न बाहर की ओर, न दोनों ओर, न जानने का घन, न जानना, न बिना जानने वाला। छह बार न कहा गया है, और हर बार एक ऐसी जगह बन्द की गई है जहाँ मन जाकर बैठना चाहता था। पिछले तीन मन्त्रों में जो तीन पहचानें दी गई थीं, वे तीनों यहाँ नाम लेकर हटाई जाती हैं, और साथ में दो और रास्ते भी बन्द कर दिए जाते हैं, कि यह दोनों का जोड़ भी नहीं है और यह जड़ता भी नहीं है।

यह आख़िरी इनकार सबसे ज़रूरी है। अगर केवल इतना कहा जाता कि वहाँ जानना नहीं है, तो कोई भी उसे बेहोशी समझ लेता। इसलिए मन्त्र उसी साँस में जोड़ता है कि वह अप्रज्ञ भी नहीं है। वहाँ जानने वाला और जानी जाने वाली चीज़ का दोपन नहीं है, पर वहाँ प्रकाश है। यह वही जगह है जिसे भाषा छू नहीं पाती, क्योंकि भाषा तो दो चीज़ों के बीच का पुल है, और वहाँ दूसरी चीज़ है ही नहीं।

इनकारों के बाद मन्त्र छह विशेषण देता है जो सब अ से शुरू होते हैं। अदृष्ट, जो देखा नहीं जा सकता। अव्यवहार्य, जिसके साथ कोई लेन देन नहीं हो सकता। अग्राह्य, जो पकड़ में नहीं आता। अलक्षण, जिसका कोई चिह्न नहीं। अचिन्त्य, जिसे सोचा नहीं जा सकता। अव्यपदेश्य, जिसे बताकर दिखाया नहीं जा सकता। ये छह इनकार नहीं हैं, ये उस चीज़ की सीधी बनावट हैं जो किसी भी औज़ार का विषय बन ही नहीं सकती, क्योंकि हर औज़ार उसी के भीतर से उठता है।

और फिर, इतनी सावधानी के बाद, मन्त्र चार शब्दों में हाँ कहता है। एकात्मप्रत्ययसार, जिसका सार एक ही आत्मा की प्रतीति है। प्रपञ्चोपशम, जहाँ फैलाव शान्त हो जाता है। “शान्तं शिवमद्वैतं चतुर्थं मन्यन्ते”, शान्त, शिव, अद्वैत, इसी को चौथा मानते हैं। शिव शब्द यहाँ किसी देवता का नाम नहीं, उसका पुराना सीधा अर्थ है, मंगलमय, कल्याण वाला। और अन्त में वाक्य आता है, वही आत्मा है, वही जानने योग्य है।

यहाँ एक बात साफ़ रहनी चाहिए। मूल में इस चौथे का नाम चतुर्थ ही है। तुरीय कहना बाद की परिपाटी है, अर्थ वही है, गिनती में चौथा। और यह चौथा पिछले तीन के बग़ल में रखा हुआ चौथा टुकड़ा नहीं है। जागना, सपना और गहरी नींद आती जाती हैं, यह जाता नहीं। तीनों में यही रहता है और तीनों के बीच की सन्धियों में भी यही रहता है। जिस तरह रस्सी में साँप दिखता है और फिर रस्सी दिख जाने पर साँप कहीं जाता नहीं, वैसे ही यहाँ तीन अवस्थाएँ ख़त्म नहीं होतीं, उनका अलग होकर खड़े रहना ख़त्म होता है।

सार: सातवाँ मन्त्र पहले छह बार न कहकर हर उस जगह का दरवाज़ा बन्द करता है जहाँ मन बैठना चाहता था, फिर छह अ वाले विशेषण देकर बताता है कि यह किसी औज़ार की पकड़ में आने वाली चीज़ नहीं। अन्त में वह शान्त, शिव और अद्वैत कहकर हाँ कहता है, और जोड़ता है कि यही आत्मा है और यही जानने योग्य है।

मात्राएँ ही पाद हैं: अ, उ और म

आठवाँ मन्त्र उपनिषद् को वापस वहीं ले आता है जहाँ से वह चला था। वही आत्मा, अक्षर की दृष्टि से, ॐ है, और मात्रा की दृष्टि से उसके हिस्से हैं। “पादा मात्रा मात्राश्च पादाः”, पाद ही मात्राएँ हैं और मात्राएँ ही पाद हैं, और वे हैं अ, उ और म। यह वाक्य दोनों दिशाओं में चलता है, इसीलिए दो बार कहा गया। अवस्था से ध्वनि तक भी जाया जा सकता है और ध्वनि से अवस्था तक भी। जिसके पास बैठकर अपनी अवस्थाओं को देखने का धीरज नहीं, उसके पास भी एक ध्वनि तो है ही, और वही ध्वनि उसे उन्हीं अवस्थाओं तक ले जाएगी।

नौवाँ मन्त्र पहली मात्रा लेता है और उसे बहुत नपे तुले ढंग से खोलता है। जागरण वाला वैश्वानर अकार है, पहली मात्रा। फिर मन्त्र दो कारण देता है और उन्हें वा से जोड़ता है, यानी दोनों में से कोई भी लिया जा सकता है। पहला कारण है आप्ति, पा लेना, व्याप जाना, क्योंकि अ वह ध्वनि है जो हर बोली हुई बात में फैली रहती है, गला खुले बिना कोई शब्द निकलता ही नहीं। दूसरा कारण है आदिमत्त्व, पहले होना, क्योंकि वर्णों में अ पहला है और अवस्थाओं में जागरण पहला।

और फिर मन्त्र इन्हीं दो कारणों के ठीक बराबर दो फल देता है, यही इस मन्त्र की असली बनावट है। “आप्नोति ह वै सर्वान् कामान्”, जो ऐसा जानता है वह सारी कामनाओं को पा लेता है, और वह आदि हो जाता है, सबमें पहला। ग़ौर कीजिए कि फल कारण से जुड़ा हुआ है। आप्ति से पाना निकला और आदिमत्त्व से पहला होना निकला। यह उपनिषद् का अपना गणित है, और इसे इधर उधर कर देने से मन्त्र का ढाँचा ही टूट जाता है। पहली मात्रा का फल न ज्ञान की उन्नति है, न लय, वह पाना और आगे होना है।

दसवाँ मन्त्र दूसरी मात्रा पर यही तरीक़ा दोहराता है। स्वप्न वाला तैजस उकार है, दूसरी मात्रा, और कारण दो हैं, उत्कर्ष यानी ऊपर उठना, और उभयत्व यानी दोनों के बीच होना, क्योंकि उ अ और म के ठीक बीच पड़ता है, जैसे स्वप्न जागरण और सुषुप्ति के बीच। फल भी इन्हीं दोनों कारणों से निकलते हैं, जो ऐसा जानता है उसकी ज्ञान की धारा ऊपर उठती है, और वह समान हो जाता है। उत्कर्ष से धारा का ऊपर उठना आया और उभयत्व से समान होना, दोनों ओर बराबर रहना, किसी ओर न झुकना। इसके बाद मन्त्र एक बात और जोड़ देता है, कि उसके कुल में कोई ब्रह्म को न जानने वाला नहीं होता।

ग्यारहवाँ मन्त्र तीसरी मात्रा पर आता है। सुषुप्ति वाला प्राज्ञ मकार है, तीसरी मात्रा, और कारण हैं मिति यानी नाप, और अपीति यानी भीतर समा जाना। जैसे तराज़ू में सब कुछ नपकर एक हो जाता है, और जैसे ॐ बोलते हुए होंठ बन्द होते ही सारी ध्वनि भीतर समा जाती है। फल वही दो हैं, जो ऐसा जानता है वह इस सबको नाप लेता है और स्वयं वह जगह हो जाता है जहाँ सब समा जाता है। तीनों मन्त्रों में एक ही रचना है, दो कारण, दो फल, और हर बार यह जोड़ कि जो ऐसा जानता है।

सार: आठवाँ मन्त्र पाद और मात्रा को आमने सामने रखकर दोनों को एक कर देता है। फिर नौवाँ, दसवाँ और ग्यारहवाँ मन्त्र एक ही साँचे में ढले हैं, हर मात्रा के लिए दो कारण और उन्हीं से निकले दो फल। अकार का फल है सारी कामनाओं को पाना और आदि हो जाना, उकार का है ज्ञान की धारा का ऊपर उठना और समान हो जाना, मकार का है सबको नाप लेना और लय की जगह बन जाना।

अमात्र: बारहवाँ मन्त्र और उसके बाद की चुप्पी

बारहवाँ मन्त्र बहुत छोटा है और वह सारे हिसाब को एक झटके में समेट लेता है। “अमात्रश्चतुर्थोऽव्यवहार्यः”, चौथा अमात्र है, मात्रा से रहित, और उसके साथ कोई लेन देन नहीं हो सकता। वह वही है जहाँ फैलाव शान्त हो जाता है, वह शिव है, वह अद्वैत है। सातवें मन्त्र के शब्द यहाँ ज्यों के त्यों लौट आते हैं, बस अब वे ध्वनि की तरफ़ से कहे जा रहे हैं। तीन मात्राएँ हो चुकीं, और चौथा उनके बाद आने वाली चौथी मात्रा नहीं है, वह वह है जिसमें तीनों उठती और बैठती हैं।

ॐ को धीरे धीरे बोलिए तो यह बात अपने आप समझ में आती है। गला खुलता है, आवाज़ आगे लुढ़कती है, होंठ मिलते हैं, और फिर एक गूँज रह जाती है जो धीरे धीरे पतली होती जाती है, और फिर वह भी नहीं रहती। जो नहीं रहती, वहाँ भी कुछ है, और वह चुप्पी है। वह चुप्पी आवाज़ का न होना भर नहीं है, वह वह पृष्ठभूमि है जिस पर आवाज़ उठी थी और जिसमें वह लौट गई। तीन मात्राएँ नापी जा सकती हैं, चौथा नापने की चीज़ नहीं है, वह वह मैदान है जिस पर नाप होती है।

मन्त्र का आख़िरी हिस्सा वह वाक्य है जिस पर यह पूरा उपनिषद् पूरा होता है। ॐ यही आत्मा है, और जो ऐसा जानता है वह आत्मा से आत्मा में प्रवेश कर जाता है। इस वाक्य में जाने वाला और जिसमें जाना है, दोनों एक ही हैं। कोई कहीं से कहीं पहुँचता नहीं, कोई नया लोक नहीं मिलता, कोई दरवाज़ा नहीं खुलता। बस जो पहले से अपना था और जिसे बाहर खोजा जा रहा था, वह अपने भीतर अपने आप में बैठ जाता है।

बारह मन्त्रों की यह इमारत कितनी कसी हुई है, यह अन्त में आकर दिखता है। पहला मन्त्र ॐ को सब कुछ कहता है, दूसरा आत्मा को चार पाद देता है, तीन से सात तक चारों पाद खुलते हैं, आठ से बारह तक वही चारों ध्वनि की तरफ़ से दोहराए जाते हैं, और आख़िरी शब्द फिर वहीं आत्मा पर रुक जाता है। बीच में एक भी वाक्य ऐसा नहीं है जिसे हटाया जा सके। इसी कसाव के कारण यह सबसे छोटा उपनिषद् सबसे ज़्यादा पढ़ा और सबसे ज़्यादा गाया गया है।

सार: बारहवाँ मन्त्र चौथे को अमात्र कहता है, वह जो नापा नहीं जा सकता, और जिसके साथ कोई लेन देन नहीं। ॐ बोलकर छोड़ने पर जो चुप्पी बचती है, वह चुप्पी आवाज़ की कमी नहीं, उसकी ज़मीन है। अन्तिम वाक्य में जाने वाला और पहुँचने की जगह एक ही निकलते हैं।

और अन्त में, अपनी ओर

इस उपनिषद् की सबसे बड़ी उदारता यह है कि इसने हमसे कुछ नया करने को नहीं कहा। जागना, सपना और गहरी नींद, ये तीनों आज रात भी होंगे, चाहे हम इस पन्ने को पढ़ें या न पढ़ें। यह उपनिषद् बस इतना कहता है कि इन तीनों के आने जाने को एक बार ग़ौर से देख लीजिए। रात को सोने से पहले, जब नींद आ रही हो और अभी आई न हो, उस पतली सी दहलीज़ पर एक पल ठहरिए। सुबह आँख खुलते ही, जब नाम और तारीख़ और चिन्ताएँ वापस लौटने लगें, उससे ठीक पहले के उस ख़ाली पल को पहचानिए। पूरे दिन में यही दो जगहें हैं जहाँ सन्धि नंगी दिखती है।

दूसरी बात रोज़ के व्यवहार की है। जिस आदमी को यह दिख जाता है कि जिसे वह अपना पूरा संसार मान बैठा है वह चार में से एक हिस्सा है, उसकी पकड़ ढीली हो जाती है। हार और जीत उसी एक हिस्से की हैं। इससे काम कम नहीं होता, काम वैसे ही होता है, पर उसमें से वह कसाव निकल जाता है जो हर छोटी बात को जीवन मरण का सवाल बना देता है। यह उपनिषद् किसी को घर छोड़ने को नहीं कहता, वह केवल अनुपात ठीक कर देता है।

और तीसरी बात उस ध्वनि की है जो सबसे आसान है। ॐ कहते हुए उसे जल्दी जल्दी निपटाने की ज़रूरत नहीं। गले के खुलने को महसूस कीजिए, आवाज़ के आगे लुढ़कने को, होंठों के मिलने को, और फिर उस गूँज को जो धीरे धीरे पतली होती जाती है। जब वह भी चली जाए, वहाँ से उठकर तुरन्त अगला काम मत कीजिए। जो एक पल वहाँ ठहरता है, वह इन बारह मन्त्रों को पढ़ने से ज़्यादा उन्हें जान लेता है, क्योंकि उपनिषद् जिसकी ओर इशारा कर रहा है वह उस चुप्पी में पढ़ने वाले से अलग खड़ा नहीं है।

आधार: माण्डूक्य उपनिषद्, मन्त्र 1 से 12; मूल पाठ के साथ पढ़ा गया, विवादित स्थलों पर शांकरभाष्य का संकेत।