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अंग 341

अंग
341
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: Bhagat Kabeer Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
झझा उरझि सुरझि नही जाना ॥
रहिओ झझकि नाही परवाना ॥
कत झखि झखि अउरन समझावा ॥
झगरु कीए झगरउ ही पावा ॥15॥
ञंञा निकटि जु घट रहिओ दूरि कहा तजि जाइ ॥
जा कारणि जगु ढूढिअउ नेरउ पाइअउ ताहि ॥16॥
टटा बिकट घाट घट माही ॥
खोलि कपाट महलि कि न जाही ॥
देखि अटल टलि कतहि न जावा ॥
रहै लपटि घट परचउ पावा ॥17॥
ठठा इहै दूरि ठग नीरा ॥
नीठि नीठि मनु कीआ धीरा ॥
जिनि ठगि ठगिआ सगल जगु खावा ॥
सो ठगु ठगिआ ठउर मनु आवा ॥18॥
डडा डर उपजे डरु जाई ॥
ता डर महि डरु रहिआ समाई ॥
जउ डर डरै त फिरि डरु लागै ॥
निडर हूआ डरु उर होइ भागै ॥19॥
ढढा ढिग ढूढहि कत आना ॥
ढूढत ही ढहि गए पराना ॥
चड़ि सुमेरि ढूढि जब आवा ॥
जिह गड़ु गड़िओ सु गड़ महि पावा ॥20॥
णाणा रणि रूतउ नर नेही करै ॥
ना निवै ना फुनि संचरै ॥
धंनि जनमु ताही को गणै ॥
मारै एकहि तजि जाइ घणै ॥21॥
तता अतर तरिओ नह जाई ॥
तन त्रिभवण महि रहिओ समाई ॥
जउ त्रिभवण तन माहि समावा ॥
तउ ततहि तत मिलिआ सचु पावा ॥22॥
थथा अथाह थाह नही पावा ॥
ओहु अथाह इहु थिरु न रहावा ॥
थोड़ै थलि थानक आरंभै ॥
बिनु ही थाभह मंदिरु थंभै ॥23॥
ददा देखि जु बिनसनहारा ॥
जस अदेखि तस राखि बिचारा ॥
दसवै दुआरि कुंची जब दीजै ॥
तउ दइआल को दरसनु कीजै ॥24॥
धधा अरधहि उरध निबेरा ॥
अरधहि उरधह मंझि बसेरा ॥
अरधह छाडि उरध जउ आवा ॥
तउ अरधहि उरध मिलिआ सुख पावा ॥25॥
नंना निसि दिनु निरखत जाई ॥
निरखत नैन रहे रतवाई ॥
निरखत निरखत जब जाइ पावा ॥
तब ले निरखहि निरख मिलावा ॥26॥
पपा अपर पारु नही पावा ॥
परम जोति सिउ परचउ लावा ॥
पांचउ इंद्री निग्रह करई ॥
पापु पुंनु दोऊ निरवरई ॥27॥
फफा बिनु फूलह फलु होई ॥
ता फल फंक लखै जउ कोई ॥
दूणि न परई फंक बिचारै ॥
ता फल फंक सभै तन फारै ॥28॥
बबा बिंदहि बिंद मिलावा ॥
बिंदहि बिंदि न बिछुरन पावा ॥
बंदउ होइ बंदगी गहै ॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।

हिन्दी अर्थ: जिस मनुष्य ने (चर्चा आदि में पड़ कर निकम्मी) उलझनों में ही फंसना सीखा। उलझनों में से निकलने की जाच नहीं सीखी। वह (सारी उम्र) शंकाओं में ही पड़ा रहा। (उसका जीवन) कबूल ना हो सका। बहस कर करके औरों को समझाने का क्या लाभ? चर्चा करते-करते खुद को तो निरी चर्चा करने का ही स्वभाव पड़ गया। 15। (हे भाई !) जो प्रभू नजदीक बस रहा है। जो हृदय में बस रहा है। उसको छोड़ के दूर कहाँ जाता है? (जिस प्रभू को) मिलने की खातिर (हमने सारा) जगत तलाशा था। उसे नजदीक ही (अपने अंदर ही) पा लिया है। 16। (प्रभू के महल में पहुँचाने वाला) मुश्किल घाट है (पर वह घाट) हृदय में ही है। (हे भाई ! माया के मोह वाले) किवाड़ खोल के आप प्रभू की हजूरी में क्यूं नहीं पहुँचता? (जिस मनुष्य ने हृदय में ही) सदा स्थिर रहने वाले प्रभू का दीदार कर लिया है। वह डोल के किसी और तरफ नहीं जाता। वह (प्रभू चरणों से) सांझ पा लेता है। 17। ये माया ऐसे है जैसा दूर से देखी हुई रेत जो पानी प्रतीत होती है। सो मैंने ध्यान से (इस माया की अस्लियत) देख के मन को धैर्यवान बना लिया है (भाव। मन को इसके पीछे दौड़ने से बचा लिया है)। जिस (मायावी मोह रूपी) ठग ने सारे जगत को भुलेखे में डाल दिया है। सारे जगत को अपने वश में कर लिया है। उस (मोह-) ठॅग को काबू करके मेरा मन ठिकाने पर आ गया है। 18। अगर परमात्मा का डर (भाव। अदब-सत्कार) मनुष्य के हृदय में पैदा हो जाए तो (दुनिया वाला) डर (दिल से) दूर हो जाता है और उस डर में दुनिया वाला डर समाप्त हो जाता है। पर अगर मनुष्य प्रभू का डर मन में ना बसाए तो (दुनिया वाला) डर दुबारा आ चिपकता है। (और प्रभू का डर दिल में बसा के जो मनुष्य) निर्भय हो गया। उसके मन का जो भी सहम है। सब भाग जाता है। 19। (हे भाई ! परमात्मा तो आपके) नजदीक ही है। आप (उसे बाहर) और कहाँ ढूँढता है? (बाहर) ढूँढते-ढूँढते आपके प्राण भी थक गए हैं। सुमेर पर्वत पे (भी) चढ़ के और (परमात्मा को वहाँ) ढूँढ-ढूँढ के जब मनुष्य (अपने शरीर में) आता है (भाव। जब अपने अंदर ही झांकता है)। तो वह प्रभू इस (शरीर रूपी) किले में ही मिल जाता है जिसने ये शरीर किला बनाया है। 20। (जगत रूपी इस) रणभूमि में (विकारों के साथ युद्ध में) व्यस्त जो मनुष्य विकारों को वश में करने की समर्था प्राप्त कर लेता है जो (विकारों के आगे) ना झुकता है। ना ही (उनसे) मेल करता है। जगत उसी मनुष्य के जीवन को भाग्यशाली गिनता है। क्योंकि वह मनुष्य (अपने) एक मन को मारता है और बहुत सारे (विकारों) को छोड़ देता है। 21। ये जगत एक ऐसा समुंद्र है जिसे तैरना मुश्किल है। जिसमें से पार लांघा नहीं जा सकता (तब तक जब तक) आँख। कान। नाक आदि ज्ञानेंद्रियां दुनियां (के रसों) में डूबी रहती हैं; पर जब संसार (के रस) शरीर के अंदर ही मिट जाते हैं (भाव। मनुष्य की इंद्रियों को आकर्षित करने में असफल हो जाते हैं)। तब (जीव की) आत्मा (प्रभू की) ज्योति में मिल जाती है। तब सदा स्थिर रहने वाला परमात्मा मिल जाता है। 22। (मनुष्य का मन) अथाह परमात्मा की थाह नहीं पा सकता (क्योंकि। एक तरफ तो) वह प्रभू बेअंत गहरा है (और। दूसरी तरफ। मनुष्य का) ये मन कभी टिक के नहीं रहता (भाव। कभी प्रभू चरणों मेंजुड़ने का उद्यम ही नहीं करता)। ये मन थोड़ी जितनी (मिली) जमीन में (कई) नगर (बनाने) आरम्भ कर देता है (भाव। थोड़ी जितनी मिली उम्र में कई पसारे पसार बैठता है); और इसके ये सारे पसारे पसारने व्यर्थ के काम हैं। ये (मानो) खम्भों (दीवारों) के बिना ही घर का निर्माण कर रहा है। 23। जो ये संसार (इन आँखों से) दिखाई दे रहा है। ये सारा नाशवंत है। (हे भाई !) आप सदा प्रभू में सुरति जोड़। जो (इन आँखों से) दिखाई नहीं देता (भाव। जो दिखाई देते त्रिगुणी संसार से अलग भी है)। पर। जब (गुरबाणी-रूपी) कूँजी दसवें द्वार में लगाएं (भाव। जब मन को सतिगुरू की बाणी के साथ जोड़ें)- उस दयाल प्रभू का दीदार तभी किया जा सकता है। 24। जब जीवात्मा का निवास परमात्मा में होता है (भाव। जब जीव प्रभू चरणों में जुड़ता है)। तो प्रभू से (एक रूप) हो के ही जीव (के जनम-मरण) का खात्मा होता है। (जीवात्मा और परमात्मा की दूरी खत्म हो जाती है)। जब जीव निचली अवस्था को (भाव। माया के मोह को) छोड़ के उच्च अवस्था में पहुँचता है तो जीव को परमात्मा मिल जाता है। और इसे (असल) सुख प्राप्त हो जाता है। 25। (जिस जीव के) दिन रात (भाव। सारा समय) (प्रभू के दीदार का) इन्तजार करते गुजरता है। ताकते हुए (भाव। दीदार की लगन में ही) उसके नेत्र (प्रभू दीदार के लिए) मतवाले हो जाते हैं। दीदार की तमन्ना करते-करते जब आखिर दीदार होता है तो वह ईष्ट प्रभू के दर्शनों की चाहत रखने वाले (अपने प्रेमी) को अपने साथ मिला लेता है। 26। परमात्मा सबसे बड़ा है। उसका किसी ने अंत नहीं पाया। जिस जीव ने रोशनी के श्रोत प्रभू से प्यार जोड़ा है। वह अपनी पाँचों ही ज्ञानेंद्रियों को (इस प्रकार) वश में कर लेता है कि वह जीव पाप और पुंन दोनों को दूर कर देता है (भाव। पाँचों ज्ञानेंद्रियों को वह इस तरह पूर्ण तौर पर काबू करता हैकि उसको अपने कामों के बारे में ये सोचने की जरूरत नहीं रहती कि मैं जो काम करता हूँ ये पाप है अथवा पुंन। सहज ही उसका हरेक काम कामादिक विकारों से बरी होता है)। 27। अगर जीव अपने आप पर गुमान छोड़ दे। तो इसे (नाम-पदार्थ रूपी वह) फल प्राप्त हैं जाता है (जिसकी खातिर मानस जनम मिला है)। और। अगर कोई उस रॅबी सूझ का रॅत्ती भर भी झलक समझ ले। और अगर उस झलक को विचारे। तो वह जनम-मरन के गड्ढे में नहीं गिरता। (क्योंकि) ईश्वरीय सूझ की वह छोटी सी चमक भी उसके देह-अध्यास (स्वै पर गुमान) को पूरे तौर पर खत्म कर देती है। 28। (जैसे पानी की) बूंद में (पानी की) बूंद मिल जाती है। (और। फिर अलग नहीं हो सकती। वैसे ही प्रभू से) निमख मात्र भी सांझ डाल के (जीव प्रभू से) विछुड़ नहीं सकता (क्योंकि जो मनुष्य प्रभू का) सेवक बन के प्रेम से (प्रभू की) भगती करता है।

गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

कबीर पन्द्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, मगर रामानन्द-शिष्य परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, ज़बान सीधी है, कई बार चुभने वाली। उनकी कुछ रचनाएँ बीजक में हैं, कुछ आदि ग्रंथ में, कुछ अनेक संप्रदायों में बिखरी हैं।

इस अंग पर एक ही शबद है, और उसकी पहली पंक्तियाँ यह कहती हैं: “जिस मनुष्य ने (चर्चा आदि में पड़ कर निकम्मी) उलझनों में ही फंसना सीखा।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।