अंग 218

अंग
218
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਕੋਈ ਜਿ ਮੂਰਖੁ ਲੋਭੀਆ ਮੂਲਿ ਨ ਸੁਣੀ ਕਹਿਆ ॥੨॥
ਇਕਸੁ ਦੁਹੁ ਚਹੁ ਕਿਆ ਗਣੀ ਸਭ ਇਕਤੁ ਸਾਦਿ ਮੁਠੀ ॥
ਇਕੁ ਅਧੁ ਨਾਇ ਰਸੀਅੜਾ ਕਾ ਵਿਰਲੀ ਜਾਇ ਵੁਠੀ ॥੩॥
ਭਗਤ ਸਚੇ ਦਰਿ ਸੋਹਦੇ ਅਨਦ ਕਰਹਿ ਦਿਨ ਰਾਤਿ ॥
ਰੰਗਿ ਰਤੇ ਪਰਮੇਸਰੈ ਜਨ ਨਾਨਕ ਤਿਨ ਬਲਿ ਜਾਤ ॥੪॥੧॥੧੬੯॥
कोई जि मूरखु लोभीआ मूलि न सुणी कहिआ ॥२॥
इकसु दुहु चहु किआ गणी सभ इकतु सादि मुठी ॥
इकु अधु नाइ रसीअड़ा का विरली जाइ वुठी ॥३॥
भगत सचे दरि सोहदे अनद करहि दिन राति ॥
रंगि रते परमेसरै जन नानक तिन बलि जात ॥४॥१॥१६९॥

हिन्दी अर्थ: पर जीव ऐसा कोई मूर्ख लोभी है कि (ऐसी) कही हुई बात बिल्कुल नहीं सुनता। 2। (हे भाई !) मैं किसी एक की~ दो या चार की क्या बात बताऊँ? सारी ही सृष्टि एक ही स्वाद में ठॅगी जा रही है। कोई विरला मनुष्य परमातमा के नाम में रस लेने वाला है~ कोई एक-आध हृदय-स्थल ही कृपा पात्र मिलता है। 3। (हे भाई !) परमात्मा की भक्ति करने वाले लोग सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा के दर पर शोभा पाते हैं~ और दिन रात आत्मिक आनंद का लुत्फ लेते हैं। हे दास नानक ! (कह, जो मनुष्य) परमेश्वर के प्रेम रंग में रंगे रहते हैं~ मैं उनसे कुर्बान जाता हूँ। 4। 1। 169।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ਮਾਂਝ ॥
ਦੁਖ ਭੰਜਨੁ ਤੇਰਾ ਨਾਮੁ ਜੀ ਦੁਖ ਭੰਜਨੁ ਤੇਰਾ ਨਾਮੁ ॥
ਆਠ ਪਹਰ ਆਰਾਧੀਐ ਪੂਰਨ ਸਤਿਗੁਰ ਗਿਆਨੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜਿਤੁ ਘਟਿ ਵਸੈ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਸੋਈ ਸੁਹਾਵਾ ਥਾਉ ॥
ਜਮ ਕੰਕਰੁ ਨੇੜਿ ਨ ਆਵਈ ਰਸਨਾ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਉ ॥੧॥
ਸੇਵਾ ਸੁਰਤਿ ਨ ਜਾਣੀਆ ਨਾ ਜਾਪੈ ਆਰਾਧਿ ॥
ਓਟ ਤੇਰੀ ਜਗਜੀਵਨਾ ਮੇਰੇ ਠਾਕੁਰ ਅਗਮ ਅਗਾਧਿ ॥੨॥
ਭਏ ਕ੍ਰਿਪਾਲ ਗੁਸਾਈਆ ਨਠੇ ਸੋਗ ਸੰਤਾਪ ॥
ਤਤੀ ਵਾਉ ਨ ਲਗਈ ਸਤਿਗੁਰਿ ਰਖੇ ਆਪਿ ॥੩॥
ਗੁਰੁ ਨਾਰਾਇਣੁ ਦਯੁ ਗੁਰੁ ਗੁਰੁ ਸਚਾ ਸਿਰਜਣਹਾਰੁ ॥
ਗੁਰਿ ਤੁਠੈ ਸਭ ਕਿਛੁ ਪਾਇਆ ਜਨ ਨਾਨਕ ਸਦ ਬਲਿਹਾਰ ॥੪॥੨॥੧੭੦॥
गउड़ी महला ५ मांझ ॥
दुख भंजनु तेरा नामु जी दुख भंजनु तेरा नामु ॥
आठ पहर आराधीऐ पूरन सतिगुर गिआनु ॥१॥ रहाउ ॥
जितु घटि वसै पारब्रहमु सोई सुहावा थाउ ॥
जम कंकरु नेड़ि न आवई रसना हरि गुण गाउ ॥१॥
सेवा सुरति न जाणीआ ना जापै आराधि ॥
ओट तेरी जगजीवना मेरे ठाकुर अगम अगाधि ॥२॥
भए क्रिपाल गुसाईआ नठे सोग संताप ॥
तती वाउ न लगई सतिगुरि रखे आपि ॥३॥
गुरु नाराइणु दयु गुरु गुरु सचा सिरजणहारु ॥
गुरि तुठै सभ किछु पाइआ जन नानक सद बलिहार ॥४॥२॥१७०॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ मांझ ॥ हे प्रभू ! तेरा नाम दुखों का नाश करने वाला है~ तेरा नाम दुखों का नाश करने वाला है। (हे भाई !) ये नाम आठों पहर सिमरना चाहिए- पूरे सतिगुरू का यही उपदेश है जो परमात्मा के साथ गहरी सांझ डाल सकता है। 1। रहाउ। (हे भाई !) जिस हृदय में परमात्मा आ बसता है~ वही हृदय-स्थल सुंदर बन जाता है। जो मनुष्य अपनी जीभ से परमात्मा के गुण गाता है~ जमदूत उसके पास नहीं फटकता (उसे मौत का डर नहीं छू सकता)। 1। मैंने (अब तक) तेरी सेवा-भक्ति की सूझ की कद्र ना जानी~ मुझे तेरे नाम की आराधना करनी नहीं सूझी~ (पर अब) मैंने तेरा आसरा लिया है, हे जगत की जिंदगी के आसरे ! हे मेरे पालनहार मालिक ! हे अपहुँच प्रभू ! हे अथाह प्रभू ! । 2। (हे भाई !) सृष्टि के मालिक प्रभू जिस मनुष्य पर मेहरवान होते हैं~ उसके सारे फिक्र और कलेश मिट जाते हैं। जिस मनुष्य की गुरू ने स्वयं रक्षा की~ उसे (सोग-संताप आदि का) सेक नहीं लगता। 3। (हे भाई !) गुरू नारायण का रूप है~ गुरू सब पर दया करने वाले प्रभू का स्वरूप है। गुरू उस करतार का रूप है जो सदा कायम रहने वाला है। अगर गुरू प्रसन्न हो जाए तो सब कुछ प्राप्त हो जाता है। हे दास नानक ! (कह,) मैं गुरू से सदके हूँ। 4। 2। 170।
ਗਉੜੀ ਮਾਝ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਹਰਿ ਰਾਮ ਰਾਮ ਰਾਮ ਰਾਮਾ ॥
ਜਪਿ ਪੂਰਨ ਹੋਏ ਕਾਮਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਰਾਮ ਗੋਬਿੰਦ ਜਪੇਦਿਆ ਹੋਆ ਮੁਖੁ ਪਵਿਤ੍ਰੁ ॥
ਹਰਿ ਜਸੁ ਸੁਣੀਐ ਜਿਸ ਤੇ ਸੋਈ ਭਾਈ ਮਿਤ੍ਰੁ ॥੧॥
ਸਭਿ ਪਦਾਰਥ ਸਭਿ ਫਲਾ ਸਰਬ ਗੁਣਾ ਜਿਸੁ ਮਾਹਿ ॥
ਕਿਉ ਗੋਬਿੰਦੁ ਮਨਹੁ ਵਿਸਾਰੀਐ ਜਿਸੁ ਸਿਮਰਤ ਦੁਖ ਜਾਹਿ ॥੨॥
ਜਿਸੁ ਲੜਿ ਲਗਿਐ ਜੀਵੀਐ ਭਵਜਲੁ ਪਈਐ ਪਾਰਿ ॥
ਮਿਲਿ ਸਾਧੂ ਸੰਗਿ ਉਧਾਰੁ ਹੋਇ ਮੁਖ ਊਜਲ ਦਰਬਾਰਿ ॥੩॥
ਜੀਵਨ ਰੂਪ ਗੋਪਾਲ ਜਸੁ ਸੰਤ ਜਨਾ ਕੀ ਰਾਸਿ ॥
ਨਾਨਕ ਉਬਰੇ ਨਾਮੁ ਜਪਿ ਦਰਿ ਸਚੈ ਸਾਬਾਸਿ ॥੪॥੩॥੧੭੧॥
गउड़ी माझ महला ५ ॥
हरि राम राम राम रामा ॥
जपि पूरन होए कामा ॥१॥ रहाउ ॥
राम गोबिंद जपेदिआ होआ मुखु पवित्रु ॥
हरि जसु सुणीऐ जिस ते सोई भाई मित्रु ॥१॥
सभि पदारथ सभि फला सरब गुणा जिसु माहि ॥
किउ गोबिंदु मनहु विसारीऐ जिसु सिमरत दुख जाहि ॥२॥
जिसु लड़ि लगिऐ जीवीऐ भवजलु पईऐ पारि ॥
मिलि साधू संगि उधारु होइ मुख ऊजल दरबारि ॥३॥
जीवन रूप गोपाल जसु संत जना की रासि ॥
नानक उबरे नामु जपि दरि सचै साबासि ॥४॥३॥१७१॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी माझ महला ५ ॥ (हे भाई !) सदा परमात्मा का नाम जप के सारे काम सफल हो जाते हैं। 1। रहाउ। (हे भाई !) राम राम गोबिंद गोबिंद जपते हुए मुंह पवित्र हो जाता है। (दुनिया में) वही मनुष्य (असल) भाई है~ (असल) मित्र है~ जिससे परमात्मा की सिफत सालाह सुनी जाए। 1। जिसके वश में (दुनिया के) सारे पदार्थ~ सारे फल और सारे आत्मिक गुण हैं (हे भाई !) उस गोबिंद को अपने मन से कभी भुलाना नहीं चाहिए~ जिसका सिमरन करने से सारे दुख दूर हो जाते हैं। 2। (हे भाई !उस गोबिंद को अपने मन से कभी भी भुलाना नहीं चाहिए) जिसका आसरा लेने से आत्मिक जीवन मिल जाता है~ संसार समुंद्र से पार लांघ जाते हैं। गुरू की संगति में मिल के (जिसका सिमरन करने से विकारों से) बचाव हो जाता है और प्रभू की हजूरी में सुर्खरू हो जाते हैं। 3। हे नानक ! गोपाल प्रभू की सिफत सालाह आत्मिक जीवन देने वाली है~ प्रभू की सिफत सालाह संत जनों के वास्ते राशि (सरमाया) है। प्रभू का नाम जप के (संत जन विकारों से) बच निकलते हैं~ और सदा स्थिर प्रभू के दर पर से शाबाश हासिल करते हैं। 4। 3। 171।
ਗਉੜੀ ਮਾਝ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਮੀਠੇ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਉ ਜਿੰਦੂ ਤੂੰ ਮੀਠੇ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਉ ॥
ਸਚੇ ਸੇਤੀ ਰਤਿਆ ਮਿਲਿਆ ਨਿਥਾਵੇ ਥਾਉ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਹੋਰਿ ਸਾਦ ਸਭਿ ਫਿਕਿਆ ਤਨੁ ਮਨੁ ਫਿਕਾ ਹੋਇ ॥
ਵਿਣੁ ਪਰਮੇਸਰ ਜੋ ਕਰੇ ਫਿਟੁ ਸੁ ਜੀਵਣੁ ਸੋਇ ॥੧॥
ਅੰਚਲੁ ਗਹਿ ਕੈ ਸਾਧ ਕਾ ਤਰਣਾ ਇਹੁ ਸੰਸਾਰੁ ॥
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਆਰਾਧੀਐ ਉਧਰੈ ਸਭ ਪਰਵਾਰੁ ॥੨॥
ਸਾਜਨੁ ਬੰਧੁ ਸੁਮਿਤ੍ਰੁ ਸੋ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਹਿਰਦੈ ਦੇਇ ॥
ਅਉਗਣ ਸਭਿ ਮਿਟਾਇ ਕੈ ਪਰਉਪਕਾਰੁ ਕਰੇਇ ॥੩॥
ਮਾਲੁ ਖਜਾਨਾ ਥੇਹੁ ਘਰੁ ਹਰਿ ਕੇ ਚਰਣ ਨਿਧਾਨ ॥
ਨਾਨਕੁ ਜਾਚਕੁ ਦਰਿ ਤੇਰੈ ਪ੍ਰਭ ਤੁਧਨੋ ਮੰਗੈ ਦਾਨੁ ॥੪॥੪॥੧੭੨॥
गउड़ी माझ महला ५ ॥
मीठे हरि गुण गाउ जिंदू तूं मीठे हरि गुण गाउ ॥
सचे सेती रतिआ मिलिआ निथावे थाउ ॥१॥ रहाउ ॥
होरि साद सभि फिकिआ तनु मनु फिका होइ ॥
विणु परमेसर जो करे फिटु सु जीवणु सोइ ॥१॥
अंचलु गहि कै साध का तरणा इहु संसारु ॥
पारब्रहमु आराधीऐ उधरै सभ परवारु ॥२॥
साजनु बंधु सुमित्रु सो हरि नामु हिरदै देइ ॥
अउगण सभि मिटाइ कै परउपकारु करेइ ॥३॥
मालु खजाना थेहु घरु हरि के चरण निधान ॥
नानकु जाचकु दरि तेरै प्रभ तुधनो मंगै दानु ॥४॥४॥१७२॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी माझ महला ५ ॥ हे मेरी जिंदे ! तू हरी के प्यारे लगने वाले गुण गाती रहा कर। सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा के साथ रंगे रहने से उस मनुष्य को भी (हर जगह) आदर मिल जाता है~ जिसे पहले कोई जगह नहीं मिलती। 1। रहाउ। (हे मेरी जिंदे ! हरी के मीठे गुणों के मुकाबले दुनिया के) सारे स्वाद फीके हैं। (इन स्वादों में पड़ने से) शरीर (हरेक ज्ञानेंद्रिय) फीकी (रूखी) हो जाती है~ मन खुश्क हो जाता है। परमेश्वर का नाम जपने से वंचित होकर मनुष्य जो कुछ भी करता है~ उससे जिंदगी धिक्कारयोग्य हो जाती है। 1। (हे मेरी जिंदे !) गुरू का पल्ला पकड़ के इस संसार (-समुंद्र) से पार लांघ सकते हैं। (हे जिंदे !) परमात्मा की आराधना करनी चाहिए। (जो मनुष्य आराधना करता है~ उसका) सारा परिवार (संसार समुंद्र के विकारों की लहरों में से) बच निकलता है। 2। (हे मेरी जिंदे !) जो गुरमुख परमात्मा का नाम हृदय में (बसाने के लिए) देता है~ वही असल सज्जन है~ वही असल संबंधी है~ वही असली मित्र है~ (क्योंकि वह हमारे अंदर से) सारे अवगुण दूर करके (हमारी) भलाई करता है। 3। (हे मेरी जिंदे !) परमात्मा के चरण ही (सारे पदार्थों के) खजाने हैं (जीव के साथ निभने वाला) माल है~ खजाना है (जीव के वास्ते असली) बसेरा व घर है। हे प्रभू ! (तेरे दर का) मंगता नानक तेरे दर पर तेरे नाम-दान के तौर पर मांगता है। 4। 4। 172।

संदर्भ: यह अंग 218 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।

M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।

Nizamuddin dargah के बाहर qawwali सुनते-सुनते।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 38 पंक्तियों का है, 4 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 218” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 219 →, पीछे का: ← अंग 217

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।