अंग 235

अंग
235
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਆਪਿ ਛਡਾਏ ਛੁਟੀਐ ਸਤਿਗੁਰ ਚਰਣ ਸਮਾਲਿ ॥੪॥
ਮਨ ਕਰਹਲਾ ਮੇਰੇ ਪਿਆਰਿਆ ਵਿਚਿ ਦੇਹੀ ਜੋਤਿ ਸਮਾਲਿ ॥
ਗੁਰਿ ਨਉ ਨਿਧਿ ਨਾਮੁ ਵਿਖਾਲਿਆ ਹਰਿ ਦਾਤਿ ਕਰੀ ਦਇਆਲਿ ॥੫॥
ਮਨ ਕਰਹਲਾ ਤੂੰ ਚੰਚਲਾ ਚਤੁਰਾਈ ਛਡਿ ਵਿਕਰਾਲਿ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਸਮਾਲਿ ਤੂੰ ਹਰਿ ਮੁਕਤਿ ਕਰੇ ਅੰਤ ਕਾਲਿ ॥੬॥
ਮਨ ਕਰਹਲਾ ਵਡਭਾਗੀਆ ਤੂੰ ਗਿਆਨੁ ਰਤਨੁ ਸਮਾਲਿ ॥
ਗੁਰ ਗਿਆਨੁ ਖੜਗੁ ਹਥਿ ਧਾਰਿਆ ਜਮੁ ਮਾਰਿਅੜਾ ਜਮਕਾਲਿ ॥੭॥
ਅੰਤਰਿ ਨਿਧਾਨੁ ਮਨ ਕਰਹਲੇ ਭ੍ਰਮਿ ਭਵਹਿ ਬਾਹਰਿ ਭਾਲਿ ॥
ਗੁਰੁ ਪੁਰਖੁ ਪੂਰਾ ਭੇਟਿਆ ਹਰਿ ਸਜਣੁ ਲਧੜਾ ਨਾਲਿ ॥੮॥
ਰੰਗਿ ਰਤੜੇ ਮਨ ਕਰਹਲੇ ਹਰਿ ਰੰਗੁ ਸਦਾ ਸਮਾਲਿ ॥
ਹਰਿ ਰੰਗੁ ਕਦੇ ਨ ਉਤਰੈ ਗੁਰ ਸੇਵਾ ਸਬਦੁ ਸਮਾਲਿ ॥੯॥
ਹਮ ਪੰਖੀ ਮਨ ਕਰਹਲੇ ਹਰਿ ਤਰਵਰੁ ਪੁਰਖੁ ਅਕਾਲਿ ॥
ਵਡਭਾਗੀ ਗੁਰਮੁਖਿ ਪਾਇਆ ਜਨ ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਸਮਾਲਿ ॥੧੦॥੨॥
आपि छडाए छुटीऐ सतिगुर चरण समालि ॥४॥
मन करहला मेरे पिआरिआ विचि देही जोति समालि ॥
गुरि नउ निधि नामु विखालिआ हरि दाति करी दइआलि ॥५॥
मन करहला तूं चंचला चतुराई छडि विकरालि ॥
हरि हरि नामु समालि तूं हरि मुकति करे अंत कालि ॥६॥
मन करहला वडभागीआ तूं गिआनु रतनु समालि ॥
गुर गिआनु खड़गु हथि धारिआ जमु मारिअड़ा जमकालि ॥७॥
अंतरि निधानु मन करहले भ्रमि भवहि बाहरि भालि ॥
गुरु पुरखु पूरा भेटिआ हरि सजणु लधड़ा नालि ॥८॥
रंगि रतड़े मन करहले हरि रंगु सदा समालि ॥
हरि रंगु कदे न उतरै गुर सेवा सबदु समालि ॥९॥
हम पंखी मन करहले हरि तरवरु पुरखु अकालि ॥
वडभागी गुरमुखि पाइआ जन नानक नामु समालि ॥१०॥२॥

हिन्दी अर्थ: अगर परमात्मा स्वयं ही (माया के जाल में) से खलासी कराए तो ही गुरू के चरणों को (हृदय में) संभाल के (इस जाल में से) निकल सकते हैं। 4। हे मेरे प्यारे मन ! हे बे-मुहार मन ! (तेरे) शरीर में (ईश्वरीय) ज्योति (बस रही है~ इसे) संभाल के रख। परमात्मा का नाम (मानो~ जगत के सारे) नौ खजाने (हैं) जिसे गुरू ने ये नाम दिखा दिया है~ दयालु परमात्मा ने उस मनुष्य पर (नाम की यह) बख्शिश कर दी है। 5। हे बे-मुहार मन ! तू कभी कहीं टिक के नहीं बैठता~ ये चंचलता ये चालाकी छोड़ दे~ (ये चतुराई) भयानक (कूएं) में (गिरा देगी)। (हे बे-मुहार मन !) परमात्मा का नाम सदा याद रख~ परमात्मा (का नाम) ही अंत समय (माया के मोह के जाल से) खलासी दिलवाता है। 6। हे बे-मुहार मन ! परमात्मा के साथ गहरी सांझ (एक) रत्न (है~ इसे) तू संभाल के रख~ और बहुत भाग्यशाली बन। गुरू का दिया हुआ ज्ञान (गुरू के द्वारा परमात्मा के साथ डाली हुई गहरी सांझ~ एक) तलवार है (खड़ग है)~ (जिस मनुष्य ने ये तलवार अपने) हाथ में पकड़ ली~ उसने (आत्मिक) मौत को मारने वाले (इस ज्ञान-खड़ग) के द्वारा जम को (मौत के सहम को~ आत्मिक मौत को) मार डाला। 7। हे बे-मुहार मन ! (परमात्मा का नाम-) खजाना (तेरे) अंदर है~ पर तू भटकना में पड़ के बाहर ढॅूँढता फिरता है। (हे मन !) परमात्मा का रूप गुरू जिस मनुष्य को मिल जाता है~ वह मनुष्य सज्जन परमात्मा को अपने साथ बसता (अंदर ही) ढूँढ लेता है। 8। (माया के मोह के) रंग में रंगे हुए हे बे-मुहारे मन ! परमात्मा का प्रेम रंग सदा (अपने अंदर) संभाल के रख~ परमात्मा (के प्यार) का (ये) रंग फिर कभी फीका नहीं पड़ता~ (इस वास्ते ये रंग प्राप्त करने के लिए) तू गुरू की शरण पड़~ तू गुरू का शबद अपने हृदय में संभाल। 9। हे बे-मुहारे मन ! हम जीव पक्षी हैं। अकाल पुरख ने (हमें जगत में भेजा है जैसे कोई वृक्ष पक्षियों के रैन-बसेरा के लिए आसरा होता है~ वैसे ही) वह सर्व-व्यापक हरी (हम जीव-पक्षियों का आसरा-) वृक्ष है। हे दास नानक ! (कह,हे मन !) गुरू के द्वारा परमात्मा का नाम हृदय में संभाल के बहुत भाग्यशाली (जीव-पक्षियों) ने वह आसरा हासिल किया है। 10। 2।
ਰਾਗੁ ਗਉੜੀ ਗੁਆਰੇਰੀ ਮਹਲਾ ੫ ਅਸਟਪਦੀਆ
ੴ ਸਤਿਨਾਮੁ ਕਰਤਾ ਪੁਰਖੁ ਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਜਬ ਇਹੁ ਮਨ ਮਹਿ ਕਰਤ ਗੁਮਾਨਾ ॥
ਤਬ ਇਹੁ ਬਾਵਰੁ ਫਿਰਤ ਬਿਗਾਨਾ ॥
ਜਬ ਇਹੁ ਹੂਆ ਸਗਲ ਕੀ ਰੀਨਾ ॥
ਤਾ ਤੇ ਰਮਈਆ ਘਟਿ ਘਟਿ ਚੀਨਾ ॥੧॥
ਸਹਜ ਸੁਹੇਲਾ ਫਲੁ ਮਸਕੀਨੀ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਅਪੁਨੈ ਮੋਹਿ ਦਾਨੁ ਦੀਨੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜਬ ਕਿਸ ਕਉ ਇਹੁ ਜਾਨਸਿ ਮੰਦਾ ॥
ਤਬ ਸਗਲੇ ਇਸੁ ਮੇਲਹਿ ਫੰਦਾ ॥
ਮੇਰ ਤੇਰ ਜਬ ਇਨਹਿ ਚੁਕਾਈ ॥
ਤਾ ਤੇ ਇਸੁ ਸੰਗਿ ਨਹੀ ਬੈਰਾਈ ॥੨॥
ਜਬ ਇਨਿ ਅਪੁਨੀ ਅਪਨੀ ਧਾਰੀ ॥
ਤਬ ਇਸ ਕਉ ਹੈ ਮੁਸਕਲੁ ਭਾਰੀ ॥
ਜਬ ਇਨਿ ਕਰਣੈਹਾਰੁ ਪਛਾਤਾ ॥
ਤਬ ਇਸ ਨੋ ਨਾਹੀ ਕਿਛੁ ਤਾਤਾ ॥੩॥
ਜਬ ਇਨਿ ਅਪੁਨੋ ਬਾਧਿਓ ਮੋਹਾ ॥
ਆਵੈ ਜਾਇ ਸਦਾ ਜਮਿ ਜੋਹਾ ॥
ਜਬ ਇਸ ਤੇ ਸਭ ਬਿਨਸੇ ਭਰਮਾ ॥
ਭੇਦੁ ਨਾਹੀ ਹੈ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮਾ ॥੪॥
ਜਬ ਇਨਿ ਕਿਛੁ ਕਰਿ ਮਾਨੇ ਭੇਦਾ ॥
ਤਬ ਤੇ ਦੂਖ ਡੰਡ ਅਰੁ ਖੇਦਾ ॥
ਜਬ ਇਨਿ ਏਕੋ ਏਕੀ ਬੂਝਿਆ ॥
ਤਬ ਤੇ ਇਸ ਨੋ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਸੂਝਿਆ ॥੫॥
ਜਬ ਇਹੁ ਧਾਵੈ ਮਾਇਆ ਅਰਥੀ ॥
ਨਹ ਤ੍ਰਿਪਤਾਵੈ ਨਹ ਤਿਸ ਲਾਥੀ ॥
ਜਬ ਇਸ ਤੇ ਇਹੁ ਹੋਇਓ ਜਉਲਾ ॥
ਪੀਛੈ ਲਾਗਿ ਚਲੀ ਉਠਿ ਕਉਲਾ ॥੬॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਜਉ ਸਤਿਗੁਰੁ ਮਿਲਿਓ ॥
ਮਨ ਮੰਦਰ ਮਹਿ ਦੀਪਕੁ ਜਲਿਓ ॥
ਜੀਤ ਹਾਰ ਕੀ ਸੋਝੀ ਕਰੀ ॥
ਤਉ ਇਸੁ ਘਰ ਕੀ ਕੀਮਤਿ ਪਰੀ ॥੭॥
रागु गउड़ी गुआरेरी महला ५ असटपदीआ
ੴ सतिनामु करता पुरखु गुर प्रसादि ॥
जब इहु मन महि करत गुमाना ॥
तब इहु बावरु फिरत बिगाना ॥
जब इहु हूआ सगल की रीना ॥
ता ते रमईआ घटि घटि चीना ॥१॥
सहज सुहेला फलु मसकीनी ॥
सतिगुर अपुनै मोहि दानु दीनी ॥१॥ रहाउ ॥
जब किस कउ इहु जानसि मंदा ॥
तब सगले इसु मेलहि फंदा ॥
मेर तेर जब इनहि चुकाई ॥
ता ते इसु संगि नही बैराई ॥२॥
जब इनि अपुनी अपनी धारी ॥
तब इस कउ है मुसकलु भारी ॥
जब इनि करणैहारु पछाता ॥
तब इस नो नाही किछु ताता ॥३॥
जब इनि अपुनो बाधिओ मोहा ॥
आवै जाइ सदा जमि जोहा ॥
जब इस ते सभ बिनसे भरमा ॥
भेदु नाही है पारब्रहमा ॥४॥
जब इनि किछु करि माने भेदा ॥
तब ते दूख डंड अरु खेदा ॥
जब इनि एको एकी बूझिआ ॥
तब ते इस नो सभु किछु सूझिआ ॥५॥
जब इहु धावै माइआ अरथी ॥
नह त्रिपतावै नह तिस लाथी ॥
जब इस ते इहु होइओ जउला ॥
पीछै लागि चली उठि कउला ॥६॥
करि किरपा जउ सतिगुरु मिलिओ ॥
मन मंदर महि दीपकु जलिओ ॥
जीत हार की सोझी करी ॥
तउ इसु घर की कीमति परी ॥७॥

हिन्दी अर्थ: रागु गउड़ी गुआरेरी महला ५ असटपदीआ ੴ सतिनामु करता पुरखु गुर प्रसादि ॥ (हे भाई !) जब मनुष्य (अपने) मन में (बड़े होने का) मान करता है तब (वह अहंकार में) बावरा (हुआ) मनुष्य (सब लोगों से) अलग अलग हो के चलता फिरता है~ पर जब ये सब लोगों की चरणधूड़ हो गया~ तब इसने सोहणे राम को हरेक शरीर में देख लिया। 1। (हे भाई !) मेरे गुरू ने मुझे (गरीबी स्वभाव की) दाति बख्शी। उस गरीबी स्वभाव का फल ये हुआ है कि मुझे आत्मिक अडोलता मिल गई~ मैं सुखी हूँ। 1। रहाउ। जब तक मनुष्य हर किसी को बुरा समझता है तब तक (इसे ऐसा प्रतीत होता है कि) सारे लोग इसके वास्ते (ठॅगी के) जाल बिछा रहे हैं~ पर जब इसने (अपने अंदर से) भेद भाव दूर कर दिया~ तब (इसे) यकीन बन जाता है कि (कोई) इसके साथ वैर नहीं कर रहा। 2। जब तक मनुष्य के (मन में) अपना ही मतलब टिकाए रखा~ तब तक इसे बड़ी मुश्किल बनी रहती है। पर जब इसने (हर जगह) सृजनहार को ही (बसता) पहिचान लिया~ तब इसे (किसी से) कोई जलन नहीं रह जाती। 3। जब तक इस मनुष्य ने (दुनिया से) अपना मोह पक्का किया हुआ है~ तब तक ये भटकता रहता है~ आत्मिक मौत ने (तब तक) सदा इसे अपनी ताक में रखा हुआ है। पर जब इसके अंदर से सारी भटकने खत्म हो जाती हैं~ तब इसमें और परमात्मा में कोई दूरी नहीं रह जाती। 4। जब तक इस मनुष्य ने (दूसरों से) कोई दूरियां मिथ रखीं हैं~ तब तक इसकी आत्मा को दुखों कलेशों की सजाएं मिलती रहती हैं~ पर जब इसने (हर जगह) एक परमात्मा को ही बसता समझ लिया~ तब इसे (सही जीवन जुगति का) हरेक तरीका समझ आ जाता है। 5। जब तक ये मनुष्य माया का मुहताज हो के (हर तरफ) भटकता फिरता है~ तब तक ये तृप्त नहीं होता। इसकी माया वाली तृष्णा खत्म नहीं होती। जब ये मनुष्य माया के मोह से अलग हो जाता है~ तब माया इसके पीछे पीछे चल पड़ती है। (माया इसकी दासी बन जाती है)। 6। जब (किसी मनुष्य को) गुरू मेहर करके मिल जाता है~ उसके मन में ज्ञान हो जाता है~ जैसे घर में दीपक जल पड़ता है (और घर की हरेक चीज दिखाई देने लग पड़ती है) तब मनुष्य को समझ आ जाती है कि मानस जन्म में दरअसल जीत क्या है और हार क्या~ तब इसे अपने शरीर की कद्र मालूम हो जाती है (और इसे विकारों में नहीं बर्बाद करता)। 7।

संदर्भ: यह अंग 235 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।

M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।

Karwa Chauth की रात, चाँद का इंतज़ार, और बीच में हाथों की मेहंदी।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 45 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 235” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 236 →, पीछे का: ← अंग 234

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।