अंग
188
राग Gauree
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਮਾਨੁ ਮਹਤੁ ਨਾਨਕ ਪ੍ਰਭੁ ਤੇਰੇ ॥੪॥੪੦॥੧੦੯॥
मानु महतु नानक प्रभु तेरे ॥४॥४०॥१०९॥
हिन्दी अर्थ: तेरा सेवक बनने से ही (लोक-परलोक में) आदर मिलता है वडिआई मिलती है। 4। 40। 109।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਜਾ ਕਉ ਤੁਮ ਭਏ ਸਮਰਥ ਅੰਗਾ ॥
ਤਾ ਕਉ ਕਛੁ ਨਾਹੀ ਕਾਲੰਗਾ ॥੧॥
ਮਾਧਉ ਜਾ ਕਉ ਹੈ ਆਸ ਤੁਮਾਰੀ ॥
ਤਾ ਕਉ ਕਛੁ ਨਾਹੀ ਸੰਸਾਰੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜਾ ਕੈ ਹਿਰਦੈ ਠਾਕੁਰੁ ਹੋਇ ॥
ਤਾ ਕਉ ਸਹਸਾ ਨਾਹੀ ਕੋਇ ॥੨॥
ਜਾ ਕਉ ਤੁਮ ਦੀਨੀ ਪ੍ਰਭ ਧੀਰ ॥
ਤਾ ਕੈ ਨਿਕਟਿ ਨ ਆਵੈ ਪੀਰ ॥੩॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਮੈ ਸੋ ਗੁਰੁ ਪਾਇਆ ॥
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਪੂਰਨ ਦੇਖਾਇਆ ॥੪॥੪੧॥੧੧੦॥
ਜਾ ਕਉ ਤੁਮ ਭਏ ਸਮਰਥ ਅੰਗਾ ॥
ਤਾ ਕਉ ਕਛੁ ਨਾਹੀ ਕਾਲੰਗਾ ॥੧॥
ਮਾਧਉ ਜਾ ਕਉ ਹੈ ਆਸ ਤੁਮਾਰੀ ॥
ਤਾ ਕਉ ਕਛੁ ਨਾਹੀ ਸੰਸਾਰੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜਾ ਕੈ ਹਿਰਦੈ ਠਾਕੁਰੁ ਹੋਇ ॥
ਤਾ ਕਉ ਸਹਸਾ ਨਾਹੀ ਕੋਇ ॥੨॥
ਜਾ ਕਉ ਤੁਮ ਦੀਨੀ ਪ੍ਰਭ ਧੀਰ ॥
ਤਾ ਕੈ ਨਿਕਟਿ ਨ ਆਵੈ ਪੀਰ ॥੩॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਮੈ ਸੋ ਗੁਰੁ ਪਾਇਆ ॥
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਪੂਰਨ ਦੇਖਾਇਆ ॥੪॥੪੧॥੧੧੦॥
गउड़ी महला ५ ॥
जा कउ तुम भए समरथ अंगा ॥
ता कउ कछु नाही कालंगा ॥१॥
माधउ जा कउ है आस तुमारी ॥
ता कउ कछु नाही संसारी ॥१॥ रहाउ ॥
जा कै हिरदै ठाकुरु होइ ॥
ता कउ सहसा नाही कोइ ॥२॥
जा कउ तुम दीनी प्रभ धीर ॥
ता कै निकटि न आवै पीर ॥३॥
कहु नानक मै सो गुरु पाइआ ॥
पारब्रहम पूरन देखाइआ ॥४॥४१॥११०॥
जा कउ तुम भए समरथ अंगा ॥
ता कउ कछु नाही कालंगा ॥१॥
माधउ जा कउ है आस तुमारी ॥
ता कउ कछु नाही संसारी ॥१॥ रहाउ ॥
जा कै हिरदै ठाकुरु होइ ॥
ता कउ सहसा नाही कोइ ॥२॥
जा कउ तुम दीनी प्रभ धीर ॥
ता कै निकटि न आवै पीर ॥३॥
कहु नानक मै सो गुरु पाइआ ॥
पारब्रहम पूरन देखाइआ ॥४॥४१॥११०॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ हे सब ताकतों के मालिक प्रभू ! जिस मनुष्य का तू सहायक बनता है~ उसे कोई (विकार आदि का) दाग नहीं छू सकता। 1। हे माया के पति-प्रभू ! जिस मनुष्य को (सिर्फ) तेरी (सहायता की) उम्मीद है~ उसे दुनिया (के लोगों की सहायता) की उम्मीद (करने की जरूरत) नहीं (रहती)। 1। रहाउ। (हे भाई !) जिस मनुष्य के हृदय में मालिक प्रभू की याद रहती है~ उसे (दुनिया का) कोई सहम-फिक्र छू नहीं सकता। 2। हे प्रभू ! जिस मनुष्य को तूने धैर्य दिया है~ कोई दुख-कलेश उसके नजदीक नहीं फटक सकता। 3। हे नानक ! कह, मैंने वह गुरू ढूँढ लिया है~ जिसने मुझे (ऐसी ताकतों का मालिक) सर्व-व्यापक बेअंत प्रभू दिखा दिया है। 4। 41। 110।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਦੁਲਭ ਦੇਹ ਪਾਈ ਵਡਭਾਗੀ ॥
ਨਾਮੁ ਨ ਜਪਹਿ ਤੇ ਆਤਮ ਘਾਤੀ ॥੧॥
ਮਰਿ ਨ ਜਾਹੀ ਜਿਨਾ ਬਿਸਰਤ ਰਾਮ ॥
ਨਾਮ ਬਿਹੂਨ ਜੀਵਨ ਕਉਨ ਕਾਮ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਖਾਤ ਪੀਤ ਖੇਲਤ ਹਸਤ ਬਿਸਥਾਰ ॥
ਕਵਨ ਅਰਥ ਮਿਰਤਕ ਸੀਗਾਰ ॥੨॥
ਜੋ ਨ ਸੁਨਹਿ ਜਸੁ ਪਰਮਾਨੰਦਾ ॥
ਪਸੁ ਪੰਖੀ ਤ੍ਰਿਗਦ ਜੋਨਿ ਤੇ ਮੰਦਾ ॥੩॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਗੁਰਿ ਮੰਤ੍ਰੁ ਦ੍ਰਿੜਾਇਆ ॥
ਕੇਵਲ ਨਾਮੁ ਰਿਦ ਮਾਹਿ ਸਮਾਇਆ ॥੪॥੪੨॥੧੧੧॥
ਦੁਲਭ ਦੇਹ ਪਾਈ ਵਡਭਾਗੀ ॥
ਨਾਮੁ ਨ ਜਪਹਿ ਤੇ ਆਤਮ ਘਾਤੀ ॥੧॥
ਮਰਿ ਨ ਜਾਹੀ ਜਿਨਾ ਬਿਸਰਤ ਰਾਮ ॥
ਨਾਮ ਬਿਹੂਨ ਜੀਵਨ ਕਉਨ ਕਾਮ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਖਾਤ ਪੀਤ ਖੇਲਤ ਹਸਤ ਬਿਸਥਾਰ ॥
ਕਵਨ ਅਰਥ ਮਿਰਤਕ ਸੀਗਾਰ ॥੨॥
ਜੋ ਨ ਸੁਨਹਿ ਜਸੁ ਪਰਮਾਨੰਦਾ ॥
ਪਸੁ ਪੰਖੀ ਤ੍ਰਿਗਦ ਜੋਨਿ ਤੇ ਮੰਦਾ ॥੩॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਗੁਰਿ ਮੰਤ੍ਰੁ ਦ੍ਰਿੜਾਇਆ ॥
ਕੇਵਲ ਨਾਮੁ ਰਿਦ ਮਾਹਿ ਸਮਾਇਆ ॥੪॥੪੨॥੧੧੧॥
गउड़ी महला ५ ॥
दुलभ देह पाई वडभागी ॥
नामु न जपहि ते आतम घाती ॥१॥
मरि न जाही जिना बिसरत राम ॥
नाम बिहून जीवन कउन काम ॥१॥ रहाउ ॥
खात पीत खेलत हसत बिसथार ॥
कवन अरथ मिरतक सीगार ॥२॥
जो न सुनहि जसु परमानंदा ॥
पसु पंखी त्रिगद जोनि ते मंदा ॥३॥
कहु नानक गुरि मंत्रु द्रिड़ाइआ ॥
केवल नामु रिद माहि समाइआ ॥४॥४२॥१११॥
दुलभ देह पाई वडभागी ॥
नामु न जपहि ते आतम घाती ॥१॥
मरि न जाही जिना बिसरत राम ॥
नाम बिहून जीवन कउन काम ॥१॥ रहाउ ॥
खात पीत खेलत हसत बिसथार ॥
कवन अरथ मिरतक सीगार ॥२॥
जो न सुनहि जसु परमानंदा ॥
पसु पंखी त्रिगद जोनि ते मंदा ॥३॥
कहु नानक गुरि मंत्रु द्रिड़ाइआ ॥
केवल नामु रिद माहि समाइआ ॥४॥४२॥१११॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ ये दुर्लभ मानव शरीर बड़े भाग्यों से मिलता है। (पर) जो मनुष्य (ये शरीर प्राप्त करके) परमात्मा का नाम नहीं जपते~ वे आत्मिक मौत ले लेते हैं। 1। (हे भाई !) जिन मनुष्यों को परमात्मा (का नाम) भूल जाता है~ वे जरूर आत्मिक मौत मर जाते हैं। (क्योंकि) परमात्मा के नाम से वंचित रहे व्यक्ति का जीवन किसी भी काम का नहीं। 1। रहाउ। (परमात्मा के नाम से वंचित मनुष्य) खाने-पीने-हसने-खेलने के पसारा पसारते हैं (पर ये ऐसे ही है जैसे किसी मुर्दे को श्रृंगारना~ और) मुर्दे को श्रृंगार का कोई लाभ नहीं होता। 2। जो मनुष्य सबसे श्रेष्ठ आनंद के मालिक प्रभू की सिफत सालाह नहीं सुनते~ वो पशु-पक्षी व टेढ़े हो के चलने वाले (रेंगने वाले) जीवों की जूनियों से भी बुरे हैं। 3। हे नानक ! कह, जिस मनुष्य के हृदय में गुरू ने अपना उपदेश पक्का कर दिया है~ उसके हृदय में सिर्फ परमात्मा का नाम ही सदा टिका रहता है। 4। 42। 111।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਕਾ ਕੀ ਮਾਈ ਕਾ ਕੋ ਬਾਪ ॥
ਨਾਮ ਧਾਰੀਕ ਝੂਠੇ ਸਭਿ ਸਾਕ ॥੧॥
ਕਾਹੇ ਕਉ ਮੂਰਖ ਭਖਲਾਇਆ ॥
ਮਿਲਿ ਸੰਜੋਗਿ ਹੁਕਮਿ ਤੂੰ ਆਇਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਏਕਾ ਮਾਟੀ ਏਕਾ ਜੋਤਿ ॥
ਏਕੋ ਪਵਨੁ ਕਹਾ ਕਉਨੁ ਰੋਤਿ ॥੨॥
ਮੇਰਾ ਮੇਰਾ ਕਰਿ ਬਿਲਲਾਹੀ ॥
ਮਰਣਹਾਰੁ ਇਹੁ ਜੀਅਰਾ ਨਾਹੀ ॥੩॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਗੁਰਿ ਖੋਲੇ ਕਪਾਟ ॥
ਮੁਕਤੁ ਭਏ ਬਿਨਸੇ ਭ੍ਰਮ ਥਾਟ ॥੪॥੪੩॥੧੧੨॥
ਕਾ ਕੀ ਮਾਈ ਕਾ ਕੋ ਬਾਪ ॥
ਨਾਮ ਧਾਰੀਕ ਝੂਠੇ ਸਭਿ ਸਾਕ ॥੧॥
ਕਾਹੇ ਕਉ ਮੂਰਖ ਭਖਲਾਇਆ ॥
ਮਿਲਿ ਸੰਜੋਗਿ ਹੁਕਮਿ ਤੂੰ ਆਇਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਏਕਾ ਮਾਟੀ ਏਕਾ ਜੋਤਿ ॥
ਏਕੋ ਪਵਨੁ ਕਹਾ ਕਉਨੁ ਰੋਤਿ ॥੨॥
ਮੇਰਾ ਮੇਰਾ ਕਰਿ ਬਿਲਲਾਹੀ ॥
ਮਰਣਹਾਰੁ ਇਹੁ ਜੀਅਰਾ ਨਾਹੀ ॥੩॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਗੁਰਿ ਖੋਲੇ ਕਪਾਟ ॥
ਮੁਕਤੁ ਭਏ ਬਿਨਸੇ ਭ੍ਰਮ ਥਾਟ ॥੪॥੪੩॥੧੧੨॥
गउड़ी महला ५ ॥
का की माई का को बाप ॥
नाम धारीक झूठे सभि साक ॥१॥
काहे कउ मूरख भखलाइआ ॥
मिलि संजोगि हुकमि तूं आइआ ॥१॥ रहाउ ॥
एका माटी एका जोति ॥
एको पवनु कहा कउनु रोति ॥२॥
मेरा मेरा करि बिललाही ॥
मरणहारु इहु जीअरा नाही ॥३॥
कहु नानक गुरि खोले कपाट ॥
मुकतु भए बिनसे भ्रम थाट ॥४॥४३॥११२॥
का की माई का को बाप ॥
नाम धारीक झूठे सभि साक ॥१॥
काहे कउ मूरख भखलाइआ ॥
मिलि संजोगि हुकमि तूं आइआ ॥१॥ रहाउ ॥
एका माटी एका जोति ॥
एको पवनु कहा कउनु रोति ॥२॥
मेरा मेरा करि बिललाही ॥
मरणहारु इहु जीअरा नाही ॥३॥
कहु नानक गुरि खोले कपाट ॥
मुकतु भए बिनसे भ्रम थाट ॥४॥४३॥११२॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ (असल में सदा के लिए) ना कोई किसी की माँ है~ ना कोई किसी का पिता है। (माता-पिता-पुत्र-सत्री आदि ये) सारे साक सदा कायम रहने वाले नहीं हैं~ कहने मात्र के ही हैं। 1। अर्थ: हे मूर्ख ! तू क्यूँ (बिलक रहा है~ जैसे) सपने के असर में बोल रहा है? (तुझे ये सूझ नहीं कि) तू परमात्मा के हुकम में (पिछले) संयोगों के अनुसार (इन माता-पिता आदि संबंधियों से) मिल के (जगत में) आया है (जब तक ये संयोग कायम है तब तक इन संबंधियों से तेरा मेल रह सकता है)। 1। रहाउ। सब जीवों की एक ही मिट्टी है~ सब में (करतार की) एक ही ज्योति मौजूद है~ सब में एक ही प्राण हैं (जितना समय संजोग कायम है उतना समय ये तत्व इकट्ठे हैं। संजोगों की समाप्ति पर तत्व अलग-अलग हो जाते हैं। किसी को किसी के वास्ते) रोने की जरूरत नहीं पड़ती (रोने का लाभ भी नहीं होता)। 2। (किसी संबन्धी के विछुड़ने पर लोग) ‘मेरा मेरा’ कह के बिलखते हैं~ (पर ये नहीं समझते कि सदा के लिए कोई किसी का ‘मेरा’ नहीं और) ये जीवात्मा मरने वाली नहीं। 3। हे नानक ! कह,जिन मनुष्यों के (माया के मोह से जकड़े हुए) किवाड़ गुरू ने खोल दिए~ वे मोह के बंधनों से स्वतंत्र हो गए~ उनकी मोह के भटकनों के सारे पसारे समाप्त हो गए। 4। 43। 112।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਵਡੇ ਵਡੇ ਜੋ ਦੀਸਹਿ ਲੋਗ ॥
ਤਿਨ ਕਉ ਬਿਆਪੈ ਚਿੰਤਾ ਰੋਗ ॥੧॥
ਕਉਨ ਵਡਾ ਮਾਇਆ ਵਡਿਆਈ ॥
ਸੋ ਵਡਾ ਜਿਨਿ ਰਾਮ ਲਿਵ ਲਾਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਭੂਮੀਆ ਭੂਮਿ ਊਪਰਿ ਨਿਤ ਲੁਝੈ ॥
ਛੋਡਿ ਚਲੈ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਨਹੀ ਬੁਝੈ ॥੨॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਇਹੁ ਤਤੁ ਬੀਚਾਰਾ ॥
ਬਿਨੁ ਹਰਿ ਭਜਨ ਨਾਹੀ ਛੁਟਕਾਰਾ ॥੩॥੪੪॥੧੧੩॥
ਵਡੇ ਵਡੇ ਜੋ ਦੀਸਹਿ ਲੋਗ ॥
ਤਿਨ ਕਉ ਬਿਆਪੈ ਚਿੰਤਾ ਰੋਗ ॥੧॥
ਕਉਨ ਵਡਾ ਮਾਇਆ ਵਡਿਆਈ ॥
ਸੋ ਵਡਾ ਜਿਨਿ ਰਾਮ ਲਿਵ ਲਾਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਭੂਮੀਆ ਭੂਮਿ ਊਪਰਿ ਨਿਤ ਲੁਝੈ ॥
ਛੋਡਿ ਚਲੈ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਨਹੀ ਬੁਝੈ ॥੨॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਇਹੁ ਤਤੁ ਬੀਚਾਰਾ ॥
ਬਿਨੁ ਹਰਿ ਭਜਨ ਨਾਹੀ ਛੁਟਕਾਰਾ ॥੩॥੪੪॥੧੧੩॥
गउड़ी महला ५ ॥
वडे वडे जो दीसहि लोग ॥
तिन कउ बिआपै चिंता रोग ॥१॥
कउन वडा माइआ वडिआई ॥
सो वडा जिनि राम लिव लाई ॥१॥ रहाउ ॥
भूमीआ भूमि ऊपरि नित लुझै ॥
छोडि चलै त्रिसना नही बुझै ॥२॥
कहु नानक इहु ततु बीचारा ॥
बिनु हरि भजन नाही छुटकारा ॥३॥४४॥११३॥
वडे वडे जो दीसहि लोग ॥
तिन कउ बिआपै चिंता रोग ॥१॥
कउन वडा माइआ वडिआई ॥
सो वडा जिनि राम लिव लाई ॥१॥ रहाउ ॥
भूमीआ भूमि ऊपरि नित लुझै ॥
छोडि चलै त्रिसना नही बुझै ॥२॥
कहु नानक इहु ततु बीचारा ॥
बिनु हरि भजन नाही छुटकारा ॥३॥४४॥११३॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ (हे भाई ! दुनिया में धन प्रभुता आदि से) जो लोग बड़े-बड़े दिखाई देते हैं~ उन्हें (सदा ही) चिंता का रोग दबाए रखता है। 1। (हे भाई !) माया के कारण (जगत में) मिले आदर से कोई भी मनुष्य (असल में) बड़ा नहीं। वही मनुष्य बड़ा है~ जिसने परमात्मा के साथ लगन लगाई हुई है। 1। रहाउ। जमीन का मालिक मनुष्य जमीन की (मल्कियत की) खातिर (औरों से) सदा लड़ता-झगड़ता रहता है (ये जमीन यहीं ही) छोड़ के (आखिर यहाँ से) चल पड़ता है। (पर सारी उम्र उसकी मल्कियत की) तृष्णा नहीं खत्म होती। 2। हे नानक ! कह,हमने विचार करके ये काम की बात ढूँढी है कि परमात्मा के भजन के बिना माया के मोह से निजात नहीं मिलती (और जब तक माया का मोह कायम है तब तक मनुष्य का दायरा छोटा ही रहता है। 3। 44। 113।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਪੂਰਾ ਮਾਰਗੁ ਪੂਰਾ ਇਸਨਾਨੁ ॥
ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਪੂਰਾ ਹਿਰਦੈ ਨਾਮੁ ॥੧॥
ਪੂਰੀ ਰਹੀ ਜਾ ਪੂਰੈ ਰਾਖੀ ॥
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਕੀ ਸਰਣਿ ਜਨ ਤਾਕੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਪੂਰਾ ਸੁਖੁ ਪੂਰਾ ਸੰਤੋਖੁ ॥
ਪੂਰਾ ਤਪੁ ਪੂਰਨ ਰਾਜੁ ਜੋਗੁ ॥੨॥
ਹਰਿ ਕੈ ਮਾਰਗਿ ਪਤਿਤ ਪੁਨੀਤ ॥
ਪੂਰੀ ਸੋਭਾ ਪੂਰਾ ਲੋਕੀਕ ॥੩॥
ਕਰਣਹਾਰੁ ਸਦ ਵਸੈ ਹਦੂਰਾ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਮੇਰਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਪੂਰਾ ॥੪॥੪੫॥੧੧੪॥
ਪੂਰਾ ਮਾਰਗੁ ਪੂਰਾ ਇਸਨਾਨੁ ॥
ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਪੂਰਾ ਹਿਰਦੈ ਨਾਮੁ ॥੧॥
ਪੂਰੀ ਰਹੀ ਜਾ ਪੂਰੈ ਰਾਖੀ ॥
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਕੀ ਸਰਣਿ ਜਨ ਤਾਕੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਪੂਰਾ ਸੁਖੁ ਪੂਰਾ ਸੰਤੋਖੁ ॥
ਪੂਰਾ ਤਪੁ ਪੂਰਨ ਰਾਜੁ ਜੋਗੁ ॥੨॥
ਹਰਿ ਕੈ ਮਾਰਗਿ ਪਤਿਤ ਪੁਨੀਤ ॥
ਪੂਰੀ ਸੋਭਾ ਪੂਰਾ ਲੋਕੀਕ ॥੩॥
ਕਰਣਹਾਰੁ ਸਦ ਵਸੈ ਹਦੂਰਾ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਮੇਰਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਪੂਰਾ ॥੪॥੪੫॥੧੧੪॥
गउड़ी महला ५ ॥
पूरा मारगु पूरा इसनानु ॥
सभु किछु पूरा हिरदै नामु ॥१॥
पूरी रही जा पूरै राखी ॥
पारब्रहम की सरणि जन ताकी ॥१॥ रहाउ ॥
पूरा सुखु पूरा संतोखु ॥
पूरा तपु पूरन राजु जोगु ॥२॥
हरि कै मारगि पतित पुनीत ॥
पूरी सोभा पूरा लोकीक ॥३॥
करणहारु सद वसै हदूरा ॥
कहु नानक मेरा सतिगुरु पूरा ॥४॥४५॥११४॥
पूरा मारगु पूरा इसनानु ॥
सभु किछु पूरा हिरदै नामु ॥१॥
पूरी रही जा पूरै राखी ॥
पारब्रहम की सरणि जन ताकी ॥१॥ रहाउ ॥
पूरा सुखु पूरा संतोखु ॥
पूरा तपु पूरन राजु जोगु ॥२॥
हरि कै मारगि पतित पुनीत ॥
पूरी सोभा पूरा लोकीक ॥३॥
करणहारु सद वसै हदूरा ॥
कहु नानक मेरा सतिगुरु पूरा ॥४॥४५॥११४॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ परमात्मा का नाम ही (जीवन का) सही रास्ता है~ नाम ही असल (तीर्थ) स्नान है (गुरू की मेहर से) जिस मनुष्य के हृदय में परमात्मा का नाम बसता है~ उसका हरेक उद्यम कमी-रहित होता है । 1। (पूरे गुरू की मेहर से) जिन मनुष्यों ने (अपने सब कार्य-व्यवहारों में) परमात्मा का आसरा लिए रखा~ उनकी इज्जत सदा बनी रही क्योंकि अभॅुल गुरू ने उनकी इज्जत रखी। 1। रहाउ। (गुरू की मेहर से जो मनुष्य परमात्मा की शरण में रहता है वह) सदा के लिए आत्मिक आनंद पाता है और संतोष वाला जीवन व्यातीत करता है। (परमात्मा की शरण ही उसके वास्ते) अभॅुल तप है~ वह पूर्ण राज भी भोगता है और परमात्मा के चरणों से भी जुड़ा रहता है। 2। (गुरू की मेहर से जो मनुष्य) परमात्मा के राह पर चलते हैं वह (पहले) विकारों में गिरे हुए भी (अब) पवित्र हो जाते हैं। (उन्हें लोक-परलोक में) सदा के लिए शोभा मिलती है। लोगों के साथ उनका मेल जोल-व्यवहार भी ठीक रहता है। 3। करतार सृजनहार सदा उस मनुष्य के अंग-संग बसता है हे नानक ! कह, जिस मनुष्य को मेरा अभॅुल गुरू मिल पड़ता है। 4। 45। 114।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਸੰਤ ਕੀ ਧੂਰਿ ਮਿਟੇ ਅਘ ਕੋਟ ॥
ਸੰਤ ਕੀ ਧੂਰਿ ਮਿਟੇ ਅਘ ਕੋਟ ॥
गउड़ी महला ५ ॥
संत की धूरि मिटे अघ कोट ॥
संत की धूरि मिटे अघ कोट ॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ (हे भाई !) गुरू संत के चरणों की धूड़ (माथे पे लगाने) से (मनुष्य के) करोड़ों पाप दूर हो जाते हैं।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 188 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
दिल्ली का summer-shaadi, मंडप के बीच bride-groom, और परिवार की उम्मीदें।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 56 पंक्तियों का है, 7 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 188” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 189 →, पीछे का: ← अंग 187।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।