अंग
302
राग Gauree
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ਸਭਿ ਜੀਅ ਤੇਰੇ ਤੂ ਸਭਸ ਦਾ ਤੂ ਸਭ ਛਡਾਹੀ ॥੪॥
सभि जीअ तेरे तू सभस दा तू सभ छडाही ॥४॥
हिन्दी अर्थ: सब जीव तेरे (रचे हुए) हैं। तू सब का (मालिक) है। तू सभी को (दुखों और चिंताओं से) स्वयं छुड़वाता है। 4।
ਸਲੋਕ ਮਃ ੪ ॥
ਸੁਣਿ ਸਾਜਨ ਪ੍ਰੇਮ ਸੰਦੇਸਰਾ ਅਖੀ ਤਾਰ ਲਗੰਨਿ ॥
ਗੁਰਿ ਤੁਠੈ ਸਜਣੁ ਮੇਲਿਆ ਜਨ ਨਾਨਕ ਸੁਖਿ ਸਵੰਨਿ ॥੧॥
ਸੁਣਿ ਸਾਜਨ ਪ੍ਰੇਮ ਸੰਦੇਸਰਾ ਅਖੀ ਤਾਰ ਲਗੰਨਿ ॥
ਗੁਰਿ ਤੁਠੈ ਸਜਣੁ ਮੇਲਿਆ ਜਨ ਨਾਨਕ ਸੁਖਿ ਸਵੰਨਿ ॥੧॥
सलोक मः ४ ॥
सुणि साजन प्रेम संदेसरा अखी तार लगंनि ॥
गुरि तुठै सजणु मेलिआ जन नानक सुखि सवंनि ॥१॥
सुणि साजन प्रेम संदेसरा अखी तार लगंनि ॥
गुरि तुठै सजणु मेलिआ जन नानक सुखि सवंनि ॥१॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला ४॥ सज्जन प्रभू का प्यार भरा संदेशा सुन के (जिन की) आँखें तार में (भाव- दीदार की उम्मीद में) लग जाती हैं; हे नानक ! गुरू ने प्रसन्न हो के उनको सज्जन मिलाया है। और वे सुख में टिके रहते हैं। 1।
ਮਃ ੪ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਦਾਤਾ ਦਇਆਲੁ ਹੈ ਜਿਸ ਨੋ ਦਇਆ ਸਦਾ ਹੋਇ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਅੰਦਰਹੁ ਨਿਰਵੈਰੁ ਹੈ ਸਭੁ ਦੇਖੈ ਬ੍ਰਹਮੁ ਇਕੁ ਸੋਇ ॥
ਨਿਰਵੈਰਾ ਨਾਲਿ ਜਿ ਵੈਰੁ ਚਲਾਇਦੇ ਤਿਨ ਵਿਚਹੁ ਤਿਸਟਿਆ ਨ ਕੋਇ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸਭਨਾ ਦਾ ਭਲਾ ਮਨਾਇਦਾ ਤਿਸ ਦਾ ਬੁਰਾ ਕਿਉ ਹੋਇ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਨੋ ਜੇਹਾ ਕੋ ਇਛਦਾ ਤੇਹਾ ਫਲੁ ਪਾਏ ਕੋਇ ॥
ਨਾਨਕ ਕਰਤਾ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਜਾਣਦਾ ਜਿਦੂ ਕਿਛੁ ਗੁਝਾ ਨ ਹੋਇ ॥੨॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਦਾਤਾ ਦਇਆਲੁ ਹੈ ਜਿਸ ਨੋ ਦਇਆ ਸਦਾ ਹੋਇ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਅੰਦਰਹੁ ਨਿਰਵੈਰੁ ਹੈ ਸਭੁ ਦੇਖੈ ਬ੍ਰਹਮੁ ਇਕੁ ਸੋਇ ॥
ਨਿਰਵੈਰਾ ਨਾਲਿ ਜਿ ਵੈਰੁ ਚਲਾਇਦੇ ਤਿਨ ਵਿਚਹੁ ਤਿਸਟਿਆ ਨ ਕੋਇ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸਭਨਾ ਦਾ ਭਲਾ ਮਨਾਇਦਾ ਤਿਸ ਦਾ ਬੁਰਾ ਕਿਉ ਹੋਇ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਨੋ ਜੇਹਾ ਕੋ ਇਛਦਾ ਤੇਹਾ ਫਲੁ ਪਾਏ ਕੋਇ ॥
ਨਾਨਕ ਕਰਤਾ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਜਾਣਦਾ ਜਿਦੂ ਕਿਛੁ ਗੁਝਾ ਨ ਹੋਇ ॥੨॥
मः ४ ॥
सतिगुरु दाता दइआलु है जिस नो दइआ सदा होइ ॥
सतिगुरु अंदरहु निरवैरु है सभु देखै ब्रहमु इकु सोइ ॥
निरवैरा नालि जि वैरु चलाइदे तिन विचहु तिसटिआ न कोइ ॥
सतिगुरु सभना दा भला मनाइदा तिस दा बुरा किउ होइ ॥
सतिगुर नो जेहा को इछदा तेहा फलु पाए कोइ ॥
नानक करता सभु किछु जाणदा जिदू किछु गुझा न होइ ॥२॥
सतिगुरु दाता दइआलु है जिस नो दइआ सदा होइ ॥
सतिगुरु अंदरहु निरवैरु है सभु देखै ब्रहमु इकु सोइ ॥
निरवैरा नालि जि वैरु चलाइदे तिन विचहु तिसटिआ न कोइ ॥
सतिगुरु सभना दा भला मनाइदा तिस दा बुरा किउ होइ ॥
सतिगुर नो जेहा को इछदा तेहा फलु पाए कोइ ॥
नानक करता सभु किछु जाणदा जिदू किछु गुझा न होइ ॥२॥
हिन्दी अर्थ: महला ४॥ दातें बख्शने वाला सतिगुरू दया का घर है। उसके (हृदय) में सदा दया (ही दया) है। सतिगुरू के (हृदय) में किसी के साथ वैर नहीं। वह सब जगह एक प्रभू को देख रहा है (इसलिए वह वैर किस के साथ करे? पर कई मूर्ख मनुष्य निर्वैर गुरू के साथ भी वैर करने से नहीं हटते) जो मनुष्य निर्वैरों के साथ वैर कमाते हैं उनमें से किसी भी के हृदय में कभी भी शांति नहीं आई (भाव-वे सदा दुखी रहते हैं) (और) सतिगुरू का बुरा तो हो ही नहीं सकता (क्योंकि) वह सबका भला सोचता है। जिस भावना से कोई जीव सतिगुरू के पास जाता है उसको वैसा फल मिल जाता है (जाहरदारी सफल नहीं हो सकती); क्योंकि। हे नानक ! रचनहार प्रभू से कोई बात छुपाई नहीं जा सकती। वह (अंदर की और बाहर की) हर बात जानता है। 2।
ਪਉੜੀ ॥
ਜਿਸ ਨੋ ਸਾਹਿਬੁ ਵਡਾ ਕਰੇ ਸੋਈ ਵਡ ਜਾਣੀ ॥
ਜਿਸੁ ਸਾਹਿਬ ਭਾਵੈ ਤਿਸੁ ਬਖਸਿ ਲਏ ਸੋ ਸਾਹਿਬ ਮਨਿ ਭਾਣੀ ॥
ਜੇ ਕੋ ਓਸ ਦੀ ਰੀਸ ਕਰੇ ਸੋ ਮੂੜ ਅਜਾਣੀ ॥
ਜਿਸ ਨੋ ਸਤਿਗੁਰੁ ਮੇਲੇ ਸੁ ਗੁਣ ਰਵੈ ਗੁਣ ਆਖਿ ਵਖਾਣੀ ॥
ਨਾਨਕ ਸਚਾ ਸਚੁ ਹੈ ਬੁਝਿ ਸਚਿ ਸਮਾਣੀ ॥੫॥
ਜਿਸ ਨੋ ਸਾਹਿਬੁ ਵਡਾ ਕਰੇ ਸੋਈ ਵਡ ਜਾਣੀ ॥
ਜਿਸੁ ਸਾਹਿਬ ਭਾਵੈ ਤਿਸੁ ਬਖਸਿ ਲਏ ਸੋ ਸਾਹਿਬ ਮਨਿ ਭਾਣੀ ॥
ਜੇ ਕੋ ਓਸ ਦੀ ਰੀਸ ਕਰੇ ਸੋ ਮੂੜ ਅਜਾਣੀ ॥
ਜਿਸ ਨੋ ਸਤਿਗੁਰੁ ਮੇਲੇ ਸੁ ਗੁਣ ਰਵੈ ਗੁਣ ਆਖਿ ਵਖਾਣੀ ॥
ਨਾਨਕ ਸਚਾ ਸਚੁ ਹੈ ਬੁਝਿ ਸਚਿ ਸਮਾਣੀ ॥੫॥
पउड़ी ॥
जिस नो साहिबु वडा करे सोई वड जाणी ॥
जिसु साहिब भावै तिसु बखसि लए सो साहिब मनि भाणी ॥
जे को ओस दी रीस करे सो मूड़ अजाणी ॥
जिस नो सतिगुरु मेले सु गुण रवै गुण आखि वखाणी ॥
नानक सचा सचु है बुझि सचि समाणी ॥५॥
जिस नो साहिबु वडा करे सोई वड जाणी ॥
जिसु साहिब भावै तिसु बखसि लए सो साहिब मनि भाणी ॥
जे को ओस दी रीस करे सो मूड़ अजाणी ॥
जिस नो सतिगुरु मेले सु गुण रवै गुण आखि वखाणी ॥
नानक सचा सचु है बुझि सचि समाणी ॥५॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ जिस (जीव-स्त्री) की मालिक प्रभू सराहना करे वही (दरअसल) बड़ी समझनी चाहिए। जिस को चाहे प्रभू मालिक बख्श लेता है। और वह साहिब के मन में प्यारी लगती है। वह (जीव-स्त्री) मूर्ख व अंजान है जो उसकी रीस करती है। (क्योंकि। रीस करने से कुछ भी हाथ नहीं आता। यहाँ तो) जिसे सतिगुरू मिलाता है (वही मिलती है और) (हरी की) सिफत सलाह ही उच्चारण करके (औरों को सुनाती है)। हे नानक ! प्रभू सदा स्थिर रहने वाला है। (इस बात को अच्छी तरह) समझ के (वह जीव-स्त्री) सच्चे प्रभू में लीन हो जाती है। 5।
ਸਲੋਕ ਮਃ ੪ ॥
ਹਰਿ ਸਤਿ ਨਿਰੰਜਨ ਅਮਰੁ ਹੈ ਨਿਰਭਉ ਨਿਰਵੈਰੁ ਨਿਰੰਕਾਰੁ ॥
ਜਿਨ ਜਪਿਆ ਇਕ ਮਨਿ ਇਕ ਚਿਤਿ ਤਿਨ ਲਥਾ ਹਉਮੈ ਭਾਰੁ ॥
ਜਿਨ ਗੁਰਮੁਖਿ ਹਰਿ ਆਰਾਧਿਆ ਤਿਨ ਸੰਤ ਜਨਾ ਜੈਕਾਰੁ ॥
ਕੋਈ ਨਿੰਦਾ ਕਰੇ ਪੂਰੇ ਸਤਿਗੁਰੂ ਕੀ ਤਿਸ ਨੋ ਫਿਟੁ ਫਿਟੁ ਕਹੈ ਸਭੁ ਸੰਸਾਰੁ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਵਿਚਿ ਆਪਿ ਵਰਤਦਾ ਹਰਿ ਆਪੇ ਰਖਣਹਾਰੁ ॥
ਧਨੁ ਧੰਨੁ ਗੁਰੂ ਗੁਣ ਗਾਵਦਾ ਤਿਸ ਨੋ ਸਦਾ ਸਦਾ ਨਮਸਕਾਰੁ ॥
ਜਨ ਨਾਨਕ ਤਿਨ ਕਉ ਵਾਰਿਆ ਜਿਨ ਜਪਿਆ ਸਿਰਜਣਹਾਰੁ ॥੧॥
ਹਰਿ ਸਤਿ ਨਿਰੰਜਨ ਅਮਰੁ ਹੈ ਨਿਰਭਉ ਨਿਰਵੈਰੁ ਨਿਰੰਕਾਰੁ ॥
ਜਿਨ ਜਪਿਆ ਇਕ ਮਨਿ ਇਕ ਚਿਤਿ ਤਿਨ ਲਥਾ ਹਉਮੈ ਭਾਰੁ ॥
ਜਿਨ ਗੁਰਮੁਖਿ ਹਰਿ ਆਰਾਧਿਆ ਤਿਨ ਸੰਤ ਜਨਾ ਜੈਕਾਰੁ ॥
ਕੋਈ ਨਿੰਦਾ ਕਰੇ ਪੂਰੇ ਸਤਿਗੁਰੂ ਕੀ ਤਿਸ ਨੋ ਫਿਟੁ ਫਿਟੁ ਕਹੈ ਸਭੁ ਸੰਸਾਰੁ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਵਿਚਿ ਆਪਿ ਵਰਤਦਾ ਹਰਿ ਆਪੇ ਰਖਣਹਾਰੁ ॥
ਧਨੁ ਧੰਨੁ ਗੁਰੂ ਗੁਣ ਗਾਵਦਾ ਤਿਸ ਨੋ ਸਦਾ ਸਦਾ ਨਮਸਕਾਰੁ ॥
ਜਨ ਨਾਨਕ ਤਿਨ ਕਉ ਵਾਰਿਆ ਜਿਨ ਜਪਿਆ ਸਿਰਜਣਹਾਰੁ ॥੧॥
सलोक मः ४ ॥
हरि सति निरंजन अमरु है निरभउ निरवैरु निरंकारु ॥
जिन जपिआ इक मनि इक चिति तिन लथा हउमै भारु ॥
जिन गुरमुखि हरि आराधिआ तिन संत जना जैकारु ॥
कोई निंदा करे पूरे सतिगुरू की तिस नो फिटु फिटु कहै सभु संसारु ॥
सतिगुर विचि आपि वरतदा हरि आपे रखणहारु ॥
धनु धंनु गुरू गुण गावदा तिस नो सदा सदा नमसकारु ॥
जन नानक तिन कउ वारिआ जिन जपिआ सिरजणहारु ॥१॥
हरि सति निरंजन अमरु है निरभउ निरवैरु निरंकारु ॥
जिन जपिआ इक मनि इक चिति तिन लथा हउमै भारु ॥
जिन गुरमुखि हरि आराधिआ तिन संत जना जैकारु ॥
कोई निंदा करे पूरे सतिगुरू की तिस नो फिटु फिटु कहै सभु संसारु ॥
सतिगुर विचि आपि वरतदा हरि आपे रखणहारु ॥
धनु धंनु गुरू गुण गावदा तिस नो सदा सदा नमसकारु ॥
जन नानक तिन कउ वारिआ जिन जपिआ सिरजणहारु ॥१॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला ४ ॥ प्रभू सचमुच है। माया से निर्लिप है। काल रहित निरभउ निर्वैर और आकार रहित है। जिन्होंने एकाग्र मन हो के उसका सिमरन किया है। उनके मन से अहंकार का बोझ उतर गया है। (पर) उन संत जनों को ही वडिआई मिलती है जिन्होंने गुरू के सन्मुख हो के सिमरन किया है। जो कोई पूरे सतिगुरू की निंदा करता है उसे सारा संसार धिक्कारता है (वह निंदक सतिगुरू का कुछ बिगाड़ नहीं सकता क्योंकि) प्रभू स्वयं सतिगुरू में बसता है और वह स्वयं रक्षा करने वाला है। धन्य है गुरू जो हरी के गुण गाता है। उसके आगे सदा सिर झुकाना चाहिए। (कह) हे नानक ! मैं सदके हूँ। उन हरी के दासों से जिन्होंने सृजनहार को आराधा है। 1।
ਮਃ ੪ ॥
ਆਪੇ ਧਰਤੀ ਸਾਜੀਅਨੁ ਆਪੇ ਆਕਾਸੁ ॥
ਵਿਚਿ ਆਪੇ ਜੰਤ ਉਪਾਇਅਨੁ ਮੁਖਿ ਆਪੇ ਦੇਇ ਗਿਰਾਸੁ ॥
ਸਭੁ ਆਪੇ ਆਪਿ ਵਰਤਦਾ ਆਪੇ ਹੀ ਗੁਣਤਾਸੁ ॥
ਜਨ ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇ ਤੂ ਸਭਿ ਕਿਲਵਿਖ ਕਟੇ ਤਾਸੁ ॥੨॥
ਆਪੇ ਧਰਤੀ ਸਾਜੀਅਨੁ ਆਪੇ ਆਕਾਸੁ ॥
ਵਿਚਿ ਆਪੇ ਜੰਤ ਉਪਾਇਅਨੁ ਮੁਖਿ ਆਪੇ ਦੇਇ ਗਿਰਾਸੁ ॥
ਸਭੁ ਆਪੇ ਆਪਿ ਵਰਤਦਾ ਆਪੇ ਹੀ ਗੁਣਤਾਸੁ ॥
ਜਨ ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇ ਤੂ ਸਭਿ ਕਿਲਵਿਖ ਕਟੇ ਤਾਸੁ ॥੨॥
मः ४ ॥
आपे धरती साजीअनु आपे आकासु ॥
विचि आपे जंत उपाइअनु मुखि आपे देइ गिरासु ॥
सभु आपे आपि वरतदा आपे ही गुणतासु ॥
जन नानक नामु धिआइ तू सभि किलविख कटे तासु ॥२॥
आपे धरती साजीअनु आपे आकासु ॥
विचि आपे जंत उपाइअनु मुखि आपे देइ गिरासु ॥
सभु आपे आपि वरतदा आपे ही गुणतासु ॥
जन नानक नामु धिआइ तू सभि किलविख कटे तासु ॥२॥
हिन्दी अर्थ: महला ४॥ प्रभू ने खुद ही धरती की रचना की और खुद ही आकाश। इस धरती में उसने जीव-जंतु पैदा किए और खुद ही (जीवों के) मुंह में ग्रास देता है। गुणों का खजाना (हरी) खुद ही सब जीवों के अंदर व्यापक है। हे दास नानक ! तू प्रभू का नाम जप। (जिसने जपा है) उसके सारे पाप प्रभू दूर करता है। 2।
ਪਉੜੀ ॥
ਤੂ ਸਚਾ ਸਾਹਿਬੁ ਸਚੁ ਹੈ ਸਚੁ ਸਚੇ ਭਾਵੈ ॥
ਜੋ ਤੁਧੁ ਸਚੁ ਸਲਾਹਦੇ ਤਿਨ ਜਮ ਕੰਕਰੁ ਨੇੜਿ ਨ ਆਵੈ ॥
ਤਿਨ ਕੇ ਮੁਖ ਦਰਿ ਉਜਲੇ ਜਿਨ ਹਰਿ ਹਿਰਦੈ ਸਚਾ ਭਾਵੈ ॥
ਕੂੜਿਆਰ ਪਿਛਾਹਾ ਸਟੀਅਨਿ ਕੂੜੁ ਹਿਰਦੈ ਕਪਟੁ ਮਹਾ ਦੁਖੁ ਪਾਵੈ ॥
ਮੁਹ ਕਾਲੇ ਕੂੜਿਆਰੀਆ ਕੂੜਿਆਰ ਕੂੜੋ ਹੋਇ ਜਾਵੈ ॥੬॥
ਤੂ ਸਚਾ ਸਾਹਿਬੁ ਸਚੁ ਹੈ ਸਚੁ ਸਚੇ ਭਾਵੈ ॥
ਜੋ ਤੁਧੁ ਸਚੁ ਸਲਾਹਦੇ ਤਿਨ ਜਮ ਕੰਕਰੁ ਨੇੜਿ ਨ ਆਵੈ ॥
ਤਿਨ ਕੇ ਮੁਖ ਦਰਿ ਉਜਲੇ ਜਿਨ ਹਰਿ ਹਿਰਦੈ ਸਚਾ ਭਾਵੈ ॥
ਕੂੜਿਆਰ ਪਿਛਾਹਾ ਸਟੀਅਨਿ ਕੂੜੁ ਹਿਰਦੈ ਕਪਟੁ ਮਹਾ ਦੁਖੁ ਪਾਵੈ ॥
ਮੁਹ ਕਾਲੇ ਕੂੜਿਆਰੀਆ ਕੂੜਿਆਰ ਕੂੜੋ ਹੋਇ ਜਾਵੈ ॥੬॥
पउड़ी ॥
तू सचा साहिबु सचु है सचु सचे भावै ॥
जो तुधु सचु सलाहदे तिन जम कंकरु नेड़ि न आवै ॥
तिन के मुख दरि उजले जिन हरि हिरदै सचा भावै ॥
कूड़िआर पिछाहा सटीअनि कूड़ु हिरदै कपटु महा दुखु पावै ॥
मुह काले कूड़िआरीआ कूड़िआर कूड़ो होइ जावै ॥६॥
तू सचा साहिबु सचु है सचु सचे भावै ॥
जो तुधु सचु सलाहदे तिन जम कंकरु नेड़ि न आवै ॥
तिन के मुख दरि उजले जिन हरि हिरदै सचा भावै ॥
कूड़िआर पिछाहा सटीअनि कूड़ु हिरदै कपटु महा दुखु पावै ॥
मुह काले कूड़िआरीआ कूड़िआर कूड़ो होइ जावै ॥६॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ हे हरी ! तू सच्चा और स्थिर रहने वाला मालिक है। तुझे सच ही प्यारा लगता है। हे सच्चे प्रभू ! जो जीव तेरी सिफत सालाह करते हैं। जमदूत उनके नजदीक नहीं फटकता। जिनके हृदय को सच्चा प्रभू प्यारा लगता है। उनके मुंह दरगाह में उज्जवल होते हैं। (पर) झूठ का व्यापार करने वालों के हृदय में झूठ और कपट होने के कारण वे पीछे फेंक दिए जाते हैं और बहुत दुखी होते हैं। झूठों का मुँह (दरगाह में) काले होते हैं (क्योंकि) उनके झूठ का पर्दा-फाश हो जाता है। 6।
ਸਲੋਕ ਮਃ ੪ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਧਰਤੀ ਧਰਮ ਹੈ ਤਿਸੁ ਵਿਚਿ ਜੇਹਾ ਕੋ ਬੀਜੇ ਤੇਹਾ ਫਲੁ ਪਾਏ ॥
ਗੁਰਸਿਖੀ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਬੀਜਿਆ ਤਿਨ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਫਲੁ ਹਰਿ ਪਾਏ ॥
ਓਨਾ ਹਲਤਿ ਪਲਤਿ ਮੁਖ ਉਜਲੇ ਓਇ ਹਰਿ ਦਰਗਹ ਸਚੀ ਪੈਨਾਏ ॥
ਇਕਨੑਾ ਅੰਦਰਿ ਖੋਟੁ ਨਿਤ ਖੋਟੁ ਕਮਾਵਹਿ ਓਹੁ ਜੇਹਾ ਬੀਜੇ ਤੇਹਾ ਫਲੁ ਖਾਏ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਧਰਤੀ ਧਰਮ ਹੈ ਤਿਸੁ ਵਿਚਿ ਜੇਹਾ ਕੋ ਬੀਜੇ ਤੇਹਾ ਫਲੁ ਪਾਏ ॥
ਗੁਰਸਿਖੀ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਬੀਜਿਆ ਤਿਨ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਫਲੁ ਹਰਿ ਪਾਏ ॥
ਓਨਾ ਹਲਤਿ ਪਲਤਿ ਮੁਖ ਉਜਲੇ ਓਇ ਹਰਿ ਦਰਗਹ ਸਚੀ ਪੈਨਾਏ ॥
ਇਕਨੑਾ ਅੰਦਰਿ ਖੋਟੁ ਨਿਤ ਖੋਟੁ ਕਮਾਵਹਿ ਓਹੁ ਜੇਹਾ ਬੀਜੇ ਤੇਹਾ ਫਲੁ ਖਾਏ ॥
सलोक मः ४ ॥
सतिगुरु धरती धरम है तिसु विचि जेहा को बीजे तेहा फलु पाए ॥
गुरसिखी अंम्रितु बीजिआ तिन अंम्रित फलु हरि पाए ॥
ओना हलति पलति मुख उजले ओइ हरि दरगह सची पैनाए ॥
इकन॑ा अंदरि खोटु नित खोटु कमावहि ओहु जेहा बीजे तेहा फलु खाए ॥
सतिगुरु धरती धरम है तिसु विचि जेहा को बीजे तेहा फलु पाए ॥
गुरसिखी अंम्रितु बीजिआ तिन अंम्रित फलु हरि पाए ॥
ओना हलति पलति मुख उजले ओइ हरि दरगह सची पैनाए ॥
इकन॑ा अंदरि खोटु नित खोटु कमावहि ओहु जेहा बीजे तेहा फलु खाए ॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला ४॥ (धरती के स्वभाव की तरह) सतिगुरू (भी) धर्म की भूमि है। जिस तरह (की भावना) का बीज कोई बीजता है। वैसा ही फल लेता है। जिन गुरसिखों ने नाम-अमृत बीजा है उन्हें प्रभू-प्राप्ति-रूपी अमृत फल ही मिल गया है। इस संसार में और अगले जहान में वे सुर्ख-रू होते हैं। और प्रभू की सच्ची दरगाह में उनका आदर होता है। एक जीवों के हृदय में खोट (होने के कारण) वे सदा खोटे कर्म करते हैं। ऐसा आदमी वैसा ही फल खाता है।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 302 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Raam Daas Ji।
सीस-गंज साहिब के बाहर Chandni Chowk की भीड़ और अंदर का shrine, दोनों एक साथ।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 41 पंक्तियों का है, 8 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 302” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 303 →, पीछे का: ← अंग 301।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।