अंग
240
राग Gauree
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਜਿਨਿ ਗੁਰਿ ਮੋ ਕਉ ਦੀਨਾ ਜੀਉ ॥
ਆਪੁਨਾ ਦਾਸਰਾ ਆਪੇ ਮੁਲਿ ਲੀਉ ॥੬॥
ਆਪੇ ਲਾਇਓ ਅਪਨਾ ਪਿਆਰੁ ॥
ਸਦਾ ਸਦਾ ਤਿਸੁ ਗੁਰ ਕਉ ਕਰੀ ਨਮਸਕਾਰੁ ॥੭॥
ਕਲਿ ਕਲੇਸ ਭੈ ਭ੍ਰਮ ਦੁਖ ਲਾਥਾ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਮੇਰਾ ਗੁਰੁ ਸਮਰਾਥਾ ॥੮॥੯॥
ਆਪੁਨਾ ਦਾਸਰਾ ਆਪੇ ਮੁਲਿ ਲੀਉ ॥੬॥
ਆਪੇ ਲਾਇਓ ਅਪਨਾ ਪਿਆਰੁ ॥
ਸਦਾ ਸਦਾ ਤਿਸੁ ਗੁਰ ਕਉ ਕਰੀ ਨਮਸਕਾਰੁ ॥੭॥
ਕਲਿ ਕਲੇਸ ਭੈ ਭ੍ਰਮ ਦੁਖ ਲਾਥਾ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਮੇਰਾ ਗੁਰੁ ਸਮਰਾਥਾ ॥੮॥੯॥
जिनि गुरि मो कउ दीना जीउ ॥
आपुना दासरा आपे मुलि लीउ ॥६॥
आपे लाइओ अपना पिआरु ॥
सदा सदा तिसु गुर कउ करी नमसकारु ॥७॥
कलि कलेस भै भ्रम दुख लाथा ॥
कहु नानक मेरा गुरु समराथा ॥८॥९॥
आपुना दासरा आपे मुलि लीउ ॥६॥
आपे लाइओ अपना पिआरु ॥
सदा सदा तिसु गुर कउ करी नमसकारु ॥७॥
कलि कलेस भै भ्रम दुख लाथा ॥
कहु नानक मेरा गुरु समराथा ॥८॥९॥
हिन्दी अर्थ: (हे भाई !) जिस गुरू ने मुझे आत्मिक जीवन दिया है। जिसने मुझे अपना तुच्छ दास बना के खुद ही मुल्य ले लिया है (मेरे साथ गहरा अपनत्व बना लिया है)। जिस गुरू ने खुद ही मेरे अंदर अपना प्यार पैदा किया है। उस गुरू को मैं सदा ही सदा ही अपना सिर झुकाता रहता हूँ। 6। 7। उसकी शरण पड़ने से (मेरे अंदर से) झगड़े-कलेश सहम-भटकना और सारे दुख दूर हो गए हैं। हे नानक ! कह, मेरा गुरू बहुत सारी ताकतों का मालिक है।8। 9।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਮਿਲੁ ਮੇਰੇ ਗੋਬਿੰਦ ਅਪਨਾ ਨਾਮੁ ਦੇਹੁ ॥
ਨਾਮ ਬਿਨਾ ਧ੍ਰਿਗੁ ਧ੍ਰਿਗੁ ਅਸਨੇਹੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਨਾਮ ਬਿਨਾ ਜੋ ਪਹਿਰੈ ਖਾਇ ॥
ਜਿਉ ਕੂਕਰੁ ਜੂਠਨ ਮਹਿ ਪਾਇ ॥੧॥
ਨਾਮ ਬਿਨਾ ਜੇਤਾ ਬਿਉਹਾਰੁ ॥ ਜਿਉ ਮਿਰਤਕ ਮਿਥਿਆ ਸੀਗਾਰੁ ॥੨॥
ਨਾਮੁ ਬਿਸਾਰਿ ਕਰੇ ਰਸ ਭੋਗ ॥
ਸੁਖੁ ਸੁਪਨੈ ਨਹੀ ਤਨ ਮਹਿ ਰੋਗ ॥੩॥
ਨਾਮੁ ਤਿਆਗਿ ਕਰੇ ਅਨ ਕਾਜ ॥
ਬਿਨਸਿ ਜਾਇ ਝੂਠੇ ਸਭਿ ਪਾਜ ॥੪॥
ਨਾਮ ਸੰਗਿ ਮਨਿ ਪ੍ਰੀਤਿ ਨ ਲਾਵੈ ॥
ਕੋਟਿ ਕਰਮ ਕਰਤੋ ਨਰਕਿ ਜਾਵੈ ॥੫॥
ਹਰਿ ਕਾ ਨਾਮੁ ਜਿਨਿ ਮਨਿ ਨ ਆਰਾਧਾ ॥
ਚੋਰ ਕੀ ਨਿਆਈ ਜਮ ਪੁਰਿ ਬਾਧਾ ॥੬॥
ਲਾਖ ਅਡੰਬਰ ਬਹੁਤੁ ਬਿਸਥਾਰਾ ॥
ਨਾਮ ਬਿਨਾ ਝੂਠੇ ਪਾਸਾਰਾ ॥੭॥
ਹਰਿ ਕਾ ਨਾਮੁ ਸੋਈ ਜਨੁ ਲੇਇ ॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਨਾਨਕ ਜਿਸੁ ਦੇਇ ॥੮॥੧੦॥
ਮਿਲੁ ਮੇਰੇ ਗੋਬਿੰਦ ਅਪਨਾ ਨਾਮੁ ਦੇਹੁ ॥
ਨਾਮ ਬਿਨਾ ਧ੍ਰਿਗੁ ਧ੍ਰਿਗੁ ਅਸਨੇਹੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਨਾਮ ਬਿਨਾ ਜੋ ਪਹਿਰੈ ਖਾਇ ॥
ਜਿਉ ਕੂਕਰੁ ਜੂਠਨ ਮਹਿ ਪਾਇ ॥੧॥
ਨਾਮ ਬਿਨਾ ਜੇਤਾ ਬਿਉਹਾਰੁ ॥ ਜਿਉ ਮਿਰਤਕ ਮਿਥਿਆ ਸੀਗਾਰੁ ॥੨॥
ਨਾਮੁ ਬਿਸਾਰਿ ਕਰੇ ਰਸ ਭੋਗ ॥
ਸੁਖੁ ਸੁਪਨੈ ਨਹੀ ਤਨ ਮਹਿ ਰੋਗ ॥੩॥
ਨਾਮੁ ਤਿਆਗਿ ਕਰੇ ਅਨ ਕਾਜ ॥
ਬਿਨਸਿ ਜਾਇ ਝੂਠੇ ਸਭਿ ਪਾਜ ॥੪॥
ਨਾਮ ਸੰਗਿ ਮਨਿ ਪ੍ਰੀਤਿ ਨ ਲਾਵੈ ॥
ਕੋਟਿ ਕਰਮ ਕਰਤੋ ਨਰਕਿ ਜਾਵੈ ॥੫॥
ਹਰਿ ਕਾ ਨਾਮੁ ਜਿਨਿ ਮਨਿ ਨ ਆਰਾਧਾ ॥
ਚੋਰ ਕੀ ਨਿਆਈ ਜਮ ਪੁਰਿ ਬਾਧਾ ॥੬॥
ਲਾਖ ਅਡੰਬਰ ਬਹੁਤੁ ਬਿਸਥਾਰਾ ॥
ਨਾਮ ਬਿਨਾ ਝੂਠੇ ਪਾਸਾਰਾ ॥੭॥
ਹਰਿ ਕਾ ਨਾਮੁ ਸੋਈ ਜਨੁ ਲੇਇ ॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਨਾਨਕ ਜਿਸੁ ਦੇਇ ॥੮॥੧੦॥
गउड़ी महला ५ ॥
मिलु मेरे गोबिंद अपना नामु देहु ॥
नाम बिना ध्रिगु ध्रिगु असनेहु ॥१॥ रहाउ ॥
नाम बिना जो पहिरै खाइ ॥
जिउ कूकरु जूठन महि पाइ ॥१॥
नाम बिना जेता बिउहारु ॥ जिउ मिरतक मिथिआ सीगारु ॥२॥
नामु बिसारि करे रस भोग ॥
सुखु सुपनै नही तन महि रोग ॥३॥
नामु तिआगि करे अन काज ॥
बिनसि जाइ झूठे सभि पाज ॥४॥
नाम संगि मनि प्रीति न लावै ॥
कोटि करम करतो नरकि जावै ॥५॥
हरि का नामु जिनि मनि न आराधा ॥
चोर की निआई जम पुरि बाधा ॥६॥
लाख अडंबर बहुतु बिसथारा ॥
नाम बिना झूठे पासारा ॥७॥
हरि का नामु सोई जनु लेइ ॥
करि किरपा नानक जिसु देइ ॥८॥१०॥
मिलु मेरे गोबिंद अपना नामु देहु ॥
नाम बिना ध्रिगु ध्रिगु असनेहु ॥१॥ रहाउ ॥
नाम बिना जो पहिरै खाइ ॥
जिउ कूकरु जूठन महि पाइ ॥१॥
नाम बिना जेता बिउहारु ॥ जिउ मिरतक मिथिआ सीगारु ॥२॥
नामु बिसारि करे रस भोग ॥
सुखु सुपनै नही तन महि रोग ॥३॥
नामु तिआगि करे अन काज ॥
बिनसि जाइ झूठे सभि पाज ॥४॥
नाम संगि मनि प्रीति न लावै ॥
कोटि करम करतो नरकि जावै ॥५॥
हरि का नामु जिनि मनि न आराधा ॥
चोर की निआई जम पुरि बाधा ॥६॥
लाख अडंबर बहुतु बिसथारा ॥
नाम बिना झूठे पासारा ॥७॥
हरि का नामु सोई जनु लेइ ॥
करि किरपा नानक जिसु देइ ॥८॥१०॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ हे मेरे गोबिंद ! (मुझे) मिल। (और मुझे) अपना नाम दे। (हे गोबिंद ! तेरे) नाम (के प्यार) के बिना (और दुनिया वाला मोह-) प्यार धिक्कार है धिक्कार है। 1। रहाउ। (हे भाई !) परमात्मा की नाम के याद के बिना मनुष्य जो कुछ भी पहनता है जो कुछ भी खाता है (वह ऐसे ही है) जैसे (कोई) कुक्ता जूठी (गंदगी) चीजों में (अपना मुंह) मारता फिरता है। 1। (हे भाई !) परमात्मा का नाम भुला के मनुष्य और जितने भी कार्य-व्यवहार करता है। (वह ऐसे है) जैसे किसी लाश का श्रृंगार व्यर्थ (उद्यम) है। 2। (हे भाई !जो मनुष्य) परमात्मा का नाम भुला के दुनिया के पदार्थ ही भोगता फिरता है उसे (उन भोगों से) सुपने में भी (कभी ही) सुख नहीं मिल सकता (पर हां इन भोगों से) उसके शरीर में रोग पैदा हो जाते हैं। 3। (हे भाई ! जो मनुष्य) परमात्मा को छोड़ के अन्य-अन्य काम-काज करता रहता है। उसका आत्मिक जीवन नाश हो जाता है, और उसके (दुनिया वाले) सारे दिखावे व्यर्थ हो जाते हैं। 4। (हे भाई ! जो मनुष्य) अपने मन में परमात्मा के नाम के साथ प्रीति नहीं जोड़ता। वह और करोड़ों ही (बनाए हुए धार्मिक) कर्म करता हुआ भी नर्क में पहुँचता है (पड़ा रहता है। सदैव नरकीय जीवन व्यतीत करता है)। 5। (हे भाई !) जिस मनुष्य ने परमात्मा का नाम नहीं सिमरा। वह जम की पुरी में बंधा रहता है (वह आत्मिक मौत के पँजे में फंसा हुआ दुखों की चोटें सहता रहता है) जैसे कोई चोर (सेंध लगाते पकड़ा जाए तो मार खाता है)। 6। (हे भाई ! दुनिया में इज्जत बनाए रखने के) लाखों ही दिखावे के उद्यम व अनेकों फैलाव- ये सारे ही परमात्मा के नाम के बिना व्यर्थ के पसारे हैं। 7। हे नानक ! वही मनुष्य परमात्मा का नाम सिमरता है। जिसे परमात्मा स्वयं कृपा करके (ये दाति) देता है। 8। 10।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਆਦਿ ਮਧਿ ਜੋ ਅੰਤਿ ਨਿਬਾਹੈ ॥ ਸੋ ਸਾਜਨੁ ਮੇਰਾ ਮਨੁ ਚਾਹੈ ॥੧॥
ਹਰਿ ਕੀ ਪ੍ਰੀਤਿ ਸਦਾ ਸੰਗਿ ਚਾਲੈ ॥
ਦਇਆਲ ਪੁਰਖ ਪੂਰਨ ਪ੍ਰਤਿਪਾਲੈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਬਿਨਸਤ ਨਾਹੀ ਛੋਡਿ ਨ ਜਾਇ ॥
ਜਹ ਪੇਖਾ ਤਹ ਰਹਿਆ ਸਮਾਇ ॥੨॥
ਸੁੰਦਰੁ ਸੁਘੜੁ ਚਤੁਰੁ ਜੀਅ ਦਾਤਾ ॥
ਭਾਈ ਪੂਤੁ ਪਿਤਾ ਪ੍ਰਭੁ ਮਾਤਾ ॥੩॥
ਜੀਵਨ ਪ੍ਰਾਨ ਅਧਾਰ ਮੇਰੀ ਰਾਸਿ ॥
ਪ੍ਰੀਤਿ ਲਾਈ ਕਰਿ ਰਿਦੈ ਨਿਵਾਸਿ ॥੪॥
ਮਾਇਆ ਸਿਲਕ ਕਾਟੀ ਗੋਪਾਲਿ ॥
ਕਰਿ ਅਪੁਨਾ ਲੀਨੋ ਨਦਰਿ ਨਿਹਾਲਿ ॥੫॥
ਸਿਮਰਿ ਸਿਮਰਿ ਕਾਟੇ ਸਭਿ ਰੋਗ ॥
ਚਰਣ ਧਿਆਨ ਸਰਬ ਸੁਖ ਭੋਗ ॥੬॥
ਪੂਰਨ ਪੁਰਖੁ ਨਵਤਨੁ ਨਿਤ ਬਾਲਾ ॥
ਹਰਿ ਅੰਤਰਿ ਬਾਹਰਿ ਸੰਗਿ ਰਖਵਾਲਾ ॥੭॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਹਰਿ ਪਦੁ ਚੀਨ ॥ ਸਰਬਸੁ ਨਾਮੁ ਭਗਤ ਕਉ ਦੀਨ ॥੮॥੧੧॥
ਆਦਿ ਮਧਿ ਜੋ ਅੰਤਿ ਨਿਬਾਹੈ ॥ ਸੋ ਸਾਜਨੁ ਮੇਰਾ ਮਨੁ ਚਾਹੈ ॥੧॥
ਹਰਿ ਕੀ ਪ੍ਰੀਤਿ ਸਦਾ ਸੰਗਿ ਚਾਲੈ ॥
ਦਇਆਲ ਪੁਰਖ ਪੂਰਨ ਪ੍ਰਤਿਪਾਲੈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਬਿਨਸਤ ਨਾਹੀ ਛੋਡਿ ਨ ਜਾਇ ॥
ਜਹ ਪੇਖਾ ਤਹ ਰਹਿਆ ਸਮਾਇ ॥੨॥
ਸੁੰਦਰੁ ਸੁਘੜੁ ਚਤੁਰੁ ਜੀਅ ਦਾਤਾ ॥
ਭਾਈ ਪੂਤੁ ਪਿਤਾ ਪ੍ਰਭੁ ਮਾਤਾ ॥੩॥
ਜੀਵਨ ਪ੍ਰਾਨ ਅਧਾਰ ਮੇਰੀ ਰਾਸਿ ॥
ਪ੍ਰੀਤਿ ਲਾਈ ਕਰਿ ਰਿਦੈ ਨਿਵਾਸਿ ॥੪॥
ਮਾਇਆ ਸਿਲਕ ਕਾਟੀ ਗੋਪਾਲਿ ॥
ਕਰਿ ਅਪੁਨਾ ਲੀਨੋ ਨਦਰਿ ਨਿਹਾਲਿ ॥੫॥
ਸਿਮਰਿ ਸਿਮਰਿ ਕਾਟੇ ਸਭਿ ਰੋਗ ॥
ਚਰਣ ਧਿਆਨ ਸਰਬ ਸੁਖ ਭੋਗ ॥੬॥
ਪੂਰਨ ਪੁਰਖੁ ਨਵਤਨੁ ਨਿਤ ਬਾਲਾ ॥
ਹਰਿ ਅੰਤਰਿ ਬਾਹਰਿ ਸੰਗਿ ਰਖਵਾਲਾ ॥੭॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਹਰਿ ਪਦੁ ਚੀਨ ॥ ਸਰਬਸੁ ਨਾਮੁ ਭਗਤ ਕਉ ਦੀਨ ॥੮॥੧੧॥
गउड़ी महला ५ ॥
आदि मधि जो अंति निबाहै ॥ सो साजनु मेरा मनु चाहै ॥१॥
हरि की प्रीति सदा संगि चालै ॥
दइआल पुरख पूरन प्रतिपालै ॥१॥ रहाउ ॥
बिनसत नाही छोडि न जाइ ॥
जह पेखा तह रहिआ समाइ ॥२॥
सुंदरु सुघड़ु चतुरु जीअ दाता ॥
भाई पूतु पिता प्रभु माता ॥३॥
जीवन प्रान अधार मेरी रासि ॥
प्रीति लाई करि रिदै निवासि ॥४॥
माइआ सिलक काटी गोपालि ॥
करि अपुना लीनो नदरि निहालि ॥५॥
सिमरि सिमरि काटे सभि रोग ॥
चरण धिआन सरब सुख भोग ॥६॥
पूरन पुरखु नवतनु नित बाला ॥
हरि अंतरि बाहरि संगि रखवाला ॥७॥
कहु नानक हरि हरि पदु चीन ॥ सरबसु नामु भगत कउ दीन ॥८॥११॥
आदि मधि जो अंति निबाहै ॥ सो साजनु मेरा मनु चाहै ॥१॥
हरि की प्रीति सदा संगि चालै ॥
दइआल पुरख पूरन प्रतिपालै ॥१॥ रहाउ ॥
बिनसत नाही छोडि न जाइ ॥
जह पेखा तह रहिआ समाइ ॥२॥
सुंदरु सुघड़ु चतुरु जीअ दाता ॥
भाई पूतु पिता प्रभु माता ॥३॥
जीवन प्रान अधार मेरी रासि ॥
प्रीति लाई करि रिदै निवासि ॥४॥
माइआ सिलक काटी गोपालि ॥
करि अपुना लीनो नदरि निहालि ॥५॥
सिमरि सिमरि काटे सभि रोग ॥
चरण धिआन सरब सुख भोग ॥६॥
पूरन पुरखु नवतनु नित बाला ॥
हरि अंतरि बाहरि संगि रखवाला ॥७॥
कहु नानक हरि हरि पदु चीन ॥ सरबसु नामु भगत कउ दीन ॥८॥११॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ (हे भाई !) जो सदा ही हर वक्त मनुष्य का साथ देता है। मेरा मन उस सज्जन प्रभू को (मिलना) चाहता है 1। (हे भाई !) परमात्मा के साथ जुड़ी हुई प्रीति सदा मनुष्य का साथ देती है। वह दया का घर सर्व-व्यापक और सब गुणों का मालिक परमात्मा (अपने सेवक भक्त की सदैव) पालना करता है। 1। रहाउ। ना वह परमात्मा कभी मरता है। और ना ही वह जीवों को छोड़ के कहीं जाता है। (हे भाई !) मैं तो जिधर देखता हूँ उधर ही हर जगह परमात्मा मौजूद है। 2। (हे भाई !) परमात्मा सुंदर स्वरूप वाला है, सुचॅजा है, समझदार है, जिंद देने वाला है। वही हमारा (असली भाई) है, पुत्र है, पिता है, माँ है। 3। (हे भाई !) परमात्मा मेरे जीवन का। मेरी जिंद का आसरा है। मेरे आत्मिक जीवन की राशि पूँजी है। मैंने उसे अपने हृदय में टिका के उसके साथ अपनी प्रीति जोड़ी हुई है। 4। (हे भाई !) सृष्टि के रक्षक उस प्रभू ने मेरी माया (के मोह) की जंजीरें काट दी हैं। (मेरी ओर) मेहर की निगाह से देख के उसने मुझे अपना बना लिया है। 5। (हे भाई !) परमात्मा का नाम सिमर-सिमर के सारे रोग काटे जा सकते हैं। परमात्मा के चरणों में सुरति जोड़नी ही (दुनिया के) सारे सुख हैं, सारे पदार्थों के भोग हैं। 6। परमात्मा सारे गुणों का मालिक है। सब जीवों में व्यापक है। वह सदा नया है। सदा जवान है (वह प्यार करने से कभी थकता नहीं। उक्ताता है)। 7। (हे भाई !) परमात्मा हरेक जीव के अंदर बसता है। सारे जगत में हर जगह बसता है। हरेक जीव के साथ है। और सब जीवों का रक्षक है। हे नानक ! कह, परमात्मा अपना नाम अपने भक्त को देता है। (भक्त के वास्ते उसका नाम ही दुनिया का) सारा धन पदार्थ है (जिसे परमात्मा अपने नाम की दाति देता है वह) परमात्मा के मिलाप की अवस्था को समझ लेता है। 8। 11।
ਰਾਗੁ ਗਉੜੀ ਮਾਝ ਮਹਲਾ ੫
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਖੋਜਤ ਫਿਰੇ ਅਸੰਖ ਅੰਤੁ ਨ ਪਾਰੀਆ ॥
ਸੇਈ ਹੋਏ ਭਗਤ ਜਿਨਾ ਕਿਰਪਾਰੀਆ ॥੧॥
ਹਉ ਵਾਰੀਆ ਹਰਿ ਵਾਰੀਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸੁਣਿ ਸੁਣਿ ਪੰਥੁ ਡਰਾਉ ਬਹੁਤੁ ਭੈਹਾਰੀਆ ॥
ਮੈ ਤਕੀ ਓਟ ਸੰਤਾਹ ਲੇਹੁ ਉਬਾਰੀਆ ॥੨॥
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਖੋਜਤ ਫਿਰੇ ਅਸੰਖ ਅੰਤੁ ਨ ਪਾਰੀਆ ॥
ਸੇਈ ਹੋਏ ਭਗਤ ਜਿਨਾ ਕਿਰਪਾਰੀਆ ॥੧॥
ਹਉ ਵਾਰੀਆ ਹਰਿ ਵਾਰੀਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸੁਣਿ ਸੁਣਿ ਪੰਥੁ ਡਰਾਉ ਬਹੁਤੁ ਭੈਹਾਰੀਆ ॥
ਮੈ ਤਕੀ ਓਟ ਸੰਤਾਹ ਲੇਹੁ ਉਬਾਰੀਆ ॥੨॥
रागु गउड़ी माझ महला ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
खोजत फिरे असंख अंतु न पारीआ ॥
सेई होए भगत जिना किरपारीआ ॥१॥
हउ वारीआ हरि वारीआ ॥१॥ रहाउ ॥
सुणि सुणि पंथु डराउ बहुतु भैहारीआ ॥
मै तकी ओट संताह लेहु उबारीआ ॥२॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
खोजत फिरे असंख अंतु न पारीआ ॥
सेई होए भगत जिना किरपारीआ ॥१॥
हउ वारीआ हरि वारीआ ॥१॥ रहाउ ॥
सुणि सुणि पंथु डराउ बहुतु भैहारीआ ॥
मै तकी ओट संताह लेहु उबारीआ ॥२॥
हिन्दी अर्थ: रागु गउड़ी माझ महला ५ ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। अनगिनत जीव ढूँढते फिरते हैं। पर किसी ने परमात्मा के गुणों का अंत नहीं पाया। वही मनुष्य परमात्मा के भक्त बन सकते हैं। जिन पर उसकी कृपा होती है। 1। मैं कुर्बान हूँ। हरी से कुर्बान हूँ। 1। रहाउ। बार बार ये सुन के कि जगत-जीवन का रास्ता डरावना है, मैं बहुत सहमा हुआ था (कि मैं कैसे ये सफर तय करूँगा?); आखिर मैंने संतों का आसरा देखा है। (मैं संत जनों के आगे अरदास करता हूँ कि आत्मिक जीवन के रास्ते के खतरों से) मुझे बचा लें। 2।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 240 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
IIT-JEE result का दिन, परिवार phones के पास बैठा।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 48 पंक्तियों का है, 4 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 240” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 241 →, पीछे का: ← अंग 239।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।