अंग
231
राग Gauree
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਤਤੁ ਨ ਚੀਨਹਿ ਬੰਨਹਿ ਪੰਡ ਪਰਾਲਾ ॥੨॥
ਮਨਮੁਖ ਅਗਿਆਨਿ ਕੁਮਾਰਗਿ ਪਾਏ ॥
ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਬਿਸਾਰਿਆ ਬਹੁ ਕਰਮ ਦ੍ਰਿੜਾਏ ॥
ਭਵਜਲਿ ਡੂਬੇ ਦੂਜੈ ਭਾਏ ॥੩॥
ਮਾਇਆ ਕਾ ਮੁਹਤਾਜੁ ਪੰਡਿਤੁ ਕਹਾਵੈ ॥
ਬਿਖਿਆ ਰਾਤਾ ਬਹੁਤੁ ਦੁਖੁ ਪਾਵੈ ॥
ਜਮ ਕਾ ਗਲਿ ਜੇਵੜਾ ਨਿਤ ਕਾਲੁ ਸੰਤਾਵੈ ॥੪॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਜਮਕਾਲੁ ਨੇੜਿ ਨ ਆਵੈ ॥
ਹਉਮੈ ਦੂਜਾ ਸਬਦਿ ਜਲਾਵੈ ॥
ਨਾਮੇ ਰਾਤੇ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਵੈ ॥੫॥
ਮਾਇਆ ਦਾਸੀ ਭਗਤਾ ਕੀ ਕਾਰ ਕਮਾਵੈ ॥
ਚਰਣੀ ਲਾਗੈ ਤਾ ਮਹਲੁ ਪਾਵੈ ॥
ਸਦ ਹੀ ਨਿਰਮਲੁ ਸਹਜਿ ਸਮਾਵੈ ॥੬॥
ਹਰਿ ਕਥਾ ਸੁਣਹਿ ਸੇ ਧਨਵੰਤ ਦਿਸਹਿ ਜੁਗ ਮਾਹੀ ॥
ਤਿਨ ਕਉ ਸਭਿ ਨਿਵਹਿ ਅਨਦਿਨੁ ਪੂਜ ਕਰਾਹੀ ॥
ਸਹਜੇ ਗੁਣ ਰਵਹਿ ਸਾਚੇ ਮਨ ਮਾਹੀ ॥੭॥
ਪੂਰੈ ਸਤਿਗੁਰਿ ਸਬਦੁ ਸੁਣਾਇਆ ॥
ਤ੍ਰੈ ਗੁਣ ਮੇਟੇ ਚਉਥੈ ਚਿਤੁ ਲਾਇਆ ॥
ਨਾਨਕ ਹਉਮੈ ਮਾਰਿ ਬ੍ਰਹਮ ਮਿਲਾਇਆ ॥੮॥੪॥
ਮਨਮੁਖ ਅਗਿਆਨਿ ਕੁਮਾਰਗਿ ਪਾਏ ॥
ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਬਿਸਾਰਿਆ ਬਹੁ ਕਰਮ ਦ੍ਰਿੜਾਏ ॥
ਭਵਜਲਿ ਡੂਬੇ ਦੂਜੈ ਭਾਏ ॥੩॥
ਮਾਇਆ ਕਾ ਮੁਹਤਾਜੁ ਪੰਡਿਤੁ ਕਹਾਵੈ ॥
ਬਿਖਿਆ ਰਾਤਾ ਬਹੁਤੁ ਦੁਖੁ ਪਾਵੈ ॥
ਜਮ ਕਾ ਗਲਿ ਜੇਵੜਾ ਨਿਤ ਕਾਲੁ ਸੰਤਾਵੈ ॥੪॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਜਮਕਾਲੁ ਨੇੜਿ ਨ ਆਵੈ ॥
ਹਉਮੈ ਦੂਜਾ ਸਬਦਿ ਜਲਾਵੈ ॥
ਨਾਮੇ ਰਾਤੇ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਵੈ ॥੫॥
ਮਾਇਆ ਦਾਸੀ ਭਗਤਾ ਕੀ ਕਾਰ ਕਮਾਵੈ ॥
ਚਰਣੀ ਲਾਗੈ ਤਾ ਮਹਲੁ ਪਾਵੈ ॥
ਸਦ ਹੀ ਨਿਰਮਲੁ ਸਹਜਿ ਸਮਾਵੈ ॥੬॥
ਹਰਿ ਕਥਾ ਸੁਣਹਿ ਸੇ ਧਨਵੰਤ ਦਿਸਹਿ ਜੁਗ ਮਾਹੀ ॥
ਤਿਨ ਕਉ ਸਭਿ ਨਿਵਹਿ ਅਨਦਿਨੁ ਪੂਜ ਕਰਾਹੀ ॥
ਸਹਜੇ ਗੁਣ ਰਵਹਿ ਸਾਚੇ ਮਨ ਮਾਹੀ ॥੭॥
ਪੂਰੈ ਸਤਿਗੁਰਿ ਸਬਦੁ ਸੁਣਾਇਆ ॥
ਤ੍ਰੈ ਗੁਣ ਮੇਟੇ ਚਉਥੈ ਚਿਤੁ ਲਾਇਆ ॥
ਨਾਨਕ ਹਉਮੈ ਮਾਰਿ ਬ੍ਰਹਮ ਮਿਲਾਇਆ ॥੮॥੪॥
ततु न चीनहि बंनहि पंड पराला ॥२॥
मनमुख अगिआनि कुमारगि पाए ॥
हरि नामु बिसारिआ बहु करम द्रिड़ाए ॥
भवजलि डूबे दूजै भाए ॥३॥
माइआ का मुहताजु पंडितु कहावै ॥
बिखिआ राता बहुतु दुखु पावै ॥
जम का गलि जेवड़ा नित कालु संतावै ॥४॥
गुरमुखि जमकालु नेड़ि न आवै ॥
हउमै दूजा सबदि जलावै ॥
नामे राते हरि गुण गावै ॥५॥
माइआ दासी भगता की कार कमावै ॥
चरणी लागै ता महलु पावै ॥
सद ही निरमलु सहजि समावै ॥६॥
हरि कथा सुणहि से धनवंत दिसहि जुग माही ॥
तिन कउ सभि निवहि अनदिनु पूज कराही ॥
सहजे गुण रवहि साचे मन माही ॥७॥
पूरै सतिगुरि सबदु सुणाइआ ॥
त्रै गुण मेटे चउथै चितु लाइआ ॥
नानक हउमै मारि ब्रहम मिलाइआ ॥८॥४॥
मनमुख अगिआनि कुमारगि पाए ॥
हरि नामु बिसारिआ बहु करम द्रिड़ाए ॥
भवजलि डूबे दूजै भाए ॥३॥
माइआ का मुहताजु पंडितु कहावै ॥
बिखिआ राता बहुतु दुखु पावै ॥
जम का गलि जेवड़ा नित कालु संतावै ॥४॥
गुरमुखि जमकालु नेड़ि न आवै ॥
हउमै दूजा सबदि जलावै ॥
नामे राते हरि गुण गावै ॥५॥
माइआ दासी भगता की कार कमावै ॥
चरणी लागै ता महलु पावै ॥
सद ही निरमलु सहजि समावै ॥६॥
हरि कथा सुणहि से धनवंत दिसहि जुग माही ॥
तिन कउ सभि निवहि अनदिनु पूज कराही ॥
सहजे गुण रवहि साचे मन माही ॥७॥
पूरै सतिगुरि सबदु सुणाइआ ॥
त्रै गुण मेटे चउथै चितु लाइआ ॥
नानक हउमै मारि ब्रहम मिलाइआ ॥८॥४॥
हिन्दी अर्थ: वह असल (जीवन उद्देश्य) को नहीं पहचानते~ वह (धार्मिक चर्चा की) फूस के बंडल ही (अपने सिर पर) बाँधे रखते हैं। 2। (हे भाई ! वे लोग ब्रहमा की रची हुई बाणी पढ़ते हैं~ पर) अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य परमात्मा के साथ जान-पहिचान से वंचित रहने के कारण गलत जीवन राह पर पड़े रहते हैं। वे परमात्मा का नाम तो भुला देते हैं~ पर (अन्य वर्त-नेम आदिक) अनेकों कर्म करने पर जोर देते रहते हैं। ऐसे मनुष्य परमात्मा के बिना और प्यार में फंसे रहने के कारण संसार समुंद्र में डूबे रहते हैं (विकारों में फंसे रहते हैं)। 3। (हे भाई ! ब्रह्मा की रची बाणी का विद्वान मनुष्य) माया का तृष्णालु रहता हुआ भी (अपने आप को) पंडित कहलवाता है। माया के मोह में फंसा वह (अंतरात्मे) बहुत दुख सहता रहता है~ उसके गले में आत्मिक मौत का फंदा पड़ा रहता है~ आत्मिक मौत उसे सदैव दुखी रखती है। 4। (पर~ हे भाई !) आत्मिक मौत गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य के नजदीक नहीं फटकती~ वह गुरू के शबद की बरकति से (अपने अंदर से) अहंकार जला देता है~ वह परमात्मा के नाम में ही रंगा रह के परमात्मा के गुण गाता रहता है। 5। (हे भाई !) जो मनुष्य परमात्मा की भक्ति करते हैं~ माया उनकी दासी बनी रहती है~ और उनकी जरूरतें पूरी करती है। जो मनुष्य उन भक्त जनों की चरणों में लगता है~ वह भी प्रभू चरणों में ठिकाना प्राप्त कर लेता है। वह भी सदा ही पवित्र मन वाला हो जाता है और आत्मिक अडोलता में टिका रहता है। 6। (हे भाई !) जो मनुष्य परमात्मा की सिफत सालाह की बातें सुनतें हैं~ वह जगत में (प्रत्यक्ष) धनवान दिखते हैं (वे माया की तृष्णा में नहीं भटकते फिरते)~ सारे लोग उनके आगे नत्मस्तक होते हैं~ और हर वक्त उनका आदर-सत्कार करते हैं (क्योंकि वह मनुष्य) आत्मिक अडोलता में टिक के सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा के गुण अपने मन में याद करे रखते हैं। 7। हे नानक ! (कह, हे भाई ! जिस मनुष्य को) पूरे गुरू ने परमात्मा की सिफत सालाह की बाणी सुनाई है~ उसने अपने अंदर से (माया के) तीनों गुणों का प्रभाव मिटा लिया है~ उसने अपना मन उस आत्मिक अवस्था में टिका लिया है जहाँ माया के तीन गुण अपना असर नहीं डाल सकते~ (गुरू ने उसके अंदर से) अहंकार मार के उसको परमात्मा के साथ जोड़ दिया है। 8। 4।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਬ੍ਰਹਮਾ ਵੇਦੁ ਪੜੈ ਵਾਦੁ ਵਖਾਣੈ ॥
ਅੰਤਰਿ ਤਾਮਸੁ ਆਪੁ ਨ ਪਛਾਣੈ ॥
ਤਾ ਪ੍ਰਭੁ ਪਾਏ ਗੁਰ ਸਬਦੁ ਵਖਾਣੈ ॥੧॥
ਗੁਰ ਸੇਵਾ ਕਰਉ ਫਿਰਿ ਕਾਲੁ ਨ ਖਾਇ ॥
ਮਨਮੁਖ ਖਾਧੇ ਦੂਜੈ ਭਾਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਪ੍ਰਾਣੀ ਅਪਰਾਧੀ ਸੀਧੇ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਅੰਤਰਿ ਸਹਜਿ ਰੀਧੇ ॥
ਮੇਰਾ ਪ੍ਰਭੁ ਪਾਇਆ ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਸੀਧੇ ॥੨॥
ਸਤਿਗੁਰਿ ਮੇਲੇ ਪ੍ਰਭਿ ਆਪਿ ਮਿਲਾਏ ॥
ਮੇਰੇ ਪ੍ਰਭ ਸਾਚੇ ਕੈ ਮਨਿ ਭਾਏ ॥
ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਵਹਿ ਸਹਜਿ ਸੁਭਾਏ ॥੩॥
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਸਾਚੇ ਭਰਮਿ ਭੁਲਾਏ ॥
ਮਨਮੁਖ ਅੰਧੇ ਸਦਾ ਬਿਖੁ ਖਾਏ ॥
ਜਮ ਡੰਡੁ ਸਹਹਿ ਸਦਾ ਦੁਖੁ ਪਾਏ ॥੪॥
ਜਮੂਆ ਨ ਜੋਹੈ ਹਰਿ ਕੀ ਸਰਣਾਈ ॥
ਹਉਮੈ ਮਾਰਿ ਸਚਿ ਲਿਵ ਲਾਈ ॥
ਸਦਾ ਰਹੈ ਹਰਿ ਨਾਮਿ ਲਿਵ ਲਾਈ ॥੫॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵਹਿ ਸੇ ਜਨ ਨਿਰਮਲ ਪਵਿਤਾ ॥
ਮਨ ਸਿਉ ਮਨੁ ਮਿਲਾਇ ਸਭੁ ਜਗੁ ਜੀਤਾ ॥
ਇਨ ਬਿਧਿ ਕੁਸਲੁ ਤੇਰੈ ਮੇਰੇ ਮੀਤਾ ॥੬॥
ਸਤਿਗੁਰੂ ਸੇਵੇ ਸੋ ਫਲੁ ਪਾਏ ॥
ਹਿਰਦੈ ਨਾਮੁ ਵਿਚਹੁ ਆਪੁ ਗਵਾਏ ॥
ਅਨਹਦ ਬਾਣੀ ਸਬਦੁ ਵਜਾਏ ॥੭॥
ਸਤਿਗੁਰ ਤੇ ਕਵਨੁ ਕਵਨੁ ਨ ਸੀਧੋ ਮੇਰੇ ਭਾਈ ॥
ਭਗਤੀ ਸੀਧੇ ਦਰਿ ਸੋਭਾ ਪਾਈ ॥
ਨਾਨਕ ਰਾਮ ਨਾਮਿ ਵਡਿਆਈ ॥੮॥੫॥
ਬ੍ਰਹਮਾ ਵੇਦੁ ਪੜੈ ਵਾਦੁ ਵਖਾਣੈ ॥
ਅੰਤਰਿ ਤਾਮਸੁ ਆਪੁ ਨ ਪਛਾਣੈ ॥
ਤਾ ਪ੍ਰਭੁ ਪਾਏ ਗੁਰ ਸਬਦੁ ਵਖਾਣੈ ॥੧॥
ਗੁਰ ਸੇਵਾ ਕਰਉ ਫਿਰਿ ਕਾਲੁ ਨ ਖਾਇ ॥
ਮਨਮੁਖ ਖਾਧੇ ਦੂਜੈ ਭਾਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਪ੍ਰਾਣੀ ਅਪਰਾਧੀ ਸੀਧੇ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਅੰਤਰਿ ਸਹਜਿ ਰੀਧੇ ॥
ਮੇਰਾ ਪ੍ਰਭੁ ਪਾਇਆ ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਸੀਧੇ ॥੨॥
ਸਤਿਗੁਰਿ ਮੇਲੇ ਪ੍ਰਭਿ ਆਪਿ ਮਿਲਾਏ ॥
ਮੇਰੇ ਪ੍ਰਭ ਸਾਚੇ ਕੈ ਮਨਿ ਭਾਏ ॥
ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਵਹਿ ਸਹਜਿ ਸੁਭਾਏ ॥੩॥
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਸਾਚੇ ਭਰਮਿ ਭੁਲਾਏ ॥
ਮਨਮੁਖ ਅੰਧੇ ਸਦਾ ਬਿਖੁ ਖਾਏ ॥
ਜਮ ਡੰਡੁ ਸਹਹਿ ਸਦਾ ਦੁਖੁ ਪਾਏ ॥੪॥
ਜਮੂਆ ਨ ਜੋਹੈ ਹਰਿ ਕੀ ਸਰਣਾਈ ॥
ਹਉਮੈ ਮਾਰਿ ਸਚਿ ਲਿਵ ਲਾਈ ॥
ਸਦਾ ਰਹੈ ਹਰਿ ਨਾਮਿ ਲਿਵ ਲਾਈ ॥੫॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵਹਿ ਸੇ ਜਨ ਨਿਰਮਲ ਪਵਿਤਾ ॥
ਮਨ ਸਿਉ ਮਨੁ ਮਿਲਾਇ ਸਭੁ ਜਗੁ ਜੀਤਾ ॥
ਇਨ ਬਿਧਿ ਕੁਸਲੁ ਤੇਰੈ ਮੇਰੇ ਮੀਤਾ ॥੬॥
ਸਤਿਗੁਰੂ ਸੇਵੇ ਸੋ ਫਲੁ ਪਾਏ ॥
ਹਿਰਦੈ ਨਾਮੁ ਵਿਚਹੁ ਆਪੁ ਗਵਾਏ ॥
ਅਨਹਦ ਬਾਣੀ ਸਬਦੁ ਵਜਾਏ ॥੭॥
ਸਤਿਗੁਰ ਤੇ ਕਵਨੁ ਕਵਨੁ ਨ ਸੀਧੋ ਮੇਰੇ ਭਾਈ ॥
ਭਗਤੀ ਸੀਧੇ ਦਰਿ ਸੋਭਾ ਪਾਈ ॥
ਨਾਨਕ ਰਾਮ ਨਾਮਿ ਵਡਿਆਈ ॥੮॥੫॥
गउड़ी महला ३ ॥
ब्रहमा वेदु पड़ै वादु वखाणै ॥
अंतरि तामसु आपु न पछाणै ॥
ता प्रभु पाए गुर सबदु वखाणै ॥१॥
गुर सेवा करउ फिरि कालु न खाइ ॥
मनमुख खाधे दूजै भाइ ॥१॥ रहाउ ॥
गुरमुखि प्राणी अपराधी सीधे ॥
गुर कै सबदि अंतरि सहजि रीधे ॥
मेरा प्रभु पाइआ गुर कै सबदि सीधे ॥२॥
सतिगुरि मेले प्रभि आपि मिलाए ॥
मेरे प्रभ साचे कै मनि भाए ॥
हरि गुण गावहि सहजि सुभाए ॥३॥
बिनु गुर साचे भरमि भुलाए ॥
मनमुख अंधे सदा बिखु खाए ॥
जम डंडु सहहि सदा दुखु पाए ॥४॥
जमूआ न जोहै हरि की सरणाई ॥
हउमै मारि सचि लिव लाई ॥
सदा रहै हरि नामि लिव लाई ॥५॥
सतिगुरु सेवहि से जन निरमल पविता ॥
मन सिउ मनु मिलाइ सभु जगु जीता ॥
इन बिधि कुसलु तेरै मेरे मीता ॥६॥
सतिगुरू सेवे सो फलु पाए ॥
हिरदै नामु विचहु आपु गवाए ॥
अनहद बाणी सबदु वजाए ॥७॥
सतिगुर ते कवनु कवनु न सीधो मेरे भाई ॥
भगती सीधे दरि सोभा पाई ॥
नानक राम नामि वडिआई ॥८॥५॥
ब्रहमा वेदु पड़ै वादु वखाणै ॥
अंतरि तामसु आपु न पछाणै ॥
ता प्रभु पाए गुर सबदु वखाणै ॥१॥
गुर सेवा करउ फिरि कालु न खाइ ॥
मनमुख खाधे दूजै भाइ ॥१॥ रहाउ ॥
गुरमुखि प्राणी अपराधी सीधे ॥
गुर कै सबदि अंतरि सहजि रीधे ॥
मेरा प्रभु पाइआ गुर कै सबदि सीधे ॥२॥
सतिगुरि मेले प्रभि आपि मिलाए ॥
मेरे प्रभ साचे कै मनि भाए ॥
हरि गुण गावहि सहजि सुभाए ॥३॥
बिनु गुर साचे भरमि भुलाए ॥
मनमुख अंधे सदा बिखु खाए ॥
जम डंडु सहहि सदा दुखु पाए ॥४॥
जमूआ न जोहै हरि की सरणाई ॥
हउमै मारि सचि लिव लाई ॥
सदा रहै हरि नामि लिव लाई ॥५॥
सतिगुरु सेवहि से जन निरमल पविता ॥
मन सिउ मनु मिलाइ सभु जगु जीता ॥
इन बिधि कुसलु तेरै मेरे मीता ॥६॥
सतिगुरू सेवे सो फलु पाए ॥
हिरदै नामु विचहु आपु गवाए ॥
अनहद बाणी सबदु वजाए ॥७॥
सतिगुर ते कवनु कवनु न सीधो मेरे भाई ॥
भगती सीधे दरि सोभा पाई ॥
नानक राम नामि वडिआई ॥८॥५॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ३ ॥ (हे भाई ! पंडित उस) वेद को पढ़ता है (जिसे वह) ब्रह्मा का उच्चारा हुआ (समझता है~ उसके आसरे) बहिस (की बातें) सुनाता है~ पर उसके अपने अंदर आत्मिक जीवन वाला अंधेरा ही रहता है~ क्योंकि वह अपने आत्मिक जीवन को पड़तालता ही नहीं। जब मनुष्य गुरू का शबद (जो प्रभू की सिफत सालाह से भरपूर है) उच्चारता है~ तभी प्रभू का मिलाप हासिल करता है। 1। (हे भाई !) मैं (तो) गुरू की सेवा करता हूँ (मैं तो गुरू की शरण पड़ा हूँ। जो मनुष्य गुरू का प्रभाव लेता है उसे) फिर कभी आत्मिक मौत नहीं खाती (आत्मिक मौत उसके आत्मिक जीवन को तबाह नहीं करती)। (पर) जो मनुष्य अपने मन के पीछे चलते हैं~ माया के प्यार में (फंसने के कारण) उनके आत्मिक जीवन खत्म हो जाते हैं। 1। रहाउ। (हे भाई !) पापी मनुष्य भी गुरू की शरण पड़ कर अपना जीवन सफल कर लेते हैं~ गुरू के शबद की बरकति से वह आत्मिक अडोलता में टिक जाते हैं~ उनके अंदर प्रभू मिलाप की रीझ पैदा हो जाती है~ वह प्रभू को मिल जाते हैं~ गुरू के शबद द्वारा वे सफल जीवन वाले हो जाते हैं। 2। (हे भाई !) जिन्हें गुरू ने (अपने शबद में) जोड़ा है~ उन्हें प्रभू ने अपने चरणों में मिला लिया है~ वह मनुष्य सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा के मन में प्यारे लगने लग पड़ते हैं~ वे आत्मिक अडोलता में प्रेम में जुड़ के प्रभू के गुण गाते हैं। 3। (हे भाई !) अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य सदा स्थिर प्रभू के रूप गुरू से विछुड़ के भटकना के कारण गलत राह पर पड़े रहते हैं। माया के मोह में अंधे हुए हुये वे सदा (इस मोह का) जहर ही खाते रहते हैं जिस कारण वे आत्मिक मौत की सजा ही सहते हैं और सदा दुख पाते हैं। 4। (हे भाई ! जो मनुष्य) परमात्मा की शरण पड़ा रहता है विचारा जम उसकी तरफ देख भी नहीं सकता (आत्मिक मौत उसके नजदीक नहीं फटकती)। वह मनुष्य (अपने अंदर से) अहंकार दूर करके सदा स्थिर प्रभू (के चरणों) में सुरति जोड़े रखता है~ वह सदा परमात्मा के नाम में लिव लगाए रखता है। 5। (हे भाई !) जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ते हैं~ वे पवित्र और स्वच्छ जीवन वाले बन जाते हैं~ वह गुरू के मन के साथ अपना मन जोड़ के (गुरू की रजा में चल के) सारे जगत को जीत लेते हैं (कोई विकार उनके ऊपर अपना प्रभाव नहीं डाल सकता)। हे मेरे मित्र ! (अगर तू भी गुरू की शरण पड़े~ तो) इस तरीके से तेरे अंदर भी आनंद बना रहेगा। 6। (हे भाई !) जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है~ वह (यह) फल हासिल करता है (कि) उसके हृदय में परमात्मा का नाम बस पड़ता है~ वह अपने अंदर से स्वैभाव (अहम्-अहंकार) दूर कर लेता है। (जैसे ढोल बजने पर कोई छोटी मोटी आवाज सुनाई नहीं देती) वह मनुष्य (अपने अंदर) एक रस सिफत सालाह की बाणी~ सिफत सालाह का शबद उजागर करता है (जिसकी बरकति से) कोई अन्य बुरी प्रेरणा असर नहीं डाल सकती। 7। हे नानक ! (कह,) हे मेरे भाई ! गुरू की शरण पड़ने से कौन कौन सा मनुष्य (जीवन में) कामयाब नहीं होता? (जो भी मनुष्य गुरू का पल्ला पकड़ता है~ उसकी जिंदगी सफल हो जाती है)। (गुरू की शरण पड़ कर) परमात्मा की भक्ति की बरकति से मनुष्य कामयाब जीवन वाले हो जाते हैं~ प्रभू के दर पर उन्हें शोभा मिलती है। परमात्मा के नाम की बरकति से उन्हें (हर जगह वडिआई) आदर~ शोभा मिलती है। 8। 5।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਤ੍ਰੈ ਗੁਣ ਵਖਾਣੈ ਭਰਮੁ ਨ ਜਾਇ ॥
ਬੰਧਨ ਨ ਤੂਟਹਿ ਮੁਕਤਿ ਨ ਪਾਇ ॥
ਮੁਕਤਿ ਦਾਤਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਜੁਗ ਮਾਹਿ ॥੧॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਪ੍ਰਾਣੀ ਭਰਮੁ ਗਵਾਇ ॥
ਸਹਜ ਧੁਨਿ ਉਪਜੈ ਹਰਿ ਲਿਵ ਲਾਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਤ੍ਰੈ ਗੁਣ ਕਾਲੈ ਕੀ ਸਿਰਿ ਕਾਰਾ ॥
ਤ੍ਰੈ ਗੁਣ ਵਖਾਣੈ ਭਰਮੁ ਨ ਜਾਇ ॥
ਬੰਧਨ ਨ ਤੂਟਹਿ ਮੁਕਤਿ ਨ ਪਾਇ ॥
ਮੁਕਤਿ ਦਾਤਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਜੁਗ ਮਾਹਿ ॥੧॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਪ੍ਰਾਣੀ ਭਰਮੁ ਗਵਾਇ ॥
ਸਹਜ ਧੁਨਿ ਉਪਜੈ ਹਰਿ ਲਿਵ ਲਾਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਤ੍ਰੈ ਗੁਣ ਕਾਲੈ ਕੀ ਸਿਰਿ ਕਾਰਾ ॥
गउड़ी महला ३ ॥
त्रै गुण वखाणै भरमु न जाइ ॥
बंधन न तूटहि मुकति न पाइ ॥
मुकति दाता सतिगुरु जुग माहि ॥१॥
गुरमुखि प्राणी भरमु गवाइ ॥
सहज धुनि उपजै हरि लिव लाइ ॥१॥ रहाउ ॥
त्रै गुण कालै की सिरि कारा ॥
त्रै गुण वखाणै भरमु न जाइ ॥
बंधन न तूटहि मुकति न पाइ ॥
मुकति दाता सतिगुरु जुग माहि ॥१॥
गुरमुखि प्राणी भरमु गवाइ ॥
सहज धुनि उपजै हरि लिव लाइ ॥१॥ रहाउ ॥
त्रै गुण कालै की सिरि कारा ॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ३ ॥ (पर~ हे भाई !) जो मनुष्य माया के पसारे की बातों में दिलचस्पी रखता है~ उसके मन की भटकना दूर नहीं हो सकती~ उसके (माया के मोह के) बंधन नहीं टूटते, उसे (माया के मोह से) आजादी प्राप्त नहीं होती। (हे भाई !) जगत में माया के मोह से निजात देने वाला (सिर्फ) गुरू (ही) है। 1। (हे भाई !) जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है~ वह अपने मन की भटकना दूर कर लेता है~ उसके अंदर आत्मिक अडोलता की रौंअ पैदा हो जाती है (क्योंकि~ गुरू की कृपा से) वह परमात्मा में सुरति जोड़े रखता है। 1। रहाउ। (हे भाई !) माया के पसारे में दिलचस्पी रखने वालों के सिर पर (सदा) आत्मिक मौत का हुकम चलता है~
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 231 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Amar Daas Ji।
Jor Bagh metro station से Khan Market की 10-मिनट की walk में मन का थमना।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 53 पंक्तियों का है, 3 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 231” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 232 →, पीछे का: ← अंग 230।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।