अंग
241
राग Gauree
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਮੋਹਨ ਲਾਲ ਅਨੂਪ ਸਰਬ ਸਾਧਾਰੀਆ ॥
ਗੁਰ ਨਿਵਿ ਨਿਵਿ ਲਾਗਉ ਪਾਇ ਦੇਹੁ ਦਿਖਾਰੀਆ ॥੩॥
ਮੈ ਕੀਏ ਮਿਤ੍ਰ ਅਨੇਕ ਇਕਸੁ ਬਲਿਹਾਰੀਆ ॥
ਸਭ ਗੁਣ ਕਿਸ ਹੀ ਨਾਹਿ ਹਰਿ ਪੂਰ ਭੰਡਾਰੀਆ ॥੪॥
ਚਹੁ ਦਿਸਿ ਜਪੀਐ ਨਾਉ ਸੂਖਿ ਸਵਾਰੀਆ ॥
ਮੈ ਆਹੀ ਓੜਿ ਤੁਹਾਰਿ ਨਾਨਕ ਬਲਿਹਾਰੀਆ ॥੫॥
ਗੁਰਿ ਕਾਢਿਓ ਭੁਜਾ ਪਸਾਰਿ ਮੋਹ ਕੂਪਾਰੀਆ ॥
ਮੈ ਜੀਤਿਓ ਜਨਮੁ ਅਪਾਰੁ ਬਹੁਰਿ ਨ ਹਾਰੀਆ ॥੬॥
ਮੈ ਪਾਇਓ ਸਰਬ ਨਿਧਾਨੁ ਅਕਥੁ ਕਥਾਰੀਆ ॥
ਹਰਿ ਦਰਗਹ ਸੋਭਾਵੰਤ ਬਾਹ ਲੁਡਾਰੀਆ ॥੭॥
ਜਨ ਨਾਨਕ ਲਧਾ ਰਤਨੁ ਅਮੋਲੁ ਅਪਾਰੀਆ ॥
ਗੁਰ ਸੇਵਾ ਭਉਜਲੁ ਤਰੀਐ ਕਹਉ ਪੁਕਾਰੀਆ ॥੮॥੧੨॥
ਗੁਰ ਨਿਵਿ ਨਿਵਿ ਲਾਗਉ ਪਾਇ ਦੇਹੁ ਦਿਖਾਰੀਆ ॥੩॥
ਮੈ ਕੀਏ ਮਿਤ੍ਰ ਅਨੇਕ ਇਕਸੁ ਬਲਿਹਾਰੀਆ ॥
ਸਭ ਗੁਣ ਕਿਸ ਹੀ ਨਾਹਿ ਹਰਿ ਪੂਰ ਭੰਡਾਰੀਆ ॥੪॥
ਚਹੁ ਦਿਸਿ ਜਪੀਐ ਨਾਉ ਸੂਖਿ ਸਵਾਰੀਆ ॥
ਮੈ ਆਹੀ ਓੜਿ ਤੁਹਾਰਿ ਨਾਨਕ ਬਲਿਹਾਰੀਆ ॥੫॥
ਗੁਰਿ ਕਾਢਿਓ ਭੁਜਾ ਪਸਾਰਿ ਮੋਹ ਕੂਪਾਰੀਆ ॥
ਮੈ ਜੀਤਿਓ ਜਨਮੁ ਅਪਾਰੁ ਬਹੁਰਿ ਨ ਹਾਰੀਆ ॥੬॥
ਮੈ ਪਾਇਓ ਸਰਬ ਨਿਧਾਨੁ ਅਕਥੁ ਕਥਾਰੀਆ ॥
ਹਰਿ ਦਰਗਹ ਸੋਭਾਵੰਤ ਬਾਹ ਲੁਡਾਰੀਆ ॥੭॥
ਜਨ ਨਾਨਕ ਲਧਾ ਰਤਨੁ ਅਮੋਲੁ ਅਪਾਰੀਆ ॥
ਗੁਰ ਸੇਵਾ ਭਉਜਲੁ ਤਰੀਐ ਕਹਉ ਪੁਕਾਰੀਆ ॥੮॥੧੨॥
मोहन लाल अनूप सरब साधारीआ ॥
गुर निवि निवि लागउ पाइ देहु दिखारीआ ॥३॥
मै कीए मित्र अनेक इकसु बलिहारीआ ॥
सभ गुण किस ही नाहि हरि पूर भंडारीआ ॥४॥
चहु दिसि जपीऐ नाउ सूखि सवारीआ ॥
मै आही ओड़ि तुहारि नानक बलिहारीआ ॥५॥
गुरि काढिओ भुजा पसारि मोह कूपारीआ ॥
मै जीतिओ जनमु अपारु बहुरि न हारीआ ॥६॥
मै पाइओ सरब निधानु अकथु कथारीआ ॥
हरि दरगह सोभावंत बाह लुडारीआ ॥७॥
जन नानक लधा रतनु अमोलु अपारीआ ॥
गुर सेवा भउजलु तरीऐ कहउ पुकारीआ ॥८॥१२॥
गुर निवि निवि लागउ पाइ देहु दिखारीआ ॥३॥
मै कीए मित्र अनेक इकसु बलिहारीआ ॥
सभ गुण किस ही नाहि हरि पूर भंडारीआ ॥४॥
चहु दिसि जपीऐ नाउ सूखि सवारीआ ॥
मै आही ओड़ि तुहारि नानक बलिहारीआ ॥५॥
गुरि काढिओ भुजा पसारि मोह कूपारीआ ॥
मै जीतिओ जनमु अपारु बहुरि न हारीआ ॥६॥
मै पाइओ सरब निधानु अकथु कथारीआ ॥
हरि दरगह सोभावंत बाह लुडारीआ ॥७॥
जन नानक लधा रतनु अमोलु अपारीआ ॥
गुर सेवा भउजलु तरीऐ कहउ पुकारीआ ॥८॥१२॥
हिन्दी अर्थ: हे मन को मोह लेने वाले सुंदर लाल ! हे सब जीवों के आसरे प्रभू ! मैंझुक झुक के गुरू के चरणों में लगता हूँ (और गुरू के आगे विनती करता हूँ कि मुझे तेरा) दर्शन करवा दे। 3। मैंने अनेको साक-संबंधियों को अपना मित्र बनाया (पर किसी के साथ भी सिरे का साथ नहीं निभता। अब मैं) एक परमात्मा से ही कुर्बान जाता हूँ (वही साथ निभने वाला साथी है)। सारे गुण (भी) और किसी में नहीं हैं। एक परमात्मा ही भरे खजानों वाला है। 4। हे नानक ! (कह, हे प्रभू !) चारों तरफ तेरा ही नाम जपा जा रहा है। (जो मनुष्य जपता है वह) सुख-आनंद में (रहता है। उसका जीवन) सँवर जाता है। (हे प्रभू !) मैंने तेरा आसरा लिया है। मैं तुझसे सदके जाता हूँ। 5। (हे भाई !) गुरू ने मुझे बाँह फैला के मोह के कूएं में से निकाल लिया है। (उसकी बरकति से) मैंने कीमती मानस जन्म (की बाजी) जीत ली है। दुबारा मैं (मोह के मुकाबले में) बाजी नहीं हारूँगा। 6। (गुरू की कृपा) मैंने सारे गुणों का खजाना वह परमात्मा ढूँढ लिया है। जिसकी सिफत सालाह की कहानियां बयान नहीं की जा सकतीं। (जो मनुष्य सरब-निधान प्रभू को मिल लेते हैं) वह उसकी दरगाह में शोभा हासिल कर लेते हैं। वह वहाँ बाँह उलार के चलते हैं (अर्थात। मौज-आनंद में रहते हैं)। 7। हे दास नानक ! (कह, जिन्होंने गुरू का पल्ला पकड़ा। उन्होंने) परमात्मा का बेअंत कीमती नाम-रत्न हासिल कर लिया। (हे भाई !) मैं पुकार के कहता हूँ कि गुरू की शरण पड़ने से संसार समुंद्र में (से बेदाग रह के) पार लांघ जाते हैं। 8। 12।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਨਾਰਾਇਣ ਹਰਿ ਰੰਗ ਰੰਗੋ ॥
ਜਪਿ ਜਿਹਵਾ ਹਰਿ ਏਕ ਮੰਗੋ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਤਜਿ ਹਉਮੈ ਗੁਰ ਗਿਆਨ ਭਜੋ ॥
ਮਿਲਿ ਸੰਗਤਿ ਧੁਰਿ ਕਰਮ ਲਿਖਿਓ ॥੧॥
ਜੋ ਦੀਸੈ ਸੋ ਸੰਗਿ ਨ ਗਇਓ ॥
ਸਾਕਤੁ ਮੂੜੁ ਲਗੇ ਪਚਿ ਮੁਇਓ ॥੨॥
ਮੋਹਨ ਨਾਮੁ ਸਦਾ ਰਵਿ ਰਹਿਓ ॥
ਕੋਟਿ ਮਧੇ ਕਿਨੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਲਹਿਓ ॥੩॥
ਹਰਿ ਸੰਤਨ ਕਰਿ ਨਮੋ ਨਮੋ ॥
ਨਉ ਨਿਧਿ ਪਾਵਹਿ ਅਤੁਲੁ ਸੁਖੋ ॥੪॥
ਨੈਨ ਅਲੋਵਉ ਸਾਧ ਜਨੋ ॥
ਹਿਰਦੈ ਗਾਵਹੁ ਨਾਮ ਨਿਧੋ ॥੫॥
ਕਾਮ ਕ੍ਰੋਧ ਲੋਭੁ ਮੋਹੁ ਤਜੋ ॥
ਜਨਮ ਮਰਨ ਦੁਹੁ ਤੇ ਰਹਿਓ ॥੬॥
ਦੂਖੁ ਅੰਧੇਰਾ ਘਰ ਤੇ ਮਿਟਿਓ ॥
ਗੁਰਿ ਗਿਆਨੁ ਦ੍ਰਿੜਾਇਓ ਦੀਪ ਬਲਿਓ ॥੭॥
ਜਿਨਿ ਸੇਵਿਆ ਸੋ ਪਾਰਿ ਪਰਿਓ ॥
ਜਨ ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਜਗਤੁ ਤਰਿਓ ॥੮॥੧॥੧੩॥
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਨਾਰਾਇਣ ਹਰਿ ਰੰਗ ਰੰਗੋ ॥
ਜਪਿ ਜਿਹਵਾ ਹਰਿ ਏਕ ਮੰਗੋ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਤਜਿ ਹਉਮੈ ਗੁਰ ਗਿਆਨ ਭਜੋ ॥
ਮਿਲਿ ਸੰਗਤਿ ਧੁਰਿ ਕਰਮ ਲਿਖਿਓ ॥੧॥
ਜੋ ਦੀਸੈ ਸੋ ਸੰਗਿ ਨ ਗਇਓ ॥
ਸਾਕਤੁ ਮੂੜੁ ਲਗੇ ਪਚਿ ਮੁਇਓ ॥੨॥
ਮੋਹਨ ਨਾਮੁ ਸਦਾ ਰਵਿ ਰਹਿਓ ॥
ਕੋਟਿ ਮਧੇ ਕਿਨੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਲਹਿਓ ॥੩॥
ਹਰਿ ਸੰਤਨ ਕਰਿ ਨਮੋ ਨਮੋ ॥
ਨਉ ਨਿਧਿ ਪਾਵਹਿ ਅਤੁਲੁ ਸੁਖੋ ॥੪॥
ਨੈਨ ਅਲੋਵਉ ਸਾਧ ਜਨੋ ॥
ਹਿਰਦੈ ਗਾਵਹੁ ਨਾਮ ਨਿਧੋ ॥੫॥
ਕਾਮ ਕ੍ਰੋਧ ਲੋਭੁ ਮੋਹੁ ਤਜੋ ॥
ਜਨਮ ਮਰਨ ਦੁਹੁ ਤੇ ਰਹਿਓ ॥੬॥
ਦੂਖੁ ਅੰਧੇਰਾ ਘਰ ਤੇ ਮਿਟਿਓ ॥
ਗੁਰਿ ਗਿਆਨੁ ਦ੍ਰਿੜਾਇਓ ਦੀਪ ਬਲਿਓ ॥੭॥
ਜਿਨਿ ਸੇਵਿਆ ਸੋ ਪਾਰਿ ਪਰਿਓ ॥
ਜਨ ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਜਗਤੁ ਤਰਿਓ ॥੮॥੧॥੧੩॥
गउड़ी महला ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
नाराइण हरि रंग रंगो ॥
जपि जिहवा हरि एक मंगो ॥१॥ रहाउ ॥
तजि हउमै गुर गिआन भजो ॥
मिलि संगति धुरि करम लिखिओ ॥१॥
जो दीसै सो संगि न गइओ ॥
साकतु मूड़ु लगे पचि मुइओ ॥२॥
मोहन नामु सदा रवि रहिओ ॥
कोटि मधे किनै गुरमुखि लहिओ ॥३॥
हरि संतन करि नमो नमो ॥
नउ निधि पावहि अतुलु सुखो ॥४॥
नैन अलोवउ साध जनो ॥
हिरदै गावहु नाम निधो ॥५॥
काम क्रोध लोभु मोहु तजो ॥
जनम मरन दुहु ते रहिओ ॥६॥
दूखु अंधेरा घर ते मिटिओ ॥
गुरि गिआनु द्रिड़ाइओ दीप बलिओ ॥७॥
जिनि सेविआ सो पारि परिओ ॥
जन नानक गुरमुखि जगतु तरिओ ॥८॥१॥१३॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
नाराइण हरि रंग रंगो ॥
जपि जिहवा हरि एक मंगो ॥१॥ रहाउ ॥
तजि हउमै गुर गिआन भजो ॥
मिलि संगति धुरि करम लिखिओ ॥१॥
जो दीसै सो संगि न गइओ ॥
साकतु मूड़ु लगे पचि मुइओ ॥२॥
मोहन नामु सदा रवि रहिओ ॥
कोटि मधे किनै गुरमुखि लहिओ ॥३॥
हरि संतन करि नमो नमो ॥
नउ निधि पावहि अतुलु सुखो ॥४॥
नैन अलोवउ साध जनो ॥
हिरदै गावहु नाम निधो ॥५॥
काम क्रोध लोभु मोहु तजो ॥
जनम मरन दुहु ते रहिओ ॥६॥
दूखु अंधेरा घर ते मिटिओ ॥
गुरि गिआनु द्रिड़ाइओ दीप बलिओ ॥७॥
जिनि सेविआ सो पारि परिओ ॥
जन नानक गुरमुखि जगतु तरिओ ॥८॥१॥१३॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हरी परमात्मा के प्यार रंग में अपने मन को रंग। (हे भाई !) अपनी जीभ से परमात्मा का नाम जप। हरी के दर से उसका नाम मांग।1। रहाउ। (हे भाई !) गुरू के बख्शे ज्ञान की बरकति से (अपने अंदर से) अहंकार दूर करके परमात्मा का नाम सिमर। जिस मनुष्य के माथे पर धुर दरगाह से बख्शिश का लेख लिखा जाता है। वह साध-संगति में मिल के (अहंकार दूर करता है और हरी-नाम जपता है)। 1। (हे भाई ! जगत में आँखों से) जो कुछ दिखाई दे रहा है। ये किसी के भी साथ नहीं जाता। पर मूर्ख माया में ग्रसित मनुष्य (इस दिखते प्यार में) लग के परेशान हो के आत्मिक मौत बर्दाश्त करता है। 2। उस मोहन प्रभू का नाम जो सदा हर जगह व्याप रहा है। (हे भाई !) करोड़ों में किसी विरले मनुष्य ने गुरू की शरण पड़ कर प्राप्त किया है ।3। (हे भाई !) परमात्मा के संत जनों को सदा सदा नमस्कार करता रह। तू बेअंत सुख पाएगा, तूझे वह नाम मिल जाएगा, जो मानो धरती के नौ खजाने हैं। 4। (मेरी तो यही प्रार्थना है कि) मैं अपनी आँखों से (उनका) दर्शन करता रहूँ (जो नाम जपते हैं)। हे साध जनो ! अपने हृदय में परमात्मा का नाम गाते रहो जो सारे सुखों का खजाना है।5। (हे भाई !अपने मन में से) काम-क्रोध-लोभ-मोह दूर करो। (जो मनुष्य इन विकारों को मिटाता है) वह जनम और मरन दोनों (के चक्र) से बच जाता है। 6। उसके हृदय-घर में दुख का अंधकार मट जाता है, (हे भाई !) गुरू ने जिस मनुष्य के हृदय में परमात्मा के साथ गहरी सांझ पक्की कर ली, उसके अंदर (आत्मिक सूझ का) दीपक जग जाता है। । 7। हे दास नानक ! (कह,) जिस मनुष्य ने परमात्मा का सिमरन किया, वह संसार समुंद्र से पार लांघ गया। गुरू की शरण पड़ कर जगत (संसार समुंद्र को) तैर जाता है। 8। 1। 13।
ਮਹਲਾ ੫ ਗਉੜੀ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਗੁਰੁ ਗੁਰੁ ਕਰਤ ਭਰਮ ਗਏ ॥
ਮੇਰੈ ਮਨਿ ਸਭਿ ਸੁਖ ਪਾਇਓ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਬਲਤੋ ਜਲਤੋ ਤਉਕਿਆ ਗੁਰ ਚੰਦਨੁ ਸੀਤਲਾਇਓ ॥੧॥
ਅਗਿਆਨ ਅੰਧੇਰਾ ਮਿਟਿ ਗਇਆ ਗੁਰ ਗਿਆਨੁ ਦੀਪਾਇਓ ॥੨॥
ਪਾਵਕੁ ਸਾਗਰੁ ਗਹਰੋ ਚਰਿ ਸੰਤਨ ਨਾਵ ਤਰਾਇਓ ॥੩॥
ਨਾ ਹਮ ਕਰਮ ਨ ਧਰਮ ਸੁਚ ਪ੍ਰਭਿ ਗਹਿ ਭੁਜਾ ਆਪਾਇਓ ॥੪॥
ਭਉ ਖੰਡਨੁ ਦੁਖ ਭੰਜਨੋ ਭਗਤਿ ਵਛਲ ਹਰਿ ਨਾਇਓ ॥੫॥
ਅਨਾਥਹ ਨਾਥ ਕ੍ਰਿਪਾਲ ਦੀਨ ਸੰਮ੍ਰਿਥ ਸੰਤ ਓਟਾਇਓ ॥੬॥
ਨਿਰਗੁਨੀਆਰੇ ਕੀ ਬੇਨਤੀ ਦੇਹੁ ਦਰਸੁ ਹਰਿ ਰਾਇਓ ॥੭॥
ਨਾਨਕ ਸਰਨਿ ਤੁਹਾਰੀ ਠਾਕੁਰ ਸੇਵਕੁ ਦੁਆਰੈ ਆਇਓ ॥੮॥੨॥੧੪॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਗੁਰੁ ਗੁਰੁ ਕਰਤ ਭਰਮ ਗਏ ॥
ਮੇਰੈ ਮਨਿ ਸਭਿ ਸੁਖ ਪਾਇਓ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਬਲਤੋ ਜਲਤੋ ਤਉਕਿਆ ਗੁਰ ਚੰਦਨੁ ਸੀਤਲਾਇਓ ॥੧॥
ਅਗਿਆਨ ਅੰਧੇਰਾ ਮਿਟਿ ਗਇਆ ਗੁਰ ਗਿਆਨੁ ਦੀਪਾਇਓ ॥੨॥
ਪਾਵਕੁ ਸਾਗਰੁ ਗਹਰੋ ਚਰਿ ਸੰਤਨ ਨਾਵ ਤਰਾਇਓ ॥੩॥
ਨਾ ਹਮ ਕਰਮ ਨ ਧਰਮ ਸੁਚ ਪ੍ਰਭਿ ਗਹਿ ਭੁਜਾ ਆਪਾਇਓ ॥੪॥
ਭਉ ਖੰਡਨੁ ਦੁਖ ਭੰਜਨੋ ਭਗਤਿ ਵਛਲ ਹਰਿ ਨਾਇਓ ॥੫॥
ਅਨਾਥਹ ਨਾਥ ਕ੍ਰਿਪਾਲ ਦੀਨ ਸੰਮ੍ਰਿਥ ਸੰਤ ਓਟਾਇਓ ॥੬॥
ਨਿਰਗੁਨੀਆਰੇ ਕੀ ਬੇਨਤੀ ਦੇਹੁ ਦਰਸੁ ਹਰਿ ਰਾਇਓ ॥੭॥
ਨਾਨਕ ਸਰਨਿ ਤੁਹਾਰੀ ਠਾਕੁਰ ਸੇਵਕੁ ਦੁਆਰੈ ਆਇਓ ॥੮॥੨॥੧੪॥
महला ५ गउड़ी ॥
हरि हरि गुरु गुरु करत भरम गए ॥
मेरै मनि सभि सुख पाइओ ॥१॥ रहाउ ॥
बलतो जलतो तउकिआ गुर चंदनु सीतलाइओ ॥१॥
अगिआन अंधेरा मिटि गइआ गुर गिआनु दीपाइओ ॥२॥
पावकु सागरु गहरो चरि संतन नाव तराइओ ॥३॥
ना हम करम न धरम सुच प्रभि गहि भुजा आपाइओ ॥४॥
भउ खंडनु दुख भंजनो भगति वछल हरि नाइओ ॥५॥
अनाथह नाथ क्रिपाल दीन संम्रिथ संत ओटाइओ ॥६॥
निरगुनीआरे की बेनती देहु दरसु हरि राइओ ॥७॥
नानक सरनि तुहारी ठाकुर सेवकु दुआरै आइओ ॥८॥२॥१४॥
हरि हरि गुरु गुरु करत भरम गए ॥
मेरै मनि सभि सुख पाइओ ॥१॥ रहाउ ॥
बलतो जलतो तउकिआ गुर चंदनु सीतलाइओ ॥१॥
अगिआन अंधेरा मिटि गइआ गुर गिआनु दीपाइओ ॥२॥
पावकु सागरु गहरो चरि संतन नाव तराइओ ॥३॥
ना हम करम न धरम सुच प्रभि गहि भुजा आपाइओ ॥४॥
भउ खंडनु दुख भंजनो भगति वछल हरि नाइओ ॥५॥
अनाथह नाथ क्रिपाल दीन संम्रिथ संत ओटाइओ ॥६॥
निरगुनीआरे की बेनती देहु दरसु हरि राइओ ॥७॥
नानक सरनि तुहारी ठाकुर सेवकु दुआरै आइओ ॥८॥२॥१४॥
हिन्दी अर्थ: महला ५ गउड़ी ॥ (हे भाई !) परमात्मा का नाम सिमरते हुए। गुरू गुरू करते हुए मेरे मन की सारी भटकनें दूर हो गई हैं। और मेरे मन ने सारे ही सुख प्राप्त कर लिए हैं। 1। रहाउ। (हे भाई ! मन विकारों में) जल रहा था, तप रहा था, (जब) गुरू का शबद रूपी चँदन (घिसा के इस पर) छिड़का, तो यह मन शीतल हो गया। 1। (हे भाई !मन विकारों में) सड़ रहा था। जल रहा था। (जब) गुरू का शबद-चंदन (घिसा के इस पर) छिड़का तो ये मन ठण्डा-ठार हो गया। 2। (हे भाई !) ये गहरा संसार-समुंद्र (विकारों की तपश से) आग (आग बना पड़ा था) मैं साध-संगति बेड़ी में चढ़ के इससे पार गुजर आया हूँ। 3। (हे भाई !) मेरे पास ना कोई कर्म। ना धर्म। ना पवित्रता (आदि राशि-पूँजी) थी। प्रभू ने मेरी बाँह पकड़ के (खुद ही मुझे) अपना (दास) बना लिया है। 4। (हे भाई !) भक्ति से प्यार करने वाले हरी का वह नाम जो हरेक किस्म का डर व दुख नाश करने में स्मर्थ है (मुझे उसकी अपनी मेहर से ही मिल गया है)। 5। हे अनाथों के नाथ ! हे दीनों पर दया करने वाले ! हे संतों के सहारे ! हे प्रभू पातशाह ! 6। मेरी गुण-हीन की विनती सुन। मुझे अपना दर्शन दे। 7। हे नानक ! (अरदास कर। और कह,) हे ठाकुर ! मैं तेरा सेवक तेरी शरण आया हूँ। तेरे दर पर आया हूँ। 8। 2। 14।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 241 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
Civil Services के interview के बाद का wait, घर का माहौल।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 43 पंक्तियों का है, 3 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 241” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 242 →, पीछे का: ← अंग 240।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।