अंग
257
राग Gauree
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਤ੍ਰਾਸ ਮਿਟੈ ਜਮ ਪੰਥ ਕੀ ਜਾਸੁ ਬਸੈ ਮਨਿ ਨਾਉ ॥
ਗਤਿ ਪਾਵਹਿ ਮਤਿ ਹੋਇ ਪ੍ਰਗਾਸ ਮਹਲੀ ਪਾਵਹਿ ਠਾਉ ॥
ਤਾਹੂ ਸੰਗਿ ਨ ਧਨੁ ਚਲੈ ਗ੍ਰਿਹ ਜੋਬਨ ਨਹ ਰਾਜ ॥
ਸੰਤਸੰਗਿ ਸਿਮਰਤ ਰਹਹੁ ਇਹੈ ਤੁਹਾਰੈ ਕਾਜ ॥
ਤਾਤਾ ਕਛੂ ਨ ਹੋਈ ਹੈ ਜਉ ਤਾਪ ਨਿਵਾਰੈ ਆਪ ॥
ਪ੍ਰਤਿਪਾਲੈ ਨਾਨਕ ਹਮਹਿ ਆਪਹਿ ਮਾਈ ਬਾਪ ॥੩੨॥
ਗਤਿ ਪਾਵਹਿ ਮਤਿ ਹੋਇ ਪ੍ਰਗਾਸ ਮਹਲੀ ਪਾਵਹਿ ਠਾਉ ॥
ਤਾਹੂ ਸੰਗਿ ਨ ਧਨੁ ਚਲੈ ਗ੍ਰਿਹ ਜੋਬਨ ਨਹ ਰਾਜ ॥
ਸੰਤਸੰਗਿ ਸਿਮਰਤ ਰਹਹੁ ਇਹੈ ਤੁਹਾਰੈ ਕਾਜ ॥
ਤਾਤਾ ਕਛੂ ਨ ਹੋਈ ਹੈ ਜਉ ਤਾਪ ਨਿਵਾਰੈ ਆਪ ॥
ਪ੍ਰਤਿਪਾਲੈ ਨਾਨਕ ਹਮਹਿ ਆਪਹਿ ਮਾਈ ਬਾਪ ॥੩੨॥
त्रास मिटै जम पंथ की जासु बसै मनि नाउ ॥
गति पावहि मति होइ प्रगास महली पावहि ठाउ ॥
ताहू संगि न धनु चलै ग्रिह जोबन नह राज ॥
संतसंगि सिमरत रहहु इहै तुहारै काज ॥
ताता कछू न होई है जउ ताप निवारै आप ॥
प्रतिपालै नानक हमहि आपहि माई बाप ॥३२॥
गति पावहि मति होइ प्रगास महली पावहि ठाउ ॥
ताहू संगि न धनु चलै ग्रिह जोबन नह राज ॥
संतसंगि सिमरत रहहु इहै तुहारै काज ॥
ताता कछू न होई है जउ ताप निवारै आप ॥
प्रतिपालै नानक हमहि आपहि माई बाप ॥३२॥
हिन्दी अर्थ: जिस मनुष्य के मन में प्रभू का नाम बस पड़े। उसका जमों के रास्ते का डर मिट जाता है (मौत का सहम खत्म हो जाता है)। (हे भाई ! नाम की बरकति से) उच्च आत्मिक अवस्था हासिल करेगा। तेरी बुद्धि रौशन हो जाएगी। प्रभू चरणों में तेरी सुरति टिकी रहेगी। धन-जवानी-राज किसी चीज ने भी तेरे साथ नहीं जाना; सत्संग में रहके प्रभू का नाम सिमरा कर। बस ! यही अंत में तेरे काम आएगा। (प्रभू का हो के रह) जब प्रभू स्वयं दुख-कलेश दूर करने वाला (सिर पर) हो तो कोई मानसिक कलेश नहीं रह सकता। हे नानक ! (कह,) प्रभू खुद माता-पिता की तरह हमारी पालना करता है। 32।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਥਾਕੇ ਬਹੁ ਬਿਧਿ ਘਾਲਤੇ ਤ੍ਰਿਪਤਿ ਨ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਲਾਥ ॥
ਸੰਚਿ ਸੰਚਿ ਸਾਕਤ ਮੂਏ ਨਾਨਕ ਮਾਇਆ ਨ ਸਾਥ ॥੧॥
ਥਾਕੇ ਬਹੁ ਬਿਧਿ ਘਾਲਤੇ ਤ੍ਰਿਪਤਿ ਨ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਲਾਥ ॥
ਸੰਚਿ ਸੰਚਿ ਸਾਕਤ ਮੂਏ ਨਾਨਕ ਮਾਇਆ ਨ ਸਾਥ ॥੧॥
सलोकु ॥
थाके बहु बिधि घालते त्रिपति न त्रिसना लाथ ॥
संचि संचि साकत मूए नानक माइआ न साथ ॥१॥
थाके बहु बिधि घालते त्रिपति न त्रिसना लाथ ॥
संचि संचि साकत मूए नानक माइआ न साथ ॥१॥
हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ हे नानक ! माया-ग्रसित जीव माया की खातिर कई तरह की दौड़-भाग करते हैं। पर संतुष्ट नहीं होते। तृष्णा खत्म नहीं होती। माया जोड़-जोड़ के आत्मिक मौत सहेड़ लेते हैं। माया भी साथ नहीं निभती। 1।
ਪਉੜੀ ॥
ਥਥਾ ਥਿਰੁ ਕੋਊ ਨਹੀ ਕਾਇ ਪਸਾਰਹੁ ਪਾਵ ॥
ਅਨਿਕ ਬੰਚ ਬਲ ਛਲ ਕਰਹੁ ਮਾਇਆ ਏਕ ਉਪਾਵ ॥
ਥੈਲੀ ਸੰਚਹੁ ਸ੍ਰਮੁ ਕਰਹੁ ਥਾਕਿ ਪਰਹੁ ਗਾਵਾਰ ॥
ਮਨ ਕੈ ਕਾਮਿ ਨ ਆਵਈ ਅੰਤੇ ਅਉਸਰ ਬਾਰ ॥
ਥਿਤਿ ਪਾਵਹੁ ਗੋਬਿਦ ਭਜਹੁ ਸੰਤਹ ਕੀ ਸਿਖ ਲੇਹੁ ॥
ਪ੍ਰੀਤਿ ਕਰਹੁ ਸਦ ਏਕ ਸਿਉ ਇਆ ਸਾਚਾ ਅਸਨੇਹੁ ॥
ਕਾਰਨ ਕਰਨ ਕਰਾਵਨੋ ਸਭ ਬਿਧਿ ਏਕੈ ਹਾਥ ॥
ਜਿਤੁ ਜਿਤੁ ਲਾਵਹੁ ਤਿਤੁ ਤਿਤੁ ਲਗਹਿ ਨਾਨਕ ਜੰਤ ਅਨਾਥ ॥੩੩॥
ਥਥਾ ਥਿਰੁ ਕੋਊ ਨਹੀ ਕਾਇ ਪਸਾਰਹੁ ਪਾਵ ॥
ਅਨਿਕ ਬੰਚ ਬਲ ਛਲ ਕਰਹੁ ਮਾਇਆ ਏਕ ਉਪਾਵ ॥
ਥੈਲੀ ਸੰਚਹੁ ਸ੍ਰਮੁ ਕਰਹੁ ਥਾਕਿ ਪਰਹੁ ਗਾਵਾਰ ॥
ਮਨ ਕੈ ਕਾਮਿ ਨ ਆਵਈ ਅੰਤੇ ਅਉਸਰ ਬਾਰ ॥
ਥਿਤਿ ਪਾਵਹੁ ਗੋਬਿਦ ਭਜਹੁ ਸੰਤਹ ਕੀ ਸਿਖ ਲੇਹੁ ॥
ਪ੍ਰੀਤਿ ਕਰਹੁ ਸਦ ਏਕ ਸਿਉ ਇਆ ਸਾਚਾ ਅਸਨੇਹੁ ॥
ਕਾਰਨ ਕਰਨ ਕਰਾਵਨੋ ਸਭ ਬਿਧਿ ਏਕੈ ਹਾਥ ॥
ਜਿਤੁ ਜਿਤੁ ਲਾਵਹੁ ਤਿਤੁ ਤਿਤੁ ਲਗਹਿ ਨਾਨਕ ਜੰਤ ਅਨਾਥ ॥੩੩॥
पउड़ी ॥
थथा थिरु कोऊ नही काइ पसारहु पाव ॥
अनिक बंच बल छल करहु माइआ एक उपाव ॥
थैली संचहु स्रमु करहु थाकि परहु गावार ॥
मन कै कामि न आवई अंते अउसर बार ॥
थिति पावहु गोबिद भजहु संतह की सिख लेहु ॥
प्रीति करहु सद एक सिउ इआ साचा असनेहु ॥
कारन करन करावनो सभ बिधि एकै हाथ ॥
जितु जितु लावहु तितु तितु लगहि नानक जंत अनाथ ॥३३॥
थथा थिरु कोऊ नही काइ पसारहु पाव ॥
अनिक बंच बल छल करहु माइआ एक उपाव ॥
थैली संचहु स्रमु करहु थाकि परहु गावार ॥
मन कै कामि न आवई अंते अउसर बार ॥
थिति पावहु गोबिद भजहु संतह की सिख लेहु ॥
प्रीति करहु सद एक सिउ इआ साचा असनेहु ॥
कारन करन करावनो सभ बिधि एकै हाथ ॥
जितु जितु लावहु तितु तितु लगहि नानक जंत अनाथ ॥३३॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी- हे मूर्ख ! किसी ने भी यहाँ सदा बैठे नहीं रहना। क्यूँ पैर पसार रहा है? (क्यूँ माया के पसारे पसार रहा है?) तू सिर्फ माया वास्ते ही कई पापड़ वेल रहा है। अनेकों ठॅगी-फरेब कर रहा है। हे मूर्ख ! तू धन जोड़ रहा है। (धन की खातिर) दौड़-भाग करता है। और थक-टूट जाता है। पर अंत के समय ये धन तेरी जिंद के काम नहीं आएगा। (हे भाई !) गुरमुखों की शिक्षा ध्यान से सुन। परमात्मा का भजन कर। आत्मिक शान्ति (तभी) मिलेगी। सदा सिर्फ परमात्मा से (दिल से) प्रीति बना। यही प्यार सदा कायम रहने वाला है। हरेक सबब तेरे हाथ में है। तू ही सब कुछ कर सकता है। (और जीव से) करवा सकता है। (पर) हे नानक ! (कह,हे प्रभू !) ये जीव बिचारे (माया के मुकाबले में बेबस) हैं। जिधर तू इन्हें लगाता है। उधर ही लगते हैं। 33।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਦਾਸਹ ਏਕੁ ਨਿਹਾਰਿਆ ਸਭੁ ਕਛੁ ਦੇਵਨਹਾਰ ॥
ਸਾਸਿ ਸਾਸਿ ਸਿਮਰਤ ਰਹਹਿ ਨਾਨਕ ਦਰਸ ਅਧਾਰ ॥੧॥
ਦਾਸਹ ਏਕੁ ਨਿਹਾਰਿਆ ਸਭੁ ਕਛੁ ਦੇਵਨਹਾਰ ॥
ਸਾਸਿ ਸਾਸਿ ਸਿਮਰਤ ਰਹਹਿ ਨਾਨਕ ਦਰਸ ਅਧਾਰ ॥੧॥
सलोकु ॥
दासह एकु निहारिआ सभु कछु देवनहार ॥
सासि सासि सिमरत रहहि नानक दरस अधार ॥१॥
दासह एकु निहारिआ सभु कछु देवनहार ॥
सासि सासि सिमरत रहहि नानक दरस अधार ॥१॥
हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ हे नानक ! प्रभू के सेवकों ने ये देख लिया है (ये निश्चय कर लिया है) कि हरेक दाति प्रभू खुद ही देने वाला है (इस वास्ते वह माया की टेक रखने की बजाय) प्रभू के दीदार को (अपनी जिंदगी का) आसरा बना के श्वास-श्वास उसे याद करते हैं। 1।
ਪਉੜੀ ॥
ਦਦਾ ਦਾਤਾ ਏਕੁ ਹੈ ਸਭ ਕਉ ਦੇਵਨਹਾਰ ॥
ਦੇਂਦੇ ਤੋਟਿ ਨ ਆਵਈ ਅਗਨਤ ਭਰੇ ਭੰਡਾਰ ॥
ਦੈਨਹਾਰੁ ਸਦ ਜੀਵਨਹਾਰਾ ॥
ਮਨ ਮੂਰਖ ਕਿਉ ਤਾਹਿ ਬਿਸਾਰਾ ॥
ਦੋਸੁ ਨਹੀ ਕਾਹੂ ਕਉ ਮੀਤਾ ॥
ਮਾਇਆ ਮੋਹ ਬੰਧੁ ਪ੍ਰਭਿ ਕੀਤਾ ॥
ਦਰਦ ਨਿਵਾਰਹਿ ਜਾ ਕੇ ਆਪੇ ॥ ਨਾਨਕ ਤੇ ਤੇ ਗੁਰਮੁਖਿ ਧ੍ਰਾਪੇ ॥੩੪॥
ਦਦਾ ਦਾਤਾ ਏਕੁ ਹੈ ਸਭ ਕਉ ਦੇਵਨਹਾਰ ॥
ਦੇਂਦੇ ਤੋਟਿ ਨ ਆਵਈ ਅਗਨਤ ਭਰੇ ਭੰਡਾਰ ॥
ਦੈਨਹਾਰੁ ਸਦ ਜੀਵਨਹਾਰਾ ॥
ਮਨ ਮੂਰਖ ਕਿਉ ਤਾਹਿ ਬਿਸਾਰਾ ॥
ਦੋਸੁ ਨਹੀ ਕਾਹੂ ਕਉ ਮੀਤਾ ॥
ਮਾਇਆ ਮੋਹ ਬੰਧੁ ਪ੍ਰਭਿ ਕੀਤਾ ॥
ਦਰਦ ਨਿਵਾਰਹਿ ਜਾ ਕੇ ਆਪੇ ॥ ਨਾਨਕ ਤੇ ਤੇ ਗੁਰਮੁਖਿ ਧ੍ਰਾਪੇ ॥੩੪॥
पउड़ी ॥
ददा दाता एकु है सभ कउ देवनहार ॥
देंदे तोटि न आवई अगनत भरे भंडार ॥
दैनहारु सद जीवनहारा ॥
मन मूरख किउ ताहि बिसारा ॥
दोसु नही काहू कउ मीता ॥
माइआ मोह बंधु प्रभि कीता ॥
दरद निवारहि जा के आपे ॥ नानक ते ते गुरमुखि ध्रापे ॥३४॥
ददा दाता एकु है सभ कउ देवनहार ॥
देंदे तोटि न आवई अगनत भरे भंडार ॥
दैनहारु सद जीवनहारा ॥
मन मूरख किउ ताहि बिसारा ॥
दोसु नही काहू कउ मीता ॥
माइआ मोह बंधु प्रभि कीता ॥
दरद निवारहि जा के आपे ॥ नानक ते ते गुरमुखि ध्रापे ॥३४॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी। एक प्रभू ही (ऐसा) दाता है जो सब जीवों को रिजक पहुँचाने के स्मर्थ है। उसके बेअंत खजाने भरे पड़े हैं। बाँटते हुए खजानों में कमी नहीं आती। जो सदा तेरे सिर पर मौजूद है हे मूर्ख मन ! तू सदा दातार को क्यूँ भुलाता है ? पर हे मित्र ! किसी जीव को ये दोष भी नहीं दिया जा सकता (कि माया के मोह में फंस के तू दातार को क्यूं बिसर रहा है। दरअसल बात ये है कि जीव के आत्मिक जीवन की राह में) प्रभू ने खुद ही माया के मोह के बाँध बना रखे हैं। हे नानक ! (कह,) हे प्रभू ! जिन लोगों के दिल में से तू खुद ही (माया के मोह की) चुभन दूर करता है। वह गुरू की शरण में पड़ कर माया की ओर से तृप्त हो जाते हैं (तृष्णा समाप्त कर लेते हैं)। 34।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਧਰ ਜੀਅਰੇ ਇਕ ਟੇਕ ਤੂ ਲਾਹਿ ਬਿਡਾਨੀ ਆਸ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਧਿਆਈਐ ਕਾਰਜੁ ਆਵੈ ਰਾਸਿ ॥੧॥
ਧਰ ਜੀਅਰੇ ਇਕ ਟੇਕ ਤੂ ਲਾਹਿ ਬਿਡਾਨੀ ਆਸ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਧਿਆਈਐ ਕਾਰਜੁ ਆਵੈ ਰਾਸਿ ॥੧॥
सलोकु ॥
धर जीअरे इक टेक तू लाहि बिडानी आस ॥
नानक नामु धिआईऐ कारजु आवै रासि ॥१॥
धर जीअरे इक टेक तू लाहि बिडानी आस ॥
नानक नामु धिआईऐ कारजु आवै रासि ॥१॥
हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ हे मेरी जिंदे ! सिर्फ परमात्मा का आसरा ले। उस के बगैर किसी और (की सहायता) की उम्मीद छोड़ दे। हे नानक ! सदा प्रभू की याद मन में बसानी चाहिए। हरेक काम सफल हो जाता है। 1।
ਪਉੜੀ ॥
ਧਧਾ ਧਾਵਤ ਤਉ ਮਿਟੈ ਸੰਤਸੰਗਿ ਹੋਇ ਬਾਸੁ ॥
ਧੁਰ ਤੇ ਕਿਰਪਾ ਕਰਹੁ ਆਪਿ ਤਉ ਹੋਇ ਮਨਹਿ ਪਰਗਾਸੁ ॥
ਧਨੁ ਸਾਚਾ ਤੇਊ ਸਚ ਸਾਹਾ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਪੂੰਜੀ ਨਾਮ ਬਿਸਾਹਾ ॥
ਧੀਰਜੁ ਜਸੁ ਸੋਭਾ ਤਿਹ ਬਨਿਆ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਸ੍ਰਵਨ ਜਿਹ ਸੁਨਿਆ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਜਿਹ ਘਟਿ ਰਹੇ ਸਮਾਈ ॥
ਨਾਨਕ ਤਿਹ ਜਨ ਮਿਲੀ ਵਡਾਈ ॥੩੫॥
ਧਧਾ ਧਾਵਤ ਤਉ ਮਿਟੈ ਸੰਤਸੰਗਿ ਹੋਇ ਬਾਸੁ ॥
ਧੁਰ ਤੇ ਕਿਰਪਾ ਕਰਹੁ ਆਪਿ ਤਉ ਹੋਇ ਮਨਹਿ ਪਰਗਾਸੁ ॥
ਧਨੁ ਸਾਚਾ ਤੇਊ ਸਚ ਸਾਹਾ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਪੂੰਜੀ ਨਾਮ ਬਿਸਾਹਾ ॥
ਧੀਰਜੁ ਜਸੁ ਸੋਭਾ ਤਿਹ ਬਨਿਆ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਸ੍ਰਵਨ ਜਿਹ ਸੁਨਿਆ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਜਿਹ ਘਟਿ ਰਹੇ ਸਮਾਈ ॥
ਨਾਨਕ ਤਿਹ ਜਨ ਮਿਲੀ ਵਡਾਈ ॥੩੫॥
पउड़ी ॥
धधा धावत तउ मिटै संतसंगि होइ बासु ॥
धुर ते किरपा करहु आपि तउ होइ मनहि परगासु ॥
धनु साचा तेऊ सच साहा ॥
हरि हरि पूंजी नाम बिसाहा ॥
धीरजु जसु सोभा तिह बनिआ ॥
हरि हरि नामु स्रवन जिह सुनिआ ॥
गुरमुखि जिह घटि रहे समाई ॥
नानक तिह जन मिली वडाई ॥३५॥
धधा धावत तउ मिटै संतसंगि होइ बासु ॥
धुर ते किरपा करहु आपि तउ होइ मनहि परगासु ॥
धनु साचा तेऊ सच साहा ॥
हरि हरि पूंजी नाम बिसाहा ॥
धीरजु जसु सोभा तिह बनिआ ॥
हरि हरि नामु स्रवन जिह सुनिआ ॥
गुरमुखि जिह घटि रहे समाई ॥
नानक तिह जन मिली वडाई ॥३५॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी- यदि संतों की संगत में उठना-बैठना हो जाए। तो (माया की खातिर मन की बेसब्री वाली) भटकना मिट जाती है। (पर ये कोई आसान खेल नहीं। हे प्रभू !) जिस जीव पर तू अपने दर से मेहर करता है। उसके मन में जीवन की सही सूझ पड़ती है (और उसकी भटकना समाप्त होती है)। (उसे ये ज्ञान होता है) कि असल सच्चे शाहूकार वे हैं (जिनके पास) सदा स्थिर रहने वाला नाम-धन है। जो हरी-नाम की पूँजी का व्यापार करते हैं। उनके अंदर गंभीरता आती है। वे आदर सत्कार कमाते हैं। जो लोग हरी नाम (ध्यान से) कानों से सुनते हैं। हे नानक ! गुरू के द्वारा जिनके हृदय में प्रभू का नाम बसता है। उन्हें (लोक-परलोक में) मान-सम्मान प्राप्त होता है। 35।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਨਾਮੁ ਜਪੁ ਜਪਿਆ ਅੰਤਰਿ ਬਾਹਰਿ ਰੰਗਿ ॥
ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਉਪਦੇਸਿਆ ਨਰਕੁ ਨਾਹਿ ਸਾਧਸੰਗਿ ॥੧॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਨਾਮੁ ਜਪੁ ਜਪਿਆ ਅੰਤਰਿ ਬਾਹਰਿ ਰੰਗਿ ॥
ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਉਪਦੇਸਿਆ ਨਰਕੁ ਨਾਹਿ ਸਾਧਸੰਗਿ ॥੧॥
सलोकु ॥
नानक नामु नामु जपु जपिआ अंतरि बाहरि रंगि ॥
गुरि पूरै उपदेसिआ नरकु नाहि साधसंगि ॥१॥
नानक नामु नामु जपु जपिआ अंतरि बाहरि रंगि ॥
गुरि पूरै उपदेसिआ नरकु नाहि साधसंगि ॥१॥
हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ हे नानक ! जिन लोगों ने काम काज करते हुए प्यार से प्रभू का नाम ही जपा है (कभी भी भूले नहीं) उन्हें पूरे गुरू ने परमात्मा अपने नजदीक दिखा दिया है। गुरू की संगति में रह के उन्हें घोर दुख नहीं होता। 1।
ਪਉੜੀ ॥
ਨੰਨਾ ਨਰਕਿ ਪਰਹਿ ਤੇ ਨਾਹੀ ॥ ਜਾ ਕੈ ਮਨਿ ਤਨਿ ਨਾਮੁ ਬਸਾਹੀ ॥
ਨਾਮੁ ਨਿਧਾਨੁ ਗੁਰਮੁਖਿ ਜੋ ਜਪਤੇ ॥
ਬਿਖੁ ਮਾਇਆ ਮਹਿ ਨਾ ਓਇ ਖਪਤੇ ॥
ਨੰਨਾਕਾਰੁ ਨ ਹੋਤਾ ਤਾ ਕਹੁ ॥ ਨਾਮੁ ਮੰਤ੍ਰੁ ਗੁਰਿ ਦੀਨੋ ਜਾ ਕਹੁ ॥
ਨੰਨਾ ਨਰਕਿ ਪਰਹਿ ਤੇ ਨਾਹੀ ॥ ਜਾ ਕੈ ਮਨਿ ਤਨਿ ਨਾਮੁ ਬਸਾਹੀ ॥
ਨਾਮੁ ਨਿਧਾਨੁ ਗੁਰਮੁਖਿ ਜੋ ਜਪਤੇ ॥
ਬਿਖੁ ਮਾਇਆ ਮਹਿ ਨਾ ਓਇ ਖਪਤੇ ॥
ਨੰਨਾਕਾਰੁ ਨ ਹੋਤਾ ਤਾ ਕਹੁ ॥ ਨਾਮੁ ਮੰਤ੍ਰੁ ਗੁਰਿ ਦੀਨੋ ਜਾ ਕਹੁ ॥
पउड़ी ॥
नंना नरकि परहि ते नाही ॥ जा कै मनि तनि नामु बसाही ॥
नामु निधानु गुरमुखि जो जपते ॥
बिखु माइआ महि ना ओइ खपते ॥
नंनाकारु न होता ता कहु ॥ नामु मंत्रु गुरि दीनो जा कहु ॥
नंना नरकि परहि ते नाही ॥ जा कै मनि तनि नामु बसाही ॥
नामु निधानु गुरमुखि जो जपते ॥
बिखु माइआ महि ना ओइ खपते ॥
नंनाकारु न होता ता कहु ॥ नामु मंत्रु गुरि दीनो जा कहु ॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी- वे घोर दुखों के गड्ढे में नहीं पड़ते। जिनके मन में तन में प्रभू का नाम बसा रहता है जो लोग गुरू के द्वारा प्रभू नाम को सब पदार्थों का खजाना जान के जपते हैं। वह (फिर) आत्मिक मौत मरने वाली माया (के मोह) में (दौड़-भाग करते) नहीं खपते। उनके जीवन-सफर में (माया) कोई रोक नहीं डाल सकती। जिन्हें गुरू ने नाम मंत्र दे दिया।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 257 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
Old Delhi के Karim’s में दोपहर का खाना, और बीच में मौन-सा एक pause।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 49 पंक्तियों का है, 9 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 257” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 258 →, पीछे का: ← अंग 256।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।