जल जो प्राण ले लेता था
वनवास का बारहवाँ बरस अपने अन्तिम दिनों में था, और पाण्डव अब उस थकान को जानते थे जो वर्षों जंगल में काटने से हड्डियों तक उतर आती है। उसी सन्धि-बेला में, जब कुछ ही महीने बचे थे और तेरहवें बरस का अज्ञातवास सामने मुँह बाए खड़ा था, एक छोटी-सी घटना उन्हें उनकी सबसे अनोखी परीक्षा तक खींच ले गई। पास के आश्रम में रहने वाले एक ब्राह्मण की अरणि, यज्ञ की वह दो काठें जिन्हें रगड़ कर पवित्र अग्नि जगाई जाती है, एक हिरन के सींगों में उलझ गई थीं, और वह मृग उन्हें ले कर जंगल में कूद पड़ा था। ब्राह्मण व्याकुल हो कर पाण्डवों के पास आया, क्योंकि उन काठों के बिना उसका हवन रुक जाता।
धर्म के पालक युधिष्ठिर के लिए यह छोटी बात नहीं थी। एक ब्राह्मण का यज्ञ रुक जाए, यह उन्हें स्वीकार नहीं था। पाँचों भाई धनुष उठा कर उस हिरन के पीछे दौड़ पड़े। पर वह कोई साधारण मृग नहीं था। वह सामने आता, फिर ओझल हो जाता; तीर की दूरी पर ठहरता, और जैसे ही प्रत्यंचा खिंचती, छलाँग लगा कर और गहरे वन में समा जाता। घण्टों वे उसके पीछे भटकते रहे, और एक समय वह बिलकुल ही लुप्त हो गया, मानो कभी था ही नहीं। पीछे रह गई केवल पाँच थके हुए शरीरों की हाँफती साँसें, और एक ऐसी प्यास जो धीरे-धीरे हर सोच पर भारी पड़ने लगी थी।
वे एक घने पेड़ की छाँव में बैठ गए। धूप सिर पर थी, गला काँटा हो रहा था, और उस सन्नाटे में किसी पक्षी की दूर की पुकार भी पानी की याद दिला जाती थी। युधिष्ठिर ने सबसे छोटे, माद्री के पुत्र नकुल की ओर देखा। बेटा, उन्होंने कहा, इस पेड़ पर चढ़ कर चारों ओर देखो। कहीं कोई जलाशय, कोई हरियाली, कोई संकेत दिखे तो बताओ। ये तुम्हारे भाई प्यास से व्याकुल हैं।
पहला, और फिर दूसरा
नकुल फुर्ती से ऊपर चढ़े और दूर तक नज़र दौड़ाई। थोड़ी ही दूरी पर हरियाली का एक टुकड़ा था, और उसमें सारसों की पुकार सुनाई दे रही थी, वह पुकार जो केवल पानी के पास उठती है। उन्होंने नीचे उतर कर बताया, और युधिष्ठिर के चेहरे पर राहत की एक रेखा आई। जाओ, उन्होंने कहा, जल्दी से सबके लिए पानी ले आओ; अपने उत्तरीय में भर लाना।
नकुल तेज़ क़दमों से उस सरोवर तक पहुँचे। पानी इतना निर्मल था कि तल तक दिखता था, और किनारे पर सारस चहल-क़दमी कर रहे थे। प्यास ने उन्हें खींचा, और वे झुके। पर जैसे ही उनका हाथ जल को छूने को बढ़ा, हवा में से एक स्वर उभरा, गम्भीर और स्थिर, जैसे आकाश स्वयं बोल रहा हो। ठहर जाइए, उस स्वर ने कहा। यह सरोवर मेरा है। पहले मेरे प्रश्नों का उत्तर दीजिए, फिर पानी लीजिए। पर नकुल की प्यास उस चेतावनी से बड़ी थी। उन्होंने सोचा, यह कोई भ्रम होगा, और अंजुलि भर कर जल पी लिया। अगले ही क्षण उनके अंग शिथिल हुए, और वे उसी किनारे पर गिर पड़े, मानो किसी ने भीतर का दीपक बुझा दिया हो।
इधर समय बीतता रहा और नकुल लौटे नहीं। युधिष्ठिर ने सहदेव को भेजा। वे उसी राह पर गए, और तट पर पहुँचते ही ठिठक गए, उनका भाई वहीं पड़ा था, निश्चल। शोक और प्यास एक साथ उनके भीतर उमड़े। उन्होंने सोचा, पहले भाई को पानी के छींटे दूँ, पर उससे पहले अपना गला तर कर लूँ। और जैसे ही वे झुके, वही स्वर फिर उभरा, वही चेतावनी। सहदेव ने भी उसे अनसुना किया, जल पिया, और भाई के पास ही धरती पर लेट गए।

धनुष भी काम न आया
अब युधिष्ठिर का मन और भी अशान्त हुआ। दोनों गए और कोई न लौटा। उन्होंने अर्जुन से कहा, तुम जाओ, और सावधान रहना; कुछ अनहोनी है उस जल के पास। अर्जुन गाण्डीव सँभाले, बाण चढ़ाए, हर दिशा पर नज़र रखते हुए पहुँचे। तट पर अपने दोनों भाइयों को पड़ा देख कर उनका रक्त खौल उठा। तभी वह स्वर आया, वही प्रश्नों की शर्त। अर्जुन ने ललकारा, कौन हो तुम, सामने आओ; और उन्होंने उस दिशा में बाणों की झड़ी छोड़ दी जहाँ से आवाज़ आई थी। पर शब्दों को तीर कहाँ बेध पाते हैं। स्वर शान्त भाव से फिर बोला, पहले उत्तर, फिर जल। प्यास से सूखते अर्जुन ने भी अन्ततः वही किया जो उनके भाइयों ने किया था, और वह महान धनुर्धर भी उसी तट पर ढह गया।
तीन भाई लौट नहीं आए, तो भीम उठे। बल के उस पर्वत को विश्वास था कि जो भी संकट हो, वह उससे भिड़ लेंगे। तट पर पहुँचे, तीनों भाइयों को निश्चल देखा, और क्रोध से भर उठे, अवश्य कोई यक्ष या राक्षस है जिसने यह किया है; उसे ढूँढ़ कर अभी दण्ड दूँगा। पर पहले यह असह्य प्यास। वही स्वर, वही चेतावनी, और भीम का वही उत्तर जो बल को अक्सर सूझता है, कि पहले अपनी ज़रूरत, फिर बाक़ी बातें। उन्होंने जल पिया, और गदा सँभाले वह विशाल शरीर भी अपने भाइयों के बीच जा गिरा। अब उस सरोवर के किनारे चार पाण्डव पड़े थे, और कहीं कोई आवाज़, कोई हलचल नहीं थी।
और तब बड़ा भाई आया
बहुत देर तक जब कोई न लौटा, तो युधिष्ठिर स्वयं उठे। हर क़दम के साथ मन में एक भारी आशंका बढ़ती जा रही थी। वन को चीरते हुए वे उस सरोवर तक पहुँचे, और जो दृश्य सामने आया उसने उन्हें जड़ कर दिया। उनके चारों भाई, जिनके सामने बड़े-बड़े योद्धा नहीं टिकते थे, उस जल के किनारे पड़े थे, मानो गहरी नींद में हों। पर वह नींद नहीं थी। न कोई कराह, न साँस की कोई आहट, न पीड़ा का कोई चिह्न। उनके शरीरों पर न कोई घाव था, न संघर्ष का कोई निशान। यही बात युधिष्ठिर को सबसे अधिक बेचैन कर गई, क्योंकि जो बिना युद्ध के इन चारों को सुला सकता है, वह कोई सामान्य शक्ति नहीं हो सकती।
उनकी आँखें भर आईं। यही वे भाई थे जिनके बल पर वे अपना खोया राज्य फिर पाने का स्वप्न देखते थे, और आज वे एक तालाब के तट पर निढाल पड़े थे। शोक की उस लहर के बीच भी एक प्रश्न उनके मन में उठ रहा था, यह हुआ कैसे। तभी, मानो उत्तर देने ही, वही स्वर हवा में उभरा।
मैंने ही इन्हें रोका था, उस स्वर ने कहा, और बार-बार रोका था। पर इन्होंने मेरी बात नहीं सुनी, और बिना उत्तर दिए जल पी लिया, इसलिए ये यहाँ सो गए। यह सरोवर मेरा है। आप भी यदि बिना मेरे प्रश्नों का उत्तर दिए पानी को छुएँगे, तो आपकी भी यही गति होगी।
युधिष्ठिर ने इधर-उधर देखा। जल के पास एक क्रौंच पक्षी खड़ा था, और स्वर मानो उसी से निकल रहा था। पर इस बार न युधिष्ठिर के भीतर क्रोध था, न ललकार। उनके मन में बस एक स्वीकार था, कि जो शक्ति बिना छुए चार महारथियों को सुला सकती है, उससे भिड़ने में नहीं, उसका सम्मान करने में बुद्धिमानी है। उन्होंने हाथ जोड़ लिए। जो आपका है उसे मैं बलपूर्वक नहीं लूँगा, उन्होंने शान्त स्वर में कहा। आप पूछिए। जितनी मुझ में समझ है, उतना उत्तर दूँगा।

वे प्रश्न, जो आज भी पूछे जाते हैं
और तब वह अनोखा संवाद आरम्भ हुआ, जिसमें न कोई अस्त्र था, न कोई गर्जना, केवल प्रश्न और उत्तर। यक्ष पूछता गया, अक्सर एक साँस में कई-कई बातें, और युधिष्ठिर उत्तर देते गए, हर बार थोड़े-से शब्दों में, पर हर उत्तर जैसे जीवन की किसी छिपी हुई गाँठ पर ठीक उँगली रख देता।
पृथ्वी से भी भारी क्या है, यक्ष ने पूछा। माता, युधिष्ठिर ने कहा, क्योंकि वह अपने भीतर एक पूरे जीवन का भार उठाती है। आकाश से ऊँचा क्या है? पिता, जिसकी छाया तले मनुष्य सबसे ऊँचा अनुभव करता है। हवा से भी तेज़ कौन है? मन, जो पलक झपकते संसार के एक छोर से दूसरे छोर पहुँच जाता है। और सूखी घास के तिनकों से भी अधिक संख्या में इस धरती पर क्या है? मनुष्य की चिन्ताएँ, जो गिनी ही नहीं जा सकतीं।
यक्ष ने आगे बढ़ाया। ऐसा कौन है जो सोते हुए भी आँखें नहीं मूँदता? मछली, युधिष्ठिर ने कहा। जन्म ले कर भी जो हिलता-डुलता नहीं? अण्डा। और किसका साथी कौन, यह बताइए। परदेस जाने वाले का साथी उसकी विद्या है, उन्होंने कहा; घर में गृहस्थ का साथी उसकी पत्नी है; रोगी का साथी वैद्य है; और जो जीवन के अन्तिम छोर पर खड़ा है, मरते हुए मनुष्य का साथी, उसका दान और उसका धर्म है, और कुछ साथ नहीं जाता।
फिर यक्ष ने वह प्रश्न पूछा जो शायद सबसे अधिक दुहराया गया है। इस संसार में सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है? युधिष्ठिर ठहरे, और फिर बोले, हर दिन, अपनी आँखों के सामने, मनुष्य प्राणियों को मृत्यु के घर जाते देखता है। एक के बाद एक, अनगिनत। और फिर भी जो बचे रह जाते हैं, वे जीते ऐसे हैं मानो उन्हें कभी मरना ही नहीं। इससे बड़ा आश्चर्य और क्या होगा। यक्ष कुछ क्षण मौन रहा, क्योंकि यह उत्तर केवल चतुराई नहीं था, यह एक दर्पण था।
और संसार का समाचार क्या है, यक्ष ने पूछा, इस दुनिया में सचमुच चल क्या रहा है? युधिष्ठिर का उत्तर एक चित्र की तरह था। यह संसार एक विशाल कड़ाही है, उन्होंने कहा; सूर्य उसकी आग है, दिन और रात उसका ईंधन हैं, और महीने तथा ऋतुएँ वह करछुल हैं जिनसे काल इस कड़ाही को चलाता रहता है, और सब प्राणियों को धीरे-धीरे पकाता रहता है। यही इस संसार का सच्चा समाचार है।
धर्म का मार्ग कौन-सा है, यक्ष ने पूछा, जब तर्क की हर राह दूसरी से टकराती है? युधिष्ठिर ने कहा, तर्क की कोई निश्चित पगडण्डी नहीं; शास्त्र भी आपस में भिन्न बोलते हैं; और कोई एक ऋषि ऐसा नहीं जिसका वचन ही अन्तिम हो। धर्म का मर्म तो किसी गुफ़ा में छिपा है। इसलिए सच्चा मार्ग वही है जिस पर बड़े और सच्चे लोग चल चुके हैं; उन्हीं के पदचिह्नों का अनुसरण करना धर्म है।

मनुष्य ब्राह्मण किससे होता है, यक्ष ने पूछा, जन्म से, अध्ययन से, या किसी और कारण से? युधिष्ठिर ने स्पष्ट कहा, न जन्म से, न केवल शास्त्र पढ़ लेने से। शील और आचरण ही मनुष्य को ऊँचा बनाते हैं। जिसका स्वभाव खोटा है, वह चाहे कितने ही ऊँचे कुल में जन्मा हो और कितना ही पढ़ा हो, वह ऊँचा नहीं; और जिसका आचरण निर्मल है, वही श्रेष्ठ है।
और अन्त में यक्ष ने वे प्रश्न रखे जो सबसे सरल लगते हैं और सबसे गहरे हैं। किस एक वस्तु को छोड़ देने से मनुष्य सबको प्रिय हो जाता है? अहंकार को, युधिष्ठिर ने कहा। किसे छोड़ कर वह कभी शोक नहीं करता? क्रोध को। किसे त्याग कर वह धनवान कहलाता है? कामना को, क्योंकि जिसकी इच्छाएँ थम गईं, उससे बड़ा धनी कौन। और किसे छोड़ कर मनुष्य सुखी होता है? लोभ को; लोभ के छूटते ही सुख स्वयं चला आता है।
प्रश्न दर प्रश्न चलते रहे, और हर उत्तर के साथ वह स्वर थोड़ा और कोमल होता गया। क्योंकि सामने कोई हड़बड़ाया हुआ, प्यास से बेहाल आदमी नहीं बोल रहा था; एक ऐसा मन बोल रहा था जो प्राणों के संकट के बीच भी ठहरा हुआ था, और यही ठहराव ही सबसे बड़ा उत्तर था।
एक भाई, और एक चुनाव
जब हर उत्तर सही निकला, तो यक्ष का स्वर प्रसन्नता से भर उठा। मैं तुम्हारे उत्तरों से तृप्त हूँ, उसने कहा। एक वर दूँगा, तुम्हारे इन चार भाइयों में से किसी एक को मैं जीवित कर दूँगा। जिसे चाहो, चुन लो। युधिष्ठिर एक क्षण रुके, और फिर बिना डगमगाए बोले, नकुल जी उठें।
इस उत्तर पर यक्ष सचमुच चौंका। यह तो विचित्र है, उसने कहा। भीम, जिसका बल दस हज़ार हाथियों के बराबर है; अर्जुन, जिसके धनुष पर तुम्हारा खोया राज्य टिका है, इन्हें छोड़ कर तुम नकुल को माँग रहे हो? जिन भाइयों की सबसे अधिक आवश्यकता तुम्हें आगे की लड़ाई में होगी, उन्हें छोड़ कर यह चुनाव क्यों?
युधिष्ठिर का उत्तर ही उनकी सबसे बड़ी परीक्षा का असली उत्तर था। मेरे पिता की दो पत्नियाँ थीं, उन्होंने कहा, कुन्ती और माद्री, और दोनों मेरे लिए समान हैं। कुन्ती का एक पुत्र, मैं स्वयं, जीवित खड़ा हूँ। न्याय यही कहता है कि माद्री का भी एक पुत्र जीवित रहे। मैं अपने और पराये में, अपनी माँ और दूसरी माँ में भेद नहीं कर सकता। इसीलिए मैं नकुल को माँगता हूँ। बल से बड़ा मेरे लिए यह सम होकर रहना है।

यही वाक्य सुनते ही वाणी की सारी कठोरता पिघल गई।
और तब, पिता प्रकट हुए
वह क्रौंच पक्षी, वह अदृश्य यक्ष, अब अपने असली रूप में प्रकट हुआ। वह कोई और नहीं था, स्वयं धर्म, युधिष्ठिर के पिता। यह सारा प्रसंग, यह प्यास, यह सरोवर, ये प्रश्न, सब एक परीक्षा थी, यह देखने के लिए कि प्राणों के संकट के बीच भी यह पुत्र धर्म पर टिका रहता है या नहीं। और पुत्र टिका रहा था, हर प्रश्न पर, और सबसे बड़े प्रश्न, उस चुनाव पर भी।
धर्म ने एक दृष्टि डाली, और चारों भाई उठ बैठे, मानो किसी गहरी नींद से जागे हों। प्यास, थकान, मृत्यु का वह छुअन, सब उतर गया। फिर पिता ने प्रसन्न हो कर पुत्र को वर माँगने को कहा, और युधिष्ठिर ने वही माँगा जो उनके स्वभाव की गहराई से निकला, कि लोभ, मोह और क्रोध पर उनका संयम बना रहे, और दान, तप तथा सत्य में उनका मन सदा डूबा रहे। धर्म ने एक और आशीर्वाद दिया, उस आने वाले तेरहवें बरस के अज्ञातवास का, कि वे पहचाने न जाएँगे और सकुशल उसे पार कर लेंगे।
इतना कह कर धर्म अन्तर्धान हो गए। पाँचों भाई फिर एक हुए, अरणि की वे काठें ले कर वे उस ब्राह्मण के पास लौटे और उसका रुका हुआ यज्ञ फिर से जुड़ गया। पर जो वे अपने साथ ले गए वह केवल लकड़ी की दो काठें नहीं थीं। वे यह जान कर लौटे थे कि जीवन की सबसे कठिन परीक्षा अक्सर हथियार से नहीं, एक ठहरे हुए और सच्चे उत्तर से जीती जाती है; और कि न्याय का असली रूप वहीं दिखता है जहाँ अपने और पराये का अन्तर मिट जाता है। यही यक्ष-प्रश्न का मर्म है, और शायद इसीलिए यह छोटी-सी कथा इतने बरसों बाद भी हर बार नई लगती है।
यह कथा महाभारत के वन पर्व (आरण्यक पर्व) के यक्ष-प्रश्न प्रसंग पर आधारित है, विस्तृत कहानी-रूप में, मूल कथा-क्रम और संवाद का अनुसरण करते हुए।