अंग 194

अंग
194
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਕਰੈ ਦੁਹਕਰਮ ਦਿਖਾਵੈ ਹੋਰੁ ॥
ਰਾਮ ਕੀ ਦਰਗਹ ਬਾਧਾ ਚੋਰੁ ॥੧॥
ਰਾਮੁ ਰਮੈ ਸੋਈ ਰਾਮਾਣਾ ॥
ਜਲਿ ਥਲਿ ਮਹੀਅਲਿ ਏਕੁ ਸਮਾਣਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਅੰਤਰਿ ਬਿਖੁ ਮੁਖਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਸੁਣਾਵੈ ॥
ਜਮ ਪੁਰਿ ਬਾਧਾ ਚੋਟਾ ਖਾਵੈ ॥੨॥
ਅਨਿਕ ਪੜਦੇ ਮਹਿ ਕਮਾਵੈ ਵਿਕਾਰ ॥
ਖਿਨ ਮਹਿ ਪ੍ਰਗਟ ਹੋਹਿ ਸੰਸਾਰ ॥੩॥
ਅੰਤਰਿ ਸਾਚਿ ਨਾਮਿ ਰਸਿ ਰਾਤਾ ॥
ਨਾਨਕ ਤਿਸੁ ਕਿਰਪਾਲੁ ਬਿਧਾਤਾ ॥੪॥੭੧॥੧੪੦॥
गउड़ी महला ५ ॥
करै दुहकरम दिखावै होरु ॥
राम की दरगह बाधा चोरु ॥१॥
रामु रमै सोई रामाणा ॥
जलि थलि महीअलि एकु समाणा ॥१॥ रहाउ ॥
अंतरि बिखु मुखि अंम्रितु सुणावै ॥
जम पुरि बाधा चोटा खावै ॥२॥
अनिक पड़दे महि कमावै विकार ॥
खिन महि प्रगट होहि संसार ॥३॥
अंतरि साचि नामि रसि राता ॥
नानक तिसु किरपालु बिधाता ॥४॥७१॥१४०॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ (पर~ जो सिमरन-हीन मनुष्य राम को सर्व-व्यापक नहीं प्रतीत करता~ वह अंदर छुप के) बुरे कर्म कमाता है (बाहर जगत को अपने जीवन का) दूसरा पक्ष दिखाता है (जैसे चोर सेंध में रंगे हाथों पकड़ा जाता है~ और फंस जाता है~ वैसे ही) वह परमातमा की दरगाह में चोर की भांति बांधा जाता है। 1। (हे भाई !) वही मनुष्य राम का (सेवक माना जाता है) जो राम को सिमरता है। (उस मनुष्य को निश्चय हो जाता है कि) राम~ जल में~ धरती में~ आकाश में हर जगह व्यापक है। 1। रहाउ। (सिमरन-हीन रह के) परमात्मा को हर जगह ना बसता जानने वाला मनुष्य अपने मुंह से (लोगों को) आत्मिक जीवन देने वाला उपदेश सुनाता है (पर उसके) अंदर (विकारों की) जहर है। (जिसने उसके अपने आत्मिक जीवन को मार दिया है~ ऐसा मनुष्य) यम की पुरी में बाँधा हुआ चोटें खाता है (आत्मिक मौत के वश में पड़ा अनेको विकारों की चोटें सहता हैं)। 2। (सिमरन-हीन मनुष्य परमात्मा को अंग-संग ना जानता हुआ) अनेकों पदार्थों पीछे (लोगों से छुपा के) विकार कर्म कमाता है~ पर (उसके कुकर्म) जगत के अंदर एक छिन में ही प्रगट हो जाते हैं। 3। हे नानक ! जो मनुष्य अपने अंदर सदा स्थिर हरी नाम में जुड़ा रहता है~ परमात्मा के प्रेम-रस में भीगा रहता है~ सृजनहार प्रभू उस पर दयावान होता है। 4। 71। 140।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਰਾਮ ਰੰਗੁ ਕਦੇ ਉਤਰਿ ਨ ਜਾਇ ॥
ਗੁਰੁ ਪੂਰਾ ਜਿਸੁ ਦੇਇ ਬੁਝਾਇ ॥੧॥
ਹਰਿ ਰੰਗਿ ਰਾਤਾ ਸੋ ਮਨੁ ਸਾਚਾ ॥
ਲਾਲ ਰੰਗ ਪੂਰਨ ਪੁਰਖੁ ਬਿਧਾਤਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸੰਤਹ ਸੰਗਿ ਬੈਸਿ ਗੁਨ ਗਾਇ ॥
ਤਾ ਕਾ ਰੰਗੁ ਨ ਉਤਰੈ ਜਾਇ ॥੨॥
ਬਿਨੁ ਹਰਿ ਸਿਮਰਨ ਸੁਖੁ ਨਹੀ ਪਾਇਆ ॥
ਆਨ ਰੰਗ ਫੀਕੇ ਸਭ ਮਾਇਆ ॥੩॥
ਗੁਰਿ ਰੰਗੇ ਸੇ ਭਏ ਨਿਹਾਲ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਗੁਰ ਭਏ ਹੈ ਦਇਆਲ ॥੪॥੭੨॥੧੪੧॥
गउड़ी महला ५ ॥
राम रंगु कदे उतरि न जाइ ॥
गुरु पूरा जिसु देइ बुझाइ ॥१॥
हरि रंगि राता सो मनु साचा ॥
लाल रंग पूरन पुरखु बिधाता ॥१॥ रहाउ ॥
संतह संगि बैसि गुन गाइ ॥
ता का रंगु न उतरै जाइ ॥२॥
बिनु हरि सिमरन सुखु नही पाइआ ॥
आन रंग फीके सभ माइआ ॥३॥
गुरि रंगे से भए निहाल ॥
कहु नानक गुर भए है दइआल ॥४॥७२॥१४१॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ (हे भाई !) परमात्मा के प्यार का रंग ~ कभी (उस मन से) उतरता नहीं (अगर किसी भाग्यशाली के मन पर चढ़ जाए तो फिर) दूर नहीं होता। 1। जो मन परमात्मा के प्रेम-रंग में रंगा जाता है~ उस पर (माया का) कोई और रंग अपना असर नहीं डाल सकता~ वह (मानो) गहरे लाल रंग वाला हो जाता है~ वह सर्व-व्यापक सृजनहार का रूप हो जाता है। 1। रहाउ। (हे भाई ! जो मनुष्य) संत जनों की संगति में बैठ के परमात्मा के गुण गाता है (सिफत सालाह करता है~ उसके मन को परमात्मा के प्यार का रंग चढ़ जाता है~ और) उसका वह रंग कभी नहीं उतरता। 2। (हे भाई !) परमात्मा का नाम सिमरे बिना (कभी किसी ने) आत्मिक आनंद नहीं पाया। (हे भाई !) माया (के स्वादों) के अन्य सभी रंग उतर जाते हैं (माया के स्वादों से मिलने वाले सुख होछे होते हैं)। 3। जिन्हें गुरू ने परमात्मा के प्रेम रंग में रंग दिया है~वह सदा खिले जीवन वाले रहते हैं। हे नानक ! कह, जिन पे सतिगुरू जी दयावान होते हैं 4। 72। 141।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਸਿਮਰਤ ਸੁਆਮੀ ਕਿਲਵਿਖ ਨਾਸੇ ॥
ਸੂਖ ਸਹਜ ਆਨੰਦ ਨਿਵਾਸੇ ॥੧॥
ਰਾਮ ਜਨਾ ਕਉ ਰਾਮ ਭਰੋਸਾ ॥
ਨਾਮੁ ਜਪਤ ਸਭੁ ਮਿਟਿਓ ਅੰਦੇਸਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਕਛੁ ਭਉ ਨ ਭਰਾਤੀ ॥
ਗੁਣ ਗੋਪਾਲ ਗਾਈਅਹਿ ਦਿਨੁ ਰਾਤੀ ॥੨॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਪ੍ਰਭ ਬੰਧਨ ਛੋਟ ॥
ਚਰਣ ਕਮਲ ਕੀ ਦੀਨੀ ਓਟ ॥੩॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਮਨਿ ਭਈ ਪਰਤੀਤਿ ॥ ਨਿਰਮਲ ਜਸੁ ਪੀਵਹਿ ਜਨ ਨੀਤਿ ॥੪॥੭੩॥੧੪੨॥
गउड़ी महला ५ ॥
सिमरत सुआमी किलविख नासे ॥
सूख सहज आनंद निवासे ॥१॥
राम जना कउ राम भरोसा ॥
नामु जपत सभु मिटिओ अंदेसा ॥१॥ रहाउ ॥
साधसंगि कछु भउ न भराती ॥
गुण गोपाल गाईअहि दिनु राती ॥२॥
करि किरपा प्रभ बंधन छोट ॥
चरण कमल की दीनी ओट ॥३॥
कहु नानक मनि भई परतीति ॥ निरमल जसु पीवहि जन नीति ॥४॥७३॥१४२॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ (हे भाई !) मालिक-प्रभू का नाम सिमरते हुए (परमात्मा के सेवकों के सारे) पाप नाश हो जाते है~ (उनके अंदर) आत्मिक अडोलता के सुखों के आनंदों का निवास बना रहता है। 1। (हे भाई !) परमात्मा के सेवकों को (हर वक्त) परमात्मा (की सहायता) का भरोसा बना रहता है~ (इस वास्ते) परमात्मा का नाम जपते हुए (उनके अंदर से) हरेक फिक्र मिटा रहता है। 1। रहाउ। (हे भाई !) साध-संगति में रहने के कारण (परमात्मा के सेवकों को) कोई डर नहीं छू सकता~ कोई भटकना नहीं भटका सकती। (क्योंकि~ परमात्मा के सेवकों के हृदय में) दिन रात गोपाल प्रभू के गुण गाए जाते हैं (उनके अंदर हर समय सिफत सालाह टिकी रहती है)। 2। (हे भाई !) माया के बंधनों से खलासी देने वाले प्रभू जी ने मेहर करके (अपने सेवकों को अपने) सुंदर चरणों का सहारा (सदा) बख्शा होता है। 3। (इस वास्ते) हे नानक ! कह, (परमात्मा के सेवकों के) मन में (परमात्मा की ओट आसरे का) निश्चय बना रहता है~ और परमात्मा के सेवक सदा (जीवन को) पवित्र करने वाला सिफत सालाह का अमृत पीते रहते हैं। 4। 73। 142।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਹਰਿ ਚਰਣੀ ਜਾ ਕਾ ਮਨੁ ਲਾਗਾ ॥
ਦੂਖੁ ਦਰਦੁ ਭ੍ਰਮੁ ਤਾ ਕਾ ਭਾਗਾ ॥੧॥
ਹਰਿ ਧਨ ਕੋ ਵਾਪਾਰੀ ਪੂਰਾ ॥
ਜਿਸਹਿ ਨਿਵਾਜੇ ਸੋ ਜਨੁ ਸੂਰਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜਾ ਕਉ ਭਏ ਕ੍ਰਿਪਾਲ ਗੁਸਾਈ ॥
ਸੇ ਜਨ ਲਾਗੇ ਗੁਰ ਕੀ ਪਾਈ ॥੨॥
ਸੂਖ ਸਹਜ ਸਾਂਤਿ ਆਨੰਦਾ ॥
ਜਪਿ ਜਪਿ ਜੀਵੇ ਪਰਮਾਨੰਦਾ ॥੩॥
ਨਾਮ ਰਾਸਿ ਸਾਧ ਸੰਗਿ ਖਾਟੀ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਪ੍ਰਭਿ ਅਪਦਾ ਕਾਟੀ ॥੪॥੭੪॥੧੪੩॥
गउड़ी महला ५ ॥
हरि चरणी जा का मनु लागा ॥
दूखु दरदु भ्रमु ता का भागा ॥१॥
हरि धन को वापारी पूरा ॥
जिसहि निवाजे सो जनु सूरा ॥१॥ रहाउ ॥
जा कउ भए क्रिपाल गुसाई ॥
से जन लागे गुर की पाई ॥२॥
सूख सहज सांति आनंदा ॥
जपि जपि जीवे परमानंदा ॥३॥
नाम रासि साध संगि खाटी ॥
कहु नानक प्रभि अपदा काटी ॥४॥७४॥१४३॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ (हे भाई !परमात्मा की मेहर से) जिस मनुष्य का मन परमात्मा के चरणों में लग जाता है उसका हरेक दुख दर्द दूर हो जाता है~ उस की (माया आदि वाली) भटकना समाप्त हो जाती है। 1। (हे भाई !) परमात्मा के नाम-धन का व्यापार करने वाला मनुष्य अडोल हृदय का मालिक बन जाता है (उस पर कोई विकार अपना प्रभाव नहीं डाल सकते~ क्योंकि) जिस मनुष्य पर परमात्मा अपने नाम-धन की दाति की मेहर करता है वह मनुष्य (विकारों से टकराव करने वाला) शूरवीर बन जाता है। 1। रहाउ। (पर~ हे भाई ! नाम-धन की दाति गुरू के द्वारा ही मिलती है और) जिन मनुष्यों पर धरती के मालिक प्रभू जी दयावान होते हैं~ वह मनुष्य गुरू के चरणों में आ लगते हैं (गुरू की शरण पड़ते हैं)। 2। उनके अंदर सदा सुख शांति और आत्मिक अडोलता के आनंद बने रहते हैं। (हे भाई !) सब से ऊँचे आत्मिक आनंद के मालिक-प्रभू को सिमर-सिमर के मनुष्य आत्मिक जीवन हासिल कर लेते हैं~। 3 हे नानक ! कह,जिस मनुष्य ने साध-संगति में टिक के परमात्मा के नाम-धन की राशि कमा ली है~ परमात्मा ने उसकी हरेक किस्म की बिपता दूर कर दी है। 4। 74। 143।
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਹਰਿ ਸਿਮਰਤ ਸਭਿ ਮਿਟਹਿ ਕਲੇਸ ॥
ਚਰਣ ਕਮਲ ਮਨ ਮਹਿ ਪਰਵੇਸ ॥੧॥
ਉਚਰਹੁ ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਲਖ ਬਾਰੀ ॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਰਸੁ ਪੀਵਹੁ ਪ੍ਰਭ ਪਿਆਰੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸੂਖ ਸਹਜ ਰਸ ਮਹਾ ਅਨੰਦਾ ॥
ਜਪਿ ਜਪਿ ਜੀਵੇ ਪਰਮਾਨੰਦਾ ॥੨॥
ਕਾਮ ਕ੍ਰੋਧ ਲੋਭ ਮਦ ਖੋਏ ॥
ਸਾਧ ਕੈ ਸੰਗਿ ਕਿਲਬਿਖ ਸਭ ਧੋਏ ॥੩॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਪ੍ਰਭ ਦੀਨ ਦਇਆਲਾ ॥
ਨਾਨਕ ਦੀਜੈ ਸਾਧ ਰਵਾਲਾ ॥੪॥੭੫॥੧੪੪॥
गउड़ी महला ५ ॥
हरि सिमरत सभि मिटहि कलेस ॥
चरण कमल मन महि परवेस ॥१॥
उचरहु राम नामु लख बारी ॥
अंम्रित रसु पीवहु प्रभ पिआरी ॥१॥ रहाउ ॥
सूख सहज रस महा अनंदा ॥
जपि जपि जीवे परमानंदा ॥२॥
काम क्रोध लोभ मद खोए ॥
साध कै संगि किलबिख सभ धोए ॥३॥
करि किरपा प्रभ दीन दइआला ॥
नानक दीजै साध रवाला ॥४॥७५॥१४४॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ परमात्मा का नाम सिमरने से मन के सारे कलेश मिट जाते हैं (हे भाई !) अपने मन में परमात्मा के सुंदर चरण बसाए रख।। 1। हे प्यारी जीभ ! (तू ) लाखों बार परमात्मा का नाम उचारती रह और परमात्मा का आत्मिक जीवन वाला नाम-रस पीती रह। 1। रहाउ। (हे भाई !) वह आत्मिक जीवन हासिल कर लेते हैं~ उनके अंदर आत्मिक अडोलता के बड़े सुख आनंद बने रहते हैं जो मनुष्य सबसे श्रेष्ठ आत्मिक आनंद के मालिक-प्रभू का नाम जपते हैं~। 2। (हे भाई !नाम-रस पीने वाले मनुष्य अपने अंदर से) काम-क्रोध-लोभ-मोह-अहंकार (आदि विकारों का) नाश कर लेते हैं। गुरू की संगति में रह के वह (अपने मन में से) सारे पाप धो लेते हैं। 3। हे दीनों पर दया करने वाले प्रभू ! मेहर कर और नानक को गुरू के चरणों की धूड़ बख्श। 4। 75। 144।

संदर्भ: यह अंग 194 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।

M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।

WhatsApp-family-group पर सुबह की good-morning messages का flood।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 54 पंक्तियों का है, 5 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 194” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 195 →, पीछे का: ← अंग 193

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।