अंग
185
राग Gauree
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਜੀਅ ਪ੍ਰਾਨ ਅਧਾਰੁ ॥
ਸਾਚਾ ਧਨੁ ਪਾਇਓ ਹਰਿ ਰੰਗਿ ॥
ਦੁਤਰੁ ਤਰੇ ਸਾਧ ਕੈ ਸੰਗਿ ॥੩॥
ਸੁਖਿ ਬੈਸਹੁ ਸੰਤ ਸਜਨ ਪਰਵਾਰੁ ॥
ਹਰਿ ਧਨੁ ਖਟਿਓ ਜਾ ਕਾ ਨਾਹਿ ਸੁਮਾਰੁ ॥
ਜਿਸਹਿ ਪਰਾਪਤਿ ਤਿਸੁ ਗੁਰੁ ਦੇਇ ॥
ਨਾਨਕ ਬਿਰਥਾ ਕੋਇ ਨ ਹੇਇ ॥੪॥੨੭॥੯੬॥
ਸਾਚਾ ਧਨੁ ਪਾਇਓ ਹਰਿ ਰੰਗਿ ॥
ਦੁਤਰੁ ਤਰੇ ਸਾਧ ਕੈ ਸੰਗਿ ॥੩॥
ਸੁਖਿ ਬੈਸਹੁ ਸੰਤ ਸਜਨ ਪਰਵਾਰੁ ॥
ਹਰਿ ਧਨੁ ਖਟਿਓ ਜਾ ਕਾ ਨਾਹਿ ਸੁਮਾਰੁ ॥
ਜਿਸਹਿ ਪਰਾਪਤਿ ਤਿਸੁ ਗੁਰੁ ਦੇਇ ॥
ਨਾਨਕ ਬਿਰਥਾ ਕੋਇ ਨ ਹੇਇ ॥੪॥੨੭॥੯੬॥
हरि हरि नामु जीअ प्रान अधारु ॥
साचा धनु पाइओ हरि रंगि ॥
दुतरु तरे साध कै संगि ॥३॥
सुखि बैसहु संत सजन परवारु ॥
हरि धनु खटिओ जा का नाहि सुमारु ॥
जिसहि परापति तिसु गुरु देइ ॥
नानक बिरथा कोइ न हेइ ॥४॥२७॥९६॥
साचा धनु पाइओ हरि रंगि ॥
दुतरु तरे साध कै संगि ॥३॥
सुखि बैसहु संत सजन परवारु ॥
हरि धनु खटिओ जा का नाहि सुमारु ॥
जिसहि परापति तिसु गुरु देइ ॥
नानक बिरथा कोइ न हेइ ॥४॥२७॥९६॥
हिन्दी अर्थ: हरी का नाम ही उस मनुष्य की जिंदगी के प्राणों का आसरा बन जाता है। वह मनुष्य हरी के प्रेम रंग में (मस्त हो के) सदा साथ निभने वाला नाम-धन हासिल कर लेता है। जो मनुष्य गुरू की संगति में रहता है~ वह इस मुश्किल से तैरे जाने वाले संसार समुंद्र से पार लांघ जाता है। हे संत जनो ! प्रिवार बन के (मेर-तेर दूर करके~ पूर्ण प्रेम से) आत्मिक आनंद में मिल बैठो। (जो मनुष्य गुरमुखों की संगति में बैठता है उसने) वह हरी-नाम धन कमा लिया जिसका अंदाजा नहीं लग सकता। हे नानक ! (प्रभू की मेहर से) जिसके भाग्यों में (नाम धन) लिखा हुआ है~ उसे गुरू (नाम-धन) देता है~ (गुरू के दर पर आ के) कोई मनुष्य खाली नहीं रह जाता। 4। 27। 96।
ਗਉੜੀ ਗੁਆਰੇਰੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਹਸਤ ਪੁਨੀਤ ਹੋਹਿ ਤਤਕਾਲ ॥
ਬਿਨਸਿ ਜਾਹਿ ਮਾਇਆ ਜੰਜਾਲ ॥
ਰਸਨਾ ਰਮਹੁ ਰਾਮ ਗੁਣ ਨੀਤ ॥
ਸੁਖੁ ਪਾਵਹੁ ਮੇਰੇ ਭਾਈ ਮੀਤ ॥੧॥
ਲਿਖੁ ਲੇਖਣਿ ਕਾਗਦਿ ਮਸਵਾਣੀ ॥
ਰਾਮ ਨਾਮ ਹਰਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਬਾਣੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਇਹ ਕਾਰਜਿ ਤੇਰੇ ਜਾਹਿ ਬਿਕਾਰ ॥
ਸਿਮਰਤ ਰਾਮ ਨਾਹੀ ਜਮ ਮਾਰ ॥
ਧਰਮ ਰਾਇ ਕੇ ਦੂਤ ਨ ਜੋਹੈ ॥
ਮਾਇਆ ਮਗਨ ਨ ਕਛੂਐ ਮੋਹੈ ॥੨॥
ਉਧਰਹਿ ਆਪਿ ਤਰੈ ਸੰਸਾਰੁ ॥
ਰਾਮ ਨਾਮ ਜਪਿ ਏਕੰਕਾਰੁ ॥
ਆਪਿ ਕਮਾਉ ਅਵਰਾ ਉਪਦੇਸ ॥
ਰਾਮ ਨਾਮ ਹਿਰਦੈ ਪਰਵੇਸ ॥੩॥
ਜਾ ਕੈ ਮਾਥੈ ਏਹੁ ਨਿਧਾਨੁ ॥
ਸੋਈ ਪੁਰਖੁ ਜਪੈ ਭਗਵਾਨੁ ॥
ਆਠ ਪਹਰ ਹਰਿ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਉ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਹਉ ਤਿਸੁ ਬਲਿ ਜਾਉ ॥੪॥੨੮॥੯੭॥
ਹਸਤ ਪੁਨੀਤ ਹੋਹਿ ਤਤਕਾਲ ॥
ਬਿਨਸਿ ਜਾਹਿ ਮਾਇਆ ਜੰਜਾਲ ॥
ਰਸਨਾ ਰਮਹੁ ਰਾਮ ਗੁਣ ਨੀਤ ॥
ਸੁਖੁ ਪਾਵਹੁ ਮੇਰੇ ਭਾਈ ਮੀਤ ॥੧॥
ਲਿਖੁ ਲੇਖਣਿ ਕਾਗਦਿ ਮਸਵਾਣੀ ॥
ਰਾਮ ਨਾਮ ਹਰਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਬਾਣੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਇਹ ਕਾਰਜਿ ਤੇਰੇ ਜਾਹਿ ਬਿਕਾਰ ॥
ਸਿਮਰਤ ਰਾਮ ਨਾਹੀ ਜਮ ਮਾਰ ॥
ਧਰਮ ਰਾਇ ਕੇ ਦੂਤ ਨ ਜੋਹੈ ॥
ਮਾਇਆ ਮਗਨ ਨ ਕਛੂਐ ਮੋਹੈ ॥੨॥
ਉਧਰਹਿ ਆਪਿ ਤਰੈ ਸੰਸਾਰੁ ॥
ਰਾਮ ਨਾਮ ਜਪਿ ਏਕੰਕਾਰੁ ॥
ਆਪਿ ਕਮਾਉ ਅਵਰਾ ਉਪਦੇਸ ॥
ਰਾਮ ਨਾਮ ਹਿਰਦੈ ਪਰਵੇਸ ॥੩॥
ਜਾ ਕੈ ਮਾਥੈ ਏਹੁ ਨਿਧਾਨੁ ॥
ਸੋਈ ਪੁਰਖੁ ਜਪੈ ਭਗਵਾਨੁ ॥
ਆਠ ਪਹਰ ਹਰਿ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਉ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਹਉ ਤਿਸੁ ਬਲਿ ਜਾਉ ॥੪॥੨੮॥੯੭॥
गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥
हसत पुनीत होहि ततकाल ॥
बिनसि जाहि माइआ जंजाल ॥
रसना रमहु राम गुण नीत ॥
सुखु पावहु मेरे भाई मीत ॥१॥
लिखु लेखणि कागदि मसवाणी ॥
राम नाम हरि अंम्रित बाणी ॥१॥ रहाउ ॥
इह कारजि तेरे जाहि बिकार ॥
सिमरत राम नाही जम मार ॥
धरम राइ के दूत न जोहै ॥
माइआ मगन न कछूऐ मोहै ॥२॥
उधरहि आपि तरै संसारु ॥
राम नाम जपि एकंकारु ॥
आपि कमाउ अवरा उपदेस ॥
राम नाम हिरदै परवेस ॥३॥
जा कै माथै एहु निधानु ॥
सोई पुरखु जपै भगवानु ॥
आठ पहर हरि हरि गुण गाउ ॥
कहु नानक हउ तिसु बलि जाउ ॥४॥२८॥९७॥
हसत पुनीत होहि ततकाल ॥
बिनसि जाहि माइआ जंजाल ॥
रसना रमहु राम गुण नीत ॥
सुखु पावहु मेरे भाई मीत ॥१॥
लिखु लेखणि कागदि मसवाणी ॥
राम नाम हरि अंम्रित बाणी ॥१॥ रहाउ ॥
इह कारजि तेरे जाहि बिकार ॥
सिमरत राम नाही जम मार ॥
धरम राइ के दूत न जोहै ॥
माइआ मगन न कछूऐ मोहै ॥२॥
उधरहि आपि तरै संसारु ॥
राम नाम जपि एकंकारु ॥
आपि कमाउ अवरा उपदेस ॥
राम नाम हिरदै परवेस ॥३॥
जा कै माथै एहु निधानु ॥
सोई पुरखु जपै भगवानु ॥
आठ पहर हरि हरि गुण गाउ ॥
कहु नानक हउ तिसु बलि जाउ ॥४॥२८॥९७॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥ उस वक्त तेरे हाथ पवित्र हो जाएंगे~ तेरे (माया के मोह के) बंधन दूर हो जाएंगे हे मेरे भाई ! हे मेरे मित्र ! अपनी जीभ से सदा परमात्मा की सिफत सालाह के गुण गाता रह~ तू आत्मिक आनंद पाएगा।। 1। (हे मेरे भाई ! अपनी ‘सुरति’ की) कलम (ले के अपनी ‘करणी’ के) कागज़ पर (‘मन’ की) दवात से परमात्मा का नाम लिख। आत्मिक जीवन देने वाली सिफत सालाह की बाणी लिख। 1। रहाउ। (हे मेरे वीर ! हे मेरे मित्र !) इस काम को करने से तेरे (अंदर से) विकार भाग जाएंगे। परमात्मा का नाम सिमरने से (तेरे वास्ते) आत्मिक मौत नहीं रहेगी। (कामादिक) दूत जो धर्मराज के वश में डालते हैं तेरी तरफ देख भी नहीं सकेंगे। तू माया (के मोह) में नहीं डूबेगा~ कोई भी चीज तुझे मोह नहीं सकेगी। 2। तू खुद (विकारों से) बच जाएगा~ (तेरी संगति में) जगत भी (विकारों के समुंद्र से) पार लांघ जाएगा। (हे मेरे वीर ! हे मेरे मित्र !) परमात्मा का नाम जप। इक ओअंकार को सिमरता रह। (हे मेरे वीर !) तू स्वयं नाम सिमरन की कमाई कर~ औरों को भी उपदेश कर। परमात्मा का नाम अपने हृदय में बसा। 3। जिसके माथे पे (भगवान की कृपा से) ये खजाना (प्राप्त करने का लेख लिखा हुआ) है। (पर हे मेरे वीर !) वही मनुष्य भगवान को याद करता है जो आठों पहर (हर वक्त) परमात्मा के गुण गाता रहता है हे नानक कह, मैं उस मनुष्य से कुर्बान जाता हूँ~ । 4। 28। 97।
ਰਾਗੁ ਗਉੜੀ ਗੁਆਰੇਰੀ ਮਹਲਾ ੫ ਚਉਪਦੇ ਦੁਪਦੇ
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਜੋ ਪਰਾਇਓ ਸੋਈ ਅਪਨਾ ॥
ਜੋ ਤਜਿ ਛੋਡਨ ਤਿਸੁ ਸਿਉ ਮਨੁ ਰਚਨਾ ॥੧॥
ਕਹਹੁ ਗੁਸਾਈ ਮਿਲੀਐ ਕੇਹ ॥
ਜੋ ਬਿਬਰਜਤ ਤਿਸ ਸਿਉ ਨੇਹ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਝੂਠੁ ਬਾਤ ਸਾ ਸਚੁ ਕਰਿ ਜਾਤੀ ॥
ਸਤਿ ਹੋਵਨੁ ਮਨਿ ਲਗੈ ਨ ਰਾਤੀ ॥੨॥
ਬਾਵੈ ਮਾਰਗੁ ਟੇਢਾ ਚਲਨਾ ॥
ਸੀਧਾ ਛੋਡਿ ਅਪੂਠਾ ਬੁਨਨਾ ॥੩॥
ਦੁਹਾ ਸਿਰਿਆ ਕਾ ਖਸਮੁ ਪ੍ਰਭੁ ਸੋਈ ॥
ਜਿਸੁ ਮੇਲੇ ਨਾਨਕ ਸੋ ਮੁਕਤਾ ਹੋਈ ॥੪॥੨੯॥੯੮॥
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਜੋ ਪਰਾਇਓ ਸੋਈ ਅਪਨਾ ॥
ਜੋ ਤਜਿ ਛੋਡਨ ਤਿਸੁ ਸਿਉ ਮਨੁ ਰਚਨਾ ॥੧॥
ਕਹਹੁ ਗੁਸਾਈ ਮਿਲੀਐ ਕੇਹ ॥
ਜੋ ਬਿਬਰਜਤ ਤਿਸ ਸਿਉ ਨੇਹ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਝੂਠੁ ਬਾਤ ਸਾ ਸਚੁ ਕਰਿ ਜਾਤੀ ॥
ਸਤਿ ਹੋਵਨੁ ਮਨਿ ਲਗੈ ਨ ਰਾਤੀ ॥੨॥
ਬਾਵੈ ਮਾਰਗੁ ਟੇਢਾ ਚਲਨਾ ॥
ਸੀਧਾ ਛੋਡਿ ਅਪੂਠਾ ਬੁਨਨਾ ॥੩॥
ਦੁਹਾ ਸਿਰਿਆ ਕਾ ਖਸਮੁ ਪ੍ਰਭੁ ਸੋਈ ॥
ਜਿਸੁ ਮੇਲੇ ਨਾਨਕ ਸੋ ਮੁਕਤਾ ਹੋਈ ॥੪॥੨੯॥੯੮॥
रागु गउड़ी गुआरेरी महला ५ चउपदे दुपदे
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जो पराइओ सोई अपना ॥
जो तजि छोडन तिसु सिउ मनु रचना ॥१॥
कहहु गुसाई मिलीऐ केह ॥
जो बिबरजत तिस सिउ नेह ॥१॥ रहाउ ॥
झूठु बात सा सचु करि जाती ॥
सति होवनु मनि लगै न राती ॥२॥
बावै मारगु टेढा चलना ॥
सीधा छोडि अपूठा बुनना ॥३॥
दुहा सिरिआ का खसमु प्रभु सोई ॥
जिसु मेले नानक सो मुकता होई ॥४॥२९॥९८॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जो पराइओ सोई अपना ॥
जो तजि छोडन तिसु सिउ मनु रचना ॥१॥
कहहु गुसाई मिलीऐ केह ॥
जो बिबरजत तिस सिउ नेह ॥१॥ रहाउ ॥
झूठु बात सा सचु करि जाती ॥
सति होवनु मनि लगै न राती ॥२॥
बावै मारगु टेढा चलना ॥
सीधा छोडि अपूठा बुनना ॥३॥
दुहा सिरिआ का खसमु प्रभु सोई ॥
जिसु मेले नानक सो मुकता होई ॥४॥२९॥९८॥
हिन्दी अर्थ: रागु गउड़ी गुआरेरी महला ५ चउपदे दुपदे ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। (माल धन आदिक) जो (अंत में) बेगाना हो जाना है~ उसे हम अपना माने बैठे हैं~ हमारा मन उस (माल धन) से मस्त रहता है~ जिसे (आखिर) छोड़ जाना है। 1। अर्थ: (हे भाई !) बताओ~ हम प्रभू-पति से कैसे मिल सकते हैं~ अगर हमारा (सदा) उस माया से प्यार है~ जिससे हमें मना किया हुआ है? । 1। रहाउ। (ये ख्याल झूठा है कि हमने यहाँ सदा बैठे रहना है~ पर यह) जो झूठी बात है इसे हमने ठीक समझा हुआ है। (मौत) जो अवश्यंभावी है~ हमारे मन को रत्ती भर नहीं जचती। 2। (बुरी तरफ प्यार डालने के कारण) हमने बुरी तरफ जीवन का रास्ता पकड़ा हुआ है~ हम जीवन की टेढ़ी चाल चल रहे हैं। जीवन का सीधा राह छोड़ के हम जीवन डोर की उल्टी बुनाई कर रहे हैं। 3। (पर) हे नानक ! (जीवों के भी क्या वश?) (जीवन के अच्छे और बुरे) दोनों तरफ का मालिक परमात्मा स्वयं ही है। जिस मनुष्य को परमात्मा (अपने चरणों में) जोड़ता है~ वे बुरे राह से बच जाते हैं। 4। 29। 98।
ਗਉੜੀ ਗੁਆਰੇਰੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਕਲਿਜੁਗ ਮਹਿ ਮਿਲਿ ਆਏ ਸੰਜੋਗ ॥
ਜਿਚਰੁ ਆਗਿਆ ਤਿਚਰੁ ਭੋਗਹਿ ਭੋਗ ॥੧॥
ਜਲੈ ਨ ਪਾਈਐ ਰਾਮ ਸਨੇਹੀ ॥
ਕਿਰਤਿ ਸੰਜੋਗਿ ਸਤੀ ਉਠਿ ਹੋਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਦੇਖਾ ਦੇਖੀ ਮਨਹਠਿ ਜਲਿ ਜਾਈਐ ॥
ਪ੍ਰਿਅ ਸੰਗੁ ਨ ਪਾਵੈ ਬਹੁ ਜੋਨਿ ਭਵਾਈਐ ॥੨॥
ਸੀਲ ਸੰਜਮਿ ਪ੍ਰਿਅ ਆਗਿਆ ਮਾਨੈ ॥
ਤਿਸੁ ਨਾਰੀ ਕਉ ਦੁਖੁ ਨ ਜਮਾਨੈ ॥੩॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਜਿਨਿ ਪ੍ਰਿਉ ਪਰਮੇਸਰੁ ਕਰਿ ਜਾਨਿਆ ॥
ਧੰਨੁ ਸਤੀ ਦਰਗਹ ਪਰਵਾਨਿਆ ॥੪॥੩੦॥੯੯॥
ਕਲਿਜੁਗ ਮਹਿ ਮਿਲਿ ਆਏ ਸੰਜੋਗ ॥
ਜਿਚਰੁ ਆਗਿਆ ਤਿਚਰੁ ਭੋਗਹਿ ਭੋਗ ॥੧॥
ਜਲੈ ਨ ਪਾਈਐ ਰਾਮ ਸਨੇਹੀ ॥
ਕਿਰਤਿ ਸੰਜੋਗਿ ਸਤੀ ਉਠਿ ਹੋਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਦੇਖਾ ਦੇਖੀ ਮਨਹਠਿ ਜਲਿ ਜਾਈਐ ॥
ਪ੍ਰਿਅ ਸੰਗੁ ਨ ਪਾਵੈ ਬਹੁ ਜੋਨਿ ਭਵਾਈਐ ॥੨॥
ਸੀਲ ਸੰਜਮਿ ਪ੍ਰਿਅ ਆਗਿਆ ਮਾਨੈ ॥
ਤਿਸੁ ਨਾਰੀ ਕਉ ਦੁਖੁ ਨ ਜਮਾਨੈ ॥੩॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਜਿਨਿ ਪ੍ਰਿਉ ਪਰਮੇਸਰੁ ਕਰਿ ਜਾਨਿਆ ॥
ਧੰਨੁ ਸਤੀ ਦਰਗਹ ਪਰਵਾਨਿਆ ॥੪॥੩੦॥੯੯॥
गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥
कलिजुग महि मिलि आए संजोग ॥
जिचरु आगिआ तिचरु भोगहि भोग ॥१॥
जलै न पाईऐ राम सनेही ॥
किरति संजोगि सती उठि होई ॥१॥ रहाउ ॥
देखा देखी मनहठि जलि जाईऐ ॥
प्रिअ संगु न पावै बहु जोनि भवाईऐ ॥२॥
सील संजमि प्रिअ आगिआ मानै ॥
तिसु नारी कउ दुखु न जमानै ॥३॥
कहु नानक जिनि प्रिउ परमेसरु करि जानिआ ॥
धंनु सती दरगह परवानिआ ॥४॥३०॥९९॥
कलिजुग महि मिलि आए संजोग ॥
जिचरु आगिआ तिचरु भोगहि भोग ॥१॥
जलै न पाईऐ राम सनेही ॥
किरति संजोगि सती उठि होई ॥१॥ रहाउ ॥
देखा देखी मनहठि जलि जाईऐ ॥
प्रिअ संगु न पावै बहु जोनि भवाईऐ ॥२॥
सील संजमि प्रिअ आगिआ मानै ॥
तिसु नारी कउ दुखु न जमानै ॥३॥
कहु नानक जिनि प्रिउ परमेसरु करि जानिआ ॥
धंनु सती दरगह परवानिआ ॥४॥३०॥९९॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥ इस कलेशों भरी दुनिया में (स्त्री और पति) पिछले सम्बंधों के कारण मिल के आ इकट्ठे होते हैं। जितना वक्त (परमात्मा से) हुकम मिलता है उतना समय (दोनों मिल के जगत के) पदार्थ भोगते हैं। 1। (पति की चिता में जल मरती है~ पर आग में) जलने से प्यार करने वाला पति नहीं मिल सकता (अपने मरे पति के साथ दुबारा) किए जा सकने वाले मिलाप की खातिर (स्त्री) उठ के सती हो जाती है। 1। रहाउ। एक दूसरी को देख के मन के हठ के साथ (ही) जल जाते हैं (पर मरे पति की चिता में जल के स्त्री अपने) प्यारे का साथ नहीं प्राप्त कर सकती। (इस तरह बल्कि) कई जूनियों में भटकते हैं। 2। जो स्त्री मीठे स्वभाव की जुगति में रह के (अपने) प्यारे (पति) का हुकम मानती है~ उस स्त्री को यमों का दुख नहीं छू सकता। 3। हे नानक ! कह, जिस (स्त्री) ने अपने पति को ही एक पति कर के समझा है (भाव~ सिर्फ अपने पति में ही पति-भावना रखी है) जैसे भक्त का पति एक परमात्मा है। वह स्त्री असली सती है~ वह भाग्यशाली है~ वह परमात्मा की हजूरी में कबूल है। 4। 30। 99।
ਗਉੜੀ ਗੁਆਰੇਰੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਹਮ ਧਨਵੰਤ ਭਾਗਠ ਸਚ ਨਾਇ ॥
ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਵਹ ਸਹਜਿ ਸੁਭਾਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਹਮ ਧਨਵੰਤ ਭਾਗਠ ਸਚ ਨਾਇ ॥
ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਵਹ ਸਹਜਿ ਸੁਭਾਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥
हम धनवंत भागठ सच नाइ ॥
हरि गुण गावह सहजि सुभाइ ॥१॥ रहाउ ॥
हम धनवंत भागठ सच नाइ ॥
हरि गुण गावह सहजि सुभाइ ॥१॥ रहाउ ॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥ (ज्यों ज्यों) हम परमात्मा के गुण (मिल के) गाते हैं~ सदा स्थिर प्रभू के नाम की बरकति से हम (परमात्मा के नाम धन के) धनी बनते जा रहे हैं। भाग्यशाली बनते जा रहे हैं~ आत्मिक अडोलता में टिके रहते हैं~ प्रेम में मगन रहते हैं। 1। रहाउ।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 185 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
Karwa Chauth की रात, चाँद का इंतज़ार, और बीच में हाथों की मेहंदी।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 52 पंक्तियों का है, 5 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 185” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 186 →, पीछे का: ← अंग 184।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।