अंग
203
राग Gauree
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਗਉੜੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਭੁਜ ਬਲ ਬੀਰ ਬ੍ਰਹਮ ਸੁਖ ਸਾਗਰ ਗਰਤ ਪਰਤ ਗਹਿ ਲੇਹੁ ਅੰਗੁਰੀਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸ੍ਰਵਨਿ ਨ ਸੁਰਤਿ ਨੈਨ ਸੁੰਦਰ ਨਹੀ ਆਰਤ ਦੁਆਰਿ ਰਟਤ ਪਿੰਗੁਰੀਆ ॥੧॥
ਦੀਨਾ ਨਾਥ ਅਨਾਥ ਕਰੁਣਾ ਮੈ ਸਾਜਨ ਮੀਤ ਪਿਤਾ ਮਹਤਰੀਆ ॥
ਚਰਨ ਕਵਲ ਹਿਰਦੈ ਗਹਿ ਨਾਨਕ ਭੈ ਸਾਗਰ ਸੰਤ ਪਾਰਿ ਉਤਰੀਆ ॥੨॥੨॥੧੧੫॥
ਭੁਜ ਬਲ ਬੀਰ ਬ੍ਰਹਮ ਸੁਖ ਸਾਗਰ ਗਰਤ ਪਰਤ ਗਹਿ ਲੇਹੁ ਅੰਗੁਰੀਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸ੍ਰਵਨਿ ਨ ਸੁਰਤਿ ਨੈਨ ਸੁੰਦਰ ਨਹੀ ਆਰਤ ਦੁਆਰਿ ਰਟਤ ਪਿੰਗੁਰੀਆ ॥੧॥
ਦੀਨਾ ਨਾਥ ਅਨਾਥ ਕਰੁਣਾ ਮੈ ਸਾਜਨ ਮੀਤ ਪਿਤਾ ਮਹਤਰੀਆ ॥
ਚਰਨ ਕਵਲ ਹਿਰਦੈ ਗਹਿ ਨਾਨਕ ਭੈ ਸਾਗਰ ਸੰਤ ਪਾਰਿ ਉਤਰੀਆ ॥੨॥੨॥੧੧੫॥
गउड़ी महला ५ ॥
भुज बल बीर ब्रहम सुख सागर गरत परत गहि लेहु अंगुरीआ ॥१॥ रहाउ ॥
स्रवनि न सुरति नैन सुंदर नही आरत दुआरि रटत पिंगुरीआ ॥१॥
दीना नाथ अनाथ करुणा मै साजन मीत पिता महतरीआ ॥
चरन कवल हिरदै गहि नानक भै सागर संत पारि उतरीआ ॥२॥२॥११५॥
भुज बल बीर ब्रहम सुख सागर गरत परत गहि लेहु अंगुरीआ ॥१॥ रहाउ ॥
स्रवनि न सुरति नैन सुंदर नही आरत दुआरि रटत पिंगुरीआ ॥१॥
दीना नाथ अनाथ करुणा मै साजन मीत पिता महतरीआ ॥
चरन कवल हिरदै गहि नानक भै सागर संत पारि उतरीआ ॥२॥२॥११५॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला ५ ॥ हे बली बाहों वाले शूरवीर प्रभू ! हे सुखों के समुंदर पारब्रहम् ! (संसार समुंद्र के विकारों के) गड्ढे में गिरते हुए की (मेरी) उंगली पकड़ ले। 1। रहाउ। (हे प्रभू ! मेरे) कानों में (तेरी सिफत सालाह) सुनने (की सूझ) नहीं~ मेरी आँखें (इतनी) सुंदर नहीं (कि हर जगह तेरा दीदार कर सकें)~ मैं तेरी साध-संगति में जाने के लायक भी नहीं हूँ~ मैं पिंगला हो चुका हूँ और दुखी हो के तेरे दर पर पुकार करता हूँ (मुझे विकारों के गड्ढे में से बचा ले)। 1। हे गरीबों के पति ! हे यतीमों पर तरस करने वाले ! हे सज्जन ! हे मित्र प्रभू ! हे मेरे पिता ! हे मेरी माँ प्रभू ! हे नानक ! (कह,) तेरे संत तेरे सुंदर चरण अपने हृदय में रख कर संसार समुंद्र से पार लांघते हैं~ (मेहर कर~ मुझे भी अपने चरणों का प्यार बख्श और मुझे भी पार लंधा ले)। 2। 2। 115।
ਰਾਗੁ ਗਉੜੀ ਬੈਰਾਗਣਿ ਮਹਲਾ ੫
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਦਯ ਗੁਸਾਈ ਮੀਤੁਲਾ ਤੂੰ ਸੰਗਿ ਹਮਾਰੈ ਬਾਸੁ ਜੀਉ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਤੁਝ ਬਿਨੁ ਘਰੀ ਨ ਜੀਵਨਾ ਧ੍ਰਿਗੁ ਰਹਣਾ ਸੰਸਾਰਿ ॥
ਜੀਅ ਪ੍ਰਾਣ ਸੁਖਦਾਤਿਆ ਨਿਮਖ ਨਿਮਖ ਬਲਿਹਾਰਿ ਜੀ ॥੧॥
ਹਸਤ ਅਲੰਬਨੁ ਦੇਹੁ ਪ੍ਰਭ ਗਰਤਹੁ ਉਧਰੁ ਗੋਪਾਲ ॥
ਮੋਹਿ ਨਿਰਗੁਨ ਮਤਿ ਥੋਰੀਆ ਤੂੰ ਸਦ ਹੀ ਦੀਨ ਦਇਆਲ ॥੨॥
ਕਿਆ ਸੁਖ ਤੇਰੇ ਸੰਮਲਾ ਕਵਨ ਬਿਧੀ ਬੀਚਾਰ ॥
ਸਰਣਿ ਸਮਾਈ ਦਾਸ ਹਿਤ ਊਚੇ ਅਗਮ ਅਪਾਰ ॥੩॥
ਸਗਲ ਪਦਾਰਥ ਅਸਟ ਸਿਧਿ ਨਾਮ ਮਹਾ ਰਸ ਮਾਹਿ ॥
ਸੁਪ੍ਰਸੰਨ ਭਏ ਕੇਸਵਾ ਸੇ ਜਨ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਹਿ ॥੪॥
ਮਾਤ ਪਿਤਾ ਸੁਤ ਬੰਧਪੋ ਤੂੰ ਮੇਰੇ ਪ੍ਰਾਣ ਅਧਾਰ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਨਾਨਕੁ ਭਜੈ ਬਿਖੁ ਤਰਿਆ ਸੰਸਾਰੁ ॥੫॥੧॥੧੧੬॥
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਦਯ ਗੁਸਾਈ ਮੀਤੁਲਾ ਤੂੰ ਸੰਗਿ ਹਮਾਰੈ ਬਾਸੁ ਜੀਉ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਤੁਝ ਬਿਨੁ ਘਰੀ ਨ ਜੀਵਨਾ ਧ੍ਰਿਗੁ ਰਹਣਾ ਸੰਸਾਰਿ ॥
ਜੀਅ ਪ੍ਰਾਣ ਸੁਖਦਾਤਿਆ ਨਿਮਖ ਨਿਮਖ ਬਲਿਹਾਰਿ ਜੀ ॥੧॥
ਹਸਤ ਅਲੰਬਨੁ ਦੇਹੁ ਪ੍ਰਭ ਗਰਤਹੁ ਉਧਰੁ ਗੋਪਾਲ ॥
ਮੋਹਿ ਨਿਰਗੁਨ ਮਤਿ ਥੋਰੀਆ ਤੂੰ ਸਦ ਹੀ ਦੀਨ ਦਇਆਲ ॥੨॥
ਕਿਆ ਸੁਖ ਤੇਰੇ ਸੰਮਲਾ ਕਵਨ ਬਿਧੀ ਬੀਚਾਰ ॥
ਸਰਣਿ ਸਮਾਈ ਦਾਸ ਹਿਤ ਊਚੇ ਅਗਮ ਅਪਾਰ ॥੩॥
ਸਗਲ ਪਦਾਰਥ ਅਸਟ ਸਿਧਿ ਨਾਮ ਮਹਾ ਰਸ ਮਾਹਿ ॥
ਸੁਪ੍ਰਸੰਨ ਭਏ ਕੇਸਵਾ ਸੇ ਜਨ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਹਿ ॥੪॥
ਮਾਤ ਪਿਤਾ ਸੁਤ ਬੰਧਪੋ ਤੂੰ ਮੇਰੇ ਪ੍ਰਾਣ ਅਧਾਰ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਨਾਨਕੁ ਭਜੈ ਬਿਖੁ ਤਰਿਆ ਸੰਸਾਰੁ ॥੫॥੧॥੧੧੬॥
रागु गउड़ी बैरागणि महला ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
दय गुसाई मीतुला तूं संगि हमारै बासु जीउ ॥१॥ रहाउ ॥
तुझ बिनु घरी न जीवना ध्रिगु रहणा संसारि ॥
जीअ प्राण सुखदातिआ निमख निमख बलिहारि जी ॥१॥
हसत अलंबनु देहु प्रभ गरतहु उधरु गोपाल ॥
मोहि निरगुन मति थोरीआ तूं सद ही दीन दइआल ॥२॥
किआ सुख तेरे संमला कवन बिधी बीचार ॥
सरणि समाई दास हित ऊचे अगम अपार ॥३॥
सगल पदारथ असट सिधि नाम महा रस माहि ॥
सुप्रसंन भए केसवा से जन हरि गुण गाहि ॥४॥
मात पिता सुत बंधपो तूं मेरे प्राण अधार ॥
साधसंगि नानकु भजै बिखु तरिआ संसारु ॥५॥१॥११६॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
दय गुसाई मीतुला तूं संगि हमारै बासु जीउ ॥१॥ रहाउ ॥
तुझ बिनु घरी न जीवना ध्रिगु रहणा संसारि ॥
जीअ प्राण सुखदातिआ निमख निमख बलिहारि जी ॥१॥
हसत अलंबनु देहु प्रभ गरतहु उधरु गोपाल ॥
मोहि निरगुन मति थोरीआ तूं सद ही दीन दइआल ॥२॥
किआ सुख तेरे संमला कवन बिधी बीचार ॥
सरणि समाई दास हित ऊचे अगम अपार ॥३॥
सगल पदारथ असट सिधि नाम महा रस माहि ॥
सुप्रसंन भए केसवा से जन हरि गुण गाहि ॥४॥
मात पिता सुत बंधपो तूं मेरे प्राण अधार ॥
साधसंगि नानकु भजै बिखु तरिआ संसारु ॥५॥१॥११६॥
हिन्दी अर्थ: रागु गउड़ी बैरागणि महला ५ ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे तरस करने वाले ! हे सृष्टि के पति ! तू मेरा प्यारा मित्र है~ सदा मेरे साथ बसता रह। 1। रहाउ। तेरे बिना एक घड़ी भर भी आत्मिक जीवन नहीं हो सकता और (आत्मिक जीवन के बिना) संसार में रहना धिक्कार-योग्य है। हे जिंद देने वाले ! हे प्राण देने वाले ! हे सुख देने वाले प्रभू ! मैं तुझसे निमख निमख कुर्बान जाता हूँ।1। हे प्रभू ! मुझे अपने हाथ का सहारा दे। हे गोपाल ! मुझे (विकारों के) गड्ढों में से निकाल ले। मैं गुण हीन हूँ~ मेरी मति होछी है। तू सदा ही गरीबों पर दया करने वाला है। 2। मैं किस किस तरीकों से (तेरे बख्शे हुए सुखों की) विचार करूँ? (मैं तेरे दिए हुए बेअंत सुख गिन नहीं सकता) हे ऊँचे ! हे अपहुँच ! हे बेअंत प्रभू ! हे शरण आए की सहायता करने वाले प्रभू ! हे अपने सेवकों के हितैषी प्रभू ! मैं तेरे (दिए हुए) कौन कौन से सुख याद करूँ? । 3। हे भाई ! दुनिया के सारे पदार्थ (योगियों की) आठों सिद्धियां सब से श्रेष्ठ राम-नाम-रस में मौजूद है। (हे भाई !) जिनपे सुंदर लंबे बालों वाला प्रभू प्रसन्न होता है~ वे लोग प्रभू के गुण गाते रहते हैं। 4। (हे दय !हे गुसांई !) हे मेरे प्राणों के आसरे प्रभू ! माता~ पिता~ पुत्र~ रिश्तेदार (सब कुछ मेरा) तू ही है। (तेरा दास) नानक (तेरी) साध-संगति में (तेरी मेहर से) तेरा भजन करता है। (जो मनुष्य तेरा भजन करता है वह विकारों के) जहिर भरे संसार से (सही सलामत आत्मिक जीवन ले के) पार लांघ जाता है। 5। 1। 116।
ਗਉੜੀ ਬੈਰਾਗਣਿ ਰਹੋਏ ਕੇ ਛੰਤ ਕੇ ਘਰਿ ਮਃ ੫
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਹੈ ਕੋਈ ਰਾਮ ਪਿਆਰੋ ਗਾਵੈ ॥
ਸਰਬ ਕਲਿਆਣ ਸੂਖ ਸਚੁ ਪਾਵੈ ॥ ਰਹਾਉ ॥
ਬਨੁ ਬਨੁ ਖੋਜਤ ਫਿਰਤ ਬੈਰਾਗੀ ॥
ਬਿਰਲੇ ਕਾਹੂ ਏਕ ਲਿਵ ਲਾਗੀ ॥
ਜਿਨਿ ਹਰਿ ਪਾਇਆ ਸੇ ਵਡਭਾਗੀ ॥੧॥
ਬ੍ਰਹਮਾਦਿਕ ਸਨਕਾਦਿਕ ਚਾਹੈ ॥
ਜੋਗੀ ਜਤੀ ਸਿਧ ਹਰਿ ਆਹੈ ॥
ਜਿਸਹਿ ਪਰਾਪਤਿ ਸੋ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਹੈ ॥੨॥
ਤਾ ਕੀ ਸਰਣਿ ਜਿਨ ਬਿਸਰਤ ਨਾਹੀ ॥
ਵਡਭਾਗੀ ਹਰਿ ਸੰਤ ਮਿਲਾਹੀ ॥
ਜਨਮ ਮਰਣ ਤਿਹ ਮੂਲੇ ਨਾਹੀ ॥੩॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਮਿਲੁ ਪ੍ਰੀਤਮ ਪਿਆਰੇ ॥
ਬਿਨਉ ਸੁਨਹੁ ਪ੍ਰਭ ਊਚ ਅਪਾਰੇ ॥
ਨਾਨਕੁ ਮਾਂਗਤੁ ਨਾਮੁ ਅਧਾਰੇ ॥੪॥੧॥੧੧੭॥
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਹੈ ਕੋਈ ਰਾਮ ਪਿਆਰੋ ਗਾਵੈ ॥
ਸਰਬ ਕਲਿਆਣ ਸੂਖ ਸਚੁ ਪਾਵੈ ॥ ਰਹਾਉ ॥
ਬਨੁ ਬਨੁ ਖੋਜਤ ਫਿਰਤ ਬੈਰਾਗੀ ॥
ਬਿਰਲੇ ਕਾਹੂ ਏਕ ਲਿਵ ਲਾਗੀ ॥
ਜਿਨਿ ਹਰਿ ਪਾਇਆ ਸੇ ਵਡਭਾਗੀ ॥੧॥
ਬ੍ਰਹਮਾਦਿਕ ਸਨਕਾਦਿਕ ਚਾਹੈ ॥
ਜੋਗੀ ਜਤੀ ਸਿਧ ਹਰਿ ਆਹੈ ॥
ਜਿਸਹਿ ਪਰਾਪਤਿ ਸੋ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਹੈ ॥੨॥
ਤਾ ਕੀ ਸਰਣਿ ਜਿਨ ਬਿਸਰਤ ਨਾਹੀ ॥
ਵਡਭਾਗੀ ਹਰਿ ਸੰਤ ਮਿਲਾਹੀ ॥
ਜਨਮ ਮਰਣ ਤਿਹ ਮੂਲੇ ਨਾਹੀ ॥੩॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਮਿਲੁ ਪ੍ਰੀਤਮ ਪਿਆਰੇ ॥
ਬਿਨਉ ਸੁਨਹੁ ਪ੍ਰਭ ਊਚ ਅਪਾਰੇ ॥
ਨਾਨਕੁ ਮਾਂਗਤੁ ਨਾਮੁ ਅਧਾਰੇ ॥੪॥੧॥੧੧੭॥
गउड़ी बैरागणि रहोए के छंत के घरि मः ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
है कोई राम पिआरो गावै ॥
सरब कलिआण सूख सचु पावै ॥ रहाउ ॥
बनु बनु खोजत फिरत बैरागी ॥
बिरले काहू एक लिव लागी ॥
जिनि हरि पाइआ से वडभागी ॥१॥
ब्रहमादिक सनकादिक चाहै ॥
जोगी जती सिध हरि आहै ॥
जिसहि परापति सो हरि गुण गाहै ॥२॥
ता की सरणि जिन बिसरत नाही ॥
वडभागी हरि संत मिलाही ॥
जनम मरण तिह मूले नाही ॥३॥
करि किरपा मिलु प्रीतम पिआरे ॥
बिनउ सुनहु प्रभ ऊच अपारे ॥
नानकु मांगतु नामु अधारे ॥४॥१॥११७॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
है कोई राम पिआरो गावै ॥
सरब कलिआण सूख सचु पावै ॥ रहाउ ॥
बनु बनु खोजत फिरत बैरागी ॥
बिरले काहू एक लिव लागी ॥
जिनि हरि पाइआ से वडभागी ॥१॥
ब्रहमादिक सनकादिक चाहै ॥
जोगी जती सिध हरि आहै ॥
जिसहि परापति सो हरि गुण गाहै ॥२॥
ता की सरणि जिन बिसरत नाही ॥
वडभागी हरि संत मिलाही ॥
जनम मरण तिह मूले नाही ॥३॥
करि किरपा मिलु प्रीतम पिआरे ॥
बिनउ सुनहु प्रभ ऊच अपारे ॥
नानकु मांगतु नामु अधारे ॥४॥१॥११७॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी बैरागणि रहोए के छंत के घरि मः ५ ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। (हे भाई !) कोई विरला भाग्यशाली मनुष्य प्यारे के गुण गाता है~ वह सारे सुख प्राप्त कर लेता है~ सच्चे आनंद लेता है~ सदा स्थिर परमात्मा को मिल पड़ता है। रहाउ। (हे भाई ! परमात्मा को मिलने के लिए जो) कोई मनुष्य गृहस्थ से उपराम हो के जंगल-जंगल ढूँढता फिरता है (तो इस तरह परमात्मा नहीं मिलता)। किसी विरले मनुष्य की एक परमात्मा के साथ लगन लगती है। जिस जिस मनुष्य ने प्रभू को ढूँढ लिया है~ वे सभी बड़े भाग्यशाली हैं। 1। (हे भाई !) ब्रहमा व अन्य बड़े-बड़े देवतागण~ सनक व उसके भाई सनंदन~ सनातन~ सनत कुमार – इनमें से हरेक प्रभू मिलाप चाहता है। जोगी-जती-सिध – हरेक परमात्मा को मिलने की चाहत रखता है। (पर जिसको धुर से) ये दाति मिली है~ वही प्रभू के गुण गाता है। 2। (हे भाई !) उनकी शरण पड़ें~ जिन्हें परमात्मा कभी नहीं भूलता। परमात्मा के संतों को कोई बड़े भाग्यशाली ही मिल सकते हैं। उन संतों को जनम नरण के चक्कर नहीं व्यापते। 3। हे प्यारे प्रीतम प्रभू ! (मेरे पर) कृपा कर तथा (मुझे) मिल। हे सबसे ऊँचे और बेअंत प्रभू ! (मेरी ये) विनती सुन। (तेरा दास) नानक (तुझसे तेरा) नाम (ही जिंदगी का) आसरा मांगता है। 4। 1। 117।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 203 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
दिल्ली मेट्रो की सुबह 7 बजे की rush hour, हर चेहरा अपनी जल्दी में, और मन के अंदर यह विचार।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 34 पंक्तियों का है, 3 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 203” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 204 →, पीछे का: ← अंग 202।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।