Background
ईशावास्य उपनिषद् दस मुख्य उपनिषदों में पहली मानी जाती है, क्योंकि शंकराचार्य ने अपनी भाष्य-परंपरा की शुरुआत इसी से की। यह यजुर्वेद की वाजसनेयी संहिता के अंतिम 40वें अध्याय में बैठी है।
नाम पहले शब्द ‘ईशा’ से पड़ा, यानी ‘ईश्वर के द्वारा’। पहली ही पंक्ति में एक radical statement है: ‘इस संसार में जो कुछ भी है, सब कुछ ईश्वर से ढका हुआ है।’ यह बाक़ी 17 मन्त्र की seedling है।
इस उपनिषद् की एक खासियत यह है कि यह बहुत कम शब्दों में बहुत गहरी बात कह जाती है। 18 मन्त्र, उनमें से 14 बहुत practical, 4 closing prayers। इसमें लंबे philosophy lectures नहीं हैं, बल्कि जीने का एक dharma है।
Mahatma Gandhi ने एक बार कहा था कि अगर बाक़ी सब हिंदू scriptures खो जाएँ और सिर्फ़ ईशावास्य का पहला मन्त्र बच जाए, तो भी हिन्दू धर्म जी सकता है। यह overstatement है, मगर इस मन्त्र की शक्ति को indicate करता है।
कथा-सार (Story in Brief)
एक छोटे आदमी की कहानी से शुरू करें। आपके पास एक नौकरी है, एक घर है, परिवार है, कुछ savings हैं। आप सोचते हैं, ‘यह सब मेरा है।’ एक रात नींद नहीं आती। आप सोचते हैं, ‘अगर यह सब छूट जाए तो?’ डर लगता है।
ईशावास्य पहली ही पंक्ति में इस डर को address करती है। कहती है, ‘यह तेरा था ही कब? यह सब उसका है। तू तो बस इसे use कर रहा है। ऐसे जी जैसे यह सब borrowed है।’ और एक twist: ‘इसी borrowed शरीर से कर्म कर, सौ साल जी, बस मत भूल कि यह तेरा नहीं।’
फिर अगले मन्त्र एक paradox set करते हैं। ‘जो विद्या के पीछे ही भागता है, वो अंधकार में जाता है। जो अविद्या (कर्म) में रत है, वो और बड़े अंधकार में।’ तो रास्ता क्या है? ‘दोनों को साथ रखो। कर्म से मृत्यु पार करो, विद्या से अमृत पाओ।’
अंत में चार मन्त्र prayers हैं, मरते वक़्त की। ‘हे सूर्य, अपना तेज समेट लो। मुझे तुम्हारा असली रूप दिखाओ।’ और एक request: ‘हे संकल्प, मेरे किए कर्मों को याद रखना।’ इन prayers में एक dying ऋषि की voice है, जो शान्ति से जा रहा है।
Introduction
मान लीजिए आप एक नया घर बनाते हैं। उस घर में रहते हैं, सजाते हैं, फिर एक दिन उसे छोड़कर जाना पड़ता है। दूसरा कोई आता है। उसका हो जाता है। आपका ‘मेरा घर’ सिर्फ़ एक window था।
ईशावास्य कह रही है कि इस पूरे जीवन के साथ भी ऐसा ही है। शरीर, रिश्ते, सम्पत्ति, सब window हैं। कोई owner नहीं है, और सब owner हैं। बस इस fact को मान लो, और जी लो।
आदि सूत्र
मन्त्र 1
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम् ॥
मन्त्र 2
एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे ॥
एक common ग़लतफ़हमी होती है कि जो आत्म-ज्ञानी होता है, वो काम छोड़कर जंगल चला जाता है। दूसरा मन्त्र इसे directly counter करता है।
‘कुर्वन्नेव इह कर्माणि’ = ‘यहाँ कर्म करते हुए ही’। ‘जिजीविषेत् शतम् समाः’ = ‘सौ साल जीने की इच्छा रखो’। यानी जीने से भागो मत, पूरा जियो। बस एक बात ध्यान रखो: पहले मन्त्र वाली बात कि सब ईश्वर का है।
तब क्या होता है? ‘न कर्म लिप्यते नरे’ = ‘कर्म तुम पर लिप्त नहीं होते’। यानी हर action का जो result आता है, अच्छा या बुरा, वो आपको bind नहीं करता।
यह बात आगे भगवद् गीता ने pick की: गीता 2.47 का ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते’ इसी विचार का विस्तार है।
मन्त्र 3
ताꣳस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः ॥
एक warning। ‘असुर्य’ लोक का literal मतलब है ‘जो असुर के हैं’। मगर परंपरा कहती है, इसका मतलब है ‘अंधकार-भरे लोक’। यहाँ शंकराचार्य कहते हैं: असुर्य कोई physical जगह नहीं, एक state of being है।
‘आत्महन’ मतलब ‘आत्मा को मारने वाला’। मगर आत्मा तो वैसे भी मरती नहीं, तो यह कैसे? शंकराचार्य की reading: जो अपने असली स्वरूप को भूलकर, सिर्फ़ शरीर-मन को ‘मैं’ मान बैठा, वो आत्म-हन है। क्योंकि उसने आत्मा को experience की दुनिया से बाहर कर दिया।
तीन मन्त्र मिलकर एक tight package बनाते हैं। पहला: सब उसका है। दूसरा: फिर भी कर्म कर। तीसरा: अगर इस सच्चाई को भूल जाओ, तो अंधकार। पूरी ईशावास्य का skeleton यहाँ है। बाक़ी 15 मन्त्र इसे develop करते हैं।
आत्मा का स्वरूप
मन्त्र 4
नैनद्देवा आप्नुवन्पूर्वमर्षत् ।
तद्धावतोऽन्यानत्येति तिष्ठत्
तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति ॥
अब आत्मा का वर्णन शुरू होता है। मगर देखिए कैसे, opposites की एक list के through।
‘अनेजत्’ = नहीं हिलता। ‘जवीयः’ = सबसे तेज़। तो हिलता नहीं और सबसे तेज़ है? मन से भी तेज़? यह कैसे?
शंकर का explanation: आत्मा अपने स्थान पर स्थिर है, क्योंकि वो space और time के बाहर है। पर वही आत्मा हर जगह है, हर पल है। तो relative रूप में, बाहर से देखो तो वो ‘सबसे तेज़’ है, अंदर देखो तो ‘स्थिर’।
‘मातरिश्वा दधाति आपः’ = ‘मातरिश्वा (वायु) जल को धारण करता है’। यानी जो activity चल रही है (वायु से बादल बनना, बादल से बारिश), वो सब उस स्थिर आत्मा पर depend करती है। पीछे से एक substrate चाहिए ही चाहिए।
मन्त्र 5
तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः ॥
पाँचवाँ मन्त्र चार जोड़े देता है, सब विरोधी:
‘तदेजति, तन्न ऐजति’ = वो चलता है, और नहीं भी। ‘तद् दूरे, तद् वन्तिके’ = वो दूर है, और पास भी। ‘तद् अन्तरस्य सर्वस्य’ = वो सब के अंदर है। ‘तद् उ सर्वस्यास्य बाह्यतः’ = और सब के बाहर भी।
यह paradox क्यों? क्योंकि साधारण भाषा में हम spatial categories use करते हैं, मगर ब्रह्म spatial नहीं है। तो जो भी category आप use करो, उसका opposite भी सच है। ‘दूर है’ सच है, ‘पास है’ भी सच।
एक practical implication: ब्रह्म ढूँढने के लिए कहीं जाना नहीं है। न ऊँचे पहाड़ पर, न मंदिर में। वो already आपके अंदर है, बाहर है, और दोनों जगह नहीं भी है। ऊपरी तौर पर यह विरोधाभास लगता है, मगर असल में यही उसका स्वरूप है।
मन्त्र 6
सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते ॥
‘जो सब प्राणियों को आत्मा में देखता है, और आत्मा को सब प्राणियों में, वो किसी से घृणा नहीं करता।’
एक practical सूत्र। ईर्ष्या, घृणा, बैर, ये सब तब उठते हैं जब हम ‘मैं’ और ‘दूसरा’ का भेद रखते हैं। जिस moment यह भेद ढीला हुआ, उतनी ही ये emotions ढीले हुए।
शंकर का comment: ‘न विजुगुप्सते’ का मतलब केवल ‘घृणा नहीं करता’ नहीं, बल्कि ‘अपने आप को बचाने की चिंता नहीं करता’। क्योंकि अगर सब मैं ही हूँ, तो किस्से बचूँ? मेरा कोई दुश्मन नहीं।
यह विचार बाद में गीता 6.30-32 में आता है।
मन्त्र 7
तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ॥
छठा मन्त्र थोड़ा सा extension देता है। अब केवल ‘घृणा नहीं’ नहीं, बल्कि ‘मोह नहीं, शोक नहीं’।
‘एकत्वम् अनुपश्यतः’ = ‘एकत्व देखने वाले के लिए’। यानी जिसके लिए हर जगह एक ही चेतना दिखती है।
क्यों कोई मोह नहीं? क्योंकि मोह तब आता है जब हम किसी एक चीज़ या व्यक्ति को special मानकर पकड़ें। अगर सब एक हैं, तो किसको special कहूँ?
क्यों कोई शोक नहीं? क्योंकि शोक तब आता है जब हम किसी ‘अपने’ को खोते हैं। अगर कोई ‘पराया’ है ही नहीं, तो खोना भी क्या? बस form बदल रहा है, substance वही है।
मन्त्र 8
अस्नाविरꣳ शुद्धमपापविद्धम् ।
कविर्मनीषी परिभूः स्वयम्भूः
याथातथ्यतोऽर्थान् व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः ॥
अब आत्मा का वर्णन एक longer list में है। ‘शुक्र’ = दीप्त, ‘अकाय’ = बिना शरीर के, ‘अव्रण’ = बिना घाव के, ‘अस्नाविर’ = बिना नाड़ी-तंत्र के। यानी कोई biological feature नहीं।
‘कविः’ = सब-कुछ-देखने वाला। ‘मनीषी’ = सोचने वाला, मगर मन से ऊपर। ‘परिभूः’ = सर्व-व्यापी। ‘स्वयम्भूः’ = अपने आप से उत्पन्न।
आखिरी पंक्ति में एक practical बात: ‘याथातथ्यतो अर्थान् व्यदधात्’। ‘उसने हर वस्तु को ठीक से व्यवस्थित किया।’ यानी जो आप संसार में देखते हैं, वो random नहीं है, उसमें एक order है। और ‘शाश्वतीभ्यः समाभ्यः’ = ‘सनातन काल के लिए’। यह order समय के साथ नहीं टूटता।
विद्या-अविद्या paradox
मन्त्र 9
ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायाꣳ रताः ॥
अब एक surprise twist। पिछले मन्त्र तक ‘विद्या (ज्ञान) पाओ’ का अंदाज़ था। अब यह कहती है: ‘जो केवल विद्या में रत हैं, वो और गहरे अंधेरे में हैं।’
क्यों? क्योंकि किताबी ज्ञान, बिना कर्म और सेवा के, एक dry exercise है। आप सब upanishad पढ़ लें, ब्रह्म-सूत्र पढ़ लें, मगर अगर रोज़ की life में कोई transformation नहीं, तो वो ज्ञान dead-weight है।
उल्टा भी सच है: ‘जो केवल अविद्या (कर्म) करते हैं, वो भी अंधेरे में जाते हैं।’ क्योंकि बिना समझ के, कर्म एक mechanical hamster-wheel बन जाता है।
तो रास्ता क्या है? अगले तीन मन्त्र बताएँगे।
मन्त्र 10
इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद्विचचक्षिरे ॥
एक छोटा मन्त्र। ‘धीर लोगों ने हमें बताया है कि विद्या से कुछ और मिलता है, अविद्या से कुछ और।’ यानी दोनों के अलग results हैं। एक ने दूसरे का काम नहीं किया।
‘धीराः’ मतलब stable, थहराए हुए विचारक। उपनिषद् कह रही है, यह हमारी ख़ुद की theory नहीं है, यह तो परंपरा से आया है। ‘हम तो बस सुनकर बता रहे हैं।’
एक तरीक़े से यह humility है। एक तरीक़े से यह authentication भी है, कि यह विद्या एक-दो लोगों की fantasy नहीं, एक पुरानी lineage है।
मन्त्र 11
अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययाऽमृतमश्नुते ॥
अब solution। ‘जो दोनों को साथ रखे…’
‘अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा’ = ‘अविद्या (कर्म) से मृत्यु पार करके’। यानी कर्म वो tool है जो साधक को death-cycle से निकालता है। निष्काम कर्म, बिना attachment वाला।
‘विद्यया अमृतम् अश्नुते’ = ‘विद्या से अमरता पाता है’। यानी आत्म-ज्ञान वो final destination है। कर्म रास्ता है, ज्ञान मंजिल।
तो practical formula: रोज़ कर्म करो, मगर समझ-समझ के। दोनों चाहिए। यह बात बहुत simple लगती है, मगर इसे जीना बहुत कठिन है। ज़्यादातर लोग या तो all-out worker बन जाते हैं, या all-out renunciate। ईशावास्य middle path बताती है।
मन्त्र 12
ततो भूय इव ते तमो य उ सम्भूत्याꣳ रताः ॥
अगले तीन मन्त्र (12-14) पिछले तीन (9-11) का mirror हैं, मगर अलग category पर।
‘सम्भूति’ = व्यक्त (manifest), यानी जो रूप में आ चुका है। ‘असम्भूति’ = अव्यक्त (unmanifest), यानी जो अभी रूप में नहीं आया, बस potential है।
यह उपनिषद् कह रही है: जो केवल असम्भूति की उपासना करते हैं (मूल कारण को, abstract को) वो अंधेरे में। और जो केवल सम्भूति की उपासना करते हैं (व्यक्त रूपों को, idols को) वो और गहरे अंधेरे में।
एक तरह से यह philosophy और religion का binary है। केवल abstract philosophy भी काफ़ी नहीं, केवल ritual भी काफ़ी नहीं। दोनों को साथ रखना है।
मन्त्र 13
इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद्विचचक्षिरे ॥
दुहराया गया pattern: ‘सम्भव से कुछ और, असम्भव से कुछ और। ऐसा धीर लोगों ने हमें बताया।’
एक तरह से यह statement Indian philosophy का एक core है। हर polarity के पास उसका function है। abstract उपासना (निराकार, formless ब्रह्म) से आपको universal vision मिलती है। मूर्ति-उपासना (साकार, form-ful) से आपको access मिलता है, intimate relationship। दोनों different gifts देती हैं।
मन्त्र 14
विनाशेन मृत्युं तीर्त्वा सम्भूत्याऽमृतमश्नुते ॥
Solution: ‘जो दोनों, सम्भूति और विनाश (असम्भूति में लीन होना), को साथ जाने…’
‘विनाशेन मृत्युं तीर्त्वा’ = ‘विनाश (व्यक्त रूपों के मिटने) से मृत्यु पार करके’। यानी रूपों की अस्थिरता को पहचानने से, मरण-चक्र से मुक्ति।
‘सम्भूत्या अमृतम् अश्नुते’ = ‘सम्भूति (सृष्टि) से अमृत पाता है’। यानी इस manifest world में रहते हुए ही अमरता।
तो दो pairs: विद्या/अविद्या (मन्त्र 9-11) and सम्भूति/असम्भूति (मन्त्र 12-14)। दोनों pair में same lesson: एक extreme मत चुनो, दोनों को साथ रखो। यह ईशावास्य का सबसे practical सबक है।
अंतिम प्रार्थनाएँ
मन्त्र 15
तत्त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये ॥
अब उपनिषद् एक नई direction लेती है। आख़िरी चार मन्त्र prayers हैं, मरते हुए ऋषि की।
‘हिरण्मय पात्र’ = सोने का पात्र। यह सूर्य के lustrous orb का रूपक है। ‘सत्य का मुख ढका हुआ है’ मतलब, बाहरी रोशनी ही असली रोशनी को छिपा रही है।
‘पूषन्’ सूर्य का एक नाम है, जिसका मतलब है ‘पोषक’ (पालने वाला)। ‘सत्यधर्माय दृष्टये’ = ‘मैं जो सत्य-धर्म वाला हूँ, मुझे देखने दो।’
यह एक beautiful image है। ऋषि सूर्य से कह रहा है, ‘तुम्हारी physical light तो मैं देख रहा हूँ, मगर असली light, जो तुम्हारे पीछे है, वो दिखाओ।’
मन्त्र 16
व्यूह रश्मीन् समूह तेजः ।
यत्ते रूपं कल्याणतमं तत्ते पश्यामि
योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि ॥
सूर्य के कई नाम। हर नाम एक aspect: पूषन् (पोषक), एकर्षि (अकेले चलने वाला), यम (control करने वाला), सूर्य (दीप्त), प्राजापत्य (प्रजापति का बेटा)।
‘व्यूह रश्मीन्, समूह तेजः’ = ‘अपनी किरणें अलग कर दो, अपना तेज समेट लो।’ यानी हे सूर्य, थोड़ा कम चमको, ताकि मैं तुम्हारे पीछे का असली रूप देख सकूँ।
अंतिम पंक्ति maha-vakya है: ‘योऽसौ असौ पुरुषः सोऽहम् अस्मि’ = ‘जो वहाँ (सूर्य में) पुरुष है, वही मैं हूँ।’ यह बृहदारण्यक के ‘अहं ब्रह्मास्मि’ का echo है। ‘मैं और वो एक हैं।’
मन्त्र 17
ॐ क्रतो स्मर कृतꣳ स्मर क्रतो स्मर कृतꣳ स्मर ॥
17वाँ मन्त्र एक dying ऋषि की voice है, बहुत practical।
‘वायुः अनिलम् अमृतम्’ = ‘मेरी प्राण-वायु अमर तत्व में मिल जाए।’ यानी जो प्राण मेरे शरीर में चल रहा है, वो वापस universal प्राण में लौट जाए।
‘अथेदं भस्मान्तं शरीरम्’ = ‘और यह शरीर भस्म हो जाए।’ शरीर का अंत हो रहा है, स्वीकार है।
फिर एक request, दो बार: ‘ओम् क्रतो स्मर, कृतं स्मर।’ ‘हे संकल्प (मेरे मन का intention), याद रख! किया हुआ कर्म याद रख!’ यह एक dying प्रार्थना है कि मेरे जीवन के कर्म व्यर्थ न जाएँ। उन्हें carry forward किया जाए, अगले जन्म तक, या आत्म-ज्ञान तक।
मन्त्र 18
विश्वानि देव वयुनानि विद्वान् ।
युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो
भूयिष्ठां ते नमउक्तिं विधेम ॥
अंतिम मन्त्र। अग्नि से प्रार्थना।
‘हे अग्ने, हमें सुपथ (अच्छे रास्ते) से ले चल।’ किधर? ‘राये’ = ‘ऐश्वर्य की ओर।’ यहाँ physical wealth नहीं, आत्मिक ऐश्वर्य का संकेत है।
‘विश्वानि देव वयुनानि विद्वान्’ = ‘हे देव, तुम सब रास्ते जानते हो।’ यानी हमें भटकने मत देना।
‘युयोधि अस्मद् जुहुराणम् एनः’ = ‘हमारी जो कुटिल त्रुटियाँ हैं, उन्हें दूर कर।’ यह humility है, कि हम imperfect हैं, हमारे अंदर कुछ ग़लत है, उसे clean करो।
‘भूयिष्ठां ते नमउक्तिं विधेम’ = ‘हम तुम्हें बार-बार नमस्ते करते हैं।’ पूरी ईशावास्य का अंत एक नमस्कार पर। बहुत सुंदर तरीक़े से एक intense philosophical text एक प्रार्थना के साथ बंद होता है।
उपनिषद् की पहली पंक्ति एक बम है। एक sentence में पूरी philosophy। ‘ईशा वास्यम्’ = ‘ईश्वर से ढका हुआ है’, या ‘ईश्वर का निवास है उसमें’। ‘इदं सर्वम्’ = ‘यह सब’। ‘जगत्यां जगत्’ = ‘जगत् में जो कुछ चलता है’।
तो पहली पंक्ति कह रही है, यह जो हम घर-गाड़ी-नौकरी-रिश्ते देखते हैं, इन सबमें कोई और बैठा है। आप नहीं, आपका employer नहीं। ईश्वर। और ‘ढका हुआ’ है, यानी आप उसे देखते नहीं, मगर वो हर जगह है।
दूसरी पंक्ति का twist: ‘तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा’। ‘त्याग करके भोगो।’ यह oxymoron है। भोग और त्याग कैसे साथ हो सकते हैं? मगर यही ईशावास्य की पूरी बात है। जिसे आप ‘अपना’ मानकर पकड़ते हैं, उसे ‘उसका’ मानकर use करो। फिर भोग आसक्ति नहीं देता।
‘मा गृधः कस्यस्विद्धनम्’। ‘किसी के धन का लोभ मत करो।’ क्योंकि कोई का धन है ही नहीं। सब का सब उसी का है। आप अगर borrowed समझें तो भी use हो जाता है, अगर ‘मेरा’ समझें तो बंधन।