ईशावास्य उपनिषद्

Live as if Everything is Borrowed
शुक्ल यजुर्वेद की वाजसनेयी संहिता का अंतिम अध्याय
कुल 18 मन्त्र। यह उन कुछ उपनिषदों में से एक है जो किसी ब्राह्मण-ग्रंथ का हिस्सा नहीं, बल्कि सीधे संहिता (मूल वेद) में बैठी है। शाब्दिक रूप से, यह यजुर्वेद की ‘मूल’ से निकली उपनिषद् है।
॥ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते ॥
वो पूर्ण है, यह भी पूर्ण है। पूर्ण से पूर्ण निकलता है। पूर्ण को पूर्ण से निकाल देने पर भी पूर्ण ही बच जाता है।
पढ़ने का समय: लगभग 20 मिनट

Background

ईशावास्य उपनिषद् दस मुख्य उपनिषदों में पहली मानी जाती है, क्योंकि शंकराचार्य ने अपनी भाष्य-परंपरा की शुरुआत इसी से की। यह यजुर्वेद की वाजसनेयी संहिता के अंतिम 40वें अध्याय में बैठी है।

नाम पहले शब्द ‘ईशा’ से पड़ा, यानी ‘ईश्वर के द्वारा’। पहली ही पंक्ति में एक radical statement है: ‘इस संसार में जो कुछ भी है, सब कुछ ईश्वर से ढका हुआ है।’ यह बाक़ी 17 मन्त्र की seedling है।

इस उपनिषद् की एक खासियत यह है कि यह बहुत कम शब्दों में बहुत गहरी बात कह जाती है। 18 मन्त्र, उनमें से 14 बहुत practical, 4 closing prayers। इसमें लंबे philosophy lectures नहीं हैं, बल्कि जीने का एक dharma है।

Mahatma Gandhi ने एक बार कहा था कि अगर बाक़ी सब हिंदू scriptures खो जाएँ और सिर्फ़ ईशावास्य का पहला मन्त्र बच जाए, तो भी हिन्दू धर्म जी सकता है। यह overstatement है, मगर इस मन्त्र की शक्ति को indicate करता है।

ईशावास्य का सबसे मज़ेदार twist यह है कि यह आत्म-ज्ञान और कर्म दोनों को साथ-साथ चलाती है। ‘ज्ञानी बनो’ भी कहती है, और ‘सौ साल कर्म करते रहो’ भी। इसमें कोई contradiction नहीं। दोनों का संतुलन इसका असली रूप है, जो आगे गीता ने उठाया।

कथा-सार (Story in Brief)

एक छोटे आदमी की कहानी से शुरू करें। आपके पास एक नौकरी है, एक घर है, परिवार है, कुछ savings हैं। आप सोचते हैं, ‘यह सब मेरा है।’ एक रात नींद नहीं आती। आप सोचते हैं, ‘अगर यह सब छूट जाए तो?’ डर लगता है।

ईशावास्य पहली ही पंक्ति में इस डर को address करती है। कहती है, ‘यह तेरा था ही कब? यह सब उसका है। तू तो बस इसे use कर रहा है। ऐसे जी जैसे यह सब borrowed है।’ और एक twist: ‘इसी borrowed शरीर से कर्म कर, सौ साल जी, बस मत भूल कि यह तेरा नहीं।’

फिर अगले मन्त्र एक paradox set करते हैं। ‘जो विद्या के पीछे ही भागता है, वो अंधकार में जाता है। जो अविद्या (कर्म) में रत है, वो और बड़े अंधकार में।’ तो रास्ता क्या है? ‘दोनों को साथ रखो। कर्म से मृत्यु पार करो, विद्या से अमृत पाओ।’

अंत में चार मन्त्र prayers हैं, मरते वक़्त की। ‘हे सूर्य, अपना तेज समेट लो। मुझे तुम्हारा असली रूप दिखाओ।’ और एक request: ‘हे संकल्प, मेरे किए कर्मों को याद रखना।’ इन prayers में एक dying ऋषि की voice है, जो शान्ति से जा रहा है।

Introduction

मान लीजिए आप एक नया घर बनाते हैं। उस घर में रहते हैं, सजाते हैं, फिर एक दिन उसे छोड़कर जाना पड़ता है। दूसरा कोई आता है। उसका हो जाता है। आपका ‘मेरा घर’ सिर्फ़ एक window था।

ईशावास्य कह रही है कि इस पूरे जीवन के साथ भी ऐसा ही है। शरीर, रिश्ते, सम्पत्ति, सब window हैं। कोई owner नहीं है, और सब owner हैं। बस इस fact को मान लो, और जी लो।

आदि सूत्र

त्याग और जीवन का संतुलन
पहले तीन मन्त्र पूरी उपनिषद् का frame तैयार करते हैं। ईश्वर सब में है। कर्म करो, मगर अनासक्त। और जो खुद को मारता है, वो अंधकार में जाता है।

मन्त्र 1

ॐ ईशा वास्यमिदꣳ सर्वं यत् किञ्च जगत्यां जगत् ।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम् ॥
साधारण अनुवाद‘इस संसार में जो कुछ भी चलता-फिरता है, सब कुछ ईश्वर से ढका हुआ है। त्याग की भावना से इसे भोगो, किसी के धन का लोभ मत करो।’

उपनिषद् की पहली पंक्ति एक बम है। एक sentence में पूरी philosophy। ‘ईशा वास्यम्’ = ‘ईश्वर से ढका हुआ है’, या ‘ईश्वर का निवास है उसमें’। ‘इदं सर्वम्’ = ‘यह सब’। ‘जगत्यां जगत्’ = ‘जगत् में जो कुछ चलता है’।

तो पहली पंक्ति कह रही है, यह जो हम घर-गाड़ी-नौकरी-रिश्ते देखते हैं, इन सबमें कोई और बैठा है। आप नहीं, आपका employer नहीं। ईश्वर। और ‘ढका हुआ’ है, यानी आप उसे देखते नहीं, मगर वो हर जगह है।

दूसरी पंक्ति का twist: ‘तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा’। ‘त्याग करके भोगो।’ यह oxymoron है। भोग और त्याग कैसे साथ हो सकते हैं? मगर यही ईशावास्य की पूरी बात है। जिसे आप ‘अपना’ मानकर पकड़ते हैं, उसे ‘उसका’ मानकर use करो। फिर भोग आसक्ति नहीं देता।

‘मा गृधः कस्यस्विद्धनम्’। ‘किसी के धन का लोभ मत करो।’ क्योंकि कोई का धन है ही नहीं। सब का सब उसी का है। आप अगर borrowed समझें तो भी use हो जाता है, अगर ‘मेरा’ समझें तो बंधन।

मन्त्र 2

कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतꣳ समाः ।
एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे ॥
साधारण अनुवाद‘इस लोक में कर्म करते हुए ही सौ साल जीने की इच्छा रखो। ऐसा करने से तुम पर कर्म लिप्त नहीं होते, यही एक मात्र रास्ता है।’

एक common ग़लतफ़हमी होती है कि जो आत्म-ज्ञानी होता है, वो काम छोड़कर जंगल चला जाता है। दूसरा मन्त्र इसे directly counter करता है।

‘कुर्वन्नेव इह कर्माणि’ = ‘यहाँ कर्म करते हुए ही’। ‘जिजीविषेत् शतम् समाः’ = ‘सौ साल जीने की इच्छा रखो’। यानी जीने से भागो मत, पूरा जियो। बस एक बात ध्यान रखो: पहले मन्त्र वाली बात कि सब ईश्वर का है।

तब क्या होता है? ‘न कर्म लिप्यते नरे’ = ‘कर्म तुम पर लिप्त नहीं होते’। यानी हर action का जो result आता है, अच्छा या बुरा, वो आपको bind नहीं करता।

यह बात आगे भगवद् गीता ने pick की: गीता 2.47 का ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते’ इसी विचार का विस्तार है।

मन्त्र 3

असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसाऽऽवृताः ।
ताꣳस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः ॥
साधारण अनुवाद‘जो लोग आत्म-हनन करते हैं (अपने असली स्वरूप को भूलते हैं), वो असुर्य नाम के अंधकार-भरे लोकों में जाते हैं।’

एक warning। ‘असुर्य’ लोक का literal मतलब है ‘जो असुर के हैं’। मगर परंपरा कहती है, इसका मतलब है ‘अंधकार-भरे लोक’। यहाँ शंकराचार्य कहते हैं: असुर्य कोई physical जगह नहीं, एक state of being है।

‘आत्महन’ मतलब ‘आत्मा को मारने वाला’। मगर आत्मा तो वैसे भी मरती नहीं, तो यह कैसे? शंकराचार्य की reading: जो अपने असली स्वरूप को भूलकर, सिर्फ़ शरीर-मन को ‘मैं’ मान बैठा, वो आत्म-हन है। क्योंकि उसने आत्मा को experience की दुनिया से बाहर कर दिया।

तीन मन्त्र मिलकर एक tight package बनाते हैं। पहला: सब उसका है। दूसरा: फिर भी कर्म कर। तीसरा: अगर इस सच्चाई को भूल जाओ, तो अंधकार। पूरी ईशावास्य का skeleton यहाँ है। बाक़ी 15 मन्त्र इसे develop करते हैं।

सारएक वाक्य में: यह सब उसका है, तुम बस use कर रहे हो। फिर भी पूरा जीवन जियो, कर्म करो। और इस fact को कभी मत भूलो, वरना अंधेरा।

आत्मा का स्वरूप

जो हिलता भी है, और स्थिर भी
अब उपनिषद् आत्मा के स्वरूप पर आती है। हर परिभाषा का उल्टा भी सच है। समदर्शन का बीज यहीं है।

मन्त्र 4

अनेजदेकं मनसो जवीयो
नैनद्देवा आप्नुवन्पूर्वमर्षत् ।
तद्धावतोऽन्यानत्येति तिष्ठत्
तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति ॥
साधारण अनुवाद‘वो (आत्मा) न हिलता है, एक है, मन से तेज़ है। इन्द्रियाँ उस तक नहीं पहुँच पातीं, क्योंकि वो उनसे पहले है। स्थिर रहते हुए भी सब को पार कर जाता है।’

अब आत्मा का वर्णन शुरू होता है। मगर देखिए कैसे, opposites की एक list के through।

‘अनेजत्’ = नहीं हिलता। ‘जवीयः’ = सबसे तेज़। तो हिलता नहीं और सबसे तेज़ है? मन से भी तेज़? यह कैसे?

शंकर का explanation: आत्मा अपने स्थान पर स्थिर है, क्योंकि वो space और time के बाहर है। पर वही आत्मा हर जगह है, हर पल है। तो relative रूप में, बाहर से देखो तो वो ‘सबसे तेज़’ है, अंदर देखो तो ‘स्थिर’।

‘मातरिश्वा दधाति आपः’ = ‘मातरिश्वा (वायु) जल को धारण करता है’। यानी जो activity चल रही है (वायु से बादल बनना, बादल से बारिश), वो सब उस स्थिर आत्मा पर depend करती है। पीछे से एक substrate चाहिए ही चाहिए।

मन्त्र 5

तदेजति तन्नैजति तद्दूरे तद्वन्तिके ।
तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः ॥
साधारण अनुवाद‘वो चलता है, और नहीं भी चलता। दूर है, और पास भी। सब के अंदर है, और सब के बाहर भी।’

पाँचवाँ मन्त्र चार जोड़े देता है, सब विरोधी:

‘तदेजति, तन्न ऐजति’ = वो चलता है, और नहीं भी। ‘तद् दूरे, तद् वन्तिके’ = वो दूर है, और पास भी। ‘तद् अन्तरस्य सर्वस्य’ = वो सब के अंदर है। ‘तद् उ सर्वस्यास्य बाह्यतः’ = और सब के बाहर भी।

यह paradox क्यों? क्योंकि साधारण भाषा में हम spatial categories use करते हैं, मगर ब्रह्म spatial नहीं है। तो जो भी category आप use करो, उसका opposite भी सच है। ‘दूर है’ सच है, ‘पास है’ भी सच।

एक practical implication: ब्रह्म ढूँढने के लिए कहीं जाना नहीं है। न ऊँचे पहाड़ पर, न मंदिर में। वो already आपके अंदर है, बाहर है, और दोनों जगह नहीं भी है। ऊपरी तौर पर यह विरोधाभास लगता है, मगर असल में यही उसका स्वरूप है।

मन्त्र 6

यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति ।
सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते ॥
साधारण अनुवाद‘जो सब प्राणियों को आत्मा में, और आत्मा को सब प्राणियों में देखता है, वो किसी से घृणा नहीं करता।’

‘जो सब प्राणियों को आत्मा में देखता है, और आत्मा को सब प्राणियों में, वो किसी से घृणा नहीं करता।’

एक practical सूत्र। ईर्ष्या, घृणा, बैर, ये सब तब उठते हैं जब हम ‘मैं’ और ‘दूसरा’ का भेद रखते हैं। जिस moment यह भेद ढीला हुआ, उतनी ही ये emotions ढीले हुए।

शंकर का comment: ‘न विजुगुप्सते’ का मतलब केवल ‘घृणा नहीं करता’ नहीं, बल्कि ‘अपने आप को बचाने की चिंता नहीं करता’। क्योंकि अगर सब मैं ही हूँ, तो किस्से बचूँ? मेरा कोई दुश्मन नहीं।

यह विचार बाद में गीता 6.30-32 में आता है।

मन्त्र 7

यस्मिन्सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः ।
तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ॥
साधारण अनुवाद‘जिस ज्ञानी के लिए सब प्राणी आत्मा ही हो गए, उसके लिए कैसा मोह, कैसा शोक? वो हर जगह एकत्व देखता है।’

छठा मन्त्र थोड़ा सा extension देता है। अब केवल ‘घृणा नहीं’ नहीं, बल्कि ‘मोह नहीं, शोक नहीं’।

‘एकत्वम् अनुपश्यतः’ = ‘एकत्व देखने वाले के लिए’। यानी जिसके लिए हर जगह एक ही चेतना दिखती है।

क्यों कोई मोह नहीं? क्योंकि मोह तब आता है जब हम किसी एक चीज़ या व्यक्ति को special मानकर पकड़ें। अगर सब एक हैं, तो किसको special कहूँ?

क्यों कोई शोक नहीं? क्योंकि शोक तब आता है जब हम किसी ‘अपने’ को खोते हैं। अगर कोई ‘पराया’ है ही नहीं, तो खोना भी क्या? बस form बदल रहा है, substance वही है।

मन्त्र 8

स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणम्
अस्नाविरꣳ शुद्धमपापविद्धम् ।
कविर्मनीषी परिभूः स्वयम्भूः
याथातथ्यतोऽर्थान् व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः ॥
साधारण अनुवाद‘वो सब जगह फैला है, शुद्ध है, बिना शरीर के, बिना घाव के, बिना नाड़ी के, पाप-रहित। कवि है, मनीषी है, सर्व-व्यापी, स्वयम्भू। उसने हर वस्तु को सनातन काल के लिए ठीक से व्यवस्थित किया है।’

अब आत्मा का वर्णन एक longer list में है। ‘शुक्र’ = दीप्त, ‘अकाय’ = बिना शरीर के, ‘अव्रण’ = बिना घाव के, ‘अस्नाविर’ = बिना नाड़ी-तंत्र के। यानी कोई biological feature नहीं।

‘कविः’ = सब-कुछ-देखने वाला। ‘मनीषी’ = सोचने वाला, मगर मन से ऊपर। ‘परिभूः’ = सर्व-व्यापी। ‘स्वयम्भूः’ = अपने आप से उत्पन्न।

आखिरी पंक्ति में एक practical बात: ‘याथातथ्यतो अर्थान् व्यदधात्’। ‘उसने हर वस्तु को ठीक से व्यवस्थित किया।’ यानी जो आप संसार में देखते हैं, वो random नहीं है, उसमें एक order है। और ‘शाश्वतीभ्यः समाभ्यः’ = ‘सनातन काल के लिए’। यह order समय के साथ नहीं टूटता।

सारएक वाक्य में: आत्मा हर परिभाषा के बाहर है, और साथ ही हर परिभाषा के अंदर। जो उसे हर जगह देखता है, उसे किसी से बैर नहीं।

विद्या-अविद्या paradox

दोनों चाहिए, दोनों ज़रूरी
एक twist: न केवल ज्ञान, न केवल कर्म। दोनों साथ चाहिए। यह उपनिषद् का सबसे practical सबक है।

मन्त्र 9

अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते ।
ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायाꣳ रताः ॥
साधारण अनुवाद‘जो केवल अविद्या (केवल कर्म, बिना ज्ञान के) की उपासना करते हैं, वो अंधेरे में जाते हैं। और जो केवल विद्या (केवल ज्ञान, बिना कर्म के) में रत हैं, वो और गहरे अंधेरे में।’

अब एक surprise twist। पिछले मन्त्र तक ‘विद्या (ज्ञान) पाओ’ का अंदाज़ था। अब यह कहती है: ‘जो केवल विद्या में रत हैं, वो और गहरे अंधेरे में हैं।’

क्यों? क्योंकि किताबी ज्ञान, बिना कर्म और सेवा के, एक dry exercise है। आप सब upanishad पढ़ लें, ब्रह्म-सूत्र पढ़ लें, मगर अगर रोज़ की life में कोई transformation नहीं, तो वो ज्ञान dead-weight है।

उल्टा भी सच है: ‘जो केवल अविद्या (कर्म) करते हैं, वो भी अंधेरे में जाते हैं।’ क्योंकि बिना समझ के, कर्म एक mechanical hamster-wheel बन जाता है।

तो रास्ता क्या है? अगले तीन मन्त्र बताएँगे।

मन्त्र 10

अन्यदेवाहुर्विद्ययाऽन्यदाहुरविद्यया ।
इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद्विचचक्षिरे ॥
साधारण अनुवाद‘विद्या से कुछ और मिलता है, अविद्या से कुछ और। ऐसा हमने धीर लोगों से सुना है, जिन्होंने हमें यह समझाया।’

एक छोटा मन्त्र। ‘धीर लोगों ने हमें बताया है कि विद्या से कुछ और मिलता है, अविद्या से कुछ और।’ यानी दोनों के अलग results हैं। एक ने दूसरे का काम नहीं किया।

‘धीराः’ मतलब stable, थहराए हुए विचारक। उपनिषद् कह रही है, यह हमारी ख़ुद की theory नहीं है, यह तो परंपरा से आया है। ‘हम तो बस सुनकर बता रहे हैं।’

एक तरीक़े से यह humility है। एक तरीक़े से यह authentication भी है, कि यह विद्या एक-दो लोगों की fantasy नहीं, एक पुरानी lineage है।

मन्त्र 11

विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभयꣳ सह ।
अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययाऽमृतमश्नुते ॥
साधारण अनुवाद‘जो दोनों, विद्या और अविद्या, को साथ-साथ जानता है, वो अविद्या से मृत्यु पार करता है और विद्या से अमृत पाता है।’

अब solution। ‘जो दोनों को साथ रखे…’

‘अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा’ = ‘अविद्या (कर्म) से मृत्यु पार करके’। यानी कर्म वो tool है जो साधक को death-cycle से निकालता है। निष्काम कर्म, बिना attachment वाला।

‘विद्यया अमृतम् अश्नुते’ = ‘विद्या से अमरता पाता है’। यानी आत्म-ज्ञान वो final destination है। कर्म रास्ता है, ज्ञान मंजिल।

तो practical formula: रोज़ कर्म करो, मगर समझ-समझ के। दोनों चाहिए। यह बात बहुत simple लगती है, मगर इसे जीना बहुत कठिन है। ज़्यादातर लोग या तो all-out worker बन जाते हैं, या all-out renunciate। ईशावास्य middle path बताती है।

मन्त्र 12

अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽसम्भूतिमुपासते ।
ततो भूय इव ते तमो य उ सम्भूत्याꣳ रताः ॥
साधारण अनुवाद‘जो असम्भूति (अव्यक्त, मूल कारण) की केवल उपासना करते हैं, वो अंधेरे में जाते हैं। और जो केवल सम्भूति (व्यक्त सृष्टि) में रत हैं, वो और गहरे अंधेरे में।’

अगले तीन मन्त्र (12-14) पिछले तीन (9-11) का mirror हैं, मगर अलग category पर।

‘सम्भूति’ = व्यक्त (manifest), यानी जो रूप में आ चुका है। ‘असम्भूति’ = अव्यक्त (unmanifest), यानी जो अभी रूप में नहीं आया, बस potential है।

यह उपनिषद् कह रही है: जो केवल असम्भूति की उपासना करते हैं (मूल कारण को, abstract को) वो अंधेरे में। और जो केवल सम्भूति की उपासना करते हैं (व्यक्त रूपों को, idols को) वो और गहरे अंधेरे में।

एक तरह से यह philosophy और religion का binary है। केवल abstract philosophy भी काफ़ी नहीं, केवल ritual भी काफ़ी नहीं। दोनों को साथ रखना है।

मन्त्र 13

अन्यदेवाहुः सम्भवादन्यदाहुरसम्भवात् ।
इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद्विचचक्षिरे ॥
साधारण अनुवाद‘सम्भव (सृष्टि) से कुछ और मिलता है, असम्भव (मूल) से कुछ और। ऐसा हमने धीर लोगों से सुना है।’

दुहराया गया pattern: ‘सम्भव से कुछ और, असम्भव से कुछ और। ऐसा धीर लोगों ने हमें बताया।’

एक तरह से यह statement Indian philosophy का एक core है। हर polarity के पास उसका function है। abstract उपासना (निराकार, formless ब्रह्म) से आपको universal vision मिलती है। मूर्ति-उपासना (साकार, form-ful) से आपको access मिलता है, intimate relationship। दोनों different gifts देती हैं।

मन्त्र 14

सम्भूतिं च विनाशं च यस्तद्वेदोभयꣳ सह ।
विनाशेन मृत्युं तीर्त्वा सम्भूत्याऽमृतमश्नुते ॥
साधारण अनुवाद‘जो सम्भूति और विनाश दोनों को साथ-साथ जानता है, वो विनाश से मृत्यु पार करता है और सम्भूति से अमृत पाता है।’

Solution: ‘जो दोनों, सम्भूति और विनाश (असम्भूति में लीन होना), को साथ जाने…’

‘विनाशेन मृत्युं तीर्त्वा’ = ‘विनाश (व्यक्त रूपों के मिटने) से मृत्यु पार करके’। यानी रूपों की अस्थिरता को पहचानने से, मरण-चक्र से मुक्ति।

‘सम्भूत्या अमृतम् अश्नुते’ = ‘सम्भूति (सृष्टि) से अमृत पाता है’। यानी इस manifest world में रहते हुए ही अमरता।

तो दो pairs: विद्या/अविद्या (मन्त्र 9-11) and सम्भूति/असम्भूति (मन्त्र 12-14)। दोनों pair में same lesson: एक extreme मत चुनो, दोनों को साथ रखो। यह ईशावास्य का सबसे practical सबक है।

सारएक वाक्य में: न केवल कर्म, न केवल ज्ञान। दोनों को साथ रखो। न केवल मूर्ति, न केवल abstract। दोनों चाहिए।

अंतिम प्रार्थनाएँ

मरते वक़्त की चार दुआएँ
अंतिम चार मन्त्र prayers हैं। सूर्य से अपना असली रूप दिखाने की request। और एक दुआ कि हमारे कर्म याद रहें।

मन्त्र 15

हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम् ।
तत्त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये ॥
साधारण अनुवाद‘हे सूर्य, सोने के पात्र से सत्य का मुख ढका हुआ है। उसे हटाओ ताकि सत्य-धर्म वाला मैं उसे देख सकूँ।’

अब उपनिषद् एक नई direction लेती है। आख़िरी चार मन्त्र prayers हैं, मरते हुए ऋषि की।

‘हिरण्मय पात्र’ = सोने का पात्र। यह सूर्य के lustrous orb का रूपक है। ‘सत्य का मुख ढका हुआ है’ मतलब, बाहरी रोशनी ही असली रोशनी को छिपा रही है।

‘पूषन्’ सूर्य का एक नाम है, जिसका मतलब है ‘पोषक’ (पालने वाला)। ‘सत्यधर्माय दृष्टये’ = ‘मैं जो सत्य-धर्म वाला हूँ, मुझे देखने दो।’

यह एक beautiful image है। ऋषि सूर्य से कह रहा है, ‘तुम्हारी physical light तो मैं देख रहा हूँ, मगर असली light, जो तुम्हारे पीछे है, वो दिखाओ।’

मन्त्र 16

पूषन्नेकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य
व्यूह रश्मीन् समूह तेजः ।
यत्ते रूपं कल्याणतमं तत्ते पश्यामि
योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि ॥
साधारण अनुवाद‘हे पूषन्, एकर्षि, यम, सूर्य, प्राजापत्य, अपनी किरणें संकेलो, अपना तेज समेटो। तुम्हारा जो सबसे कल्याणकारी रूप है, मैं उसे देख रहा हूँ। वो जो पुरुष है, वही मैं हूँ।’

सूर्य के कई नाम। हर नाम एक aspect: पूषन् (पोषक), एकर्षि (अकेले चलने वाला), यम (control करने वाला), सूर्य (दीप्त), प्राजापत्य (प्रजापति का बेटा)।

‘व्यूह रश्मीन्, समूह तेजः’ = ‘अपनी किरणें अलग कर दो, अपना तेज समेट लो।’ यानी हे सूर्य, थोड़ा कम चमको, ताकि मैं तुम्हारे पीछे का असली रूप देख सकूँ।

अंतिम पंक्ति maha-vakya है: ‘योऽसौ असौ पुरुषः सोऽहम् अस्मि’ = ‘जो वहाँ (सूर्य में) पुरुष है, वही मैं हूँ।’ यह बृहदारण्यक के ‘अहं ब्रह्मास्मि’ का echo है। ‘मैं और वो एक हैं।’

मन्त्र 17

वायुरनिलममृतमथेदं भस्मान्तꣳ शरीरम् ।
ॐ क्रतो स्मर कृतꣳ स्मर क्रतो स्मर कृतꣳ स्मर ॥
साधारण अनुवाद‘मेरी प्राण-वायु अमर तत्व में मिल जाए, यह शरीर भस्म हो जाए। ओम्, हे संकल्प, याद रख, किया हुआ याद रख। हे संकल्प, याद रख, किया हुआ याद रख।’

17वाँ मन्त्र एक dying ऋषि की voice है, बहुत practical।

‘वायुः अनिलम् अमृतम्’ = ‘मेरी प्राण-वायु अमर तत्व में मिल जाए।’ यानी जो प्राण मेरे शरीर में चल रहा है, वो वापस universal प्राण में लौट जाए।

‘अथेदं भस्मान्तं शरीरम्’ = ‘और यह शरीर भस्म हो जाए।’ शरीर का अंत हो रहा है, स्वीकार है।

फिर एक request, दो बार: ‘ओम् क्रतो स्मर, कृतं स्मर।’ ‘हे संकल्प (मेरे मन का intention), याद रख! किया हुआ कर्म याद रख!’ यह एक dying प्रार्थना है कि मेरे जीवन के कर्म व्यर्थ न जाएँ। उन्हें carry forward किया जाए, अगले जन्म तक, या आत्म-ज्ञान तक।

मन्त्र 18

अग्ने नय सुपथा राये अस्मान्
विश्वानि देव वयुनानि विद्वान् ।
युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो
भूयिष्ठां ते नमउक्तिं विधेम ॥
साधारण अनुवाद‘हे अग्नि, हमें सही रास्ते से ऐश्वर्य की ओर ले चल। हे देव, तुम सब रास्ते जानते हो। हमारी जो ग़लतियाँ हैं, उन्हें दूर करो। हम तुम्हें बार-बार नमस्कार करते हैं।’

अंतिम मन्त्र। अग्नि से प्रार्थना।

‘हे अग्ने, हमें सुपथ (अच्छे रास्ते) से ले चल।’ किधर? ‘राये’ = ‘ऐश्वर्य की ओर।’ यहाँ physical wealth नहीं, आत्मिक ऐश्वर्य का संकेत है।

‘विश्वानि देव वयुनानि विद्वान्’ = ‘हे देव, तुम सब रास्ते जानते हो।’ यानी हमें भटकने मत देना।

‘युयोधि अस्मद् जुहुराणम् एनः’ = ‘हमारी जो कुटिल त्रुटियाँ हैं, उन्हें दूर कर।’ यह humility है, कि हम imperfect हैं, हमारे अंदर कुछ ग़लत है, उसे clean करो।

‘भूयिष्ठां ते नमउक्तिं विधेम’ = ‘हम तुम्हें बार-बार नमस्ते करते हैं।’ पूरी ईशावास्य का अंत एक नमस्कार पर। बहुत सुंदर तरीक़े से एक intense philosophical text एक प्रार्थना के साथ बंद होता है।

सारएक वाक्य में: मरते वक़्त ऋषि सूर्य से अपना असली रूप माँगता है, अपने कर्मों की स्मृति माँगता है, और अग्नि से अच्छा रास्ता माँगता है।