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शुक्ल यजुर्वेद की संहिता अपने चालीसवें अध्याय पर पहुँचती है। उससे पहले के उनतालीस अध्याय यज्ञ के हैं, आहुति के हैं, वेदी नापने और मन्त्र बोलने के हैं। और फिर अचानक यह अध्याय आता है, जिसमें कोई विधि नहीं है, कोई आहुति नहीं है, कोई देवता बुलाया नहीं जाता। पहला ही शब्द पूरे जगत पर हाथ फेर देता है: “ईशावास्यमिदँ सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्”, यह सब कुछ, इस चलती हुई दुनिया में जो कुछ चलता है, ईश से ओढ़ा हुआ है। और उसके ठीक बाद, उसी साँस में, एक बात कही जाती है जिस पर सदियाँ रुकी रह गयीं, कि उसके छोड़े हुए से ही भोगिए।
अठारह मन्त्र, इतना ही पूरा उपनिषद् है। बड़े उपनिषदों के सामने यह मुट्ठी भर लगता है, और घनापन इसी में सबसे ज़्यादा है। यहाँ कोई कथा नहीं है, कोई शिष्य आकर सवाल नहीं करता, कोई राजा किसी ब्राह्मण को हराता नहीं। यहाँ एक ही स्वर है जो बिना रुके बोलता है और हर दो मन्त्र पर दिशा बदल देता है। पहले वह सारे जगत पर मालिकाना हक़ रखता है, फिर सौ बरस काम करते हुए जीने को कहता है, फिर उस सत्ता का वर्णन करता है जो खड़ी रहकर दौड़ने वालों से आगे निकल जाती है, फिर विद्या पर मुग्ध लोगों को चेतावनी देता है, और आख़िर में एक मरते हुए आदमी की तरह सूर्य और अग्नि को पुकारता है। इस उपनिषद् को पढ़ने का तरीक़ा यही है कि इन मोड़ों को एक यात्रा की तरह देखा जाये, एक-एक मन्त्र का अलग-अलग अर्थ निकालकर नहीं।
इस उपनिषद् के मुख्य किरदार
कहने वाला: मूल में इसका नाम नहीं आता। संहिता के अन्तिम अध्याय में बैठा हुआ एक स्वर, जो आदेश भी देता है और विनती भी करता है।
ईश: वह स्वामी जिससे यह सारा चलता-फिरता जगत ओढ़ा हुआ है, और जिसका छोड़ा हुआ ही हमारे भोगने के लिए है।
आत्महन्: अपने को ही मार डालने वाले लोग, इस उपनिषद् का सबसे कड़ा शब्द, जो तीसरे मन्त्र में आता है।
धीर: वे पूर्वज जिनसे विद्या और अविद्या का भेद सुना गया, और जिनकी गवाही पर यह पाठ अपनी बात रखता है।
पूषन्: सूर्य, जिन्हें पोषण करने वाला कहा गया, और जिनसे सत्य के मुँह पर पड़ा सोने का ढक्कन हटाने की विनती की जाती है।
क्रतु: भीतर बैठा हुआ संकल्प, जिसे सत्रहवें मन्त्र में अन्तिम क्षण पर पुकारा जाता है कि याद रख, जो किया था वह याद रख।
अग्नि: अठारहवें मन्त्र के देवता, जिनसे प्रार्थना है कि सीधे रास्ते से ले चलें, क्योंकि वे हमारे सब रास्ते जानते हैं।
ईशावास्यम्: ओढ़ा हुआ जगत (मन्त्र 1)
पहला शब्द ही पूरा उपनिषद् है, बाक़ी सत्रह मन्त्र उसी को खोलते हैं। ईशावास्य, यानी ईश से ढका हुआ, ईश से ओढ़ा हुआ। वास् धातु में ओढ़ने का, पहनाने का भाव है, वैसे ही जैसे किसी मूर्ति पर वस्त्र चढ़ाया जाता है या किसी बच्चे को चादर उढ़ा दी जाती है। ऊपर से डालना, ढक देना, और ढकने से जो भीतर है उसकी मर्यादा बना देना। यह उपनिषद् यह नहीं कहता कि जगत झूठा है, वह कहता है कि जगत पर एक चादर पड़ी हुई है और वह चादर ईश की है।
अगला हिस्सा और सधा हुआ है: यत्किञ्च जगत्यां जगत्, इस चलती हुई दुनिया में जो कुछ भी चलता है। जगत् शब्द दो बार आया है, और उसका मूल अर्थ ही चलना है। जो हिल रहा है, जो बदल रहा है, जो कल कुछ और था और कल कुछ और हो जायेगा, वह सब इसमें आ गया। बाज़ार, घर, शरीर, मन, रिश्ते, समय। उपनिषद् किसी चीज़ को इस चादर से बाहर नहीं छोड़ता, और यहीं से इसकी सारी कठिनाई और सारी राहत शुरू होती है।
फिर वह वाक्य आता है जिस पर इस उपनिषद् की पहचान टिकी है। “तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः”, उसके छोड़े हुए से भोगिए। भोग की मनाही कहीं नहीं है। कहा यह जा रहा है कि भोगिए उसे, जो छोड़ दिया गया हो। एक ही वाक्य में त्याग और भोग साथ खड़े हैं, और उनके बीच में कोई लड़ाई नहीं रखी गयी। जो चीज़ आपकी नहीं है, उसे आप हाथ में ले सकते हैं, बरत सकते हैं, उसका स्वाद ले सकते हैं, बस उस पर नाम नहीं लिखवा सकते।
इसे समझने के लिए किसी दर्शन की ज़रूरत नहीं, एक बहुत रोज़ की तस्वीर काफ़ी है। किराये के मकान में लोग बरसों रहते हैं, दीवार पर तस्वीर टाँगते हैं, आँगन में तुलसी लगाते हैं, बच्चों की ऊँचाई दरवाज़े पर निशान लगाकर नापते हैं। सब कुछ भोगा जाता है। बस एक बात भीतर बनी रहती है कि यह मकान अपना नहीं है। उस एक बात के रहते हुए भी जीवन पूरा जिया जाता है, और जिस दिन छोड़ना पड़ता है, तकलीफ़ होती है पर टूटना नहीं होता। यह उपनिषद् सारी पृथ्वी को इसी तरह बरतने के लिए कहता है।
और फिर चेतावनी: “मा गृधः कस्यस्विद्धनम्”, लालच मत कीजिए, धन आख़िर किसका है। इस आधे मन्त्र में एक सवाल छिपा हुआ है जिसका उत्तर कोई नहीं दे सकता। किसी भी चीज़ का पीछा कीजिए, खेत का, सोने का, नाम का, और पूछिए कि यह किसका है। जो अभी आपके पास है, वह किसी और के पास था, और उससे पहले किसी और के। ज़मीन किसी की नहीं होती, बस कुछ बरस के लिए किसी के नाम लिखी जाती है। गृध् धातु में गिद्ध की तरह झपटने का भाव है, चीज़ पर टूट पड़ने का। मन्त्र उसी झपटने को रोकता है, चीज़ को नहीं।
सार: पहला मन्त्र पूरे चलते-फिरते जगत पर ईश की चादर डाल देता है और उसी साँस में भोग की इजाज़त दे देता है, इस शर्त के साथ कि जो भोगा जाये वह छोड़ा हुआ हो। फिर वह लालच पर हाथ रखता है और एक सवाल पूछता है जिसका कोई उत्तर नहीं देता: धन आख़िर है किसका।
सौ बरस, कर्म करते हुए (मन्त्र 2 और 3)
दूसरा मन्त्र उस पाठक की ओर मुड़ता है जिसने पहला मन्त्र सुनकर हाथ झाड़ लिये हों। अगर सब कुछ ईश का है और कुछ मेरा नहीं, तो करना ही क्या है। उत्तर बहुत सीधा है: “कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतँ समाः”, यहीं, इसी जगह, कर्म करते हुए ही सौ बरस जीने की इच्छा करनी चाहिए। इह शब्द पर ध्यान दीजिए, यहीं, इसी लोक में। और एव पर भी, कर्म करते हुए ही। कोई दूसरा दरवाज़ा नहीं बताया गया।
यह बात इस उपनिषद् को बाक़ी बहुत से पाठों से अलग खड़ा कर देती है। सौ बरस जीने की इच्छा को यहाँ दोष नहीं कहा गया। कहा गया कि सौ बरस जीने की इच्छा कीजिए, और उन सौ बरसों में काम कीजिए। जो चादर पहले मन्त्र में डाली गयी थी, वह हाथ बाँधने के लिए नहीं डाली गयी थी। वह तो हाथ खोलने के लिए थी, क्योंकि जिस काम पर मालिकाना दावा नहीं है, वह काम कहीं ज़्यादा हल्के हाथों से होता है।
मन्त्र का दूसरा हिस्सा इसकी वजह बताता है: इस तरह जीने वाले मनुष्य में कर्म लिपटता नहीं। लिप् धातु का अर्थ है चिपकना, लेप लग जाना। जैसे हाथ में तेल लगा हो तो जो छूओ वही चिपक जाता है, और सूखे हाथ से वही चीज़ उठाकर रख दी जाती है। काम दोनों हाथों से होता है, बस एक में लेप है और दूसरे में नहीं। इस उपनिषद् की सारी शिक्षा उस लेप को हटाने की है, काम को रोकने की नहीं। और यह भी कहा गया कि आपके लिए इससे भिन्न कोई और रास्ता है ही नहीं।
तीसरा मन्त्र अचानक बहुत अँधेरा हो जाता है, और यह अँधेरा जानबूझकर लाया गया है। कहा गया कि असूर्य नाम के वे लोक अन्धकार से ढके हैं, और मरने के बाद वहीं जाते हैं वे लोग जो आत्महन् हैं। असूर्य यानी जहाँ सूर्य नहीं पहुँचता, जहाँ कुछ दिखता ही नहीं। और आत्महन्, अपने को मार डालने वाला, इस पूरे उपनिषद् का सबसे भारी शब्द है।
अपने को मारने का अर्थ यहाँ शरीर छोड़ देना नहीं है। जिस आत्मा की बात पहले मन्त्र में चादर के भीतर रखी गयी थी, उसे ढककर जीना, उसे भूलकर जीना, उसकी ओर कभी आँख न उठाना, इसी को यह शब्द मारना कहता है। आदमी सौ बरस जी सकता है, बहुत काम कर सकता है, बहुत धन जोड़ सकता है, और इस अर्थ में पूरे समय मरा हुआ रह सकता है। यह उपनिषद् किसी को नर्क की धमकी देने में रुचि नहीं रखता, वह केवल इतना कहता है कि जो भीतर बन्द रहकर जीता है, वह जाता भी बन्द ही रहता है, और उस बन्द जगह का नाम असूर्य है।
दो मन्त्र साथ रखिए तो एक पूरा जीवन खड़ा हो जाता है। सौ बरस, काम भरे हुए, दावे से ख़ाली। और उसके ठीक बगल में वह दूसरा जीवन, जो देखने में वैसा ही व्यस्त है, पर जिसमें कोई अपने भीतर झाँकता ही नहीं। बाहर से दोनों में फ़र्क़ बताना कठिन है। फ़र्क़ भीतर है, और यह उपनिषद् उसी भीतर की ओर उँगली रखता है।
सार: कर्म से छुट्टी कहीं नहीं दी गयी, उलटे यहीं सौ बरस काम करते हुए जीने की इच्छा करने को कहा गया, क्योंकि इस भाव से किया गया कर्म आदमी पर लेप नहीं छोड़ता। और उसके बगल में तीसरा मन्त्र असूर्य लोकों की बात रखता है, जहाँ वे जाते हैं जो अपने भीतर बैठी आत्मा को भुलाकर ही पूरा जीवन काट देते हैं।
स्थिर है, और मन से तेज़ है (मन्त्र 4 और 5)
अब स्वर बदलता है और उस सत्ता का वर्णन शुरू होता है जिसकी चादर पहले मन्त्र में डाली गयी थी। पहली ही पंक्ति में एक ऐसी बात है जो सिर घुमा देती है: “अनेजदेकं मनसो जवीयः”, वह हिलता नहीं, वह एक है, और वह मन से भी तेज़ है। जो हिलता ही नहीं, वह तेज़ कैसे हो सकता है। यह विरोध पहली बार में चुभता है और दूसरी बार में खुल जाता है।
मन की तेज़ी को नापिए। आप यहाँ बैठे हैं और मन एक पल में उस गली में पहुँच जाता है जहाँ आप बचपन में खेलते थे, अगले पल किसी और शहर में। मन से तेज़ कुछ नहीं माना जाता। पर मन जहाँ भी पहुँचता है, वहाँ यह पहले से मौजूद रहता है। इसीलिए मन इसे कभी पकड़ नहीं पाता, और इसीलिए इसे मन से तेज़ कहा गया। जो हर जगह पहले से है, उसे पहुँचने के लिए चलना नहीं पड़ता।
मन्त्र इसी बात को आगे बढ़ाता है: देवता इसे पा नहीं सके, यह उनसे पहले ही चला गया था। देव शब्द यहाँ इन्द्रियों के लिए भी पढ़ा जाता है, क्योंकि आँख, कान और मन ही हमारे भेजे हुए दूत हैं। वे जहाँ भी दौड़कर पहुँचें, यह वहाँ पहले से खड़ा मिलता है। और फिर वह पंक्ति जो सबसे सुन्दर है: खड़ा हुआ ही यह दौड़ने वालों को पीछे छोड़ देता है। किसी को दौड़ में हराने के लिए उसे दौड़ना ही पड़े, यह ज़रूरी नहीं, अगर वह मंज़िल पर पहले से बैठा हो। मन्त्र के अन्त में कहा गया कि इसी में मातरिश्वा जल को धारण करता है, यानी जो कुछ बहता और चलता है, उसका आधार यही स्थिर सत्ता है।
पाँचवाँ मन्त्र इसी को चार जोड़ों में बाँधकर रख देता है। “तदेजति तन्नैजति तद्दूरे तद्वन्तिके”, वह चलता है और वह नहीं चलता, वह दूर है और वही पास है। और फिर, वह इस सबके भीतर है और वही इस सबके बाहर भी। हर जोड़ा अपने आप में एक दरवाज़ा बन्द करता है। जो कुछ हम उसके बारे में सोचकर तय करना चाहें, अगला आधा उसे खोल देता है।
इन विरोधों को पहेली की तरह लेना ठीक नहीं है। ये नाप हैं। दूर और पास हमारे नाप हैं, चलना और ठहरना हमारी घड़ी के नाप हैं, भीतर और बाहर हमारी चमड़ी से बने नाप हैं। मन्त्र हर नाप को उठाकर उसी पर चढ़ा देता है, ताकि दिख जाये कि कोई नाप उस पर पूरी नहीं बैठती। जो नापने वाला है, वह अपने ही फ़ीते में कैसे आये।
और इन दोनों मन्त्रों का असर बहुत व्यावहारिक है। जिस चीज़ के लिए हम जीवन भर दौड़ते हैं, अगर वह दौड़ से नहीं मिलती तो उसे पाने का ढंग बदलना पड़ता है। दौड़ना यहाँ बेकार नहीं कहा गया, बस यह कहा गया कि वह पहले से वहाँ है जहाँ आप पहुँचना चाहते हैं। इसीलिए आगे आने वाले मन्त्रों में देखने की बात आती है, पाने की नहीं।
सार: चौथा और पाँचवाँ मन्त्र उस सत्ता को हर नाप से बाहर कर देते हैं: वह हिलता नहीं और मन से तेज़ है, खड़ा हुआ ही दौड़ने वालों से आगे निकल जाता है, दूर भी है और पास भी, सबके भीतर भी और सबके बाहर भी। इन्द्रियाँ जहाँ भी पहुँचें, वह वहाँ पहले से है, इसीलिए वह पकड़ में नहीं आता।
सब भूतों में अपने को देखना (मन्त्र 6 से 8)
छठा मन्त्र इस उपनिषद् का सबसे बड़ा मोड़ है, क्योंकि यहाँ पहली बार बताया जाता है कि उस सत्ता के साथ किया क्या जाये। जो सब भूतों को अपने में ही देखता है, और सब भूतों में अपने को देखता है, वह फिर किसी से घृणा नहीं करता। क्रिया पर ध्यान दीजिए, अनुपश्यति, यानी पीछे-पीछे देखना, बार-बार देखना, लगातार देखते रहना। एक बार का दर्शन नहीं, देखने का अभ्यास।
और जो फल बताया गया, वह चौंकाता है। यह नहीं कहा गया कि उसे सिद्धि मिलती है या वह लोक जीत लेता है। कहा गया कि वह विजुगुप्सते नहीं, यानी उसे किसी से घिन नहीं होती, वह किसी से मुँह नहीं फेरता। गुप् धातु में छिपाने और बचाने का भाव है, और इस रूप में घृणा से मुँह छिपा लेने का। सारे अध्यात्म का फल एक सामाजिक बात में उतर आया है: अब कोई ऐसा नहीं बचा जिससे बचकर निकलना पड़े।
यह छोटी बात नहीं है। हमारी घृणा हमेशा किसी दूरी पर टिकी होती है। जो व्यक्ति हमें बुरा लगता है, उसे हम पहले अपने से अलग करते हैं, फिर उसे एक नाम देते हैं, और तब उससे मुँह मोड़ते हैं। यह मन्त्र पहले ही क़दम पर हाथ रख देता है। जब वही आत्मा उसमें भी दिखे जो अपने में है, तो अलग करने की जगह ही नहीं बचती, और आगे की सारी इमारत बिना नींव के गिर जाती है।
सातवाँ मन्त्र इसी को एक और सीढ़ी ऊपर ले जाता है। जिस जानने वाले के लिए सब भूत आत्मा ही हो गये, “तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः”, एकत्व को लगातार देखने वाले के लिए वहाँ मोह कहाँ, शोक कहाँ। मोह और शोक को एक साथ रखना बहुत सटीक है, क्योंकि ये दोनों एक ही जड़ से उगते हैं। मोह तब होता है जब कोई चीज़ अपनी लगे और अलग भी लगे, और शोक तब होता है जब वही अलग चीज़ हाथ से निकल जाये। जहाँ अलगपन ही नहीं बचा, वहाँ दोनों की जड़ कट गयी।
आठवाँ मन्त्र उस सत्ता का एक लम्बा वर्णन है, और उसमें जो शब्द चुने गये हैं वे सब शरीर की भाषा से लिये गये हैं। वह शुक्र है, यानी उज्ज्वल। अकाय है, बिना शरीर के। अव्रण है, बिना किसी घाव के। अस्नाविर है, बिना नस-नाड़ी के। शुद्ध है और पाप से बिंधा हुआ नहीं। हमारा सारा दुख शरीर से आता है, घाव से, नस के खिंचने से, थकन से। मन्त्र एक-एक करके उन सबका इन्कार करता जाता है, जैसे कोई हमारे दुख की सूची पढ़कर हर पंक्ति पर काट लगाता जाये।
और फिर चार नाम आते हैं: कवि, मनीषी, परिभू और स्वयम्भू। कवि यानी देखने वाला, जिसकी दृष्टि में सब आ जाये। मनीषी यानी मन का स्वामी। परिभू यानी जो सबको चारों ओर से घेरे हुए है। स्वयम्भू यानी जो अपने से ही है, जिसे किसी ने बनाया नहीं। मन्त्र अन्त में कहता है कि उसने शाश्वत वर्षों के लिए अर्थों को यथातथ्य, यानी जैसा उनका ठीक स्वरूप है वैसा ही, बाँट दिया। जगत की व्यवस्था कोई अन्धी दुर्घटना नहीं है, हर चीज़ अपनी जगह पर ठीक-ठीक रखी गयी है, और यह रखना बहुत पुराना है।
सार: छठा मन्त्र सब भूतों में अपने को और अपने में सब भूतों को लगातार देखने की बात करता है, और उसका फल घृणा का उठ जाना बताता है। सातवाँ कहता है कि एकत्व देखने वाले के लिए मोह और शोक की जड़ ही नहीं बचती। आठवाँ उस सत्ता को बिना शरीर, बिना घाव, बिना नस का और अपने से ही होने वाला बताकर कहता है कि उसी ने हर चीज़ को उसका ठीक स्वरूप देकर रखा है।
विद्या और अविद्या, दोनों साथ (मन्त्र 9 से 11)
अब वह हिस्सा आता है जिस पर सबसे ज़्यादा बहस हुई है, और जो सबसे ज़्यादा ग़लत समझा गया है। “अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते”, अन्धकार में प्रवेश करते हैं वे जो अविद्या की उपासना करते हैं। यहाँ तक तो सब ठीक लगता है। पर मन्त्र आगे कहता है कि उससे भी अधिक अन्धकार में वे जाते हैं जो विद्या में रमे हुए हैं। पहली बार पढ़कर लगता है कि कहीं कुछ उलटा छप गया है।
उलटा कुछ नहीं है। अविद्या से यहाँ मतलब है वह सब जो इस चलते-फिरते जगत का ज्ञान है, कर्म का, नाम-रूप का, व्यवहार का ज्ञान। विद्या से मतलब है उस अचल सत्ता का ज्ञान। और मन्त्र का ज़ोर उस शब्द पर है जो दोनों जगह आया है: उपासते, रताः, यानी केवल उसी में लगे रहना, वहीं बस जाना। जो केवल दुनियादारी में डूबा रहा, वह अँधेरे में गया। और जो केवल ऊपर वाली बात में रम गया, दुनिया को छूने से भी कतराता रहा, वह और गहरे अँधेरे में गया। भूय इव, कुछ और भी ज़्यादा।
इसका कारण समझ में आता है। दुनियादारी में डूबा हुआ आदमी जानता है कि वह क्या कर रहा है, और किसी दिन ठोकर खाकर मुड़ सकता है। पर जिसने विद्या का नाम पकड़ लिया और उसी में बैठ गया, उसके पास एक ऐसा कवच आ गया जिसे कोई ठोकर तोड़ती नहीं। वह अपनी दूरी को साधना कहता है, अपनी उदासीनता को वैराग्य, अपनी घृणा को विवेक। छठे मन्त्र में जिस विजुगुप्सा के उठ जाने की बात थी, वह इस आदमी में सबसे मोटी होकर बैठ जाती है।
दसवाँ मन्त्र इस बात की नींव रखता है: वे कहते हैं कि विद्या से कुछ और होता है और अविद्या से कुछ और, ऐसा हमने उन धीरों से सुना जिन्होंने हमें यह समझाया। कहने वाला अपनी बात अपने बल पर नहीं रखता, वह उन लोगों की क़तार का सहारा लेता है जो पहले चल चुके। यह वही विनय है जो कई उपनिषदों में मिलती है, और इसका एक और अर्थ भी है: यह भेद किसी की अपनी खोज नहीं, यह परखा हुआ भेद है।
और फिर ग्यारहवाँ मन्त्र वह वाक्य देता है जिसके लिए यह पूरा हिस्सा लिखा गया। जो इन दोनों को, विद्या और अविद्या को, साथ-साथ जानता है, “अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययाऽमृतमश्नुते”, वह अविद्या से मृत्यु को पार करके विद्या से अमृत को पा लेता है। दोनों को काम दे दिया गया। अविद्या से नाव का काम लिया जाता है, जिससे यह किनारा पार होता है। विद्या से उस पार का काम लिया जाता है।
यही इस उपनिषद् की सबसे बड़ी बात है, और पहले मन्त्र से इसका सीधा रिश्ता है। वहाँ भोग और त्याग एक वाक्य में रखे गये थे, यहाँ संसार का ज्ञान और ब्रह्म का ज्ञान एक वाक्य में रखे गये हैं। एक ही हाथ से दोनों उठाने की बात हर बार दोहरायी जाती है। जो आदमी दफ़्तर में पूरी मेहनत करता है और शाम को उसी मन से बैठ जाता है, वह इस मन्त्र को जी रहा है। उसे अपने दो टुकड़े करने की ज़रूरत नहीं पड़ी।
सार: अविद्या में ही डूबे रहने वालों के लिए अन्धकार कहा गया, और केवल विद्या में रमे रहने वालों के लिए उससे भी गहरा अन्धकार, क्योंकि उनका कवच कोई ठोकर तोड़ती नहीं। रास्ता दोनों को साथ जानने का है, अविद्या से मृत्यु पार करके विद्या से अमृत पाने का। भोग और त्याग की तरह यहाँ भी दोनों एक ही हाथ में रखे गये हैं।
सम्भूति और विनाश: वही चेतावनी दूसरे नाम से (मन्त्र 12 से 14)
अगले तीन मन्त्र पिछले तीन का ढाँचा अक्षर-अक्षर दोहराते हैं, बस शब्द बदल जाते हैं। पहले अन्धकार उनके लिए कहा गया जो असम्भूति की उपासना करते हैं, और उससे भी गहरा अन्धकार उनके लिए जो सम्भूति में रमे हुए हैं। फिर वही गवाही कि यह हमने धीरों से सुना। और फिर वही उपाय कि दोनों को साथ जानने वाला मृत्यु पार करके अमृत पाता है।
सम्भूति का अर्थ है जो हो गया हो, जो रूप ले चुका हो, जो प्रकट है। असम्भूति का अर्थ है जो अभी हुआ नहीं, जो अप्रकट है, जिसका कोई रूप सामने नहीं आया। इन दोनों शब्दों के पीछे क्या-क्या पढ़ा गया है, इसकी एक लम्बी परम्परा है। शांकरभाष्य असम्भूति को अव्याकृत प्रकृति के रूप में और सम्भूति को हिरण्यगर्भ के रूप में पढ़ता है, और यह भाष्य का पाठ है, मन्त्र का अपना शब्द नहीं। मन्त्र अपने शब्दों में इतना ही रखता है कि जो अप्रकट में ही अटका रहा वह अँधेरे में गया, और जो प्रकट में ही रम गया वह और गहरे अँधेरे में।
चौदहवें मन्त्र में एक बात बदल जाती है, और उसे छिपाना नहीं चाहिए। वहाँ जोड़ा सम्भूति और असम्भूति का नहीं, सम्भूति और विनाश का है: विनाश से मृत्यु पार करके सम्भूति से अमृत पाया जाता है। बारहवें और चौदहवें मन्त्र के शब्द आपस में पूरी तरह नहीं मिलते, और यही वह जगह है जहाँ पाठ-भेद और भाष्य-भेद सबसे अधिक हैं। ईमानदार बात यही है कि मूल जैसा है वैसा ही रखा जाये, दोनों जोड़ों के साथ, और उन्हें ज़बरदस्ती एक रंग में न रँगा जाये।
इस पूरे हिस्से में जो बात बार-बार लौट रही है, वह ढाँचे में ही साफ़ है। पहले एक तरफ़ अटके हुए लोग, फिर दूसरी तरफ़ अटके हुए लोग, और दूसरी तरफ़ वालों के लिए और भी कड़ी बात। फिर पूर्वजों की गवाही। फिर दोनों को साथ रखने का आदेश। यह ढाँचा तीन बार चलता है, विद्या-अविद्या के साथ, फिर सम्भूति-असम्भूति के साथ, और अन्त में सम्भूति-विनाश के साथ। जो बात तीन बार एक ही साँचे में ढालकर कही जाये, उसे पाठ की सबसे बड़ी बात मान लेना चाहिए।
और वह बात हमारे जीवन की सबसे आम बीमारी पर उँगली रखती है। हम आधा उठा लेते हैं और पूरा समझ लेते हैं। कोई केवल दिखने वाली दुनिया को पकड़ता है, उसका हिसाब, उसका नाप, उसकी दौड़, और उसी में ख़त्म हो जाता है। कोई केवल अनदेखी की बात करता है, हर ठोस चीज़ से नाक-भौं सिकोड़ता है, और भीतर से सूख जाता है। उपनिषद् दोनों हाथ माँगता है, और यही माँग इसे इतना कठिन बनाती है, क्योंकि एक हाथ काट लेना हमेशा आसान रहा है।
सार: बारहवें से चौदहवें मन्त्र वही साँचा दोहराते हैं, बस विद्या और अविद्या की जगह सम्भूति, असम्भूति और विनाश आ जाते हैं। जो केवल अप्रकट में अटका उसे अँधेरा, जो केवल प्रकट में रमा उसे और गहरा अँधेरा, और दोनों को साथ जानने वाले को अमृत। चौदहवें मन्त्र में जोड़ा बदल जाता है, और यह पाठ की अपनी उलझन है जिसे वैसा ही रहने देना चाहिए।
सोने के ढक्कन के पीछे का मुँह (मन्त्र 15 और 16)
अब स्वर एकदम बदल जाता है। अब तक जो आदेश दे रहा था, वह हाथ जोड़कर खड़ा हो जाता है। “हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्”, सोने के पात्र से सत्य का मुँह ढका हुआ है। और फिर विनती: हे पूषन्, उसे हटा दीजिए, ताकि सत्य के धर्म वाले को दर्शन हो सके।
इस चित्र में जो चीज़ चुभती है, वह यह कि ढक्कन सोने का है। अगर सत्य के आगे कोई पत्थर पड़ा होता, कोई कीचड़, तो बात सरल थी, हटाने में हिचक न होती। सोने का ढक्कन हटाने में हाथ काँपता है, क्योंकि वह अपने आप में सुन्दर है, क़ीमती है, और देखने वाले की आँख उसी पर ठहर जाती है। जो चीज़ें हमें सत्य तक पहुँचने नहीं देतीं, वे अक्सर बुरी चीज़ें नहीं होतीं। वे हमारी कमाई होती हैं, हमारा नाम, हमारी विद्या, हमारा वह सब जो हमने मेहनत से बनाया।
विनती में जो शब्द रखा गया है, वह भी देखने लायक़ है: सत्यधर्माय दृष्टये, सत्य ही जिसका धर्म हो उसके लिए, देखने के लिए। माँगने वाला अपने को इस योग्य बताकर माँग रहा है, और जो माँग रहा है वह देखना है। न कोई वरदान, न कोई लोक, न कोई शक्ति। बस पर्दा हट जाये और दिख जाये।
सोलहवाँ मन्त्र उसी सूर्य को पाँच नामों से पुकारता है: पूषन्, एकर्षि, यम, सूर्य और प्राजापत्य। पूषन् यानी पोषण करने वाला, जो सबको पालता है। एकर्षि यानी अकेले चलने वाला। यम यानी संयम करने वाला, जो सबको उनकी मर्यादा में रखता है। प्राजापत्य यानी प्रजापति से सम्बन्ध रखने वाला। एक ही मण्डल को पाँच नामों से बुलाना यह बताता है कि पुकारने वाला कितने तरफ़ से उस तक पहुँचना चाहता है।
फिर वह विनती आती है जो बहुत प्यारी है: अपनी किरणों को फैला दीजिए, अपने तेज को समेट लीजिए। सूर्य की ओर सीधे देखा नहीं जा सकता, आँख झुलस जाती है। माँगने वाला रोशनी कम करने को नहीं कह रहा, वह उस चौंध को समेटने को कह रहा है जो देखने ही नहीं देती। और फिर: आपका जो रूप सबसे कल्याणकारी है, उसे मैं देखता हूँ। और अन्त में वह वाक्य जिस पर सब कुछ टिक जाता है: जो वह पुरुष उधर है, वही मैं हूँ।
इस अन्तिम पंक्ति का असर तभी खुलता है जब इसे पिछले मन्त्रों के साथ रखा जाये। छठे मन्त्र में सब भूतों में अपने को देखने की बात थी, सातवें में एकत्व की। यहाँ वही बात सूर्य के सामने खड़े होकर, आँख उठाकर, पहली पुरुष में कही जा रही है। जो मण्डल के भीतर है और जो इस देह के भीतर है, दोनों एक हैं। यह कोई दावा नहीं है, यह उस पर्दे के हटने के बाद निकला हुआ वाक्य है।
सार: सत्य का मुँह सोने के ढक्कन से ढका है, और सोने का होना ही सबसे बड़ी कठिनाई है, क्योंकि वह ढक्कन अपने आप में सुन्दर लगता है। पूषन् से केवल इतनी विनती है कि पर्दा हटा दें और दर्शन हो जाये। फिर सूर्य को पाँच नामों से पुकारकर उनका सबसे कल्याणकारी रूप देखा जाता है, और मन्त्र इस वाक्य पर ठहरता है कि जो वह पुरुष उधर है, वही मैं हूँ।
राख और स्मृति, और अग्नि से आख़िरी विनती (मन्त्र 17 और 18)
सत्रहवाँ मन्त्र बहुत छोटा है और बहुत भारी है। कहा जाता है कि यह प्राण अब अनिल में, उस अमर वायु में मिल जाये, और यह शरीर भस्म में समाप्त होने वाला है। भस्मान्तम् शरीरम्, इस एक शब्द में सारी देह की कथा पूरी हो जाती है। इस उपनिषद् में कहीं भी शरीर से घृणा नहीं की गयी, दूसरे मन्त्र में तो सौ बरस जीने की इच्छा तक कही गयी थी। यहाँ बस उसका अन्त बताया जा रहा है, बिना किसी शिकायत के, जैसे कोई अपनी यात्रा का अन्तिम पड़ाव बता दे।
और उसी क्षण में एक पुकार उठती है: “क्रतो स्मर कृतँ स्मर”, हे क्रतु, याद कर, जो किया गया उसे याद कर। और यह पूरी पंक्ति दो बार दोहरायी जाती है। क्रतु का अर्थ है संकल्प, वह इच्छाशक्ति जिससे यज्ञ भी होता है और जीवन का हर काम भी। अन्तिम क्षण में इस उपनिषद् को न धन याद आता है, न नाम, न लोग। उसे अपना संकल्प याद आता है, और उसने जो किया वह याद आता है।
इस पुकार में एक बहुत गहरी बात है। जीवन भर हम बाहर की चीज़ें जोड़ते हैं, और आख़िर में जो साथ जाता है वह भीतर का किया हुआ है। मन्त्र किसी से यह नहीं कह रहा कि डरो। वह अपने ही भीतर बैठे संकल्प को कन्धे से पकड़कर हिला रहा है और कह रहा है कि इस समय भूल मत जाना। और दो बार कहना इसलिए है कि यह वह क्षण है जब सब कुछ फिसल रहा होता है, और जो बात इस क्षण में याद रह जाये वही बात असल में सीखी गयी थी।
अठारहवाँ मन्त्र आख़िरी है, और वह अग्नि की ओर मुड़ जाता है। “अग्ने नय सुपथा राये अस्मान्”, हे अग्नि, हमें अच्छे रास्ते से समृद्धि की ओर ले चलिए। कारण भी तुरन्त दिया जाता है: आप सब वयुन जानते हैं, यानी हमारे सारे रास्ते, हमारे सारे तौर-तरीक़े आपकी जानकारी में हैं। किसी से रास्ता वही माँगता है जो मानता हो कि सामने वाले को रास्ता मालूम है।
फिर वह माँग आती है जो इस पूरे पाठ का हिसाब खोलकर रख देती है: हमसे कुटिल पाप को दूर कीजिए। जुहुराण शब्द में टेढ़ेपन का भाव है, मुड़े हुए रास्ते का। पाप को यहाँ किसी अपराध की सूची की तरह नहीं, चाल के टेढ़ेपन की तरह देखा गया है। जो सीधा नहीं चलता, वह कहीं भी पहुँचे, वहाँ ठीक से नहीं पहुँचता। और अन्त में वह पंक्ति जिसमें इस उपनिषद् की सारी विनय बैठी है: हम आपके लिए बार-बार नमस्कार का वचन कहते हैं। सबसे अधिक नमस्कार, बस इतना ही देने को बचा है।
इस अन्त पर ठहरना चाहिए। जिस उपनिषद् ने पहले मन्त्र में पूरी पृथ्वी पर एक चादर डाल दी थी, जिसने बीच में मोह और शोक की जड़ काट दी थी, वही अन्त में सूर्य से पर्दा हटाने की विनती करता है और अग्नि से सीधा रास्ता माँगता है। ऊँचे से ऊँची बात कहने के बाद भी हाथ जोड़ना बाक़ी रहता है। और इसी के साथ यह उपनिषद् पूरा होता है, उसी पूर्ण वाले शान्तिपाठ पर लौटकर, जिसमें पूर्ण में से पूर्ण निकाल लेने पर भी पूर्ण ही बचा रहता है।
सार: सत्रहवाँ मन्त्र प्राण को अमर वायु के हवाले करता है और शरीर को राख के, और उसी साँस में भीतर बैठे संकल्प को दो बार पुकारता है कि याद रख, जो किया वह याद रख। अठारहवाँ अग्नि से सीधे रास्ते की और टेढ़े पाप को हटाने की विनती करता है, और सबसे अधिक नमस्कार देकर यह उपनिषद् पूरा होता है।
और अन्त में, अपनी ओर
अठारह मन्त्र, और उनमें से पहला वाला वाक्य ही पूरे दिन के लिए काफ़ी है। सुबह उठकर एक बार यह देख लेना कि आज जो कुछ हाथ में आयेगा, वह ओढ़ी हुई चीज़ है, किसी और की चादर के नीचे से आयी हुई। इसके बाद दिन ठीक वैसा ही चलता है, वही काम, वही लोग, वही झगड़े। बस पकड़ का दबाव कुछ कम रहता है। और जब शाम को कोई चीज़ हाथ से निकल जाती है, तो वह उतनी नहीं छीलती, क्योंकि सुबह ही उस पर नाम नहीं लिखा गया था।
दूसरी बात जो साथ रखने लायक़ है, वह विद्या और अविद्या वाली है, क्योंकि वहीं हम सबसे ज़्यादा फिसलते हैं। कोई अपने काम में इतना डूब जाता है कि बरसों बाद सिर उठाकर देखता है और कुछ पहचान में नहीं आता। और कोई अध्यात्म का नाम लेकर अपने ही घर के लोगों से दूर हो जाता है, और उस दूरी को ऊँचाई समझ लेता है। यह उपनिषद् दोनों पर बराबर हाथ रखता है और दोनों हाथ माँगता है: पूरा काम, पूरी दृष्टि, एक साथ, एक ही जीवन में। इसीलिए इसने सौ बरस काम करते हुए जीने की इच्छा को कहीं बुरा नहीं कहा।
और आख़िर में वह सोने का ढक्कन, जो सबका अपना-अपना होता है। किसी के लिए वह उसकी कमाई है, किसी के लिए उसका पद, किसी के लिए उसकी विद्वत्ता, किसी के लिए वह छवि जो लोगों की आँखों में बन गयी है। हर एक अपने आप में सुन्दर है, और हर एक ठीक उसी जगह पड़ा है जहाँ देखना था। इस उपनिषद् ने उसे तोड़ने को नहीं कहा, हटाने की विनती करने को कहा, और विनती करने वाले ने अपने बारे में बस इतना कहा कि सत्य ही उसका धर्म है। रोज़ के अन्त में क्रतु वाली पुकार भी काम की है: जो किया, उसे याद रखिए। जिस दिन याद करते हुए शर्म न आये, वह दिन ठीक-ठीक जिया गया।
आधार: ईश उपनिषद्, मन्त्र 1 से 18; मूल पाठ के साथ पढ़ा गया, विवादित स्थलों पर शांकरभाष्य का संकेत।