Lulla Family

ईशावास्य उपनिषद्

शुक्ल यजुर्वेद · उपनिषद्
अठारह मन्त्रों में पूरा वेदान्त, और एक सूत्र जो भोग और त्याग की पुरानी लड़ाई एक साँस में सुलझा देता है।
A luminous golden-hued sage seated in a forest hermitage holding open a single small palm-leaf manuscript glowing with light, while around him the vast manifest world (sun, rivers, beasts, people) is shown faintly veiled in a translucent shimmering film, illustrating Ishavasyam idam sarvam, that the whole world is enveloped by the Lord.

शुक्ल यजुर्वेद की संहिता अपने चालीसवें, यानी आख़िरी अध्याय तक पहुँचती है। अब तक के पन्नों में यज्ञ-होम का विधान था, आहुति थी, कर्म का विस्तृत ब्योरा था। पर इस आख़िरी अध्याय में आते ही सुर बदल जाता है। यहाँ कोई कर्मकाण्ड का आदेश नहीं, सीधे एक घोषणा है, और घोषणा का पहला ही शब्द है ईशावास्यम् (ईश्वर से ढका हुआ)। कहते हैं महात्मा गांधी ने इस पहले मन्त्र के विषय में कहा था कि यदि संसार के समस्त शास्त्र लुप्त हो जाएँ और केवल यही एक श्लोक बचा रहे, तो भी काम चल जाएगा। केवल अठारह मन्त्र, पर इन्हीं अठारह में कर्म और ज्ञान का, भोग और त्याग का वह मेल बैठाया गया है जिसे ढूँढ़ने ऋषि वनों में भटकते रहे।

इसी पहले शब्द से इस उपनिषद् का नाम पड़ा, ईशावास्य उपनिषद्। स्वामी कृष्णानन्द बताते हैं कि यह कोई साधारण उपनिषद् नहीं, यह मन्त्रोपनिषद् (मन्त्रों में ही दीक्षा देने वाला उपनिषद्) है, और चूँकि यह संहिता के भीतर, उसके अन्त में बैठा है, इसे संहिता-उपनिषद् भी कहते हैं। पहली ही पंक्ति, ईशावास्यमिदं सर्वम् (यह सब कुछ ईश्वर से ढका है), तीन बातें एक साथ खोल देती है, जिन्हें स्वामी जी तत्त्वशास्त्र का सार कहते हैं: ईश्वर की सत्ता (अस्तित्व), जगत् का स्वरूप, और जीव का कर्तव्य। यानी ईश्वर है कौन, यह संसार है क्या, और इस संसार में मनुष्य को करना क्या है। और इसी पंक्ति के पीछे वह एक सवाल खड़ा है जो पूरे उपनिषद् को चलाता है, तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः, त्याग करके ही भोगिए, क्योंकि अन्त में पूछा यही जाता है, मा गृधः कस्यस्विद्धनम्, लोभ मत कीजिए, यह धन है आख़िर किसका?

“ईशावास्यम् इदं सर्वम्”: त्यागपूर्वक भोग

यह उपनिषद् अपने पहले ही शब्द से अपना नाम पा लेता है। जैसे केनोपनिषद् “केन” शब्द से शुरू होने के कारण वही नाम रखता है, वैसे ही यह “ईशावास्यम्” से आरम्भ होने के कारण ईशावास्योपनिषद् कहलाता है। पहली ही ऋचा एक सूत्र की तरह है, छोटी-सी, पर अपने भीतर पूरी की पूरी एक जीवन-दृष्टि समेटे हुए। महात्मा गाँधी ने इसी ऋचा के बारे में कहा था कि अगर सारे पवित्र ग्रंथ संसार से लुप्त हो जाएँ और केवल यही एक श्लोक बचा रहे, तो वह अकेला उन सबकी जगह ले सकता है।

श्लोक की पहली पंक्ति कहती है, यह सब कुछ, जो भी इस चलती-फिरती दुनिया में हिलता-डुलता है, ईश्वर से ढका हुआ है, उससे भरा हुआ है। स्वामी कृष्णानन्द (वेदान्त के आचार्य और शिवानन्द आश्रम के महासचिव) समझाते हैं कि “इदम्” (यह) का अर्थ है यह पूरा संसार, सारी सृष्टि जो हमारे सामने प्रकट है। जो दिखता है और जो नहीं दिखता, स्थूल हो या सूक्ष्म, कारण हो या कार्य, चेतन हो या जड़, सब ईश्वर से आच्छादित है। वे “ईशावास्यम्” के कई पाठ बताते हैं, ईशा + वास्यम् (जो ईश्वर के बसने योग्य है, उसका मंदिर), या ईशा + आवास्यम् (जो ईश्वर से ढका जाने योग्य है), या ईशेन + आवास्यम् (जिसमें ईश्वर इस तरह व्याप्त है जैसे खारे पानी में नमक घुला रहता है)।

Hanuman kneeling with folded hands before a blue-skinned crowned Rama in a Mughal-miniature court, with three subtle translucent overlays of Hanuman radiating from him (a humble servant bowing, a small spark merging into Rama's body, and a figure identical to Rama himself), depicting the three levels of his answer 'as body your servant, as soul your part, as Self I am You.'

स्वामी कृष्णानन्द के अनुसार ईश्वर संसार में कैसे है, इसके भी कई दर्शन हैं। नैयायिक (न्याय-दर्शन के अनुयायी) उसे कुम्हार जैसा निमित्त कारण मानते हैं, जो घड़े से अलग रहता है। विशिष्टाद्वैत उसे खारे पानी में घुले नमक जैसा कहता है, व्याप्त तो है पर भिन्न भी। और अद्वैत कहता है, ईश्वर संसार से अलग है ही नहीं। इसी को समझाने वे हनुमान जी (श्रीराम के परम भक्त) का प्रसिद्ध उत्तर सुनाते हैं। जब श्रीराम ने पूछा, “आप कौन हैं?”, तब हनुमान जी बोले, “देह की दृष्टि से मैं आपका दास हूँ; जीव की दृष्टि से मैं आपका अंश हूँ, आपकी ही एक कोशिका; और आत्मा की दृष्टि से मैं आप ही हूँ, यही मेरा निश्चय है।” स्वामी जी कहते हैं, ऐसा कोई स्थान नहीं जहाँ ईश्वर न हो; जड़ में केवल उसकी “सत्” (सत्ता, होनापन) है, चेतन में सत् के साथ चैतन्य भी; और जैसे-जैसे रजस् और तमस् घटते हैं, सत् उभरता है और तभी आनन्द फूटता है, क्योंकि सत् ही आनन्द है।

अब आती है दूसरी पंक्ति, “तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः”, उसका त्यागपूर्वक भोग करो। स्वामी कृष्णानन्द इसके दो अर्थ खोलते हैं। पहला, सांसारिक अर्थ। जब पहली पंक्ति में कह दिया कि सब कुछ ईश्वर का है, तो फिर आपका क्या? आप साथ क्या लाए थे, और जाते समय क्या ले जाएँगे? ईश्वर ने जो दिया है, उसी से सन्तुष्ट रहिए, उसी का भोग कीजिए। गीता भी यही कहती है, “यदृच्छालाभसन्तुष्टः” (जो अपने-आप मिल जाए उसी में सन्तुष्ट)। पर इसमें एक नाज़ुक बात है, आपको केवल भोग का अधिकार है, स्वामित्व का नहीं। आप तो ईश्वर के धन के एक न्यासी (ट्रस्टी, अमानतदार) मात्र हैं।

दूसरा अर्थ और गहरा है, और स्वामी जी इसे शंकराचार्य का सिद्धान्त बताते हैं। चूँकि सब कुछ ईश्वर ही है, इसलिए सब त्यागकर ईश्वर-दत्त आनन्द भोगिए। यहाँ “त्याग” का अर्थ चीज़ें फेंक देना नहीं है; इसका असली अर्थ है उनकी ओर दौड़ना छोड़ देना, अर्थात् वैराग्य (विषयों से मन का हट जाना)। उनका सूक्ष्म तर्क यह है, सुख वस्तु का स्वभाव है ही नहीं, सुख तो ईश्वर का स्वभाव है। वस्तु से जो थोड़ा-सा आनन्द मिलता-सा लगता है, उसे हम भूल से वस्तु पर आरोपित कर देते हैं। पर ईश्वर का वस्तुओं से कोई संपर्क है ही नहीं, क्योंकि वह अनन्त है। जहाँ परम-सत्ता है, वहीं परम-आनन्द है, वस्तु में नहीं। इसीलिए जितना आप विषयों की ओर दौड़ना छोड़कर ईश्वर की ओर मुड़ते हैं, उतना ही आनन्द बढ़ता है; और जितना वस्तु पाने में लगते हैं, उतनी ही चिन्ता और शोक बढ़ता है। यही उल्टी कसौटी उसी रहस्य को सिद्ध कर देती है।

स्वामी कृष्णानन्द कहते हैं कि यही सात्त्विक आनन्द है, वही जो संत-महात्मा भोगते हैं, वही जो वृन्दावन की गोपियों को मिला। उन्हें यह इसलिए नहीं मिला कि कोई विषय हाथ लग गया; यह इसलिए मिला कि वे विषयों से मुँह मोड़कर ईश्वर की ओर दौड़ीं। और अन्तिम प्रश्न, “कस्यस्विद् धनम्” (यह धन किसका है)। सांसारिक दृष्टि से, जो आपने अपने पसीने से कमाया वही आपका; दूसरे के पसीने की कमाई की ओर देखिए तक नहीं, “मा गृधः” (लालच मत कीजिए)। और परम दृष्टि से, जब सब कुछ ईश्वर का है, तो किसी पर भी पाने की इच्छा से नज़र डालने का आपको कोई अधिकार ही नहीं। मन को ईश्वर की ओर मोड़िए। स्वामी जी इसमें एक मीठी पलटी देते हैं, संसार के पीछे दौड़ने से संसार हाथ नहीं आता, पर जो ईश्वर को पा लेता है, उसे ईश्वर के साथ-साथ उसका रचा सारा संसार भी विरासत में मिल जाता है, जैसे पिता की संपत्ति संतान को।

सार: जब हर चीज़ उसी एक की है, तो अपनेपन और परायेपन का दावा ही झूठा है। त्याग का मतलब चीज़ों को छोड़ना नहीं, उन पर अपने स्वामित्व का भ्रम छोड़ना है। आप मालिक नहीं, न्यासी हैं; और सुख वस्तु में कभी था ही नहीं, वह तो उसी की झलक है जो सबमें भरा बैठा है। इसी समझ के साथ बिना बँधे भोगिए, यही असली भोग है।

कर्म करते हुए सौ बरस: काम बाँधता नहीं

पहली ऋचा में जिस आदमी से कहा गया था कि सब कुछ ईश्वर का घूँघट ओढ़े है, उसी के मन में अब एक सीधा-सा सवाल कौंधता है। ठीक है, हमने मान लिया कि सब ईश्वर का है और हमारा अपना कुछ नहीं; पर हम तो हाड़-माँस के जीव हैं, साँस लेते हैं, कमाते हैं, रूठते हैं, डरते हैं। ऐसी हालत में करें क्या? बैठ जाएँ, या काम करते रहें? यह उपनिषद् इसी झिझक का जवाब अपनी दूसरी ऋचा में देता है, और स्वामी कृष्णानन्द (आधुनिक वेदान्त के व्याख्याकार, स्वामी शिवानन्द की परम्परा के संत) इसे कर्मयोग का बीजमंत्र मानते हैं।

ऋचा का गद्य कुछ यों है: इसी संसार में कर्म करते हुए ही सौ बरस जीने की इच्छा करनी चाहिए; आपके लिए (इस देह में रहते हुए) इसके सिवा और कोई राह है ही नहीं, और इस तरह किया गया कर्म मनुष्य से चिपकता नहीं (न लिप्यते, यानी लेप की तरह लग नहीं जाता)। स्वामी कृष्णानन्द पहले इस “जीने की इच्छा” को टटोलते हैं। वे कहते हैं, जब तक यह भाव बना है कि हम अलग-अलग व्यक्ति हैं, बाहर वस्तुएँ हैं, समाज है, तब तक जिजीविषा (जीने की चाह) रहेगी, और जहाँ जीने की चाह है वहाँ कर्म अपने-आप खड़ा हो जाता है। जीव का स्वभाव ही क्रिया है, चाहे मन की हो, वाणी की हो, या देह के अंगों की।

फिर वे एक गहरी बात खोलते हैं। जीने की यह चाह असल में ईश्वर की ही सत्ता (होने की शक्ति, अस्तित्व का सार) है, जिसे वे ईश्वर-भाव कहते हैं। ईश्वर में तो केवल शुद्ध “है-पन” है। पर जीव इसमें एक अपनी पूँछ जोड़ देता है, जिसे महर्षि पतंजलि अभिनिवेश (देह से चिपके रहने का मोह, जीने का राग और मरने का डर) कहते हैं। तब जीव कहने लगता है, “हम सिर्फ़ हैं ही नहीं, हमें तो जीते भी रहना है, इसी देह में, हमेशा।” स्वामी कृष्णानन्द के अनुसार यहीं से कर्म एक टाला न जा सकने वाला धर्म बन जाता है, क्योंकि देह को बचाने और चलाने के लिए कर्म करना ही पड़ेगा।

अब असली गाँठ खुलती है। स्वामी कृष्णानन्द कहते हैं कि कर्म दोधारी तलवार है, यही काट भी सकता है और यही बचा भी सकता है। जो कर्म आदमी अपनी अलग शख़्सियत से जोड़कर, फल की लालसा और कर्ता-भाव के साथ करता है, वही उसे बाँधता है। पर जो कर्म ईश्वर में टिककर, अपने-आप को उनका एक छोटा-सा साधन मानकर, फल की चाह छोड़कर, पूजा की तरह किया जाता है, वह चिपकता ही नहीं। उनके अनुसार इसी छोटे-से वचन “न लिप्यते” में पूरी बात भरी है: समस्या कर्म नहीं है, समस्या वह “मैं कर रहा हूँ” और “इसका फल मुझे चाहिए” वाली पकड़ है। यही कारण है कि वे कहते हैं, गीता ने जिस बात को विस्तार से समझाया, वह इस एक ऋचा में बीज की तरह बंद है।

इसे समझाने के लिए वे एक सुन्दर चित्र देते हैं। ईश्वर विराट् स्वरूप (समूचे ब्रह्मांड के देह वाला पुरुष) है, और हम उस विराट् देह की एक नन्ही-सी कोशिका हैं। जैसे हमारे शरीर की हर कोशिका दिन-रात बिना रुके अपना काम करती रहती है, और दूसरी कोशिकाओं के काम में दख़ल नहीं देती, वैसे ही आदमी को अपना धर्म निभाना चाहिए। स्वामी कृष्णानन्द साफ़ कहते हैं कि काम तो हमें करना ही पड़ेगा, चाहें या न चाहें, क्योंकि प्रकृति के गुण आदमी को विवश करके कर्म में जोत देते हैं; भगवान् कृष्ण के शब्दों में, विराट् मानो कान पकड़कर हमें काम पर बैठा देता है। तो जब करना ही है, तो उसे फल की आस छोड़कर, ईश्वर की पूजा मानकर कीजिए।

आख़िर में वे जीने की चाह और कर्म को एक ही सिक्के के दो पहलू बताते हैं। चूँकि जीना और कर्तव्य अलग नहीं हो सकते, इसलिए आदमी को लम्बी और निरोग ज़िन्दगी की कामना करनी चाहिए, सौ बरस की। वे याद दिलाते हैं कि सन्ध्या-वन्दन (सन्ध्या-काल की प्रार्थना) के मंत्र भी यही माँगते हैं: सौ बरस तक हम देखें, सौ बरस तक सुनें, सौ बरस अग्नि हमारे साथ रहे। पर जो सौ बरस जीना चाहता है, उसे वे सौ बरस कर्मयोग की तरह जीने चाहिए, अपने-आप को ईश्वर की रचना के करोड़ों जीवों में से एक मानकर, निष्काम भाव से। इसी समझ से किया कर्म, स्वामी कृष्णानन्द आश्वासन देते हैं, आदमी को बाँधता नहीं, बचा लेता है।

सार: काम छोड़ना मुक्ति नहीं देता, क्योंकि जीते-जी काम छूटता ही नहीं। बँधन कर्म से नहीं आता, “मैं कर्ता हूँ” और “फल मेरा हो” इस पकड़ से आता है। उसी काम को ईश्वर की पूजा मानकर, अपने को उनके विराट् शरीर की एक कोशिका जानकर, फल की चाह छोड़कर कीजिए; तब सौ बरस का सारा कर्म भी आप पर लेप की तरह चिपकेगा नहीं।

विद्या और अविद्या: दोनों को साथ साधने वाला ही पार उतरता है

ईशावास्य उपनिषद् अब ऐसे मोड़ पर आ खड़ा हुआ है जहाँ वह एक झटके में हमारी आसान सोच पर पानी फेर देता है। हम सब मन में यही ठान बैठते हैं कि या तो दुनिया का काम-काज सच है, या भगवान का ध्यान। उपनिषद् कहता है, इन तीन मन्त्रों (नौ, दस और ग्यारह) को अलग-अलग मत पढ़िए, ये एक ही धागे में पिरोए हुए हैं। स्वामी कृष्णानन्द (इन मन्त्रों के व्याख्याकार) शुरू में ही आगाह करते हैं कि इनका असली मतलब पकड़ना टेढ़ी खीर है, हर आचार्य (व्याख्याकार) ने अपने दर्शन की रौशनी में इन्हें खोला है, और शब्द भी इतने खुले हैं कि सब अर्थ उनमें समा जाते हैं।

मन्त्र का कहना सीधा-सा सुनाई देता है। जो लोग केवल अविद्या (यहाँ अर्थ है कर्म, सांसारिक काम-काज, संसार के प्रति हमारा फ़र्ज़) की उपासना करते हैं, वे अँधेरे में जा पड़ते हैं। और जो केवल विद्या (यहाँ अर्थ है ईश्वर का ज्ञान, निरी उपासना) में अटक रहते हैं, वे और गहरे अँधेरे में डूबते हैं। दसवें मन्त्र में ऋषि कहते हैं कि धीर पुरुषों (शान्त, गम्भीर ज्ञानियों) से हमने यही सुना है, विद्या से जो फल मिलता है वह और है, अविद्या से जो मिलता है वह और। और ग्यारहवें में निचोड़ आता है, जो इन दोनों को साथ-साथ जानता है, वह अविद्या से मृत्यु को पार कर लेता है और विद्या से अमरता पा लेता है।

स्वामी कृष्णानन्द के अनुसार आचार्यों का आख़िरी फ़ैसला यह है कि ईश्वर का बोध न अकेले कर्म से मिलता है, न अकेले ज्ञान से। अकेली अविद्या यानी कर्म, ऐसे फल देता है जिनका आदि भी है और अन्त भी, और फल भोगने के लिए जन्म पर जन्म लेने पड़ते हैं, यही गहरे अँधेरे में गिरना है, यही संसार (जन्म-मरण का चक्कर) है। दूसरी ओर शास्त्र पढ़े-लिखे पंडित कर्म को अविद्या मानकर उससे मुँह मोड़ लेते हैं, काम छोड़ बैठते हैं, तो उनका ज्ञान भी मोक्ष तक नहीं पहुँचाता। स्वामी जी कहते हैं, असली बात इन दोनों के बीच ठीक तराज़ू बैठाने की है, बराबर तौल में; एक को छोड़कर दूसरे से चिपकना दोनों ओर से चूक है।

फिर वे एक गहरी बात खोलते हैं। यह जगत असल में ईश्वर से अलग कोई चीज़ है ही नहीं, अलग तो हमारी अनजानी नज़र की वजह से दिखता है। स्वामी कृष्णानन्द कहते हैं, संसार ईश्वर का चेहरा है, उसका प्रतीक है, उसका प्रतिबिम्ब है, इसीलिए हम कहते हैं कि भगवान हर चीज़ में बसा है। जब तक देह है, हमें संसार स्वीकारना ही पड़ेगा, क्योंकि देह ख़ुद संसार का ही एक अंग है। तो रास्ता यह निकलता है कि संसार के प्रति अपना फ़र्ज़ निभाइए, मगर ईश्वर के ज्ञान की रौशनी में। यही कर्म-योग (कर्म करते हुए ईश्वर से जुड़े रहने की साधना) है। वे तन्त्रशास्त्र की एक चोट करती हुई बात याद दिलाते हैं, जिस चीज़ से आप गिरते हैं, उसी से उठ भी सकते हैं। यह जगत हमें फँसा भी सकता है और मुक्त भी कर सकता है।

इसी को समझाने के लिए स्वामी जी एक सजीव चित्र खींचते हैं। कर्म जंगल के शेर जैसा है। उसे यदि आप ईश्वर-सत्ता (भगवान के होने) की बुनियाद से काटकर अकेला छोड़ देंगे, तो वह आपको निगल जाएगा। पर सर्कस का उस्ताद उसी शेर को क़ाबू में रखता है, क्योंकि वह शेर की फ़ितरत का राज़ जानता है। ऐसे ही जब आप कर्म का भेद जान लेते हैं कि हर कर्म ईश्वर-सत्ता पर ही टिका है, तब कर्म का बाँधने वाला ज़हर उतर जाता है। वे एक और चित्र देते हैं, कर्म दोधारी तलवार है; सिपाही के हाथ में वह दुश्मन को हराती है, बच्चे के हाथ में वही ख़ुद उसके और सबके लिए ख़तरा बन जाती है। फ़र्क़ इतना ही है कि चलाने का हुनर आता है या नहीं।

अन्त में स्वामी कृष्णानन्द दो शब्द जोड़ते हैं, सत्य और ऋत (वैदिक भाषा में: सत्य वह शाश्वत नियम जो ईश्वर परे रहकर चलाते हैं, और ऋत वही नियम जो सृष्टि में काम करता दिखाई देता है)। दोनों को साथ स्वीकारना, एक को दूसरे में देखना, यही विद्या और अविद्या को एक उपासना में जोड़ना है, और यही, उन्हीं के शब्दों में, असली वीर का काम है। वे कहते हैं, निष्काम कर्म (फल की चाह बिना किया गया काम) से मन निर्मल होता है, और निर्मल मन ही ध्यान के क़ाबिल बनता है। मृत्यु को पार करना और अमरता पाना दो अलग मंज़िलें नहीं हैं; जैसे रोग से छूटना और निरोग होना एक ही बात है, ऐसे ही ये दोनों एक ही ठिकाने पर मिलते हैं।

सार: संसार से भागना भी अधूरा है और संसार में डूब रहना भी। राज़ बीच की डोर में है, अपना फ़र्ज़ पूरी तरह निभाइए, पर इस जान के साथ कि वह फ़र्ज़ ईश्वर की ही बुनियाद पर खड़ा है। तब कर्म का शेर सधा हुआ चलता है, अविद्या से मृत्यु पार होती है और विद्या से अमरता, और दोनों एक ही द्वार पर खुलते हैं।

वह जो स्थिर रहकर भी सबके आगे

ईशावास्य उपनिषद् अब हमें वहाँ ले जाता है जहाँ अब तक की सारी बात एक नुक़्ते पर आ ठहरती है। पहले तीन मन्त्रों में जो कहा गया कि हर कर्म उसी को समर्पित करना है, अब वह “उसी” का परिचय खोलता है। यह “उसी” है ईश्वर (परम सत्ता, जो सबका भीतरी नियामक है)। स्वामी कृष्णानन्द, जो शिवानन्द आश्रम के विद्वान आचार्य रहे और जिन्होंने इन छोटे प्रवचनों में इस उपनिषद् को आम पढ़ने वाले के लिए खोला, इन चौथे और पाँचवें मन्त्रों को एक ही साँस में पढ़ते हैं, क्योंकि दोनों उसी एक विरोधाभास के दो पहलू हैं।

उपनिषद् कहता है, वह एक है, हिलता नहीं, उसमें कोई कम्पन नहीं, फिर भी मन से तेज़ है। स्वामी कृष्णानन्द इसे यूँ समझाते हैं। वह केवल सत्ता (होना, अस्तित्व) है, अद्वितीय (जिसके बराबर दूसरा कोई नहीं), अविभाज्य, माप से परे, और देश-काल (जगह और समय) से उसका कोई वास्ता नहीं। उसके पार या उससे अलग कुछ है ही नहीं। इसी को समझाने के लिए वे एक पुरानी उपमा देते हैं, वह “अचल चालक” है, सबको चलाता तो है पर ख़ुद कभी नहीं हिलता।

A serene radiant Self seated motionless at the center of a great spiral cosmos, while a streaking comet-like mind races outward toward a distant golden Brahmaloka, yet finds the same calm luminous Self already seated there waiting, illustrating the unmoving One that is swifter than the mind.

फिर वे एक सुन्दर दृष्टान्त देते हैं। मन की गति इतनी है कि वह पलक झपकते ब्रह्मलोक (सृष्टि का परम लोक) तक पहुँच जाता है। पर आत्मा (हमारा असली स्वरूप, भीतर बैठी चेतना) की गति उससे भी आगे है, क्योंकि जब मन वहाँ पहुँचता है, आत्मा तो पहले से ही वहाँ बैठी मिलती है। स्वामी जी कहते हैं, यही “हिलता नहीं पर सबके आगे” का अर्थ है। जैसे आकाश में तारे बड़े वेग से दौड़ते हैं फिर भी टँगे हुए-से जान पड़ते हैं, वैसे ही गहरी-से-गहरी गतिशीलता बाहर से निश्चल दिखती है। यह पत्थर का जड़ ठहराव नहीं, यह परम वेग है। गरुड़ हों, उड़ते हनुमान हों, या तेज़ पंखों वाले देवता, कोई उससे आगे नहीं निकल सकता। यहाँ “देव” शब्द से इन्द्रियों का भी संकेत है, और उपनिषद् कहता है कि इन्द्रियाँ उस तक पहुँच ही नहीं पातीं, क्योंकि वह उनसे पहले ही वहाँ होता है। वह तो विचार के भी पीछे की वह नींव है जिस पर विचार उठता है।

स्वामी कृष्णानन्द इस गति को मातरिश्वा (वायु, जो आकाश में गति करती है, जिसे कुछ लोग हिरण्यगर्भ या महाप्राण मानते हैं) से जोड़ते हैं। यही व्यापक नियम हर कर्म को बाँटता और सँभालता है। उनका परम जीवन्त उदाहरण अपना शरीर है। हृदय का रक्त-चक्र, साँस का तन्त्र, पाचन, नाड़ियाँ, हड्डियाँ, माँसपेशियाँ और हज़ारों कोशिकाएँ, सब जन्म से मृत्यु तक बिना रुके इतने तालमेल से चलती हैं। इस अद्भुत व्यवस्था को कौन चलाता है? वे कहते हैं, यह अविभाज्य चैतन्य (अखण्ड चेतना) है। अगर यह बँटी हुई होती तो यह तन्त्र कभी इतने मेल से न चल पाता। जो विराट ब्रह्माण्ड में काम कर रहा है, वही इस छोटे-से शरीर-पिण्ड में काम कर रहा है। उनका मार्मिक वाक्य यह है कि मनुष्य में होना और करना दो अलग बातें हैं, पर ईश्वर में सत्ता (होना) और क्रिया (करना) एक ही हैं।

अब पाँचवाँ मन्त्र इन्हीं विरोधों को एक माला में पिरो देता है। वह चलता भी है और नहीं भी, दूर भी है और बहुत पास भी, सबके भीतर भी और सबके बाहर भी। स्वामी कृष्णानन्द कहते हैं, ये सारे विरोध ईश्वर में मेल खा जाते हैं। आकाश की तरह वह जहाँ चाहे वहीं है। और एक गहरी बात वे यूँ रखते हैं, जहाँ आप पहुँचना चाहते हैं अगर आप वहाँ पहले से ही हैं, तो हिलने की ज़रूरत कहाँ रही? इसलिए वह हिलता नहीं। ये “चलता है, नहीं चलता, दूर है, पास है” वाली बातें व्यवहार की दृष्टि से कही गई हैं। परम दृष्टि से तो भीतर, बाहर, पास, दूर, कोई भी क्रिया-शब्द उस पर लगता ही नहीं। वह इन्द्रियों, वस्तुओं और मन की सोच से परले-से-परले दूर है, और साथ ही गहरे-से-गहरा निकट, क्योंकि वह तो हर प्राणी की अपनी आत्मा है, सबका सच्चा मित्र।

The fire-god Agni, a flame-bodied deity riding ascending columns of fire ever upward through star-filled cosmic space trying to measure the boundless creation, halted and turning back exhausted at the blazing orb of the sun, with the tiny sage-sons Sanaka and his brothers still drifting onward in the far dark heavens, showing the One that is farther than the farthest.

इस दूरी को समझाने के लिए वे योगवासिष्ठ की एक कथा भी सुनाते हैं। अग्निदेव ने सृष्टि की लम्बाई-चौड़ाई नापने की ठानी और ऊपर, और ऊपर उड़ते गए, पर सूर्य के मण्डल से आगे न जा सके, हार कर लौट आए। कहा जाता है कि ब्रह्मा के मानस-पुत्र सनक और उनके भाई आज भी उसे नापने के लिए ब्रह्माण्ड में चल रहे हैं। तात्पर्य यह कि वह दूर-से-दूर है और फिर भी निकट-से-निकट। पुरुषसूक्त भी यही कहता है कि सारे ब्रह्माण्ड को घेरकर भी वह उससे आगे फैला रहता है। इसीलिए उसमें तीन प्रकार के भेद, सजातीय (एक जैसी चीज़ों में अन्तर, जैसे दो मनुष्य), विजातीय (अलग चीज़ों में अन्तर, जैसे पेड़ और मनुष्य) और स्वगत (अपने ही अंगों के बीच अन्तर), कोई भी नहीं ठहरता। न भीतरी फ़र्क़, न बाहरी विविधता। इन ढेर सारे विरोधों को गिनाने का एक ही प्रयोजन है, मन को आत्मा का सच सिखाना, कि उसके सिवा और कुछ है ही नहीं।

सार: जो परम है उसमें “होना” और “करना” एक हो जाते हैं, इसलिए वह बिना हिले सबके आगे, बिना दौड़े परम वेगवान, और बिना यात्रा किए हर जगह मौजूद है। ये विरोधाभास इसलिए हैं कि वह देश-काल से परे है। उसे ढूँढ़ने कहीं दूर जाने की ज़रूरत नहीं, क्योंकि जिसे आप खोज रहे हैं वही आपके भीतर बैठी आपकी अपनी आत्मा है, गहरे-से-गहरा निकट।

सोने के ढक्कन के पीछे सत्य का मुख

यह उपनिषद् अब अपने अन्तिम चार मन्त्रों पर आ पहुँचा है, और दृश्य बदल गया है। अब तक जो चिन्तन चल रहा था, वह प्रार्थना बन गया है। बोलने वाला उपासक है, यानी वह साधक जिसने जीवन भर सत्य की राह पकड़ी, और अब आख़िरी घड़ी के सामने खड़ा है। उसकी निगाह आकाश के उस सूर्य पर है जिसे पूषन् (पोषण करने वाला देवता, सूर्य) कहा गया है। पूरब की ओर मुँह करके वह उस चमकती हुई गोल थाली को देखता है और एक विनती करता है।

An aged white-clad seeker standing at dawn facing east with outstretched hands, gazing at a dazzling golden solar disc whose blinding sheet of gold light is being lifted aside like a lid to reveal a calm luminous purusha-face of Truth hidden behind it, the prayer to Pushan to remove the golden cover.

उसकी विनती यह है, “हे पूषन्, सत्य का मुख एक हिरण्मय पात्र (सोने के ढक्कन) से ढका हुआ है। आप वह ढक्कन हटा दीजिए, ताकि मैं सत्यधर्मी (सत्य को ही अपना धर्म मानने वाला) होकर उस सत्य के दर्शन कर सकूँ।” स्वामी कृष्णानन्द कहते हैं कि यहाँ “सोने का पात्र” कोई बाहरी वस्तु नहीं है, यह तो वही तेज़ है जो सूर्य से फूटता है। हमारी आँखें उस प्रकाश की चकाचौंध में बँध जाती हैं, हमें केवल एक तेजोबिन्दु (प्रकाश की चमकीली बूँद) दिखता है, और भीतर छिपा हुआ असली रूप ढक जाता है। साधक कहता है, हे प्रभु, यह चमक ही आपका परदा है, इसे हटा दीजिए।

स्वामी जी इस प्रार्थना को और गहरे ले जाते हैं। उनके अनुसार यह “सोने का पात्र” वे सब वस्तुएँ भी हैं जो हमारे सामने सोने-सी चमकती हैं। पर जैसा कहावत में है, जो चमकता है वह सोना नहीं होता। हम वस्तुओं में दरअसल अपने ही मन का प्रक्षेप (मन की फेंकी हुई किरण) देखते हैं, और उसी को संसार मान बैठते हैं। इसलिए वे कहते हैं कि यह प्रार्थना असल में अपने ही मन से की गई प्रार्थना है, “हे मन, अपनी इन बिखरी किरणों को समेट लो, वस्तुओं से जुड़ी इस दृष्टि को हटा लो। जो जगत मैंने अपने से बाहर खड़ा मान रखा था, वह भ्रम है। यह परदा हटे तो सत्य दिखे।”

साधक का बल इस बात पर है कि उसका इस दर्शन पर हक़ है। स्वामी कृष्णानन्द बताते हैं कि यहाँ सत्य (जो है, वह) और धर्म (उसका नियम) एक ही माने गए हैं। सूर्य के भीतर बैठा सत्य और हर प्राणी के भीतर बैठा सत्य अलग नहीं हैं, वही एक पुरुष (चेतन तत्त्व) दोनों में है। इसीलिए साधक कह उठता है, “जो वह पुरुष है, वही मैं हूँ।” वह कहता है, मेरा जीवन धर्म पर टिका है, और धर्म उसी सत्य से निकलता है जो आपका मूल रूप है। जब हम दोनों की नींव एक ही सत्य है, तो आपको देखने का, और देखकर स्वयं वही सत्य हो जाने का, मुझे अधिकार है।

फिर मन की ओर मुड़कर वह आख़िरी हिसाब माँगता है। मरते समय की प्रार्थना है, “यह शरीर तो भस्मान्त है (अन्त में राख होने वाला), इसके प्राण वायु में लौट जाएँ, इसका अंश हिरण्यगर्भ (सृष्टि के मूल बीज) में लौट जाए, मेरे कर्मों के फल अपने-अपने ठिकाने पर पहुँच जाएँ। पर हे मन, इस घड़ी में, ॐ का स्मरण रखना। याद करो, इस जीवन में जो कुछ किया, सब याद करो।” स्वामी जी कहते हैं कि यही पंक्ति “क्रतो स्मर, कृतं स्मर” (हे संकल्प, स्मरण कर, जो किया है उसका स्मरण कर) जान-बूझकर दो बार दोहराई गई है, जैसे ईसा मसीह का वचन, अभी पश्चात्ताप कर लो, क्योंकि अन्त सामने है। उनके अनुसार सच्चा पश्चात्ताप अपने-आप में एक बड़ा तप है, एक महाव्रत (आजीवन निभाने वाला संकल्प), जो पतंजलि के अनुसार कभी ढीला नहीं पड़ता। साथ जाएगा केवल कर्मों का फल, इस फैले हुए जगत की और कोई वस्तु नहीं।

अन्त में प्रार्थना अग्नि की ओर हो जाती है। साधक कहता है, “हे अग्ने, मुझे सीधे और शुभ मार्ग से ले चलिए (उत्तरायण की वह राह जो मुक्ति की ओर जाती है)। आप सब जानने वाले हैं, हे देव। मेरे अनजाने में, अपनी मूढ़ता में किए हुए जितने पाप हैं, उन्हें केवल क्षमा ही मत कीजिए, उन्हें जला दीजिए। बार-बार आपको नमस्कार है।” स्वामी कृष्णानन्द कहते हैं कि इन प्रार्थनाओं के सहारे जीव सूर्य के द्वारा ईश्वर तक पहुँचने की याचना करता है। जीव जब ईश्वर की उसी सत्ता में लीन हो जाता है, इसी कारण इस उपनिषद् का नाम ईशावास्य है। और जिस पूर्णता के मन्त्र (ॐ पूर्णमदः) से यह उपनिषद् शुरू हुआ था, उसी पर आकर वह ठहर जाता है।

सार: जो वस्तु हमें रोक रखती है, वह अँधेरा नहीं, बहुत तेज़ चमक है। संसार की सुनहरी झिलमिल ही सत्य के मुख पर पड़ा परदा है, और वह परदा कहीं बाहर नहीं, हमारे ही मन की बिखरी किरणों में है। उन्हें समेट लीजिए तो जो सूर्य में बैठा है, वही आपके भीतर मिलेगा। और जब अन्तिम घड़ी आए, साथ केवल किए हुए कर्म और एक चेतन स्मरण जाता है, इसलिए आज ही ॐ को याद रखना सीख लीजिए, ताकि उस घड़ी देह राख हो जाए पर चेतना सीधे मार्ग पर बनी रहे।

और अन्त में, अपनी ओर

तो यह उपनिषद् पहली ही साँस में पूरी बात कह देता है, “ईशावास्यमिदं सर्वम्” (यह सब कुछ ईश से ढका, उसी से भरा है)। स्वामी कृष्णानन्द कहते हैं कि जैसे खारे पानी में नमक घुला रहता है, वैसे ही यह सारा जगत, दिखता-अनदिखता, चेतन-जड़, सब उसी एक सत्ता से भरा पड़ा है; ऐसी कोई जगह नहीं जहाँ वह न हो। और जब सब कुछ उसी का है, तो आपका अपना क्या? स्वामी जी के अनुसार आप यहाँ मालिक नहीं, बस एक न्यासी (अमानत सँभालने वाले) हैं; भोगने का हक़ है, अपना कहकर मुट्ठी भींचने का नहीं। इसीलिए वह दूसरी पंक्ति आती है, “तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा, मा गृधः” (छोड़कर भोगिए, ललचाइए मत)। स्वामी जी इसमें एक गुप्त बात खोलते हैं, कि सुख वस्तु में है ही नहीं, सुख तो उसी एक का स्वभाव है; इसलिए जितना आप पकड़ ढीली करते हैं, उतना ही भीतर का आनन्द बढ़ता जाता है। पकड़ने की दौड़ चिंता बढ़ाती है, और हाथ खोलना हल्का कर देता है।

आगे यह उपनिषद् इसी बात को और पैना कर देता है, “यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति” (जो सब प्राणियों को अपने ही भीतर देखे, और अपने को सब प्राणियों में)। स्वामी कृष्णानन्द कहते हैं कि राग और द्वेष, यह मेरा, यह पराया, सब उसी दीवार से जन्मते हैं जो हम बाहर और भीतर के बीच खड़ी कर लेते हैं; जिस दिन वह दीवार गिर जाती है, उस दिन किसी से घृणा का, किसी से होड़ का कोई आधार ही नहीं बचता। तब उपनिषद् पूछता है, “तत्र को मोहः कः शोकः” (वहाँ कैसा मोह, कैसा शोक), क्योंकि जो एकता को देख ले उसके लिए कोई दूसरा रहता ही नहीं। लहर सागर में है और सागर लहर में, यही ईशावास्य का न्योता है, हर रूप में उसी एक को पहचान लीजिए और बिना मुट्ठी भींचे जी लीजिए। तब काम भी पूरा होता रहेगा और मन भी हल्का रहेगा। एक पल को रुककर अपने भीतर देखिए, जिस “मैं” से आप यह सब पकड़ते हैं, क्या वह भी उसी एक की झलक नहीं?

सार: जब सब कुछ उसी एक से भरा दिखने लगे, तो न पकड़ने की हड़बड़ी रहती है, न छोड़ने का बोझ। स्वामी कृष्णानन्द के अनुसार आप यहाँ मालिक नहीं, अमानत के रखवाले हैं; और सुख वस्तु में नहीं, उसी एक के स्पर्श में है, इसलिए हाथ जितना खुलता है, आनन्द उतना बढ़ता है। जो हर रूप में उसी को देख ले, उसके लिए न कोई मोह बचता है, न कोई शोक। यही ईशावास्य का न्योता, हर चीज़ में उसी को देखना और बिना मुट्ठी भींचे जीना।

व्याख्या मुख्यतः स्वामी कृष्णानन्द (दिव्य जीवन संघ) की ईशावास्योपनिषद्-व्याख्या पर आधारित।