Lulla Family

अंग 273

अंग
273
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सुखमनी साहिब का हिस्सा। पूरी 24 अष्टपदियों की हिन्दी टीका /sukhmani-sahib/ पर है।
ब्रहम गिआनी की द्रिसटि अंम्रितु बरसी ॥
ब्रहम गिआनी बंधन ते मुकता ॥
ब्रहम गिआनी की निरमल जुगता ॥
ब्रहम गिआनी का भोजनु गिआन ॥
नानक ब्रहम गिआनी का ब्रहम धिआनु ॥3॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: उसकी नजर से (सब के ऊपर) अमृत की बरखा होती है। ब्रहमज्ञानी (माया के) बंधनों से आजाद होता है। और उसकी जीवन-जुगति विकारों से रहित है। (रॅबी-) ज्ञान ब्रहमज्ञानी की खुराक है (भाव। ब्रहमज्ञानी की आत्मिक जिंदगी का आसरा है)। हे नानक ! ब्रहमज्ञानी की सुरति अकाल-पुरख के साथ जुड़ी रहती है।
ब्रहम गिआनी एक ऊपरि आस ॥
ब्रहम गिआनी का नही बिनास ॥
ब्रहम गिआनी कै गरीबी समाहा ॥
ब्रहम गिआनी परउपकार उमाहा ॥
ब्रहम गिआनी कै नाही धंधा ॥
ब्रहम गिआनी ले धावतु बंधा ॥
ब्रहम गिआनी कै होइ सु भला ॥
ब्रहम गिआनी सुफल फला ॥
ब्रहम गिआनी संगि सगल उधारु ॥
नानक ब्रहम गिआनी जपै सगल संसारु ॥4॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: ब्रहमज्ञानी एक अकाल-पुरख पर आस रखता है; ब्रहमज्ञानी (की ऊँची आत्मिक अवस्था) का कभी विनाश नहीं होता। ब्रहमज्ञानी के हृदय में गरीबी टिकी रहती है। और उसे दूसरों की भलाई करने का (सदा) चाव (चढ़ा रहता) है। ब्रहमज्ञानी के मन में (माया का) जंजाल नहीं व्यापता। (क्योंकि) वह भटकते मन को काबू करके (माया की तरफ से) रोक सकता है। जो कुछ (प्रभू द्वारा) होता है। ब्रहमज्ञानी को अपने मन में भला प्रतीत होता है। (इस तरह) उसका मानस जनम अच्छी तरह कामयाब होता है। ब्रहमज्ञानी की संगति में सबका बेड़ा पार होता है। (क्योंकि) हे नानक ! ब्रहमज्ञानी के द्वारा सारा जगत (ही) (प्रभू का नाम) जपने लग पड़ता है।4।
ब्रहम गिआनी कै एकै रंग ॥
ब्रहम गिआनी कै बसै प्रभु संग ॥
ब्रहम गिआनी कै नामु आधारु ॥
ब्रहम गिआनी कै नामु परवारु ॥
ब्रहम गिआनी सदा सद जागत ॥
ब्रहम गिआनी अहंबुधि तिआगत ॥
ब्रहम गिआनी कै मनि परमानंद ॥
ब्रहम गिआनी कै घरि सदा अनंद ॥
ब्रहम गिआनी सुख सहज निवास ॥
नानक ब्रहम गिआनी का नही बिनास ॥5॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: ब्रहमज्ञानी के हृदय में (सदा) एक अकाल-पुरख का प्यार (बसता है)। (तभी तो) प्रभू ब्रहमज्ञानी के अंग-संग रहता है। ब्रहमज्ञानी के मन में (प्रभू का) नाम (ही) टेक है और नाम ही उसका परिवार है। ब्रहमज्ञानी सदा (विकारों के हमलों से) सुचेत रहता है। और ‘मैं मैं’ करने वाली मति त्याग देता है। ब्रहमज्ञानी के मन में इस ऊँचे सुख का मालिक अकाल-पुरख बसता है। (तभी तो) उसके हृदय रूपी घर में सदा खुशी खिड़ाव है। ब्रहमज्ञानी (मनुष्य) सुख और शांति में टिका रहता है; (और) हे नानक ! ब्रहमज्ञानी (की इस ऊँची अवस्था) का कभी नाश नहीं होता।5।
ब्रहम गिआनी ब्रहम का बेता ॥
ब्रहम गिआनी एक संगि हेता ॥
ब्रहम गिआनी कै होइ अचिंत ॥
ब्रहम गिआनी का निरमल मंत ॥
ब्रहम गिआनी जिसु करै प्रभु आपि ॥
ब्रहम गिआनी का बड परताप ॥
ब्रहम गिआनी का दरसु बडभागी पाईऐ ॥
ब्रहम गिआनी कउ बलि बलि जाईऐ ॥
ब्रहम गिआनी कउ खोजहि महेसुर ॥
नानक ब्रहम गिआनी आपि परमेसुर ॥6॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: ब्रहमज्ञानी (मनुष्य) अकाल-पुरख का महरम बन जाता है और वह एक प्रभू के साथ ही प्यार करता है। ब्रहमज्ञानी के मन में (सदैव) बेफिक्री रहती है। उसका उपदेश (भी औरों को) पवित्र करने वाला होता है। वही मनुष्य ब्रहमज्ञानी बनता है) जिसे प्रभू खुद बनाता है। ब्रहमज्ञानी का बड़ा नाम हो जाता है ब्रहमज्ञानी का दीदार बड़े भाग्यों से प्राप्त होता है। ब्रहमज्ञानी से सदा सदके जाएं। शिव (आदि देवते भी) ब्रहमज्ञानी को तलाशते फिरते हैं; हे नानक ! अकाल-पुरख स्वयं ही ब्रहमज्ञानी (का रूप) है।6।
ब्रहम गिआनी की कीमति नाहि ॥
ब्रहम गिआनी कै सगल मन माहि ॥
ब्रहम गिआनी का कउन जानै भेदु ॥
ब्रहम गिआनी कउ सदा अदेसु ॥
ब्रहम गिआनी का कथिआ न जाइ अधाख्यरु ॥
ब्रहम गिआनी सरब का ठाकुरु ॥
ब्रहम गिआनी की मिति कउनु बखानै ॥
ब्रहम गिआनी की गति ब्रहम गिआनी जानै ॥
ब्रहम गिआनी का अंतु न पारु ॥
नानक ब्रहम गिआनी कउ सदा नमसकारु ॥7॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: ब्रहमज्ञानी (के गुणों) का मूल्य नहीं पड़ सकता। सारे ही (गुण) ब्रहमज्ञानी के अंदर हैं। कौन सा मनुष्य ब्रहमज्ञानी (की उच्च जिंदगी) का भेद पा सकता है? ब्रहमज्ञानी के आगे सदा झुकना ही (फबता) है। ब्रहमज्ञानी (की महिमा) का आधा अक्षर भी कहा नहीं जा सकता; ब्रहमज्ञानी सारे जीवों का पूज्य है ब्रहमज्ञानी (की ऊँची जिंदगी) का अंदाजा कौन लगा सकता है? उस हालत को (उस जैसा) ब्रहमज्ञानी ही जानता है। ब्रहमज्ञानी (के गुणों के समुंद्र) की कोई सीमा नहीं; हे नानक ! सदा ब्रहमज्ञानी के चरणों में पड़ा रह।7।
ब्रहम गिआनी सभ स्रिसटि का करता ॥
ब्रहम गिआनी सद जीवै नही मरता ॥
ब्रहम गिआनी मुकति जुगति जीअ का दाता ॥
ब्रहम गिआनी पूरन पुरखु बिधाता ॥
ब्रहम गिआनी अनाथ का नाथु ॥
ब्रहम गिआनी का सभ ऊपरि हाथु ॥
ब्रहम गिआनी का सगल अकारु ॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: ब्रहमज्ञानी सारे जगत को बनाने वाला है। सदा ही जीवित है। कभी (जनम) मरण के चक्कर में नहीं आता। ब्रहमज्ञानी मुक्ति का राह (बताने वाला व उच्च आत्मिक) जिंदगी देने वाला है। वही पूर्ण पुरख व कादर है ब्रहमज्ञानी निखस्मों का खसम है (अनाथों का नाथ है)। सब की सहायता करता है। सारा दिखाई देने वाला जगत ब्रहमज्ञानी का (अपना) है।

गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “उसकी नजर से (सब के ऊपर) अमृत की बरखा होती है।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
English