अंग 273

अंग
273
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सुखमनी साहिब का हिस्सा। पूरी 24 अष्टपदियों की हिन्दी टीका /sukhmani-sahib/ पर है।
ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਕੀ ਦ੍ਰਿਸਟਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਬਰਸੀ ॥
ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਬੰਧਨ ਤੇ ਮੁਕਤਾ ॥
ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਕੀ ਨਿਰਮਲ ਜੁਗਤਾ ॥
ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਕਾ ਭੋਜਨੁ ਗਿਆਨ ॥
ਨਾਨਕ ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਕਾ ਬ੍ਰਹਮ ਧਿਆਨੁ ॥੩॥
ब्रहम गिआनी की द्रिसटि अंम्रितु बरसी ॥
ब्रहम गिआनी बंधन ते मुकता ॥
ब्रहम गिआनी की निरमल जुगता ॥
ब्रहम गिआनी का भोजनु गिआन ॥
नानक ब्रहम गिआनी का ब्रहम धिआनु ॥३॥

हिन्दी अर्थ: उसकी नजर से (सब के ऊपर) अमृत की बरखा होती है। ब्रहमज्ञानी (माया के) बंधनों से आजाद होता है। और उसकी जीवन-जुगति विकारों से रहित है। (रॅबी-) ज्ञान ब्रहमज्ञानी की खुराक है (भाव। ब्रहमज्ञानी की आत्मिक जिंदगी का आसरा है)। हे नानक ! ब्रहमज्ञानी की सुरति अकाल-पुरख के साथ जुड़ी रहती है।
ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਏਕ ਊਪਰਿ ਆਸ ॥
ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਕਾ ਨਹੀ ਬਿਨਾਸ ॥
ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਕੈ ਗਰੀਬੀ ਸਮਾਹਾ ॥
ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਪਰਉਪਕਾਰ ਉਮਾਹਾ ॥
ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਕੈ ਨਾਹੀ ਧੰਧਾ ॥
ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਲੇ ਧਾਵਤੁ ਬੰਧਾ ॥
ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਕੈ ਹੋਇ ਸੁ ਭਲਾ ॥
ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਸੁਫਲ ਫਲਾ ॥
ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਸੰਗਿ ਸਗਲ ਉਧਾਰੁ ॥
ਨਾਨਕ ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਜਪੈ ਸਗਲ ਸੰਸਾਰੁ ॥੪॥
ब्रहम गिआनी एक ऊपरि आस ॥
ब्रहम गिआनी का नही बिनास ॥
ब्रहम गिआनी कै गरीबी समाहा ॥
ब्रहम गिआनी परउपकार उमाहा ॥
ब्रहम गिआनी कै नाही धंधा ॥
ब्रहम गिआनी ले धावतु बंधा ॥
ब्रहम गिआनी कै होइ सु भला ॥
ब्रहम गिआनी सुफल फला ॥
ब्रहम गिआनी संगि सगल उधारु ॥
नानक ब्रहम गिआनी जपै सगल संसारु ॥४॥

हिन्दी अर्थ: ब्रहमज्ञानी एक अकाल-पुरख पर आस रखता है; ब्रहमज्ञानी (की ऊँची आत्मिक अवस्था) का कभी विनाश नहीं होता। ब्रहमज्ञानी के हृदय में गरीबी टिकी रहती है। और उसे दूसरों की भलाई करने का (सदा) चाव (चढ़ा रहता) है। ब्रहमज्ञानी के मन में (माया का) जंजाल नहीं व्यापता। (क्योंकि) वह भटकते मन को काबू करके (माया की तरफ से) रोक सकता है। जो कुछ (प्रभू द्वारा) होता है। ब्रहमज्ञानी को अपने मन में भला प्रतीत होता है। (इस तरह) उसका मानस जनम अच्छी तरह कामयाब होता है। ब्रहमज्ञानी की संगति में सबका बेड़ा पार होता है। (क्योंकि) हे नानक ! ब्रहमज्ञानी के द्वारा सारा जगत (ही) (प्रभू का नाम) जपने लग पड़ता है।4।
ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਕੈ ਏਕੈ ਰੰਗ ॥
ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਕੈ ਬਸੈ ਪ੍ਰਭੁ ਸੰਗ ॥
ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਕੈ ਨਾਮੁ ਆਧਾਰੁ ॥
ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਕੈ ਨਾਮੁ ਪਰਵਾਰੁ ॥
ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਸਦਾ ਸਦ ਜਾਗਤ ॥
ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਅਹੰਬੁਧਿ ਤਿਆਗਤ ॥
ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਕੈ ਮਨਿ ਪਰਮਾਨੰਦ ॥
ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਕੈ ਘਰਿ ਸਦਾ ਅਨੰਦ ॥
ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਸੁਖ ਸਹਜ ਨਿਵਾਸ ॥
ਨਾਨਕ ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਕਾ ਨਹੀ ਬਿਨਾਸ ॥੫॥
ब्रहम गिआनी कै एकै रंग ॥
ब्रहम गिआनी कै बसै प्रभु संग ॥
ब्रहम गिआनी कै नामु आधारु ॥
ब्रहम गिआनी कै नामु परवारु ॥
ब्रहम गिआनी सदा सद जागत ॥
ब्रहम गिआनी अहंबुधि तिआगत ॥
ब्रहम गिआनी कै मनि परमानंद ॥
ब्रहम गिआनी कै घरि सदा अनंद ॥
ब्रहम गिआनी सुख सहज निवास ॥
नानक ब्रहम गिआनी का नही बिनास ॥५॥

हिन्दी अर्थ: ब्रहमज्ञानी के हृदय में (सदा) एक अकाल-पुरख का प्यार (बसता है)। (तभी तो) प्रभू ब्रहमज्ञानी के अंग-संग रहता है। ब्रहमज्ञानी के मन में (प्रभू का) नाम (ही) टेक है और नाम ही उसका परिवार है। ब्रहमज्ञानी सदा (विकारों के हमलों से) सुचेत रहता है। और ‘मैं मैं’ करने वाली मति त्याग देता है। ब्रहमज्ञानी के मन में इस ऊँचे सुख का मालिक अकाल-पुरख बसता है। (तभी तो) उसके हृदय रूपी घर में सदा खुशी खिड़ाव है। ब्रहमज्ञानी (मनुष्य) सुख और शांति में टिका रहता है; (और) हे नानक ! ब्रहमज्ञानी (की इस ऊँची अवस्था) का कभी नाश नहीं होता।5।
ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਬ੍ਰਹਮ ਕਾ ਬੇਤਾ ॥
ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਏਕ ਸੰਗਿ ਹੇਤਾ ॥
ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਕੈ ਹੋਇ ਅਚਿੰਤ ॥
ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਕਾ ਨਿਰਮਲ ਮੰਤ ॥
ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਜਿਸੁ ਕਰੈ ਪ੍ਰਭੁ ਆਪਿ ॥
ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਕਾ ਬਡ ਪਰਤਾਪ ॥
ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਕਾ ਦਰਸੁ ਬਡਭਾਗੀ ਪਾਈਐ ॥
ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਕਉ ਬਲਿ ਬਲਿ ਜਾਈਐ ॥
ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਕਉ ਖੋਜਹਿ ਮਹੇਸੁਰ ॥
ਨਾਨਕ ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਆਪਿ ਪਰਮੇਸੁਰ ॥੬॥
ब्रहम गिआनी ब्रहम का बेता ॥
ब्रहम गिआनी एक संगि हेता ॥
ब्रहम गिआनी कै होइ अचिंत ॥
ब्रहम गिआनी का निरमल मंत ॥
ब्रहम गिआनी जिसु करै प्रभु आपि ॥
ब्रहम गिआनी का बड परताप ॥
ब्रहम गिआनी का दरसु बडभागी पाईऐ ॥
ब्रहम गिआनी कउ बलि बलि जाईऐ ॥
ब्रहम गिआनी कउ खोजहि महेसुर ॥
नानक ब्रहम गिआनी आपि परमेसुर ॥६॥

हिन्दी अर्थ: ब्रहमज्ञानी (मनुष्य) अकाल-पुरख का महरम बन जाता है और वह एक प्रभू के साथ ही प्यार करता है। ब्रहमज्ञानी के मन में (सदैव) बेफिक्री रहती है। उसका उपदेश (भी औरों को) पवित्र करने वाला होता है। वही मनुष्य ब्रहमज्ञानी बनता है) जिसे प्रभू खुद बनाता है। ब्रहमज्ञानी का बड़ा नाम हो जाता है ब्रहमज्ञानी का दीदार बड़े भाग्यों से प्राप्त होता है। ब्रहमज्ञानी से सदा सदके जाएं। शिव (आदि देवते भी) ब्रहमज्ञानी को तलाशते फिरते हैं; हे नानक ! अकाल-पुरख स्वयं ही ब्रहमज्ञानी (का रूप) है।6।
ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਕੀ ਕੀਮਤਿ ਨਾਹਿ ॥
ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਕੈ ਸਗਲ ਮਨ ਮਾਹਿ ॥
ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਕਾ ਕਉਨ ਜਾਨੈ ਭੇਦੁ ॥
ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਕਉ ਸਦਾ ਅਦੇਸੁ ॥
ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਕਾ ਕਥਿਆ ਨ ਜਾਇ ਅਧਾਖੵਰੁ ॥
ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਸਰਬ ਕਾ ਠਾਕੁਰੁ ॥
ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਕੀ ਮਿਤਿ ਕਉਨੁ ਬਖਾਨੈ ॥
ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਕੀ ਗਤਿ ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਜਾਨੈ ॥
ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਕਾ ਅੰਤੁ ਨ ਪਾਰੁ ॥
ਨਾਨਕ ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਕਉ ਸਦਾ ਨਮਸਕਾਰੁ ॥੭॥
ब्रहम गिआनी की कीमति नाहि ॥
ब्रहम गिआनी कै सगल मन माहि ॥
ब्रहम गिआनी का कउन जानै भेदु ॥
ब्रहम गिआनी कउ सदा अदेसु ॥
ब्रहम गिआनी का कथिआ न जाइ अधाखॵरु ॥
ब्रहम गिआनी सरब का ठाकुरु ॥
ब्रहम गिआनी की मिति कउनु बखानै ॥
ब्रहम गिआनी की गति ब्रहम गिआनी जानै ॥
ब्रहम गिआनी का अंतु न पारु ॥
नानक ब्रहम गिआनी कउ सदा नमसकारु ॥७॥

हिन्दी अर्थ: ब्रहमज्ञानी (के गुणों) का मूल्य नहीं पड़ सकता। सारे ही (गुण) ब्रहमज्ञानी के अंदर हैं। कौन सा मनुष्य ब्रहमज्ञानी (की उच्च जिंदगी) का भेद पा सकता है? ब्रहमज्ञानी के आगे सदा झुकना ही (फबता) है। ब्रहमज्ञानी (की महिमा) का आधा अक्षर भी कहा नहीं जा सकता; ब्रहमज्ञानी सारे जीवों का पूज्य है ब्रहमज्ञानी (की ऊँची जिंदगी) का अंदाजा कौन लगा सकता है? उस हालत को (उस जैसा) ब्रहमज्ञानी ही जानता है। ब्रहमज्ञानी (के गुणों के समुंद्र) की कोई सीमा नहीं; हे नानक ! सदा ब्रहमज्ञानी के चरणों में पड़ा रह।7।
ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਸਭ ਸ੍ਰਿਸਟਿ ਕਾ ਕਰਤਾ ॥
ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਸਦ ਜੀਵੈ ਨਹੀ ਮਰਤਾ ॥
ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਮੁਕਤਿ ਜੁਗਤਿ ਜੀਅ ਕਾ ਦਾਤਾ ॥
ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਪੂਰਨ ਪੁਰਖੁ ਬਿਧਾਤਾ ॥
ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਅਨਾਥ ਕਾ ਨਾਥੁ ॥
ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਕਾ ਸਭ ਊਪਰਿ ਹਾਥੁ ॥
ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਕਾ ਸਗਲ ਅਕਾਰੁ ॥
ब्रहम गिआनी सभ स्रिसटि का करता ॥
ब्रहम गिआनी सद जीवै नही मरता ॥
ब्रहम गिआनी मुकति जुगति जीअ का दाता ॥
ब्रहम गिआनी पूरन पुरखु बिधाता ॥
ब्रहम गिआनी अनाथ का नाथु ॥
ब्रहम गिआनी का सभ ऊपरि हाथु ॥
ब्रहम गिआनी का सगल अकारु ॥

हिन्दी अर्थ: ब्रहमज्ञानी सारे जगत को बनाने वाला है। सदा ही जीवित है। कभी (जनम) मरण के चक्कर में नहीं आता। ब्रहमज्ञानी मुक्ति का राह (बताने वाला व उच्च आत्मिक) जिंदगी देने वाला है। वही पूर्ण पुरख व कादर है ब्रहमज्ञानी निखस्मों का खसम है (अनाथों का नाथ है)। सब की सहायता करता है। सारा दिखाई देने वाला जगत ब्रहमज्ञानी का (अपना) है।

संदर्भ: यह अंग 273 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।

M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।

Vasant Vihar के market में Sunday सुबह की धीमी-धीमी activity।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 52 पंक्तियों का है, 6 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 273” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 274 →, पीछे का: ← अंग 272

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।