अंग
280
राग Gauree
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਨਾਨਕ ਸੰਤ ਭਾਵੈ ਤਾ ਓਇ ਭੀ ਗਤਿ ਪਾਹਿ ॥੨॥
नानक संत भावै ता ओइ भी गति पाहि ॥२॥
हिन्दी अर्थ: (हाँ) हे नानक ! अगर संतों को भाए तो वे निंदक भी बढ़िया अवस्था में पहुँच जाते हैं। 2।
ਸੰਤ ਕਾ ਨਿੰਦਕੁ ਮਹਾ ਅਤਤਾਈ ॥
ਸੰਤ ਕਾ ਨਿੰਦਕੁ ਖਿਨੁ ਟਿਕਨੁ ਨ ਪਾਈ ॥
ਸੰਤ ਕਾ ਨਿੰਦਕੁ ਮਹਾ ਹਤਿਆਰਾ ॥
ਸੰਤ ਕਾ ਨਿੰਦਕੁ ਪਰਮੇਸੁਰਿ ਮਾਰਾ ॥
ਸੰਤ ਕਾ ਨਿੰਦਕੁ ਰਾਜ ਤੇ ਹੀਨੁ ॥
ਸੰਤ ਕਾ ਨਿੰਦਕੁ ਦੁਖੀਆ ਅਰੁ ਦੀਨੁ ॥
ਸੰਤ ਕੇ ਨਿੰਦਕ ਕਉ ਸਰਬ ਰੋਗ ॥
ਸੰਤ ਕੇ ਨਿੰਦਕ ਕਉ ਸਦਾ ਬਿਜੋਗ ॥
ਸੰਤ ਕੀ ਨਿੰਦਾ ਦੋਖ ਮਹਿ ਦੋਖੁ ॥
ਨਾਨਕ ਸੰਤ ਭਾਵੈ ਤਾ ਉਸ ਕਾ ਭੀ ਹੋਇ ਮੋਖੁ ॥੩॥
ਸੰਤ ਕਾ ਨਿੰਦਕੁ ਖਿਨੁ ਟਿਕਨੁ ਨ ਪਾਈ ॥
ਸੰਤ ਕਾ ਨਿੰਦਕੁ ਮਹਾ ਹਤਿਆਰਾ ॥
ਸੰਤ ਕਾ ਨਿੰਦਕੁ ਪਰਮੇਸੁਰਿ ਮਾਰਾ ॥
ਸੰਤ ਕਾ ਨਿੰਦਕੁ ਰਾਜ ਤੇ ਹੀਨੁ ॥
ਸੰਤ ਕਾ ਨਿੰਦਕੁ ਦੁਖੀਆ ਅਰੁ ਦੀਨੁ ॥
ਸੰਤ ਕੇ ਨਿੰਦਕ ਕਉ ਸਰਬ ਰੋਗ ॥
ਸੰਤ ਕੇ ਨਿੰਦਕ ਕਉ ਸਦਾ ਬਿਜੋਗ ॥
ਸੰਤ ਕੀ ਨਿੰਦਾ ਦੋਖ ਮਹਿ ਦੋਖੁ ॥
ਨਾਨਕ ਸੰਤ ਭਾਵੈ ਤਾ ਉਸ ਕਾ ਭੀ ਹੋਇ ਮੋਖੁ ॥੩॥
संत का निंदकु महा अतताई ॥
संत का निंदकु खिनु टिकनु न पाई ॥
संत का निंदकु महा हतिआरा ॥
संत का निंदकु परमेसुरि मारा ॥
संत का निंदकु राज ते हीनु ॥
संत का निंदकु दुखीआ अरु दीनु ॥
संत के निंदक कउ सरब रोग ॥
संत के निंदक कउ सदा बिजोग ॥
संत की निंदा दोख महि दोखु ॥
नानक संत भावै ता उस का भी होइ मोखु ॥३॥
संत का निंदकु खिनु टिकनु न पाई ॥
संत का निंदकु महा हतिआरा ॥
संत का निंदकु परमेसुरि मारा ॥
संत का निंदकु राज ते हीनु ॥
संत का निंदकु दुखीआ अरु दीनु ॥
संत के निंदक कउ सरब रोग ॥
संत के निंदक कउ सदा बिजोग ॥
संत की निंदा दोख महि दोखु ॥
नानक संत भावै ता उस का भी होइ मोखु ॥३॥
हिन्दी अर्थ: संत की निंदा करने वाला सदा अति किए रखता है। और एक पलक भर भी (अपनी अत्याचारी आदत) से बाज नहीं आता। संत का निंदक बड़ा जालिम बन जाता है। और रॅब द्वारा धिक्कारा जाता है। संत का निंदक राज (भाव। दुनिया के सुखों) से वंचित रहता है। (सदा) दुखी और आतुर रहता है। संत की निंदा करने वाले को सारे रोग व्याप्ते हैं (क्योंकि) उसका (सुखों के श्रोत प्रभू से) सदा विछोड़ा बना रहता है। संत की निंदा करनी बहुत ही बुरा काम है। हे नानक ! अगर संतों को भाए तो उस (निंदक) का भी (निंदा से) छुटकारा हो जाता है। 3।
ਸੰਤ ਕਾ ਦੋਖੀ ਸਦਾ ਅਪਵਿਤੁ ॥
ਸੰਤ ਕਾ ਦੋਖੀ ਕਿਸੈ ਕਾ ਨਹੀ ਮਿਤੁ ॥
ਸੰਤ ਕੇ ਦੋਖੀ ਕਉ ਡਾਨੁ ਲਾਗੈ ॥
ਸੰਤ ਕੇ ਦੋਖੀ ਕਉ ਸਭ ਤਿਆਗੈ ॥
ਸੰਤ ਕਾ ਦੋਖੀ ਮਹਾ ਅਹੰਕਾਰੀ ॥
ਸੰਤ ਕਾ ਦੋਖੀ ਸਦਾ ਬਿਕਾਰੀ ॥
ਸੰਤ ਕਾ ਦੋਖੀ ਜਨਮੈ ਮਰੈ ॥
ਸੰਤ ਕੀ ਦੂਖਨਾ ਸੁਖ ਤੇ ਟਰੈ ॥
ਸੰਤ ਕੇ ਦੋਖੀ ਕਉ ਨਾਹੀ ਠਾਉ ॥
ਨਾਨਕ ਸੰਤ ਭਾਵੈ ਤਾ ਲਏ ਮਿਲਾਇ ॥੪॥
ਸੰਤ ਕਾ ਦੋਖੀ ਕਿਸੈ ਕਾ ਨਹੀ ਮਿਤੁ ॥
ਸੰਤ ਕੇ ਦੋਖੀ ਕਉ ਡਾਨੁ ਲਾਗੈ ॥
ਸੰਤ ਕੇ ਦੋਖੀ ਕਉ ਸਭ ਤਿਆਗੈ ॥
ਸੰਤ ਕਾ ਦੋਖੀ ਮਹਾ ਅਹੰਕਾਰੀ ॥
ਸੰਤ ਕਾ ਦੋਖੀ ਸਦਾ ਬਿਕਾਰੀ ॥
ਸੰਤ ਕਾ ਦੋਖੀ ਜਨਮੈ ਮਰੈ ॥
ਸੰਤ ਕੀ ਦੂਖਨਾ ਸੁਖ ਤੇ ਟਰੈ ॥
ਸੰਤ ਕੇ ਦੋਖੀ ਕਉ ਨਾਹੀ ਠਾਉ ॥
ਨਾਨਕ ਸੰਤ ਭਾਵੈ ਤਾ ਲਏ ਮਿਲਾਇ ॥੪॥
संत का दोखी सदा अपवितु ॥
संत का दोखी किसै का नही मितु ॥
संत के दोखी कउ डानु लागै ॥
संत के दोखी कउ सभ तिआगै ॥
संत का दोखी महा अहंकारी ॥
संत का दोखी सदा बिकारी ॥
संत का दोखी जनमै मरै ॥
संत की दूखना सुख ते टरै ॥
संत के दोखी कउ नाही ठाउ ॥
नानक संत भावै ता लए मिलाइ ॥४॥
संत का दोखी किसै का नही मितु ॥
संत के दोखी कउ डानु लागै ॥
संत के दोखी कउ सभ तिआगै ॥
संत का दोखी महा अहंकारी ॥
संत का दोखी सदा बिकारी ॥
संत का दोखी जनमै मरै ॥
संत की दूखना सुख ते टरै ॥
संत के दोखी कउ नाही ठाउ ॥
नानक संत भावै ता लए मिलाइ ॥४॥
हिन्दी अर्थ: संत का निंदक सदा मैले मन वाला है (तभी) वह (कभी) किसी का सज्जन नहीं बनता। (अंत समय) संत के निंदक को (धर्मराज से) सजा मिलती है और सारे उसका साथ छोड़ जाते हैं। संत की निंदा करने वाला बड़े गुरूर वाला (अकड़ वाला ) बन जाता है और सदा बुरे काम करता है। (इन औगुणों में) संत का निंदक पैदा होता मरता रहता है। और संत की निंदा के कारण सुखों से वंचित रहता है। संत के निंदक को कोई सहारा नहीं मिलता। (पर हाँ)। हे नानक ! अगर संत चाहे अपने साथ उस (निंदक) को मिला लेता है। 4।
ਸੰਤ ਕਾ ਦੋਖੀ ਅਧ ਬੀਚ ਤੇ ਟੂਟੈ ॥
ਸੰਤ ਕਾ ਦੋਖੀ ਕਿਤੈ ਕਾਜਿ ਨ ਪਹੂਚੈ ॥
ਸੰਤ ਕੇ ਦੋਖੀ ਕਉ ਉਦਿਆਨ ਭ੍ਰਮਾਈਐ ॥
ਸੰਤ ਕਾ ਦੋਖੀ ਉਝੜਿ ਪਾਈਐ ॥
ਸੰਤ ਕਾ ਦੋਖੀ ਅੰਤਰ ਤੇ ਥੋਥਾ ॥
ਜਿਉ ਸਾਸ ਬਿਨਾ ਮਿਰਤਕ ਕੀ ਲੋਥਾ ॥
ਸੰਤ ਕੇ ਦੋਖੀ ਕੀ ਜੜ ਕਿਛੁ ਨਾਹਿ ॥
ਆਪਨ ਬੀਜਿ ਆਪੇ ਹੀ ਖਾਹਿ ॥
ਸੰਤ ਕੇ ਦੋਖੀ ਕਉ ਅਵਰੁ ਨ ਰਾਖਨਹਾਰੁ ॥
ਨਾਨਕ ਸੰਤ ਭਾਵੈ ਤਾ ਲਏ ਉਬਾਰਿ ॥੫॥
ਸੰਤ ਕਾ ਦੋਖੀ ਕਿਤੈ ਕਾਜਿ ਨ ਪਹੂਚੈ ॥
ਸੰਤ ਕੇ ਦੋਖੀ ਕਉ ਉਦਿਆਨ ਭ੍ਰਮਾਈਐ ॥
ਸੰਤ ਕਾ ਦੋਖੀ ਉਝੜਿ ਪਾਈਐ ॥
ਸੰਤ ਕਾ ਦੋਖੀ ਅੰਤਰ ਤੇ ਥੋਥਾ ॥
ਜਿਉ ਸਾਸ ਬਿਨਾ ਮਿਰਤਕ ਕੀ ਲੋਥਾ ॥
ਸੰਤ ਕੇ ਦੋਖੀ ਕੀ ਜੜ ਕਿਛੁ ਨਾਹਿ ॥
ਆਪਨ ਬੀਜਿ ਆਪੇ ਹੀ ਖਾਹਿ ॥
ਸੰਤ ਕੇ ਦੋਖੀ ਕਉ ਅਵਰੁ ਨ ਰਾਖਨਹਾਰੁ ॥
ਨਾਨਕ ਸੰਤ ਭਾਵੈ ਤਾ ਲਏ ਉਬਾਰਿ ॥੫॥
संत का दोखी अध बीच ते टूटै ॥
संत का दोखी कितै काजि न पहूचै ॥
संत के दोखी कउ उदिआन भ्रमाईऐ ॥
संत का दोखी उझड़ि पाईऐ ॥
संत का दोखी अंतर ते थोथा ॥
जिउ सास बिना मिरतक की लोथा ॥
संत के दोखी की जड़ किछु नाहि ॥
आपन बीजि आपे ही खाहि ॥
संत के दोखी कउ अवरु न राखनहारु ॥
नानक संत भावै ता लए उबारि ॥५॥
संत का दोखी कितै काजि न पहूचै ॥
संत के दोखी कउ उदिआन भ्रमाईऐ ॥
संत का दोखी उझड़ि पाईऐ ॥
संत का दोखी अंतर ते थोथा ॥
जिउ सास बिना मिरतक की लोथा ॥
संत के दोखी की जड़ किछु नाहि ॥
आपन बीजि आपे ही खाहि ॥
संत के दोखी कउ अवरु न राखनहारु ॥
नानक संत भावै ता लए उबारि ॥५॥
हिन्दी अर्थ: संत की निंदा करने वाले का काम आधे बीच में ही रह जाता है। संत की निंदा करने वाले का कोई काम सिरे नहीं चढ़ता। संत के निंदक को (मानो) जंगलों में परेशान किया जाता है और (राह से विछोड़ के) उजाड़ में डाल देते हैं। वैसे ही संत का निंदक अंदर से (असली जिंदगी से जो मनुष्य का आधार है) खाली होता है। जैसे प्राणों के बिना मुर्दा शव है। संत के निंदकों की (नेक कमाई और सिमरन वाली) कोई पक्की नींव नहीं होती। खुद ही (निंदा की) कमाई करके खुद ही (उसका बुरा फल) खाते हैं। संत की निंदा करने वाले को कोई और मनुष्य (निंदा की वादी से) बचा नहीं सकता। (पर) हे नानक ! अगर संत चाहे तो (निंदक को निंदा के स्वभाव से) बचा सकता है। 5।
ਸੰਤ ਕਾ ਦੋਖੀ ਇਉ ਬਿਲਲਾਇ ॥
ਜਿਉ ਜਲ ਬਿਹੂਨ ਮਛੁਲੀ ਤੜਫੜਾਇ ॥
ਸੰਤ ਕਾ ਦੋਖੀ ਭੂਖਾ ਨਹੀ ਰਾਜੈ ॥
ਜਿਉ ਪਾਵਕੁ ਈਧਨਿ ਨਹੀ ਧ੍ਰਾਪੈ ॥
ਸੰਤ ਕਾ ਦੋਖੀ ਛੁਟੈ ਇਕੇਲਾ ॥
ਜਿਉ ਬੂਆੜੁ ਤਿਲੁ ਖੇਤ ਮਾਹਿ ਦੁਹੇਲਾ ॥
ਸੰਤ ਕਾ ਦੋਖੀ ਧਰਮ ਤੇ ਰਹਤ ॥
ਸੰਤ ਕਾ ਦੋਖੀ ਸਦ ਮਿਥਿਆ ਕਹਤ ॥
ਕਿਰਤੁ ਨਿੰਦਕ ਕਾ ਧੁਰਿ ਹੀ ਪਇਆ ॥
ਨਾਨਕ ਜੋ ਤਿਸੁ ਭਾਵੈ ਸੋਈ ਥਿਆ ॥੬॥
ਜਿਉ ਜਲ ਬਿਹੂਨ ਮਛੁਲੀ ਤੜਫੜਾਇ ॥
ਸੰਤ ਕਾ ਦੋਖੀ ਭੂਖਾ ਨਹੀ ਰਾਜੈ ॥
ਜਿਉ ਪਾਵਕੁ ਈਧਨਿ ਨਹੀ ਧ੍ਰਾਪੈ ॥
ਸੰਤ ਕਾ ਦੋਖੀ ਛੁਟੈ ਇਕੇਲਾ ॥
ਜਿਉ ਬੂਆੜੁ ਤਿਲੁ ਖੇਤ ਮਾਹਿ ਦੁਹੇਲਾ ॥
ਸੰਤ ਕਾ ਦੋਖੀ ਧਰਮ ਤੇ ਰਹਤ ॥
ਸੰਤ ਕਾ ਦੋਖੀ ਸਦ ਮਿਥਿਆ ਕਹਤ ॥
ਕਿਰਤੁ ਨਿੰਦਕ ਕਾ ਧੁਰਿ ਹੀ ਪਇਆ ॥
ਨਾਨਕ ਜੋ ਤਿਸੁ ਭਾਵੈ ਸੋਈ ਥਿਆ ॥੬॥
संत का दोखी इउ बिललाइ ॥
जिउ जल बिहून मछुली तड़फड़ाइ ॥
संत का दोखी भूखा नही राजै ॥
जिउ पावकु ईधनि नही ध्रापै ॥
संत का दोखी छुटै इकेला ॥
जिउ बूआड़ु तिलु खेत माहि दुहेला ॥
संत का दोखी धरम ते रहत ॥
संत का दोखी सद मिथिआ कहत ॥
किरतु निंदक का धुरि ही पइआ ॥
नानक जो तिसु भावै सोई थिआ ॥६॥
जिउ जल बिहून मछुली तड़फड़ाइ ॥
संत का दोखी भूखा नही राजै ॥
जिउ पावकु ईधनि नही ध्रापै ॥
संत का दोखी छुटै इकेला ॥
जिउ बूआड़ु तिलु खेत माहि दुहेला ॥
संत का दोखी धरम ते रहत ॥
संत का दोखी सद मिथिआ कहत ॥
किरतु निंदक का धुरि ही पइआ ॥
नानक जो तिसु भावै सोई थिआ ॥६॥
हिन्दी अर्थ: संत का निंदक ऐसे बिलकता है जैसे पानी के बिना मछली तड़फती है। संत का निंदक तृष्णा का मारा हुआ कभी संतुष्ट नहीं होता। जैसे आग ईधन से तृप्त नहीं होती (भाव। संत को शोभा का जला हुआ ईष्या के कारण निंदा करता है और ये ईरखा कम नहीं होती)। वैसे ही संत का निंदक भी अकेला त्यागा हुआ पड़ा रहता है (कोई उसके नजदीक नहीं आता)। जैसे अंदर से जला हुआ तिल का पौधा खेत में ही दुत्कारा सा पड़ा रहता है संत का निंदक धर्म से हीन होता है और सदा झूठ बोलता है। (पर) पहली की हुई निंदा का ये फल (-रूपी स्वभाव) निंदक का आरम्भ से ही (जब से उसने निंदा का काम पकड़ा) चला आ रहा है (सो, उस स्वभाव के कारण बिचारा और करे भी तो क्या?) हे नानक ! (ये मालिक की रजा है) जो उसे ठीक लगता है वही होता है। 6।
ਸੰਤ ਕਾ ਦੋਖੀ ਬਿਗੜ ਰੂਪੁ ਹੋਇ ਜਾਇ ॥
ਸੰਤ ਕੇ ਦੋਖੀ ਕਉ ਦਰਗਹ ਮਿਲੈ ਸਜਾਇ ॥
ਸੰਤ ਕਾ ਦੋਖੀ ਸਦਾ ਸਹਕਾਈਐ ॥
ਸੰਤ ਕਾ ਦੋਖੀ ਨ ਮਰੈ ਨ ਜੀਵਾਈਐ ॥
ਸੰਤ ਕੇ ਦੋਖੀ ਕੀ ਪੁਜੈ ਨ ਆਸਾ ॥
ਸੰਤ ਕਾ ਦੋਖੀ ਉਠਿ ਚਲੈ ਨਿਰਾਸਾ ॥
ਸੰਤ ਕੈ ਦੋਖਿ ਨ ਤ੍ਰਿਸਟੈ ਕੋਇ ॥
ਜੈਸਾ ਭਾਵੈ ਤੈਸਾ ਕੋਈ ਹੋਇ ॥
ਪਇਆ ਕਿਰਤੁ ਨ ਮੇਟੈ ਕੋਇ ॥
ਨਾਨਕ ਜਾਨੈ ਸਚਾ ਸੋਇ ॥੭॥
ਸੰਤ ਕੇ ਦੋਖੀ ਕਉ ਦਰਗਹ ਮਿਲੈ ਸਜਾਇ ॥
ਸੰਤ ਕਾ ਦੋਖੀ ਸਦਾ ਸਹਕਾਈਐ ॥
ਸੰਤ ਕਾ ਦੋਖੀ ਨ ਮਰੈ ਨ ਜੀਵਾਈਐ ॥
ਸੰਤ ਕੇ ਦੋਖੀ ਕੀ ਪੁਜੈ ਨ ਆਸਾ ॥
ਸੰਤ ਕਾ ਦੋਖੀ ਉਠਿ ਚਲੈ ਨਿਰਾਸਾ ॥
ਸੰਤ ਕੈ ਦੋਖਿ ਨ ਤ੍ਰਿਸਟੈ ਕੋਇ ॥
ਜੈਸਾ ਭਾਵੈ ਤੈਸਾ ਕੋਈ ਹੋਇ ॥
ਪਇਆ ਕਿਰਤੁ ਨ ਮੇਟੈ ਕੋਇ ॥
ਨਾਨਕ ਜਾਨੈ ਸਚਾ ਸੋਇ ॥੭॥
संत का दोखी बिगड़ रूपु होइ जाइ ॥
संत के दोखी कउ दरगह मिलै सजाइ ॥
संत का दोखी सदा सहकाईऐ ॥
संत का दोखी न मरै न जीवाईऐ ॥
संत के दोखी की पुजै न आसा ॥
संत का दोखी उठि चलै निरासा ॥
संत कै दोखि न त्रिसटै कोइ ॥
जैसा भावै तैसा कोई होइ ॥
पइआ किरतु न मेटै कोइ ॥
नानक जानै सचा सोइ ॥७॥
संत के दोखी कउ दरगह मिलै सजाइ ॥
संत का दोखी सदा सहकाईऐ ॥
संत का दोखी न मरै न जीवाईऐ ॥
संत के दोखी की पुजै न आसा ॥
संत का दोखी उठि चलै निरासा ॥
संत कै दोखि न त्रिसटै कोइ ॥
जैसा भावै तैसा कोई होइ ॥
पइआ किरतु न मेटै कोइ ॥
नानक जानै सचा सोइ ॥७॥
हिन्दी अर्थ: संतों की निंदा करने वाला भ्रष्टा जाता है। प्रभू की दरगाह में उसको सजा मिलती है। संत का निंदक सदा आतुर (सिसकता) रहता है। ना वह जीवितों में ना ही मरों में होता है। संत के निंदक की आस कभी पूरी नहीं होती। जगत से निराश ही चला जाता है (भला संतों वाली शोभा उसे कैसे मिले?)। (इस वास्ते) संत की निंदा करने कोई मनुष्य (निंदा की) इस प्यास से नहीं बचता। जैसी मनुष्य की नीयति होती है वैसा उसका स्वभाव बन जाता है (बचे भी कैसे?) पीछे की हुई (बुरी) कमाई के इकट्ठे हुए (स्वभाव रूपी) फल को कोई मिटा नहीं सकता। हे नानक ! (इस भेद को) वह सच्चा प्रभू जानता है। 7।
ਸਭ ਘਟ ਤਿਸ ਕੇ ਓਹੁ ਕਰਨੈਹਾਰੁ ॥
ਸਦਾ ਸਦਾ ਤਿਸ ਕਉ ਨਮਸਕਾਰੁ ॥
ਪ੍ਰਭ ਕੀ ਉਸਤਤਿ ਕਰਹੁ ਦਿਨੁ ਰਾਤਿ ॥
ਤਿਸਹਿ ਧਿਆਵਹੁ ਸਾਸਿ ਗਿਰਾਸਿ ॥
ਸਭੁ ਕਛੁ ਵਰਤੈ ਤਿਸ ਕਾ ਕੀਆ ॥
ਜੈਸਾ ਕਰੇ ਤੈਸਾ ਕੋ ਥੀਆ ॥
ਅਪਨਾ ਖੇਲੁ ਆਪਿ ਕਰਨੈਹਾਰੁ ॥
ਦੂਸਰ ਕਉਨੁ ਕਹੈ ਬੀਚਾਰੁ ॥
ਸਦਾ ਸਦਾ ਤਿਸ ਕਉ ਨਮਸਕਾਰੁ ॥
ਪ੍ਰਭ ਕੀ ਉਸਤਤਿ ਕਰਹੁ ਦਿਨੁ ਰਾਤਿ ॥
ਤਿਸਹਿ ਧਿਆਵਹੁ ਸਾਸਿ ਗਿਰਾਸਿ ॥
ਸਭੁ ਕਛੁ ਵਰਤੈ ਤਿਸ ਕਾ ਕੀਆ ॥
ਜੈਸਾ ਕਰੇ ਤੈਸਾ ਕੋ ਥੀਆ ॥
ਅਪਨਾ ਖੇਲੁ ਆਪਿ ਕਰਨੈਹਾਰੁ ॥
ਦੂਸਰ ਕਉਨੁ ਕਹੈ ਬੀਚਾਰੁ ॥
सभ घट तिस के ओहु करनैहारु ॥
सदा सदा तिस कउ नमसकारु ॥
प्रभ की उसतति करहु दिनु राति ॥
तिसहि धिआवहु सासि गिरासि ॥
सभु कछु वरतै तिस का कीआ ॥
जैसा करे तैसा को थीआ ॥
अपना खेलु आपि करनैहारु ॥
दूसर कउनु कहै बीचारु ॥
सदा सदा तिस कउ नमसकारु ॥
प्रभ की उसतति करहु दिनु राति ॥
तिसहि धिआवहु सासि गिरासि ॥
सभु कछु वरतै तिस का कीआ ॥
जैसा करे तैसा को थीआ ॥
अपना खेलु आपि करनैहारु ॥
दूसर कउनु कहै बीचारु ॥
हिन्दी अर्थ: सारे जीव जंतु उस प्रभू के हैं। वही सब कुछ करने के स्मर्थ हैं। सदा उस प्रभू के आगे सिर निवाओ। दिन रात प्रभू के गुण गाओ। हर दम के साथ उसे याद करो। (जगत में) हरेक खेल उसी की चलाई हुई चल रही है। प्रभू (जीव को) जैसा बनाता है वैसा ही हरेक जीव बन जाता है। (जगत रूपी) अपनी खेल खुद ही करने के काबिल है। कौन कोई दूसरा उसे सलाह दे सकता है?
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 280 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
New Friends Colony के पाँच-मंज़िला flat की terrace पर रात की हवा।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 59 पंक्तियों का है, 7 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 280” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 281 →, पीछे का: ← अंग 279।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।