अंग 243

अंग
243
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਗਉੜੀ ਛੰਤ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਸੁਣਿ ਨਾਹ ਪ੍ਰਭੂ ਜੀਉ ਏਕਲੜੀ ਬਨ ਮਾਹੇ ॥
ਕਿਉ ਧੀਰੈਗੀ ਨਾਹ ਬਿਨਾ ਪ੍ਰਭ ਵੇਪਰਵਾਹੇ ॥
ਧਨ ਨਾਹ ਬਾਝਹੁ ਰਹਿ ਨ ਸਾਕੈ ਬਿਖਮ ਰੈਣਿ ਘਣੇਰੀਆ ॥
ਨਹ ਨੀਦ ਆਵੈ ਪ੍ਰੇਮੁ ਭਾਵੈ ਸੁਣਿ ਬੇਨੰਤੀ ਮੇਰੀਆ ॥
ਬਾਝਹੁ ਪਿਆਰੇ ਕੋਇ ਨ ਸਾਰੇ ਏਕਲੜੀ ਕੁਰਲਾਏ ॥
ਨਾਨਕ ਸਾ ਧਨ ਮਿਲੈ ਮਿਲਾਈ ਬਿਨੁ ਪ੍ਰੀਤਮ ਦੁਖੁ ਪਾਏ ॥੧॥
ਪਿਰਿ ਛੋਡਿਅੜੀ ਜੀਉ ਕਵਣੁ ਮਿਲਾਵੈ ॥
ਰਸਿ ਪ੍ਰੇਮਿ ਮਿਲੀ ਜੀਉ ਸਬਦਿ ਸੁਹਾਵੈ ॥
ਸਬਦੇ ਸੁਹਾਵੈ ਤਾ ਪਤਿ ਪਾਵੈ ਦੀਪਕ ਦੇਹ ਉਜਾਰੈ ॥
ਸੁਣਿ ਸਖੀ ਸਹੇਲੀ ਸਾਚਿ ਸੁਹੇਲੀ ਸਾਚੇ ਕੇ ਗੁਣ ਸਾਰੈ ॥
ਸਤਿਗੁਰਿ ਮੇਲੀ ਤਾ ਪਿਰਿ ਰਾਵੀ ਬਿਗਸੀ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਬਾਣੀ ॥
ਨਾਨਕ ਸਾ ਧਨ ਤਾ ਪਿਰੁ ਰਾਵੇ ਜਾ ਤਿਸ ਕੈ ਮਨਿ ਭਾਣੀ ॥੨॥
ਮਾਇਆ ਮੋਹਣੀ ਨੀਘਰੀਆ ਜੀਉ ਕੂੜਿ ਮੁਠੀ ਕੂੜਿਆਰੇ ॥
ਕਿਉ ਖੂਲੈ ਗਲ ਜੇਵੜੀਆ ਜੀਉ ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਅਤਿ ਪਿਆਰੇ ॥
ਹਰਿ ਪ੍ਰੀਤਿ ਪਿਆਰੇ ਸਬਦਿ ਵੀਚਾਰੇ ਤਿਸ ਹੀ ਕਾ ਸੋ ਹੋਵੈ ॥
ਪੁੰਨ ਦਾਨ ਅਨੇਕ ਨਾਵਣ ਕਿਉ ਅੰਤਰ ਮਲੁ ਧੋਵੈ ॥
ਨਾਮ ਬਿਨਾ ਗਤਿ ਕੋਇ ਨ ਪਾਵੈ ਹਠਿ ਨਿਗ੍ਰਹਿ ਬੇਬਾਣੈ ॥
ਨਾਨਕ ਸਚ ਘਰੁ ਸਬਦਿ ਸਿਞਾਪੈ ਦੁਬਿਧਾ ਮਹਲੁ ਕਿ ਜਾਣੈ ॥੩॥
ਤੇਰਾ ਨਾਮੁ ਸਚਾ ਜੀਉ ਸਬਦੁ ਸਚਾ ਵੀਚਾਰੋ ॥
ਤੇਰਾ ਮਹਲੁ ਸਚਾ ਜੀਉ ਨਾਮੁ ਸਚਾ ਵਾਪਾਰੋ ॥
ਨਾਮ ਕਾ ਵਾਪਾਰੁ ਮੀਠਾ ਭਗਤਿ ਲਾਹਾ ਅਨਦਿਨੋ ॥
ਤਿਸੁ ਬਾਝੁ ਵਖਰੁ ਕੋਇ ਨ ਸੂਝੈ ਨਾਮੁ ਲੇਵਹੁ ਖਿਨੁ ਖਿਨੋ ॥
ਪਰਖਿ ਲੇਖਾ ਨਦਰਿ ਸਾਚੀ ਕਰਮਿ ਪੂਰੈ ਪਾਇਆ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਮਹਾ ਰਸੁ ਮੀਠਾ ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਸਚੁ ਪਾਇਆ ॥੪॥੨॥
गउड़ी छंत महला १ ॥
सुणि नाह प्रभू जीउ एकलड़ी बन माहे ॥
किउ धीरैगी नाह बिना प्रभ वेपरवाहे ॥
धन नाह बाझहु रहि न साकै बिखम रैणि घणेरीआ ॥
नह नीद आवै प्रेमु भावै सुणि बेनंती मेरीआ ॥
बाझहु पिआरे कोइ न सारे एकलड़ी कुरलाए ॥
नानक सा धन मिलै मिलाई बिनु प्रीतम दुखु पाए ॥१॥
पिरि छोडिअड़ी जीउ कवणु मिलावै ॥
रसि प्रेमि मिली जीउ सबदि सुहावै ॥
सबदे सुहावै ता पति पावै दीपक देह उजारै ॥
सुणि सखी सहेली साचि सुहेली साचे के गुण सारै ॥
सतिगुरि मेली ता पिरि रावी बिगसी अंम्रित बाणी ॥
नानक सा धन ता पिरु रावे जा तिस कै मनि भाणी ॥२॥
माइआ मोहणी नीघरीआ जीउ कूड़ि मुठी कूड़िआरे ॥
किउ खूलै गल जेवड़ीआ जीउ बिनु गुर अति पिआरे ॥
हरि प्रीति पिआरे सबदि वीचारे तिस ही का सो होवै ॥
पुंन दान अनेक नावण किउ अंतर मलु धोवै ॥
नाम बिना गति कोइ न पावै हठि निग्रहि बेबाणै ॥
नानक सच घरु सबदि सिञापै दुबिधा महलु कि जाणै ॥३॥
तेरा नामु सचा जीउ सबदु सचा वीचारो ॥
तेरा महलु सचा जीउ नामु सचा वापारो ॥
नाम का वापारु मीठा भगति लाहा अनदिनो ॥
तिसु बाझु वखरु कोइ न सूझै नामु लेवहु खिनु खिनो ॥
परखि लेखा नदरि साची करमि पूरै पाइआ ॥
नानक नामु महा रसु मीठा गुरि पूरै सचु पाइआ ॥४॥२॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी छंत महला १ ॥ हे प्रभू पति जी ! (मेरी विनती) सुनो। (तेरे बिना) मैं जीव-स्त्री इस संसार-जंगल में अकेली हूँ। हे बेपरवाह प्रभू ! तुझ पति के बगैर मेरी जीवात्मा धैर्य नहीं पा सकती। जीव-स्त्री प्रभू-पति के बिना रह नहीं सकती (प्रभू-पति के बिना इसकी) जिंदगी की रात बहुत ही मुश्किल में गुजरती है। हे पति प्रभू ! मेरी विनती सुन। मुझे तेरा प्यार अच्छा लगता है (तेरे विछोड़े में) मुझे शांति नहीं आ सकती। प्यारे प्रभू-पति के बिना (इस जीवात्मा की) कोई बात नहीं पूछता। ये अकेली ही (इस संसार-जंगल में) पुकारती फिरती है। (पर) हे नानक ! जीव स्त्री तभी प्रभू-पति को मिल सकती है। यदि इसे गुरू मिलवा दे। वरना प्रीतम प्रभू के बिना दुख ही दुख बर्दाश्त करती है। 1। हे सहेलियो ! जिसे पति ने भुला दिया उसे और कौन (पति-प्रभू के साथ) मिला सकता है? हे सहेलियो ! जो जीव-दुल्हन गुरू के शबद द्वारा प्रभू के नाम-रस में प्रभू के प्रेम-रस में जुड़ती है। वह (अंतरात्मे) सुंदर हो जाती है। जब गुरू के शबद द्वारा जीव-स्त्री (अंतरात्मा में) सुंदर हो जाती है। तब (लोक-परलोक में) इज्जत कमाती है; ज्ञान का दीपक इसके शरीर में (हृदय में) प्रकाश कर देता है। हे सहेली ! सुन ! जो जीव-स्त्री सदा स्थिर रहने वाले प्रभू के गुण याद करती है। वह सदा स्थिर प्रभू में जुड़ के सुखी हो जाती है। जब सतिगुरू ने उसे अपने शबद में जोड़ा। तब प्रभू पति ने उसे अपने चरणों में मिला लिया। आत्मिक जीवन देने वाली बाणी की बरकति से उसका हृदय-कमल फूल खिल जाता है। हे नानक ! जीव-स्त्री तभी प्रभू-पति को मिलती है। जब (गुरू के शबद द्वारा) ये प्रभू पति के मन को प्यारी लगती है। 2। हे सहेली ! जिस जीव-स्त्री को मोहनी माया ने मोह लिया। जिसे नाशवंत पदार्थों के प्यार ने ठॅग लिया। वह नाशवंत पदार्थों के वणज में लग गई। (उसके गले में मोह की फाही पड़ जाती है) उसके गले की ये फाही अति प्यारे गुरू (की सहायता) के बिना नहीं खुल सकती। जो आदमी प्रभू से प्रीत डालता है। गुरू के शबद द्वारा प्रभू के गुणों को विचारता है। वह प्रभू का सेवक हो जाता है। (सिमरन के बिना सिफत सालाह के बिना) अनेकों पुन्न-दान करने से। अनेकों तीर्थ-स्नान करने से कोई जीव अपने अंदर की (विकारों की) मैल नहीं धो सकता। हठ करके इंद्रियों को रोकने का प्रयत्न करके जंगल में जाकर बैठने से कोई मनुष्य उच्च आत्मिक अवस्था प्राप्त नहीं कर सकता। हे नानक ! सदा स्थिर रहने वाले प्रभू का दरबार गुरू के शबद के द्वारा पहिचाना जा सकता है। प्रभू के बिना किसी और आसरे की झाक से उस दरबार को नहीं पाया जा सकता। 3। हे प्रभू जी ! तेरा नाम सदा स्थिर रहने वाला है। तेरी सिफत सालाह की बाणी अटल है। तेरे गुणों की विचार सदा स्थिर (कर्म) है। हे प्रभू ! तेरा दरबार सदा-स्थिर है। तेरा नाम और तेरे नाम का व्यापार सदा साथ निभने वाला व्यापार है। परमात्मा के नाम का व्यापार स्वादिष्ट व्यापार है। भक्ती के व्यापार से सदा मुनाफा बढ़ता ही रहता है। प्रभू के नाम के बिना और कोई ऐसा सौदा नहीं जो सदा लाभ ही लाभ दे। हे भाई ! सदा छिन-छिन पल-पल नाम जपो। जिस मनुष्य ने नाम-व्यापार के लेखे की परख की। उस पर प्रभू की अटल मेहर की निगाह हुई। प्रभू की पूरी मेहर से उसने नाम-वखर (नाम-धन) हासिल कर लिया। हे नानक ! प्रभू का नाम सदा स्थिर रहने वाला और बहुत ही मीठे स्वाद वाला पदार्थ है। पूरे गुरू के द्वारा ही ये पदार्थ मिलता है। 4। 2।
ਰਾਗੁ ਗਉੜੀ ਪੂਰਬੀ ਛੰਤ ਮਹਲਾ ੩
ੴ ਸਤਿਨਾਮੁ ਕਰਤਾ ਪੁਰਖੁ ਗੁਰਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਸਾ ਧਨ ਬਿਨਉ ਕਰੇ ਜੀਉ ਹਰਿ ਕੇ ਗੁਣ ਸਾਰੇ ॥
ਖਿਨੁ ਪਲੁ ਰਹਿ ਨ ਸਕੈ ਜੀਉ ਬਿਨੁ ਹਰਿ ਪਿਆਰੇ ॥
ਬਿਨੁ ਹਰਿ ਪਿਆਰੇ ਰਹਿ ਨ ਸਾਕੈ ਗੁਰ ਬਿਨੁ ਮਹਲੁ ਨ ਪਾਈਐ ॥
ਜੋ ਗੁਰੁ ਕਹੈ ਸੋਈ ਪਰੁ ਕੀਜੈ ਤਿਸਨਾ ਅਗਨਿ ਬੁਝਾਈਐ ॥
ਹਰਿ ਸਾਚਾ ਸੋਈ ਤਿਸੁ ਬਿਨੁ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਈ ਬਿਨੁ ਸੇਵਿਐ ਸੁਖੁ ਨ ਪਾਏ ॥
ਨਾਨਕ ਸਾ ਧਨ ਮਿਲੈ ਮਿਲਾਈ ਜਿਸ ਨੋ ਆਪਿ ਮਿਲਾਏ ॥੧॥
ਧਨ ਰੈਣਿ ਸੁਹੇਲੜੀਏ ਜੀਉ ਹਰਿ ਸਿਉ ਚਿਤੁ ਲਾਏ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵੇ ਭਾਉ ਕਰੇ ਜੀਉ ਵਿਚਹੁ ਆਪੁ ਗਵਾਏ ॥
ਵਿਚਹੁ ਆਪੁ ਗਵਾਏ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਏ ਅਨਦਿਨੁ ਲਾਗਾ ਭਾਓ ॥
ਸੁਣਿ ਸਖੀ ਸਹੇਲੀ ਜੀਅ ਕੀ ਮੇਲੀ ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਸਮਾਓ ॥
रागु गउड़ी पूरबी छंत महला ३
ੴ सतिनामु करता पुरखु गुरप्रसादि ॥
सा धन बिनउ करे जीउ हरि के गुण सारे ॥
खिनु पलु रहि न सकै जीउ बिनु हरि पिआरे ॥
बिनु हरि पिआरे रहि न साकै गुर बिनु महलु न पाईऐ ॥
जो गुरु कहै सोई परु कीजै तिसना अगनि बुझाईऐ ॥
हरि साचा सोई तिसु बिनु अवरु न कोई बिनु सेविऐ सुखु न पाए ॥
नानक सा धन मिलै मिलाई जिस नो आपि मिलाए ॥१॥
धन रैणि सुहेलड़ीए जीउ हरि सिउ चितु लाए ॥
सतिगुरु सेवे भाउ करे जीउ विचहु आपु गवाए ॥
विचहु आपु गवाए हरि गुण गाए अनदिनु लागा भाओ ॥
सुणि सखी सहेली जीअ की मेली गुर कै सबदि समाओ ॥

हिन्दी अर्थ: रागु गउड़ी पूरबी छंत महला ३ ੴ सतिनामु करता पुरखु गुरप्रसादि ॥ (जिस जीव स्त्री के हृदय में प्रभू-मिलाप की चाहत पैदा होती है। वह) जीव-स्त्री (प्रभू-दर पे) विनती करती है और परमात्मा के गुण (अपने हृदय में) संभालती है। प्यारे परमात्मा (के दर्शनों) के बगैर वह एक छिन भर एक पल भर (शांत-चित्त) नहीं रह सकती। प्यारे परमात्मा के दर्शन के बिना वह (शांत-चित्त) नहीं रह सकती। पर परमात्मा का ठिकाना गुरू के बिना पाया नहीं जा सकता। जो जो गुरू शिक्षा देता है उसे अच्छी तरह कमाया जाए तो। (मन में से) तृष्णा की आग बुझ जाती है। एक परमात्मा ही सदा कायम रहने वाला है। उसके बगैर (जगत में) और कोई (सदा साथ निभने वाला साथी) नहीं। उसकी शरण पड़े बिना जीव-स्त्री सुख नहीं पा सकती। हे नानक ! वही जीव स्त्री (गुरू की) मिलाई हुई (प्रभू-चरणों में) मिल सकती है जिसे प्रभू स्वयं मेहर (करके। अपने चरणों में) मिला ले। 1। जो जीव-स्त्री परमात्मा (के चरणों) से अपना चित्त जोड़े रखती है उस जीव-स्त्री की (जिंदगी रूपी) रात आसान बीतती है। वह जीव-स्त्री गुरू की शरण पड़ती है गुरू के साथ प्रेम करती है और अपने अंदर से अहं-अहंकार दूर करती है। जो जीव-स्त्री अपने अंदर से स्वैभाव दूर करती है सदा परमात्मा के गुण गाती रहती है। उसका हर वक्त प्रभू चरणों से प्यार बना रहता है। दिल-मिली (सत्संगी) सखियों-सहेलियों से (गुरू का शबद) सुन के गुरू के शबद में उसकी लीनता हुई रहती है।

संदर्भ: यह अंग 243 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।

गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।

दिल्ली-NCR की office-canteen की 1 बजे की दोपहर।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 37 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 243” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 244 →, पीछे का: ← अंग 242

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।