अंग 274

अंग
274
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सुखमनी साहिब का हिस्सा। पूरी 24 अष्टपदियों की हिन्दी टीका /sukhmani-sahib/ पर है।
ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਆਪਿ ਨਿਰੰਕਾਰੁ ॥
ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਕੀ ਸੋਭਾ ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਬਨੀ ॥
ਨਾਨਕ ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਸਰਬ ਕਾ ਧਨੀ ॥੮॥੮॥
ब्रहम गिआनी आपि निरंकारु ॥
ब्रहम गिआनी की सोभा ब्रहम गिआनी बनी ॥
नानक ब्रहम गिआनी सरब का धनी ॥८॥८॥

हिन्दी अर्थ: वह (तो प्रत्यक्ष) स्वयं ही ईश्वर है। ब्रहमज्ञानी की महिमा (कोई) ब्रहमज्ञानी ही कर सकता है; हे नानक ! ब्रहमज्ञानी सब जीवों का मालिक है।8।8।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਉਰਿ ਧਾਰੈ ਜੋ ਅੰਤਰਿ ਨਾਮੁ ॥
ਸਰਬ ਮੈ ਪੇਖੈ ਭਗਵਾਨੁ ॥
ਨਿਮਖ ਨਿਮਖ ਠਾਕੁਰ ਨਮਸਕਾਰੈ ॥
ਨਾਨਕ ਓਹੁ ਅਪਰਸੁ ਸਗਲ ਨਿਸਤਾਰੈ ॥੧॥
सलोकु ॥
उरि धारै जो अंतरि नामु ॥
सरब मै पेखै भगवानु ॥
निमख निमख ठाकुर नमसकारै ॥
नानक ओहु अपरसु सगल निसतारै ॥१॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक ॥ जो मनुष्य सदा अपने हृदय में अकाल-पुरख का नाम टिकाए रखता है। और भगवान को सभी में व्यापक देखता है। जो पल पल अपने प्रभू को नमस्कार करता है; हे नानक ! वह (असली) अछोह है और वह सब जीवों को (संसार समुंद्र से) तार लेता है। 1।
ਅਸਟਪਦੀ ॥
ਮਿਥਿਆ ਨਾਹੀ ਰਸਨਾ ਪਰਸ ॥
ਮਨ ਮਹਿ ਪ੍ਰੀਤਿ ਨਿਰੰਜਨ ਦਰਸ ॥
ਪਰ ਤ੍ਰਿਅ ਰੂਪੁ ਨ ਪੇਖੈ ਨੇਤ੍ਰ ॥
ਸਾਧ ਕੀ ਟਹਲ ਸੰਤਸੰਗਿ ਹੇਤ ॥
ਕਰਨ ਨ ਸੁਨੈ ਕਾਹੂ ਕੀ ਨਿੰਦਾ ॥
ਸਭ ਤੇ ਜਾਨੈ ਆਪਸ ਕਉ ਮੰਦਾ ॥
ਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਬਿਖਿਆ ਪਰਹਰੈ ॥
ਮਨ ਕੀ ਬਾਸਨਾ ਮਨ ਤੇ ਟਰੈ ॥
ਇੰਦ੍ਰੀ ਜਿਤ ਪੰਚ ਦੋਖ ਤੇ ਰਹਤ ॥
ਨਾਨਕ ਕੋਟਿ ਮਧੇ ਕੋ ਐਸਾ ਅਪਰਸ ॥੧॥
असटपदी ॥
मिथिआ नाही रसना परस ॥
मन महि प्रीति निरंजन दरस ॥
पर त्रिअ रूपु न पेखै नेत्र ॥
साध की टहल संतसंगि हेत ॥
करन न सुनै काहू की निंदा ॥
सभ ते जानै आपस कउ मंदा ॥
गुर प्रसादि बिखिआ परहरै ॥
मन की बासना मन ते टरै ॥
इंद्री जित पंच दोख ते रहत ॥
नानक कोटि मधे को ऐसा अपरस ॥१॥

हिन्दी अर्थ: अष्टपदी। जो मनुष्य जीभ से झूठ को छूने नहीं देता। मन में अकाल-पुरख के दीदार की तमन्ना रखता है; जो पराई स्त्री के हुस्न को अपनी आँखों से नहीं देखता। भले मनुष्यों की टहल (सेवा करता है) और संत जनों की संगति में प्रीति (रखता है); जो कानों से किसी की भी निंदा नहीं सुनता। (बल्कि) सभी से अपने आप को बुरा समझता है; जो गुरू की मेहर के सदका माइआ (का प्रभाव) परे हटा देता है। और जिसके मन की वासना मन से टल जाती है; जो अपनी ज्ञानेन्द्रियों को वश में रख के कामादिक पाँचों विकारों से बचा रहता है। हे नानक ! करोड़ों में से कोई ऐसा विरला मनुष्य ‘अपरस’ (कहा जा सकता है)। 1।
ਬੈਸਨੋ ਸੋ ਜਿਸੁ ਊਪਰਿ ਸੁਪ੍ਰਸੰਨ ॥
ਬਿਸਨ ਕੀ ਮਾਇਆ ਤੇ ਹੋਇ ਭਿੰਨ ॥
ਕਰਮ ਕਰਤ ਹੋਵੈ ਨਿਹਕਰਮ ॥
ਤਿਸੁ ਬੈਸਨੋ ਕਾ ਨਿਰਮਲ ਧਰਮ ॥
ਕਾਹੂ ਫਲ ਕੀ ਇਛਾ ਨਹੀ ਬਾਛੈ ॥
ਕੇਵਲ ਭਗਤਿ ਕੀਰਤਨ ਸੰਗਿ ਰਾਚੈ ॥
ਮਨ ਤਨ ਅੰਤਰਿ ਸਿਮਰਨ ਗੋਪਾਲ ॥
ਸਭ ਊਪਰਿ ਹੋਵਤ ਕਿਰਪਾਲ ॥
ਆਪਿ ਦ੍ਰਿੜੈ ਅਵਰਹ ਨਾਮੁ ਜਪਾਵੈ ॥
ਨਾਨਕ ਓਹੁ ਬੈਸਨੋ ਪਰਮ ਗਤਿ ਪਾਵੈ ॥੨॥
बैसनो सो जिसु ऊपरि सुप्रसंन ॥
बिसन की माइआ ते होइ भिंन ॥
करम करत होवै निहकरम ॥
तिसु बैसनो का निरमल धरम ॥
काहू फल की इछा नही बाछै ॥
केवल भगति कीरतन संगि राचै ॥
मन तन अंतरि सिमरन गोपाल ॥
सभ ऊपरि होवत किरपाल ॥
आपि द्रिड़ै अवरह नामु जपावै ॥
नानक ओहु बैसनो परम गति पावै ॥२॥

हिन्दी अर्थ: जिस पर प्रभू खुद प्रसन्न होता है वह है असली वैष्णव। जो मनुष्य प्रभू की माया के असर से बेदाग है और जो (धर्म के) काम करता हुआ इन कामों के फल की इच्छा नहीं रखता। उस वैष्णव का धर्म (भी) पवित्र है जो मनुष्य किसी भी फल की ख्वाइश नहीं करता; और निरा भगती व कीर्तन में मस्त रहता है। जिसके मन तन में प्रभू का सिमरन बस रहा है। जो सब जीवों पे दया करता है। जो खुद (प्रभू के नाम को) अपने मन में टिकाता है व औरों को नाम जपाता है। हे नानक ! वह वैष्णव उच्च स्थान हासिल करता है। 2।
ਭਗਉਤੀ ਭਗਵੰਤ ਭਗਤਿ ਕਾ ਰੰਗੁ ॥
ਸਗਲ ਤਿਆਗੈ ਦੁਸਟ ਕਾ ਸੰਗੁ ॥
ਮਨ ਤੇ ਬਿਨਸੈ ਸਗਲਾ ਭਰਮੁ ॥
ਕਰਿ ਪੂਜੈ ਸਗਲ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਪਾਪਾ ਮਲੁ ਖੋਵੈ ॥
ਤਿਸੁ ਭਗਉਤੀ ਕੀ ਮਤਿ ਊਤਮ ਹੋਵੈ ॥
ਭਗਵੰਤ ਕੀ ਟਹਲ ਕਰੈ ਨਿਤ ਨੀਤਿ ॥
ਮਨੁ ਤਨੁ ਅਰਪੈ ਬਿਸਨ ਪਰੀਤਿ ॥
ਹਰਿ ਕੇ ਚਰਨ ਹਿਰਦੈ ਬਸਾਵੈ ॥
ਨਾਨਕ ਐਸਾ ਭਗਉਤੀ ਭਗਵੰਤ ਕਉ ਪਾਵੈ ॥੩॥
भगउती भगवंत भगति का रंगु ॥
सगल तिआगै दुसट का संगु ॥
मन ते बिनसै सगला भरमु ॥
करि पूजै सगल पारब्रहमु ॥
साधसंगि पापा मलु खोवै ॥
तिसु भगउती की मति ऊतम होवै ॥
भगवंत की टहल करै नित नीति ॥
मनु तनु अरपै बिसन परीति ॥
हरि के चरन हिरदै बसावै ॥
नानक ऐसा भगउती भगवंत कउ पावै ॥३॥

हिन्दी अर्थ: भगवान का (असली) उपासक (वह है जिसके हृदय में) भगवान की भक्ति का प्यार है और जो सब बुरे काम करने वालों का संग त्याग देता है। जिसके मन में से हर तरह का वहम मिट जाता है। जो अकाल-पुरख को हर जगह मौजूद जान के पूजता है। जो गुरमुखों की संगति में रह के पापों की मैल (मन से) दूर करता है। उस भगवती की मति उक्तम होती है। जो नित्य भगवान का सिमरन करता है। जो प्रभू के प्यार में अपना मन व तन कुर्बान कर देता है; जो प्रभू के चरण (सदा अपने) हृदय में बसाता है। हे नानक ! ऐसा भगवती भगवान को पा लेता है। 3।
ਸੋ ਪੰਡਿਤੁ ਜੋ ਮਨੁ ਪਰਬੋਧੈ ॥
ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਆਤਮ ਮਹਿ ਸੋਧੈ ॥
ਰਾਮ ਨਾਮ ਸਾਰੁ ਰਸੁ ਪੀਵੈ ॥
ਉਸੁ ਪੰਡਿਤ ਕੈ ਉਪਦੇਸਿ ਜਗੁ ਜੀਵੈ ॥
ਹਰਿ ਕੀ ਕਥਾ ਹਿਰਦੈ ਬਸਾਵੈ ॥
ਸੋ ਪੰਡਿਤੁ ਫਿਰਿ ਜੋਨਿ ਨ ਆਵੈ ॥
ਬੇਦ ਪੁਰਾਨ ਸਿਮ੍ਰਿਤਿ ਬੂਝੈ ਮੂਲ ॥
ਸੂਖਮ ਮਹਿ ਜਾਨੈ ਅਸਥੂਲੁ ॥
ਚਹੁ ਵਰਨਾ ਕਉ ਦੇ ਉਪਦੇਸੁ ॥
ਨਾਨਕ ਉਸੁ ਪੰਡਿਤ ਕਉ ਸਦਾ ਅਦੇਸੁ ॥੪॥
सो पंडितु जो मनु परबोधै ॥
राम नामु आतम महि सोधै ॥
राम नाम सारु रसु पीवै ॥
उसु पंडित कै उपदेसि जगु जीवै ॥
हरि की कथा हिरदै बसावै ॥
सो पंडितु फिरि जोनि न आवै ॥
बेद पुरान सिम्रिति बूझै मूल ॥
सूखम महि जानै असथूलु ॥
चहु वरना कउ दे उपदेसु ॥
नानक उसु पंडित कउ सदा अदेसु ॥४॥

हिन्दी अर्थ: (असली) पण्डित वह है जो अपने मन को शिक्षा देता है। और प्रभू के नाम को अपने मन में तलाशता है। जो प्रभू नाम का मीठा स्वाद चखता है। उस पण्डित के उपदेश से (सारा) संसार रूहानी जिंदगी हासिल करता है। जो अकाल-पुरख (की सिफतसलाह) की बातें अपने हृदय में बसाता है। वह पंडित दुबारा जनम (मरन) में नहीं आता। जो वेद पुराण स्मृतियां (आदि सब धर्म-पुस्तकों) के मूल (प्रभू को) समझता है। जो यह जानता है कि ये सारा दृश्यमान संसार अदृश्य प्रभू के ही आसरे है। जो (ब्राहमण।, क्षत्रीय, वैश्य व शूद्र) चारों ही जातियों को शिक्षा देता है। हे नानक ! (कह) उस पंडित के सामने हम सदा सिर निवाते हैं (नत्मस्तक होते हैं)। 4।
ਬੀਜ ਮੰਤ੍ਰੁ ਸਰਬ ਕੋ ਗਿਆਨੁ ॥
ਚਹੁ ਵਰਨਾ ਮਹਿ ਜਪੈ ਕੋਊ ਨਾਮੁ ॥
ਜੋ ਜੋ ਜਪੈ ਤਿਸ ਕੀ ਗਤਿ ਹੋਇ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਪਾਵੈ ਜਨੁ ਕੋਇ ॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਅੰਤਰਿ ਉਰ ਧਾਰੈ ॥
ਪਸੁ ਪ੍ਰੇਤ ਮੁਘਦ ਪਾਥਰ ਕਉ ਤਾਰੈ ॥
ਸਰਬ ਰੋਗ ਕਾ ਅਉਖਦੁ ਨਾਮੁ ॥
ਕਲਿਆਣ ਰੂਪ ਮੰਗਲ ਗੁਣ ਗਾਮ ॥
ਕਾਹੂ ਜੁਗਤਿ ਕਿਤੈ ਨ ਪਾਈਐ ਧਰਮਿ ॥
ਨਾਨਕ ਤਿਸੁ ਮਿਲੈ ਜਿਸੁ ਲਿਖਿਆ ਧੁਰਿ ਕਰਮਿ ॥੫॥
बीज मंत्रु सरब को गिआनु ॥
चहु वरना महि जपै कोऊ नामु ॥
जो जो जपै तिस की गति होइ ॥
साधसंगि पावै जनु कोइ ॥
करि किरपा अंतरि उर धारै ॥
पसु प्रेत मुघद पाथर कउ तारै ॥
सरब रोग का अउखदु नामु ॥
कलिआण रूप मंगल गुण गाम ॥
काहू जुगति कितै न पाईऐ धरमि ॥
नानक तिसु मिलै जिसु लिखिआ धुरि करमि ॥५॥

हिन्दी अर्थ: नाम (और सब मंत्रों का) मूल मंत्र है और सब का ज्ञान (दाता) है। (ब्राहमण, क्षत्रीय, वैश्य व शूद्र) चारों ही जातियों में से कोई भी मनुष्य (प्रभू का) नाम जप (के देख ले)। जो जो मनुष्य नाम जपता है उसकी जिंदगी ऊँची हो जाती है। (पर) कोई विरला मनुष्य ही साध-संगति में (रह के) (इसे) हासिल करता है। (अगर प्रभू) मेहर करके (उसके) हृदय में (नाम) टिका दे। पशु, बुरी रूह, मूर्ख, पत्थर (-दिल) (कोई भी हो सब) को (नाम) तार देता है प्रभू का नाम सारे रोगों की दवाई है। प्रभू के गुण गाने सौभाग्य व सुख का रूप है। (पर ये नाम और) किसी ढंग से अथवा किसी धार्मिक रस्म-रिवाज के करने से नहीं मिलता; हे नानक ! (ये नाम) उस मनुष्य को मिलता है जिस (के माथे पर) धुर से (प्रभू की) मेहर मुताबक लिखा जाता है। 5।
ਜਿਸ ਕੈ ਮਨਿ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਕਾ ਨਿਵਾਸੁ ॥
जिस कै मनि पारब्रहम का निवासु ॥

हिन्दी अर्थ: जिसके मन में अकाल पुरख बसता है।

संदर्भ: यह अंग 274 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।

M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।

दिल्ली-यूनिवर्सिटी के North Campus में exam-season की tension।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 60 पंक्तियों का है, 8 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 274” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 275 →, पीछे का: ← अंग 273

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।