लुल्ला परिवारLulla Family
English
उपनिषद्प्रश्न के भीतर का मौन

तैत्तिरीय उपनिषद्: सत्यं वद, पाँच कोश, और भृगु की तपस्या

इस पृष्ठ पर
कृष्ण यजुर्वेद · तैत्तिरीय उपनिषद् · तीन वल्ली
वह कक्षा जहाँ से सत्यं वद और मातृदेवो भव निकले, वे पाँच परतें जो देह से आनन्द तक जाती हैं, और भृगु का पाँच बार पिता के पास लौटना।

पाठ पूरा हो चुका है। जो विद्यार्थी बरसों आचार्य के घर में रहकर वेद कंठस्थ करता रहा, आज उसकी विदाई का दिन है। आचार्य उसे सामने बिठाते हैं, और जो कहते हैं उसमें कोई गोल-मोल आशीर्वाद नहीं, सीधे-सीधे वाक्य हैं। “सत्यं वद”, सच बोलिए। “धर्मं चर”, धर्म पर चलिए। पढ़ाई में ढील मत आने दीजिए, आचार्य को उनका प्रिय धन देकर विदा लीजिए, और अपने वंश की डोर मत टूटने दीजिए। फिर वे चार वाक्य आते हैं जिन्हें इस देश ने कभी हाथ से नहीं जाने दिया, “मातृदेवो भव”, माता को देवता मानिए, और उसी तरह पिता को, आचार्य को, और द्वार पर आए अतिथि को। आज भी किसी दीक्षान्त समारोह में जब यह पंक्ति गूँजती है, वह उसी कक्षा की गूँज है।

तैत्तिरीय उपनिषद् कृष्ण यजुर्वेद की तैत्तिरीय शाखा से आता है और तीन वल्ली में चलता है। पहली शिक्षावल्ली है, जहाँ स्वर और उच्चारण से बात शुरू होकर उस विदाई के उपदेश तक पहुँचती है। दूसरी ब्रह्मानन्दवल्ली है, जहाँ आदमी की देह को एक के भीतर एक रखी पाँच परतों की तरह खोला जाता है, अन्न से प्राण, प्राण से मन, मन से विज्ञान, और विज्ञान से आनन्द, और फिर आनन्द को नापने की एक अनोखी गिनती आती है। तीसरी भृगुवल्ली है, जहाँ एक बेटा अपने पिता से ब्रह्म का पता पूछता है और पाँच बार उत्तर लेकर लौटता है, हर बार पहले से बड़ा उत्तर। यह उपनिषद् कहीं भी जल्दी में नहीं दिखता, और यही इसकी सबसे बड़ी बात है।

इस उपनिषद् के मुख्य किरदार

आचार्य और अन्तेवासी: गुरु और उनके घर में रहकर पढ़ने वाला विद्यार्थी; शिक्षावल्ली का पूरा ढाँचा इन्हीं दो के बीच खड़ा है, और अन्त का उपदेश इन्हीं दोनों के बीच कहा जाता है।

माहाचमस्य: वह आचार्य जिन्होंने भूः, भुवः और सुवः के साथ एक चौथी व्याहृति महः को जाना और आगे बताया।

प्राचीनयोग्य: वह शिष्य जिसे नाम लेकर कहा जाता है कि हृदय के भीतर के आकाश की इस तरह उपासना कीजिए।

सत्यवचा राथीतर, तपोनित्य पौरुशिष्टि और नाक मौद्गल्य: तीन आचार्य, जिनकी तीन अलग राय एक ही पन्ने पर बिना झगड़े के रख दी गई हैं।

त्रिशङ्कु: वह ऋषि जिसका वेदानुवचन एक छोटी-सी घोषणा के रूप में आया है, कि मैं वृक्ष को हिला देने वाला हूँ और अमृत से सींचा हुआ हूँ।

भृगु वारुणि: वरुण का बेटा, जो ब्रह्म का पता पूछने आता है और हर बार तप करके लौटता है।

वरुण: भृगु के पिता और आचार्य, जो पूरा उत्तर कभी मुँह से नहीं देते, बस कसौटी थमा देते हैं और बेटे को अपने पैरों पर उस तक पहुँचने देते हैं।

शिक्षावल्ली की देहरी: शान्ति, स्वर, और जोड़ों की विद्या

इस उपनिषद् की पहली आवाज़ किसी सिद्धान्त की नहीं, एक प्रार्थना की है। मित्र हमारे लिए कल्याण करें, वरुण कल्याण करें, अर्यमा कल्याण करें, इन्द्र और बृहस्पति कल्याण करें, और बड़े डग भरने वाले विष्णु कल्याण करें। फिर ब्रह्म को नमस्कार है, और वायु को नमस्कार है, और वायु से सीधे कहा जाता है कि आप ही प्रत्यक्ष ब्रह्म हैं और मैं आपको ही प्रत्यक्ष ब्रह्म कहूँगा। इसके बाद दो प्रतिज्ञाएँ आती हैं जो पूरे ग्रन्थ का स्वर बाँध देती हैं, ऋत बोलूँगा और सत्य बोलूँगा। और अन्त में एक विनती, कि वह मेरी रक्षा करे और उनकी भी जो यह बोल रहे हैं। पढ़ने वाला और पढ़ाने वाला, दोनों एक ही छतरी के नीचे ले लिए गए हैं।

इसके तुरन्त बाद जो पाठ शुरू होता है, वह आवाज़ का पाठ है। शीक्षा, यानी उच्चारण की विद्या, की व्याख्या छह शब्दों में कर दी जाती है। वर्ण, यानी अक्षर। स्वर, यानी उसका उतार और चढ़ाव। मात्रा, यानी उसकी लम्बाई। बल, यानी उसे बोलने में लगा प्रयत्न। साम, यानी बोलने की समता। और सन्तान, यानी शब्दों का आपस में जुड़ते हुए बहते रहना। जिस परम्परा में सारा ज्ञान कान से कान तक जाता है, वहाँ स्वर की एक चूक अर्थ को कहीं और ले जाती है, इसलिए यह उपनिषद् अपना पहला अध्याय गले और जीभ को सौंपता है।

अब एक और सीढ़ी। दो पद जब पास आते हैं तो उनके मिलने की जगह को संहिता कहते हैं, और इस उपनिषद् के पास उस मिलन की अपनी उपनिषद् है। पाँच क्षेत्रों में यह जोड़ को खोलकर दिखाता है, और हर जोड़ के चार अंग गिनाता है, पूर्वरूप यानी पहला सिरा, उत्तररूप यानी दूसरा सिरा, सन्धि यानी वह जगह जहाँ दोनों मिलते हैं, और सन्धान यानी वह जो दोनों को जोड़े रखता है। लोकों में पृथ्वी पहला सिरा है, द्युलोक दूसरा, आकाश उनकी सन्धि, और वायु उनका जोड़ने वाला। ज्योतियों में अग्नि और आदित्य दो सिरे हैं, जल उनकी सन्धि, और बिजली उनका जोड़।

तीसरा क्षेत्र सबसे सुन्दर है। विद्या में आचार्य पहला सिरा हैं और अन्तेवासी दूसरा, विद्या उन दोनों की सन्धि है, और प्रवचन, यानी पढ़ाने का काम, उन्हें जोड़े रखने वाली डोर। गुरु और शिष्य दो अलग व्यक्ति नहीं रह जाते, वे एक ही वाक्य के दो पद हो जाते हैं जिनके बीच से ज्ञान बहता है। चौथे क्षेत्र में माता पहला सिरा हैं, पिता दूसरा, सन्तान उनकी सन्धि, और सन्तान का होना उनका जोड़। और पाँचवाँ क्षेत्र अपनी ही देह में है, नीचे का जबड़ा और ऊपर का जबड़ा दो सिरे, वाणी उनकी सन्धि, और जीभ वह जो दोनों को जोड़ती है।

इन पाँचों को यह उपनिषद् महासंहिता कहता है, और जो इन्हें इस तरह जान लेता है उसके लिए फल भी गिना देता है, कि वह सन्तान से, पशुओं से, ब्रह्मतेज से, खाने-पीने की समृद्धि से और ऊपर के लोक से जुड़ जाता है। ध्यान देने की बात यह है कि जोड़ हर जगह एक ही तरह से बना है। दो अलग चीज़ें, उनके बीच एक ख़ाली जगह, और उस ख़ाली जगह में बहता हुआ कुछ जो उन्हें दो नहीं रहने देता। संसार इसी तरह टिका हुआ है, और आगे चलकर यही बात परतों और कोशों की भाषा में लौटेगी।

इसके बाद मेधा की प्रार्थना आती है, और वह बड़ी आत्मीय है। छन्दों में जो ऋषभ है और विश्वरूप है, जो अमृत से निकलकर छन्दों के ऊपर उठा, वह ओंकार इन्द्र के रूप में मेधा से मुझे भर दे। मेरी देह चलने-फिरने में समर्थ रहे, मेरी जीभ मीठी रहे, मेरे कानों से बहुत सुनने को मिले, और जो सुना है उसकी रक्षा हो। फिर आचार्य की अपनी माँग आती है, कि लक्ष्मी मेरे घर आए, वस्त्र और गाएँ आएँ, अन्न और पानी सदा रहे, और सबसे बढ़कर, विद्यार्थी मेरे पास आएँ, चारों ओर से आएँ, संयम और शान्ति लेकर आएँ। जिस शिक्षक ने कभी ख़ाली कक्षा देखी हो, वह इस प्रार्थना को तुरन्त पहचान लेगा।

सार: शिक्षावल्ली शान्तिपाठ से खुलती है और सबसे पहले उच्चारण सिखाती है, क्योंकि सुनी हुई परम्परा में स्वर ही अर्थ का रखवाला है। फिर वह पाँच जगहों पर दिखाती है कि हर चीज़ किसी जोड़ पर टिकी है, और उन जोड़ों में सबसे जीवित जोड़ आचार्य और शिष्य का है, जिसे पढ़ाना जोड़े रखता है।

चार व्याहृतियाँ, हृदय का आकाश, और वह अक्षर जिससे सब आरम्भ होता है

भूः, भुवः और सुवः, ये तीन व्याहृतियाँ हर ब्राह्मण बचपन से जानता था। इस उपनिषद् के पास एक चौथी है, और उसका श्रेय नाम लेकर दिया गया है, कि माहाचमस्य ने उसे जाना और बताया, महः। और तुरन्त कह दिया जाता है कि वही ब्रह्म है, वही आत्मा है, और बाक़ी देवता उसके अंग हैं। इसके बाद यह चौथाई चार बार दोहराई जाती है, हर बार एक नए तल पर। लोकों में भूः यह पृथ्वी है, भुवः अन्तरिक्ष है, सुवः वह ऊपर का लोक है, और महः आदित्य है, क्योंकि आदित्य से ही सारे लोक बड़े होते हैं।

दूसरी बार ज्योतियों में, जहाँ भूः अग्नि है, भुवः वायु, सुवः आदित्य, और महः चन्द्रमा, क्योंकि चन्द्रमा से सारी ज्योतियाँ बढ़ती हैं। तीसरी बार वेदों में, जहाँ भूः ऋचाएँ हैं, भुवः साम, सुवः यजु, और महः ब्रह्म, क्योंकि ब्रह्म से सारे वेद बढ़ते हैं। और चौथी बार अपनी ही साँस में, जहाँ भूः प्राण है, भुवः अपान, सुवः व्यान, और महः अन्न, क्योंकि अन्न से ही सारे प्राण बढ़ते हैं। चार व्याहृतियाँ चार-चार होकर सोलह हो जाती हैं, और जो इन्हें जान लेता है, यह उपनिषद् कहता है, वह ब्रह्म को जान लेता है और सारे देवता उसके पास भेंट लेकर आते हैं।

इसके बाद दृश्य एकाएक भीतर मुड़ जाता है। हृदय के भीतर एक आकाश है, और उस आकाश में वह पुरुष है जो मन से बना है, जो मरता नहीं, जो सुनहरा है। फिर बड़ी बारीकी से एक रास्ता बताया जाता है, दोनों तालुओं के बीच जो स्तन की तरह लटकता हुआ अंश है, वह इन्द्र तक जाने का द्वार है, और उसके आगे वहाँ जहाँ सिर के बाल बँटते हैं, खोपड़ी के दोनों पल्लों को अलग करके वह रास्ता निकलता है। इस रास्ते पर चलते हुए साधक भूः कहकर अग्नि में ठहरता है, भुवः कहकर वायु में, सुवः कहकर आदित्य में, और महः कहकर ब्रह्म में।

वहाँ पहुँचकर उसे अपना राज्य मिल जाता है, मन का स्वामी मिल जाता है, और वह वाणी का, आँख का, कान का और समझ का स्वामी हो जाता है। और फिर वह स्वयं वह हो जाता है जिसका वर्णन इस उपनिषद् ने बस चार टुकड़ों में कर दिया है, जिसकी देह आकाश है, जिसका स्वरूप सत्य है, जो प्राणों में रमता है, जिसका मन आनन्द में है, जो शान्ति से भरपूर है और जो अमर है। और अन्त में एक नाम आता है, प्राचीनयोग्य, आप इसी तरह उपासना कीजिए। पूरे उपनिषद् में यह इकलौती जगह है जहाँ उपासना किसी एक व्यक्ति के नाम पर सौंपी जाती है, और उससे यह पन्ना अचानक एक कक्षा का पन्ना बन जाता है।

अगला अनुवाक गिनती का खेल खेलता है। बाहर की ओर पाँच-पाँच हैं, पृथ्वी, अन्तरिक्ष, द्युलोक, दिशाएँ और कोनों की दिशाएँ। अग्नि, वायु, आदित्य, चन्द्रमा और नक्षत्र। जल, ओषधि, वनस्पति, आकाश और आत्मा। और भीतर की ओर भी पाँच-पाँच हैं, प्राण, व्यान, अपान, उदान और समान। आँख, कान, मन, वाणी और त्वचा। चमड़ा, माँस, स्नायु, हड्डी और मज्जा। इतना रखकर ऋषि ने कहा कि यह सब पाँच-पाँच का बना है, और पाँच से ही पाँच को पूरा किया जाता है। भीतर और बाहर एक ही नाप के हैं, इसलिए एक से दूसरे तक जाना सम्भव है।

शिक्षावल्ली का यह हिस्सा उस अक्षर पर आकर ठहरता है जिससे हर पाठ शुरू होता है। ओम ही ब्रह्म है, ओम ही यह सब है, और ओम ही वह स्वीकृति है जिससे हर काम आगे बढ़ता है। सामगान ओम से शुरू होते हैं, शस्त्र ओम से पढ़े जाते हैं, अध्वर्यु ओम कहकर उत्तर देता है, ब्रह्मा नाम का पुरोहित ओम कहकर अनुमति देता है, अग्निहोत्र की आज्ञा ओम से मिलती है, और पढ़ाने बैठा ब्राह्मण ओम कहकर मन में रखता है कि मैं ब्रह्म को प्राप्त करूँ, और वह ब्रह्म को ही प्राप्त कर लेता है। एक छोटी-सी हामी, जिससे हर बड़ी बात को रास्ता मिलता है।

सार: तीन व्याहृतियों में एक चौथी महः जुड़ती है और चारों को लोक, ज्योति, वेद और प्राण पर बार-बार बिछाया जाता है। फिर बात हृदय के भीतर के आकाश पर आती है, जहाँ मन से बना अमर पुरुष बसता है, और अन्त में ओम पर, जिसकी एक हामी से हर यज्ञ और हर पाठ चलता है।

स्वाध्याय और प्रवचन ही तप है

अब एक ऐसा अनुवाक आता है जो पढ़ने में सूची जैसा लगता है और असल में एक ज़िद है। ऋत भी करना है और स्वाध्याय-प्रवचन भी। सत्य भी और स्वाध्याय-प्रवचन भी। तप भी और स्वाध्याय-प्रवचन भी। दम भी, शम भी, अग्नियों की सेवा भी, अग्निहोत्र भी, अतिथि का सत्कार भी, मनुष्यों के प्रति अपना कर्तव्य भी, सन्तान भी, सन्तान का होना भी, और वंश का बढ़ना भी। हर एक के साथ वही दो शब्द फिर-फिर लौटते हैं, स्वाध्याय और प्रवचन, यानी अपने लिए पढ़ना और दूसरों को पढ़ाना। बारह बार यह जोड़ा दोहराया जाता है, और दोहराव ही उसका तर्क है।

इसके बाद तीन आचार्य नाम लेकर बुलाए जाते हैं। सत्यवचा राथीतर कहते हैं कि सत्य ही सब कुछ है। तपोनित्य पौरुशिष्टि कहते हैं कि तप ही सब कुछ है। और नाक मौद्गल्य कहते हैं कि स्वाध्याय और प्रवचन ही सब कुछ हैं, क्योंकि वही तप है, वही तप है। तीनों मत एक ही पन्ने पर बिना किसी खींचतान के रख दिए गए हैं, और किसी को ग़लत नहीं ठहराया जाता। पर आख़िरी वाक्य का दोहराव अपनी बात कह जाता है। जिस परम्परा में सारा ज्ञान कंठ में रहता है, वहाँ रोज़ का पाठ और रोज़ का पढ़ाना ही वह आग है जिसमें आदमी तपता है।

यह बात आज और भी काम की है। तप को हम अक्सर किसी असाधारण कठिनाई में ढूँढ़ते हैं, किसी उपवास में, किसी एकान्त में। यह उपनिषद् उसे रोज़ की मेज़ पर रख देता है। जो आदमी हर दिन अपने विषय पर लौटता है, उसे दोहराता है, और फिर किसी और को उसे सौंपता है, वह अपने को घिस रहा है, और उसी घिसाई से चमक आती है। पढ़ना अकेले में अधूरा है, क्योंकि जो सीखा है वह किसी दूसरे के कान तक पहुँचे बिना परम्परा नहीं बनता, और पढ़ाना भी अकेला अधूरा है, क्योंकि जो ख़ुद नहीं पढ़ता उसके पास देने को बासी माल ही बचता है।

इसी सिलसिले में एक छोटी-सी घोषणा आती है, त्रिशङ्कु का वेदानुवचन। वे कहते हैं कि मैं वृक्ष को हिला देने वाला हूँ, मेरी कीर्ति पर्वत की चोटी की तरह ऊँची है, मैं ऊपर से पवित्र हूँ, और जैसे सूर्य में अमृत है वैसा ही शुद्ध अमृत मैं हूँ, मैं तेजस्वी धन हूँ, मैं अच्छी बुद्धि वाला हूँ, अमृत से सींचा हुआ हूँ। यह आत्मप्रशंसा की तरह सुनाई देती है और है उसकी उलटी चीज़। जिसने अपने भीतर के उस तत्त्व को छू लिया जो कभी मरता नहीं, उसके मुँह से यही निकलता है, और वह अपने बारे में नहीं, उसी तत्त्व के बारे में बोल रहा होता है।

सार: बारह कर्तव्यों की सूची में हर बार एक ही जोड़ा लौटता है, स्वाध्याय और प्रवचन। तीन आचार्यों की तीन राय साथ-साथ रखी जाती हैं, और आख़िरी राय दोहराकर कही जाती है कि पढ़ना और पढ़ाना ही तप है। इसके बाद त्रिशङ्कु का वह उद्गार आता है जिसमें अपने भीतर के अमृत की पहचान बोल रही है।

दीक्षान्त का उपदेश: सत्यं वद, धर्मं चर

वेद पढ़ा चुकने के बाद आचार्य अपने अन्तेवासी को अनुशासन देते हैं। पहला वाक्य वही है जिससे यह पन्ना दुनिया भर में पहचाना जाता है, “सत्यं वद”, सच बोलिए, और उसके पीछे-पीछे “धर्मं चर”, धर्म पर चलिए। फिर, अपने स्वाध्याय में प्रमाद मत कीजिए। आचार्य के लिए उन्हें प्रिय धन लाकर दीजिए, और वंश की डोर मत तोड़िए। इन थोड़े शब्दों में एक पूरी गृहस्थी बाँध दी गई है। सत्य वाणी का व्रत है, धर्म काम का, स्वाध्याय बुद्धि का, आचार्य को दक्षिणा कृतज्ञता का, और सन्तान समय के प्रति ज़िम्मेदारी का।

फिर एक और तरह से वही बात कही जाती है, और अब मना करके। सत्य से प्रमाद नहीं होना चाहिए। धर्म से प्रमाद नहीं होना चाहिए। कुशल से, यानी अपने हित से, प्रमाद नहीं होना चाहिए। भूति से, यानी उन्नति से, प्रमाद नहीं होना चाहिए। स्वाध्याय और प्रवचन से प्रमाद नहीं होना चाहिए। और देवताओं तथा पितरों के कामों से प्रमाद नहीं होना चाहिए। यह उपनिषद् संसार से भागने को नहीं कहता। वह अपने हित और अपनी उन्नति को भी उसी सूची में रखता है जिसमें सत्य और धर्म हैं, और छह बार एक ही शब्द दोहराता है, चूक मत जाइए।

अब वे चार वाक्य आते हैं जो इस देश के घरों में मुहावरा बन गए। “मातृदेवो भव”, माता आपके लिए देवता हों। पिता देवता हों, आचार्य देवता हों, अतिथि देवता हों। चारों में एक ही क्रम है, जो सबसे पास है उससे शुरू करके जो अभी-अभी द्वार पर आया है उस तक। और ध्यान दीजिए कि यहाँ किसी मन्दिर का नाम नहीं है। जिनसे देह मिली, जिनसे विद्या मिली, और जो बिना बुलाए आ गया, ये चार ही वे देवता हैं जिनकी पूजा इस उपनिषद् ने बताई है।

इसके बाद वह वाक्य आता है जो इस पूरे उपदेश को ईमानदार बना देता है। जो कर्म निन्दा से परे हैं, उन्हीं का सेवन कीजिए, दूसरों का नहीं। और फिर आचार्य अपने बारे में कहते हैं, कि हमारे जो सुचरित हैं, यानी अच्छे आचरण हैं, आप उन्हीं को अपनाइए, दूसरों को नहीं। गुरु अपने शिष्य से कह रहे हैं कि मेरी हर बात मत उठा लीजिए, मुझमें भी जो उठाने लायक़ है बस वही उठाइए। इतना साफ़ वाक्य किसी भी परम्परा में दुर्लभ है, और वही इस परम्परा को जकड़न से बचाता है।

फिर देने की तमीज़ सिखाई जाती है। जो ब्राह्मण हमसे श्रेष्ठ हैं, उन्हें आसन देकर थकान मिटाने दीजिए। श्रद्धा से दीजिए, अश्रद्धा से मत दीजिए। अपनी सामर्थ्य के अनुसार दीजिए, लज्जा के साथ दीजिए, भय के साथ दीजिए, और समझ के साथ दीजिए। इन चार शब्दों में देने की पूरी मनोदशा है। लज्जा, कि मैं दे रहा हूँ यह जताने में संकोच हो। भय, कि कहीं ठीक से न दिया जाए। और संविद, कि लेने वाले की स्थिति को समझकर दिया जाए। दान की मात्रा से ज़्यादा इस उपनिषद् को दान का ढंग प्यारा है।

अन्त में एक ऐसी सलाह आती है जो इस पन्ने को बहुत आधुनिक बना देती है। अगर कभी किसी कर्म के बारे में या किसी के आचरण के बारे में आपके मन में सन्देह हो, तो जो ब्राह्मण वहाँ विचारशील हों, अपने काम में लगे हों, कठोर न हों और धर्म के प्रेमी हों, वे उस स्थिति में जैसा बरतें, आप भी वैसा ही बरतिए। और जिन पर कोई आरोप लगा हो, उनके बारे में भी यही कसौटी है। नियम हर स्थिति के लिए नहीं बन सकते, इसलिए यहाँ नियम की जगह एक जीवित आदमी की ओर उँगली उठाई गई है। यही आदेश है, यही उपदेश है, यही वेद का रहस्य है, यही अनुशासन है, इसी तरह जीना चाहिए।

सार: विदाई के उपदेश में सत्य, धर्म, स्वाध्याय, कृतज्ञता और वंश, पाँचों एक साँस में सौंपे जाते हैं, और चार देवता गिनाए जाते हैं, माता, पिता, आचार्य और अतिथि। सबसे बड़ी बात वह छूट है जो आचार्य ख़ुद देते हैं, कि हममें जो अच्छा है बस उसी को अपनाइए, और सन्देह के समय किसी विचारशील और निष्कपट आदमी को देखकर तय कीजिए।

ब्रह्मानन्दवल्ली: सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म, और अन्न से बनी पहली परत

दूसरी वल्ली गुरु और शिष्य की उस साझी प्रार्थना से खुलती है जो आज भी हर कक्षा में दोहराई जाती है, कि वह हम दोनों की रक्षा करे, हम दोनों का पालन करे, हम साथ मिलकर बल पाएँ, हमारा पढ़ा हुआ तेजस्वी हो, और हम आपस में द्वेष न करें। इसके ठीक बाद पहला वाक्य पड़ता है, ब्रह्म को जानने वाला परम को प्राप्त करता है। और फिर वह परिचय आता है जो इस उपनिषद् की सबसे कसी हुई पंक्ति है, “सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म”, ब्रह्म सत्य है, ज्ञान है, अनन्त है। जो इसे हृदय की गुहा में, परम आकाश में रखा हुआ जान लेता है, वह उस विद्वान् ब्रह्म के साथ सारी कामनाएँ एक साथ भोग लेता है।

तीन शब्दों में तीन दरवाज़े बन्द किए गए हैं। सत्य कहने से वह उस श्रेणी से निकल जाता है जो बदलती रहती है। ज्ञान कहने से वह जड़ नहीं रह जाता, वह चेतना है। और अनन्त कहने से उसकी कोई सीमा नहीं बचती, न देश की, न काल की, न किसी दूसरी वस्तु की। इसके बाद सृष्टि का क्रम एक साँस में कह दिया जाता है। उस आत्मा से आकाश हुआ, आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल, जल से पृथ्वी, पृथ्वी से ओषधियाँ, ओषधियों से अन्न, अन्न से रेत, और रेत से पुरुष। सृष्टि ऊपर से नीचे उतरती है और आख़िर में जाकर एक आदमी बनती है, जो अन्न के रस से बना है।

अब यह उपनिषद् उस आदमी को यज्ञ की वेदी की तरह खोलकर रखता है, और एक ही नक़्शा पाँच बार दोहराएगा। हर परत का एक सिर है, एक दायाँ पंख, एक बायाँ पंख, एक बीच का धड़, और एक पूँछ जो उसे टिकाए रखती है। पहली परत अन्नरसमय है, यानी खाए हुए अन्न से बनी देह। यही सिर है, यही दायाँ पार्श्व, यही बायाँ, यही बीच, और यही नीचे की प्रतिष्ठा। पक्षी का रूपक इसलिए है कि यह देह उड़ने के लिए बनी है और उड़ान के लिए दोनों पंख और एक पूँछ चाहिए।

इसके बाद अन्न की महिमा का वह श्लोक आता है जिसे यह उपनिषद् बाद में तीसरी वल्ली में फिर उठाएगा। अन्न से ही सारी प्रजा पैदा होती है, जितनी भी पृथ्वी के सहारे जीती है। अन्न से ही जीती है, और अन्त में अन्न में ही समा जाती है। अन्न प्राणियों में सबसे पहले हुआ, इसलिए उसे सब ओषधियों का सार कहते हैं। जो अन्न को ब्रह्म मानकर उसकी उपासना करते हैं, वे सब अन्न पा लेते हैं। और अन्न शब्द का कारण भी गिना दिया जाता है, कि वह खाया भी जाता है और प्राणियों को खाता भी है, इसलिए उसका नाम अन्न है।

यह एक पंक्ति पूरे उपनिषद् की चाभी है। जिसे हम खाते हैं वही हमें खा रहा है, धीरे-धीरे, हर दिन। शरीर अन्न का बना है और अन्त में अन्न बनकर लौट जाएगा। इस सच को यह उपनिषद् उदासी की तरह नहीं, बल्कि एक तथ्य की तरह रखता है, और उसी तथ्य से आगे की सीढ़ी बनाता है। क्योंकि जो चीज़ खाई जा सकती है, उसे अन्तिम नहीं माना जा सकता, और इसीलिए अगली पंक्ति आती है, कि इस अन्नरसमय से भीतर एक और आत्मा है, प्राण से बनी हुई, और उससे यह देह भरी हुई है।

सार: ब्रह्मानन्दवल्ली ब्रह्म को तीन शब्दों में पकड़ती है, सत्य, ज्ञान और अनन्त, और उसे हृदय की गुहा में रखा हुआ बताती है। फिर आकाश से लेकर आदमी तक सृष्टि का क्रम रखकर वह पहली परत खोलती है, अन्न से बनी देह, जो खाती भी है और खाई भी जाती है।

प्राण, मन, विज्ञान और आनन्द: भीतर की ओर चार परतें

दूसरी परत प्राणमय है। देवता भी प्राण के पीछे-पीछे साँस लेते हैं, मनुष्य भी, और पशु भी। प्राण ही प्राणियों की आयु है, इसलिए उसे सब की आयु कहते हैं। जो प्राण को ब्रह्म मानकर उपासना करते हैं, वे पूरी आयु पाते हैं। इस परत का नक़्शा भी वैसा ही बनता है, प्राण उसका सिर है, व्यान दायाँ पंख, अपान बायाँ पंख, आकाश बीच का धड़, और पृथ्वी उसकी पूँछ, उसकी प्रतिष्ठा। और अन्त में वही वाक्य लौटता है, कि जो पहली परत का शरीर था, उसकी आत्मा यही दूसरी है, और इससे भीतर एक और है।

तीसरी परत मनोमय है, और यहाँ नक़्शे में एक मोड़ आता है। इस परत का सिर यजुर्वेद है, दायाँ पंख ऋग्वेद, बायाँ पंख सामवेद, बीच का धड़ आदेश यानी ब्राह्मण-ग्रन्थों का विधान, और पूँछ अथर्वाङ्गिरस। मन की परत को वेदों से बनाकर दिखाना एक गहरी बात कह जाता है। हमारा मन जिन शब्दों से भरा है, वही उसका आकार बनते हैं। जिसने जीवन भर जो सुना और दोहराया है, उसी का बना उसका भीतर का आदमी है, और इसीलिए पहली वल्ली इतनी देर तक स्वाध्याय पर अड़ी रही।

चौथी परत विज्ञानमय है, यानी वह जो जानता है और निर्णय करता है। इस परत का सिर श्रद्धा है, दायाँ पंख ऋत, बायाँ पंख सत्य, बीच का धड़ योग, और पूँछ महः। सिर पर श्रद्धा रखना बहुत बड़ी बात है। जानने की पूरी इमारत सबसे पहले एक भरोसे पर खड़ी होती है, कि जानने लायक़ कुछ है और मैं उसे जान सकता हूँ। विज्ञान ही यज्ञ को फैलाता है, कर्मों को फैलाता है, और सारे देवता उसी ज्येष्ठ ब्रह्म की उपासना करते हैं। जो विज्ञान को ब्रह्म जानकर उससे प्रमाद नहीं करता, वह देह में पड़े पापों को छोड़कर सारी कामनाएँ पा लेता है।

और पाँचवीं परत आनन्दमय है। इसका सिर प्रिय है, यानी मनचाही वस्तु के दिखते ही जो पहली उमंग उठती है। दायाँ पंख मोद है, उसे पा लेने का सुख। बायाँ पंख प्रमोद है, उस सुख का फैलाव। बीच का धड़ स्वयं आनन्द है। और पूँछ, यानी वह जिस पर यह सारी परत टिकी है, ब्रह्म है। यहाँ यह उपनिषद् नक़्शा तोड़ देता है, क्योंकि अब तक हर परत की पूँछ कोई और चीज़ थी और इस बार पूँछ ब्रह्म है। शांकरभाष्य इसी शब्द पर ज़ोर देता है, कि आनन्दमय भी एक परत ही है और ब्रह्म वह है जिस पर यह परत भी टिकी हुई है।

पाँचों परतों को एक साथ देखिए तो एक सीधी बात निकलती है। हर बार यह उपनिषद् उसी ढाँचे को दोहराता है और हर बार कहता है कि इससे भीतर एक और है, यानी जिस चीज़ को हमने अपना सब कुछ समझ रखा था वह किसी और के ऊपर ओढ़ी हुई निकलती है। देह प्राण पर ओढ़ी है, प्राण मन पर, मन समझ पर, समझ आनन्द पर, और आनन्द ब्रह्म पर। और इन सबके बारे में जो पंक्ति चौथी परत के सिरे पर रखी गई है वह पूरे ग्रन्थ की सबसे प्रसिद्ध पंक्ति है, “यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह”, जहाँ से वाणी लौट आती है, मन के साथ, उसे पाए बिना।

सार: अन्न के भीतर प्राण, प्राण के भीतर मन, मन के भीतर विज्ञान, और विज्ञान के भीतर आनन्द। हर परत का वही पक्षी वाला नक़्शा दोहराया जाता है, और हर बार वही वाक्य लौटता है कि इससे भीतर एक और है। आनन्दमय की पूँछ पर ब्रह्म रखकर यह उपनिषद् इशारा कर देता है कि गिनती यहीं ख़त्म होती है।

तप से रचना, रचना में प्रवेश, और आनन्द की मीमांसा

अब एक कड़ा वाक्य आता है। जो यह मान लेता है कि ब्रह्म है ही नहीं, वह स्वयं असत् हो जाता है। और जो यह जान लेता है कि ब्रह्म है, उसे सज्जन लोग सत् मानते हैं। इसके ठीक बाद शिष्य के मन में उठे प्रश्न रखे जाते हैं, जिन्हें यह उपनिषद् अनुप्रश्न कहता है। क्या जो नहीं जानता वह भी मरकर उस लोक में पहुँचता है, या जो जानता है वही पहुँचकर उसे पा लेता है। प्रश्न हवा में लटका रहता है, और उत्तर की जगह एक कथा आ जाती है, जो इस उपनिषद् का ढंग है।

वह अकेला था। उसने चाहा कि मैं बहुत हो जाऊँ, मैं जन्म लूँ। उसने तप किया। तप करके उसने यह सब रचा, जो कुछ भी यहाँ है। और रचकर वह उसी में प्रवेश कर गया। प्रवेश करके वह सत् भी हुआ और वह भी जो सामने नहीं आता, निरुक्त भी हुआ और अनिरुक्त भी, आश्रय वाला भी और बिना आश्रय का भी, विज्ञान भी और अविज्ञान भी, सत्य भी और अनृत भी। और जो कुछ भी यहाँ है, वह सत्य हो गया, इसलिए उसे सत्य कहते हैं। बनाने वाला बनाकर बाहर खड़ा नहीं रहा, वह अपनी ही बनाई चीज़ के भीतर चला गया, और इसीलिए वह हर चीज़ में मिलेगा।

अगला अनुवाक इसी बात को दूसरी ओर से कहता है। पहले यह सब मानो असत् था, उससे सत् उत्पन्न हुआ, और उसने अपने आप को स्वयं बनाया, इसलिए उसे सुकृत कहते हैं, अपने आप किया हुआ। और फिर वह वाक्य आता है जो इस उपनिषद् का हृदय है, “रसो वै सः”, वह रस ही है। इस रस को पाकर ही यह जीव आनन्दित होता है। अगर हृदय के इस आकाश में यह आनन्द न होता, तो कौन साँस लेता और कौन जीता। वही तो है जो सबको आनन्दित करता है।

इसके बाद डर की जड़ बताई जाती है, और वह बहुत सीधी है। जब यह जीव उस अदृश्य, देह-रहित, बिना नाम और बिना आश्रय वाले तत्त्व में अपना ठहराव पा लेता है, तब वह अभय हो जाता है। और जिस क्षण वह उसमें ज़रा-सी दरार बना लेता है, ज़रा-सा अन्तर खड़ा कर लेता है, उसी क्षण उसे भय हो जाता है। डर किसी बाहरी चीज़ से नहीं आता। डर उस पल पैदा होता है जब मैं और वह दो हो जाते हैं। और यह उपनिषद् यह भी जोड़ देता है कि यह भय उसी विद्वान् को होता है जो मानता तो है पर मनन नहीं करता।

इसी डर का एक विराट चित्र अगले अनुवाक के पहले वाक्य में है। उसके भय से वायु बहती है, उसके भय से सूर्य उगता है, उसके भय से अग्नि और इन्द्र अपना काम करते हैं, और पाँचवाँ, मृत्यु, उसी के भय से दौड़ता है। यहाँ भय का अर्थ काँपना नहीं, अनुशासन है। एक ऐसी सत्ता है जिसके कारण हवा अपने समय पर चलती है और सूरज अपने समय पर निकलता है, और वही नियम है जो सब को अपनी सीमा में रखता है।

और अब वह गिनती आती है जिसके कारण इस वल्ली का नाम ब्रह्मानन्द पड़ा। मान लीजिए एक जवान आदमी है, अच्छा जवान, पढ़ा हुआ, सबसे तेज़, सबसे दृढ़, सबसे बलवान, और यह सारी पृथ्वी धन से भरी हुई उसकी हो जाए। यह एक मानुष आनन्द है। ऐसे सौ मानुष आनन्द मिलकर एक मनुष्यगन्धर्व का आनन्द बनते हैं, और उतना ही आनन्द उस श्रोत्रिय को भी मिला हुआ है जो कामना से आहत नहीं है। फिर सौ मनुष्यगन्धर्वों का आनन्द एक देवगन्धर्व का, सौ देवगन्धर्वों का एक चिरकाल तक लोक भोगने वाले पितर का, फिर आजानज देवों का, फिर कर्म से देवता बने हुओं का, फिर देवों का, फिर इन्द्र का, फिर बृहस्पति का, फिर प्रजापति का, और अन्त में ब्रह्मा का आनन्द।

इस पूरी सीढ़ी पर एक वाक्य बार-बार लौटता है, और वही असली बात है। हर पायदान पर कहा जाता है कि इतना ही आनन्द उस श्रोत्रिय का भी है जिसकी कामना उसे घायल नहीं करती। यानी जिस ऊँचाई तक पहुँचने में देवताओं की सौ-सौ गुना सीढ़ियाँ लगती हैं, वहाँ एक शान्त आदमी अपनी जगह बैठे-बैठे खड़ा है। और अन्त में यह उपनिषद् वह जोड़ लगाता है जिसकी ओर वह शुरू से बढ़ रहा था, जो यह पुरुष में है और जो वह आदित्य में है, वह एक ही है। जो ऐसा जानता है, वह इस लोक से जाकर अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय आत्मा को एक-एक करके पार करता चला जाता है।

वल्ली का आख़िरी पन्ना उसी पंक्ति पर लौटता है जिससे बीच में मुलाक़ात हुई थी, कि जहाँ से वाणी मन के साथ लौट आती है, उसे पाए बिना, वहाँ के ब्रह्म के आनन्द को जानने वाला किसी से नहीं डरता। और फिर एक बहुत मनुष्य वाली बात, कि उसे यह पछतावा नहीं जलाता कि मैंने अच्छा काम क्यों नहीं किया और बुरा काम क्यों किया। जो ऐसा जान लेता है, वह इन दोनों को अपनी आत्मा में समेट लेता है। रात में जो सवाल छत की ओर देखते हुए उठते हैं, यह उपनिषद् उन्हें नाम लेकर गिनाता है और फिर उनसे ऊपर की जगह दिखा देता है।

सार: उसने चाहा, तप किया, रचा, और अपनी ही रचना में प्रवेश कर गया, इसलिए वह हर चीज़ के भीतर से मिलता है। वही रस है जिससे जीने में स्वाद आता है, और भय उसी क्षण पैदा होता है जब उसमें ज़रा-सा अन्तर खड़ा कर लिया जाए। आनन्द की सौ-सौ गुना सीढ़ी पर हर पायदान के बराबर वह श्रोत्रिय रखा जाता है जिसे कामना घायल नहीं करती।

भृगु का पाँच बार लौटना

तीसरी वल्ली एक बेटे से शुरू होती है। भृगु वरुण के पुत्र थे, और वे अपने पिता के पास गए, यह कहकर कि भगवन्, मुझे ब्रह्म पढ़ाइए। वरुण ने पहले कुछ चीज़ें गिनाईं, अन्न, प्राण, आँख, कान, मन और वाणी, यानी वे दरवाज़े जिनसे होकर कोई भी खोज शुरू हो सकती है। और फिर उन्होंने वह कसौटी दी जो इस पूरी वल्ली को चलाएगी, “यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते”, जिससे ये सारे प्राणी जन्म लेते हैं, जिससे जन्म लेकर जीते हैं, और जिसकी ओर जाते हुए जिसमें समा जाते हैं, उसे जानने की इच्छा कीजिए, वही ब्रह्म है।

ध्यान दीजिए कि पिता ने उत्तर नहीं दिया। उन्होंने एक तराज़ू दे दिया, तीन काँटों वाला, कि जिससे सब पैदा हो, जिससे सब जिए, और जिसमें सब लौट जाए। अब बेटे को इस तराज़ू पर एक-एक चीज़ रखकर देखनी है। और वरुण ने एक और बात कही थी, कि तप से जानने की इच्छा कीजिए, तप ही ब्रह्म है। इस वल्ली में तप कोई कठिन आसन नहीं है, वह सोच को एक ही जगह गड़ाए रखने का नाम है, वह ज़िद है जो किसी उत्तर पर जल्दी सन्तुष्ट नहीं होती।

भृगु ने तप किया, और पहला उत्तर पाया, “अन्नं ब्रह्म”, अन्न ही ब्रह्म है। कसौटी पर वह ठीक बैठता था, क्योंकि अन्न से ही ये सब प्राणी पैदा होते हैं, अन्न से ही जीते हैं, और अन्त में अन्न में ही समा जाते हैं। यह कोई कच्चा उत्तर नहीं था। जो आदमी भूख जानता है, वह जानता है कि शरीर मिट्टी और अनाज का बना है और उसी में लौट जाएगा। पर भृगु उस उत्तर को लेकर बैठ नहीं गए। वे फिर पिता के पास गए और वही वाक्य दोहराया, भगवन्, मुझे ब्रह्म पढ़ाइए।

और वरुण ने फिर वही बात कही, “तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व”, तप से ब्रह्म को जानने की इच्छा कीजिए, तप ही ब्रह्म है। पिता ने उत्तर की समीक्षा नहीं की, यह नहीं कहा कि आप ग़लत थे, और यह भी नहीं कहा कि आप ठीक थे। उन्होंने बस वही औज़ार वापस थमा दिया। यह इस पूरी कथा का सबसे सधा हुआ हिस्सा है। एक शिक्षक जो सही उत्तर जानता है और फिर भी उसे मुँह से नहीं निकालता, क्योंकि जानता है कि उधार लिया हुआ उत्तर बेटे के काम नहीं आएगा।

दूसरी बार तप करके भृगु ने जाना कि प्राण ब्रह्म है। और ठीक ही जाना, क्योंकि प्राण से ही ये सब प्राणी पैदा होते हैं, प्राण से ही जीते हैं, और प्राण में ही समा जाते हैं। अन्न से प्राण तक की यह छलाँग बड़ी है। पहली बार उन्होंने उस चीज़ को देखा था जो तराज़ू पर रखी जा सकती थी, और अब उन्होंने उस चीज़ को देखा जो दिखती नहीं, बस चलती हुई महसूस होती है। पर वे फिर लौटे, और पिता ने फिर वही एक वाक्य कहा।

तीसरी बार तप से उन्होंने जाना कि मन ब्रह्म है, क्योंकि मन से ही ये सब प्राणी पैदा होते हैं, मन से ही जीते हैं, और मन में ही समा जाते हैं। और वे फिर लौटे। चौथी बार उन्होंने जाना कि विज्ञान ब्रह्म है, वह समझ जो निर्णय करती है और जिसके बिना कोई काम नहीं बनता, क्योंकि उसी से ये सब पैदा होते हैं, उसी से जीते हैं, और उसी में समा जाते हैं। और वे फिर लौटे। हर बार वही दरवाज़ा, वही वाक्य, वही उत्तर। पाँच चक्कर इस कथा को थकाने के लिए नहीं लिखे गए, वे बताने के लिए लिखे गए कि गहराई की कोई छोटी सड़क नहीं होती।

और पाँचवीं बार जो हुआ, वह इस उपनिषद् की सबसे बड़ी चुप्पी है। तप करके भृगु ने जाना, “आनन्दो ब्रह्म”, आनन्द ही ब्रह्म है, क्योंकि आनन्द से ही ये सारे प्राणी जन्म लेते हैं, आनन्द से ही जीते हैं, और आनन्द की ओर जाते हुए उसी में समा जाते हैं। इस बार वे पिता के पास नहीं लौटे। कथा वहीं रुक जाती है, और उसकी जगह एक नाम आता है, यही भार्गवी वारुणी विद्या है, जो परम आकाश में प्रतिष्ठित है। बेटे की खोज पर पिता का नाम भी लिखा गया, क्योंकि जिसने रास्ता नहीं बताया उसी ने रास्ता बनाया था।

और फिर जो फल गिनाया जाता है, वह ज़मीन पर उतर आता है। जो ऐसा जानता है वह प्रतिष्ठित हो जाता है, अन्न वाला और अन्न खाने वाला होता है, सन्तान से, पशुओं से और ब्रह्मतेज से महान् होता है, और कीर्ति से महान् होता है। आनन्द को ब्रह्म जान लेने का नतीजा संसार से विदा नहीं है। नतीजा यह है कि आदमी के पास देने के लिए बहुत कुछ हो जाता है, और यहीं से यह वल्ली अपना आख़िरी मोड़ लेती है।

सार: वरुण उत्तर नहीं देते, वे एक कसौटी देते हैं, कि जिससे सब जन्मे, जिससे सब जिए, और जिसमें सब लौटे। भृगु उस कसौटी पर अन्न, प्राण, मन और विज्ञान को रखते हैं और हर बार लौट आते हैं। पाँचवीं बार जब आनन्द ब्रह्म के रूप में खुलता है, वे लौटते नहीं, और यही न लौटना उत्तर का प्रमाण है।

अन्न का व्रत, और अन्त में वह गान

आनन्द तक पहुँचने के बाद यह उपनिषद् रसोई में लौट आता है, और यह उसकी सबसे बड़ी अदा है। चार व्रत गिनाए जाते हैं, और चारों अन्न के बारे में हैं। पहला, “अन्नं न निन्द्यात्”, अन्न की निन्दा न कीजिए, यही व्रत है। और उसका कारण भी दिया जाता है, कि प्राण अन्न है और शरीर उसे खाने वाला है, शरीर प्राण में टिका है और प्राण शरीर में, इसलिए यह अन्न अन्न में ही टिका हुआ है। जो यह जानता है वह प्रतिष्ठित होता है, अन्नवान् और अन्नाद होता है, सन्तान से, पशुओं से, ब्रह्मतेज से और कीर्ति से महान् होता है।

दूसरा व्रत, अन्न का तिरस्कार न कीजिए। यहाँ जल अन्न है और ज्योति उसे खाने वाली, क्योंकि ज्योति जल में टिकी है और जल ज्योति में। तीसरा व्रत, अन्न बहुत उपजाइए। यहाँ पृथ्वी अन्न है और आकाश उसे खाने वाला, क्योंकि आकाश पृथ्वी में टिका है और पृथ्वी आकाश में। हर बार वही वाक्य लौटता है, कि अन्न अन्न में ही टिका हुआ है, यानी खाने वाला और खाया जाने वाला एक ही चक्र के दो सिरे हैं, और कोई भी सिरा ऊँचा नहीं है।

चौथा व्रत सबसे मनुष्य वाला है, अपने घर से किसी को लौटाइए मत, यही व्रत है। और इसके पीछे जो तर्क दिया जाता है, वह चौंकाने वाली सीधी बात है, कि इसीलिए जिस किसी भी तरह से हो सके, बहुत अन्न कमाइए। भोजन जमा करने का कारण यहाँ अपनी भूख नहीं है, वह दरवाज़े पर आने वाला अनजान आदमी है। लोग कहते हैं कि उसके लिए अन्न तैयार है, और यह उपनिषद् जोड़ता है कि जो अन्न पहले, आदर के साथ परोसा जाता है, वह देने वाले को भी पहले मिलता है, जो बीच में परोसा जाता है वह बीच में मिलता है, और जो सबसे पीछे परोसा जाता है वह सबसे पीछे। देने का ढंग ही लौटकर आने का ढंग बन जाता है।

इसके बाद कुछ समीकरण आते हैं जो मनुष्य के भीतर हैं। वाणी में क्षेम है, यानी जो है उसकी रक्षा। प्राण और अपान में योगक्षेम है, जो नहीं है उसे पाना और जो है उसे बचाना। हाथों में कर्म है, पैरों में गति है, और मल त्याग में विमुक्ति है। ये मानुषी समाज्ञाएँ हैं। फिर दैवी समाज्ञाएँ आती हैं, वर्षा में तृप्ति है, बिजली में बल है, पशुओं में यश है, नक्षत्रों में ज्योति है, जननेन्द्रिय में सन्तान, अमृत और आनन्द है, और आकाश में सब कुछ है। भीतर और बाहर के इस मेल को इस उपनिषद् ने पहली वल्ली में भी दिखाया था, और यहाँ वह इसे उपासना बना देता है।

अब उपासना के छह सोपान आते हैं। उसे प्रतिष्ठा मानकर उपासना कीजिए, आदमी प्रतिष्ठावान् हो जाता है। उसे महः मानकर उपासना कीजिए, वह महान् हो जाता है। उसे मन मानकर उपासना कीजिए, वह मान पाने वाला हो जाता है। उसे नमः मानकर उपासना कीजिए, कामनाएँ उसके सामने झुक जाती हैं। उसे ब्रह्म मानकर उपासना कीजिए, वह ब्रह्म वाला हो जाता है। और उसे ब्रह्म का परिमर मानकर उपासना कीजिए, तो उसके चारों ओर उसके द्वेष करने वाले नष्ट हो जाते हैं। और फिर वही वाक्य लौटता है जो दूसरी वल्ली में आ चुका है, कि जो यह पुरुष में है और जो वह आदित्य में है, वह एक ही है।

और अब अन्तिम दृश्य। जो ऐसा जान गया, वह इस लोक से जाकर अन्नमय आत्मा को पार करता है, प्राणमय को पार करता है, मनोमय को, विज्ञानमय को, और आनन्दमय को पार करता है। फिर वह इन लोकों में मनचाहा अन्न पाता हुआ और मनचाहा रूप लेता हुआ घूमता है, और बैठकर एक साम गाता है। पहले तीन बार एक लम्बी हुंकार, और फिर वे शब्द जिनसे यह उपनिषद् पूरा होता है, “अहमन्नमहमन्नमहमन्नम्”, मैं अन्न हूँ, मैं अन्न हूँ, मैं अन्न हूँ। और उसके तुरन्त बाद, मैं अन्न खाने वाला हूँ, तीन बार। मैं श्लोक बनाने वाला हूँ, तीन बार। मैं ऋत का पहला जन्मा हूँ, देवताओं से भी पहले अमृत के बीच में हूँ, जो मुझे देता है वह मुझे बचा लेता है, मैं अन्न को खाने वाले को भी खा जाता हूँ, मैंने सारे भुवन को जीत लिया, मैं सुवर्ण की तरह ज्योतिर्मय हूँ।

यह गान इस पूरे ग्रन्थ की गाँठ है। जो अन्न से शुरू हुआ था वह अन्त में फिर अन्न कहता है, पर अब उसमें कोई सिकुड़न नहीं है। पहले अन्न का मतलब था वह जो खाया जाता है और मिट जाता है। अब अन्न का मतलब है वह जो देता है, बँटता है, और बँटकर भी घटता नहीं। जो आदमी अपने को खाने वाला और खाया जाने वाला, दोनों देख लेता है, उसके लिए खोने का हिसाब ख़त्म हो जाता है, और उसी भरे हुए मन से यह गान निकलता है।

सार: सबसे ऊँची बात जान लेने के बाद यह उपनिषद् चार व्रत देता है, और चारों रोटी के बारे में हैं, अन्न की निन्दा मत कीजिए, उसका तिरस्कार मत कीजिए, उसे बहुत उपजाइए, और अपने द्वार से किसी को लौटाइए मत। अन्त में वह आदमी अपने को अन्न भी कहता है और अन्न खाने वाला भी, और उसी गान पर यह ग्रन्थ पूरा होता है।

और अन्त में, अपनी ओर

इस उपनिषद् से जो एक बात सबसे पहले हाथ लगती है, वह भृगु का लौटना है। उन्हें हर बार एक सच्चा उत्तर मिला, और हर उत्तर इतना अच्छा था कि उस पर रुका जा सकता था। अन्न सच था, प्राण सच था, मन सच था, समझ सच थी। फिर भी वे उठे और चलकर उसी दरवाज़े पर गए। अपने जीवन में भी हमें ऐसे ही उत्तर मिलते हैं, कोई काम, कोई रिश्ता, कोई पहचान, जो एक समय तक पूरी दुनिया जैसी लगती है। उसे झूठ कहने की ज़रूरत नहीं। बस इतना याद रखने की ज़रूरत है कि उससे भीतर भी कुछ है, और वह याद ही आदमी को चलता हुआ रखती है।

दूसरी बात उस डर की है। यह उपनिषद् कहता है कि भय तब पैदा होता है जब हम उस एक में ज़रा-सा अन्तर बना लेते हैं, थोड़ी-सी दूरी, थोड़ा-सा अलगाव। दिनभर की घबराहटों को इस कसौटी पर रखकर देखिए, और लगभग हर बार वही मिलेगा, कोई न कोई ऐसी चीज़ जिसे हमने अपने से अलग और अपने ख़िलाफ़ मान लिया है। जिस क्षण वह दूरी थोड़ी घटती है, डर भी उसी अनुपात में घट जाता है। और आनन्द की उस पूरी सीढ़ी का असली सन्देश भी यही था, कि जिसकी कामना उसे घायल नहीं करती, वह अपनी जगह बैठे-बैठे देवताओं के बराबर है।

और तीसरी बात उस कक्षा से आती है जहाँ से यह सब शुरू हुआ। आचार्य ने विदा लेते शिष्य से कहा था कि हममें जो अच्छा है बस उसी को अपनाइए, और जब समझ में न आए कि क्या करना चाहिए तो किसी विचारशील, बिना कठोरता वाले, धर्म से प्रेम करने वाले आदमी को देखकर तय कीजिए। इससे ईमानदार सलाह किसी परम्परा ने अपने उत्तराधिकारी को नहीं दी। और अन्त में उसी उपनिषद् ने एक व्रत भी दे दिया, कि अपने दरवाज़े से किसी को लौटाइए मत। सबसे ऊँचा ज्ञान देकर उसने सबसे नीचे की सीढ़ी पर हाथ रखा, और उसी में उसकी पूरी बात आ गई।

आधार: तैत्तिरीय उपनिषद्, तीनों वल्ली; शिक्षावल्ली अनुवाक 1 से 12, ब्रह्मानन्दवल्ली अनुवाक 1 से 9, भृगुवल्ली अनुवाक 1 से 10; मूल पाठ के साथ पढ़ा गया, विवादित स्थलों पर शांकरभाष्य का संकेत।