Background
तैत्तिरीय उपनिषद् कृष्ण यजुर्वेद की तैत्तिरीय शाखा से ली गई है। नाम ‘तैत्तिरीय’ तित्तिरि (बटेर) पक्षी से जुड़ा है। कथा यह है कि एक ऋषि के शिष्यों ने उनके sikh viewpoint रूप पर बटेर बनकर पढ़ा, और इस तरह यह शाखा आगे चली।
तीन वल्लियाँ हैं:
1. शिक्षा-वल्ली: यह सबसे practical हिस्सा है। कैसे बोलें, कैसे पढ़ें, क्या नियम पकड़ें। इसी में मशहूर ‘graduation speech’ है (1.11): ‘सत्यं वद, धर्मं चर…’
2. ब्रह्मानन्द-वल्ली: यहाँ Vedanta का गहरा हिस्सा है। ‘सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म।’ और पाँच कोश (annamaya से anandamaya तक)। और famous आनन्द-मीमांसा, जहाँ एक मानवीय सुख की unit बनाई गई और उसे multiply करते-करते ब्रह्म-आनन्द तक पहुँचा गया।
3. भृगु-वल्ली: एक कथा। भृगु अपने पिता वरुण से पूछते हैं, ‘ब्रह्म क्या है?’ वरुण उन्हें पाँच बार भेजते हैं तपस्या को। हर बार भृगु एक नया जवाब लेकर आते हैं, और हर बार और गहरा।
कथा-सार (Story in Brief)
तैत्तिरीय एक gurukul की story जैसी पढ़ी जा सकती है। पहली वल्ली शिक्षा-वल्ली है। यहाँ साधारण बातें हैं: कैसे बोलो, कैसे पढ़ो, कैसे रहो। जैसे एक नया विद्यार्थी class में बैठा है, और गुरु पहले basics सिखा रहे हैं।
इसी वल्ली में एक famous moment है, अध्याय 11 का, जिसमें गुरु अपने graduating शिष्य को alvida करते हुए कहते हैं, ‘सत्यं वद। धर्मं चर। स्वाध्यायात् मा प्रमदः।’ सच बोलो। धर्म पर चलो। स्वाध्याय में आलस्य मत करना। और एक-एक करके अपनी ज़िंदगी की directions दे देते हैं।
दूसरी वल्ली ब्रह्मानन्द-वल्ली है। अब गुरु एक deeper question पर आते हैं: ‘ब्रह्म क्या है?’ और एक powerful definition देते हैं: ‘सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म।’ सत्य, ज्ञान, अनन्त, यही ब्रह्म।
फिर पाँच कोश (sheaths) का concept introduce करते हैं। अन्न-मय, प्राण-मय, मन-मय, विज्ञान-मय, और आनन्द-मय। हर layer अंदर है, और हर layer पिछली से sukshmतर है।
और एक beautiful section है जिसमें ब्रह्म के आनन्द को measure किया जाता है। एक नौजवान human’s सुख को unit मानकर, उसको gradually multiply किया जाता है। 100 गुना से शुरू करके, और हर step पर 100 गुना, जब तक हम ‘ब्रह्म-आनन्द’ तक पहुँचते हैं।
तीसरी वल्ली भृगु-वल्ली। भृगु अपने पिता वरुण से पूछते हैं ब्रह्म के बारे में। वरुण कहते हैं, ‘अन्न, प्राण, चक्षु, श्रोत्र, मन, वाणी, जिनसे यह सब उत्पन्न होता है, जिनमें टिका है, जिनमें लौटता है, वो ब्रह्म है। तप कर के जान।’ भृगु तप करते हैं, और जवाब आता है, ‘अन्न ही ब्रह्म है।’ मगर पिता कहते हैं, ‘फिर तप करो।’ दूसरी बार ‘प्राण’। फिर ‘मन’। फिर ‘विज्ञान’। अंत में ‘आनन्द।’ और यहीं रुकती है उपनिषद्।
Introduction
अगर आपने कभी किसी बच्चे को कुछ सिखाया हो, तो आप तैत्तिरीय की structure समझेंगे। पहले छोटी-छोटी बातें, फिर बड़ी, फिर सबसे बड़ी। यह pedagogy है, design है।
और इसमें graduation moment भी है, जहाँ गुरु student को विदा करते हुए कुछ ऐसा कहते हैं जो उसके पूरे जीवन के लिए काम आता है। ‘सत्यं वद। धर्मं चर।’ यह आज भी हर भारतीय school graduation में सुना जाता है, और शायद हमेशा सुना जाता रहेगा।
शिक्षा वल्ली
अनुवाक 1.1
शं न इन्द्रो बृहस्पतिः । शं नो विष्णुरुरुक्रमः ।
नमो ब्रह्मणे । नमस्ते वायो । त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि ।
त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि ।
ऋतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि ।
तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु ।
अवतु माम् । अवतु वक्तारम् ।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
अनुवाक 1.2
मात्रा बलम् । साम सन्तानः ।
इत्युक्तः शीक्षाध्यायः ॥
अध्याय 2 बहुत technical है। शिक्षा (phonetics) के six aspects: वर्ण (letters), स्वर (accents), मात्रा (length), बल (force), साम (uniformity), सन्तान (continuity)।
यह सोचकर interesting है कि एक ब्रह्म-विद्या वाली उपनिषद् phonetics से शुरू हो रही है। मगर पारंपरिक रूप से, सही pronunciation श्रुति के लिए essential है। ग़लत बोलने से mantra का असर नहीं होता।
अनुवाक 1.3
अथातः संहिताया उपनिषदं व्याख्यास्यामः ।
पञ्चस्वधिकरणेषु । अधिलोकमधिज्यौतिषमधिविद्यमधिप्रजमध्यात्मम् ।
ता महासंहिता इत्याचक्षते ।
एक conjoint blessing: ‘हम दोनों को (गुरु-शिष्य) यश और ब्रह्म-वर्चस मिले।’ और एक list, पाँच अधिकरण में: लोक, ज्योति, विद्या, प्रजा, अध्यात्म। यह ‘महा-संहिता’ है, बड़ा connection।
अनुवाक 1.4
स मेन्द्रो मेधया स्पृणोतु । अमृतस्य देव धारणो भूयासम् ।
शरीरं मे विचर्षणम् । जिह्वा मे मधुमत्तमा ।
कर्णाभ्यां भूरि विश्रुवम् । ब्रह्मणः कोशोऽसि मेधया पिहितः ।
श्रुतं मे गोपाय ॥
एक प्रार्थना। ‘मेधा से सब अमृत मेरा हो। मेरा शरीर तेज़, जिह्वा मधुर, कान बहुत सुनें। और सबसे important: ”ब्रह्म का कोश तू है, मेधा से ढका। मेरा सुना हुआ रक्षा कर।”’
एक शिष्य के लिए, यह सब प्रार्थनाएँ अपने medium को optimize करने की हैं।
अनुवाक 1.5
तासामु ह स्मैतां चतुर्थीं माहाचमस्यः प्रवेदयते ।
मह इति । तद्ब्रह्म । स आत्मा ।
अङ्गान्यन्या देवताः । भूरिति वा अयं लोकः ।
भुव इत्यन्तरिक्षम् । सुवरित्यसौ लोकः । मह इत्यादित्यः ॥
‘भू, भुवः, सुवः’ standard तीन व्याहृतियाँ हैं, मगर तैत्तिरीय एक चौथी जोड़ती है: ‘महः।’ इसे माहाचमस्य ऋषि ने प्रवर्तित किया।
‘महः = वो ब्रह्म, वो आत्मा।’ यानी तीन lower व्याहृतियों को एक upper anchor मिल गया। बाक़ी देव सिर्फ़ अंग हैं।
अनुवाक 1.6
अमृतो हिरण्मयः । अन्तरेण तालुके ।
य एष स्तन इवावलम्बते सेन्द्रयोनिः ।
यत्रासौ केशान्तो विवर्तते व्यपोह्य शीर्षकपाले ।
भूरित्यग्नौ प्रतितिष्ठति । भुव इति वायौ ।
सुवरित्यादित्ये । मह इति ब्रह्मणि ॥
बहुत technical। ‘हृदय के अंदर एक आकाश है। उसमें मनोमय पुरुष बैठा है।’ और एक anatomy। तालु के बीच, उसके पास एक ‘स्तन-जैसा’ लटका हुआ, वो ‘इन्द्र-योनि’ (इन्द्र का निकलने का दरवाज़ा) है। और सिर के top पर एक ‘केश-अन्त’ (वो जगह जहाँ केश नहीं), वो भी एक gateway।
यह योग-शरीर-शास्त्र का early version है। बाद में ‘ब्रह्म-रन्ध्र’ और ‘सहस्रार चक्र’ इसी का more developed form।
अनुवाक 1.7
अग्निर्वायुरादित्यश्चन्द्रमा नक्षत्राणि ।
आप ओषधयो वनस्पतय आकाश आत्मा ।
इत्यधिभूतम् । अथाध्यात्मम् । प्राणो व्यानोऽपान उदानः समानः ।
चक्षुः श्रोत्रं मनो वाक्त्वक् । चर्म मांसꣳ स्नावास्थि मज्जा ।
एतदधिविधाय ऋषिरवोचत् । पाङ्क्तं वा इदꣳ सर्वम् ।
पाङ्क्तेनैव पाङ्क्तꣳ स्पृणोतीति ॥
एक list: सब चीज़ें पाँच-पाँच में। पाँच लोक, पाँच ज्योतियाँ, पाँच elements। पाँच प्राण, पाँच knowledge-इन्द्रियाँ, पाँच शरीर के parts। ‘पाङ्क्तेनैव पाङ्क्तꣳ स्पृणोति।’ पाँच ही पाँच को पकड़ता है।
क्या मतलब? कि बाहर और अंदर एक ही pattern पर बने हैं। और इसलिए, हर बाहरी चीज़ अंदर की उसी सीमा से connect होती है।
अनुवाक 1.8
ॐ इत्येतदनुकृतिर्ह स्म वा अप्यो श्रावयेत्याश्रावयन्ति ।
ओमिति सामानि गायन्ति । ओꣳ शोमिति शस्त्राणि शꣳसन्ति ।
ओमित्यध्वर्युः प्रतिगरं प्रतिगृणाति ।
ओमिति ब्रह्मा प्रसौति । ओमित्यग्निहोत्रमनुजानाति ।
ओमिति ब्राह्मणः प्रवक्ष्यन्नाह ब्रह्मोपाप्नवानीति ।
ब्रह्मैवोपाप्नोति ॥
‘ओम् ब्रह्म है। ओम् सब है।’ और फिर ओम् के सब uses: साम-गायन, यज्ञ-शुरुआत, वेद-पाठ, अग्निहोत्र। हर जगह ओम् शुरू में।
क्यों? क्योंकि ‘जो ओम् कहता है, वो ब्रह्म चाहता है। और ब्रह्म पाता है।’ एक powerful claim।
अनुवाक 1.9
तपश्च स्वाध्यायप्रवचने च । दमश्च स्वाध्यायप्रवचने च ।
शमश्च स्वाध्यायप्रवचने च । अग्नयश्च स्वाध्यायप्रवचने च ।
अग्निहोत्रं च स्वाध्यायप्रवचने च । अतिथयश्च स्वाध्यायप्रवचने च ।
मानुषं च स्वाध्यायप्रवचने च । प्रजा च स्वाध्यायप्रवचने च ।
प्रजनश्च स्वाध्यायप्रवचने च । प्रजातिश्च स्वाध्यायप्रवचने च ।
सत्यमिति सत्यवचा राथीतरः ।
तप इति तपोनित्यः पौरुशिष्टिः ।
स्वाध्यायप्रवचने एवेति नाको मौद्गल्यः ।
तद्धि तपस्तद्धि तपः ॥
शिष्यों को बताया गया कि क्या-क्या करें। और हर एक practice के साथ ‘स्वाध्याय-प्रवचन’ जुड़ा है।
तीन ऋषियों की राय: सत्यवचा कहते, ‘सत्य most important।’ तपोनित्य कहते, ‘तप।’ नाक मौद्गल्य कहते, ‘स्वाध्याय-प्रवचन ही, यही सब तप है।’
तीन opinions, मगर सब कह रहे एक तरह की बात। self-study + teaching ही सबसे ऊँचा तप।
अनुवाक 1.10
ऊर्ध्वपवित्रो वाजिनीव स्वमृतमस्मि ।
द्रविणꣳ सवर्चसम् । सुमेधा अमृतोक्षितः ।
इति त्रिशङ्कोर्वेदानुवचनम् ॥
त्रिशङ्कु ऋषि का एक mysterious वेद-अनुवचन। ‘मैं वृक्ष का काटने वाला हूँ। मेरी कीर्ति पहाड़ जैसी।’
शंकर के अनुसार यह saint के self-realization का स्वर है, ‘मैं अब सब बंधनों को काट चुका। मैं अमर हूँ।’
अनुवाक 1.11
सत्यं वद । धर्मं चर । स्वाध्यायान्मा प्रमदः ।
आचार्याय प्रियं धनमाहृत्य प्रजातन्तुं मा व्यवच्छेत्सीः ।
सत्यान्न प्रमदितव्यम् । धर्मान्न प्रमदितव्यम् ।
कुशलान्न प्रमदितव्यम् । भूत्यै न प्रमदितव्यम् ।
स्वाध्यायप्रवचनाभ्यां न प्रमदितव्यम् ।
देवपितृकार्याभ्यां न प्रमदितव्यम् ।
मातृदेवो भव । पितृदेवो भव । आचार्यदेवो भव । अतिथिदेवो भव ।
यान्यनवद्यानि कर्माणि । तानि सेवितव्यानि । नो इतराणि ।
यान्यस्माकꣳ सुचरितानि । तानि त्वयोपास्यानि । नो इतराणि ।
ये के चास्मच्छ्रेयाꣳ सो ब्राह्मणाः । तेषां त्वयाऽऽसनेन प्रश्वसितव्यम् ।
श्रद्धया देयम् । अश्रद्धयाऽदेयम् । श्रिया देयम् ।
ह्रिया देयम् । भिया देयम् । संविदा देयम् ।
अथ यदि ते कर्मविचिकित्सा वा वृत्तविचिकित्सा वा स्यात् ।
ये तत्र ब्राह्मणाः संमर्शिनः । युक्ता आयुक्ताः । अलूक्षा धर्मकामाः स्युः ।
यथा ते तत्र वर्तेरन् । तथा तत्र वर्तेथाः ।
अथाभ्याख्यातेषु । ये तत्र ब्राह्मणाः संमर्शिनः ।
युक्ता आयुक्ताः । अलूक्षा धर्मकामाः स्युः ।
यथा ते तेषु वर्तेरन् । तथा तेषु वर्तेथाः ।
एष आदेशः । एष उपदेशः । एषा वेदोपनिषत् । एतदनुशासनम् ।
एवमुपासितव्यम् । एवमु चैतदुपास्यम् ॥
यह वो anuvak है जो हर भारतीय school graduation पर सुनाई जाता है। यह वेद की सबसे beloved instructions है।
एक gurukul से पढ़कर निकलने वाले बच्चे को आचार्य alvida करते हुए instructions देते हैं:
1. सत्यं वद। सच बोलो। 2. धर्मं चर। धर्म पर चलो। 3. स्वाध्यायात् मा प्रमदः। स्वाध्याय में आलस्य मत करना। 4. आचार्य को प्रिय धन देकर परंपरा मत तोड़ो।
फिर एक list ‘मा प्रमदितव्यम्’ (आलस्य न करना): सत्य, धर्म, कुशल, भूति, स्वाध्याय-प्रवचन, देव-पितृ-कार्य।
फिर famous: मातृदेवो भव। पितृदेवो भव। आचार्यदेवो भव। अतिथिदेवो भव। माँ देव, पिता देव, आचार्य देव, अतिथि देव।
आगे: ‘जो हमारे सुचरित हैं, वही करो। दूसरे नहीं।’ और ‘अगर doubt हो किसी कर्म में, तो विवेकी ब्राह्मणों की तरह व्यवहार करो।’
आख़िर में: ‘यह आदेश है, उपदेश है, वेद-उपनिषद् है, अनुशासन है।’ यानी यह सब निर्देश ही वेद का सार है।
अनुवाक 1.12
शं न इन्द्रो बृहस्पतिः । शं नो विष्णुरुरुक्रमः ।
नमो ब्रह्मणे । नमस्ते वायो । त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि ।
त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्मावादिषम् ।
ऋतमवादिषम् । सत्यमवादिषम् ।
तन्मामावीत् । तद्वक्तारमावीत् ।
आवीन्माम् । आवीद्वक्तारम् ।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
शिक्षा-वल्ली का अंत। शुरू वाला शान्ति-मन्त्र दोहराया गया है, मगर past tense में। ‘हमने ब्रह्म कहा, ऋत कहा, सत्य कहा। उसने रक्षा की।’
यह एक beautiful framing है। शुरू में future tense (‘कहूँगा’), अंत में past (‘कहा’)। पूरी study एक complete cycle।
ब्रह्मानन्द वल्ली
अनुवाक 2.1
सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म । यो वेद निहितं गुहायां परमे व्योमन् ।
सोऽश्नुते सर्वान् कामान् सह । ब्रह्मणा विपश्चितेति ।
तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः सम्भूतः ।
आकाशाद्वायुः । वायोरग्निः । अग्नेरापः ।
अद्भ्यः पृथिवी । पृथिव्या ओषधयः । ओषधीभ्योऽन्नम् ।
अन्नात् पुरुषः । स वा एष पुरुषोऽन्नरसमयः ।
तस्येदमेव शिरः । अयं दक्षिणः पक्षः । अयमुत्तरः पक्षः ।
अयमात्मा । इदं पुच्छं प्रतिष्ठा ।
तदप्येष श्लोको भवति ॥
दूसरी वल्ली, ब्रह्मानन्द-वल्ली। पहले मन्त्र में एक powerful definition: ‘सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म।’ सत्य, ज्ञान, अनन्त, यही ब्रह्म।
तीन गुण: नित्यता (सत्य), चेतना (ज्ञान), और infinity (अनन्त)। बाद में शंकर ने इसी पर पूरा निर्भयता-विवेक-चूड़ामणि लिखा।
फिर एक creation order: आकाश → वायु → अग्नि → जल → पृथ्वी → ओषधि → अन्न → पुरुष। यह सूक्ष्म से स्थूल का flow है।
और अन्न-रस-मय पुरुष का anatomical description, सिर-पाँख-आत्मा-पुच्छ structure। यह metaphor पाँच कोशों में हर एक के लिए repeat होगा।
अनुवाक 2.2
अथो अन्नेनैव जीवन्ति । अथैनदपि यन्त्यन्ततः ।
अन्नꣳ हि भूतानां ज्येष्ठम् । तस्मात् सर्वौषधमुच्यते ।
सर्वं वै तेऽन्नमाप्नुवन्ति । येऽन्नं ब्रह्मोपासते ।
अन्नꣳ हि भूतानां ज्येष्ठम् । तस्मात् सर्वौषधमुच्यते ।
अन्नाद्भूतानि जायन्ते । जातान्यन्नेन वर्धन्ते । अद्यतेऽत्ति च भूतानि ।
तस्मादन्नं तदुच्यत इति ।
तस्माद्वा एतस्मादन्नरसमयात् । अन्योऽन्तर आत्मा प्राणमयः ।
तेनैष पूर्णः । स वा एष पुरुषविध एव । तस्य पुरुषविधताम् ।
अन्वयं पुरुषविधः । तस्य प्राण एव शिरः ।
व्यानो दक्षिणः पक्षः । अपान उत्तरः पक्षः ।
आकाश आत्मा । पृथिवी पुच्छं प्रतिष्ठा ।
तदप्येष श्लोको भवति ॥
अन्न-मय कोश का विस्तार। ‘सब अन्न से उत्पन्न, अन्न से जीते, अन्न में लौटते।’ यह बहुत biological है।
और एक deeper layer: ‘इसके अंदर एक और आत्मा है, प्राण-मय।’ यह पहली bridge है। हम अब biology से physiology में आ रहे हैं।
अनुवाक 2.3
प्राणो हि भूतानामायुः । तस्मात् सर्वायुषमुच्यते ।
सर्वमेव त आयुर्यन्ति । ये प्राणं ब्रह्मोपासते ।
प्राणो हि भूतानामायुः । तस्मात् सर्वायुषमुच्यत इति ।
तस्यैष एव शारीर आत्मा । यः पूर्वस्य ।
तस्माद्वा एतस्मात् प्राणमयात् । अन्योऽन्तर आत्मा मनोमयः ।
तेनैष पूर्णः । स वा एष पुरुषविध एव ।
तस्य पुरुषविधताम् । अन्वयं पुरुषविधः ।
तस्य यजुरेव शिरः । ऋग्दक्षिणः पक्षः । सामोत्तरः पक्षः ।
आदेश आत्मा । अथर्वाङ्गिरसः पुच्छं प्रतिष्ठा ।
तदप्येष श्लोको भवति ॥
प्राण-मय कोश। ‘देव, मनुष्य, पशु, सब प्राण से जीते हैं।’ और अंदर एक और: मन-मय।
हम पाँच-कोश सीढ़ी पर चढ़ रहे हैं। हर एक sukshmतर। मन-मय वो है जो हमारे विचारों का स्तर है।
अनुवाक 2.4
आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् । न बिभेति कुतश्चनेति ।
तस्यैष एव शारीर आत्मा । यः पूर्वस्य ।
तस्माद्वा एतस्मान्मनोमयात् । अन्योऽन्तर आत्मा विज्ञानमयः ।
तेनैष पूर्णः । स वा एष पुरुषविध एव ।
तस्य पुरुषविधताम् । अन्वयं पुरुषविधः ।
तस्य श्रद्धैव शिरः । ऋतं दक्षिणः पक्षः ।
सत्यमुत्तरः पक्षः । योग आत्मा ।
महः पुच्छं प्रतिष्ठा । तदप्येष श्लोको भवति ॥
मन-मय कोश। पहले एक famous श्लोक: ‘जहाँ से वाणी और मन लौट जाते हैं।’ यानी मन भी ब्रह्म तक नहीं पहुँचता।
फिर अगला कोश: विज्ञान-मय। यह ‘judgment, discrimination’ की layer है, मन-मय से ऊँची।
अनुवाक 2.5
विज्ञानं देवाः सर्वे । ब्रह्म ज्येष्ठमुपासते ।
विज्ञानं ब्रह्म चेद्वेद । तस्माच्चेन्न प्रमाद्यति ।
शरीरे पाप्मनो हित्वा । सर्वान् कामान् समश्नुत इति ।
तस्यैष एव शारीर आत्मा । यः पूर्वस्य ।
तस्माद्वा एतस्माद्विज्ञानमयात् । अन्योऽन्तर आत्माऽऽनन्दमयः ।
तेनैष पूर्णः । स वा एष पुरुषविध एव ।
तस्य पुरुषविधताम् । अन्वयं पुरुषविधः ।
तस्य प्रियमेव शिरः । मोदो दक्षिणः पक्षः । प्रमोद उत्तरः पक्षः ।
आनन्द आत्मा । ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा । तदप्येष श्लोको भवति ॥
विज्ञान-मय कोश। ‘विज्ञान यज्ञ करता, कर्म करता।’ यह decision-making और understanding की layer।
और सबसे अंदर: आनन्द-मय। यह सबसे सूक्ष्म कोश। ‘उसका सिर प्रिय, दक्षिण पाँख मोद, उत्तर पाँख प्रमोद, आत्मा आनन्द, पुच्छ-प्रतिष्ठा ब्रह्म।’
तो पाँच कोश: अन्न-मय, प्राण-मय, मन-मय, विज्ञान-मय, आनन्द-मय। सब हर एक के अंदर। यह famous ‘पंच-कोश’ सिद्धान्त।
अनुवाक 2.6
अस्ति ब्रह्मेति चेद्वेद । सन्तमेनं ततो विदुरिति ।
तस्यैष एव शारीर आत्मा । यः पूर्वस्य ।
अथातोऽनुप्रश्नाः । उताविद्वानमुं लोकं प्रेत्य कश्चन गच्छती ३ ।
आहो विद्वानमुं लोकं प्रेत्य कश्चित् समश्नुता ३ उ ।
सोऽकामयत । बहु स्यां प्रजायेयेति । स तपोऽतप्यत ।
स तपस्तप्त्वा । इदꣳ सर्वमसृजत । यदिदं किं च ।
तत् सृष्ट्वा । तदेवानुप्राविशत् ।
तदनुप्रविश्य । सच्च त्यच्चाभवत् ।
निरुक्तं चानिरुक्तं च । निलयनं चानिलयनं च ।
विज्ञानं चाविज्ञानं च । सत्यं चानृतं च सत्यमभवत् ।
यदिदं किंच । तत्सत्यमित्याचक्षते ।
तदप्येष श्लोको भवति ॥
एक थोड़ा subtle मन्त्र। ‘अगर तुम मानो ब्रह्म असत् है, तुम भी असत् हो जाते हो। अगर मानो सत् है, तो ज्ञानी तुम्हें सत् मानते हैं।’
यानी आप जो belief रखते हैं, आप वही बन जाते हैं।
फिर एक creation story: ‘उसने सोचा, मैं बहुत हो जाऊँ। उसने तप किया, सब बनाया। फिर ख़ुद उसी में प्रवेश किया।’ यह ऐतरेय 1.3.12 का echo है।
अनुवाक 2.7
तदात्मानꣳ स्वयमकुरुत । तस्मात्तत्सुकृतमुच्यत इति ।
यद्वै तत् सुकृतम् । रसो वै सः । रसꣳ ह्येवायं लब्ध्वाऽऽनन्दी भवति ।
को ह्येवान्यात्कः प्राण्यात् । यदेष आकाश आनन्दो न स्यात् ।
एष ह्येवानन्दयाति ।
यदा ह्येवैष एतस्मिन्नदृश्येऽनात्म्येऽनिरुक्तेऽनिलयनेऽभयं प्रतिष्ठां विन्दते ।
अथ सोऽभयं गतो भवति ।
यदा ह्येवैष एतस्मिन्नुदरमन्तरं कुरुते ।
अथ तस्य भयं भवति ।
तत्त्वेव भयं विदुषोऽमन्वानस्य ।
तदप्येष श्लोको भवति ॥
‘पहले असत् था, फिर सत् हुआ। उसने ख़ुद को बनाया, इसलिए सुकृत।’
‘जो सुकृत है, वो रस है। रस पाकर ही कोई आनन्दी होता है।’ Ananda is the underlying reality।
‘अगर यह आकाश आनन्द न होता, तो कौन साँस लेता?’ यानी हर breath, हर जीवन, ananda-driven है।
‘अभय कैसे मिलता है? जब साधक उस अदृष्ट में ख़ुद को पूरी तरह दे देता है। मगर जब वो उसमें थोड़ा भी दूरी (अंतर) बनाता है, तो भय।’ यानी ब्रह्म से separateness का sense ही भय है।
अनुवाक 2.8
भीषाऽस्मादग्निश्चेन्द्रश्च । मृत्युर्धावति पञ्चम इति ।
सैषाऽऽनन्दस्य मीमाꣳसा भवति ।
युवा स्यात्साधुयुवाऽध्यायकः ।
आशिष्ठो दृढिष्ठो बलिष्ठः ।
तस्येयं पृथिवी सर्वा वित्तस्य पूर्णा स्यात् ।
स एको मानुष आनन्दः ।
ते ये शतं मानुषा आनन्दाः । स एको मनुष्यगन्धर्वाणामानन्दः ।
श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य ।
ते ये शतं मनुष्यगन्धर्वाणामानन्दाः ।
स एको देवगन्धर्वाणामानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य ।
ते ये शतं देवगन्धर्वाणामानन्दाः ।
स एकः पितृणां चिरलोकलोकानामानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य ।
ते ये शतं पितृणां चिरलोकलोकानामानन्दाः ।
स एक आजानजानां देवानामानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य ।
ते ये शतमाजानजानां देवानामानन्दाः ।
स एकः कर्मदेवानां देवानामानन्दः । ये कर्मणा देवानपियन्ति । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य ।
ते ये शतं कर्मदेवानां देवानामानन्दाः । स एको देवानामानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य ।
ते ये शतं देवानामानन्दाः । स एक इन्द्रस्यानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य ।
ते ये शतमिन्द्रस्यानन्दाः । स एको बृहस्पतेरानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य ।
ते ये शतं बृहस्पतेरानन्दाः । स एकः प्रजापतेरानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य ।
ते ये शतं प्रजापतेरानन्दाः । स एको ब्रह्मण आनन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य ।
स यश्चायं पुरुषे । यश्चासावादित्ये । स एकः ।
स य एवंवित् । अस्माल्लोकात् प्रेत्य । एतमन्नमयमात्मानमुपसङ्क्रामति ।
एतं प्राणमयमात्मानमुपसङ्क्रामति । एतं मनोमयमात्मानमुपसङ्क्रामति ।
एतं विज्ञानमयमात्मानमुपसङ्क्रामति । एतमानन्दमयमात्मानमुपसङ्क्रामति ।
तदप्येष श्लोको भवति ॥
एक famous श्लोक: ‘इसी से डरकर वायु बहती, सूर्य उगता, अग्नि-इन्द्र काम करते, मृत्यु भागती।’ (तुलना: कठ 2.3.3)
फिर आनन्द-मीमांसा, एक मज़ेदार exercise। एक नौजवान, अच्छा, बलवान, जिसे पूरी पृथ्वी का धन मिले, उसका सुख = 1 ‘मानुष आनन्द।’
100 गुना = मनुष्य-गन्धर्व आनन्द (श्रोत्रिय और अकाम-हत के लिए)। फिर 100 गुना = देव-गन्धर्व। फिर पितर। फिर आजानज देव। कर्म-देव। देव। इन्द्र। बृहस्पति। प्रजापति। और अंत में ब्रह्म-आनन्द।
यानी ब्रह्म-आनन्द = 100^11 × मानुष आनन्द। एक huge number। मगर idea यह है कि ब्रह्म-आनन्द किसी भी sensory pleasure से अनगिनत गुना बड़ा है।
अनुवाक 2.9
आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् । न बिभेति कदाचनेति ।
एतꣳ ह वाव न तपति । किमहꣳ साधु नाकरवम् ।
किमहं पापमकरवमिति ।
स य एवं विद्वानेते आत्मानꣳ स्पृणुते ।
उभे ह्येवैष एते आत्मानꣳ स्पृणुते । य एवं वेद ।
इत्युपनिषत् ॥
‘वाणी और मन इसे पाए बिना लौटते हैं।’ ब्रह्म-आनन्द को जानने वाला कभी नहीं डरता।
‘उसे यह नहीं तपाता कि मैंने अच्छा क्यों नहीं किया, पाप क्यों किया।’ यानी past-regret मिट जाता है।
‘यह उपनिषद् है।’ दूसरी वल्ली बंद।
भृगु वल्ली
अनुवाक 3.1
अधीहि भगवो ब्रह्मेति । तस्मा एतत् प्रोवाच ।
अन्नं प्राणं चक्षुः श्रोत्रं मनो वाचमिति ।
तꣳ होवाच । यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते ।
येन जातानि जीवन्ति । यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति ।
तद्विजिज्ञासस्व । तद्ब्रह्मेति ।
स तपोऽतप्यत । स तपस्तप्त्वा ॥
तीसरी वल्ली शुरू। एक छोटी कथा। भृगु, वरुण ऋषि का बेटा, अपने पिता के पास आता है। ‘पिताजी, ब्रह्म सिखाइए।’
वरुण का जवाब: ‘अन्न, प्राण, चक्षु, श्रोत्र, मन, वाणी। जिनसे ये भूत उत्पन्न, जिनसे जीते, जिनमें लौटते। उसको जानो। वो ब्रह्म।’
एक workable definition दी गई, फिर instruction: ‘तप करो।’
अनुवाक 3.2
अन्नाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते ।
अन्नेन जातानि जीवन्ति ।
अन्नं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति ।
तद्विज्ञाय । पुनरेव वरुणं पितरमुपससार ।
अधीहि भगवो ब्रह्मेति ।
तꣳ होवाच । तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व । तपो ब्रह्मेति ।
स तपोऽतप्यत । स तपस्तप्त्वा ॥
(पाँच मन्त्र साथ:) भृगु की पाँच यात्राएँ। हर बार वो तप करते हैं, और एक नया जवाब लाते हैं।
1. अन्न ब्रह्म है। क्योंकि अन्न से सब उत्पन्न, अन्न से जीते, अन्न में लौटते। पिता: ‘फिर तप करो।’
2. प्राण ब्रह्म है। पिता: ‘फिर तप।’
3. मन ब्रह्म है। पिता: ‘फिर तप।’
4. विज्ञान ब्रह्म है। पिता: ‘फिर तप।’
5. आनन्द ब्रह्म है। यहाँ पिता रुक जाते हैं।
पाँच जवाबों का pattern पाँच कोशों से matches। और ‘आनन्द’ पर रुकना, यानी यही final answer। ‘यह भार्गवी वारुणी विद्या है।’
जो ऐसा जानता है, वो अन्नवान्, अन्नाद, महान् प्रजा-पशु-ब्रह्म-वर्चस्व-कीर्ति वाला होता है।
अनुवाक 3.3
प्राणाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते ।
प्राणेन जातानि जीवन्ति ।
प्राणं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति ।
तद्विज्ञाय । पुनरेव वरुणं पितरमुपससार ।
अधीहि भगवो ब्रह्मेति ।
तꣳ होवाच । तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व । तपो ब्रह्मेति ।
स तपोऽतप्यत । स तपस्तप्त्वा ॥
(पाँच मन्त्र साथ:) भृगु की पाँच यात्राएँ। हर बार वो तप करते हैं, और एक नया जवाब लाते हैं।
1. अन्न ब्रह्म है। क्योंकि अन्न से सब उत्पन्न, अन्न से जीते, अन्न में लौटते। पिता: ‘फिर तप करो।’
2. प्राण ब्रह्म है। पिता: ‘फिर तप।’
3. मन ब्रह्म है। पिता: ‘फिर तप।’
4. विज्ञान ब्रह्म है। पिता: ‘फिर तप।’
5. आनन्द ब्रह्म है। यहाँ पिता रुक जाते हैं।
पाँच जवाबों का pattern पाँच कोशों से matches। और ‘आनन्द’ पर रुकना, यानी यही final answer। ‘यह भार्गवी वारुणी विद्या है।’
जो ऐसा जानता है, वो अन्नवान्, अन्नाद, महान् प्रजा-पशु-ब्रह्म-वर्चस्व-कीर्ति वाला होता है।
अनुवाक 3.4
मनसो ह्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते ।
मनसा जातानि जीवन्ति ।
मनः प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति ।
तद्विज्ञाय । पुनरेव वरुणं पितरमुपससार ।
अधीहि भगवो ब्रह्मेति ।
तꣳ होवाच । तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व । तपो ब्रह्मेति ।
स तपोऽतप्यत । स तपस्तप्त्वा ॥
(पाँच मन्त्र साथ:) भृगु की पाँच यात्राएँ। हर बार वो तप करते हैं, और एक नया जवाब लाते हैं।
1. अन्न ब्रह्म है। क्योंकि अन्न से सब उत्पन्न, अन्न से जीते, अन्न में लौटते। पिता: ‘फिर तप करो।’
2. प्राण ब्रह्म है। पिता: ‘फिर तप।’
3. मन ब्रह्म है। पिता: ‘फिर तप।’
4. विज्ञान ब्रह्म है। पिता: ‘फिर तप।’
5. आनन्द ब्रह्म है। यहाँ पिता रुक जाते हैं।
पाँच जवाबों का pattern पाँच कोशों से matches। और ‘आनन्द’ पर रुकना, यानी यही final answer। ‘यह भार्गवी वारुणी विद्या है।’
जो ऐसा जानता है, वो अन्नवान्, अन्नाद, महान् प्रजा-पशु-ब्रह्म-वर्चस्व-कीर्ति वाला होता है।
अनुवाक 3.5
विज्ञानाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते ।
विज्ञानेन जातानि जीवन्ति ।
विज्ञानं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति ।
तद्विज्ञाय । पुनरेव वरुणं पितरमुपससार ।
अधीहि भगवो ब्रह्मेति ।
तꣳ होवाच । तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व । तपो ब्रह्मेति ।
स तपोऽतप्यत । स तपस्तप्त्वा ॥
(पाँच मन्त्र साथ:) भृगु की पाँच यात्राएँ। हर बार वो तप करते हैं, और एक नया जवाब लाते हैं।
1. अन्न ब्रह्म है। क्योंकि अन्न से सब उत्पन्न, अन्न से जीते, अन्न में लौटते। पिता: ‘फिर तप करो।’
2. प्राण ब्रह्म है। पिता: ‘फिर तप।’
3. मन ब्रह्म है। पिता: ‘फिर तप।’
4. विज्ञान ब्रह्म है। पिता: ‘फिर तप।’
5. आनन्द ब्रह्म है। यहाँ पिता रुक जाते हैं।
पाँच जवाबों का pattern पाँच कोशों से matches। और ‘आनन्द’ पर रुकना, यानी यही final answer। ‘यह भार्गवी वारुणी विद्या है।’
जो ऐसा जानता है, वो अन्नवान्, अन्नाद, महान् प्रजा-पशु-ब्रह्म-वर्चस्व-कीर्ति वाला होता है।
अनुवाक 3.6
आनन्दाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते ।
आनन्देन जातानि जीवन्ति ।
आनन्दं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति ।
सैषा भार्गवी वारुणी विद्या ।
परमे व्योमन् प्रतिष्ठिता ।
स य एवं वेद प्रतितिष्ठति ।
अन्नवानन्नादो भवति ।
महान्भवति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन ।
महान् कीर्त्या ॥
(पाँच मन्त्र साथ:) भृगु की पाँच यात्राएँ। हर बार वो तप करते हैं, और एक नया जवाब लाते हैं।
1. अन्न ब्रह्म है। क्योंकि अन्न से सब उत्पन्न, अन्न से जीते, अन्न में लौटते। पिता: ‘फिर तप करो।’
2. प्राण ब्रह्म है। पिता: ‘फिर तप।’
3. मन ब्रह्म है। पिता: ‘फिर तप।’
4. विज्ञान ब्रह्म है। पिता: ‘फिर तप।’
5. आनन्द ब्रह्म है। यहाँ पिता रुक जाते हैं।
पाँच जवाबों का pattern पाँच कोशों से matches। और ‘आनन्द’ पर रुकना, यानी यही final answer। ‘यह भार्गवी वारुणी विद्या है।’
जो ऐसा जानता है, वो अन्नवान्, अन्नाद, महान् प्रजा-पशु-ब्रह्म-वर्चस्व-कीर्ति वाला होता है।
अनुवाक 3.7
शरीरमन्नादम् । प्राणे शरीरं प्रतिष्ठितम् । शरीरे प्राणः प्रतिष्ठितः ।
तदेतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितम् । स य एतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितं वेद प्रतितिष्ठति ।
अन्नवानन्नादो भवति । महान्भवति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन ।
महान् कीर्त्या ॥
(तीन मन्त्र साथ:) तीन व्रत:
1. ‘अन्न की निन्दा मत करो।’ अन्न और शरीर एक loop में हैं, दोनों एक-दूसरे को support करते हैं।
2. ‘अन्न को नकारो मत।’ जल और ज्योति एक-दूसरे में टिके।
3. ‘अन्न बहुत बनाओ।’ पृथ्वी और आकाश एक-दूसरे में टिके।
हर व्रत के साथ एक identification, और एक blessing कि जो ऐसा जानता है, वो टिकता है।
अनुवाक 3.8
ज्योतिरन्नादम् । अप्सु ज्योतिः प्रतिष्ठितम् । ज्योतिष्यापः प्रतिष्ठिताः ।
तदेतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितम् । स य एतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितं वेद प्रतितिष्ठति ।
अन्नवानन्नादो भवति । महान्भवति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन ।
महान् कीर्त्या ॥
(तीन मन्त्र साथ:) तीन व्रत:
1. ‘अन्न की निन्दा मत करो।’ अन्न और शरीर एक loop में हैं, दोनों एक-दूसरे को support करते हैं।
2. ‘अन्न को नकारो मत।’ जल और ज्योति एक-दूसरे में टिके।
3. ‘अन्न बहुत बनाओ।’ पृथ्वी और आकाश एक-दूसरे में टिके।
हर व्रत के साथ एक identification, और एक blessing कि जो ऐसा जानता है, वो टिकता है।
अनुवाक 3.9
आकाशोऽन्नादः । पृथिव्यामाकाशः प्रतिष्ठितः । आकाशे पृथिवी प्रतिष्ठिता ।
तदेतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितम् । स य एतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितं वेद प्रतितिष्ठति ।
अन्नवानन्नादो भवति । महान्भवति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन ।
महान् कीर्त्या ॥
(तीन मन्त्र साथ:) तीन व्रत:
1. ‘अन्न की निन्दा मत करो।’ अन्न और शरीर एक loop में हैं, दोनों एक-दूसरे को support करते हैं।
2. ‘अन्न को नकारो मत।’ जल और ज्योति एक-दूसरे में टिके।
3. ‘अन्न बहुत बनाओ।’ पृथ्वी और आकाश एक-दूसरे में टिके।
हर व्रत के साथ एक identification, और एक blessing कि जो ऐसा जानता है, वो टिकता है।
अनुवाक 3.10
तस्माद्यया कया च विधया बह्वन्नं प्राप्नुयात् ।
अराध्यस्मा अन्नमित्याचक्षते ।
एतद्वै मुखतोऽन्नꣳ राद्धम् । मुखतोऽस्मा अन्नꣳ राध्यते ।
एतद्वै मध्यतोऽन्नꣳ राद्धम् । मध्यतोऽस्मा अन्नꣳ राध्यते ।
एतद्वा अन्ततोऽन्नꣳ राद्धम् । अन्ततोऽस्मा अन्नꣳ राध्यते ।
य एवं वेद ।
ब्रह्मविदाप्नोति परम् ।
सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ।
एतत् साम गायन्नास्ते । हाऽऽवु हाऽऽवु हाऽऽवु ।
अहमन्नमहमन्नमहमन्नम् ।
अहमन्नादोऽहमन्नादोऽहमन्नादः ।
अहꣳ श्लोककृदहꣳ श्लोककृदहꣳ श्लोककृत् ।
अहमस्मि प्रथमजा ऋतस्य ।
पूर्वं देवेभ्योऽमृतस्य नाभायि ।
यो मा ददाति स इदेव मा आवाः ।
अहमन्नमन्नमदन्तमादि ।
अहं विश्वं भुवनमभ्यभवाम् ।
सुवर्ण ज्योतीः । य एवं वेद ।
इत्युपनिषत् ॥
आख़िरी मन्त्र। एक practical instruction: ‘किसी को अपने घर में अतिथि-रूप में मत मना करो।’
क्यों? ‘किसी भी तरह से बहुत अन्न प्राप्त करो ताकि लोग कहें ”उसको अन्न दिया जा रहा है।” मुँह से दिया अन्न मुँह से मिलता है। मध्य से मध्य से। अंत से अंत से।’
यानी अन्न-दान एक loop है। आप जैसा देते हैं, वैसा पाते हैं।
फिर एक final song, बहुत celebratory। ‘हाऽऽवु हाऽऽवु हाऽऽवु। मैं अन्न हूँ, मैं अन्न हूँ, मैं अन्न हूँ। मैं अन्नाद हूँ, अन्नाद, अन्नाद। मैं श्लोक-कर्ता, मैं ऋत का प्रथमज, मैं देवों से पहले अमृत की नाभि।’
‘जो मुझे देता, वही मुझे पाता।’ और: ‘मैं अन्न खाने वालों को खाता हूँ। मैं विश्व को जीतता हूँ। सुनहरी ज्योति।’
यह वो song है जो आत्म-ज्ञानी गाता है, अपनी identity के साथ। हर ‘मैं’ brahman है। हर ‘खाने वाला’ और ‘खाया जाने वाला’ एक ही। तीन-तीन बार दोहराकर finality। ‘यह उपनिषद् है।’
तैत्तिरीय का शुरुआती शान्ति-मन्त्र। यह एक prayer है, मगर ध्यान दीजिए कि इसमें सिर्फ़ देवों से मदद नहीं माँगी जा रही, यह एक commitment भी है। ‘ऋतं वदिष्यामि, सत्यं वदिष्यामि।’ मैं ऋत बोलूँगा, सत्य बोलूँगा।
शिष्य अध्ययन से पहले यह कहता है ताकि उसकी वाणी सही दिशा में रहे।