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तैत्तिरीय उपनिषद्

कृष्ण यजुर्वेद · तैत्तिरीय शाखा · उपनिषद्
गुरु की विदाई का वह उपदेश जो आज भी दीक्षांत में गूँजता है, और भृगु की वह खोज जो अन्न से शुरू होकर आनन्द पर ठहरी।
In a tranquil forest ashram a seated guru, eyes lowered, points not outward but inward toward the disciple's heart, where a softly glowing cave-of-the-heart holds a luminous point of the whole cosmos.

कल्पना कीजिए, एक शान्त आश्रम, जहाँ शिष्य अपने आचार्य के सामने बैठा है और एक ही प्रश्न उसके मन में गूँज रहा है, “आख़िर सबके मूल में बचता क्या है? वह कौन-सी वस्तु है जो वृक्षों में है, पत्थरों में है, तारों में है, और मुझमें भी?” आचार्य उँगली बाहर की ओर नहीं उठाते, भीतर की ओर इशारा करते हैं, हृदय की उस गुफा (गुहा, अर्थात् भीतर का गहरे-से-गहरा कोना) की ओर, जहाँ, उनके अनुसार, समूचे ब्रह्माण्ड का रहस्य छिपा बैठा है। स्वामी कृष्णानन्द कहते हैं कि जो उस परम सत्ता का स्पर्श कर लेता है, मानो उसने सत्य के सागर की तह छू ली, और एक ही क्षण में उसकी सारी कामनाएँ तृप्त हो जाती हैं। यही दृश्य, यही भीतर की यात्रा, इस उपनिषद् का प्राण होता है।

यह तैत्तिरीय उपनिषद् कृष्ण यजुर्वेद की तैत्तिरीय शाखा से आता है, और इसका नाम उसी शाखा-परम्परा से जुड़ा हुआ होता है। यह तीन भागों (वल्लियों) में बँटा हुआ है, शिक्षावल्ली (जहाँ गुरु अपने शिष्य को आचरण की सीख और प्रसिद्ध दीक्षांत-उपदेश देते हैं), ब्रह्मानन्दवल्ली (जहाँ अन्न, प्राण, मन, विज्ञान और आनन्द, इन पाँच कोशों यानी आत्मा को ढकने वाली परतों की मीमांसा होती है और आनन्द को नापने का प्रयास होता है), और भृगुवल्ली (जहाँ भृगु नामक पुत्र अपने पिता वरुण से बार-बार पूछकर ब्रह्म की खोज करते हैं)। इसी उपनिषद् में वह अमर परिभाषा गूँजती है, “सत्यं ज्ञानम् अनन्तं ब्रह्म” (ब्रह्म सत्य है, ज्ञान है, और अनन्त है), और इसी के सहारे यह उपनिषद् उस एक मूल सवाल का उत्तर देता है, कि जो परम सत्ता हृदय की गुहा में छिपी है, वही समूची सृष्टि का स्रोत किस प्रकार होता है, और हम स्वयं उसी का लघु प्रतिबिम्ब किस तरह हैं।

इस उपनिषद् के मुख्य किरदार

वरुण: भृगु के पिता और गुरु, जिन्होंने बेटे को बार-बार तप पर लौटाकर ख़ुद ब्रह्म खोजने दिया।

भृगु: वरुण के पुत्र, जिन्होंने अन्न से आनन्द तक एक-एक सीढ़ी चढ़कर ब्रह्म को पहचाना।

गुरु की सीख

“सत्यं वद, धर्मं चर”: गुरु की विदाई-सीख

पढ़ाई पूरी हो चुकी है। बरसों जो शिष्य (विद्यार्थी, जिसने गुरु के घर रहकर वेद पढ़े) आचार्य (पढ़ानेवाले गुरु) के चरणों में बैठा रहा, अब घर लौटने को तैयार खड़ा है। तैत्तिरीय उपनिषद् की शिक्षावल्ली (पहला अध्याय, जो शिक्षा यानी सीख का वल्ली कहलाता है) में यही घड़ी आती है, जिसे परम्परा दीक्षांत-उपदेश कहती है, यानी विद्या समाप्त होने पर दी गई आख़िरी नसीहत। गुरु विदा देने से पहले हाथ रोककर कुछ शब्द कहते हैं, और वही शब्द आज तक हर गुरुकुल की देहरी पर गूँजते आए हैं।

गुरु का पहला आदेश छोटा है पर भारी है, “सत्यं वद” (सच बोलिए), “धर्मं चर” (धर्म पर चलिए, यानी अपने कर्तव्य का आचरण कीजिए)। फिर वे जोड़ते हैं, “स्वाध्यायान्मा प्रमदः” (पढ़ाई में आलस मत कीजिए, सीखने का सिलसिला रुकने न दीजिए)। मानो गुरु कह रहे हों कि घर लौटकर भी वह दीपक बुझे नहीं जो यहाँ जलाया गया है।

At the gurukul threshold the departing student bows with folded hands before four radiant venerated figures, mother, father, teacher and an arriving guest, each haloed as a deity in classical Indian painting.

इसके बाद वह वाक्य आता है जिसे यह उपनिषद् पीढ़ियों के मुँह में डाल गया, “मातृदेवो भव” (माता को देवता मानिए), “पितृदेवो भव” (पिता को देवता मानिए), “आचार्यदेवो भव” (गुरु को देवता मानिए), “अतिथिदेवो भव” (अतिथि को, यानी बिना बुलाए द्वार आए पाहुन को, देवता मानिए)। गुरु इन चारों के आगे झुकने को कहते हैं, क्योंकि जिसने जन्म दिया, जिसने पाला, जिसने ज्ञान दिया, और जो भरोसे से आपके द्वार चला आया, उन सबमें वही एक सत्ता बैठी है जिसकी खोज में सारी विद्या रची गई।

परम्परा (शंकर-भाष्य की मुख्यधारा) के अनुसार यह उपदेश ऊँचे आदर्शों की सूची भर नहीं है, यह जीवन भर साथ चलनेवाली कसौटी है। गुरु सावधान करते हैं कि आगे कर्म ऐसे भी आएँगे जहाँ राह साफ़ न दिखे, जहाँ शास्त्र का वचन भी दुविधा में छोड़ दे। ऐसी घड़ी के लिए वे एक सीधा माप थमा देते हैं, “यान्यनवद्यानि कर्माणि, तानि सेवितव्यानि” (जो कर्म निंदा से परे हों, केवल वही कीजिए), और “नो इतराणि” (और कोई नहीं)। निंदा से परे, यानी जिन्हें करके आपका मन भी न लजाए और जिन्हें देखकर सज्जन-पुरुष भी भौंह न चढ़ाएँ।

गुरु यहीं नहीं रुकते। वे कहते हैं कि कभी संदेह घेरे, किसी कर्म पर या किसी व्यक्ति के बरताव पर, तो उस देश के ठहरे हुए, विचारशील, सौम्य और धर्मप्रिय सत्पुरुषों को देखिए कि वे ऐसी जगह कैसे चलते हैं, और वैसे ही चलिए। परम्परा इसमें एक गहरी विनम्रता पढ़ती है। विद्या पा लेने पर भी मनुष्य को अकेले अपने अहंकार के बल पर निर्णय करने का हक़ नहीं मिल जाता; उसे उन लोगों की जीती-जागती मिसाल से सीखते रहना है जिनका आचरण निर्मल है।

यही इस दीक्षांत-उपदेश की असली ख़ूबसूरती है। गुरु शिष्य को कोई गुप्त मंत्र थमाकर विदा नहीं करते, वे उसे चरित्र की एक आदत थमाते हैं, सच, धर्म, सीखते रहने की लगन, बड़ों और पाहुनों के प्रति श्रद्धा, और हर कर्म को निंदा की कसौटी पर कस लेने की आदत। बरसों का ज्ञान आख़िर में इसी सादगी में निचुड़ आता है, और इसीलिए यह विदाई-सीख आज भी, गुरुकुल कब के मिट जाने पर भी, हर ईमानदार आचरण में गूँजती रहती है।

सार: विद्या की सच्ची विदाई कोई रहस्य नहीं, एक आदत है, सच बोलिए, धर्म पर चलिए, सीखना मत रोकिए, माता-पिता-गुरु-अतिथि को देवता मानिए, और जब राह उलझे तो केवल वही कर्म चुनिए जो निंदा से परे हों, और जिन सत्पुरुषों का आचरण निर्मल है उनकी मिसाल से सीखते रहिए।

पाँच कोश और आनन्द

पाँच कोश: अन्न से आनन्द तक की परतें

तैत्तिरीय उपनिषद् के ब्रह्मानन्दवल्ली (आनन्द की उस वल्ली, यानी अध्याय, जहाँ ब्रह्म की परिभाषा खुलती है) में आचार्य अपने शिष्यों के सामने एक बड़ा प्रश्न रखते हैं। पहले वे ब्रह्म को नाम देते हैं, सत्यं ज्ञानम् अनन्तं ब्रह्म (वह जो सत्य है, जो ज्ञान है, जिसका कोई अन्त नहीं)। फिर वे कहते हैं कि यही परम सत्ता हर एक के हृदय की गुहा (गुफा, अन्तरतम कोना) में छिपी पड़ी है। अब सवाल यह उठता है कि अगर वही भीतर बैठा है, तो उस तक पहुँचने में हमें इतनी परतें क्यों पार करनी पड़ती हैं। इसी जिज्ञासा से पंचकोश (पाँच आवरण) का चित्र खुलता है।

स्वामी कृष्णानन्द इस प्रसंग को बड़े अनोखे ढंग से पढ़ते हैं। वे कहते हैं कि जो सृष्टि बाहर ब्रह्म से क्रम-क्रम से उतरी, आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल, जल से पृथ्वी, पृथ्वी से वनस्पति, वनस्पति से अन्न (भोजन), और अन्न से यह मनुष्य की देह, वही पूरा क्रम हमारे भीतर एक छोटे रूप में दोहराया गया है। उनके अनुसार विश्व को वे ब्रह्माण्ड कहते हैं और इस व्यक्ति को पिण्डाण्ड (छोटा अण्डा, यानी सूक्ष्म रूप में वही पूरा ब्रह्माण्ड)। जो परतें बाहर ऊपर की ओर खड़ी हैं, वही हमारे भीतर उलटी होकर कोश बन गई हैं। इसीलिए वे कहते हैं कि आप अपने को जान लें तो पूरा जगत जान लिया, क्योंकि आप पूरी सृष्टि के एक छोटे नक़्शे हैं।

A seated meditating human shown in cutaway as five nested luminous sheaths, food-body, breath, mind, intellect and innermost golden bliss, each glowing ring enclosing the next around a central radiant Self.

पहली परत है अन्नमय कोश (अन्न से बना स्थूल शरीर)। स्वामी जी इसे हमारी बाहरी-से-बाहरी और ठोस परत बताते हैं, वह जो आँख से दिखती है, जो असल में खाए हुए अन्न का ही जमा हुआ रूप है। इसके भीतर है प्राणमय कोश (साँस और जीवनी-शक्ति की परत)। यहाँ वे एक सावधानी देते हैं, प्राण का अर्थ केवल नाक से आती-जाती हवा नहीं है, यह एक भीतरी स्पन्दन है, प्राण-शक्ति, जिसके कारण देह जीवित जान पड़ती है। जहाँ-जहाँ यह शक्ति फैली है, वहीं उँगली की नोक तक जीवन धड़कता है, और जहाँ से यह खिंच जाए, वहाँ पक्षाघात या मृत्यु आ जाती है।

आगे की परत है मनोमय कोश (मन की परत)। स्वामी कृष्णानन्द एक सुन्दर कड़ी जोड़ते हैं, प्राण देह को जिलाता ज़रूर है, पर वह स्वयं मन के विचारों से बँधा रहता है। मन जिस ओर सोचता है, प्राण की ऊर्जा उसी ओर बहने लगती है। वे उदाहरण देते हैं कि छोटे बच्चे इसीलिए सुन्दर लगते हैं, क्योंकि उनकी प्राण-शक्ति पूरी देह में बराबर बँटी रहती है, अभी किसी इन्द्रिय की लालसा उसे एक तरफ़ नहीं खींचती। ज्यों-ज्यों आदमी बड़ा होता है, इन्द्रियाँ उस ऊर्जा को अपने-अपने काम के लिए हड़पने लगती हैं। इसके भीतर है विज्ञानमय कोश (बुद्धि और निश्चय की परत)। वे फ़र्क़ साफ़ करते हैं, मन कहता है “कुछ है”, पर यह निश्चय कि “अच्छा, यह तो पेड़ है, यह दीये का खम्भा है, यह तो मनुष्य है”, यह पहचान बुद्धि (विज्ञान) का काम है।

और सबके भीतर बैठी है आनन्दमय कोश (आनन्द की परत), जिसे स्वामी जी हमारे भीतर की उस गहरी अनिश्चित अवस्था से जोड़ते हैं जो गहरी नींद (सुषुप्ति) में अनुभव होती है। यह परत सब भूत अनुभवों का भण्डार और सब आगामी अनुभवों की सम्भावना है। उनका सूक्ष्म तर्क यह है कि नींद कोरी जड़ता नहीं हो सकती, क्योंकि उससे जागकर मनुष्य कहता है “मैं सुख से सोया”, और इस सुख का स्वाद किसी चेतना के बिना सम्भव नहीं। राजा हो या भिखारी, गहरी नींद का वह भरापन सब चाहते हैं। स्वामी जी कहते हैं कि एक राजा, जो रातों सो न पाए, अपने विशाल राज्य के बदले बस कुछ दिन की चैन की नींद माँग बैठेगा। यही संकेत है कि अन्दर की वह परत आनन्द से बनी है। परतें छीलते-छीलते जो हाथ लगता है, वही सत्यं ज्ञानम् अनन्तं ब्रह्म, हृदय की गुहा में छिपी आत्मा है।

इस पूरे चित्र के लिए स्वामी कृष्णानन्द एक घरेलू उपमा देते हैं, जैसे प्याज़ की परतें ही मिलकर प्याज़ बनती हैं, वैसे ही ये कोश ही मिलकर हमारा व्यक्तित्व रचते हैं, और यही पूरी सृष्टि-रचना का ढंग भी है। उनके अनुसार एक माने में पूरा विश्व ही ब्रह्म के ऊपर का एक आवरण है। एक परत हटाइए, भीतर अगली, फिर उसके भीतर अगली, और अन्त में वह आत्मा जो किसी परत की मोहताज नहीं। यहाँ बाहर जाने से कुछ हाथ नहीं आता, क्योंकि जो परम दूर है (सृष्टि के विस्तार में), वही परम निकट है (आपके अपने होने के रूप में)।

सार: आप परतों का जोड़ नहीं, परतों के भीतर बैठा वह हैं जो परतें गिनता है। अन्न का शरीर, साँस, मन, बुद्धि, यह सब एक के भीतर एक लिपटे आवरण हैं, और इन्हें प्याज़ की तरह छीलते जाइए तो अन्त में जो शेष रहता है वह कोई और परत नहीं, वह आनन्द ही है, वही गुहा में छिपी आत्मा। अपने को जानना ही पूरी सृष्टि को जान लेना है।

आनन्द की मीमांसा, और “रसो वै सः”

अब हम ब्रह्मानन्दवल्ली में आ पहुँचे हैं (तैत्तिरीय उपनिषद् का वह भाग जहाँ ब्रह्म के आनन्द की बात होती है)। यहाँ ऋषि एक अनोखा हिसाब लगाने बैठते हैं। आम तौर पर तर्क के सहारे ब्रह्म तक पहुँचा जाता है, पर यहाँ उपनिषद् एक सीढ़ी बनाता है, सुख की सीढ़ी, और कहता है कि आइए, आनन्द को नापकर देखें कि वह असल में रहता कहाँ है। इस माप-तौल को परम्परा आनन्द-मीमांसा कहती है (आनन्द की छानबीन, उसका विवेचन)।

नाप की इकाई वे बड़े सलीक़े से चुनते हैं। एक युवक लीजिए, जवान, चरित्रवान, पढ़ा-लिखा, दृढ़ और फुर्तीला, और इस भरी-पूरी धरती का सारा वैभव जिसके पास हो। ऐसे एक सम्पन्न मनुष्य का जो सुख है, उसे एक इकाई मान लीजिए। यही मानुष आनन्द (मनुष्य का सुख) पहला पायदान है। फिर उपनिषद् इस इकाई को सौ-सौ गुना करता चला जाता है। मनुष्य-गन्धर्व (वे आत्माएँ जो अपनी साधना से गन्धर्व-लोक तक पहुँचीं) का आनन्द उस मानुष सुख से सौ गुना है। उनसे आगे देव-गन्धर्व, फिर पितृ-लोक के दीर्घजीवी देवता, फिर वे देवता जो कर्म से देवपद पाते हैं, फिर जन्म से देवता, फिर इन्द्र (देवताओं के अधिपति), फिर बृहस्पति (देवताओं के गुरु), फिर प्रजापति (सृष्टि के स्वामी), और इन सबके सिर पर ब्रह्म का आनन्द। हर पायदान पर वही शर्त दोहराई जाती है, जो अकाम-हत हो, यानी जिसकी कामनाएँ शान्त हो चुकी हों।

यह आख़िरी शर्त ही पूरे हिसाब की कुंजी है। उपनिषद् यह नहीं कहता कि ऊपर वाले के पास भोग के साधन ज़्यादा हैं। वह कहता है कि ऊपर वाला उतना ही आनन्दित है जितनी उसकी तृष्णा बुझी हुई है। प्यास जितनी कम, घूँट उतना गहरा। इसलिए यह सीढ़ी बाहर के संसार में ऊँची नहीं चढ़ रही, वह भीतर की ओर, तृप्ति की ओर गहरी उतर रही है। ब्रह्म का आनन्द इसीलिए परम है कि वहाँ माँगने को कुछ बचा ही नहीं रहता।

स्वामी कृष्णानन्द इस पूरे प्रसंग की जड़ यहीं पकड़ते हैं। वे कहते हैं कि संसार का हर सुख बाहर की किसी चीज़ के सहारे टिका है, और जो चीज़ बाहर खड़ी है वह कभी पूरी तरह हमारी हो नहीं पाती। वे राजा का उदाहरण देते हैं। राजा सोचता है, “यह सारी धरती मेरी है,” पर धरती तो उसके बाहर ही पड़ी रहती है, उसकी चेतना की पकड़ में कभी आती नहीं। इसलिए, स्वामी जी के अनुसार, राजा का सुख एक कल्पना भर है, और हर बाहरी चीज़ अपने साथ चिन्ता लेकर आती है, उसे सम्भालने की, बचाने की, खो न जाने की। सोने का ढेर हथेली में भर लीजिए, वह सुख नहीं, बेचैनी देता है। यही कारण है कि बाहर जितना ऊपर चढ़िए, घबराहट उतनी बढ़ती है, और तृप्ति घटती है।

फिर वे ब्रह्म के आनन्द और इस संसारी सुख का असली फ़र्क़ खोलते हैं। स्वामी कृष्णानन्द कहते हैं कि ब्रह्म का अनुभव किसी वस्तु से सम्पर्क (छूना, पाना, भोगना) नहीं है, वह अपनी ही सत्ता के साथ एकता है। वहाँ जिसे जाना जा रहा है और जो जान रहा है, दोनों एक हो जाते हैं। सत् (होना) और चित् (जानना) आपस में मिल जाते हैं, इसलिए वह आनन्द बाहर से नहीं आता, वह हमारे होने का स्वभाव ही है। और यही आनन्द, वे याद दिलाते हैं, हर मनुष्य के हृदय की गुहा (भीतर का गहरे-से-गहरा कोना) में पहले से छिपा बैठा है।

परम्परा इसी बात को एक पंक्ति में पकड़ लेती है, “रसो वै सः” (वह तो रस ही है, स्वाद ही है, मिठास ही है)। यानी जिस आनन्द की सीढ़ी हमने अभी चढ़ी, उसकी हर सीढ़ी पर जो थोड़ा-सा रस चखने को मिला, वह उधार का था, उसी एक रस से टपका हुआ। गन्धर्व के सुख में, इन्द्र के सुख में, हमारे एक छोटे-से हँसी के पल में भी, बैठा वही है। उपनिषद् कहता है कि उस रस को पाकर ही जीव आनन्दमय हो जाता है, क्योंकि रस के बिना कोई साँस ले ही नहीं सकता, जी ही नहीं सकता। और यह सब डर के मारे नहीं चलता, उसी रस के सहारे चलता है। जैसे फूल को सूरज से डर नहीं लगता, वह तो उसी की रोशनी में खिलता है।

सार: आनन्द की सीढ़ी बाहर की ओर ऊँची नहीं, भीतर की ओर गहरी जाती है, और उसका हर पायदान इसी बात से नापा जाता है कि तृष्णा कितनी बुझी। जिस छोटे-से रस के लिए हम बाहर भागते हैं, वह “रसो वै सः”, हमारे अपने हृदय की गुहा में पहले से बैठा है। उसे पा लेने पर आदमी डर के सहारे नहीं, उसी रस के सहारे जीने लगता है।

भृगु की खोज

भृगु-वल्ली: अन्न से आनन्द तक भृगु की खोज

आश्रम के एकान्त में एक बेटा अपने पिता के पास आता है, हाथ जोड़े, मन में एक ही जिज्ञासा लिए। बेटे का नाम भृगु है, और पिता हैं वरुण (वैदिक परम्परा में जल और ऋत के अधिष्ठाता देव, यहाँ भृगु के गुरु-पिता)। भृगु एक ही चीज़ माँगते हैं, “हे भगवन्, मुझे ब्रह्म (वह परम सत्ता जिससे सब कुछ है) का उपदेश कीजिए।” तैत्तिरीय उपनिषद् का यह भृगु-वल्ली नाम का भाग इसी एक प्रश्न पर खुलता है, और बड़ी सादगी से एक बहुत गहरी बात कह जाता है।

वरुण बेटे को रटी-रटाई परिभाषा नहीं थमाते। वह केवल इतना संकेत देते हैं, “जिससे ये सारे प्राणी जन्म लेते हैं, जिसमें जन्म लेकर जीते हैं, और अन्त में जिसमें लौट जाते हैं, उसे जानने की इच्छा कीजिए; वही ब्रह्म है।” फिर आदेश देते हैं, “जाइए, तप (एकाग्र मनन और अन्तर्मुखी साधना) कीजिए, और स्वयं खोजिए।” यहाँ परम्परा (शंकर-भाष्य की मुख्यधारा) का बल इसी पर है कि ब्रह्म कोई उधार का उत्तर नहीं; वह तो स्वयं की गहराई में उतरकर पहचानी जाने वाली वस्तु है।

The young seeker Bhrigu, returning yet again with folded hands to his father-sage Varuna seated on a riverbank, who gently gestures him back toward solitary tapas under a tree.

भृगु तप में बैठते हैं और पहला उत्तर पाते हैं, “अन्न (भोजन, खाया जाने वाला पदार्थ) ही ब्रह्म है।” तर्क सीधा है, अन्न से ही तो देह बनती है, अन्न से ही प्राणी जीते और बढ़ते हैं। पर मन ठहरता नहीं। वह फिर पिता के पास लौटते हैं, और वरुण हर बार वही एक बात दोहराते हैं, “तप से ब्रह्म को जानने की इच्छा कीजिए; तप ही ब्रह्म है।” यानी जो उत्तर मिला है, उससे आगे जाइए।

अगली बार भृगु को लगता है, प्राण (जीवन-शक्ति, साँस के पीछे की चेतन ऊर्जा) ही ब्रह्म है, क्योंकि अन्न तो तभी जीवन बनता है जब प्राण उसे सँभालता है। फिर उन्हें मन (विचार और संकल्प की शक्ति) ब्रह्म जान पड़ता है, क्योंकि प्राण भी मन के सोचने पर ही दिशा पकड़ता है। उसके बाद विज्ञान (निश्चयात्मक बुद्धि, जो ठीक-ठीक पहचानती है कि यह क्या है) ब्रह्म लगता है। हर सीढ़ी पर वरुण उन्हें वापस तप पर भेजते रहे, मानो कह रहे हों कि अभी और भीतर उतरना बाक़ी है।

अन्त में भृगु उस तल पर पहुँचते हैं जहाँ पहचानते हैं, आनन्द (परम प्रसन्नता, भरेपन का वह बोध जो किसी बाहरी वस्तु पर नहीं टिकता) ही ब्रह्म है। क्योंकि आनन्द से ही ये सारे प्राणी जन्मते हैं, आनन्द में ही जीते हैं, और आनन्द में ही लौट जाते हैं। यही भृगु-वल्ली की चरम घोषणा है, आनन्दो ब्रह्म (आनन्द ही ब्रह्म है)। पाँच परतें, अन्न, प्राण, मन, विज्ञान और आनन्द, एक के भीतर एक रखी हुई थीं, और गहरी-से-गहरी परत पर वह पूर्णता बैठी थी जिसकी खोज में सब चल रहा था।

स्वामी कृष्णानन्द इसी तैत्तिरीय उपनिषद् की व्याख्या में इन परतों को कोश (चेतना को ढकने वाले आवरण) कहते हैं, और एक सुन्दर उपमा देते हैं, जैसे प्याज़ की परतें एक के ऊपर एक चढ़कर ही प्याज़ बनती हैं, वैसे ही ये कोश मिलकर हमारा व्यक्तित्व रचते हैं। उनके अनुसार पूरी सृष्टि एक क्रम में उतरी है, आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल, जल से पृथ्वी, पृथ्वी से वनस्पति, वनस्पति से अन्न, और अन्न से यह पुरुष (देहधारी व्यक्ति); इसलिए भृगु का अन्न से शुरू करना कोई भूल नहीं, वह तो उसी सीढ़ी का पहला डंडा पकड़ना है जिसके सिरे पर ब्रह्म है। स्वामी कृष्णानन्द कहते हैं कि व्यक्ति ब्रह्माण्ड (समूचा विश्व) का छोटा प्रतिरूप, पिण्ड है; इसीलिए “स्वयं को जान लीजिए तो सब कुछ जान लिया”, क्योंकि जो हमारे परम निकट है वही दूर-से-दूर वाले को भी अपने भीतर समेटे है।

और जहाँ भृगु आनन्द पर पहुँचते हैं, वहाँ स्वामी कृष्णानन्द की एक मार्मिक बात ठीक बैठती है। उनके अनुसार ब्रह्म का अनुभव किसी वस्तु से सम्पर्क नहीं; वह तो स्वयं की पहचान है; वहाँ सत् (अस्तित्व) ही चित् (चेतना) बन जाता है, अनुभव करने वाला और अनुभव की वस्तु दो नहीं रह जाते। संसार में हर सुख इसीलिए अधूरा है कि उसका विषय हमसे बाहर खड़ा रहता है, सोने का ढेर हाथ में हो तब भी वह चिन्ता ही देता है, उसे सँभालें कैसे, खोएँ नहीं कैसे। पर भृगु का आनन्द बाहर का नहीं, वह तो स्वयं वही पूर्णता हो जाने का बोध है, और इसीलिए वह घटता नहीं।

सार: ब्रह्म कोई उधार का उत्तर नहीं जो कोई थमा दे; उसे अन्न से प्राण, मन और बुद्धि की परतें पार करके अपने भीतर खोजना पड़ता है। और जिस आनन्द की भूख में हम बाहर की हर वस्तु से चिपकते हैं, वह भरापन किसी वस्तु में नहीं, स्वयं की गहराई में बैठा है; उसे पा लेना ही आनन्दो ब्रह्म को जान लेना है।

और अन्त में, अपनी ओर

ज़रा उस घड़ी को याद कीजिए जहाँ यह उपनिषद् हमें छोड़ता है। वरुण (जल के अधिष्ठाता देव और भृगु के पिता) ने अपने पुत्र भृगु (एक जिज्ञासु ऋषिकुमार) को बार-बार एक ही न्योता दिया था कि ब्रह्म (वह परम सत्ता जिससे सब कुछ है) को तप (एकाग्र साधना) से खोजिए। भृगु लौट-लौटकर पूछते रहे, और सीढ़ी दर सीढ़ी चढ़ते गए, पहले अन्न (भोजन, स्थूल जगत) को ब्रह्म जाना, फिर प्राण (जीवन-शक्ति) को, फिर मन को, फिर विज्ञान (बुद्धि, समझ) को। हर बार पिता ने न हाँ कहा न ना, बस फिर से तप की ओर भेज दिया। और अन्तिम बार लौटकर भृगु ठहर गए, क्योंकि उन्हें वह मिल गया जिसके आगे कोई प्रश्न नहीं बचता, “आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्”, उन्होंने आनन्द को ही ब्रह्म जाना।

स्वामी कृष्णानन्द इस अन्तिम सोपान को खोलते हुए कहते हैं कि आनन्द ब्रह्म का कोई गुण या सजावट भर नहीं है, वह स्वयं सत्ता का द्रव्य (मूल वस्तु) है। उनके अनुसार सुख तब झलकता है जब हमारी चेतना क्षण भर के लिए बाहर की ओर दौड़ना छोड़ देती है, और भीतर बैठा वह आत्मा (हमारा अपना न-बाहर-होने वाला स्वरूप) एक टुकड़े-भर के लिए प्रकट हो जाता है। जिसे हम मनचाही वस्तु पाकर का सुख कहते हैं, स्वामी जी कहते हैं वह बाहर की वस्तु से नहीं आता, वह उस एक पल में आता है जब मन शान्त होकर अपने ही रस में डूब जाता है। यही वह आनन्द है जिससे, भृगु-वल्ली के अनुसार, सब प्राणी जन्मते हैं, जिसमें जीते हैं, और जिसमें लौटकर समा जाते हैं। स्वामी कृष्णानन्द के अनुसार यह तीनों एक ही द्रव्य की बात है, जिससे सब उपजता है, जिसमें सब टिका है, और जिसमें सब विश्राम पाता है।

A serene closing tableau: a single cup of steaming chai held in cupped hands glows with the same golden light as the distant sun above, the everyday sip revealed as Brahman's bliss.

और गहरे-से-गहरी बात यह कि स्वामी जी इसे कहीं दूर आकाश में नहीं रखते। वे कहते हैं कि जो दूर गगन में सूरज बनकर चमक रहा है और जो हमारे भीतर चेतना बनकर जाग रहा है, दोनों एक ही हैं। यह परम सत्ता हर साधारण क्षण में अपने को खोलती रहती है, बस हम वस्तुओं से चिपके रहने के कारण उसे पहचान नहीं पाते। स्वामी जी का दृष्टान्त बड़ा घरेलू है कि एक प्याली चाय का घूँट तक उसी का प्रकाश है। परम्परा भी इसी सुर में भृगु-वल्ली का समापन करती है कि ज्ञानी अन्न (भोजन, जीवन का रस) की निन्दा नहीं करता, उसे ठुकराता भी नहीं, वह तो गाते हुए उत्सव मनाता है कि “मैं अन्न हूँ, मैं अन्न का भोक्ता हूँ”, अर्थात् जो खिलाता है और जो खाता है, दोनों एक ही आनन्द की लहरें हैं।

तो यह न्योता, जो भृगु को आख़िर में मिला, वही आज आपके लिए रखा है। आपको कहीं तीर्थ नहीं जाना, किसी दूर शिखर पर नहीं चढ़ना। जिस आनन्द की खोज में सारा संसार दौड़ रहा है, वह हर साँस के रस में पहले से बैठा है, उस ठहराव में जो किसी प्यारी चीज़ को पाकर एक पल को आता है, उस चुप्पी में जो किसी गहरी नींद के बाद बची रहती है। बस ज़रा बाहर की ओर भागना रोकिए, और अपनी ओर मुड़िए। वहीं वह है, जिससे आप आए, जिसमें आप हैं, और जिसमें आप लौटेंगे।

सार: भृगु को जो परम बात मिली वह यही थी कि आनन्द ही ब्रह्म है, वही द्रव्य जिससे सब जन्मता है, जिसमें सब जीता है, और जिसमें सब लौटता है। और वह आनन्द दूर नहीं, हर साँस के रस में, हर शान्त क्षण में, अपनी ही ओर मुड़ने की प्रतीक्षा में बैठा है।

व्याख्या मुख्यतः स्वामी कृष्णानन्द (दिव्य जीवन संघ) की तैत्तिरीय-उपनिषद् पर दिए प्रवचनों पर आधारित।