विवेकचूडामणि
आदि शंकराचार्य · पूरे 580 श्लोक, सरल हिन्दी में
विवेकचूडामणि, अर्थात् विवेक की चूड़ामणि, विवेक-शास्त्रों में सबसे ऊँचा रत्न। आदि शंकर ने एक गुरु-शिष्य संवाद में पूरी अद्वैत-यात्रा रख दी है, पहले प्रश्न से लेकर निर्वाण तक। बीच में हर वह पड़ाव, हर वह उपमा, हर वह कील है जो साधक के मन की पुरानी पकड़ को धीरे-धीरे ढीला करती है।

यह क्या है
आदि शंकर के नाम से प्रसिद्ध यह 580-श्लोकी ग्रंथ अद्वैत वेदान्त की सबसे जीवंत प्रस्तुति है। यह दर्शन-ग्रंथ कम, गुरु-शिष्य कथा अधिक है। एक शिष्य जिज्ञासा से गुरु के पास आता है। गुरु उसे साधन-चतुष्टय से आरम्भ कर के, हर परत के पार, पंच-कोश, साक्षी, तत्त्वमसि, वासना-क्षय, अहंकार-नाश, समाधि, जीवन्मुक्ति और कर्म-त्रय तक ले जाते हैं। शिष्य पकता है, समाधि में डूबता है, उठ कर अपना उद्गार बहाता है। और अंत में गुरु एक परम-वचन दे कर शिष्य को विदा करते हैं, कि अब वसुधा पर विचरें।
हर श्लोक पर देवनागरी मूल, उसका सरल शब्दार्थ, साफ़ अर्थ और एक रोज़मर्रा का भावार्थ है, जिसमें कहीं उपमाएँ जोड़ी गई हैं ताकि भाव हृदय तक उतर आए। संस्कृत का शुद्ध शास्त्रीय भाष्य यहाँ अभीष्ट नहीं, पर हर श्लोक की आत्मा यहाँ सुरक्षित रहे, यही मंशा है।
कैसे पढ़ें
दो रास्ते हैं। पहला, क्रम से, भाग 1 से 19 तक। हर भाग पिछले पर खड़ा है, इसलिए क्रम से पढ़ना सबसे उत्तम है। हर बैठक में एक भाग, प्रतिदिन तीस से साठ मिनट। उन्नीस दिन में पूरा। दूसरा, यदि कोई विशेष विषय खोज रहे हों, तो नीचे की तालिका में हर भाग का विषय और श्लोक-सीमा दी है, वहाँ से आरम्भ किया जा सकता है।
एक बात स्मरण रहे। हर भाग के अंत में एक ऐसी बात है जिसे साथ ले जाना है, उस पर एक दिन ठहरना। यह जीने का ढंग बदलने का यत्न है। एक-एक श्लोक धीरे-धीरे भीतर बैठने दीजिए।
विवेकचूडामणि, उन्नीस भागों में पूरी
भाग 1 · दुर्लभ मानव-जन्म
श्लोक 1-13 · 13 श्लोक
तीन दुर्लभ वस्तुएँ, मानव-जन्म, मुमुक्षुत्व और सत्संग। मानव-जन्म पा कर भी यदि मुक्ति की चाह न जागे, तो जन्म का असली अर्थ अभी आया ही नहीं। यह आरम्भ है, कि यह सब क्यों करना है और कब आरम्भ करना है।
भाग 2 · साधन-चतुष्टय
श्लोक 14-31 · 18 श्लोक
चार आधार-गुण, नित्य और अनित्य के बीच विवेक, वैराग्य, शम-दम आदि छह सम्पत्तियाँ, और मुमुक्षुत्व। इनके बिना आगे कुछ नहीं। यहीं वह आधार बैठता है जिस पर अधिकार खड़ा होता है।
भाग 3 · गुरु की शरण
श्लोक 32-71 · 40 श्लोक
शिष्य की पात्रता, गुरु के पास जाने की रीति, और शिष्य का पहला प्रश्न, कि मैं संसार-बंधन से मुक्त कैसे होऊँ। गुरु की लंबी, अत्यंत कोमल भूमिका, और उपदेश का प्रारम्भ।
भाग 4 · अनात्म का खंडन
श्लोक 72-123 · 52 श्लोक
स्थूल देह, इन्द्रियाँ, प्राण, मन, बुद्धि, ये सब मैं नहीं। एक-एक कर के हर परत का परीक्षण। यह विवेकचूडामणि का सबसे लंबा और सबसे सूक्ष्म नेति-नेति प्रकरण है।
भाग 5 · आत्मा का स्वरूप
श्लोक 124-145 · 22 श्लोक
अनात्म खंडित हुई, अब असली आत्मा का चित्र। साक्षी, स्वयं-ज्योति, अकर्ता, अभोक्ता, सब कोशों के परे। तत्त्वमसि की ओर भूमि तैयार।
भाग 6 · पंच-कोश (1)
श्लोक 146-183 · 38 श्लोक
तैत्तिरीय की पंच-कोश परम्परा, अन्नमय, प्राणमय, मनोमय। हर कोश आत्मा नहीं, और क्यों नहीं। एक-एक पर सूक्ष्म दृष्टि।
भाग 7 · पंच-कोश (2)
श्लोक 184-211 · 28 श्लोक
विज्ञानमय और आनंदमय कोश। ये भी आत्मा क्यों नहीं, और इनसे परे का बिंदु क्या है। पंच-कोश-यात्रा का समापन।
भाग 8 · साक्षी और ब्रह्म
श्लोक 212-240 · 29 श्लोक
आत्मा साक्षी है, यह बात दृढ़ होती है। साथ ही ब्रह्म का स्थापन, कि आत्मा और ब्रह्म एक ही हैं। अद्वैत की नींव।
भाग 9 · तत्त्वमसि
श्लोक 241-266 · 26 श्लोक
छांदोग्य का महावाक्य तत्त्वमसि का सूक्ष्म निरूपण। जहद्-अजहद्-लक्षणा का तर्क। शब्द और वाक्य के अर्थ का सबसे गहरा बिंदु।
भाग 10 · वासना-क्षय
श्लोक 267-297 · 31 श्लोक
शास्त्र-ज्ञान पर्याप्त नहीं। वासना का क्षय होना चाहिए। मन की पुरानी आदतें कैसे टूटें, और कौन से तीन शत्रु अब भी शेष हैं।
भाग 11 · अहंकार और प्रमाद
श्लोक 298-328 · 31 श्लोक
अहंकार बार-बार सिर उठाता है। प्रमाद, अर्थात् एक पल की असावधानी, सब बिगाड़ देती है। यहाँ एक चेतावनी है और एक नित्य अभ्यास।
भाग 12 · समाधि, हृदय की गाँठ खुलती है
श्लोक 329-366 · 38 श्लोक
निर्विकल्प समाधि की विधि। हृदय की ग्रंथि का खुलना। श्रवण-मनन-निदिध्यासन की प्रसिद्ध सीढ़ी, जहाँ मनन का फल श्रवण से सौ-गुना और निदिध्यासन का फल मनन से लाख-गुना कहा गया है।
भाग 13 · योग, वैराग्य, भेद कहाँ
श्लोक 367-407 · 41 श्लोक
योग का पहला द्वार। वैराग्य और बोध, पक्षी के दो पंख। अनात्म-चिंतन छोड़ कर आत्म-चिंतन। और चार बार लौटती टेक, निर्विकारे निराकारे निर्विशेषे भिदा कुतः।
भाग 14 · जीवन्मुक्त की पहचान
श्लोक 408-440 · 33 श्लोक
हृदि कलयति विद्वान् ब्रह्म पूर्णं समाधौ, तीन श्लोक तक लौटती टेक। फिर वैराग्य, बोध, उपरति और शांति की प्रसिद्ध सीढ़ी। और जीवन्मुक्त के सोलह लक्षण।
भाग 15 · कर्म-त्रय और एकमेव अद्वयं
श्लोक 441-470 · 30 श्लोक
संचित, प्रारब्ध और क्रियमाण, तीनों कर्मों का स्पष्ट हिसाब। बाण की उपमा। और अंत में सात बार लौटती धड़कन, एकमेव अद्वयं ब्रह्म नेह नानास्ति किंचन।
भाग 16 · गुरु का अंतिम वाक्य, शिष्य का जागरण
श्लोक 471-485 · 15 श्लोक
गुरु का संक्षेप, कि वेदान्त-सिद्धान्त बस इतना ही है। और शिष्य का पहला उद्गार, बुद्धिर्विनष्टा गलिता प्रवृत्तिः… किं वा कियद् वा सुखम् अस्ति अपारम्। विवेकचूडामणि का सबसे ऊँचा क्षण।
भाग 17 · शिष्य का स्तोत्र
श्लोक 486-519 · 34 श्लोक
गुरु को नमन, फिर एक के बाद एक अहम् ब्रह्म की घोषणाएँ, असंग, अनंग, अकर्ता; नारायण, शिव और ईश्वर वही अहम्। और अंत में, महा-स्वप्न से जगा कर आपने मुझे उबार लिया।
भाग 18 · गुरु फिर बोलते हैं
श्लोक 520-545 · 26 श्लोक
ब्रह्म-प्रत्यय की अविच्छिन्न धारा से हर अवस्था में ब्रह्म को देखो। पूर्ण चन्द्र हो तो जल में पड़ी चन्द्र-छाया क्यों खोजें। और ज्ञानी की विविध रोज़मर्रा की चाल, कहीं मूढ़-सा, कहीं विद्वान, कहीं बालक-सा, कहीं उन्मत्त-सा।
भाग 19 · विदेह-कैवल्य और समापन
श्लोक 546-580 · 35 श्लोक
देह पत्ते की भाँति गिरे, वृक्ष वैसा का वैसा। मोक्ष देह का नहीं, अविद्या-रूपी हृदय-ग्रंथि का है। घट के फूटने और दूध के दूध में मिल जाने की उपमा से, बंधन और मोक्ष भी अंत में कल्पना। और समापन, शंकर-भारती विजयते निर्वाण-संदायिनी।
एक बात पढ़ने वालों के लिए
यह संस्करण किसी विशेषज्ञ के लिए नहीं, एक सामान्य पाठक के लिए है, जिसे संस्कृत का आदर है पर जो पढ़ने में कठिनाई से ठिठक जाता है। हर श्लोक पर देवनागरी मूल, शब्दों का सीधा अर्थ, साफ़ अर्थ, और एक रोज़मर्रा का भावार्थ मिलेगा, जिसमें कहीं घर-गृहस्थी की, कहीं बच्चे की, कहीं नित्य जीवन की उपमा है।
भाष्य में अनावश्यक दोहराव और रटे-रटाए संबोधन छोड़ दिए गए हैं, ताकि हर श्लोक स्वयं साँस ले और उपदेश सहज उतरे, भारी न पड़े।
इस प्रकार के संस्करण अनेक हैं, और हर एक का अपना रंग है। यह एक रंग है, सरल और निकट। यदि शुद्ध शास्त्रीय व्याख्या अभीष्ट हो, तो स्वामी माधवानन्द (अद्वैत आश्रम), स्वामी चिन्मयानन्द, अथवा अन्य पारम्परिक प्रकाशन देखें। यह उनका स्थान नहीं लेता, उनके साथ खड़ा है।