अंग 182

अंग
182
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਬਿਆਪਤ ਹਰਖ ਸੋਗ ਬਿਸਥਾਰ ॥
ਬਿਆਪਤ ਸੁਰਗ ਨਰਕ ਅਵਤਾਰ ॥
ਬਿਆਪਤ ਧਨ ਨਿਰਧਨ ਪੇਖਿ ਸੋਭਾ ॥
ਮੂਲੁ ਬਿਆਧੀ ਬਿਆਪਸਿ ਲੋਭਾ ॥੧॥
ਮਾਇਆ ਬਿਆਪਤ ਬਹੁ ਪਰਕਾਰੀ ॥
ਸੰਤ ਜੀਵਹਿ ਪ੍ਰਭ ਓਟ ਤੁਮਾਰੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਬਿਆਪਤ ਅਹੰਬੁਧਿ ਕਾ ਮਾਤਾ ॥
ਬਿਆਪਤ ਪੁਤ੍ਰ ਕਲਤ੍ਰ ਸੰਗਿ ਰਾਤਾ ॥
ਬਿਆਪਤ ਹਸਤਿ ਘੋੜੇ ਅਰੁ ਬਸਤਾ ॥
ਬਿਆਪਤ ਰੂਪ ਜੋਬਨ ਮਦ ਮਸਤਾ ॥੨॥
ਬਿਆਪਤ ਭੂਮਿ ਰੰਕ ਅਰੁ ਰੰਗਾ ॥
ਬਿਆਪਤ ਗੀਤ ਨਾਦ ਸੁਣਿ ਸੰਗਾ ॥
ਬਿਆਪਤ ਸੇਜ ਮਹਲ ਸੀਗਾਰ ॥
ਪੰਚ ਦੂਤ ਬਿਆਪਤ ਅੰਧਿਆਰ ॥੩॥
ਬਿਆਪਤ ਕਰਮ ਕਰੈ ਹਉ ਫਾਸਾ ॥
ਬਿਆਪਤਿ ਗਿਰਸਤ ਬਿਆਪਤ ਉਦਾਸਾ ॥
ਆਚਾਰ ਬਿਉਹਾਰ ਬਿਆਪਤ ਇਹ ਜਾਤਿ ॥
ਸਭ ਕਿਛੁ ਬਿਆਪਤ ਬਿਨੁ ਹਰਿ ਰੰਗ ਰਾਤ ॥੪॥
ਸੰਤਨ ਕੇ ਬੰਧਨ ਕਾਟੇ ਹਰਿ ਰਾਇ ॥
ਤਾ ਕਉ ਕਹਾ ਬਿਆਪੈ ਮਾਇ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਜਿਨਿ ਧੂਰਿ ਸੰਤ ਪਾਈ ॥ ਤਾ ਕੈ ਨਿਕਟਿ ਨ ਆਵੈ ਮਾਈ ॥੫॥੧੯॥੮੮॥
बिआपत हरख सोग बिसथार ॥
बिआपत सुरग नरक अवतार ॥
बिआपत धन निरधन पेखि सोभा ॥
मूलु बिआधी बिआपसि लोभा ॥१॥
माइआ बिआपत बहु परकारी ॥
संत जीवहि प्रभ ओट तुमारी ॥१॥ रहाउ ॥
बिआपत अहंबुधि का माता ॥
बिआपत पुत्र कलत्र संगि राता ॥
बिआपत हसति घोड़े अरु बसता ॥
बिआपत रूप जोबन मद मसता ॥२॥
बिआपत भूमि रंक अरु रंगा ॥
बिआपत गीत नाद सुणि संगा ॥
बिआपत सेज महल सीगार ॥
पंच दूत बिआपत अंधिआर ॥३॥
बिआपत करम करै हउ फासा ॥
बिआपति गिरसत बिआपत उदासा ॥
आचार बिउहार बिआपत इह जाति ॥
सभ किछु बिआपत बिनु हरि रंग रात ॥४॥
संतन के बंधन काटे हरि राइ ॥
ता कउ कहा बिआपै माइ ॥
कहु नानक जिनि धूरि संत पाई ॥ ता कै निकटि न आवै माई ॥५॥१९॥८८॥

हिन्दी अर्थ: कहीं खुशी कहीं गमीं का पसारा है~ कहीं जीव नरकों में पड़ते हैं~ कहीं स्वर्गों में पहुँचते हैं~ कहीं कोई धन वाले हैं~ कहीं कंगाल हैं~ कहीं कोई अपनी शोभा देख के (खुश हैं) – कहीं सारे रोगों का मूल लोभ बन के माया अपना जोर डाल रही है । 1। इन अनेको तरीकों से माया जीवों पे प्रभाव डाल रही है। हे प्रभू ! (तेरी रची) माया अनेकों तरीकों से (जीवों पर) प्रभाव डाले रखती है (और जीवों को आत्मिक मौत मार देती है)~ तेरे संत तेरे आसरे आत्मिक जीवन भोगते हैं। 1। रहाउ। कहीं कोई ‘हउ हउ~ मैं मैं’ की अक्ल में मस्त है। कहीं कोई पुत्र-स्त्री के मोह में रंगा पड़ा है। कहीं हाथी घोड़ों (सुंदर) कपड़ों (की लगन है)। कहीं कोई रूप और जवानी के नशे में मस्त है -इन अनेकों तरीकों से माया अपना प्रभान डाल रही है। 2। कहीं जमीन की मल्कियत है~ कहीं कंगाली है। कहीं अमीर हैं~ कहीं मंडलियों के गीत नाद सुन के (खुश हो रहे हैं)~ कही (सुंदर) सेज~ हार-श्रृंगार और महल माढ़ीयों (की लालसा है)। इन अनेकों तरीकों से माया अपना प्रभाव डाल रही है। कहीं मोह के अंधकार में कामादिक पाँचों विकार दूत बन के माया जोर डाल रही है। 3। कहीं कोई अहंकार में फंसा हुआ (अपनी ओर से धार्मिक) काम कर रहा है। कोई गृहस्थ में प्रवृत्त है~ कोई उदासी रूप में है। कहीं कोई धार्मिक रस्मों में प्रवृत्ति है~ कोई (ऊँची) जाति के अभिमान में है – परमात्मा के प्रेम में मगन होने से वंचित रह के यह सब कुछ माया का प्रभाव ही है। 4। परमात्मा खुद ही संत जनों के माया के बंधन काट देता है। उन पर माया अपना जोर नहीं डाल सकती। हे नानक ! कह, जिस मनुष्य ने संत जनों के चरणों की धूड़ प्राप्त कर ली है~ माया उस मनुष्य के नजदीक नहीं फटक सकती। 4। 19। 88।
ਗਉੜੀ ਗੁਆਰੇਰੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਨੈਨਹੁ ਨੀਦ ਪਰ ਦ੍ਰਿਸਟਿ ਵਿਕਾਰ ॥
ਸ੍ਰਵਣ ਸੋਏ ਸੁਣਿ ਨਿੰਦ ਵੀਚਾਰ ॥
ਰਸਨਾ ਸੋਈ ਲੋਭਿ ਮੀਠੈ ਸਾਦਿ ॥
ਮਨੁ ਸੋਇਆ ਮਾਇਆ ਬਿਸਮਾਦਿ ॥੧॥
ਇਸੁ ਗ੍ਰਿਹ ਮਹਿ ਕੋਈ ਜਾਗਤੁ ਰਹੈ ॥
ਸਾਬਤੁ ਵਸਤੁ ਓਹੁ ਅਪਨੀ ਲਹੈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਗਲ ਸਹੇਲੀ ਅਪਨੈ ਰਸ ਮਾਤੀ ॥
ਗ੍ਰਿਹ ਅਪੁਨੇ ਕੀ ਖਬਰਿ ਨ ਜਾਤੀ ॥
ਮੁਸਨਹਾਰ ਪੰਚ ਬਟਵਾਰੇ ॥
ਸੂਨੇ ਨਗਰਿ ਪਰੇ ਠਗਹਾਰੇ ॥੨॥
ਉਨ ਤੇ ਰਾਖੈ ਬਾਪੁ ਨ ਮਾਈ ॥
ਉਨ ਤੇ ਰਾਖੈ ਮੀਤੁ ਨ ਭਾਈ ॥
ਦਰਬਿ ਸਿਆਣਪ ਨਾ ਓਇ ਰਹਤੇ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਓਇ ਦੁਸਟ ਵਸਿ ਹੋਤੇ ॥੩॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਮੋਹਿ ਸਾਰਿੰਗਪਾਣਿ ॥
ਸੰਤਨ ਧੂਰਿ ਸਰਬ ਨਿਧਾਨ ॥
ਸਾਬਤੁ ਪੂੰਜੀ ਸਤਿਗੁਰ ਸੰਗਿ ॥
ਨਾਨਕੁ ਜਾਗੈ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਕੈ ਰੰਗਿ ॥੪॥
ਸੋ ਜਾਗੈ ਜਿਸੁ ਪ੍ਰਭੁ ਕਿਰਪਾਲੁ ॥
ਇਹ ਪੂੰਜੀ ਸਾਬਤੁ ਧਨੁ ਮਾਲੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ਦੂਜਾ ॥੨੦॥੮੯॥
गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥
नैनहु नीद पर द्रिसटि विकार ॥
स्रवण सोए सुणि निंद वीचार ॥
रसना सोई लोभि मीठै सादि ॥
मनु सोइआ माइआ बिसमादि ॥१॥
इसु ग्रिह महि कोई जागतु रहै ॥
साबतु वसतु ओहु अपनी लहै ॥१॥ रहाउ ॥
सगल सहेली अपनै रस माती ॥
ग्रिह अपुने की खबरि न जाती ॥
मुसनहार पंच बटवारे ॥
सूने नगरि परे ठगहारे ॥२॥
उन ते राखै बापु न माई ॥
उन ते राखै मीतु न भाई ॥
दरबि सिआणप ना ओइ रहते ॥
साधसंगि ओइ दुसट वसि होते ॥३॥
करि किरपा मोहि सारिंगपाणि ॥
संतन धूरि सरब निधान ॥
साबतु पूंजी सतिगुर संगि ॥
नानकु जागै पारब्रहम कै रंगि ॥४॥
सो जागै जिसु प्रभु किरपालु ॥
इह पूंजी साबतु धनु मालु ॥१॥ रहाउ दूजा ॥२०॥८९॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥ पराए रूप को विकार भरी निगाह से देखना – ये आँखों में नींद आ रही है। औरों की निंदा के विचार सुन-सुन के कान सो रहे हैं। जीभ खाने के लोभ में पदार्थों के मीठे स्वाद में सो रही है। मन माया के आश्चर्य तमाशों में सोया रहता है। 1। (हे भाई !) इस शरीर रूपी घर में कोई विरला मनुष्य ही सुचेत रहता है (जो सुचेत रहता है) वह अपनी आत्मिक जीवन की सारी की सारी राशि-पूँजी सम्भाल लेता है। 1। रहाउ। सारी ही ज्ञानेंद्रियां अपने अपने चस्के में मस्त रहती हैं~ अपने शरीर घर की ये सूझ नहीं रखते। ठॅगने वाले पाँचों डाकू सूने (शरीर-) घर में आ के हमला बोल देते हैं। 2। उन (पाँचों डाकुओं से) ना पिता बचा सकता है~ ना माँ बचा सकती है। उनसे ना कोई मित्र बचा सकता है~ ना ही कोई भाई। वो पाँचों डाकू ना धन से हटाए जा सकते हैं~ ना चतुराई से। वे पाँचों दुष्ट सिर्फ साध-संगति में रह के ही काबू में आते हैं। 3। हे धर्नुधारी प्रभू ! मेरे पर कृपा कर। मुझे संतों की चरण धूड़ दे~ यही मेरे वास्ते सारे खजाने हैं। गुरू की संगति में रहने से आत्मिक जीवन का सरमाया सारा का सारा बचा रह सकता है। (परमात्मा का सेवक) नानक परमात्मा के प्रेम-रंग में रह के ही सुचेत रह सकता है (और पाँचों के आक्रमण से बच सकता है)। 4। (हे भाई ! कामादिक पाँचों डाकुओं के आक्रमण से) वही व्यक्ति सुचेत रहता है~ जिस पर परमात्मा खुद दयावान होता है। उसकी आत्मिक जीवन की ये राशि-पूँजी सारी की सारी बची रहती है~ उसके पास प्रभू का नाम-धन सरमाया बचा रहता है। 1। रहाउ दूजा। 20। 89।
ਗਉੜੀ ਗੁਆਰੇਰੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਜਾ ਕੈ ਵਸਿ ਖਾਨ ਸੁਲਤਾਨ ॥
ਜਾ ਕੈ ਵਸਿ ਹੈ ਸਗਲ ਜਹਾਨ ॥
ਜਾ ਕਾ ਕੀਆ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਹੋਇ ॥
ਤਿਸ ਤੇ ਬਾਹਰਿ ਨਾਹੀ ਕੋਇ ॥੧॥
ਕਹੁ ਬੇਨੰਤੀ ਅਪੁਨੇ ਸਤਿਗੁਰ ਪਾਹਿ ॥
ਕਾਜ ਤੁਮਾਰੇ ਦੇਇ ਨਿਬਾਹਿ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਭ ਤੇ ਊਚ ਜਾ ਕਾ ਦਰਬਾਰੁ ॥
ਸਗਲ ਭਗਤ ਜਾ ਕਾ ਨਾਮੁ ਅਧਾਰੁ ॥
ਸਰਬ ਬਿਆਪਿਤ ਪੂਰਨ ਧਨੀ ॥
ਜਾ ਕੀ ਸੋਭਾ ਘਟਿ ਘਟਿ ਬਨੀ ॥੨॥
ਜਿਸੁ ਸਿਮਰਤ ਦੁਖ ਡੇਰਾ ਢਹੈ ॥
ਜਿਸੁ ਸਿਮਰਤ ਜਮੁ ਕਿਛੂ ਨ ਕਹੈ ॥
ਜਿਸੁ ਸਿਮਰਤ ਹੋਤ ਸੂਕੇ ਹਰੇ ॥
गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥
जा कै वसि खान सुलतान ॥
जा कै वसि है सगल जहान ॥
जा का कीआ सभु किछु होइ ॥
तिस ते बाहरि नाही कोइ ॥१॥
कहु बेनंती अपुने सतिगुर पाहि ॥
काज तुमारे देइ निबाहि ॥१॥ रहाउ ॥
सभ ते ऊच जा का दरबारु ॥
सगल भगत जा का नामु अधारु ॥
सरब बिआपित पूरन धनी ॥
जा की सोभा घटि घटि बनी ॥२॥
जिसु सिमरत दुख डेरा ढहै ॥
जिसु सिमरत जमु किछू न कहै ॥
जिसु सिमरत होत सूके हरे ॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥ (हे भाई ! दुनिया के) खान और सुल्तान भी जिस परमात्मा के अधीन हैं~ सारा जगत ही जिसके हुकम में है~ जिस परमात्मा का किया हुआ ही (जगत में) सब कुछ होता है~ उस परमात्मा से कोई भी जीव आकी नहीं हो सकता। 1। (हे भाई !) अपने गुरू के पास विनती कर। गुरू तेरे कार्य (जनम उद्देश्य) पूरे कर देगा~ भाव (तुझे प्रभू के नाम की दाति बख्शेगा)। 1। रहाउ। (हे भाई !) जिस परमात्मा का दरबार (दुनिया के) सारे शाहों-बादशाहों के दरबारों से ऊँचा (शानदार) है। सारे भक्तों की (जिंदगी) के वास्ते जिस परमात्मा का नाम आसरा है~ जो मालिक प्रभू सब जीवों पे अपना प्रभाव रखता है और सब में व्यापक है~ जिस परमात्मा की सुंदरता हरेक शरीर में अपनी दमक दिखा रही है (उसका नाम सदा सिमर)। 2। (हे भाई !) जिस परमात्मा का सिमरन करने से सारे ही दुख दूर हो जाते हैं। जिसका नाम सिमरने से मौत का डर छू नहीं सकता। जिस परमात्मा का सिमरन करने से निर्दयी मनुष्य भी नर्म-दिल हो जाते हैं।

संदर्भ: यह अंग 182 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।

M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।

दिल्ली के winter-fog में सुबह 5 बजे driver को waiting करवाना।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 56 पंक्तियों का है, 3 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 182” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 183 →, पीछे का: ← अंग 181

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।