केनोपनिषद्

किसके द्वारा? Who Wills the Mind?
सामवेद की तलवकार ब्राह्मण शाखा
कुल 4 खण्ड, 34 मन्त्र। रचना का अनुमानित काल: ईसा-पूर्व 7वीं से 6वीं शताब्दी।

यह उपनिषद् दो हिस्सों में बँटी है: पहले दो खण्ड दार्शनिक (मन्त्र भाग), और बाद के दो खण्ड कथात्मक (ब्राह्मण भाग)।
॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
सब जगह शान्ति हो। बाहर, भीतर, और तीनों तापों से मुक्ति।

Background

केनोपनिषद् दस प्रमुख (मुख्य) उपनिषदों में गिनी जाती है, उन्हीं दस में जिन पर आदि शंकराचार्य ने भाष्य लिखा। इसका दूसरा नाम तलवकार उपनिषद् है, क्योंकि यह सामवेद की तलवकार ब्राह्मण शाखा से ली गई है। प्राचीन परंपरा में सामवेद को गान और संगीत का वेद कहा जाता है, और तलवकार ब्राह्मण उन ब्राह्मण-ग्रंथों में से एक है जो उस गान-परंपरा को व्यवस्थित करते थे।

“केन” शब्द का मतलब है “किसके द्वारा”। पूरे उपनिषद् की शुरुआत इसी सवाल से होती है, और इसी पहले शब्द ने उपनिषद् का नाम तय किया। यह परंपरा है उपनिषदों की कि उनके नाम पहले मन्त्र के पहले या मुख्य शब्द से रखे जाते हैं। जैसे ईशावास्य उपनिषद् “ईशा” से शुरू होती है, मुण्डक उपनिषद् मुण्ड (मुण्डन, सिर मुंडवाना) से, और कठोपनिषद् ऋषि कठ की शाखा से।

इसकी संरचना सरल मगर असाधारण है। चार खण्ड हैं। पहले दो खण्ड पद्य में हैं और एक शिष्य-गुरु संवाद की तरह चलते हैं। तीसरा खण्ड एक कहानी से शुरू होता है। चौथा खण्ड उस कहानी का सार खोलकर रखता है और उपनिषद् की एक संक्षिप्त परिभाषा देता है।

केनोपनिषद् का स्वर पूरी तरह से व्यंजना (apophatic) का है। यानी, यह ब्रह्म के बारे में सीधे यह नहीं कहती कि “ब्रह्म ऐसा है”, बल्कि बार-बार कहती है कि “ब्रह्म वो नहीं है जो तुम सोचते हो”। हर इन्द्रिय, हर शक्ति, हर अनुभव के पीछे एक और गहरी सच्चाई है, जो खुद इन्द्रिय या अनुभव का विषय नहीं बन सकती। यह उपनिषद् उसी सच्चाई की ओर बार-बार इशारा करती है।

Introduction

कल्पना कीजिए कि आप एक engineer हैं और किसी complex system को debug कर रहे हैं। आप देख सकते हैं कि output क्या है। आप कुछ inputs भी देख सकते हैं। बीच में कई processes चल रहे हैं। हर process के पीछे एक scheduler है, हर scheduler के पीछे एक kernel। अंत में आप एक ऐसे layer पर पहुँचते हैं जिसे आप debugger से देख ही नहीं सकते। वो substrate है। उस पर पूरा system चल रहा है, लेकिन वो खुद कोई भी instrument नहीं है जिसे आप अलग से process कर सकें।

केनोपनिषद् का पहला प्रश्न ठीक यही है। हमारी हर इन्द्रिय एक उपकरण है। आँख रोशनी पकड़ती है, कान आवाज़ पकड़ता है, जीभ स्वाद। मन भी एक उपकरण है, जो विचारों को पकड़ता और छोड़ता है। हर उपकरण को कोई चलाने वाला चाहिए। तो मन को कौन चलाता है? और जो मन को चलाता है, उसे कौन?

इस सवाल से एक regress शुरू होता है। पश्चिमी दर्शन इसी regress को बाहर की तरफ़ खींचता है, “first cause” की तरफ़, जिसे ईश्वर या Big Bang कह दिया जाता है। उपनिषद् इसे उल्टा करती है। regress का अंत बाहर नहीं, अंदर है। और वो किसी “चीज़” पर नहीं रुकता, बल्कि उस चेतना पर रुकता है जो खुद कुछ नहीं, मगर जिसके बिना कुछ नहीं।

केनोपनिषद् इस बात पर बार-बार ज़ोर देती है कि जिसको आप “जान सकते हैं”, वो ब्रह्म नहीं है। “मैं जानता हूँ” कहने में ही एक भेद आ जाता है: एक जानने वाला, एक जाना जाने वाला विषय। ब्रह्म वो है जो दोनों से पहले है, दोनों का स्रोत है। इसलिए यह उपनिषद् ‘नेति-नेति’ का दर्शन है। “यह नहीं, वह नहीं”।

दूसरे हिस्से में यक्ष की कहानी आती है। देवता मान रहे थे कि उनकी शक्ति उनकी अपनी है। ब्रह्म ने यक्ष का रूप लेकर एक तिनके के सामने उन्हें रख दिया। अग्नि नहीं जला सका, वायु नहीं उड़ा सका। तब समझ आया कि शक्ति किसकी थी असल में। पूरी उपनिषद् इसी एक सबक के दो रूप हैं: दार्शनिक रूप और कथात्मक रूप।

खण्ड 1

मन को कौन चलाता है?
शिष्य एक तीखा सवाल पूछता है। गुरु जवाब देने के बजाय सवाल को और गहरा कर देता है। नौ मन्त्रों में पूरी अद्वैत वेदान्त की नींव रखी जाती है।

मन्त्र 1.1

ॐ केनेषितं पतति प्रेषितं मनः
केन प्राणः प्रथमः प्रैति युक्तः ।
केनेषितां वाचमिमां वदन्ति
चक्षुः श्रोत्रं क उ देवो युनक्ति ॥

उपनिषद् का पहला शब्द ही “केन” है, यानी “किसके द्वारा”। शिष्य गुरु से एक के बाद एक सवाल पूछ रहा है। मन इधर-उधर भागता है, किसके भेजे हुए जाता है? सबसे पहले जो प्राण चलता है (हमारी पहली साँस), वो किसके योग से चलता है? जिस वाणी से हम बोलते हैं, वो किसकी प्रेरणा से निकलती है? आँख और कान को कौन सा देव जोड़ता है काम पर?

ध्यान देने वाली बात यह है कि सवाल “क्या है” नहीं है, “कौन है” है। “केन” एक personal सर्वनाम है। शिष्य पूछ रहा है कि क्या इन सब के पीछे कोई agent है? कोई “करने वाला” है? और अगर है, तो वो कैसा है?

यह सवाल हर जिज्ञासु के मन में आता है। एक engineer अपने code को देखता है तो जानता है कि कौन सा function किसे call कर रहा है। पर अगर वो खुद को देखे, अपने thinking को, अपने decisions को, तो जल्दी से एक regress में फँस जाएगा। मैं सोच रहा हूँ, पर “मैं” कौन? मेरे विचार किसे आते हैं? यही उपनिषद् का opening प्रश्न है।

मन्त्र 1.2

श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो मनो यद्
वाचो ह वाचं स उ प्राणस्य प्राणः ।
चक्षुषश्चक्षुरतिमुच्य धीराः
प्रेत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति ॥

गुरु का जवाब बड़ा अनोखा है। वो सीधे यह नहीं कहता कि “ब्रह्म ही है जो मन को चलाता है”। बल्कि वो कहता है: जो “कान का कान” है, “मन का मन” है, “वाणी की वाणी” है, “प्राण का प्राण” है, “आँख की आँख” है, वही है।

यह क्या मतलब हुआ? देखिए, कान आवाज़ सुनता है। लेकिन कान खुद कान को नहीं सुन सकता। कान को सुनने के लिए एक और श्रोता चाहिए, जो कान के पीछे है। वो श्रोता “कान का कान” है। इसी तरह मन सोचता है, पर मन खुद को नहीं सोच सकता। जो मन को सोचता है, वो “मन का मन” है। हर इन्द्रिय के पीछे एक witness है, और वो witness खुद इन्द्रिय नहीं है।

“धीराः” यानी जो धैर्य रखते हैं, जो ठहरे हुए हैं, जो स्थिर बुद्धि वाले हैं। वो इस “इन्द्रिय के पीछे की चेतना” को पहचान लेते हैं और इन्द्रियों से अपनी पहचान छोड़ देते हैं (“अतिमुच्य”)। और जब वो इस लोक से जाते हैं, अमर हो जाते हैं। “अमर” यानी जो जन्म-मरण के चक्र से बाहर निकल गया।

मन्त्र 1.3

न तत्र चक्षुर्गच्छति न वाग्गच्छति नो मनः ।
न विद्मो न विजानीमो यथैतदनुशिष्यात् ॥

यह मन्त्र पूरी उपनिषद् का सबसे प्रसिद्ध और सबसे चौंकाने वाला कथन है। गुरु शिष्य से कहता है: “वहाँ” (ब्रह्म तक) न तो आँख जा सकती है, न वाणी, न मन। हम स्वयं उसे न जानते हैं, न जान सकते हैं, और हमें यह भी नहीं पता कि उसे कैसे सिखाया जाए।

यह आश्चर्य की बात है। एक गुरु अपने शिष्य से कह रहा है कि “मैं नहीं जानता कि इसे तुम्हें कैसे सिखाऊँ”। यह विनम्रता है, मगर इससे ज़्यादा यह एक तकनीकी सच्चाई है। ब्रह्म का स्वरूप ऐसा नहीं है कि उसे एक “चीज़” की तरह दिखाया जा सके, या एक “विषय” की तरह बताया जा सके। हर सिखाने का तरीका एक object की तरफ़ इशारा करता है। ब्रह्म object नहीं है। वो subject है, हर subject का subject।

दृष्टान्त

कल्पना कीजिए कि एक टॉर्च है जो हर चीज़ पर रोशनी डाल सकती है। मेज़ पर, कुर्सी पर, पेड़ पर। लेकिन क्या वो टॉर्च खुद पर रोशनी डाल सकती है? नहीं। टॉर्च की रोशनी उससे बाहर जाती है, उसके अंदर नहीं। आँख भी ऐसी है। आँख सब देखती है, खुद को नहीं। आइना भी एक माध्यम है, फिर भी देखने वाला आइने में नहीं, उसके सामने है। ठीक उसी तरह, चेतना सब को जानती है, खुद को object की तरह नहीं जान सकती।

मन्त्र 1.4

अन्यदेव तद्विदितादथो अविदितादधि ।
इति शुश्रुम पूर्वेषां ये नस्तद्व्याचचक्षिरे ॥

“वो (ब्रह्म) जाने हुए से अलग है, और जो नहीं जाना उससे भी अलग है”। यह एक बहुत बारीक बात है। हम जो भी “जानते” हैं, वो सब हमारी इन्द्रियों और बुद्धि की पहुँच में है। उसके अलावा बहुत कुछ है जो हम “नहीं जानते”, पर वो भी संभावित रूप से जानने योग्य है, बस अभी हमारी पहुँच में नहीं है। ब्रह्म दोनों से बाहर है।

ब्रह्म “ज्ञात” (जाना हुआ) नहीं हो सकता, क्योंकि वो object नहीं बनता। ब्रह्म “अज्ञात” भी नहीं है, क्योंकि वो हर जानने का आधार है, उसके बिना जानना मुमकिन नहीं। तो वो दोनों से परे है, एक तीसरी category है।

“इति शुश्रुम पूर्वेषाम्” यानी “ऐसा हमने पूर्वजों से सुना है, जिन्होंने हमें इसकी व्याख्या दी”। यह बहुत ज़रूरी पंक्ति है। उपनिषद् का गुरु अपनी authority खुद से नहीं ले रहा। वो परंपरा का संदर्भ दे रहा है। यह ज्ञान पीढ़ी-दर-पीढ़ी आ रहा है, और हर पीढ़ी इसे verify करके आगे बढ़ाती है। यह श्रौत परंपरा है, सुनकर सीखने वाली।

मन्त्र 1.5

यद्वाचाऽनभ्युदितं येन वागभ्युद्यते ।
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥

अब गुरु एक pattern शुरू करता है जो पाँच मन्त्रों तक चलेगा। हर मन्त्र में एक इन्द्रिय या शक्ति का नाम लेता है, और कहता है: “जो वो (इन्द्रिय/शक्ति) नहीं उठाती (नहीं express करती), लेकिन जिसके द्वारा वो (इन्द्रिय/शक्ति) उठती है (express होती है), उसे ही ब्रह्म जानो। यह नहीं जिसकी लोग पूजा करते हैं।”

पहला: वाणी। वाणी जो बोल नहीं सकती, लेकिन जिसके द्वारा खुद वाणी बोलती है, वही ब्रह्म है। वाणी एक tool है। हम बोलते हैं, शब्द निकलते हैं। पर वो “बोलना” शुरू कौन करता है? जो वाणी के बारे में बोलने की क्षमता रखता है, वो वाणी नहीं है।

आखिरी पंक्ति बहुत महत्वपूर्ण है: “नेदं यदिदमुपासते” यानी “यह नहीं, जिसकी (लोग) यहाँ पूजा करते हैं”। गुरु सीधे कह रहा है कि जिन देवताओं या रूपों की तुम पूजा करते हो, वो ब्रह्म नहीं हैं। वो ब्रह्म के expressions हो सकते हैं, मगर ब्रह्म खुद उन सब से परे है। यह कथन उपनिषदों के “नेति-नेति” मार्ग की clearest declaration है।

मन्त्र 1.6

यन्मनसा न मनुते येनाहुर्मनो मतम् ।
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥

दूसरा: मन। जिसे मन से सोचा नहीं जा सकता, लेकिन जिसके द्वारा मन सोचता है, वही ब्रह्म है। यह नहीं जिसकी पूजा होती है।

मन हमारा सबसे शक्तिशाली tool है। मन से हम सब कुछ सोच सकते हैं, कल्पना कर सकते हैं, गणित कर सकते हैं, कविता रच सकते हैं। पर एक बात नहीं हो सकती: मन से मन को ही नहीं सोचा जा सकता। आप अपने विचार को सोच सकते हैं, पर “सोचने वाले” को नहीं। हर बार जब आप सोचने की कोशिश करते हैं, वो सोचने वाला एक कदम पीछे हट जाता है। यही recursion का अंत है, और यही ब्रह्म है।

मन्त्र 1.7

यच्चक्षुषा न पश्यति येन चक्षूँषि पश्यति ।
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥

तीसरा: आँख। जिसे आँख देख नहीं सकती, लेकिन जिसके द्वारा आँख देखती है, वही ब्रह्म है।

आँख रोशनी पर निर्भर है। बिना रोशनी आँख नहीं देख सकती। पर जो “देखना” शुरू करता है, जो आँख की रोशनी को meaning देता है, जो दिखे हुए को “अनुभव” में बदलता है, वो आँख से अलग है। आप एक तस्वीर देख रहे हैं। आँख तस्वीर का pixel-by-pixel input भेज रही है। पर तस्वीर “कविता” है, “ग्लानी” है, “खुशी” है, यह आँख नहीं जानती। यह जो जानता है, वो आँख का साक्षी है। वही ब्रह्म है।

मन्त्र 1.8

यच्छ्रोत्रेण न श्रृणोति येन श्रोत्रमिदं श्रुतम् ।
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥

चौथा: कान। जिसे कान सुन नहीं सकता, लेकिन जिसके द्वारा यह कान सुना जाता है, वही ब्रह्म है।

कान वायु के कंपन को संगीत में बदल देता है, शब्दों में बदल देता है, चेतावनी में बदल देता है। पर कंपन और कान के बीच में जो interpreter है, जो “सुनने” को meaning देता है, वो कान नहीं है। वो श्रोता-का-श्रोता है।

मन्त्र 1.9

यत्प्राणेन न प्राणिति येन प्राणः प्रणीयते ।
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥

पाँचवाँ: प्राण। जो प्राण से साँस नहीं लेता, लेकिन जिसके द्वारा प्राण की प्रक्रिया चलती है, वही ब्रह्म है।

प्राण हमारी सबसे autonomic process है। हम सोते हैं तो भी साँस चलती है। हमें सोचना नहीं पड़ता। मगर “साँस का इरादा” कहीं तो शुरू होता है। शरीर के सोते हुए भी कोई जागता है जो साँस लेने वाली system को चालू रखता है। वो प्राण नहीं है, प्राण का प्राण है।

पाँचों मन्त्रों का pattern एक है: हर इन्द्रिय या शक्ति एक tool है। हर tool को कोई operator चाहिए। और operator खुद tool नहीं है। चेतना सब tools के पीछे है, हर tool को सक्रिय करती है, मगर खुद कोई tool नहीं। यही ब्रह्म है। और जिनकी पूजा लोग बाहरी रूपों में करते हैं, वो ब्रह्म नहीं, उसके बाहरी रूप हैं।

खण्ड 2

जानने और न जानने का विरोधाभास
दूसरा खण्ड बड़ा subtle है। गुरु कहता है: अगर तुम सोचते हो कि तुम जानते हो, तो असल में तुम नहीं जानते। और अगर तुम जानते हो कि तुम नहीं जानते, तो तुम जानने के क़रीब हो।

मन्त्र 2.1

यदि मन्यसे सुवेदेति दहरमेवापि दभ्रमेवापि
नूनं त्वं वेत्थ ब्रह्मणो रूपम् ।
यदस्य त्वं यदस्य देवेष्वथ नु
मीमाँस्यमेव ते मन्ये विदितम् ॥

गुरु शिष्य से कहता है: “अगर तुम सोचते हो कि तुम (ब्रह्म को) अच्छी तरह जानते हो, तो शायद तुम उसका एक छोटा सा रूप जानते हो”। यानी अगर तुम्हें लगता है कि तुम सब समझ गए, तो असल में जो तुम “जानते” हो वो ब्रह्म का बहुत छोटा हिस्सा है, या एक रूप-मात्र।

“मीमाँस्यमेव” यानी विचारणीय। गुरु कह रहा है कि यह बात ही विचार करने योग्य है, “अब मुझे तुम्हारा ‘जानना’ विचारणीय लगता है”। यह एक subtle रूप से शिष्य को challenge करना है। बता रहा है कि जिसे तुम “ज्ञान” समझ रहे हो, उसकी जाँच करनी पड़ेगी।

मन्त्र 2.2

नाहं मन्ये सुवेदेति नो न वेदेति वेद च ।
यो नस्तद्वेद तद्वेद नो न वेदेति वेद च ॥

शिष्य अब समझ जाता है, और जवाब देता है: “मैं नहीं मानता कि मैं अच्छी तरह जानता हूँ। और न मैं यह कहता हूँ कि मैं नहीं जानता। मैं जानता हूँ, और (फिर भी) नहीं जानता।”

यह विरोधाभास नहीं है। यह बहुत बारीक statement है। शिष्य कह रहा है कि उसे यह तो पता है कि ब्रह्म है, यह उसका अनुभव है। मगर वो यह claim नहीं करता कि वो ब्रह्म को “जान” लिया है, क्योंकि ब्रह्म को object की तरह “जाना” नहीं जा सकता। इसलिए वो दोनों extremes से बच निकलता है: न तो overconfident है, न nihilist है।

“हमारे बीच में जो ऐसा जानता है, वो जानता है। जो (कहता है) न मैं नहीं जानता न मैं जानता हूँ, वो जानता है”। मतलब जो इस विरोधाभास को pratically समझ लेता है, वही असली ज्ञानी है।

मन्त्र 2.3

यस्यामतं तस्य मतं मतं यस्य न वेद सः ।
अविज्ञातं विजानतां विज्ञातमविजानताम् ॥

यह श्लोक केनोपनिषद् का सबसे प्रसिद्ध है। शाब्दिक अनुवाद: “जिसके लिए (वो) नहीं जाना गया (अमतम्), उसके लिए (वो) जाना गया (मतम्) है। जिसने (उसे) जाना (मानता) है, वो (असल में) नहीं जानता।” “जानने वालों के लिए (वो) अज्ञात है, और न जानने वालों के लिए (वो) ज्ञात है।”

यह pure paradox लगता है, मगर है तकनीकी कथन। “जानना” यहाँ object-knowledge है। जो claim करता है कि “मैंने ब्रह्म को जान लिया”, वो claim ही यह बताती है कि उसने ब्रह्म को एक object में reduce कर लिया है, और इसलिए वो miss कर गया। जो विनम्रता से कहता है कि “ब्रह्म मेरी पकड़ में नहीं आता”, वो उस सीमा को पहचानता है, और इसी पहचान में ब्रह्म प्रकट होता है।

दृष्टान्त

एक छोटा सा experiment कीजिए। अपने हाथ की हथेली देखिए। आप उसे देख रहे हैं। अब देखने वाले को देखने की कोशिश कीजिए। जो “मैं” देख रहा हूँ, उस “मैं” को कैसे देखें? आप जैसे ही उस “मैं” पर ध्यान देंगे, वो objectify हो जाएगा, “मैं” से एक और observer पीछे हट जाएगा। यही recursion अंतहीन है। और इसी recursion में जब आप समझ जाते हैं कि “मैं” को object नहीं बनाया जा सकता, तभी आप उस “मैं” के असली स्वरूप के क़रीब आ रहे हैं। यह नहीं-जानने का जानना ही केन कह रहा है।

मन्त्र 2.4

प्रतिबोधविदितं मतममृतत्वं हि विन्दते ।
आत्मना विन्दते वीर्यं विद्यया विन्दतेऽमृतम् ॥

तो फिर जाना कैसे जाए? गुरु कहता है: “प्रतिबोध-विदितं”। यानी हर बोध (cognition) के साथ ही जान लिया गया। हर बार जब हम कुछ भी जानते हैं, ब्रह्म साथ में जान लिया जाता है। क्योंकि “जानने” की प्रक्रिया खुद उसकी मौजूदगी का सबूत है।

“आत्मना विन्दते वीर्यम्” यानी आत्म-ज्ञान से शक्ति मिलती है। “विद्यया विन्दतेऽमृतम्” यानी विद्या से अमरता मिलती है। यहाँ विद्या का मतलब book-knowledge नहीं, बल्कि वो विद्या है जो आत्म-तत्व का साक्षात्कार कराती है। और “अमृत” यानी जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति।

मन्त्र 2.5

इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति
न चेदिहावेदीन्महती विनष्टिः ।
भूतेषु भूतेषु विचित्य धीराः
प्रेत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति ॥

“अगर इसी जीवन में (ब्रह्म को) जान लिया, तो सत्य है (यानी जीवन सार्थक है)। अगर नहीं जाना, तो बहुत बड़ी हानि है। हर एक प्राणी में, हर एक भूत में, उसे पहचानकर, धीर लोग इस लोक से जाते समय अमर हो जाते हैं।”

यह बहुत practical advice है। उपनिषद् यह नहीं कहती कि “मरने के बाद देखेंगे”। वो कहती है: अभी, इसी जीवन में, इसी शरीर में। क्योंकि देह छूटने के बाद यह जिज्ञासा भी छूट जाती है, और साधन भी। जो काम यहाँ नहीं हुआ, वो बाद में और भी मुश्किल है।

“भूतेषु भूतेषु विचित्य” यानी हर प्राणी में, हर अस्तित्व में उसे पहचानकर। ब्रह्म कहीं दूर नहीं है। वो हर जगह है। हर चेहरे में, हर पत्थर में, हर साँस में। पहचानने की बात है।

खण्ड 3

यक्ष की कहानी
अब उपनिषद् दर्शन से कहानी में आती है। एक रहस्यमय यक्ष देवताओं के सामने प्रकट होता है। अग्नि, वायु, इन्द्र, तीनों को एक तिनके के सामने हार माननी पड़ती है। यह कहानी पहले के दर्शन का नाटकीय रूप है।

मन्त्र 3.1

ब्रह्म ह देवेभ्यो विजिग्ये तस्य ह ब्रह्मणो
विजये देवा अमहीयन्त ॥

एक बार ब्रह्म ने देवताओं के लिए विजय प्राप्त की। (पुराण-परंपरा में देवों और असुरों के बीच लगातार युद्ध चलते थे।) ब्रह्म ने उन देवताओं की तरफ़ से लड़ाई जीती। और इस विजय से देवता बहुत खुश हुए, बहुत महिमावान हो गए।

ध्यान देने वाली बात है: विजय की असली शक्ति ब्रह्म थी, मगर देवताओं को लगा कि शक्ति उनकी अपनी है। यही ego का pattern है। हर सफलता के साथ “मैं” बड़ा हो जाता है।

मन्त्र 3.2

त ऐक्षन्तास्माकमेवायं विजयोऽस्माकमेवायं महिमेति ।
तद्धैषां विजज्ञौ तेभ्यो ह प्रादुर्बभूव तन्न व्यजानत
किमिदं यक्षमिति ॥

देवताओं ने सोचा: “यह विजय हमारी अपनी है, यह महिमा हमारी अपनी है”। ब्रह्म को यह बात पता चली। तो वो उनके सामने प्रकट हुआ। पर देवता पहचान नहीं पाए कि यह क्या है। “किमिदं यक्षम्” यानी “यह क्या यक्ष है”?

“यक्ष” शब्द का यहाँ मतलब है एक रहस्यमय, चमत्कारिक उपस्थिति। एक divine being जो पहचानी नहीं जा सकती। ब्रह्म ने जान-बूझकर वो रूप लिया जिसे देवता identify नहीं कर सकते थे। यह एक tactical move है, क्योंकि अगर ब्रह्म सीधे ब्रह्म के रूप में आता, तो शायद देवता पहचान लेते और lecture सुन लेते। पर पहचान न होने पर वो test के लिए मजबूर हुए।

मन्त्र 3.3

तेऽग्निमब्रुवञ्जातवेद एतद्विजानीहि
किमिदं यक्षमिति तथेति ॥

देवताओं ने अग्नि से कहा: “हे जातवेदा (अग्नि का एक नाम, जिसका मतलब है ‘जिसको सब जन्म जान लिए हैं’ या ‘जो जन्म के साथ ज्ञान रखता है’)। तुम जाकर पता करो कि यह क्या यक्ष है”। अग्नि ने कहा: “ठीक है”।

अग्नि को पहले भेजा गया क्योंकि वो “सब कुछ जानने वाला” (जातवेदा) माना जाता है। वो सब को “जला” देता है, इसलिए सब उसके परिचय में हैं। यानी सबसे आत्म-विश्वासी देवता।

मन्त्र 3.4

तदभ्यद्रवत्तमभ्यवदत्कोऽसीत्यग्निर्वा
अहमस्मीत्यब्रवीज्जातवेदा वा अहमस्मीति ॥

अग्नि उसकी तरफ़ दौड़ा। यक्ष ने पूछा: “तुम कौन हो?” अग्नि ने जवाब दिया: “मैं अग्नि हूँ, मैं जातवेदा हूँ”।

देखिए दिलचस्प बात। यक्ष का पहला सवाल यही था: “तुम कौन हो?” यह वही सवाल है जो पूरी उपनिषद् पूछ रही है। अग्नि ने अपना नाम बताया, अपनी identity बताई। पर नाम और identity किसी की असली शक्ति नहीं हैं। यह यक्ष यही दिखाने वाला है।

मन्त्र 3.5

तस्मिँस्त्वयि किं वीर्यमित्यपीदꣳ सर्वं
दहेयं यदिदं पृथिव्यामिति ॥

यक्ष ने पूछा: “तुम में क्या शक्ति है?” अग्नि ने कहा: “मैं इस पृथ्वी पर जो कुछ भी है, सब कुछ जला सकता हूँ”।

यह बड़ा confident claim है। अग्नि अपनी क्षमता का full advertisement कर रहा है। यह claim एक hubris है, और हर hubris अपनी परीक्षा माँगती है।

मन्त्र 3.6

तस्मै तृणं निदधावेतद्दहेति ।
तदुपप्रेयाय सर्वजवेन तन्न शशाक दग्धुं स तत एव
निववृते नैतदशकं विज्ञातुं यदेतद्यक्षमिति ॥

यक्ष ने अग्नि के सामने एक तिनका रखा और कहा: “इसे जला दो”। अग्नि पूरी ताकत से उस पर टूटा। पर जला नहीं सका। हार कर वापस आया और बोला: “मैं नहीं जान सका कि यह यक्ष क्या है”।

मनन

यह scene बहुत powerful है। अग्नि, जो पूरी पृथ्वी को जला सकता है, एक तिनके के सामने हार जाता है। क्यों? क्योंकि उसकी शक्ति उधार की थी। उसे लग रहा था कि यह शक्ति उसकी अपनी है। पर जिस ब्रह्म से वो शक्ति निकलती थी, वही ब्रह्म जब उसे रोक देता है, तो शक्ति नहीं चलती।

हमारे जीवन में भी ऐसा होता है। कोई एक दिन सब कुछ कर लेता है, कोई एक tweet viral कर देता है, कोई एक product launch आसमान छू लेता है। हम सोचने लगते हैं: “यह मैं कर रहा हूँ”। पर जब वही skill, वही effort, अगली बार fail हो जाता है, तब समझ आता है कि कुछ और भी था जो काम कर रहा था।

मन्त्र 3.7

अथ वायुमब्रुवन्वायवेतद्विजानीहि
किमेतद्यक्षमिति तथेति ॥

फिर देवताओं ने वायु से कहा: “हे वायु, तुम जाकर पता करो कि यह क्या यक्ष है”। वायु ने कहा: “ठीक है”।

वायु अगला powerful देव है। हवा सब को उड़ा सकती है, सब को छू सकती है। उसका दूसरा नाम “मातरिश्वा” है, जिसका मतलब है “माता के गर्भ में बढ़ने वाला”, यानी जो सब जगह पहुँचता है, जिससे जीवन शुरू होता है।

मन्त्र 3.8

तदभ्यद्रवत्तमभ्यवदत्कोऽसीति वायुर्वा
अहमस्मीत्यब्रवीन्मातरिश्वा वा अहमस्मीति ॥

वायु उसकी तरफ़ दौड़ा। यक्ष ने पूछा: “तुम कौन हो?” वायु ने कहा: “मैं वायु हूँ, मैं मातरिश्वा हूँ”।

वही pattern। अग्नि की तरह वायु ने भी अपनी पहचान बताई। “मैं” वाले identifier दिए।

मन्त्र 3.9

तस्मिँस्त्वयि किं वीर्यमित्यपीदँ
सर्वमाददीय यदिदं पृथिव्यामिति ॥

यक्ष ने पूछा: “तुम में क्या शक्ति है?” वायु ने कहा: “मैं इस पृथ्वी पर जो कुछ भी है, सब को उठा सकता हूँ, उड़ा सकता हूँ”।

उसी तरह का claim। पूरी पृथ्वी को उड़ाने की शक्ति।

मन्त्र 3.10

तस्मै तृणं निदधावेतदादत्स्वेति
तदुपप्रेयाय सर्वजवेन तन्न शशाकादातुं स तत एव
निववृते नैतदशकं विज्ञातुं यदेतद्यक्षमिति ॥

यक्ष ने वायु के सामने वही तिनका रखा और कहा: “इसे उठाओ”। वायु पूरी गति से उस पर टूटा। पर उठा नहीं सका। हार कर वापस आया और बोला: “मैं नहीं जान सका कि यह यक्ष क्या है”।

वही pattern दोहराया गया। अग्नि की तरह वायु भी एक तिनके के सामने हार गया। दो सबसे शक्तिशाली देवता, दोनों हार गए। अब केवल एक बचा था: इन्द्र।

मन्त्र 3.11

अथेन्द्रमब्रुवन्मघवन्नेतद्विजानीहि किमेतद्यक्षमिति तथेति
तदभ्यद्रवत्तस्मात्तिरोदधे ॥

फिर देवताओं ने इन्द्र से कहा: “हे मघवन (इन्द्र का एक नाम, यानी ‘धनी’, ‘उदार’), तुम पता करो कि यह क्या यक्ष है”। इन्द्र ने कहा: “ठीक है”। वो यक्ष की तरफ़ दौड़ा। पर यक्ष उसके सामने से अदृश्य हो गया।

यह बहुत interesting मोड़ है। इन्द्र के सामने यक्ष आँखों से ओझल हो जाता है। यह क्यों? कुछ टीकाकारों के अनुसार, क्योंकि इन्द्र देवताओं का राजा है, और वो सबसे ज़्यादा deserving है इसे समझने का। यक्ष का अदृश्य होना उसकी परीक्षा है। इन्द्र को अब बिना दिखाई दिए ही इसकी खोज करनी पड़ेगी।

मन्त्र 3.12

स तस्मिन्नेवाकाशे स्त्रियमाजगाम बहुशोभमानामुमाँ
हैमवतीं ताँहोवाच किमेतद्यक्षमिति ॥

उसी आकाश में, जहाँ यक्ष था, इन्द्र को एक सुंदर स्त्री मिलीं। बहुत शोभायमान। नाम था उमा हैमवती (हिमालय की पुत्री)। इन्द्र ने उनसे पूछा: “यह क्या यक्ष था?”

उमा यहाँ ज्ञान की देवी की भूमिका में हैं। हिमालय की पुत्री, शिव की पत्नी, पार्वती। उपनिषद् यहाँ एक स्त्री-स्वरूप में ज्ञान को रखता है। यह interesting choice है। इन्द्र को अपने ज्ञान के लिए स्त्री-शक्ति की शरण लेनी पड़ी। यह एक quiet pointer है उस ज्ञान-परंपरा की तरफ़ जो शक्ति को feminine मानती है।

खण्ड 4

उमा का प्रकट होना और उपनिषद् की परिभाषा
उमा ब्रह्म का रहस्य खोलती हैं। फिर उपनिषद् “तद्वनम्” की उपासना सिखाती है, और अंत में उपनिषद् की एक संक्षिप्त परिभाषा देती है।

मन्त्र 4.1

सा ब्रह्मेति होवाच ब्रह्मणो वा एतद्विजये महीयध्वमिति
ततो हैव विदाञ्चकार ब्रह्मेति ॥

उमा ने कहा: “वह ब्रह्म है। और ब्रह्म की ही विजय थी जिसकी महिमा तुम कर रहे थे”। तब इन्द्र को पता चला कि वो ब्रह्म ही था।

यह केनोपनिषद् का climax है। पूरी कहानी इसी एक revelation के लिए बनी थी। देवताओं ने सोचा था कि शक्ति उनकी है। वो एक यक्ष के रूप में आकर उन्हें बताया गया कि शक्ति कहीं और से आती है। और अब उमा ने नाम लेकर बताया कि वो “कहीं और” क्या है: ब्रह्म।

देवताओं की महिमा झूठी नहीं थी। मगर वो उनकी अपनी नहीं थी। जैसे एक चाँद की रोशनी असली रोशनी होती है, मगर असली स्रोत सूरज है। चाँद अगर सोचने लगे कि “यह मेरी अपनी रोशनी है”, तो वो ग़लत है। देवताओं ने यही ग़लती की थी।

मन्त्र 4.2

तस्माद्वा एते देवा अतितरामिवान्यान्देवान्यदग्निर्वायुरिन्द्रस्ते
ह्येनन्नेदिष्ठं पस्पर्शुस्ते ह्येनत्प्रथमो विदाञ्चकार ब्रह्मेति ॥

इसीलिए ये तीन देव, अग्नि, वायु, इन्द्र, बाकी सब देवों से ऊँचे माने जाते हैं। क्योंकि इन्होंने ही ब्रह्म को सबसे क़रीब से छुआ। इन्होंने ही पहले उसे ब्रह्म जाना।

“छूना” यहाँ एक रूपक है। experience की पहली रेखा को छूना। तीनों ने ब्रह्म की वास्तविकता को सीधे feel किया, भले हार के रूप में। बाकी देवों ने तो उससे interaction भी नहीं किया।

मन्त्र 4.3

तस्माद्वा इन्द्रोऽतितरामिवान्यान्देवान्स
ह्येनन्नेदिष्ठं पस्पर्श स ह्येनत्प्रथमो विदाञ्चकार ब्रह्मेति ॥

और इन्द्र इन तीनों में भी सबसे ऊँचा है। क्योंकि इन्द्र ने ब्रह्म को सबसे क़रीब से छुआ, और इन्द्र ने ही पहले उसे “यह ब्रह्म है” ऐसा जाना।

इन्द्र क्यों ऊँचा है? क्योंकि अग्नि और वायु तो हार कर “नहीं जान सका” कह कर वापस गए थे। इन्द्र ने हार नहीं मानी। यक्ष ओझल हुआ, मगर इन्द्र खोजता रहा, उमा से पूछा, जवाब लाया। यानी जिज्ञासा बनी रही, और उत्तर मिला। यही गुण उसे आगे रखता है।

मन्त्र 4.4

तस्यैष आदेशो यदेतद्विद्युतो व्यद्युतदा
इतीन् न्यमीमिषदा इत्यधिदैवतम् ॥

उस ब्रह्म का प्रत्यक्ष लक्षण क्या है? जैसे बिजली चमके, ऐसा क्षणिक चमक के रूप में, या जैसे आँख का एक झपकना। यह adhi-daivika (देव-पक्ष का) उपदेश है, यानी बाह्य प्रकृति में ब्रह्म कैसे दिखता है।

बिजली का रूपक बहुत सटीक है। बिजली एक पल को आसमान भर देती है, सब कुछ दिख जाता है, फिर ओझल। आप उसे पकड़ नहीं सकते, मगर उसकी मौजूदगी से इनकार भी नहीं कर सकते। ब्रह्म भी ऐसा ही अनुभव में आता है। एक झलक, एक चमक, और फिर वो “गोचर” नहीं रहता। पर वो था, यह आपको पता है।

मन्त्र 4.5

अथाध्यात्मं यद्देतद्गच्छतीव च मनोऽनेन
चैतदुपस्मरत्यभीक्ष्णँ सङ्कल्पः ॥

अब adhyaatmika (आत्म-पक्ष का) उपदेश। यह वो है जिसकी तरफ़ मन जाता है (एक प्रकार से), और जिसके कारण मन बार-बार सङ्कल्प (इरादा, याद) करता है।

यह एक subtle psychological observation है। मन में कोई विचार उठता है। यह विचार कहीं से आता है। मन उस “कहीं से” की तरफ़ खिंचा जाता है। यह खिंचाव, यह pull, ब्रह्म की तरफ़ है। हर सोच के पहले एक “I am thinking” की भावना होती है। वो “I am” ब्रह्म का सबसे क़रीबी अनुभव है। हर इरादा (सङ्कल्प) उसी “I am” से शुरू होता है।

तो ब्रह्म दो जगह दिखता है: बाहर बिजली की चमक की तरह, और भीतर हर विचार के पीछे “मैं हूँ” की भावना की तरह।

मन्त्र 4.6

तद्ध तद्वनं नाम तद्वनमित्युपासितव्यं स य एतदेवं वेदाभि
हैनꣳ सर्वाणि भूतानि संवाञ्छन्ति ॥

उसका एक नाम है “तद्वनम्”। “वन” का मतलब है चाहत, इच्छा का विषय। तद्वनम् यानी “वो जो सब चाहते हैं”। उपासना इसी रूप में करनी चाहिए, “तद्वनम्” के रूप में। जो इसको ऐसा जानता है, सारे प्राणी उसकी ओर खिंचे चले आते हैं।

यह एक practical बात है। हर इंसान कुछ चाहता है। पैसा, प्रेम, यश, सुख। हर “चाहत” के पीछे एक deeper चाहत है: स्थायी पूर्णता की। वो स्थायी पूर्णता ब्रह्म है। तो हर इच्छा एक तरह से ब्रह्म की ही तलाश है, गलत रास्तों पर भटकी हुई।

जो इस सच्चाई को जान लेता है, उसका व्यवहार बदल जाता है। वो किसी से कुछ माँगता नहीं, मगर सब उसकी ओर आते हैं। क्योंकि सब को लगता है कि वो जो खोज रहे थे, यह व्यक्ति शायद उस तक पहुँच गया है।

मन्त्र 4.7

उपनिषदं भो ब्रूहीत्युक्ता त उपनिषद्ब्राह्मीं वाव त
उपनिषदमब्रूमेति ॥

शिष्य कहता है: “गुरुदेव, उपनिषद् बताइए”। गुरु कहते हैं: “उपनिषद् कही जा चुकी है। तुम्हें ब्राह्मी उपनिषद् (ब्रह्म-विद्या के बारे में) सुनाई जा चुकी है।”

“उपनिषद्” शब्द का literal मतलब है “पास बैठना”। गुरु के पास बैठकर मिला हुआ रहस्य-ज्ञान। यहाँ गुरु कह रहे हैं कि वो जो रहस्य था, वो खुल चुका है। अब इसके बाद कुछ अलग नहीं बताना है, बस इसी को gathered करना है।

मन्त्र 4.8

तस्यै तपो दमः कर्मेति प्रतिष्ठा वेदाः सर्वाङ्गानि
सत्यमायतनम् ॥

इस उपनिषद् के स्थापन (foundation) क्या हैं? तप (तपस्या, अनुशासन), दम (इन्द्रिय-नियंत्रण), और कर्म (दैनिक कर्तव्य)। वेद इसके अंग हैं (limbs)। और सत्य इसका आयतन है, यानी इसका घर।

यह बहुत practical निर्देश है। ज्ञान केवल book-knowledge से नहीं आता। तीन चीज़ें ज़रूरी हैं। तप: कठिनाई सहने की क्षमता, अपने आप को कुछ कठिन में रखना। दम: अपनी इन्द्रियों को control करना, हर इच्छा का गुलाम न होना। कर्म: रोज़ के काम, अपने धर्म-कर्तव्य निभाना। ये तीनों मिलकर साधक की नींव बनाते हैं।

वेद “अंग” हैं, यानी secondary। मुख्य काम तप-दम-कर्म का है। और सब का घर सत्य है। अगर वाणी और कर्म में सत्य नहीं, तो उपनिषद् का ज्ञान बेकार है।

मन्त्र 4.9

यो वा एतामेवं वेदापहत्य पाप्मानमनन्ते स्वर्गे
लोके ज्येये प्रतितिष्ठति प्रतितिष्ठति ॥

जो इस उपनिषद् को इस तरह जान लेता है, वो अपने पापों को हटाकर अनन्त स्वर्ग-लोक में, सबसे ऊँचे स्थान में स्थापित हो जाता है। और यह स्थापना दोहराई जाती है: प्रतितिष्ठति प्रतितिष्ठति।

अंत में “प्रतितिष्ठति” शब्द दो बार आता है। उपनिषदों में जब कोई शब्द दोहराया जाता है, तो उसका मतलब है “यह बात final है”। यह उपनिषद् का closing seal है।

“स्वर्ग-लोक” यहाँ शाब्दिक स्वर्ग नहीं है। यह वो स्थिति है जहाँ साधक स्वयं को आत्म-स्थित कर लेता है। बाहर की दुनिया जैसी भी हो, उसके अंदर का “घर” स्थिर है। पाप-कर्म उसके आगे नहीं ठहरते, क्योंकि अब वो उन्हें करने वाले “मैं” से अपनी पहचान नहीं रखता।