केनोपनिषद्

साम वेद · तलवकार · उपनिषद्
मन किसके कहने पर दौड़ता है, आँख किसके बल से देखती है? और वह यक्ष कौन था जिसके आगे अग्नि एक तिनका तक न जला सका।
On the celestial horizon a luminous, faceless Yaksha figure materializes above the assembly of victorious devas, who recoil in wonder; radiant aureole, classical Indian painting style.

देवताओं की सभा में उस दिन एक अजीब-सी खामोशी छाई थी। असुरों पर विजय अभी-अभी मिली थी, और देवगण अपनी जीत के नशे में फूले न समा रहे थे। तभी क्षितिज पर एक तेजोमय आकृति प्रकट हुई, एक यक्ष (एक रहस्यमय दिव्य सत्ता), जिसका न कोई परिचय था, न कोई नाम। अग्निदेव (वाणी के अधिष्ठाता) आगे बढ़े, अपनी सारी शक्ति बटोरकर एक तिनके को जलाने चले, और हार गए। वायुदेव (प्राण के स्वामी) उसी तिनके को उड़ा ले जाने पहुँचे, और वे भी विफल लौटे। अंत में देवराज इन्द्र (अहंकार, यानी जीव का प्रतीक) स्वयं उस सत्ता के पास गए, पर वह आकृति उनकी आँखों के सामने से ही ओझल हो गई।

स्वामी कृष्णानन्द के अनुसार यह दृश्य एक ही बात कहता है, कि देवताओं की सारी महिमा, सारा बल, उधार का है, उस आत्मतत्त्व से लिया हुआ। अग्नि जला नहीं पाते, वायु उड़ा नहीं पाते, इन्द्र पकड़ नहीं पाते, क्योंकि उनकी अपनी कोई स्वतन्त्र शक्ति है ही नहीं। जब तक अहंकार नहीं मिटता, तब तक जीव उस परम सत्य के दर्शन नहीं कर पाता, और इसीलिए वह आकृति इन्द्र के सामने आते ही ओझल हो गई।

यही केनोपनिषद् है, साम वेद की तलवकार (जैमिनीय) शाखा से आया हुआ एक छोटा पर गहरे-से-गहरा पाठ। इसका नाम इसके पहले ही शब्द “केन” से पड़ा, जिसका अर्थ होता है “किसके द्वारा”। यह उपनिषद् सीधे जड़ पर हाथ रखता है और पूछता है, इन कानों को सुनने की शक्ति कौन देता है, इस मन को सोचने की प्रेरणा कौन भेजता है, इन प्राणों और इन्द्रियों के पीछे वह कौन-सी अदृश्य सत्ता है जो इन्हें चलाती है।

स्वामी कृष्णानन्द कहते हैं कि यह आत्मा ही मन, प्राण और इन्द्रियों का नियन्ता और प्रेरक है, जो बिना देह और बिना मन के कार्य करता है, और जिसका होना ही इन सब का चलना है। आँख देखती है, पर उस देखने के पीछे जो “देखनेवाला” बैठा है, उसे आँख देख नहीं सकती। मन सोचता है, पर जिस चेतना के सहारे मन सोचता है, उसे मन सोच नहीं सकता। वही प्रेरक तत्त्व इन्द्रियों से परे, पर इन्द्रियों के भीतर ही विराजमान है।

पहले यह उपनिषद् तर्क और मनन से उस अदृश्य प्रेरक की ओर इशारा करता है, फिर बीच में यक्ष और देवताओं की यह छोटी पर मर्मभेदी कथा रखकर वही सत्य अनुभव की भाषा में समझाता है। जो वाणी, मन और आँख की पकड़ में नहीं आता, उसी को जानना मनुष्य के जीवन का असली प्रयोजन है, यही इस पाठ का संकल्प है।

इस उपनिषद् के मुख्य किरदार

देवता (अग्नि, वायु, इन्द्र): जो एक विजय के बाद घमंड में आ गए कि जीत उनके अपने बल से हुई।

यक्ष: एक रहस्यमय आकृति, जो असल में ब्रह्म ही था, देवताओं का घमंड तोड़ने आया।

उमा हैमवती: वह देवी जिसने इन्द्र को बताया कि वह यक्ष कौन था, ब्रह्म।

इन्द्रियों के पीछे कौन

“किसकी प्रेरणा से?” मन-प्राण-वाणी के पीछे

कल्पना कीजिए, एक शान्त आश्रम का प्रांगण है, जहाँ शिष्य गुरु के सामने बैठा है और एक प्रश्न उसके भीतर बहुत दिनों से करवट ले रहा है। यही प्रश्न केनोपनिषद् (वह उपनिषद् जो अपने पहले शब्द “केन”, यानी “किससे, किसकी प्रेरणा से”, पर ही टिका है) के आरम्भ में फूट पड़ता है। शिष्य पूछता है, किसकी इच्छा से यह मन (मनस्, सोचने-विचारने की शक्ति) अपने विषय की ओर दौड़ता है? किसके कहे प्राण (जीवन-शक्ति, साँस की धारा) चलता है? किसने भेजा कि वाणी बोले, आँख देखे, कान सुने? यह सीधा सा जान पड़ता प्रश्न दरअसल पूरी खोज की पहली चिंगारी है।

स्वामी कृष्णानन्द इस प्रश्न को बड़े नाटकीय ढंग से खोलते हैं। वे कहते हैं कि यह उपनिषद् आरम्भ में ही पूछ लेता है, “कौन देख रहा है? कौन सुन रहा है?” हम मान बैठे हैं कि आँख देखती है, कान सुनते हैं, नाक सूँघती है। पर स्वामी जी के अनुसार ऐसा कुछ हो ही नहीं रहा। जो सूँघता है, वह कोई और है। अगर आँख ही देखती होती, तो शव भी देख लेता, क्योंकि शव के पास भी तो आँख की पुतलियाँ हैं। जहाँ जीवन-शक्ति खिंच गई, वहाँ न कोई क्रिया सम्भव है, न कोई अनुभूति। यानी देखने-सुनने का असली स्वामी इन्द्रियाँ नहीं हैं।

फिर स्वामी कृष्णानन्द एक सीढ़ी-दर-सीढ़ी नक्शा खींचते हैं। उनके अनुसार वह विश्वात्मा (समस्त सृष्टि की एक चेतन आत्मा) व्यक्ति की आत्मा के द्वारा काम करती है। पहले वह बुद्धि (निश्चय करने वाली समझ) में झलकती है और ज्ञान बनती है, फिर मन में उतरती है, फिर प्राण रूपी ऊर्जा में, और अन्त में इस देह में। तब जाकर यह देह, जो अपने आप में पंचभूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, यानी पाँच मूल तत्त्व) से बना एक निर्जीव ढाँचा-भर है, जीवित और सुन्दर जान पड़ता है। इसी उधार की रोशनी के बल पर आदमी कहता है, “हम देख रहे हैं, हम जी रहे हैं।”

A seated sage in meditation rendered as a translucent body of light, with a glowing inner witness-flame behind the eyes and ears, depicting the 'ear of the ear, eye of the eye' consciousness.

इसी पर केन का वह वाक्य आता है जिसे स्वामी जी यों सुनाते हैं, “जो आँखों के पीछे रहकर देखता है, जो कानों के पीछे रहकर सुनता है, जो साँस के पीछे रहकर साँस लेता है, जो मन के पीछे रहकर सोचता है, जो बुद्धि के पीछे रहकर समझता है, उसी को पहचानिए।” यही उस सूत्र का मर्म है जिसे परम्परा में “कान का कान, आँख की आँख, मन का मन, वाणी की वाणी” कहा गया है। ये इन्द्रियाँ तो बस झरोखे हैं, देखने-सुनने वाला इनके पीछे बैठा है।

स्वामी कृष्णानन्द यहाँ एक नाज़ुक मोड़ देते हैं। वे कौषीतकि उपनिषद् को साक्षी बनाकर कहते हैं कि वस्तु को जान लेना काफ़ी नहीं है, “समझने वाले को समझिए।” सामने पेड़ है, यह तो आँख बता देती है, पर असली सवाल यह है कि वह समझ किसके बल पर समझ पा रही है? जो समझ को समझता है, उसे जानना उस जानी हुई वस्तु से कहीं अधिक हितकारी है। और यहीं वे एक चेतावनी भी जोड़ते हैं, यह जो चेतना इन सबके पीछे है, वह स्वयं किसी की पकड़ में नहीं आती। न देह सचमुच अपने बल पर जीता है, न इन्द्रियाँ अपने बल पर देखती हैं, न प्राण अपने आप चलता है, न मन स्वतन्त्र होकर सोचता है, न बुद्धि अपने दम पर समझती है। सब उसी एक के प्रकट होने का खेल है।

इस तरह स्वामी जी इस प्रसंग को उस “एक” की ओर मोड़ देते हैं। ऋग्वेद का वचन है, एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति (जो है वह एक ही सत्य है, ज्ञानी उसे अनेक नामों से पुकारते हैं)। उसी एक अस्तित्व की झलक इन सब रंगों, रूपों, हलचलों में है। हमारा होना, आपका होना, इस मेज़ का होना, सब उसी विश्व-अस्तित्व में हिस्सेदारी-भर है। स्वामी कृष्णानन्द के शब्दों में, असल में वही परम है, और कुछ भी अपने बूते नहीं है। मन-प्राण-वाणी के पीछे की वह चेतना ही पहचानने योग्य है।

सार: देखने का दावा आँख करती है, पर देखने वाला आँख नहीं। साँस, वाणी, मन, बुद्धि, ये सब झरोखे हैं; इनके पीछे बैठी एक चेतना से ही ये चलते हैं। बाहर की वस्तु को जानने में उम्र बीत जाती है, और जो जानने वाला है, उसी की ओर हम कभी मुड़ते नहीं। केनोपनिषद् का पहला इशारा यही है, झरोखे को मत गिनिए, झरोखे के पीछे झाँकिए।

जिसे मन नहीं सोच सकता, पर जिससे मन सोचता है

केनोपनिषद् का पहला खंड एक अनोखे सवाल से खुलता है। शिष्य अपने आचार्य (गुरु, ज्ञान देने वाले) से पूछता है, किसके बल पर मन उड़ता है, किसके इशारे पर प्राण (जीवन की साँस) चलता है, किसकी प्रेरणा से वाणी बोलती है, और किसके आगे आँख-कान अपना काम करते हैं? सवाल मामूली नहीं है। हम सब दिन भर देखते, सुनते, सोचते हैं, पर रुककर यह कभी नहीं पूछते कि इन सबको चला कौन रहा है। यहीं उपनिषद् हमारा हाथ पकड़कर भीतर की ओर मोड़ता है।

उत्तर जो आता है, वह पहले तो निराश करता है। केन 1.3 कहता है, वहाँ न आँख पहुँचती है, न वाणी, न मन। हम यह भी नहीं जानते कि उसे किसी और को कैसे समझाएँ, क्योंकि वह ज्ञात (जो जाना जा चुका) से अलग है और अज्ञात (जो अभी जाना नहीं) से भी परे है। स्वामी कृष्णानन्द इस मन्त्र को बहुत बारीकी से खोलते हैं। उनके अनुसार आँख, वाणी और मन ये सब किरण की तरह हैं जो जानने वाले से बाहर की ओर फेंकी जाती हैं, भीतर की ओर नहीं। ये सब वस्तुओं (विषय, बाहर पड़ी चीज़ों) को दिखाते हैं, उस द्रष्टा (देखने वाले) को नहीं जिससे ये निकलती हैं।

स्वामी कृष्णानन्द एक सीधा-सा दृष्टान्त देते हैं। जैसे आग ख़ुद को नहीं जला सकती, वैसे ही आत्मा (अपना असली स्वरूप, वह चेतना जो सबकी जड़ है) इन साधनों से ख़ुद को नहीं जान सकती। आँख हर रंग दिखा देगी, पर अपने को नहीं देख पाती। मन हर विचार पकड़ लेगा, पर जिस आधार पर विचार उठते हैं उसे नहीं पकड़ पाता। इसी कारण उपनिषद् कहता है कि ब्रह्म (वह परम सत्य, सबका मूल) न ज्ञात है न अज्ञात। ज्ञात इसलिए नहीं कि उसे जानने का कोई साधन ही नहीं, हमारे सारे साधन नश्वर (नाशवान) हैं और जो नश्वर है वह अविनाशी तक नहीं पहुँच सकता। और अज्ञात भी इसलिए नहीं कि वह तो हर जानने में पहले से मौजूद है, हर अनुभव की नींव में बैठा हुआ। स्वामी जी कहते हैं, आत्मा हर ज्ञान में एक मान ली गई बात की तरह उपस्थित रहता है, उसके बिना कोई जानना सम्भव ही नहीं।

दूसरा खंड इसी बात को और तीखा कर देता है। केन 2.1-2.3 में आचार्य एक उलट-पुलट देने वाली घोषणा करते हैं। जो आदमी कहता है कि मैं ब्रह्म को भली-भाँति जानता हूँ, वह असल में नहीं जानता। और जो कहता है कि मैं नहीं जानता, वह कुछ-कुछ जानता है। स्वामी कृष्णानन्द इस उलटबाँसी को सुलझाते हैं। उनके अनुसार जो भी जाना जाता है वह वस्तु बन जाता है, जानने वाले के सामने रखी एक अलग चीज़। पर आत्मा तो सबका ज्ञाता (जानने वाला) है, उसे किसी और के सामने वस्तु की तरह रखा ही नहीं जा सकता। इसलिए जैसे ही कोई कहता है मैंने उसे जान लिया, उसने उसे एक सीमा में बाँध दिया, एक नापी-तौली चीज़ बना दिया, और यहीं वह चूक गया।

तो फिर जो कहता है मैं नहीं जानता, वह क्यों कुछ जानता है? स्वामी जी समझाते हैं कि यह इनकार दरअसल एक गहरी पहचान है। वह आदमी इतना जान चुका है कि ब्रह्म कोई पकड़ में आने वाली वस्तु नहीं। जानना हमेशा दो पर टिकता है, जानने वाला और जाना जाने वाला। पर आत्मा अद्वैत (बिना दूसरे का, एक ही) है, वहाँ जानने वाले से अलग कोई दूसरा बचता ही नहीं जिसे जाना जाए। स्वामी कृष्णानन्द साफ़ कहते हैं, ब्रह्म का थोड़ा-सा ज्ञान जैसी कोई चीज़ नहीं होती, उसे टुकड़ों में नहीं बाँटा जा सकता, या तो पूरा या कुछ नहीं। इसलिए जो डींग हाँकता है उसने अपने मन की एक छवि को ब्रह्म समझ लिया है, और जो विनम्रता से ठहर जाता है वह सच के क़रीब खड़ा है।

इस पूरे प्रसंग का मर्म स्वामी कृष्णानन्द एक वाक्य में रख देते हैं। वह कहते हैं, यह आत्मा सबका ज्ञाता है और किसी से जाना नहीं जाता। आँख इसी से देखती है पर इसे नहीं देख सकती, मन इसी से सोचता है पर इसे नहीं सोच सकता, वाणी इसी से बोलती है पर इसका वर्णन नहीं कर सकती। जिस चेतना के बल पर हम हर चीज़ जानते हैं, वही चेतना हमारी पकड़ से इसलिए बाहर है क्योंकि वह हमसे दूर नहीं, हम ख़ुद वही हैं।

सार: जिसे हम जानना चाहते हैं, उसे वस्तु बनाकर सामने रखना पड़ता है, और आत्मा कभी वस्तु नहीं बनता, वह तो जानने वाला ख़ुद है। इसीलिए जो दावा करे कि उसने ब्रह्म को पूरी तरह जान लिया, वह चूक गया, और जो विनम्र होकर ठहर जाए कि यह पकड़ में आने वाली चीज़ नहीं, वह सच के पास आ गया। जिससे मन सोचता है उसे मन से नहीं सोचा जा सकता, क्योंकि वह आप ख़ुद हैं।

यक्ष की कथा

देवता और यक्ष: घमंड का टूटना

स्वर्ग में अभी-अभी एक बड़ा युद्ध थमा है। देवताओं और असुरों के बीच ठनी थी, और इस बार जीत देवताओं की हुई। देवता फूले नहीं समा रहे। वे अपनी ही पीठ ठोंक रहे हैं, “देखिए, हमने विजय पाई, हमारे ही बल से यह सब हुआ।” यहीं से केनोपनिषद् का वह प्रसंग खुलता है जिसे यक्षोपाख्यान (यक्ष की कथा) कहते हैं। स्वामी कृष्णानन्द कहते हैं कि यह उपनिषद् हम सब से एक सीधा सवाल पूछता है, हम दिन-रात कहते रहते हैं “हमने यह खेत जोता, हमने यह वृक्ष लगाया, हमने युद्ध जीता”, पर क्या हम वाक़ई इसके कर्ता हैं?

Agni the fire-god, blazing and straining with full force over a single small straw on the ground that remains untouched and unburnt, the mysterious Yaksha watching from the tree.

परम सत्ता, जो इस सारे ब्रह्माण्ड की आत्मा है, ने देखा कि देवता घमंड में चूर हैं और सारी शक्ति को अपनी समझ बैठे हैं। उसने सोचा, इन्हें एक सबक़ देना होगा। वह एक यक्ष (एक रहस्यमय, अचरज भरी आकृति) का रूप धरकर देवताओं के निवास के पास एक वृक्ष की चोटी पर आ बैठी। देवता हैरान कि यह विचित्र आकृति कौन है। वे अपने राजा इन्द्र (देवताओं के अधिपति) के पास पहुँचे। इन्द्र ने पहले भेजा अग्नि (आग के देवता) को, जिनकी ताक़त ऐसी कि सारी पृथ्वी राख कर दें। यक्ष ने पूछा, “आप कौन हैं, और क्या कर सकते हैं?” अग्नि ने डींग मारी, “हम सब कुछ जलाकर भस्म कर सकते हैं।” यक्ष ने सामने एक तिनका रख दिया, “इसे जला दीजिए।” अग्नि अपनी सारी शक्ति झोंक बैठे, पर वह तिनका हिला तक न पाए, जलाना तो दूर। वे लौट आए, यह कहते हुए कि “हम समझ ही न सके कि वह कौन था।”

The golden radiant goddess Uma Haimavati appearing in the empty space before a humbled, listening Indra, revealing with a gesture that the vanished Yaksha was Brahman; Himalayan backdrop.

फिर इन्द्र ने वायु (हवा के देवता) को भेजा, जो समूची धरती को उड़ा ले जाने का दम भरते थे। यक्ष ने वही तिनका उनके आगे रखा, “इसे उड़ाकर दिखाइए।” वायु ने पूरा ज़ोर लगाया, पर तिनका टस-से-मस न हुआ। वायु भी हारकर लौटे। अन्त में स्वयं इन्द्र चले। पर इन्द्र के पहुँचते ही यक्ष अदृश्य हो गया। उसी स्थान पर प्रकट हुईं उमा हैमवती (हिमालय की पुत्री, ब्रह्म की ज्ञानमयी शक्ति, देवी)। उन्होंने इन्द्र को बताया, “जिसे आपने देखा, वह तो स्वयं परम सृष्टिकर्ता ब्रह्म था। आप इस भ्रम में थे कि असुरों पर विजय आपने पाई। आप तो एक तिनका भी नहीं उठा सकते। सारा बल उसी सत्ता का था, वही आपके भीतर से काम कर रही थी, और आपको लगा कि कर्ता आप हैं।”

स्वामी कृष्णानन्द इस कथा को घमंड के टूटने की कथा मानते हैं, और इसका एक-एक पात्र उनके लिए हमारे ही भीतर की किसी शक्ति का प्रतीक है। उनके अनुसार यक्ष परम ब्रह्म है, अग्नि वाणी (बोलने की शक्ति) है, वायु प्राण और मन है, इन्द्र अहंकार यानी जीव है, और उमा ज्ञान है। उनका मर्म यह है कि किसी व्यक्ति की शक्ति, बड़प्पन और महिमा उसकी अपनी होती ही नहीं, वह आत्मा से उधार ली हुई होती है। यही उधार की चमक हमें यह भुलावा देती है कि हम बड़े हैं, हम ज्ञानी हैं, हम बलवान हैं। वाणी बोल सकती है, प्राण हरकत दिखा सकता है, मन सोच सकता है, पर इनमें से कोई उस सत्य को छू तक नहीं सकता। इसीलिए अग्नि और वायु, देवताओं में अग्रणी होकर भी, एक तिनके के आगे हार गए।

इन्द्र के पहुँचते ही यक्ष का ओझल हो जाना, स्वामी कृष्णानन्द के लिए, इस कथा का गहरे-से-गहरा संकेत है। अहंकार उस परम रूप के सामने आमने-सामने नहीं ठहर सकता, जैसे नमक की गुड़िया समुद्र की थाह लेने उतरे और स्वयं घुलकर लोप हो जाए। जब इन्द्र (अहंकार) पास आता है तो दृश्य रूप तिरोहित हो जाता है, क्योंकि अहंकार ही वह घमंड का केंद्र है जिसके आगे दिव्यता प्रकट नहीं होती। पर जो अहंकार हार से घबराकर भागता नहीं, डटा रहता है, उसके आगे ज्ञान का उदय होता है। यही उमा हैं, स्वामी जी कहते हैं, क्योंकि दिव्यता से पहले उसकी शक्ति (सत्त्वगुण, मन की वह निर्मल अवस्था जहाँ अहंकार धुल चुका हो) प्रकट होती है। उमा भी जब विलीन होती हैं, यानी जब वह आख़िरी झीनी अवस्था भी पार हो जाती है, तभी यक्ष का असली स्वरूप, शुद्ध ब्रह्म, खुलता है। दृश्य का मिटना, स्वामी जी के शब्दों में, जैसे सारी चेतना का मर जाना जान पड़ता है, पर असल में वही शाश्वत चेतना का द्वार है।

स्वामी कृष्णानन्द इसी से एक और सबक़ निकालते हैं, अहंकार का बार-बार टूटना ही सिद्ध करता है कि वह असली नहीं है। जो सचमुच होता, वह अपने हर प्रयास में सफल होता। अहंकार तो हर पल किसी न किसी ओर से कुचला जाता है, और इस संसार का सारा शोक इसी अहंकार के कुचले जाने की पीड़ा है। ब्रह्म को सबक़ देने के लिए कोई विराट डरावना रूप धरना ज़रूरी नहीं, वह हर जीव के घमंड के नाप का रूप, ठीक उसी जगह, उसी क्षण धर लेता है। और जैसे यह सत्य देवताओं के लिए था, वैसे ही स्वामी जी श्रीकृष्ण और अर्जुन का उदाहरण देते हैं, जिस अर्जुन के गांडीव धनुष के आगे धरती काँपती थी, वही कृष्ण के देहत्याग के बाद एक छड़ी तक न उठा सका, क्योंकि भीतर बैठी वह व्यापक शक्ति, कृष्ण, हट चुकी थी। सच तो यह है, स्वामी जी कहते हैं, कि ब्रह्म ही है, और कुछ नहीं।

सार: जिस बल पर हम अकड़ते हैं, वह हमारा अपना है ही नहीं, आत्मा से उधार लिया हुआ है। अग्नि एक तिनका न जला पाए, वायु उसे हिला न सके, क्योंकि कर्ता वे थे ही नहीं। घमंड का गल जाना कोई हानि नहीं, वही वह द्वार है जहाँ से असली स्वरूप, परम ब्रह्म, खुलकर सामने आता है।

ब्रह्म वही है, जिसे लोग पूजते हैं वह रूप नहीं

हाल यह है कि देवताओं के बीच एक अद्भुत यक्ष (एक दिव्य, अनजानी आकृति) प्रकट हुआ, और किसी को समझ न आता था कि वह कौन है। अग्नि (वाणी के अधिष्ठाता देव) और वायु (प्राण के देव) अपनी सारी शक्ति लेकर उसके सामने गए, मगर एक तिनका तक न हिला सके और लज्जित होकर लौट आए। तब इन्द्र (देवराज, यहाँ अहंकार और जीव के प्रतीक) स्वयं उस ओर बढ़े, पर जैसे ही वे पास पहुँचे, वह आकृति उसी क्षण ओझल हो गई। उसी रिक्त आकाश में एक तेजस्वी स्त्री-रूप उभरा, उमा हैमवती (हिमालय की पुत्री, यहाँ ज्ञान की शक्ति का स्वरूप), और उन्होंने इन्द्र को वह बात बताई जिस पर यह सारा उपनिषद् टिका हुआ है।

स्वामी कृष्णानन्द के अनुसार उमा हैमवती ने इन्द्र से कहा, “आपने अभी जो देखा, वह स्वयं परम सृष्टिकर्ता थे। आप इस भ्रम में पड़े थे, और यह बड़ी भारी भूल थी, कि राक्षसों पर विजय आपने पाई। आप में बल कहाँ है? आप तो एक तिनका तक नहीं उठा सकते। सारा बल उसी सत्ता से आया था, वही आपके भीतर से काम कर रहा था, और आप समझ बैठे कि करनेवाले आप हैं।” स्वामी जी इसे अहंकार के दमन का दृश्य कहते हैं। यक्ष यहाँ परब्रह्म (वह परम सत्ता जो सबका मूल है) का प्रतीक है, और उमा वह पहला ज्ञान है जो दिव्यता के साक्षात्कार से ठीक एक सीढ़ी नीचे ठहरा है।

स्वामी कृष्णानन्द यहाँ श्रीकृष्ण और अर्जुन का दृष्टान्त भी देते हैं। अर्जुन के सामने कोई खड़ा न हो पाता था, उनका गाण्डीव उठते ही धरती काँप जाती थी, पर जब श्रीकृष्ण इस लोक से विदा हुए, तो वही अर्जुन एक छड़ी तक न उठा सके। बल भीतर बैठी उस व्यापक सत्ता का था, अर्जुन तो केवल निमित्त (माध्यम, औज़ार) थे। इसी से स्वामी जी का सार निकलता है, “जो है, वह ब्रह्म ही है, और कुछ नहीं।” व्यक्ति की महिमा, ज्ञान और शक्ति उसकी अपनी नहीं, सब आत्मा से उधार ली हुई है।

इसी संवाद की धुरी पर यह उपनिषद् वह वाक्य कहता है जो परम्परा में बार-बार दोहराया जाता है, “तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि” (उसी को आप ब्रह्म जानिए)। उमा का संकेत यही था कि इस जगत् में लोग जिन रूपों को, जिन शक्तियों और देवताओं को पूजते हैं, ब्रह्म उन रूपों में नहीं समाता। जिस सत्ता के बल से अग्नि जलते, वायु बहते और इन्द्र विजय पाते हैं, जो हर पूजा के पीछे का असली आधार है, वही ब्रह्म है। पूजा की वस्तु नहीं, पूजा को सम्भव बनानेवाली चेतना, वही जानने योग्य है।

A single brilliant lightning flash splitting a deep-dark night sky, illuminating a solitary meditating seeker for one instant, evoking the fleeting glimpse of Brahman within.

परम्परा (शंकर-भाष्य की मुख्यधारा) इस झलक को बिजली की कौंध जैसा बताती है। जैसे घने अँधेरे में बिजली एक पल को कौंधती है और सारा दृश्य क्षण-भर के लिए उजागर कर देती है, या जैसे पलक एक बार झपकती है, वैसे ही ब्रह्म की झलक मिलती है, अकस्मात्, बहुत थोड़ी देर के लिए, और फिर मन उसे पकड़ नहीं पाता। यह झलक बाहर के देवताओं में नहीं, अपने ही भीतर अधिष्ठान (आन्तरिक आधार) पर मिलती है, जहाँ चेतना अपनी ओर मुड़ती है।

पर यह झलक यूँ ही, बिना तैयारी के, ठहरती नहीं। परम्परा कहती है कि इस ज्ञान की नींव तप (आत्म-तपन, साधना का ताप), दम (इन्द्रियों का संयम) और कर्म (निष्काम सेवा-कर्म) पर रखी जाती है, और सत्य इस सबका आधार है। जिसका जीवन इन पर सधा हुआ है, उसी का मन उस कौंध को झेलने और उसमें ठहरने योग्य बनता है। ज्ञान का फल आत्म-दर्शन है, और उस फल तक का मार्ग इन्हीं अनुशासनों से होकर जाता है।

सार: जिस सत्ता के बल से आप देखते, सुनते और जीतते हैं, ब्रह्म वही है, न कि वे रूप जिन्हें यह जगत् बाहर खड़े होकर पूजता है। उसकी झलक बिजली की कौंध-सी क्षण-भर की होती है, अपने ही भीतर मिलती है, और तप, दम, कर्म तथा सत्य की नींव पर ही वह मन में ठहरती है।

और अन्त में, अपनी ओर

कल्पना कीजिए कि शिष्य गुरु के सम्मुख बैठा है, और सारा प्रश्न जो उसके भीतर उमड़ रहा है, वही है जिससे यह केनोपनिषद् (केन अर्थात् “किससे”, वह उपनिषद् जो पूछता है कि किसकी प्रेरणा से मन दौड़ता है) आरम्भ होता है। किसके कहने पर मन विषय की ओर भागता है? किस चेतना से आँख देखती, कान सुनता, साँस चलती है? शिष्य सोचता है कि जैसे वह बाहर की हर वस्तु को जान लेता है, वैसे ही इस भीतर बैठे जानने वाले को भी पकड़ लेगा, नाप लेगा, “जान” लेगा। और ठीक यहीं वह ठिठक जाता है, क्योंकि जिसे वह पकड़ना चाहता है, वह तो पकड़ने वाला हाथ ही है।

स्वामी कृष्णानन्द इसी मोड़ को खोलकर रखते हैं। वे कहते हैं कि हमारे जानने के सब साधन (आँख, कान, मन, बुद्धि) केवल विषयों को प्रकट करते हैं, जानने वाले को नहीं। आत्मा तो वह “कान का कान, मन का मन, आँख की आँख” है (अर्थात् वह चेतना जिसके बल पर ही कान सुनता और मन सोचता है), इसलिए वह स्वयं किसी इन्द्रिय का विषय कभी नहीं बन सकता। स्वामी जी के अनुसार जिस क्षण आप उस चेतना को सामने रखकर “वस्तु” बनाने चलते हैं, उसी क्षण आप जानने वाले और जाने जाने वाले का भेद गढ़ देते हैं, और वह तो अद्वैत (जहाँ दो नहीं) है, उसका स्वभाव ही इस भेद को नकार देता है। जो परम विषयी (देखने-सुनने वाला स्वयं) है, उसे विषय बनाने की हर कोशिश उलटी पड़ती है।

तो उपाय क्या है? स्वामी कृष्णानन्द कहते हैं कि यह बात केवल सोच लेने की नहीं, अनुभव में उतरने की है। सोचना और अनुभव करना जब एक हो जाते हैं, तब वह अन्तर्ज्ञान (भीतर से उठा सीधा बोध) बनता है, और वह गहरे ध्यान से ही आता है। उस चेतना को बाहर से जोड़कर पाया नहीं जाता, अपनेपन की दीवार को धीरे-धीरे घुलने देकर उसी में ठहरा जाता है। वह स्वयं अपने को जानती है (सत्-चित्-आनन्द, होना-जानना-आनन्द), किसी दूसरे की तरह नहीं। इसीलिए परम्परा की वह टेक यहाँ सार्थक हो उठती है, प्रज्ञानं ब्रह्म (चेतना ही ब्रह्म है), तत्त्वमसि (वह तत्त्व आप ही हैं)। जिसे आप खोजने निकले थे, खोजने वाला वही था।

सार: जिस चेतना से आप देखते, सुनते, सोचते हैं, उसे वस्तु की तरह पकड़ने मत जाइए, क्योंकि पकड़ने वाला वही है। उसे जानना नहीं, उसी में ठहरना है, और वह ठहराव खोज नहीं, घर लौटना है।

व्याख्या मुख्यतः स्वामी कृष्णानन्द (दिव्य जीवन संघ) की केनोपनिषद् पर व्याख्या पर आधारित।