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केन उपनिषद्: किसके भेजे मन जाता है

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सामवेद · केन उपनिषद्
मन को किसने भेजा, यह पूछने वाला यह उपनिषद् आगे चलकर एक कथा बन जाता है, जिसमें अग्नि एक तिनका नहीं जला पाते और उमा हैमवती नाम खोलती हैं।

साम का एक लम्बा स्वर अभी थमा है। गाने वाला चुप है, सुनने वाले चुप हैं, और उस चुप्पी के भीतर से एक प्रश्न उठता है जिसका पूछने वाला मूल में बेनाम रह जाता है। प्रश्न यह नहीं है कि देवताओं में बड़ा कौन है, और यह भी नहीं कि यज्ञ का फल कितना मिलेगा। प्रश्न इतना ही है कि अभी-अभी जो मन उस स्वर के पीछे दौड़ पड़ा, उसे दौड़ाया किसने। “केनेषितं पतति प्रेषितं मनः”, किसकी इच्छा से भेजा हुआ यह मन जाता है। सवाल पूछने वाला अपने ही भीतर उँगली रख रहा है, और जब तक इसका उत्तर न आये, बाकी सब सुना-सुनाया ही रहता है।

यह उपनिषद् सामवेद की तलवकार शाखा के ब्राह्मण में बैठा है, इसीलिए इसे तलवकार उपनिषद् भी कहा जाता है। नाम इसके पहले ही शब्द से पड़ा, केन, यानी किससे। पूरा उपनिषद् चार खण्डों का है और उसकी बनावट में एक सुन्दर मोड़ है: पहले दो खण्ड छन्द में हैं और सवाल-जवाब की तरह चलते हैं, आख़िरी दो खण्ड गद्य में हैं और सीधे कथा बन जाते हैं। जो बात पहले आधे में इशारों और निषेधों से कही गयी, वही दूसरे आधे में देवताओं के साथ घटती है, और उन्हें वह चोट खाकर समझ में आती है। इस मोड़ को पकड़ लीजिए, तो यह उपनिषद् अपने आप खुलने लगता है।

इस उपनिषद् के मुख्य किरदार

पूछने वाला: मूल में इसका नाम नहीं आता। बस प्रश्न आता है, और उसी प्रश्न से सारा पाठ चलता है।

बताने वाला: जो उत्तर में एक और सवाल खड़ा कर देता है, और अपनी सीमा मानने से नहीं हिचकता।

यक्ष: वह अनजानी उपस्थिति जो देवताओं के सामने प्रकट होती है। खण्ड 4 में पता चलता है कि वह ब्रह्म ही था।

अग्नि: जिन्हें जातवेदा भी कहा गया, जो सब कुछ जला देने का दावा लेकर आगे बढ़ते हैं।

वायु: जिन्हें मातरिश्वा भी कहा गया, जो सब कुछ उड़ा ले जाने का दावा लेकर आगे बढ़ते हैं।

इन्द्र: देवों के मघवा, जिनसे यक्ष बात तक नहीं करता, और जो इसी कारण सबसे पहले पहचान लेते हैं।

उमा हैमवती: आकाश में मिली वह अत्यन्त शोभायमान स्त्री, जिनके तीन शब्दों से सारी गुत्थी खुलती है।

किसके भेजे मन दौड़ पड़ता है (खण्ड 1, मन्त्र 1)

पहला मन्त्र चार सवाल एक साथ रखता है, और चारों एक ही दिशा में उँगली उठाते हैं। किसकी प्रेरणा से भेजा हुआ मन जाता है। किसके जोड़े जाने पर यह पहला प्राण चलता है। किसकी इच्छा से लोग यह वाणी बोलते हैं। और आँख तथा कान को कौन देव जोत देता है। आख़िरी पंक्ति में जो क्रिया आती है, युनक्ति, वह जोतने की क्रिया है, वैसे ही जैसे सारथी घोड़ों को रथ में जोतता है। यानी आँख और कान अपने आप नहीं चलते, कोई उन्हें जोतता है, और मन्त्र उसी जोतने वाले का पता पूछ रहा है।

ध्यान दीजिए कि यह सवाल कितना उलटा है। हम सुबह से रात तक यही पूछते रहते हैं कि मन कहाँ गया, किस चीज़ पर अटका, किस बात पर बिगड़ा। हमारी सारी जाँच उस वस्तु की जाँच रहती है जिस पर मन जाकर बैठा। यह मन्त्र वस्तु की तरफ़ देखता ही नहीं। वह पीछे मुड़कर देखता है और पूछता है कि भेजा किसने। एक ही प्रश्न में सारी खोज की दिशा घूम जाती है, बाहर से भीतर की ओर, दृश्य से देखने वाले की ओर।

और इस सवाल में जो चीज़ें गिनायी गयी हैं, वे भी चुनकर ली गयी हैं। मन, प्राण, वाणी, आँख, कान। यही पाँच हमारे पास हैं। इन्हीं से हम जगत को नापते हैं, इन्हीं से उसे बोलते हैं, इन्हीं से अपने होने का सबूत इकट्ठा करते हैं। जब कोई पूछता है कि आप कौन हैं, तो हम इन्हीं पाँच की गवाही देते हैं: हम सोच रहे हैं, हम साँस ले रहे हैं, हम बोल रहे हैं, हम देख रहे हैं, हम सुन रहे हैं। मन्त्र ठीक इन्हीं पाँच गवाहों को कठघरे में बुला लेता है और उनसे उनके मालिक का नाम पूछता है।

एक छोटा-सा प्रयोग कीजिए। आज शाम कुछ पढ़ने बैठिए और देखिए कि तीसरी पंक्ति तक पहुँचते-पहुँचते मन कहाँ चला गया। शायद कल की किसी बात पर, शायद किसी अधूरे हिसाब पर। अब पूछिए कि वहाँ जाने का आदेश किसने दिया। आपने तो नहीं दिया, क्योंकि आप तो पढ़ना चाहते थे। मन ने अपने आप भी नहीं लिया, क्योंकि मन उतनी देर बाद ख़ुद ही लौटकर शर्मिन्दा होता है। तो बीच में कोई और है, जिसके भेजे वह जाता है और जिसके खींचे वह लौटता है। इसी को यह उपनिषद् पहले शब्द से पकड़ता है।

और एक बात इस मन्त्र में छिपी है। पूछने वाला किसी देवता का नाम नहीं माँग रहा। अगर उत्तर में कोई नाम आ जाता, कोई इन्द्र, कोई वरुण, तो सवाल हल नहीं होता, बस एक क़दम आगे खिसक जाता। नाम मिलते ही अगला सवाल खड़ा हो जाता कि उस नाम वाले को किसने भेजा। इसलिए जो उत्तर आने वाला है, वह नाम की जगह एक और ही तरह की चीज़ देगा, और वहीं से इस उपनिषद् की असली कठिनाई शुरू होती है।

सार: पहला मन्त्र वस्तु से हटकर भेजने वाले का पता पूछता है। मन, प्राण, वाणी, आँख और कान, जिन पाँचों की गवाही पर हम अपने होने का दावा करते हैं, उन्हीं से उनके जोतने वाले का नाम माँगा जा रहा है। नाम वाला उत्तर यहाँ काम नहीं आयेगा, और पूछने वाला यह जानता है।

कान का कान, मन का मन (खण्ड 1, मन्त्र 2 से 4)

उत्तर आता है और किसी का नाम नहीं लेता। “श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो मनः”, वह कान का कान है और मन का मन, वाणी की वाणी है, प्राण का प्राण और आँख की आँख। पाँच सवालों के बदले पाँच नाम नहीं दिये गये, उन्हीं पाँच को दोहरा दिया गया, हर एक के पीछे एक और उसी नाम का रख दिया गया। सुनने में यह पहेली जैसा लगता है, पर इसमें एक बहुत ठोस बात है।

कान क्या करता है। कान हवा की लहर पकड़ता है। कान ने कभी कुछ नहीं सुना, कान के पास सुनने का कोई तरीक़ा नहीं। सुनना उस जगह होता है जहाँ वह लहर अर्थ बन जाती है, और वह जगह कान से आगे है। नींद में भी कान खुले रहते हैं, हवा की लहरें उनमें गिरती रहती हैं, पर सुनने वाला वहाँ नहीं होता, इसलिए कुछ सुनायी नहीं देता। तो कान के भीतर एक और कान है, और उपनिषद् ठीक उसी को गिना रहा है। यही बात आँख की है, यही मन की। मन विचार उठाता है, पर विचार को देखता कौन है। जब आप कहते हैं कि आज मन बेचैन है, तो बेचैनी मन में है और उसे देखने वाला उससे अलग खड़ा है।

इसी मन्त्र का दूसरा हिस्सा और आगे ले जाता है। जो धीर हैं, वे अतिमुच्य होकर, यानी इन सबसे अपनी पकड़ छोड़कर, इस लोक से जाते हुए अमृत हो जाते हैं। अतिमुच्य शब्द बहुत प्यारा है, इसमें छोड़ने का भाव है, ऊपर से पार निकल जाने का भाव है। कान को फेंक देना नहीं कहा गया, कान के साथ जो चिपकन है उसे ढीला करना कहा गया, यह मान लेना कि सुनने वाला कान की मिल्कियत नहीं है।

और फिर तीसरा मन्त्र आता है, जो इस पूरे उपनिषद् की सबसे ईमानदार पंक्ति है। “न तत्र चक्षुर्गच्छति न वाग्गच्छति नो मनः”, वहाँ आँख नहीं जाती, वाणी नहीं जाती, मन भी नहीं जाता। और इसके तुरन्त बाद बताने वाला अपने बारे में कहता है कि हम जानते नहीं, हम समझते नहीं कि इसका उपदेश किस तरह किया जाये। सोचिए, कोई आचार्य बीच पाठ में यह कह दे कि इसे पढ़ाने का तरीक़ा हमें मालूम नहीं। किसी और शास्त्र में ऐसा वाक्य ढूँढ़ना कठिन है। पर यहाँ यह हार नहीं है, यह उस विषय की सही नाप है। जिसे वाणी छू नहीं सकती, उसे वाणी सिखाये कैसे।

इसी बेबसी में से चौथा मन्त्र निकलता है, और वह एक ऐसी परिभाषा देता है जो हर तरफ़ से दरवाज़ा बन्द कर देती है। “अन्यदेव तद्विदितादथो अविदितादधि”, वह ज्ञात से भी दूसरा है और अज्ञात से भी परे है। ज्ञात से दूसरा, यह तो समझ में आता है, क्योंकि जो कुछ हमने जान रखा है वह सब वस्तु है और वह वस्तु नहीं। पर अज्ञात से भी परे क्यों। इसलिए कि अज्ञात भी एक वस्तु ही है, बस अभी हमारी सूची में दर्ज नहीं हुई। समुद्र की तह में कोई मछली है जिसे हम नहीं जानते, वह अज्ञात है, और कल जाल में आ जाये तो ज्ञात हो जायेगी। जिसकी बात यहाँ चल रही है, वह उस सूची में कभी नहीं आयेगा, न इस तरफ़ से न उस तरफ़ से, क्योंकि सूची बनाने वाला वही है।

मन्त्र अपनी बात अपने बल पर नहीं कहता। वह जोड़ता है कि यह हमने पूर्वजों से सुना है, उन्होंने हमें यही समझाया। एक पूरी परम्परा अपने कन्धे इस वाक्य के नीचे लगा देती है। यह विनय भी है और प्रमाण भी, क्योंकि जिस बात को इन्द्रियाँ जाँच नहीं सकतीं, उसकी गवाही उन लोगों की क़तार ही है जो इस रास्ते पहले चल चुके।

सार: उत्तर में कोई नाम नहीं आता, इन्द्रियों के पीछे उन्हीं का एक और रूप रख दिया जाता है: कान का कान, मन का मन। फिर साफ़ कह दिया जाता है कि वहाँ आँख, वाणी और मन का रास्ता नहीं, और यह भी कि उसे पढ़ाने का तरीक़ा बताने वाले को भी नहीं आता। वह ज्ञात से दूसरा है और अज्ञात से भी परे, और यह बात पूर्वजों से सुनी हुई है।

जिससे वाणी बोलती है, उसी को ब्रह्म जानिए (खण्ड 1, मन्त्र 5 से 9)

अब पाँच मन्त्र आते हैं जो एक ही साँचे में ढले हैं, और उनकी आख़िरी पंक्ति पाँचों बार ज्यों की त्यों लौटती है। पहला कहता है कि जो वाणी से बोला नहीं जाता और जिससे वाणी बोली जाती है, उसी को ब्रह्म जानिए। दूसरा वही बात मन के लिए कहता है: जिसे मन सोच नहीं पाता और जिससे मन सोचा जाता है। तीसरा आँख के लिए, चौथा कान के लिए, पाँचवाँ प्राण के लिए। हर बार वही मोड़, पहले इन्कार, फिर स्रोत, और फिर वही एक पंक्ति।

वह पंक्ति है “तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते”, उसी को आप ब्रह्म जानिए, और जिसकी उपासना लोग यहाँ इस रूप में करते हैं, उस पर यह बात नहीं ठहरती। दूसरा हिस्सा तेज़ चाकू की तरह चलता है। उपासना में हम सामने कुछ रखते हैं, किसी मूर्ति को, किसी नाम को, किसी कल्पना को, और उसके सामने बैठ जाते हैं। जिस क्षण कोई चीज़ सामने आयी, वह वस्तु हो गयी, और वस्तु का एक देखने वाला अलग से खड़ा हो गया। मन्त्र उसी खड़े रह गये देखने वाले की ओर हाथ करके कहता है कि पता वहाँ है।

पहले मन्त्र को ध्यान से देखिए। वाणी उसे बोल नहीं सकती। यह तो हम मान भी लें। पर दूसरा हिस्सा और गहरा है: वाणी उसी से बोली जाती है। यानी जिस सत्ता का वर्णन वाणी नहीं कर पाती, उसी के बल पर वाणी चल रही है। जो शब्द उसे पकड़ने में हार जाते हैं, वे शब्द भी उसी से उठ रहे हैं। यह एक अजीब घेरा है, और इसी घेरे में हमारा सारा जीवन कट रहा है। हम जिससे बोलते हैं, उसे बोल नहीं पाते। हम जिससे देखते हैं, उसे देख नहीं पाते।

मन वाले मन्त्र में एक और बारीकी है। कहा गया कि जिससे लोग मन को मत, यानी जाना हुआ, कहते हैं। मन हमारा सबसे बड़ा औज़ार है, और हम उसे ही अन्तिम अदालत मान बैठे हैं। जो मन में आ जाये वह सच, जो मन में न बैठे वह झूठ। उपनिषद् मन को भी कठघरे में रख देता है। मन ख़ुद जाना जाता है, इसलिए मन भी वस्तु है। रात को जब मन नींद में डूब जाता है, तब भी कोई रहता है जो सुबह कहता है कि हम गहरी नींद सोये। उसकी गवाही मन के बिना ली गयी है।

अब सवाल यह है कि एक ही बात पाँच बार क्यों कही गयी। छन्द भरने के लिए नहीं। इसलिए कि हमारी पकड़ पाँच अलग-अलग जगहों पर है, और हर जगह से छुड़ाना पड़ता है। कोई अपनी बुद्धि पर मुग्ध है, कोई अपनी आँख पर, कोई अपनी आवाज़ पर, कोई अपनी साँस की साधना पर। पाँचों बार वही वाक्य वैसे ही लौटता है जैसे कोई हाथ रखकर बार-बार चेहरा उसी दिशा में घुमा दे। जिधर मन भागे, उधर से उसे उसी पंक्ति का सामना करना पड़े।

पहला खण्ड यहीं पूरा होता है, और उसने अब तक एक भी बात सीधे नहीं बतायी। उसने पूछा, फिर इन्कार किया, फिर इशारा किया, फिर पाँच बार वही इशारा दोहराया। कोई पढ़ने वाला यहाँ तक आकर यह सोच सकता है कि अच्छा, अब समझ आ गया। दूसरा खण्ड उसी पाठक की ओर मुड़ता है और उसका हाथ पकड़ लेता है।

सार: पाँच मन्त्र वाणी, मन, आँख, कान और प्राण को एक-एक करके लेते हैं और हर बार वही पंक्ति लौटाते हैं कि जो इनसे पकड़ा नहीं जाता और जिससे ये चलते हैं, वही ब्रह्म है। जो कुछ उपासना में सामने रखा जाता है, वह इस वचन की पकड़ में नहीं आता। दोहराव पाठ की सजावट नहीं है, हर औज़ार से पकड़ छुड़ाने का तरीक़ा है।

जिसने कहा जान लिया, उसने नहीं जाना (खण्ड 2)

दूसरा खण्ड सीधे पाठक पर हाथ रखता है। बताने वाला कहता है कि अगर आप यह मान बैठे हैं कि अच्छी तरह जान लिया, तो सच यह है कि ब्रह्म का बहुत थोड़ा-सा रूप ही आपकी पकड़ में आया है। जिस शब्द से यह कहा गया है वह है दहर, यानी छोटा, नन्हा, ज़रा-सा। बात आगे बढ़ती है कि इसका जो हिस्सा आपके भीतर है और जो हिस्सा देवताओं में है, वह अभी विचार करने योग्य ही है। एक झटके में सारी उपलब्धि वापस विचार की मेज़ पर रख दी गयी।

यह चोट कहीं और से नहीं आती, अपने ही आचार्य से आती है, और ठीक उस क्षण आती है जब शिष्य को लगा कि अब बात हाथ में आ गयी। इस उपनिषद् को यह ख़तरा मालूम है कि पहला खण्ड बहुत सुन्दर है, उसकी पंक्तियाँ याद रह जाती हैं, और याद रह जाना अपने आप में एक धोखा है। जो कान का कान वाली बात दोहरा सकता है, वह अपने को जानकार समझने लगता है। दूसरा खण्ड उसी समझ को उठाकर नीचे रख देता है।

अब शिष्य का उत्तर आता है, और वह इस पूरे पाठ का सबसे सधा हुआ वाक्य है। वह कहता है कि हम यह नहीं मानते कि हमने अच्छी तरह जान लिया, और यह भी नहीं कहते कि हम नहीं जानते। हम जानते भी हैं और नहीं भी जानते। यह चतुराई नहीं है। यह उस स्थिति का ठीक-ठीक वर्णन है जिसमें जानने वाला अपने आप को जान रहा हो। जिस चीज़ के बारे में हम कह सकते हैं कि हम इसे जानते हैं, वह हमसे अलग पड़ी रहती है। और जो हमसे अलग है ही नहीं, उसके बारे में जानने का दावा करते ही वह अलग हो जाती है।

इसी बात को अगला मन्त्र एक ऐसी पंक्ति में बाँधता है जो सुनते ही चौंका देती है। “यस्यामतं तस्य मतं मतं यस्य न वेद सः”, जिसके लिए वह अज्ञात है, उसके लिए वह ज्ञात है, और जिसके लिए वह ज्ञात हो गया, वह उसे नहीं जानता। मन्त्र अपनी बात और खोलता है कि वह जानने वालों के लिए अनजाना है और न जानने वालों के लिए जाना हुआ। इसे पहेली की तरह मत लीजिए, इसे व्याकरण की तरह लीजिए। जानना हमेशा दो चीज़ें माँगता है, एक जानने वाला और एक जानी जाने वाली वस्तु। जहाँ दूसरी चीज़ है ही नहीं, वहाँ जानने का वह ढाँचा ही काम नहीं करता। इसलिए जो ईमानदारी से कहता है कि हमारी पकड़ में नहीं आया, वह सही जगह खड़ा है।

चौथा मन्त्र इस अँधेरे में एक दीया रख देता है, और वह दीया बहुत काम का है। “प्रतिबोधविदितं मतममृतत्वं हि विन्दते”, प्रतिबोध में, यानी हर एक बोध के साथ-साथ, वह जाना जाता है, और वैसा जानना अमरता देता है। प्रतिबोध का अर्थ है हर जागने की क्रिया, हर एक बार का समझना। आप कुछ देखते हैं और समझ आता है, कोई बोलता है और अर्थ खुलता है, कोई नाम याद आता है। उस हर छोटे-से खुलने के भीतर वह मौजूद है। उसे किसी दूर के समाधि-क्षण में नहीं खोजना, वह इसी रोज़ के समझने में बैठा है, जैसे हर लहर में पानी बैठा है। मन्त्र आगे कहता है कि आत्मा से बल मिलता है और विद्या से अमृत।

और फिर खण्ड अपनी सबसे कड़ी बात रखकर विदा लेता है। अगर यहीं, इसी जीवन में, यह जान लिया गया तो सच है, और अगर यहाँ नहीं जाना गया तो बहुत बड़ा नाश है। महती विनष्टिः, इससे भारी शब्द इस उपनिषद् में कहीं नहीं आता। इसके साथ ही रास्ता भी बता दिया जाता है: भूतेषु भूतेषु विचित्य, एक-एक प्राणी में उसे चुन-चुनकर पहचानते हुए धीर लोग इस लोक से जाकर अमृत हो जाते हैं। ढूँढ़ना कहीं बाहर नहीं, हर जीव में, एक के बाद एक में।

सार: दूसरा खण्ड उस पाठक की ओर मुड़ता है जिसे लगा कि समझ आ गया, और कहता है कि जो पकड़ में आया वह बहुत थोड़ा है। शिष्य का उत्तर बहुत सधा है: हम जानते भी हैं और नहीं भी। जो कहता है जान लिया वह चूक गया, और जो हर बोध के भीतर उसे पहचानता है वह अमृत पाता है। इसी जीवन में यह न हुआ तो बहुत बड़ा नाश है।

जीत का नशा और एक अजनबी यक्ष (खण्ड 3, मन्त्र 1 से 6)

अब उपनिषद् छन्द छोड़ देता है और गद्य में उतर आता है, और पहली ही पंक्ति में एक कथा खुल जाती है। “ब्रह्म ह देवेभ्यो विजिग्ये”, ब्रह्म ने देवताओं के लिए विजय प्राप्त की, और उस ब्रह्म की विजय में देवता महिमावान हो उठे। मूल यह नहीं बताता कि जीत किस पर हुई और हारने वाला कौन था। शांकरभाष्य इसे देव-असुर संग्राम की जीत पढ़ता है, और वह पाठ परम्परा में चला आता है, पर मन्त्र ख़ुद इस बारे में चुप है। कथा को इस चुप्पी के साथ ही पढ़िए, क्योंकि उसका ज़ोर हारने वाले पर है ही नहीं, जीतने के बाद देवताओं के मन में जो उठा, उस पर है।

जो उठा वह यह था: “अस्माकमेवायं विजयोऽस्माकमेवायं महिमा”, यह विजय हमारी ही है, यह महिमा हमारी ही है। दो बार एव आया है, हमारी ही, हमारी ही। इस छोटे-से शब्द में सारी बात है। देवता झूठ नहीं बोल रहे थे, वे लड़े तो थे ही, जीत के मैदान में खड़े भी वही थे। बस उन्होंने बीच का एक हिस्सा भुला दिया, वह हिस्सा जिससे उनका बल चल रहा था। यह भूल इतनी आम है कि हम इसे भूल भी नहीं मानते। किसी काम के पूरा होने पर जो पहला वाक्य मन में उठता है, वह अक्सर यही होता है।

आगे जो पंक्ति है, वह इस कथा की सबसे सुन्दर पंक्ति है। तद्धैषां विजज्ञौ, उसने इनका यह भाव जान लिया। किसी ने शिकायत नहीं की, कोई दूत नहीं गया। जिसकी बात चल रही है वह मन के भीतर उठे वाक्य को वैसे ही जानता है जैसे हम अपनी हथेली को जानते हैं, क्योंकि वही मन का मन है। और जानकर उसने एक काम किया: वह उनके सामने प्रकट हो गया। दण्ड नहीं दिया, वचन नहीं कहा, बस सामने आकर खड़ा हो गया।

देवता उसे पहचान नहीं सके। मूल का वाक्य है तन्न व्यजानत, वे उसे नहीं जान पाये, और आपस में पूछने लगे “किमिदं यक्षम्”, यह यक्ष क्या है। यक्ष शब्द यहाँ किसी वनदेवता का नाम नहीं है, इसका भाव है एक अद्भुत उपस्थिति, कुछ ऐसा जो सामने तो है पर जिसका कोई ख़ाना हमारे पास नहीं। सोचिए तो हँसी भी आती है और सिहरन भी। जिस सत्ता के बल से वे अभी-अभी जीते थे, वह उनके सामने खड़ी थी और वे उसका नाम तक नहीं बता सकते थे।

देवताओं ने अग्नि से कहा, हे जातवेदा, जाइए और पता लगाइए कि यह यक्ष क्या है। अग्नि ने कहा, तथा, ऐसा ही हो। यहाँ भी एक बारीक बात है। पूरी सभा में से कोई ख़ुद नहीं गया, एक को भेजा गया। जानना भी उन्होंने एक काम की तरह सौंप दिया, जैसे कोई काग़ज़ किसी विभाग को भेज दिया जाये।

अग्नि उसकी ओर दौड़े। यक्ष ने उनसे कहा, आप कौन हैं। अग्नि ने उत्तर दिया, हम अग्नि हैं, और फिर तुरन्त जोड़ा, हम जातवेदा हैं। दूसरा नाम किसी ने पूछा नहीं था। परिचय एक ही बार में पूरा हो चुका था, दूसरा नाम अपनी प्रतिष्ठा के लिए जोड़ा गया। यक्ष ने अगला सवाल किया, आप में शक्ति क्या है। अग्नि ने कहा, इस पृथ्वी पर जो कुछ है, हम उस सबको जला सकते हैं। यह घमण्ड नहीं था, यह सच था। अग्नि का काम ही जलाना है और उनकी सीमा वहीं तक है जहाँ तक पदार्थ है।

तब यक्ष ने उनके सामने एक तिनका रख दिया और कहा, इसे जलाइए। अग्नि पूरे वेग से उस पर टूट पड़े, मूल कहता है सर्वजवेन, अपनी सारी तेज़ी के साथ। और वह तिनका नहीं जला। अग्नि उसी जगह से लौट आये। उन्होंने सभा में आकर जो कहा, उस पर ठहरकर सोचिए: हम यह जान नहीं सके कि यह यक्ष क्या है। जलाने की नाकामी का ज़िक्र तक नहीं किया। जिस काम पर भेजे गये थे, वह जानना था, और वही नहीं हुआ। तिनका तो केवल कसौटी था, और कसौटी भी कितनी छोटी चुनी गयी। पहाड़ रखा जाता तो हार में कुछ शान बची रहती। एक तिनका रखा गया।

सार: जीत ब्रह्म की थी और श्रेय देवताओं ने अपने नाम कर लिया। वह भाव उनके भीतर ही पकड़ लिया गया और सामने आकर खड़ा हो गया, पर कोई उसे पहचान न सका। अग्नि अपने दो नाम गिनाकर और सब कुछ जला देने का दावा करके गये, और एक तिनके पर पूरे वेग से टूटकर भी हार गये। लौटकर उन्होंने यही कहा कि जान नहीं सके।

वायु का खाली हाथ, और इन्द्र की आँखों से ओझल (खण्ड 3, मन्त्र 7 से 12)

अब देवताओं ने वायु से कहा, हे वायु, आप जाइए और जानिए कि यह यक्ष क्या है। वायु ने भी कहा, तथा। यहाँ मूल पाठ लगभग अक्षर-अक्षर वही दोहराता है जो अग्नि के साथ हुआ था, और यह दोहराव जानबूझकर है। सभा ने अपनी रीति नहीं बदली। पहली नाकामी से किसी ने यह नहीं सीखा कि शायद भेजने का तरीक़ा ही ग़लत है। उन्होंने बस दूसरा नाम चुन लिया, जैसे पहला औज़ार टूट जाने पर उसी दराज़ से दूसरा औज़ार निकाल लिया जाये।

वायु उसकी ओर दौड़े। वही सवाल आया, आप कौन हैं। और वही उत्तर लौटा, दो नामों के साथ: हम वायु हैं, हम मातरिश्वा हैं। मातरिश्वा नाम का भाव है अन्तरिक्ष में बिना रुके बहने वाला। अग्नि की तरह वायु ने भी अपना दूसरा, अधिक भारी नाम अपने आप जोड़ दिया। यक्ष ने वही अगला सवाल रखा, आप में शक्ति क्या है। वायु ने कहा, इस पृथ्वी पर जो कुछ है, हम उस सबको उठा ले जा सकते हैं। और यह भी सच था। हवा जब चलती है तो छत उड़ा ले जाती है, पेड़ जड़ समेत गिरा देती है, समुद्र को खड़ा कर देती है।

यक्ष ने वही तिनका सामने रख दिया और कहा, इसे उठा लीजिए। वायु पूरे वेग से उस पर झपटे और वह तिनका अपनी जगह से नहीं हिला। वायु लौट आये और उन्होंने भी ठीक वही वाक्य कहा जो अग्नि ने कहा था: हम जान नहीं सके कि यह यक्ष क्या है। दो देवता, दो अलग सामर्थ्य, एक ही तिनका, और एक ही वाक्य। इस दोहराव में कथा की हँसी भी है और उसका दंश भी। जिस तिनके पर पूरी पृथ्वी जला देने वाला और पूरी पृथ्वी उड़ा ले जाने वाला दोनों हार जायें, उस तिनके में कुछ नहीं बदला था। बदला यह था कि वह किसकी मरज़ी से वहाँ पड़ा था।

अब देवताओं ने इन्द्र से कहा, हे मघवा, आप जाइए और जानिए कि यह यक्ष क्या है। इन्द्र ने भी कहा, तथा, और उसकी ओर दौड़े। और यहाँ कथा अचानक मुड़ जाती है। तस्मात्तिरोदधे, वह उनसे छिप गया, उनकी आँखों के सामने से ओझल हो गया। न कोई सवाल पूछा गया, न कोई नाम लिया गया, न कोई तिनका रखा गया। इन्द्र को परीक्षा का मौक़ा तक नहीं मिला।

ऊपर से देखें तो यह सबसे बुरी बीती। अग्नि और वायु को कम से कम बातचीत तो मिली, अपना परिचय देने का अवसर तो मिला। इन्द्र के पास लौटने के लिए कोई क़िस्सा भी नहीं था। पर ज़रा और ठहरिए। अग्नि और वायु अपने-अपने दावे के साथ गये थे और दावे के साथ ही लौटे। इन्द्र के सामने से जब वह उपस्थिति हट गयी, तो जो बचा वह खाली आकाश था, और उस खाली में इन्द्र खड़े रह गये, बिना दावे के, बिना उत्तर के, बिना नाम के। यही ख़ालीपन उनका सबसे बड़ा लाभ बना।

और वे सभा में लौटे ही नहीं। मूल कहता है कि उसी आकाश में वे एक स्त्री के पास पहुँचे, अत्यन्त शोभायमान, उमा हैमवती। और उनसे पूछा, यह यक्ष क्या है। ध्यान दीजिए कि इन्द्र ने अब वही प्रश्न किसी और से पूछा है। अग्नि और वायु जिस सवाल को जीतकर हल करने गये थे, इन्द्र उसे पूछकर हल कर रहे हैं। दौड़ने से जो नहीं मिला, वह पूछने से मिलने वाला है, और पूछने के लिए पहले हाथ खाली होना ज़रूरी था।

सार: वायु का क़िस्सा अग्नि के क़िस्से की नक़ल है, वही दो नाम, वही बड़ा दावा, वही तिनका, वही लौटकर कही गयी हार। इन्द्र के साथ कथा मुड़ जाती है, उनसे वह उपस्थिति छिप ही जाती है और पीछे खाली आकाश रह जाता है। उसी खालीपन में इन्द्र उमा हैमवती से जाकर वही सवाल पूछते हैं, और यही पूछना उनका रास्ता खोलता है।

उमा हैमवती ने नाम खोल दिया (खण्ड 4, मन्त्र 1 से 3)

उमा का उत्तर बहुत छोटा है। उन्होंने कहा, वह ब्रह्म है। फिर उन्होंने दूसरी बात जोड़ी, और वही असली चोट है: “ब्रह्मणो वा एतद्विजये महीयध्वम्”, ब्रह्म की ही विजय में आप सब महिमावान हुए हैं। जिस महिमा पर देवता फूले हुए थे, उसका मालिकाना हक़ एक वाक्य में लौटा दिया गया। तब जाकर इन्द्र ने जाना कि वह ब्रह्म है। मूल का शब्द है ततो हैव, उसके बाद ही, तभी जाकर।

इस ततो हैव पर रुकिए। ज्ञान दौड़ने से नहीं आया, न परीक्षा पास करने से आया। वह तब आया जब कोई दूसरा बता गया, और बताने वाली एक ऐसी उपस्थिति थी जो सभा में शामिल नहीं थी। देवताओं की पूरी बैठक, उनकी सारी व्यवस्था, उनका विभाग-विभाग करके काम सौंपना, कुछ काम नहीं आया। काम वह आया जो आकाश में खड़ा होकर बिना किसी दावे के पूछा गया।

मूल उमा के बारे में बस इतना कहता है, अत्यन्त शोभायमान, उमा हैमवती। हैमवती यानी हिमवान से सम्बन्ध रखने वाली। इससे आगे कथा उनका कोई परिचय नहीं देती, न कोई वंश, न कोई पूर्व-कथा, और हमें भी इससे आगे नहीं जाना चाहिए। शांकरभाष्य उन्हें विद्या का साकार रूप पढ़ता है, वह ज्ञान जो ठीक समय पर सामने आ खड़ा होता है, और यह पढ़ना उस भाष्य का है, मूल का अपना वचन नहीं। इतना मूल से ही साफ़ है कि उत्तर देवसभा के भीतर से नहीं आया, बाहर से आया।

अगला मन्त्र इस कथा का फल बाँटता है, और वह बँटवारा चौंकाने वाला है। कहा गया कि इसीलिए ये तीन देवता, अग्नि, वायु और इन्द्र, बाक़ी देवताओं से बढ़कर हैं, क्योंकि इन्होंने उसे सबसे पास से छुआ और इन्होंने ही उसे सबसे पहले ब्रह्म के रूप में जाना। सोचिए, जिन दो ने खुली हार पायी थी, वे भी बढ़ गये। जो सभा में बैठे रह गये और जिनकी कोई हार दर्ज नहीं हुई, वे पीछे रह गये।

नेदिष्ठं पस्पर्शुः, उन्होंने उसे सबसे पास से छुआ। छूना शब्द यहाँ बहुत सोचकर रखा गया है। अग्नि ने तिनके पर अपना पूरा बल लगाया और वहीं उनकी सीमा उनके सामने खुली। वायु के साथ भी वही हुआ। जो अपनी सीमा को अपनी आँखों से देख लेता है, वह उस सत्ता के सबसे पास पहुँच जाता है जो हर सीमा के पार है। जो कभी अपनी हद तक गया ही नहीं, उसके लिए यह मुलाक़ात होती ही नहीं।

और तीसरा मन्त्र इन्द्र को सबसे ऊपर रखता है, उसी दो कारणों से: उन्होंने उसे सबसे पास से छुआ, और उन्होंने ही सबसे पहले उसे ब्रह्म के रूप में जाना। इन्द्र का पास से छूना वह था जब वह उनके सामने से ओझल हुआ और उनके हाथ में कुछ न बचा। और पहले जानना वह था जब उन्होंने पूछा। इस कथा में ऊँचाई का पैमाना बल नहीं है, न जीत है। पैमाना यह है कि कौन कितने पास तक गया और किसने पूछने की विनय दिखायी।

सार: उमा तीन शब्दों में गुत्थी खोल देती हैं, वह ब्रह्म है, और आपकी सारी महिमा उसी की विजय से मिली है। इन्द्र तभी जाकर पहचानते हैं। अग्नि, वायु और इन्द्र बाक़ी देवताओं से इसलिए बढ़ गये कि उन्होंने उसे सबसे पास से छुआ, यानी अपनी सीमा को अपनी आँखों से देखा, और इन्द्र सबसे ऊपर इसलिए कि उन्होंने सबसे पहले पहचाना।

बिजली की चमक, पलक की झपक, और वह नाम तद्वनम् (खण्ड 4, मन्त्र 4 से 9)

कथा ख़त्म होते ही उपनिषद् एक आख़िरी काम करता है। वह कहता है, अब इसका आदेश सुनिए, यानी इसकी ओर इशारा करने का ढंग। और फिर वह कोई परिभाषा नहीं देता, दो दृश्य रख देता है। पहला देवताओं के धरातल पर है: जैसे बिजली कौंधी और एक आवाज़ निकली, आह। दूसरा भी वहीं का है: जैसे पलक झपकी और वही आवाज़ निकली। मूल में उस स्वर पर एक लम्बा चिह्न लगा है, आ३, यानी वह आवाज़ खिंची हुई है, वैसी ही जैसी अचानक चौंधिया जाने पर मुँह से निकलती है।

यह सिखाने का बड़ा अजीब तरीक़ा है और बहुत सटीक तरीक़ा है। बिजली एक क्षण को कौंधती है और पूरा आकाश दिख जाता है, और अगले ही क्षण अँधेरा वैसा का वैसा। पलक झपकने में भी उतना ही समय लगता है। उपनिषद् कह रहा है कि उसका पता उसी नाप का है, उतना ही अचानक और उतना ही छोटा। जो लोग किसी लम्बी, टिकाऊ, सधी हुई अनुभूति की प्रतीक्षा में बैठे हैं, उनसे यह मन्त्र कहता है कि जो मिलेगा वह कौंध की तरह मिलेगा, और उसे पहचानना आपका काम है।

फिर वह भीतर की ओर मुड़ता है और कहता है, अब अध्यात्म की ओर से सुनिए। जिसकी ओर मन जाता-सा है, और जिसके सहारे यह बार-बार उसका स्मरण करता है, और जो संकल्प है। यहाँ इव शब्द पर ध्यान दीजिए, गच्छति इव, जाता-सा है। मन उसकी ओर सचमुच जा नहीं सकता, क्योंकि वह मन का मन है और पहला ही खण्ड कह चुका है कि वहाँ मन नहीं जाता। पर हर बार जब मन उस ओर झुकता है, तब जाने जैसा कुछ होता है। और भीतर जो स्मरण बार-बार उठता है, जो चाह बार-बार उसी दिशा में मुड़ जाती है, वह भी उसी का संकेत है।

अब उपनिषद् उसे एक नाम देता है, और यह नाम पूरे पाठ में सबसे कोमल जगह है। वह कहता है, वह तद्वनम् नाम वाला है, उसकी उपासना तद्वन के रूप में करनी चाहिए। वन धातु का अर्थ है चाहना, प्रेम करना। तद्वनम् यानी वह जिसे सब चाहते हैं, जिसकी ओर हर चाह जा रही है। और मन्त्र इसका फल बताता है: जो इसे इस तरह जानता है, उसे सब प्राणी चाहने लगते हैं। जिसने सबकी चाह के केन्द्र को पहचान लिया, वह ख़ुद सबके प्रेम में आ जाता है। इतने कठोर उपनिषद् का अन्त इस मीठे वचन पर होना अपने आप में कुछ कहता है।

इसके बाद एक छोटा-सा संवाद है जो पूरे पाठ की चाबी है। कोई कहता है, भगवन्, मुझे उपनिषद् कहिए। और उत्तर मिलता है कि उपनिषद् आपसे कह दिया गया, हमने आपसे ब्राह्मी उपनिषद् ही कहा है। यानी जो अभी-अभी सुना, वही था। मन, प्राण और वाणी के सवाल, कान का कान, जान लेने के दावे का खण्डन, और फिर वह तिनका जिस पर अग्नि हार गये। पूछने वाला शायद और कुछ की प्रतीक्षा में था, कोई अलग से दिया जाने वाला गुप्त वचन। बताने वाला कह देता है कि रहस्य अलग से नहीं आता, वह इसी कथा में बँटा हुआ था।

फिर उसकी नींव बतायी जाती है, और यहाँ कोई छूट नहीं दी जाती। उसकी प्रतिष्ठा हैं तप, दम और कर्म; वेद उसके सब अंग हैं; सत्य उसका घर है। तप यानी अपने पर मेहनत, दम यानी इन्द्रियों पर क़ाबू, कर्म यानी जो करना है उसे करते रहना। यह सूची उस दरवाज़े पर लगी है जिससे होकर वह कोमल नाम मिलता है। कौंध की बात सुनकर कोई यह न सोच ले कि बस बैठे-बैठे कौंध की राह देखनी है। ज़मीन तैयार रखनी पड़ती है, वरना कौंध आकर चली जाती है और कुछ दिखता ही नहीं।

आख़िरी वाक्य कहता है कि जो इसे इस तरह जानता है, वह पाप को दूरकर उस अनन्त, सबसे बड़े स्वर्गलोक में प्रतिष्ठित होता है, प्रतिष्ठित होता है। दो बार प्रतितिष्ठति कहा गया है, और यह दोहराव इस उपनिषद् का पूरा होना है, वैसे ही जैसे गाने वाला आख़िरी पंक्ति दो बार गाकर हाथ नीचे रख देता है।

सार: आदेश परिभाषा से नहीं, दो कौंधों से दिया जाता है, बिजली की चमक और पलक की झपक। भीतर की ओर वह संकेत है जिसकी ओर मन जाता-सा है और जिसका स्मरण बार-बार उठता है। उसका नाम तद्वनम् है, वह जिसे सब चाहते हैं, और उसे जानने वाले को सब प्राणी चाहने लगते हैं। नींव में तप, दम, कर्म, वेद और सत्य रखे हैं, और यहीं यह उपनिषद् पूरा होता है।

और अन्त में, अपनी ओर

इस कथा का यक्ष हमारे दिनों में भी आता है, बस वह इतना तेजोमय नहीं होता कि पहचान में आ जाये। कोई काम बरसों की मेहनत के बाद पूरा होता है, और पूरा होने के अगले ही क्षण भीतर एक वाक्य उठता है, यह हमने किया। वाक्य ग़लत भी नहीं होता, हमने किया ही होता है। बस उसमें से वह हिस्सा गिर जाता है जिससे करने की ताक़त आयी थी: वह शरीर जो हमें मिला, वह बुद्धि जो हमारी बनायी हुई नहीं, वे लोग जो ठीक समय पर मिल गये, वह साँस जो बिना पूछे चलती रही। देवता भी यही भूले थे, और उनकी भूल पर कोई दण्ड नहीं आया, बस एक तिनका सामने रख दिया गया।

तिनका हर किसी के जीवन में अलग-अलग होता है। किसी के लिए वह एक रिश्ता है जिसे वह अपनी सारी समझदारी से नहीं सुलझा पाता। किसी के लिए एक आदत है जो बीस साल से नहीं छूटती। किसी के लिए एक रात है जिसमें नींद नहीं आती, चाहे वह दिन में कितने ही बड़े फ़ैसले क्यों न लेता हो। हम उस पर सर्वजवेन टूटते हैं, पूरी तेज़ी से, और वह वहीं का वहीं पड़ा रहता है। ऐसे क्षण में अग्नि वाला वाक्य याद रखने लायक़ है। वे यह कहकर नहीं लौटे कि हम जला नहीं सके, वे यह कहकर लौटे कि हम जान नहीं सके। अपनी नाकामी को अपने अज्ञान के नाम से पुकार लेना ही पहला सही क़दम है।

और उसके बाद इन्द्र वाला क़दम है। हाथ खाली हों तो सभा में लौटकर सफ़ाई देने के बजाय उसी खाली आकाश में खड़े रहिए और किसी से पूछ लीजिए। पूछना इस कथा में सबसे ऊँचा काम है, दौड़ने से भी ऊँचा। साथ ही प्रतिबोधविदितम् वाली बात जेब में रखिए: वह किसी दूर की घटना में नहीं, आज के हर छोटे समझ जाने में मौजूद है, हर उस पल में जब कुछ खुलता है और आप जानते हैं कि खुला। इसी उपनिषद् की शान्तिपाठ में एक प्रार्थना है, “माऽहं ब्रह्म निराकुर्याम्”, हमसे ब्रह्म का इनकार न हो। यही इस पूरे पाठ की सबसे छोटी और सबसे बड़ी माँग है: जीत के नशे में, हार के क्षोभ में, तिनके के सामने, कहीं भी उस भेजने वाले से इनकार न हो जाये।

आधार: केन उपनिषद्, खण्ड 1 से 4; मूल पाठ के साथ पढ़ा गया, विवादित स्थलों पर शांकरभाष्य का संकेत।