वही गीता, एक शान्त आवाज़ में लौटी
महायुद्ध समाप्त हो चुका था। जिनके लिए लड़ा गया, वे जीत तो गए थे, पर जीत के साथ जो ख़ालीपन आता है उसे भी जान रहे थे। उसी बीच एक शान्त दिन, इन्द्रप्रस्थ की उसी सभा में जहाँ कभी इतना कुछ टूटा था, कृष्ण और अर्जुन साथ बैठे थे, दो मित्र, जिनके बीच अब रथ और रणभूमि नहीं, बस एक लम्बी थकान और एक गहरा प्रेम था।
बातों-बातों में अर्जुन ने वह बात कह दी जो कोई शिष्य अपने गुरु से कहने में हिचकता है। केशव, उन्होंने धीरे से कहा, रण के ठीक मुहाने पर, जब मैं अपने ही लोगों को सामने देख कर ढह गया था, आपने मुझे जो परम उपदेश दिया था, वह अब मेरे मन से निकल गया है। मैं उसे फिर से जानना चाहता हूँ।
कृष्ण के चेहरे पर एक हल्की-सी झुँझलाहट आई, और उसके पीछे एक मुस्कान भी। वह योग, अर्जुन, मैंने तुम्हें एक ऊँची घड़ी में कहा था, उन्होंने कहा, जब मेरा सारा अस्तित्व एकाग्र था। वही वाणी अक्षर-अक्षर अब लौटा देना सम्भव नहीं, क्योंकि वह उस क्षण की थी। पर निराश मत हो। एक पुरानी कथा के सहारे, उसी सार को मैं तुम्हें फिर देता हूँ। और इस तरह वह उपदेश शुरू हुआ जिसे अनुगीता कहते हैं, गीता की प्रतिध्वनि, एक शान्त और धीमे स्वर में।
जो कर्म कभी नहीं मरता
कृष्ण ने सबसे पहले उस सच पर हाथ रखा जिससे हर मनुष्य कभी न कभी टकराता है। शुभ हो या अशुभ, कोई कर्म नष्ट नहीं होता, उन्होंने कहा। हर कर्म अपना फल ले कर लौटता है, और जब तक वह फल भोग नहीं लिया जाता, वह कहीं नहीं जाता। इसलिए सच्ची चतुराई कर्म से भागने में नहीं, उसे समझ कर, आसक्ति छोड़ कर करने में है। यही गीता की पहली साँस थी, और यहीं से अनुगीता ने अपने पंख खोले।

भीतर की वेदी
फिर कृष्ण ने एक पुरानी कथा सुनाई, एक पति और पत्नी का संवाद। पत्नी ने पति से पूछा कि असली यज्ञ कहाँ होता है, बाहर की वेदी पर या कहीं और। और पति ने जो उत्तर दिया वह इस पूरे उपदेश की कुंजी है। सबसे बड़ा यज्ञ बाहर किसी अग्निकुण्ड में नहीं, उसने कहा, हमारे अपने भीतर चलता रहता है। हमारी इन्द्रियाँ ही वेदियाँ हैं, हमारी साँसें ही आहुतियाँ हैं, और हमारा हर सजग क्षण ही वह हवन है जिसमें अहंकार धीरे-धीरे जलता है। जो इस भीतर के यज्ञ को साध लेता है, उसे बाहर के विधानों की मुहताजी नहीं रहती।
इस छोटी-सी कथा से कृष्ण एक बड़ी बात कह गए, कि साधना का असली मैदान कहीं दूर मन्दिर या जंगल में नहीं, हमारे अपने शरीर और मन में है, और हम चाहें तो हर साँस को एक आहुति बना सकते हैं।
इन्द्रियों का झगड़ा
एक और कथा कृष्ण ने सुनाई, जिसमें भीतर की शक्तियाँ ही आपस में उलझ पड़ीं। आँख ने कहा, मैं सबसे बड़ी हूँ, मेरे बिना संसार दिखता ही नहीं। कान ने कहा, नहीं, मैं; जीभ, नाक, त्वचा, सब ने अपना-अपना दावा किया, और मन ने तो सबसे ऊँचा दावा किया। झगड़ा सुलझा नहीं तो एक-एक कर वे शरीर छोड़ कर जाने लगे, यह देखने को कि किसके बिना जीवन रुक जाता है।
आँख चली गई, मनुष्य अंधा हो कर भी जीता रहा। कान गया, बहरा हो कर भी जीता रहा। एक-एक कर सब गए, और हर बार शरीर किसी तरह चलता रहा। पर जब प्राण ने जाने को पाँव उठाया, तो सारी इन्द्रियाँ एक साथ डगमगाने लगीं, मानो किसी ने उनकी जड़ ही खींच ली हो। तब सबको समझ आया कि असली स्वामी वह दिखावटी बड़ा नहीं, वह चुपचाप भीतर बहने वाला प्राण है, जिस पर सब टिके हैं। अहंकार का यह झगड़ा वहीं शान्त हो गया।

संसार का वन, और नौ द्वारों का नगर
कृष्ण ने इस संसार को एक घने वन की तरह दिखाया, जिसमें संकल्प के डाँस-मच्छर भिनभिनाते हैं, शोक और हर्ष की धूप-छाँव बदलती रहती है, मोह का अँधेरा छाया रहता है, और लोभ के साँप पाँवों के पास रेंगते हैं। इस वन को पार करना ही जीवन है, और जो भीतर की ओर मुड़ कर अपने स्वामी को पहचान लेता है, वही इसे बिना भटके पार कर जाता है।
इसी क्रम में उन्होंने इस शरीर को नौ द्वारों वाला एक नगर कहा, जिसमें वह अव्यक्त, सर्वव्यापी तत्त्व बसता है। हम सोचते हैं हम इस नगर के मालिक हैं, पर असली निवासी तो वह है जो इन सब आँख-कान-द्वारों के पीछे चुपचाप साक्षी बना बैठा है। उसे पहचान लेना ही सारी विद्या का सार है।
तीन रंग, और एक आख़िरी आवाज़
फिर कृष्ण ने उन तीन गुणों की बात की जो हर मनुष्य के भीतर आपस में गुँथे रहते हैं, सत्त्व, रजस् और तमस्, स्थिरता, बेचैनी और जड़ता। इन्हें अलग-अलग पकड़ना कठिन है, क्योंकि ये एक-दूसरे में घुले रहते हैं, जैसे एक ही दीये में लौ, गरमी और धुआँ। जो इन रंगों को पहचान कर इनके पार देखना सीख लेता है, वही अपने ऊपर इनका राज नहीं चलने देता।

और अन्त में कृष्ण ने वह दृश्य रखा जिसमें स्वयं ब्रह्मा ऋषियों को वही परम रहस्य समझाते हैं, कि इन पाँचों भूतों का, इन सारी इन्द्रियों का स्वामी अन्ततः मन ही है, नियम में भी और छूट में भी; और उस मन को साध लेना ही सबसे बड़ी जीत है। यहीं अनुगीता पूरी होती है।
अर्जुन चुप सुनते रहे। यह वह गर्जना नहीं थी जो कुरुक्षेत्र के बीच उठी थी, जहाँ कृष्ण ने अपना विराट रूप दिखाया था। यह उसी सत्य की एक धीमी, घरेलू-सी आवाज़ थी, मानो वही गीत किसी शान्त शाम को, दोस्त के कन्धे पर हाथ रख कर फिर से गुनगुनाया गया हो। और शायद इसीलिए इसे अनुगीता कहते हैं, वही परम बात, युद्ध की ऊँचाई से उतर कर, जीवन की सीध में लौटी हुई।
यह कथा महाभारत के अश्वमेध पर्व की अनुगीता पर आधारित है, विस्तृत कहानी-रूप में, मूल के कथा-क्रम और भाव का अनुसरण करते हुए। (अनुगीता गीता का शब्दशः दोहराव नहीं, उसी सार की पुनर्प्रस्तुति है।)