अंग 253

अंग
253
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਪਉੜੀ ॥
ਯਯਾ ਜਾਰਉ ਦੁਰਮਤਿ ਦੋਊ ॥
ਤਿਸਹਿ ਤਿਆਗਿ ਸੁਖ ਸਹਜੇ ਸੋਊ ॥
ਯਯਾ ਜਾਇ ਪਰਹੁ ਸੰਤ ਸਰਨਾ ॥
ਜਿਹ ਆਸਰ ਇਆ ਭਵਜਲੁ ਤਰਨਾ ॥
ਯਯਾ ਜਨਮਿ ਨ ਆਵੈ ਸੋਊ ॥ ਏਕ ਨਾਮ ਲੇ ਮਨਹਿ ਪਰੋਊ ॥
ਯਯਾ ਜਨਮੁ ਨ ਹਾਰੀਐ ਗੁਰ ਪੂਰੇ ਕੀ ਟੇਕ ॥
ਨਾਨਕ ਤਿਹ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ਜਾ ਕੈ ਹੀਅਰੈ ਏਕ ॥੧੪॥
पउड़ी ॥
यया जारउ दुरमति दोऊ ॥
तिसहि तिआगि सुख सहजे सोऊ ॥
यया जाइ परहु संत सरना ॥
जिह आसर इआ भवजलु तरना ॥
यया जनमि न आवै सोऊ ॥ एक नाम ले मनहि परोऊ ॥
यया जनमु न हारीऐ गुर पूरे की टेक ॥
नानक तिह सुखु पाइआ जा कै हीअरै एक ॥१४॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी- (हे भाई !) बुरी मति और माया का प्यार जला दो। इसे त्याग के ही सुख में अडोल अवस्था में टिके रहोगे। जा के संतों की शरण पड़ो। इसी आसरे इस संसार-समुंद्र में से (सही सलामत) पार लांघ सकते हैं। वह बारंबार जन्मों में नहीं आता। जो बंदा एक प्रभू का नाम ले के अपने मन में परो लेता है। पूरे गुरू का आसरा लेने से मानस जनम व्यर्थ नहीं जाता। हे नानक ! जिस मनुष्य के हृदय में एक प्रभू बस गया है। उसने आत्मिक आनंद हासिल कर लिया है। 14।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਅੰਤਰਿ ਮਨ ਤਨ ਬਸਿ ਰਹੇ ਈਤ ਊਤ ਕੇ ਮੀਤ ॥
ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਉਪਦੇਸਿਆ ਨਾਨਕ ਜਪੀਐ ਨੀਤ ॥੧॥
सलोकु ॥
अंतरि मन तन बसि रहे ईत ऊत के मीत ॥
गुरि पूरै उपदेसिआ नानक जपीऐ नीत ॥१॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक॥ जिस मनुष्य को पूरा गुरू लोक-परलोक में साथ देने वाला परमात्मा नजदीक दिखा देता है। परमात्मा उस मनुष्य के मन में तन में हर समय आ बसता है। हे नानक ! पूर्ण गुरु उपदेश देता है, ऐसे प्रभू को सदा सिमरना चाहिए। 1।
ਪਉੜੀ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਸਿਮਰਹੁ ਤਾਸੁ ਕਉ ਜੋ ਅੰਤਿ ਸਹਾਈ ਹੋਇ ॥
ਇਹ ਬਿਖਿਆ ਦਿਨ ਚਾਰਿ ਛਿਅ ਛਾਡਿ ਚਲਿਓ ਸਭੁ ਕੋਇ ॥
ਕਾ ਕੋ ਮਾਤ ਪਿਤਾ ਸੁਤ ਧੀਆ ॥
ਗ੍ਰਿਹ ਬਨਿਤਾ ਕਛੁ ਸੰਗਿ ਨ ਲੀਆ ॥
ਐਸੀ ਸੰਚਿ ਜੁ ਬਿਨਸਤ ਨਾਹੀ ॥
ਪਤਿ ਸੇਤੀ ਅਪੁਨੈ ਘਰਿ ਜਾਹੀ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਕਲਿ ਕੀਰਤਨੁ ਗਾਇਆ ॥
ਨਾਨਕ ਤੇ ਤੇ ਬਹੁਰਿ ਨ ਆਇਆ ॥੧੫॥
पउड़ी ॥
अनदिनु सिमरहु तासु कउ जो अंति सहाई होइ ॥
इह बिखिआ दिन चारि छिअ छाडि चलिओ सभु कोइ ॥
का को मात पिता सुत धीआ ॥
ग्रिह बनिता कछु संगि न लीआ ॥
ऐसी संचि जु बिनसत नाही ॥
पति सेती अपुनै घरि जाही ॥
साधसंगि कलि कीरतनु गाइआ ॥
नानक ते ते बहुरि न आइआ ॥१५॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी- जो प्रभू आखिर में सहायता करता है। उसे हर वक्त याद रखो। ये माया तो दस दिनों की साथिन है। हरेक जीव इसे यहीं छोड़ के चला जाता है। माता। पिता। पुत्र। पुत्री कोई भी किसी का साथी नहीं। घर-स्त्री कोई भी चीज कोई जीव यहाँ से साथ ले के नहीं जा सकता। (हे भाई !) ऐसी राशि-पूंजी इकट्ठी कर जिसका कभी नाश ना हो। और इज्जत से उस घर में जा सकें। जहाँ से कोई निकाल ना सके। हे नानक ! जिन लोगों ने मानस जनम ले के सत्संग में प्रभू की सिफत-सालाह की। वे बार-बार जनम-मरण के चक्कर में नहीं आए। 15।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਅਤਿ ਸੁੰਦਰ ਕੁਲੀਨ ਚਤੁਰ ਮੁਖਿ ਙਿਆਨੀ ਧਨਵੰਤ ॥
ਮਿਰਤਕ ਕਹੀਅਹਿ ਨਾਨਕਾ ਜਿਹ ਪ੍ਰੀਤਿ ਨਹੀ ਭਗਵੰਤ ॥੧॥
सलोकु ॥
अति सुंदर कुलीन चतुर मुखि ङिआनी धनवंत ॥
मिरतक कहीअहि नानका जिह प्रीति नही भगवंत ॥१॥

हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ यदि कोई बड़ा सुंदर। अच्छे कुल वाला। समझदार। ज्ञानवान व धनवान भी हो। पर। हे नानक ! जिन के अंदर भगवान की प्रीति नहीं। वे मुर्दे ही कहे जाते हैं (भाव। विकारों में मरी हुई आत्मा वाले)। 1।
ਪਉੜੀ ॥
ਙੰਙਾ ਖਟੁ ਸਾਸਤ੍ਰ ਹੋਇ ਙਿਆਤਾ ॥
ਪੂਰਕੁ ਕੁੰਭਕ ਰੇਚਕ ਕਰਮਾਤਾ ॥
ਙਿਆਨ ਧਿਆਨ ਤੀਰਥ ਇਸਨਾਨੀ ॥
ਸੋਮਪਾਕ ਅਪਰਸ ਉਦਿਆਨੀ ॥
ਰਾਮ ਨਾਮ ਸੰਗਿ ਮਨਿ ਨਹੀ ਹੇਤਾ ॥
ਜੋ ਕਛੁ ਕੀਨੋ ਸੋਊ ਅਨੇਤਾ ॥
ਉਆ ਤੇ ਊਤਮੁ ਗਨਉ ਚੰਡਾਲਾ ॥
ਨਾਨਕ ਜਿਹ ਮਨਿ ਬਸਹਿ ਗੁਪਾਲਾ ॥੧੬॥
पउड़ी ॥
ङंङा खटु सासत्र होइ ङिआता ॥
पूरकु कुंभक रेचक करमाता ॥
ङिआन धिआन तीरथ इसनानी ॥
सोमपाक अपरस उदिआनी ॥
राम नाम संगि मनि नही हेता ॥
जो कछु कीनो सोऊ अनेता ॥
उआ ते ऊतमु गनउ चंडाला ॥
नानक जिह मनि बसहि गुपाला ॥१६॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी- कोई मनुष्य छे शास्त्रों को जानने वाला हो। (प्राणयाम के अभ्यास में) श्वास ऊपर चढ़ाने। रोक के रखने व नीचे उतारने के कर्म करता हो। धार्मिक चर्चा करता हो। समाधियां लगाता हो। (स्वच्छता की खातिर) अपने हाथों से रोटी पकाता हो। जंगलों में रहता हो। पर यदि उसके मन में परमात्मा के नाम का ध्यान नहीं। तो उसने जो कुछ किया व्यर्थ ही किया। हे नानक ! (कह,) जिस मनुष्य के मन में प्रभू जी नहीं बसते। उससे मैं एक नीच जाति के आदमी को बेहतर समझता हूँ। 16।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਕੁੰਟ ਚਾਰਿ ਦਹ ਦਿਸਿ ਭ੍ਰਮੇ ਕਰਮ ਕਿਰਤਿ ਕੀ ਰੇਖ ॥
ਸੂਖ ਦੂਖ ਮੁਕਤਿ ਜੋਨਿ ਨਾਨਕ ਲਿਖਿਓ ਲੇਖ ॥੧॥
सलोकु ॥
कुंट चारि दह दिसि भ्रमे करम किरति की रेख ॥
सूख दूख मुकति जोनि नानक लिखिओ लेख ॥१॥

हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ हे नानक ! जीव अपने किए कर्मों के संस्कारों के अनुसार चारों तरफ दसों दिशाओं में भटकते हैं। लिखे लेखों के मुताबिक ही सुख-दुख-मुक्ति अथवा जनम-मरण के चक्कर मिलते हैं। 1। 2।
ਪਵੜੀ ॥
ਕਕਾ ਕਾਰਨ ਕਰਤਾ ਸੋਊ ॥
ਲਿਖਿਓ ਲੇਖੁ ਨ ਮੇਟਤ ਕੋਊ ॥
ਨਹੀ ਹੋਤ ਕਛੁ ਦੋਊ ਬਾਰਾ ॥
ਕਰਨੈਹਾਰੁ ਨ ਭੂਲਨਹਾਰਾ ॥
ਕਾਹੂ ਪੰਥੁ ਦਿਖਾਰੈ ਆਪੈ ॥
ਕਾਹੂ ਉਦਿਆਨ ਭ੍ਰਮਤ ਪਛੁਤਾਪੈ ॥
ਆਪਨ ਖੇਲੁ ਆਪ ਹੀ ਕੀਨੋ ॥
ਜੋ ਜੋ ਦੀਨੋ ਸੁ ਨਾਨਕ ਲੀਨੋ ॥੧੭॥
पवड़ी ॥
कका कारन करता सोऊ ॥
लिखिओ लेखु न मेटत कोऊ ॥
नही होत कछु दोऊ बारा ॥
करनैहारु न भूलनहारा ॥
काहू पंथु दिखारै आपै ॥
काहू उदिआन भ्रमत पछुतापै ॥
आपन खेलु आप ही कीनो ॥
जो जो दीनो सु नानक लीनो ॥१७॥

हिन्दी अर्थ: पवड़ी- करतार स्वयं ही (जगत के कार्य-व्यवहार का) सबब बनाने वाला है। कोई जीव उसके द्वारा लिखे लेख को मिटा नहीं सकता। कोई काम उसे दूसरी बार (ठीक करके) नहीं करना पड़ता। सृजनहार भूलने वाला नहीं। (जो भी काम वह करता है। उसमें गलती नहीं रह जाती।) किसी जीव को खुद ही (जिंदगी का सही) रास्ता दिखाता है। किसी को खुद ही जंगल में भटका के पछुतावे की ओर ले जाता है। ये सारा जगत-खेल प्रभू ने स्वयं ही बनाया है। हे नानक ! जो कुछ वह जीवों को देता है। वही उन्हें मिलता है। 17।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਖਾਤ ਖਰਚਤ ਬਿਲਛਤ ਰਹੇ ਟੂਟਿ ਨ ਜਾਹਿ ਭੰਡਾਰ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਜਪਤ ਅਨੇਕ ਜਨ ਨਾਨਕ ਨਾਹਿ ਸੁਮਾਰ ॥੧॥
सलोकु ॥
खात खरचत बिलछत रहे टूटि न जाहि भंडार ॥
हरि हरि जपत अनेक जन नानक नाहि सुमार ॥१॥

हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ (भक्तो के पास सिफत सालाह के इतने खजाने इकट्ठे हो जाते हैं कि) वे उन खजानों को खाते-खरचते-भोगते हैं, पर वह कभी खत्म नहीं होते। हे नानक ! अनेकों जीव। जिनकी गिनती नहीं की जा सकती। परमात्मा का नाम जपते हैं ।1।
ਪਉੜੀ ॥
ਖਖਾ ਖੂਨਾ ਕਛੁ ਨਹੀ ਤਿਸੁ ਸੰਮ੍ਰਥ ਕੈ ਪਾਹਿ ॥
ਜੋ ਦੇਨਾ ਸੋ ਦੇ ਰਹਿਓ ਭਾਵੈ ਤਹ ਤਹ ਜਾਹਿ ॥
ਖਰਚੁ ਖਜਾਨਾ ਨਾਮ ਧਨੁ ਇਆ ਭਗਤਨ ਕੀ ਰਾਸਿ ॥
ਖਿਮਾ ਗਰੀਬੀ ਅਨਦ ਸਹਜ ਜਪਤ ਰਹਹਿ ਗੁਣਤਾਸ ॥
ਖੇਲਹਿ ਬਿਗਸਹਿ ਅਨਦ ਸਿਉ ਜਾ ਕਉ ਹੋਤ ਕ੍ਰਿਪਾਲ ॥
ਸਦੀਵ ਗਨੀਵ ਸੁਹਾਵਨੇ ਰਾਮ ਨਾਮ ਗ੍ਰਿਹਿ ਮਾਲ ॥
ਖੇਦੁ ਨ ਦੂਖੁ ਨ ਡਾਨੁ ਤਿਹ ਜਾ ਕਉ ਨਦਰਿ ਕਰੀ ॥
ਨਾਨਕ ਜੋ ਪ੍ਰਭ ਭਾਣਿਆ ਪੂਰੀ ਤਿਨਾ ਪਰੀ ॥੧੮॥
पउड़ी ॥
खखा खूना कछु नही तिसु संम्रथ कै पाहि ॥
जो देना सो दे रहिओ भावै तह तह जाहि ॥
खरचु खजाना नाम धनु इआ भगतन की रासि ॥
खिमा गरीबी अनद सहज जपत रहहि गुणतास ॥
खेलहि बिगसहि अनद सिउ जा कउ होत क्रिपाल ॥
सदीव गनीव सुहावने राम नाम ग्रिहि माल ॥
खेदु न दूखु न डानु तिह जा कउ नदरि करी ॥
नानक जो प्रभ भाणिआ पूरी तिना परी ॥१८॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी- प्रभू सब ताकतों का मालिक है। उसके पास किसी भी चीज की कमी नहीं। उसके भक्त जन उसकी रजा में चलते हैं। उन्हें वह सब कुछ देता है। प्रभू का नाम-धन भक्तों की राशि पूँजी है। इसी खजाने को वे सदा इस्तेमाल करते हैं। वे सदा गुणों के खजाने प्रभू को सिमरते हैं और इससे उनके अंदर क्षमा-निम्रता-आत्मिक आनंद व अडोलता (आदि गुण प्रफुल्लित होते हैं)। वह जिन पर कृपा करता है। वह आत्मिक आनंद से जीवन की खेल खेलते हैं और सदा खिले रहते हैं। वे सदा ही धनवान हैं। उनके माथे चमकते हैं। उनके हृदय में बेअंत नाम-धन है। उनकी आत्मा को कोई कलेश नहीं। कोई दुख नहीं (जीवन-वणज में उन्हें कोई जिंमेदारी) बोझ नहीं लगती। जिन पर प्रभू मेहर की नजर करता है। हे नानक ! जो मनुष्य प्रभू को अच्छे लगते हैं। (जीवन-व्यापार में) वह कामयाब हो जाते हैं। 18।

संदर्भ: यह अंग 253 है, राग Gauree का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।

M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।

दिल्ली मेट्रो की सुबह 7 बजे की rush hour, हर चेहरा अपनी जल्दी में, और मन के अंदर यह विचार।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 56 पंक्तियों का है, 9 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 253” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Gauree राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 254 →, पीछे का: ← अंग 252

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।